Headlines

महाजनो येन गतः स पन्थाः कब-कैसे प्रयोग होगा और कहां नहीं

महाजनो येन गतः स पन्थाः कब-कैसे प्रयोग होगा और कहां नहीं महाजनो येन गतः स पन्थाः कब-कैसे प्रयोग होगा और कहां नहीं

“आज धर्म की व्याख्या शास्त्रज्ञ नहीं, अपितु शास्त्रज्ञान से सर्वथा अभिज्ञ लोग कर रहे हैं।”

सम्प्रति स्वेच्छाचारियों द्वारा एक शास्त्र वचन का ही दुरूपयोग करते हुये कर्मकांड में स्वेच्छाचार को सिद्ध करने के लिये जो प्रयोग किया जाता है वो है “महाजनो येन गतः स पन्थाः।” अनेकानेक अवसरों पर आपने ऐसा कहते-सुनते देखा हो और यह भी संभव है कि आपने भी प्रयोग किया हो। कर्मकांड के विषय में यह प्रयोग ही नहीं होगा, क्योंकि यहां किसी न किसी पक्ष का विधान पूर्वस्वीकृत होता है। जब स्वीकृत रूप से पक्ष है ही तो कहने की आवश्यकता ही क्या है अर्थात इसके संबंध में कुछ विशेष चिंतन-मनन आवश्यक है।

महाजनो येन गतः स पन्थाः कब-कैसे प्रयोग होगा और कहां नहीं

इसमें कोई आपत्ति नहीं कि शास्त्रों में यत्र-तत्र विरोधाभास भी प्रतीत होता है और सर्वत्र संगति स्थापित हो ही ऐसा नहीं होता। यद्यपि अधिकतर संगति स्थापन करने का प्रयास होना ही चाहिये किन्तु जब किसी भी प्रकार संगति न बैठे तो यही विकल्प बचता है कि कोई एक पक्ष जो देश-वर्णादि के आधार पर अधिक उचित हो उसको ग्रहण किया जाय। इस प्रकार का प्रयास पूर्वाचार्यों द्वारा पूर्वकृत ही है वर्त्तमान में उसे केवल समझ लेना भी पर्याप्त होगा।

किन्तु विघ्न यह है कि मूढ़ों को पूर्वाचार्यों का मत जानना-समझना ही नहीं है, विद्वान बनना है।

चलो ऐसा माना जायेगा कि मार्ग अवरुद्ध नहीं होता किन्तु उक्त अधिकार के लिये जिन पूर्वाचार्यों ने मार्ग प्रशस्त किया कदाचित उसमें कुछ प्रमाण छूट गया हो तो उन प्रमाणों का संकलन करके सम्यक् रूपेण सिद्ध तो करो। किन्तु ऐसा करने का सामर्थ्य नहीं, परम्परा-देशाचार आदि भी चिल्लाना है किन्तु शास्त्रविधान (पूर्वाचार्यों द्वारा निर्द्धिष्ट) भी पालन नहीं करना केवल स्वेच्छाचार करना है और इसको आवरण देने के लिये “महाजनो येन गतः स पन्थाः” मिल जाता है जिसका कर्मकांड में विचार ही असंगत है।

महाजनो येन गतः स पन्थाः कब-कैसे प्रयोग होगा और कहां नहीं

यजमान के लिये भी अनिवार्य ज्ञान

यदि अपनी परम्परा का त्याग कर दे तो वह शाखारण्ड कहलाता है, यहां उपनयन काल में ही मुख्य भाव है। किन्तु उपनयन के पश्चात् आगे वह सभी कर्म (अध्ययनादि) अपनी शाखा के अनुसार ही करे एवं उसके सभी संस्कार। आगे भिन्न आचार्य से भिन्न वेदादि का भी अध्ययन कर सकता है। इतनी बात तो उसके लिये है जो वेदादि अध्ययन करे, जो करता ही नहीं उसके लिये उपनयन में सावित्री दीक्षा और वेदारम्भ में एकाध मुख्य ऋचा पाठ (उच्चारण मात्र) कराया जाता है।

