अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार

अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार

लगभग ३ वर्षों में अधिकमास लगता ही रहता है और वर्त्तमान में मतिछिन्नता सीमा से पार कर चुकी है एवं इस कारण प्रमाण व विद्वानों का सम्पूर्ण निर्णय रहते हुये भी मनमुखी कर्म में प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है और उसी में से एक है अधिकमास पड़ने पर श्राद्ध का विचार। इस विषय में एक तथ्य तो पूर्णतः स्पष्ट है कि वर्त्तमान के मतिच्छिन्न सिद्ध होने पर भी स्वेच्छाचारिता का त्याग नहीं कर सकते किन्तु भविष्य की पीढ़ी में भटकाव न हो इस कारण इस विषय पर गंभीर विमर्श और सप्रमाण सिद्धि की आवश्यकता है।

इस आलेख में अधिकमास संबंधी श्राद्ध का विस्तृत और सप्रमाण विमर्श किया गया है जो परवर्तियों के लिये संशय निवारक सिद्ध होगा।

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अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार

अधिकमास में श्राद्ध का तात्पर्य अधिकांश लोग मात्र एकादशाह-द्वादशाह और सांवत्सरिक (क्षयाह) श्राद्ध ही लेंगे जो कि अल्पज्ञता के कारण है। श्राद्ध के अनेकानेक अवसर होते हैं एवं उनमें से कौन से श्राद्ध होंगे और कौन से नहीं इस प्रकार विचार किया जा सकता है न कि यदि कोई श्राद्ध होगा तो इसका तात्पर्य शेष सभी श्राद्ध भी प्रशस्त होंगे अथवा कोई श्राद्ध निषिद्ध है तो इसका तात्पर्य शेष सभी श्राद्ध भी निषिद्ध होंगे ऐसा नहीं है। अपितु भिन्न-भिन्न श्राद्धों के लिये भिन्न-भिन्न विधान हैं और वो प्रमाणों से स्पष्ट होंगे। एक बात अवश्य है कि विहित-निषिद्ध निर्णय तो सरलता से हो जायेगा किन्तु मुख्य विमर्श मृताह श्राद्ध अर्थात षोडश श्राद्ध (आद्य, मासिक, सपिंडीकरण), सांवत्सरिक (क्षयाह) श्राद्ध परक है।

अधिकमास लगने पर कब से कब तक षोडश श्राद्ध से सप्तदश श्राद्ध हो जायेगा अर्थात अधिकमास का भी श्राद्ध होगा अथवा नहीं होगा। यदि कोई त्रुटि हो गयी हो अर्थात यदि अधिकमास का श्राद्ध भी होना था किन्तु न हो पाया अर्थात सप्तदश श्राद्ध होना चाहिये था किन्तु षोडश श्राद्ध ही हो पाया तो आगे क्या ? आगे यदि अधिकमास से पूर्व ज्ञात हो जाये कि श्राद्ध होना चाहिये था किन्तु न हो पाया, यदि अधिकमास के पश्चात् ज्ञात हो तो क्या होगा ? कर्मलोप कब मान्य होगा और कब नहीं ? प्रायश्चित्त कब होगा और कब नहीं ?

इत्यादि अनेकानेक प्रश्नों का उत्तर निःसंदेह परवर्ती विद्वानों के लिये प्रस्तुत करना आवश्यक है। इसके पीछे कारण को भी समझना है कि यदि इस वर्ष (सवत्सर २०८३) ज्येष्ठ माह में अधिकमास लगा है और पूर्व वर्ष संवत्सर २०८२ के ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष में भी कोई सप्तदश श्राद्ध करा रहे थे तो किसी ने ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष का क्या कहें आषाढ़ कृष्ण पक्ष में भी षोडश श्राद्ध ही कराया।

इसका कारण भी वो एक प्रमाण बताते हैं जो कि वास्तव में प्रमाण है ही नहीं अपितु एक श्राद्ध पद्धतिकार का एक निर्देश है “एकादशमासाभ्यन्तरे यदि अधिमासपातो भवति तदा षोडशपदस्थाने सप्तदशपदं योज्यं” इसका प्रमाण क्या है एवं उस प्रमाण से तात्पर्य क्या है इसको भी समझना नितांत आवश्यक है क्योंकि मतिछिन्नता के कारण इसी निर्देश को आधार बनाने वाले अपण्डित सिद्ध हो सकें, आगे अनर्थ करने से बच सकें। सर्वप्रथम इस विश्लेषण के लिये जो प्रमाण अपेक्षित है उन प्रमाणों का अवलोकन करते हैं तदुपरांत उसके आधार पर तथ्यों को समझने का प्रयास करेंगे।

अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार

विषय के मुख्य प्रमाण

गर्भे वार्धुषिके भृत्ये श्राद्धकर्मणि मासिके । सपिण्डीकरणे नित्ये नाधिमासं विवर्जयेत् ॥
तीर्थस्नानं जपो होमो यवव्रीहितिलादिभिः । जातकर्मान्त्यकर्माणि नवश्राद्धं तथैव च ॥
मघात्रयोदशीश्राद्धं श्राद्धान्यपि च षोडश । चन्द्रसूर्यग्रहे स्नानं श्राद्धं दानं जपादिकम् ॥
कार्याणि मलमासेऽपि नित्यं नैमित्तिकं तथा ॥

यम वचन (स्मृति चन्द्रिका श्राद्ध कांड से)

संवत्सरातिरेको यो मासश्चैव त्रयोदशः । असुराणां तु मासोऽसौ तस्माद्देवविगर्हितः ॥
तस्मात्त्रयोदशं श्राद्धं न कुर्यान्नोपतिष्ठते ॥

ऋष्यश्रृंग वचन (स्मृति चन्द्रिका श्राद्ध कांड से)

श्राद्धीयाहनि संप्राप्ते अधिमासो भवेद्यदि । श्राद्धद्वयं प्रकुर्वीत एवं कुर्वन्न मुह्यति ॥
वृद्धवशिष्ठ वचन (स्मृति चन्द्रिका श्राद्ध कांड से)

वर्षे वर्षे तू यच्छ्राद्धं मातापित्रोर्मुतेऽहनि । मलमासे न कर्तव्यं व्याघ्रस्य वचनं यथा ॥
सत्यव्रत (स्मृति चन्द्रिका श्राद्ध कांड, वीरमित्रोदय से)

मलमासे मृतानां तु श्राद्धं यत्प्रतिवत्सरम् । मलमासे तु कर्तव्यं नान्येषां तु कथञ्चन ॥
पैठीनसी, भृगु (स्मृति चन्द्रिका श्राद्ध कांड से)

असङ्क्रान्ते तु कर्तव्यमाब्दिकं प्रथमं द्विजैः । तथैव मासिकं श्राद्धं सपिण्डीकरणं तथा ॥
हारीत, वशिष्ठ (स्मृति चन्द्रिका श्राद्ध कांड, वीरमित्रोदय से)

यौगादिकं मासिकञ्च श्राद्धश्चाऽऽपरपक्षिकम् । मन्वादिकं तैर्थिकञ्च कुर्यान्मासद्वयेऽपि च ॥
श्राद्धकल्पलता