इस परिस्थिति में वह अन्य शाखादि का अध्ययन भी नहीं कर सकता क्योंकि प्रथम स्वशाखा का सम्पूर्ण अध्ययन आवश्यक होता है। संस्कार, यज्ञादि अर्थात सभी कर्मों (कर्मकांड) में स्वशाखोक्त विधि का अनुसरण करे यह अनिवार्य होता है। इसके लिये सूत्रग्रन्थ का अध्ययन करना आवश्यक होता है। अधिकांशतः कर्मकांड का मुख्य अंग हवन ही होता है अथवा मुख्य अंग कुछ अन्य हो तो भी हवन मिलता है।

मुख्य रूप से स्वशाखोक्त विधान से हवन (अग्निहोत्री को तो अग्निहोत्र विषय में ही हवन विधान का भी विशेष ज्ञान प्राप्त हो जाता है) का ज्ञान अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त स्वस्तिवाचन, प्रमुख सूक्त (रक्षोघ्न, पवमान, पुरुष, रुद्र आदि), कलशस्थापन, प्रमुख मण्डल पूजन (मुख्य – मातृका, नवग्रह, वास्तु, योगिनी और सर्वतोभद्र), श्राद्ध एवं संस्कार से जुड़े विषय का ज्ञान अनिवार्य होता है। किन्तु समस्या यह है कि अब यह ज्ञान कर्मकांडी (प्रतिष्ठित) पंडित भी प्राप्त नहीं करते तो यजमानों की बात ही क्या करें। हवन विधान तक का ज्ञान नहीं होता है, कुछ दिन पूर्व में एक महर्षि (स्वघोषित) का सोशल मीडिया वीडियो देकर सिद्ध किया गया।

कर्मकांड में ब्राह्मण की मुख्य आवश्यकता

“वर्तमान में कुल परंपरा चिल्लाने वाले ही अपनी वास्तविक परंपरा का परित्याग कर चुके हैं।”

कर्मकांड में ब्राह्मण की मुख्य आवश्यकता उपस्थिति (सान्निध्य), निर्देशन, भोजन, प्रतिग्रहादि ही होता है, गौण आवश्यकता जापक, होता, पाठक आदि के लिये प्रतिनिधि रूप में। किन्तु वर्त्तमान में जब किसी को कुछ ज्ञात ही नहीं तो कर्मकांडी का अर्थ और ब्राह्मण की आवश्यकता का तात्पर्य यह लिया जाता है कि वो करायेंगे और कराते हैं, इसका कारण यजमान का पूर्णतः अनभिज्ञ होना है।

इस प्रकार पूर्णतः अनभिज्ञ व्यक्ति को अपनी परम्परा का भी कोई ज्ञान नहीं होता और वह परम्परा का तात्पर्य भी बिल्ली को बांधना, मातृका पूजन में ५ – ७ – ९ आदि कितने जगह गोबर लगया जायेगा, मंडप बनेगा या नहीं, मण्डप में भाई-गोतिया खायेगा, पितामह (बाबा) उपनयन करेंगे, चाचा आदि मातृका पूजन करेगा गोत्र से भिन्न नहीं आदि विषयों को ग्रहण करता है जिसमें अधिकांशतः निराधार अथवा शास्त्रविरुद्ध भी होता है।

कुल परम्परा चिल्लाने वाले को देखें तो अधिकांशतः परम्परा का भी परित्याग कर चुके हैं जैसे : उचित काल में उपनयन-विवाहादि संस्कार, धौत धारण, भोज के नियम आदि एवं परम्परा विरुद्ध विषयों को अंगीकार करता जा रहा है जैसे जयमाला, मेंहदी-हल्दी रस्म, व्रात्यता, म्लेच्छाचार आदि। अब यहां आवश्यकता होती है बचाव के लिये शास्त्रीय आवरण की और तब एक शास्त्रीय वचन उद्धृत किया जाता है :