पिण्डवर्जमसंक्रान्तौ संक्रान्तौ पिण्डसंयुतम् । प्रतिसंवत्सरं श्राद्धमेवं मासद्वयेऽपि च ॥
बृहत्पाराशर (श्राद्ध कल्पलता)

आब्दिकं प्रथमं यत् स्यात्तत्कुर्वीत मलिम्लुचे । त्रयोदशे (चतुर्दशे) च संप्राप्ते कुर्वीत पुनराब्दिकम् ॥
यम (श्राद्ध कल्पलता, वीरमित्रोदय)

एकसंज्ञौ यदा मासौ स्यातां संवत्सरे कचित् । तत्राद्ये पितृकार्याणि देवकार्याणि चोत्तरे ॥
शातातप (श्राद्ध कल्पलता)

मासपक्षतिथिस्पृष्टे यो यस्मिन्म्रियतेऽहनि । प्रत्यब्दं तु तथाभूतं क्षयाहं तस्य तं विदुः ॥
हेमाद्रि, व्यास(निर्णयसिंधु से)

नित्यनैमित्तिकेकुर्याच्छ्राद्धंकुर्यान्मलिम्लुचे । तिथिनक्षत्रवारोक्तं काम्यंनैव कदाचन ॥
जाबालि वचन (निर्णय सिंधु से)

मलेऽनन्यगतिं कुर्यान्नित्यां नैमित्तिकीं क्रियां ॥
काठक गृह्यसूत्र (निर्णय सिंधु से)

द्वादशाहंसपिंडांतं कर्मग्रहणजन्मनोः । सीमन्ते पुंसवेश्राद्धं द्वावेतौजातकर्मच ॥
रोगेशांतिरलभ्येच योगेश्राद्धव्रतानिच । प्रायश्चित्तनिमित्तस्य वशात्पूर्वेपरत्रच ॥
अब्दोदकुंभमन्वादि महालय युगादिषु ॥ श्रार्द्धदर्शेप्यहरहःश्राद्धमूनादिमासिकम् ॥
मलिम्लुचान्यमा सेषुमृतानांश्राद्धमाब्दिकम् । श्राद्धन्तुपूर्वदृष्टेषु तीर्थेष्वेवयुगादिषु ॥
मन्वादिषुचयद्दानं दानंदैनंदिनंचयत् । तिलगोभूहिरण्यानां संध्योपासनयोः क्रिया ॥
पर्वहोमश्चाग्रयणं साग्नेरिष्टिश्वपर्वणि । नित्याग्निहोत्रहोमश्च देवतातिथिपूजनम् ॥
स्नानंचस्नानविधिनाप्यभक्ष्यापेयवर्जन्म् । तर्पणं वानिमित्तस्य नित्यत्वादुभयत्र चे ॥

कालादर्श (निर्णय सिंधु से)

संवत्सरातिरेकेण मासो यः स्यान्मलिम्लुचः । तस्मिंस्त्रयोदश श्राद्धं न कुर्यादिंदुसंक्षय ॥
ऋष्यश्रृंग (निर्णय सिंधु से)

एकराशि स्थितेसूर्ये यदादर्शद्वयंभवेत् । दर्शश्राद्धंतदादौस्यान्नपरत्र मलिम्लुचे ॥
शूलपाणि (निर्णय सिंधु से)

मलमास मृतानां तु सौरंमानंसमाश्रयेत् । स एव दिवसस्तस्य श्राद्धपिंडोदकादिषु ॥
हेमाद्रि, व्यास (निर्णय सिंधु से)

उत्तरे देवकार्याणि पितृकार्याणि चोभयः ॥
व्यास (निर्णय सिंधु से)

सांवत्सरं न वर्धेत श्राद्धं यो मृतेहनि ॥
पैठीनसि (निर्णय सिंधु से)

आब्दिके पितृकार्ये च चान्द्रो मासः प्रशस्यते ॥
गर्ग (निर्णय सिंधु से)

विद्वद्जनों के निबंध पूर्व ही स्पष्ट हैं किन्तु वो संस्कृत में हैं और आज के पंडित उसे समझने में अक्षम हैं अथवा अवलोकन करके भी अनर्थ ही करने वाले हैं। इस विषय को अधिक स्पष्टता से समझने के लिये कृत्यसार समुच्चय में जो विश्लेषण है वो अत्युत्तम है और मैथिलों के लिये तो यही मान्य भी है अस्तु यदि उसे समझ लिया जाय तो विवाद ही न हो अर्थात आज मिथिला में भी जो विवाद कर रहे हैं वो स्वयं को अविवेकी, अल्पज्ञ सिद्ध करते हैं और ऐसे ही अल्पज्ञ-दिग्भ्रमित व्यक्ति मात्र विवाद करते हैं, स्वयं को पंडित सिद्ध करने के लिये यदि त्रुटिवश कुछ शास्त्रविरुद्ध बोल तो व्याकरण बल से जैसे-तैसे वही सिद्ध करते रहेंगे।

पंडित/विद्वान का तात्पर्य व्याकरणाचार्य होना, शिक्षक होना आदि जो हो गया है इसके कारण भी विवाद अधिक होता है। किसी भी विषय पर शास्त्रज्ञ के समक्ष ये व्याकरणाचार्य कर्मकांड विषयक चर्चा नहीं कर सकते और न ही करते हैं, कर्मकांड में भी इनका विषय केवल और केवल व्याकरण रहता है, शेष में लोकाचार/देशाचार/महाजनो येन गतः सा पन्थाः आदि रहता है अर्थात उस विषय पर कुछ बोलने में भी अक्षम होते हैं यह स्वीकारते हैं किन्तु इसमें भी एक छल ही सन्निहित रहता है कि शास्त्रज्ञ (यदि वो व्याकरणाचार्य नहीं है तो) उचित विचार भी न करे। जो त्रुटिपूर्ण हो वो यथावत ही रहना चाहिये।

अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार
अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार

संख्याबल में अधिक होने से ये नारकीय अपण्डित विजयी होते प्रतीत भी होते हैं, किन्तु वहां विजय नहीं होती, विजय तो तब होगी न जब शास्त्रीय पक्ष वाले व्यक्ति को निरुत्तर कर दिया जाय। यदि वो विषयान्तरित नहीं होता तो इसका तात्पर्य शास्त्रदस्यु की विजय नहीं है अपितु उसे अल्पज्ञ-मूर्ख समझकर विद्वान ने उसको चर्चा के ही अयोग्य सिद्ध किया। जिसे निर्णय चाहिये वह भी शब्दमात्र से विधि-विधान बोलने वाला होता है उसे भी उचित ग्रहण और अनुचित ग्रहण में कोई रूचि होती ही नहीं है। व्याकरणाचार्य/साहित्याचार्य और कर्मकांडी विद्वान में अंतर को इस प्रकार समझा जा सकता है :

  • व्याकरणाचार्य/साहित्याचार्य के मुंह से जयमाला अनुचित है और नहीं होना चाहिये ऐसा निकल ही नहीं सकता,
  • इन शास्त्रदस्युओं ने ही व्रात्य विषयक विवेक का हरण कर लिया है और पूरा समाज ही व्रात्य होता जा रहा है,
  • ये शास्त्रदस्यु ही द्वादशाह को प्रातः काल से आरम्भ करके सायं/रात्रि पर्यन्त श्राद्ध कराते रहते हैं।
  • ये शास्त्रदस्यु ही स्त्री/अनुपनीतों को भी हवन कराते रहते हैं, पैंट पहने वर से भी हवन कराते हैं।
  • अरे ये शास्त्रदस्यु तो कुर्सी पर बैठकर, चप्पल-जूता पहने हुये भी और विवाह पंडाल में मंच पर खड़े-खड़े भी वेद पाठ करते रहते हैं जो इनका शास्त्रदस्यु होना सिद्ध करता है।