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः सः पन्थाः॥

मूढ़ता की सीमा को भी पार करते हुये यह जो धर्म के तत्व की बात कर रहा है उसे कर्मकांड मात्र से जोड़ देता है। यह कर्मकांड के विषय में है ही नहीं, धर्म के विषय में कहा गया है। किन्तु मतिभ्रम ऐसा है की शास्त्रविरुद्ध कर्म में आधार लेने के लिये अथवा स्वेच्छाचार में प्रवृत्त होने के लिये इस वचन का अनर्थपूर्वक ओट लिया जाता है।

यह वचन धर्म विषयक निर्णय हेतु कहा गया है और उसका नियम भी स्पष्ट कहा गया है कि जहां ऋषिवचन, शास्त्र वचन परस्पर विरुद्ध हों वहां अपनी कुल परम्परा के अनुसार करे। अब आगे की पीढ़ी कुलपरम्परा का तात्पर्य भी यह लेगी की २५ वर्ष के उपरांत उपनयन होता है, कोर्ट-पैंट या शेरवानी आदि पहनकर ही विवाह होता है, तीर्थ में केवल डुबकी लगाने जाते हैं, जूते-चप्पल पहनकर भी धर्माचरण किये जा सकते हैं, हवन में केवल आग जोड़ो और सूहा-हुआ करते हुये कुछ अपद्रव्य आग में फेंक दो।

महाजनो येन गतः सः पन्थाः का तात्पर्य

जबकि “महाजनो येन गतः सः पन्थाः” का तात्पर्य है कि जहां विरोधाभास दिखे वहां अपनी परम्परा से यह ज्ञात करो कि कौन सा पक्ष ग्रहण किया गया था ? जैसे नित्यकर्म किस प्रकार करें, शिखा किस प्रकार धारण करें, अन्न (ऊपज) में किसका-किसका भाग कितना प्रदान करें, क्या भोजन करें क्या न करें, परिवार-संबंधी-समाज आदि के साथ कैसा व्यवहार रखें, किसका अपमान कदापि न करें, आजीविका में क्या ग्रहण करें और यदि दोष है तो मार्जन कैसे करें, उपार्जित धन का विभिन्न कर्मों में भाग निर्धारण आदि कुल मिलकर जीवनचर्या किस प्रकार हो।

महाजनो येन गतः सः पन्थाः का तात्पर्य
महाजनो येन गतः सः पन्थाः का तात्पर्य

यदि भिन्न रूप से शास्त्रीय सन्दर्भ के आधार पर कहें तो धर्म के दश लक्षणों “धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥” को किस प्रकार ग्रहण करें और देश-काल-परिस्थिति के अनुसार किस प्रकार कितना परिवर्तन करें अर्थात यदि विपरीत धारा बह रही हो तो किस प्रकार आगे बढ़ें या आत्मोन्नति करें ?

वो निरे मूर्ख हैं जो महाजनो येन गतः सः पन्थाः का भाव कर्मकांड के विषय में ग्रहण करते हैं। ये तो पूर्वाचार्यों द्वारा निर्धारित ही है और वर्त्तमान में लिखित स्वरूप में भी उपलब्ध होता है जैसे व्रत निर्णय, विभिन्न पद्धति आदि। इसमें उन मूर्खों को करने के लिये रिक्त है क्या अर्थात कुछ भी नहीं। यदि भिन्नता है भी तो अपने क्षेत्रीय ग्रंथों से ज्ञात हो जायेगा। अन्य देशीय पोथी-पत्रों से भिन्नता होगी किन्तु स्वदेशीय ही ग्रहण करना है।