यह निंदा ब्राह्मणों की नहीं है शास्त्रदस्यु वर्ग की है और वो निन्दनीय हैं। पुरोहित वर्ग को कुछ छूट दी जा सकती है और इस विषय में पुरोहित वर्ग सन्निहित नहीं है। विद्वान ब्राह्मण उपरोक्त एवं ऐसे सभी शास्त्रविरुद्ध विषय पर स्पष्टतः अनुचित कहेंगे, त्याग भी कर सकते हैं। किन्तु यदि त्याग न कर सकें तो भी अनुचित कहने में, शास्त्रविरुद्ध कहने में तो कोई समस्या नहीं है। उचित हेतु प्रयास तो कर सकते हैं न।

सम्बंधित विषय : क्षयाह श्राद्ध में एकोद्दिष्ट या पार्वण

हम मलमास विषयक चर्चा से पूर्व एक सम्बंधित चर्चा जो वार्षिक श्राद्ध की है उसे करना चाहेंगे।

सपिंडीकरणादूर्ध्वं प्रतिसंवत्सरंसुतैः । मातापित्रोः पृथक्कार्यमेकोद्दिष्टंमृतेहनि ॥
यम (निर्णय सिंधु से)

एकोद्दिष्टंतुकर्तव्यं पित्रोश्चैवमृतेहनि। एकोद्दिष्टंपरित्यज्य पार्वणंकुरुतेनरः॥
अकृतंतद्विजानीयाद्भवेच्चपितृघातकः ॥

व्यास (निर्णय सिंधु से)

सपिंडीकरणं कृत्वा कुर्यात्पार्वणवत्सदा । प्रतिसंवत्सरंश्राद्धं छागलेनोदितोविधिः ॥
यः सपिंडीकृतंप्रेतं पृथपिंडेनियोजयेत् । विधिघ्नस्तेनभवति पितृहाचोपजायते ॥

शातातप (निर्णय सिंधु से)

वार्षिक श्राद्ध के विषय में दो पक्ष है एक एकोद्दिष्ट का तो दूसरा पार्वण का एवं दोनों ही पक्ष दूसरे पक्ष को अनुचित भी सिद्ध करते हैं अर्थात स्पष्ट विरोधाभास है और व्याकरणाचार्य/साहित्याचार्य बस इसी को लेकर बकवास करते हुये यह स्थापित करते हैं कि शास्त्रविषयक चर्चा ही नहीं करनी चाहिये। जहां कहीं भी जो शास्त्रीय चर्चा को ही बाधित करने का प्रयास करता है उसे शास्त्रदस्यु कहा जा सकता है। क्योंकि विद्वानों का कार्य शास्त्रीय विमर्श/शास्त्रचिंतन ही होना चाहिये न कि शास्त्रचर्चा से वैराग्य।

ये शास्त्रदस्यु यहां जैसे आब्दिक/सांवत्सरिक/क्षयाह श्राद्ध की चर्चा को लाये तो अब यहां आब्दिक/सांवत्सरिक/क्षयाह और श्राद्ध शब्द की व्युत्पत्ति – अर्थ की ओर चर्चा को मोड़कर दिग्भ्रमित करने का प्रयास करने लगते हैं। अभी तत्काल में ही एक स्थान पर ऐसे ही शास्त्रदस्यु जुटे थे और शास्त्रज्ञ १ – २ ही थे। छन्दोगी और वाजसनेयी चर्चा आरम्भ होते ही जो श्रेष्ठ व्याकरणाचार्य था अर्थात शास्त्रदस्यु का नेता था उसने विषय को ही परिवर्तित करना आरम्भ कर दिया क्योंकि विषय की चर्चा में सक्षम ही नहीं था, गोत्र पर व्याकरण के अनुसार वक्तव्य देने में समर्थ था।

उसके लगुओं-भगुओं ने भी शास्त्रज्ञ को गोत्र के विषय पर बोलने के लिये उकसाना आरम्भ कर दिया और शास्त्रीय विमर्श के विषय का ही अपहरण कर लिया। इसी कारण ऐसे लोग शास्त्रदस्यु श्रेणी में गण्य होते हैं। ऐसे व्यावहारिक विषयों को उठाने का उद्देश्य यह है कि यदि आप लोगों में भी यह दोष है तो उसका मार्जन कर सकें। क्षयाह श्राद्ध विषयक दोनों पक्षों में शास्त्रज्ञों द्वारा संगति स्थापित किया जाता है यही परम्परा है और उसके रहस्य को समझने का प्रयास करना चाहिये न कि दोनों को परस्पर विरुद्ध घोषित करना चाहिये। इसमें संगति दो प्रकार से स्थापित किया गया है :

साग्न्योरौरसक्षेत्रजयोःपार्वणम् । निरग्निकयोस्त्वेकोद्दिष्टमित्याह ॥
कल्पतरु (निर्णय सिंधु से)
प्रत्यब्दंपार्वणेनैव विधिनाक्षेत्रजौरसौ । कुर्यात्तामितरे कुर्युरेकोद्दिष्टंसुतादश ॥
जातूकर्ण्य (निर्णय सिंधु से)

  • प्रथम यह कि औरस और क्षेत्रज पुत्र पार्वण करे इससे भिन्न हो तो एकोद्दिष्ट करे।
  • द्वितीय यह कि साग्निकों का पार्वण करे और निरग्निकों का एकोद्दिष्ट करे।

आगे यह दोनों ही पक्ष ग्राह्य है एवं जो औरस-क्षेत्रज से भिन्न पुत्र एकोद्दिष्ट करते हैं वो भी उचित हैं, जो निरग्निक एकोद्दिष्ट करते हैं वो भी उचित हैं। साग्निक का भी यदि औरस-क्षेत्रज से भिन्न अन्य १० प्रकार के पुत्रों में हो तो एकोद्दिष्ट ही करने वाला पक्ष स्पष्ट है। साग्निकों के औरस-क्षेत्रज पुत्र ही क्षयाह करें तो वो पार्वण विधि से करें शेष एकोद्दिष्ट करे। एक अन्य पक्ष यह भी है कि महालय में अथवा अमावस्या को जिसका क्षयाह हो वहां निरग्निक और दशप्रकार के पुत्र भी पार्वण विधि ग्रहण कर सकता है।

अब इसी प्रकार रहस्य तक पहुंच सके ऐसा विवेक हो तभी अधिकमास और श्राद्ध विषयक चर्चा को प्रमाणों से समझा भी जा सकता है अन्यथा शास्त्रदस्यु आदि का तो अपहरण के अतिरिक्त ज्ञान और शास्त्र से कोई लेना-देना ही नहीं होता। शास्त्र भी अपना रहस्य उसी के समक्ष प्रकट करते हैं जो शास्त्रनिष्ठ हो, दस्यु के लिये रहस्य भी प्रकट नहीं करते।

अधिकमास में श्राद्ध करे अथवा न करे :

आइये हम शास्त्रनिष्ठ होकर इस विषय को समझने का प्रयास करें, प्रमाण ऊपर ही दिये जा चुके हैं। चूडाकरण-उपनयन-विवाहादि से सम्बंधित वृद्धिश्राद्ध अधिकमास में न करे। दर्श (अमावास्या) श्राद्ध के पक्ष में दोनों प्रमाण हैं जिसका निष्कर्ष यह है कि प्रथम शुद्ध अमावास्या में करे किन्तु अधिक के अमावास्या में न करे। पूर्णिमा-योग-नक्षत्र-युगादि-मन्वादि विषयक श्राद्ध को प्रशस्त कहा गया है किन्तु काम्य हो तो न करे। मरण के निमित्त तो नैमित्तिक श्राद्ध ही हो गया और इसका निषेध है ही नहीं अर्थात षोडश श्राद्ध (सपिंडीकरण सहित) अधिकमास वा क्षयमास दोनों में ही प्रशस्त है।

विवादित यदि है तो क्षयाह अर्थात आब्दिक श्राद्ध ही है और यही मुख्य विषय से मुख्यतः सम्बंधित भी है। अधिक मास में मृत व्यक्ति के क्षयाह हेतु तो सौर मास ग्रहण करने का निर्देश है। किन्तु क्षयाह और अधिकमास के संगम में विभिन्न स्थितियां व विभिन्न पक्ष हैं जो परस्पर विरोधाभासी भी प्रतीत होते हैं। क्षयाह श्राद्ध के विषय में जो तथ्य है वो दोनों ही प्रकार का है और दोनों में संगति की आवश्यकता है :

प्रथम पक्ष यह है कि अधिकमास में क्षयाह न करे और द्वितीय पक्ष यह है कि अधिकमास में भी करे और एक पक्ष दोनों में ही करे ऐसा भी है। इसमें संगति इस प्रकार स्थापित होती है कि यदि प्रथम क्षयाह अधिकमास में आ पड़े तो करे, किन्तु द्वितीयादि शुद्ध मास में ही करे, क्षयाह में न करे। अर्थात यदि प्रथम वार्षिक श्राद्ध अधिकमास में पड़ता हो तो प्रथम क्षयाह अधिकमास में ही करे किन्तु उसके पश्चात् द्वितीयादि अधिकमास में पड़ने पड़े तो भी अधिकमास में न करके तेरहवें शुद्ध मास में ही करे।

एकादशमासाभ्यन्तरे ?

“एकादशमासाभ्यन्तरे यदि अधिमासपातो भवति तदा षोडशपदस्थाने सप्तदशपदं योज्यं” भी इसी विषय को स्पष्ट और सिद्ध करते हैं। किन्तु यहां पर शास्त्रदस्यु उचित पक्ष को तो अस्वीकार कर देंगे किन्तु अनुचित रूप से गणना करके सप्तदश-षोडश का विवाद करेंगे और करते हैं।

सर्वप्रथम तो “एकादशमासाभ्यन्तरे यदि अधिमासपातो भवति तदा षोडशपदस्थाने सप्तदशपदं योज्यं” यह वचन प्रमाण जैसा प्रतीत नहीं होता किन्तु कुछ ग्रन्थ इस शैली के भी होते हैं तो संभव है कि किसी मूल ग्रन्थकार का भी निर्णय हो ऐसी अवस्था में मूल का उल्लेख हो तो निःसंदेह प्रमाण रूप में ग्राह्य होगा किन्तु जहां कहीं भी ऐसा मिलता है वहां कहीं पर भी मूल उद्धृत नहीं है अस्तु निर्देश मात्र है प्रमाण नहीं। दूसरी बात यह आद्य श्राद्ध में ही मुख्य रूप से संकल्प किया जाता है तदुपरांत अन्यत्र षोडश/सप्तदश श्राद्ध अंतर्गत अमुक का उल्लेख होता है।

अन्तर का अर्थ मध्य में भी लिया जा सकता है किन्तु “भिन्न” भी होता है जैसे “कालांतर” का तात्पर्य उल्लिखित अथवा किसी घटना से भिन्न काल होगा। यथा कालांतर का अर्थ यहां अगले श्लोक में क्या लिया जायेगा भिन्न काल में अथवा उक्त काल के मध्य में ?

पालनाय पितुः सत्यं रामो बभ्राम कानने
कालान्तरे महारण्ये भगिनी रावणस्य च । भ्रमन्ती कानने घोरे भर्त्रा सार्धं सुगौतुकात् ॥

अनेकानेक वचनों में इसी क्षयाह तिथि के अधिकमास में पड़ने की बात बताई गयी है। अर्थात यदि क्षयाह तिथि चान्द्रमास गणना से यदि अधिकमास में आ पड़े तो प्रथम क्षयाह वहीं अधिकमास में करे अथवा दोनों में (अधिकमास में भी और शुद्ध मास में भी) करे। अधिकमास में क्षयाह तिथि आने का तात्पर्य संवत्सर पूर्ण होना लिया गया है।

एक बात स्पष्ट होना आवश्यक है कि जहां से (जिस तिथि से) मासिक वृद्धि होगी उसका क्षयाह शुद्ध मास में ही होगा और उससे पूर्व मास के मृतक का क्षयाह अधिकमास में होगा, न कि शुद्ध मास में। यदि दोनों (अधिक और शुद्ध) में करना चाहे तो दोनों मासों में भी कर सकता है क्योंकि ऐसी भी आज्ञा है किन्तु इस स्थिति में मासिक श्राद्ध की वृद्धि नहीं होगी यह भी स्पष्ट हो रहा है।

एकादशमासाभ्यन्तरे कहीं न कहीं इसी तथ्य को स्पष्ट करता है और इसी तथ्य को आत्मसात करने में समस्या होने के कारण विवाद है। अन्यथा सीधा भाव तो यह है ही कि आगे ज्येष्ठ मास में अधिकमास यदि है तो पूर्व के ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से ही शुद्ध आगे शुद्ध मास में श्राद्ध होगा और मासिक की वृद्धि भी होगी। फिर प्रथम अधिकमास में भी जो क्षयाह करने की आज्ञा है वो निष्प्रयोजन हो जायेगा।

क्योंकि यदि शुक्ल पक्ष वाला शुक्ल अर्थात शुद्ध में करे तो क्या ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष वाला शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण में नहीं करेगा क्या फिर तो सबका शुद्ध में हो ही रहा है और सीधा एवं स्पष्ट है कि ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से ही मासिक श्राद्ध की वृद्धि होगी अर्थात सप्तदश श्राद्ध होगा और उसका क्षयाह शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में होगा। अब यदि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष के मृतक का क्षयाह यदि शुद्ध ज्येष्ठ में होगा तो क्या आषाढ़ मास के मृतक का क्षयाह अधिकमास (ज्येष्ठ) में होगा। वास्तव में विसंगति है नहीं अपितु मनमुखी अर्थ करना और वास्तविक भाव को आत्मसात न कर पाना समस्या है।