उत्कृष्ट उदाहरण

मैथिल परम्परा में “न मम” को ग्रहण नहीं किया गया है किन्तु मैथिलेत्तर परंपरा में ग्रहण किया गया है। मिथिला में ज्ञान की वो अवस्था रही जहां सब-कुछ भगवती को जगरना (निशा-पूजा) में चौरठ छींटकर समर्पित कर दिया जाता है। अब मेरा है कहां कि यह कहें “न मम” क्योंकि ये तो तब कहा जायेगा न जब उससे पुर “मम” भाव हो। आज के नवोदित कर्मकांडी इतने मूढ़ हैं कि इतना भी नहीं जानते और अब करते हैं।

इसी प्रकार पंचदेवता और षड्देवता दोनों पक्ष शास्त्रों में है तो मिथिला ने षड्देवता पक्ष को ग्रहण किया है और पद्धति-परम्परा से प्राप्त है एवं मैथिलेत्तरों में पंचदेवता पक्ष ग्रहण किया है। तो शास्त्रों, ऋषिमतों में जहां कहीं विरोध है उसमें जो करना है वह पूर्वाचार्यों द्वारा लिखित उपलब्ध है। इसमें “तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं न भिन्नं” के लिये स्थान रिक्त है कहां ?

निर्णय के अधिकारी

“विवाद और शास्त्रार्थ में अंतर है; दुराग्रही विवाद करते हैं, और विद्वान प्रामाणिक खंडन-मंडन।”

मान लिया जाय यदि कहीं रिक्त स्थान हो भी तो वह कार्य केवल शास्त्रज्ञ विद्वानों आचार्यों का है, वो उचित निर्णय करेंगे सबको निर्णय करने का तो अधिकार भी नहीं है। कर्मकांड के विषय में स्वयं ही स्वयं के लिये निर्णय नहीं लिया जा सकता, ये भी शास्त्रीय विधान है और परम्परा भी कि आचार्यों (विद्वान ब्राह्मणों) से ही निर्णय लेना चाहिये।

अब बात आयेगी कि किनको निर्णय का अधिकारी माने अर्थात किनका निर्णय अंतिम हो। तो वर्त्तमान में यह लक्षण से ही समझा जा सकता है। दो प्रकार के कर्मकांडी वा आचार्य-पुरोहित आदि ब्राह्मण होते हैं – एक तो केवल मुंह से कहते हैं और कहीं से कोई प्रमाण आदि देकर शास्त्रीय सिद्धि नहीं करते। किसी का कोई मत/निर्णय है तो उसके विरुद्ध दुराग्रह से बोलेंगे किन्तु शास्त्रीय विधि से खंडन नहीं करते हैं विवाद करते हैं। दूसरे वो जो किसी भी विषय पर जो कहा वह सिद्ध करते हैं और विरुद्ध में जो मत/निर्णय है उसका प्रामाणिक खंडन भी। द्वितीय वर्ग के विद्वानों का मत/निर्णय ग्राह्य होता है।

जो कह दिया सो कह दिया ऐसा बोलने वाले निर्णय के अधिकारी नहीं होते क्योंकि दुराग्रही होते हैं। ये लोग किसी भी प्रश्न का उत्तर तत्काल ही दे देते हैं और किसी भी प्रश्न का उत्तर अज्ञात नहीं होता अथवा किसी भी प्रश्न का शास्त्रीय उत्तर ज्ञात ही नहीं होता, जो मुंह में आये बक देंगे, ऐसे लोगों का भाव यह होता है कि यदि तत्काल उत्तर न दिया तो मूर्ख सिद्ध हो जाऊंगा, वास्तव में मूर्ख ही होते हैं बस तत्काल उत्तर देकर ज्ञानी सिद्ध होने का भाव रखते हैं।