यदि ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या तक आगे शुद्ध है तो वह आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से ग्यारहवें मास की समाप्ति है अर्थात उसके पश्चात् मासिक वृद्धि होगी अर्थात आषाढ़ कृष्ण पक्ष में मासिक वृद्धि नहीं होगी और ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष से लेकर आषाढ़ कृष्ण पक्ष तक के मृतकों का षोडश श्राद्ध होगा एवं उसका वार्षिक/क्षयाह श्राद्ध अगले वर्ष अधिक ज्येष्ठ मास में होगा। एकादशमासाभ्यन्तरे का यही तात्पर्य है और यह प्रथम अधिकमास में भी क्षयाह करना भी स्पष्ट करता है।

विष्णुसूत्रम् के रूप में कृत्यसार समुच्चय एक वचन प्रदान करता है “संवत्सराभ्यन्तरे यद्यधिमासपातो भवति तदा मासिकार्थं दिनमेकं वर्द्धयेत्” और एकादशमासाभ्यन्तरे…. का तात्पर्य भी यही है ।

शुक्लादि (अमावास्यांत) मास के आधार पर

किन्तु यहां इस प्रकार अभी केवल समझने के लिये कहा गया है इसको भलीभांति समझने के लिये हमें सर्वप्रथम शुक्लादि मास के आधार पर इस विषय को समझना आवश्यक है। हमें इस विषय को सीधे समझने में अनेकों भ्रमों का सामना करना पड़ा है और बारम्बार भ्रमित ही होते रहे हैं। भ्रम का निवारण तभी हो सकता है जब कि प्रथम शुक्लादि (अमावास्यांत) मास के आधार पर समझ लें।

हम विचार कर रहे हैं कृष्णादि (पूर्णिमांत) मास के आधार पर और समझने के लिये भी शुक्लादि का विचार नहीं करते एवं कृत्यसारसमुच्चयकार ने इस विषय को सरलीकृत करके विश्लेषित किया है फिर भी स्वीकार नहीं करते। यदि स्वीकार करते तो पूर्व के ज्येष्ठ माह (शुक्ल) में षोडश/सप्तदश विवाद नहीं होगा, जिसका सप्तदश हुआ उसका वार्षिक कब होगा, प्रथम वार्षिक तो अधिकमास में ही होना चाहिये और जिसका षोडश हुआ उसको समस्या है कि अधिकमास में कैसे होगा ? इसी प्रकार आषाढ़ कृष्ण में भी षोडश/सप्तदश का विवाद रहा और जिसका षोडश हुआ उसका क्षयाह कब होगा यह उससे भी बड़ा प्रश्न है ?

ऐसे विवाद बड़े-बड़े पंडितों के श्राद्ध में भी हुए हैं और टमटम चलाने वाला भी पंडित बनने के अहंकार से बकवास करने उपस्थित हो गया। सोचिये पचासों पंडितों के मध्य कोई किसी को अधिक शास्त्रज्ञ स्वीकारना नहीं चाहता, अशास्त्रज्ञ होते हुये भी सभी स्वयं को ही विद्वान सिद्ध करना चाहता है तो ऐसा क्यों न हो ?

व्याकरण के कुछ ज्ञाता होते भी हैं तो उनसे व्याकरण के विषय में पूछने पर वो मौन धारण कर लेते हैं, मैंने स्वयं ही ऐसे लोगों को “एकादशमासाभ्यन्तरे” का अन्यान्य अर्थ स्पष्ट करने के लिये कहा और सब मौन रहे। ये भी नहीं कह पाये कि एकादश मास के भीतर ही अर्थ है और यही लिया जायेगा, दूसरा अर्थ नहीं होगा। किन्तु कर्मकांड और शास्त्रों के विषय में अनधिकृत रूप से बकवास करने के लिये व्याकुल रहते हैं।

वैयाकरण होने का तात्पर्य है कि आचमन के मंत्रों का अधिक शुद्ध उच्चारण कर लेगा, उन नामों का भी विश्लेषण करेगा, किन्तु आचमन के मूल तथ्यों को भी जानता है अथवा नहीं यह कहा नहीं जा सकता है, अधिकांशतः नहीं जानते। आचमन कर्मकांड का प्रारंभिक विषय है और यदि आचमन के मूल तथ्य ज्ञात न हों तो अन्य विषयों के ज्ञान की आशा व्यर्थ है।

शुक्लादि मास का तात्पर्य होगा कि कृष्णादि में जो आषाढ़ कृष्ण पक्ष है वो शुक्लादि में ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष होगा। अगले वर्ष वैशाख शुक्ल तदनन्तर कृष्ण अमावास्या के पश्चात् प्रथम ज्येष्ठ अधिक मास आरम्भ होगा शुक्ल कृष्ण रीति से ही उसके अनन्तर शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल-कृष्ण मास होगा।

कृष्णादि में जो आषाढ़ कृष्ण पक्ष है शुक्लादि में वो ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष ही है और इस प्रकार अगले वर्ष अधिक ज्येष्ठ मास उसके ग्यारहवें मास के भीतर नहीं आएगा एवं इस कारण मासिक श्राद्ध की वृद्धि भी नहीं होगी। यदि मासिक श्राद्ध की वृद्धि नहीं होगी तो प्रथम आब्दिक हेतु अधिकमास में करने की जो आज्ञा है उसका भी पालन होगा और ज्येष्ठ शुक्ल के मृतक का अधिक ज्येष्ठ शुक्ल में तथा ज्येष्ठ कृष्ण के मृतक का अधिक ज्येष्ठ कृष्ण में क्षयाह होगा।

शुक्लादि मास पक्ष तिथि संवत्सर २०८२ – २०८३

शुक्लादि मास पक्ष तिथिदिनांक
ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा (संवत्सर २०८२)28/5/2025
ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या (संवत्सर २०८२)25/6/2025
आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा (संवत्सर २०८२)26/6/2025
आषाढ़ कृष्ण अमावास्या (संवत्सर २०८२)24/7/2025
वैशाख कृष्ण प्रतिपदा (संवत्सर २०८३)2/5/2026
अधिक ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा (संवत्सर २०८३)17/5/2026
अधिक ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या (संवत्सर २०८३)15/6/2026
शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा/द्वितीया (संवत्सर २०८३)16/6/2026
शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या (संवत्सर २०८३)14/7/2026

यहां स्पष्ट है कि ज्येष्ठ मास संवत्सर २०८३ में अधिकमास है अर्थात संवत्सर २०८२ में भी ज्येष्ठ माह से ही विचार करके प्रमाणों के आधार पर जांच करेंगे। दिनांक २८/५/२०२५ से ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा के साथ ज्येष्ठ मास का आरम्भ होता है और दिनांक २५/६/२०२५ को ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या के साथ कृष्णादि ज्येष्ठ माह समाप्त होता है तदुपरांत आषाढ़ शुक्ल आरम्भ होता है अर्थात २६/६/२०२५ से आषाढ़ माह आरम्भ होता है शुक्ल-कृष्ण क्रम से।

पुनः अगले संवत्सर में वैशाख कृष्ण प्रतिपदा २/५/२०२६ को है एवं समापन १६/५/२०२६ को होता है। १७/५/२०२६ से अधिक ज्येष्ठ माह आरम्भ होता है और १५/६/२०२६ को कृष्ण अमावास्या के साथ अधिक ज्येष्ठ माह समाप्त होता है। शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा का क्षय है किन्तु वो दिनांक के अनुसार १५/६/२०२६ को आरम्भ होता है द्वितीय १६/६/२०२६ को है।