वहीं जो अधिकारी होते हैं वो अनेकों बार अज्ञात-अदृष्ट आदि कह सकते हैं, समय ले सकते हैं, बाद में बताऊंगा, सोचना होगा आदि कहेंगे। उनको तत्काल उत्तर न देने पर मूर्ख सिद्ध हो जाऊंगा ऐसा भाव आता ही नहीं। किसी भी विषय पर प्रमाणों द्वारा अपना निष्कर्ष प्रदान करते हुये खंडन का भी अवसर अन्य को प्रदान करते हों, पुनः प्रातिखंडन पूर्वक सिद्धि करने में सक्षम हों अथवा यदि प्रतिखंडन न कर सकें तो अगला सिद्ध विषय ग्रहण करते हों अर्थात जो उचित होगा वह ग्रहण किया जायेगा ऐसी मान्यता हों, ऐसे विद्वानों का ही निर्णय ग्राह्य होता है।

अनधिकारी का एक उदाहरण

दक्षवचन के रूप में एक विशेष श्लोक प्राप्त होता है : मुण्डनं पिण्डदानं च प्रेतकर्म च सर्वशः । न जीवत्पितृकः कुर्याद्गुर्विणीपतिरेव च ॥”

इस वचन के विषय में मेरे एक ग्रामीण पंडित से ही जो विमर्श हुआ वो समझने के लिये अत्युपयोगी है : यहां “गुर्विणीपति” का तात्पर्य को लेकर विवाद आरम्भ कर दिये, प्रथम तो गुर्विणी का अर्थ गुरु की पत्नी ग्रहण किये, तदनन्तर आगे चर्चा में गर्भिणी स्पष्ट करने पर विवाद यह करने लगे कि “गर्भिणीपति” अर्थात वह पति जो गर्भ धारण करे ऐसा कैसे हो सकता है, पति तो गर्भधारण ही नहीं कर सकता।

महाजनो येन गतः स पन्थाः कब-कैसे प्रयोग होगा और कहां नहीं
महाजनो येन गतः स पन्थाः कब-कैसे प्रयोग होगा और कहां नहीं

आगे रमापति, लक्ष्मीपति आदि का उदाहरण से समझाने का प्रयास करने पर भी अड़े रहे और उस स्थान पर और भी पंडित थे, अंततः सब हंसने लगे क्योंकि पति गर्भिणी कैसे होगा यह भाव ग्रहण करना और अड़ जाना “कह दिया सो कह दिया” का नियम, हास्यास्पद ही था।

ऐसे लोग निर्णय देने के अधिकारी ही नहीं होते।

तो क्या कर्मकाण्ड में बिल्कुल प्रयोग ही नहीं होगा

किन्तु एक अनर्थ यहां भी न किया जाना चाहिये कि कर्मकांड में किसी भी प्रकार “महाजनो येन गतः स पन्थाः” का प्रयोग नहीं किया जा सकता, वास्तव में यहां ये कहा जा रहा है कि वही होता है, पृथक से इसका प्रयोग करने का तात्पर्य ही कुछ न कुछ विपरीत करने का गुप्त भाव प्रकट करता है। क्योंकि सभी विषय तो निर्धारित-निर्द्दिष्ट ही हैं न। जो निर्दिष्ट नहीं है अथवा निर्द्दिष्ट से भिन्न है वहां पर प्रयोग होगा। यहां आगे प्रश्न आएगा कि जो निर्द्दिष्ट नहीं हो तो ?

ठीक है तो उन विषयों को सूचीबद्ध करें उनमें से ढेरों विषय निर्द्दिष्ट ही प्राप्त होंगे यह अन्य विद्वानों से संवाद करने पर ज्ञात हो जायेगा। आपको जो नहीं मिला आप उसे अनिर्द्दिष्ट नहीं कह सकते, हां ये अवश्य है कि यदि आप शास्त्रीय दृष्टिकोण रखते हैं तो निर्द्दिष्ट वा अनिर्द्दिष्ट सभी विषयों की समीक्षा कर सकते हैं।

उदाहरण देना चाहूंगा कि पूर्वाचार्यों द्वारा ग्रहण किया गया श्राद्ध विषयक पक्ष वर्त्तमान पद्धतिकारों ने विकृत कर दिया। वर्त्तमान में श्राद्ध कर्म का स्वरूप पूर्णतः विकृत देखने को मिलता है एवं यदि ऐसा है तो इसका निःसंदेह युगानुसार विश्लेषण और संशोधन किया जा सकता है और किया गभी गया है, जिसका नाम है “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं”

कर्मकांड में नये विचार-विश्लेषण-संशोधन आदि किये ही नहीं जा सकते ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा है और न ही कहा जा सकता है इसी से सिद्ध हो जाता है कि निरर्थक प्रयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि यदि यही सिद्धांत स्वीकार किया जाय तो संशोधन, पुनर्विचार, देश-काल-परिस्थिति का विचार आदि सभी पक्ष ही खंडित हो जायेंगे। फिर जो पूर्व से होते आया है वह ज्ञात करें एवं यथावत पालन करें। अज्ञात हो गया तो क्या करें पुनः यहां आचार्यों को निर्धारण करना ही होगा न।

अर्थात कर्मकांड में “महाजनो येन गतः स पन्थाः” का प्रयोग सामान्यतः होगा ही नहीं, और यदि करना है तो उन विषयों को संकलन किया जाय जो केवल १००० वर्ष पूर्व से यथावत हो रहा है। उतने दूर क्या जाओगे आवश्यकता ही नहीं है, मैंने अपने जीवन में ही कर्मकांड को विकृत होते देखा है, बाल्यकाल में जो स्वरूप था अब वो नहीं है, विकृत हो चुका है। इस विकृत स्वरूप के पक्ष में “महाजनो येन गतः स पन्थाः” अथवा देशाचार आदि चिल्लाना मूढ़ता से भिन्न कुछ भी नहीं है। यदि चिल्लाना भी है तो इस विकृति के विरुद्ध चिल्लाओ जिससे विकृति का निवारण हो सके।

निष्कर्ष

सनातन धर्म की रक्षा केवल ऊंचे स्वर में ‘कुल-परंपरा’ चिल्लाने से नहीं, बल्कि शास्त्रोक्त विधियों के प्रामाणिक ज्ञान और आचरण से होगी। “महाजनो येन गतः” की ओट लेकर स्वेच्छाचारी न बनकर पूर्वाचार्यों के दिखाए मार्ग पर चलना होगा। जब तक यजमान स्वयं सजग नहीं होगा और ‘जो कह दिया सो कह दिया’ वाले अज्ञानी पुरोहितों के स्थान पर प्रामाणिक और शास्त्रनिष्ठ विद्वानों को आश्रय नहीं लेगा, तब तक धार्मिक क्रियाओं का वास्तविक फल प्राप्त होना असंभव है।

यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि “महाजनो येन गतः स पन्थाः” कोई ऐसा वैधानिक छिद्र (Loophole) नहीं है जिसका आश्रय लेकर कर्मकांड में स्वेच्छाचार को शास्त्रीय आवरण दिया जा सके। यह वचन वहाँ प्रवृत्त होता है जहाँ आत्मज्ञान, धर्म के दस लक्षणों के निर्वहन और परिस्थितिविशेष में जीवनचर्या के निर्धारण हेतु अनेक शास्त्रीय मत हों । कर्मकांड का मार्ग तो पूर्वाचार्यों द्वारा पद्धतियों और सूत्रग्रंथों में पूर्णतः रेखांकित और पूर्व-स्वीकृत है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार पूर्णतः सनातन धर्म के सूत्रग्रंथों, पद्धतियों और स्मृतियों की मर्यादा पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी क्षेत्रीय परंपरा या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि कर्मकांड के नाम पर होने वाले मनमाने आचरण और शास्त्रीय वचनों के दुरुपयोग का निवारण करना है। सुविज्ञ पाठक इसे केवल एक शास्त्रीय और सुधारात्मक दृष्टिकोण के रूप में ग्रहण करें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

Leave a Reply