अब विचार करें ज्येष्ठ मास संवत्सर २०८२ (२०२५ ई०) के मृतक हेतु ज्येष्ठ से बारहवां वैशाख है किन्तु बारहवां देखने पर ज्ञात होता है कि अधिक ज्येष्ठ है। अस्तु षोडश श्राद्ध ही होगा और मासिक वृद्धि नहीं होगी। रही क्षयाह की बात तो बारहवां मास अधिक ज्येष्ठ है और प्रथम क्षयाह अधिकमास में करे ऐसी आज्ञा है तो उसका प्रथम क्षयाह अधिक ज्येष्ठ में ही होगा। प्रमाणानुसार सभी ग्राह्य नियमों की सिद्धि हो रही है।

२६/६/२०२५ से आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा का आरम्भ हो रहा है यदि आषाढ़ माह से गणना करें तो ग्यारहवां माह ही अधिक ज्येष्ठ प्राप्त होता है और शुद्ध ज्येष्ठ बारहवां मास है। यहां ग्यारह मास के भीतर अधिकमास की व्याप्ति हो रही है अर्थात २६/०६/२०२५ से शुक्लादि आषाढ़ मास का आरम्भ हो रहा है एवं इस माह के मृतक का सप्तदश श्राद्ध होगा एवं अगले वर्ष उक्त मास/पक्ष/तिथ्यादि में क्षयाह।

किसी प्रकार की विसंगति देखने को नहीं मिलती। यहां एक और नियम भी यथावत स्थापित होगा वो यह कि अधिकमास में मृत का मासिक श्राद्ध बढ़ेगा अर्थात सप्तदश श्राद्ध होगा। इसको विचार करके देख लें अधिक ज्येष्ठ में मृतक के लिये प्रथम तो अधिक ज्येष्ठ ही है और शुद्ध ज्येष्ठ द्वितीय मास है यदि शुद्ध ज्येष्ठ द्वितीय मास है तो अगला वैशाख बारहवां मास होगा एवं उसके पश्चात् ज्येष्ठ तेरहवां मास। इस प्रकार एक मास की वृद्धि हो रही है और मासिक श्राद्ध की भी वृद्धि होगी अर्थात अधिक ज्येष्ठ में मृतक का सप्तदश श्राद्ध ही होगा।

इस प्रकार शुक्लादि मास रीति से एकादशमासाभ्यन्तरे की भी सिद्धि हो रही है और प्रथम अधिकमास में क्षयाह की भी सिद्धि होती है। किन्तु जब हम कृष्णादि मास में विचार करेंगे तो विसंगति उत्पन्न होगी और इसकी समझ न होने के कारण विवाद और केवल विवाद देखने को मिलेगा। तदपि इस विषय का प्रामाणिक निर्णय वही कर सकता है जो इस प्रकार से अधिकमास विषयक विषयों को समझता है।

इसमें कहीं कोई विवादित विषय दृष्टिगत ही नहीं होता। तो फिर विवाद है क्यों वो इसलिए की इसे समझे बिना हम कृष्णादि मास के विषय में निर्णय नहीं ले सकते और भले ही कृत्यसारसमुच्चय में पूर्णतः स्पष्ट है तथापि वैयाकरण भी उसकी व्याख्या नहीं कर पाते, स्वयं भी निर्णय नहीं दे पाते क्योंकि शास्त्र में प्रवेश नहीं है और व्याकरण मात्र के ज्ञान से कर्मकांड के पंडित बने फिरते हैं, शास्त्रज्ञ बनने का स्वांग रचते हैं। इसी कारण विवाद ही विवाद है।

कृष्णादि (पूर्णिमांत) मास के आधार पर

यदि अब हम कृष्णादि मास के विषय में समझना चाहें तो समझ सकते हैं और उपरोक्त शुक्लादि मास विषयक तथ्य यदि आपको समझ न आयी हो तो उसे और अधिक गंभीरता से समझें उसके बिना इसको समझाना दुष्कर है। हम कृत्यसारसमुच्चय का ही अक्षरशः अनुकरण करेंगे अर्थात जो कृत्यसारसमुच्चय में वर्णित है वही स्पष्ट करेंगे और उसी को समझने के लिये उपरोक्त भूमिका बांधी गयी है, प्रमाण तो अपेक्षित होता ही है। उपरोक्त क्रम से मास पक्ष तिथि आदि को दिनांक के साथ अब रखते हैं और शुक्लादि एवं कृष्णादि दोनों ही प्रकार से।

अब कृष्णादि मास में भी यदि शुक्लादि की तरह नियमों को स्थापित करें तो विसंगतिया उत्पन्न होंगी क्योंकि शुक्लादि में जो ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष था कृष्णादि में वो आषाढ़ माह का कृष्ण पक्ष है और शुक्लादि में जो वैशाख कृष्ण पक्ष था कृष्णादि में वो ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष है। स्पष्ट है मास के भेद से जो विसंगति उत्पन्न हो रही है उसके कारण जैसे अधिकमास और श्राद्ध विषयक जो नियम शुक्लादि मास में यथावत सिद्ध हो रहे थे यहां स्थापित करने में भ्रम भी उत्पन्न होगा।

यहां दूसरी समस्या यह भी है कि यदि इस आलेख को बारम्बार न पढ़ा जाय, गंभीरता से समझने का प्रयास न किया जाय तो समझ भी नहीं सकते एवं निष्कर्ष को आत्मसात करने में पूर्वाग्रह भी रोड़े अटकायेगा तथापि इतना तो स्पष्ट है कि आलेख में शुक्लादि मास से विचार करके प्रमाणों से प्राप्त नियमों का यथावत स्थापन करके यह सिद्ध किया जा चुका है कि आगे कृष्णादि मास विषयक विचार भी मान्य होगा साथ ही यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि ये मनमाना नहीं है अपितु कृत्यसारसमुच्चयकार के विश्लेषण का आधार भी है।

कृष्णादि मास पक्ष तिथि संवत्सर २०८२ – २०८३

कृष्णादि मास पक्ष तिथिदिनांक
ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा (संवत्सर २०८२)28/5/2025
आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा (संवत्सर २०८२)12/6/2025
आषाढ़ कृष्ण अमावास्या (संवत्सर २०८२)25/6/2025
शुद्ध/प्रथम ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा (संवत्सर २०८३)2/5/2026
अधिक/प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा (संवत्सर २०८३)17/5/2026
अधिक/द्वितीय ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या (संवत्सर २०८३)15/6/2026
शुद्ध/द्वितीय ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा/द्वितीया (संवत्सर २०८३)16/6/2026
आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा (संवत्सर २०८३)1/7/2026

कृष्णादि क्रम से संवत्सर २०८२ में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा २८/५/२०२५ को है। आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा १२/६/२०२५ को है और अमावास्या २५/६/२०२५ को है। संवत्सर २०८३ में शुद्ध/प्रथम ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष २/५/२०२६ से आरम्भ होता है एवं अधिक/प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष १७/५/२०२६ को आरम्भ होता है एवं अधिक/द्वितीय ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या के साथ १५/६/२०२६ को समाप्त होता है। इसके पश्चात् शुद्ध/द्वितीय ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष आता है तदुपरांत आषाढ़ कृष्ण। यहां 3 तथ्यों को गंभीरता से समझें :

  1. प्रथम यह कि अधिक/अशुद्ध मास शुक्लादि में भी दिनांक १७/५/२०२६ से १५/६/२०२६ तक था और कृष्णादि में भी है।
  2. शुक्लादि में अधिक मास ही प्रथम ज्येष्ठ मास भी था किन्तु कृष्णादि में प्रथम ज्येष्ठ मास का पूर्वार्द्ध शुद्ध है एवं उत्तरार्द्ध अधिक/अशुद्ध है।
  3. इसी प्रकार शुक्लादि में द्वितीय ज्येष्ठ (अधिक/प्रथम के पश्चात्) शुद्ध था किन्तु कृष्णादि में द्वितीय ज्येष्ठ का पूर्वार्द्ध अशुद्ध/अधिक है एवं उत्तरार्द्ध शुद्ध है।

यहां हम निःसंदेह कृत्यसारसमुच्चय के विश्लेषण को आधार मानकर यथावत विमर्श ही कर रहे हैं किन्तु विपरीत क्रम से करेंगे। इसका कारण यह है कि इसी प्रकार से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है और जिस प्रकार सरलतापूर्वक समझा जा सके हम उसी प्रकार विमर्श करेंगे।

प्रथम ज्येष्ठ और द्वितीय ज्येष्ठ को ध्यान में रखें इसको सही से ध्यान में रखने पर समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। अर्थात जब अधिकमास लग रहा है तो ज्येष्ठ को दो भागों में ग्रहण करना है अर्थात दो मास के रूप गणना की जाएगी जिसमें पहला प्रथम कहलायेगा कर दूसरा द्वितीय प्रथम का उत्तरार्द्ध अधिक है तो द्वितीय का पूर्वार्द्ध। अब गणना आरम्भ करते हैं :

  • यदि ज्येष्ठ मास से गणना आरम्भ करते हैं तो वैशाख बारहवां मास है और चैत्र ग्यारहवां यहां पर ग्यारह मास के भीतर अधिक मास नहीं है अस्तु मासिक वृद्धि का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है और सप्तदश श्राद्ध भी नहीं होगा अर्थात षोडश ही होगा।
  • किन्तु ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष के मृतक हेतु बारहवां मास अधिक/प्रथम है इसलिए उसका षोडश श्राद्ध ही होगा एवं प्रथम क्षयाह अधिक/प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में होगा। क्यों ? क्योंकि ग्यारह मास के भीतर अधिकमास नहीं है अपितु बारहवां मास है।
  • अब आषाढ़ मास का विचार करें आषाढ़ मास से बारहवां ज्येष्ठ होता है किन्तु द्वितीय ज्येष्ठ, प्रथम ज्येष्ठ ही ग्यारहवां होगा, विपरीत क्रम से विचार किया जा रहा है। विपरीत क्रम से विचार क्यों करेंगे क्योंकि पक्ष का क्रम विपरीत हो गया है। कृष्णादि मास विचार में यहां पर लक्षण की ही स्थापना करी गयी है, प्रथम ज्येष्ठ ग्यारहवां है और उसमें अधिकमास की प्राप्ति हो रही है। यदि विपरीत क्रम से विचार न करें तो आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष के मृतक का क्षयाह द्वितीय/अधिक ज्येष्ठ के कृष्ण पक्ष में होगा। यहां आषाढ़ मास का क्षयाह ज्येष्ठ में नहीं किया जा सकता। अस्तु आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष के मृतक का भी सप्तदश श्राद्ध होगा एवं क्षयाह अगले वर्ष यथा मास/पक्ष/तिथ्यादि में होगा।

नियमानुसार आषाढ़ कृष्ण पक्ष के मृतक हेतु “एकादशमासाभ्यन्तरे” के नियम से द्वितीय/अधिक ज्येष्ठ कृष्ण (अशुद्ध) में वार्षिक श्राद्ध होना प्रतीत होता है किन्तु यहां आषाढ़ मासादि का उल्लेख नहीं किया जा सकेगा और यही व्यवधान है। शुक्लादि रीति में यह व्यवधान नहीं होता है क्योंकि कृष्णादि रीति से जो आषाढ़ कृष्ण पक्ष है शुक्लादि रीति से वह ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष ही होता है और उसमें मासादि नाम परिवर्तित नहीं होता। इस कारण शुक्लादि रीति में ज्येष्ठ कृष्ण के मृतक का अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष में प्रथम वार्षिक श्राद्ध सिद्ध होता है किन्तु कृष्णादि रीति से आषाढ़ कृष्ण पक्ष के मृतक का अधिक ज्येष्ठ कृष्ण में असिद्ध हो जाता है क्योंकि यहां पर पक्ष का ही व्युत्क्रम हो रहा है।

अब इसी प्रकार अधिक ज्येष्ठ के मृतक हेतु भी विचार होगा और प्रथम कृष्ण (शुद्ध) के मृतक का षोडश ही होगा। प्रथम अधिक ज्येष्ठ शुक्ल (अशुद्ध) के मृतक का अगले वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल में क्षयाह होगा अस्तु सप्तदश होगा। द्वितीय ज्येष्ठ कृष्ण (अशुद्ध) के मृतक का व्युत्क्रम से अगले वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण में क्षयाह होगा अस्तु षोडश ही होगा और पुनः ज्येष्ठ शुक्ल के मृतक का अगले ज्येष्ठ शुक्ल में क्षयाह होगा अस्तु षोडश ही होगा। यह व्युत्क्रम भी कृत्यसारसमुच्चयकार ने सिद्ध किया है और सर्वत्र इसी प्रकार व्युत्क्रम से ही गणना आदि की गयी है। विपरीत गणना का तात्पर्य १२, ११ करके है अर्थात १, २, ३ करके नहीं।

अब अधिक मास में जो श्राद्ध होगा उसमें क्षौर का विचार भी करना होगा क्योंकि अधिकमास में क्षौर का भी निषेध है :

अधिमासे च यत्क्षौरं जन्ममासे च जन्मभे । न भवेत्तत्र कल्याणं शुभकृन्नहि संस्कृतं ॥
राजमार्तण्ड (कृत्यसार समुच्चय से)

यहां निषेध का तात्पर्य सामान्य अवस्था में निषेध है निमित्त से निषेध नहीं। श्राद्ध के निमित्त होने वाला क्षौर निषिद्ध में नहीं गिना जायेगा।

गंभीर व्यावहारिक प्रश्न

अब गंभीर प्रश्न ज्येष्ठ शुक्ल और आषाढ़ कृष्ण में मृतक के षोडश/सप्तदश कुछ भी कर देने के पश्चात् आगे की परिस्थिति का है एवं इसका विचार अपेक्षित है। क्योंकि ऐसा केवल वर्त्तमान वर्ष में ही हुआ आगे नहीं होगा यह नहीं कहा जा सकता। आगे न हो इस कारण अभी इसका विचार करते हुये भली-भांति समझना अपेक्षित है। एक बात यह भी स्पष्ट करना नितांत आवश्यक है कि यहां संगति भी बैठाई गयी है एवं प्रमाणों के अनुसार नियमों का भी विचार किया गया है साथ ही महत्वपूर्ण विद्वानों के विचारों का भी आधार लिया गया है।

यदि किसी को लगे कि यहां संगति का अभाव है अथवा अनुचित सिद्धि की गयी है तो वो स्वतंत्र रूप से जैसे यहां विस्तार पूर्वक विश्लेषण किया गया है कर सकते हैं। प्रयास करके देखें तब उचित प्रतीत होगा, बिना प्रयास किये झूठे अहंकार के कारण अनुचित प्रतीत होना विद्वत्ता नहीं है। विद्वत्ता हो तो इसे त्रुटिपूर्ण सिद्ध करते हुये त्रुटिरहित निर्णय प्रस्तुत करें हमें स्वीकार होगा। आइये गंभीर व्यावहारिक प्रश्न के उत्तर को भी समझते हैं :

गंभीर प्रश्न में वही है कि किसी ने ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष के मृतक का षोडश श्राद्ध किया तो किसी ने सप्तदश और किसी ने आषाढ़ कृष्ण पक्ष के मृतक का भी इसी प्रकार किया। अब यदि यह निष्कर्ष सत्यापित हो रहा है एवं इसका खंडन करने का तात्पर्य अनेकानेक पूर्वाचार्यों के निर्णय का भी खंडन करना होगा। कारण कि मुख्य आधार कृत्यसारसमुच्चयकार के विश्लेषण का ही लिया गया है। यदि प्रमादवश को त्रुटि हो गयी हो तो वह भी स्वीकार है और ज्ञात होने पर उचित संशोधन किया जायेगा। किन्तु ऐसे ऊटपटांग निर्णेताओं को धूल चटाना ही होगा अन्यथा ये लोग सुधरेंगे नहीं।

जिसने ज्येष्ठ शुक्ल में षोडश श्राद्ध किया उसने कोई उल्लंघन नहीं किया और उसका क्षयाह अधिक/प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल (अशुद्ध) में होगा। अगले वर्ष से सदैव शुद्ध शुक्ल में होगा। जिसने सप्तदश श्राद्ध किया उसने स्वयं कोई उल्लंघन नहीं किया यदि किसी अपण्डित (स्वघोषित पंडित) के निर्णय से किया है किन्तु अज्ञानी निर्णेता इस दोष का भागी होगा।

आषाढ़ कृष्ण पक्ष के मृतक का जिसने षोडश श्राद्ध किया उसके लिये अभी अवसर शेष है अधिकमास का श्राद्ध नहीं किया गया है सप्तदश होना चाहिये था। अवसर रहते अधिकमास का श्राद्ध कर ले तो कर्मलोप नहीं होगा, क्षयाह आषाढ़ कृष्ण पक्ष में ही होगा। षोडश श्राद्ध करने वाले ने यदि अधिकमास का श्राद्ध नहीं किया तो कर्मलोप होगा और पतन होगा, यदि कोई अपण्डित निर्णेता बनकर रोकेगा तो उस कर्मलोप का दोष उस निर्णेता का होगा न कि श्राद्धकर्ता का।

जिसने आषाढ़ कृष्ण पक्ष में सप्तदश श्राद्ध किया उसका उचित था और क्षयाह यथा काल होगा।

निष्कर्ष

शास्त्रीय प्रमाणों और कृत्यसारसमुच्चय के सूक्ष्म विश्लेषण से यह सिद्ध होता है कि अधिकमास में श्राद्ध का निर्णय केवल “हाँ” या “ना” पर आधारित नहीं है, बल्कि वह ‘मृत्यु तिथि’ और ‘अधिकमास के अंतराल’ पर निर्भर है। यदि मृत्यु के ग्यारह महीनों के भीतर अधिकमास आता है (एकादशमासाभ्यन्तरे), तो मासिक श्राद्धों की संख्या बढ़कर १७ हो जाती है (सप्तदश श्राद्ध)।

आब्दिक (वार्षिक) श्राद्ध के लिए नियम स्पष्ट है कि प्रथम वर्ष का क्षयाह अधिकमास में ग्राह्य है, किंतु बाद के वर्षों में वह केवल शुद्ध मास में ही किया जाना चाहिए। विसंगति केवल तब उत्पन्न होती है जब हम व्याकरण के शुष्क ज्ञान को ही ‘शास्त्र-विवेक’ मान लेते हैं एवं शास्त्रीय विषयों के चिंतन का सामर्थ्य नहीं रखते। अतः, शुक्लादि और कृष्णादि गणना के समन्वय से ही संशय का निवारण संभव है।

F&Q :

FAQ

प्रश्न : सप्तदश श्राद्ध कब करना अनिवार्य होता है?

उत्तर : यदि मृत्यु तिथि (मास) से ग्यारह महीनों के भीतर अधिकमास आ जाए, तो गणना के अनुसार एक मास बढ़ जाता है, जिससे १६ के स्थान पर १७ श्राद्ध (सप्तदश) किए जाते हैं।

प्रश्न : क्या अधिकमास में श्राद्ध के निमित्त मुंडन (क्षौर) कराया जा सकता है?

उत्तर : सामान्यतः अधिकमास में क्षौर निषिद्ध है, परंतु नैमित्तिक कार्यों जैसे श्राद्ध या अंत्येष्टि क्रिया के लिए यह निषिद्ध नहीं है।

प्रश्न : यदि ज्येष्ठ शुक्ल के मृतक का षोडश श्राद्ध किया गया है और अगले वर्ष ज्येष्ठ माह में अधिकमास है तो उसका क्षयाह कब होगा ?

उत्तर : यदि ज्येष्ठ शुक्ल के मृतक का षोडश श्राद्ध किया गया है तो प्रमाणों के अनुसार उचित ही है, जिसका सप्तदश किया गया है उसमें त्रुटि है। जिसका षोडश श्राद्ध किया गया है उसका क्षयाह प्रथम/अधिक ज्येष्ठ शुक्ल (अशुद्ध) में होगा।

प्रश्न : यदि आषाढ़ कृष्ण के मृतक का षोडश श्राद्ध किया गया है और अगले वर्ष ज्येष्ठ माह में अधिकमास है तो उचित है अथवा नहीं एवं उसका क्षयाह कब होगा ?

उत्तर : यदि आषाढ़ कृष्ण के मृतक का षोडश श्राद्ध किया गया है और अगले वर्ष ज्येष्ठ माह में अधिकमास है तो अनुचित है क्योंकि उसके लिये मासिक वृद्धि का विधान है और सप्तदश करना चाहिये था। यदि षोडश श्राद्ध किया गया है तो एक मासिक शेष है एवं अधिक ज्येष्ठ में श्राद्ध (एक मासिक) करना आवश्यक है। उसका क्षयाह श्राद्ध आषाढ़ कृष्ण के मृत्यु तिथि पर ही होगा।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह आलेख केवल शास्त्रीय विमर्श, शास्त्रीय शोध और कर्मकांडियों के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है। यद्यपि इसमें प्रामाणिक स्मृतियों और कृत्यसारसमुच्चय जैसे ग्रंथों का संदर्भ लिया गया है, तथापि किसी भी विशेष परिस्थिति, कुल-परम्परा या देश-भेद के अनुसार निर्णय लेने से पूर्व अपने अधिकृत कुलगुरु या स्थानीय धर्मशास्त्रज्ञ से परामर्श अवश्य लें। व्यक्तिगत कर्मकांडीय निर्णयों के लिए लेखक या प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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