“श्रद्धा से श्राद्ध होता है किन्तु विधि का ज्ञान भी अनिवार्य है, यदि विधि का ज्ञान न हो तो श्रद्धा, सामग्री आदि निष्फल होता है”
किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् सर्वप्रथम उसका षोडश श्राद्ध ही किया जाता है। मिथिला में षोडशत्रयी नहीं होता है किन्तु अन्यत्र कुछ क्षेत्रों में षोडशत्रयी भी होता है। मलिन षोडशी, मध्यम षोडशी और उत्तम षोडशी तीन षोडशी होते हैं। यहां षोडश श्राद्ध संबंधी चर्चा में उत्तमषोडशी विधि की चर्चा की जा रही है जो सर्वत्र (द्विजाति) में प्रचलित है।
इसके साथ ही यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि कुछ लोग अधिक प्रज्ञावान होते हैं और संक्षेप में ही समझ जाते हैं किन्तु यहां अल्पज्ञों हेतु विस्तृत चर्चा की गयी है यदि आप विस्तृत आलेख का अवलोकन नहीं कर सकते तो यह आलेख आपके लिये नहीं है। किन्तु यदि आपके पास पर्याप्त समय है और गंभीरता से समझना चाहते हैं तो यह आलेख आपके लिये अत्यधिक उपयोगी है क्योंकि श्राद्धकर्म में अनेकों विसंगतियां देखने को मिलती है एवं इसके लिये यह आवश्यक है कि उनको चिह्नित किया जाय और शोधन किया जाय।
सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें – Shodasha shraddh
श्राद्ध की विधि का जो तात्पर्य है सर्वप्रथम उसको समझना आवश्यक है क्योंकि बहुत लोग श्राद्ध की विधि का भी गलत अर्थ ही लगाते हैं और हमारे क्षेत्र में तो यह अर्थ ही लगाया जाता है कि द्वादशाह को एक-एक करके १४ मासिक किया जाना विधिपूर्वक श्राद्ध है, प्रातःकाल से आरम्भ करके सायंकाल तक ९ – १० घंटे तक करना विधिपूर्वक श्राद्ध है।
सर्वप्रथम इसी भ्रम का उन्मूलन करना आवश्यक है कि ये मूर्खों का मनगढंत विचार है। विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य आगे विस्तार से समझाया जायेगा किन्तु उसे समझने के लिये इस दुराग्रह का परित्याग आवश्यक है अथवा इसका प्रमाण ढूंढकर इसीको पुष्ट करें।
किन्तु यदि इसका कोई प्रमाण अप्राप्य है तो इस बात की गांठ बांधना दुराग्रह मात्र ही है जो मूर्खों द्वारा प्रचारित किया गया है।

विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य
“जहाँ विधि नहीं, वहाँ केवल औपचारिकता है, आध्यात्मिक लाभ नहीं।”
वास्तव में विधिपूर्वक श्राद्ध का तात्पर्य श्राद्ध विषयक जो देश, काल, अधिकारी, सामग्री, शुद्धता, विहित-निषिद्ध आदि प्रकरण हैं उनका पालन करते हुए श्राद्ध क्रिया के मंत्रादि का उचित प्रयोग करते हुये पितरों के निमित्त उत्सर्ग-दानादि करना है।
किन्तु वर्तमान में हमें जो दिखता है उसमें न तो देश का विचार मिलता है न ही काल निर्धारण, अधिकारी विषयक विसंगतियां भी दिखने लगी हैं, सामग्री और शुद्धता समाप्त हो चुकी है, विहित-निषिद्ध का कुछ अंश है, मंत्रप्रयोग में मात्र व्याकरण-व्याकरण सुनने को मिलता है और वैयाकरण ऐसे उद्दण्ड हो गये कि वेदमंत्र प्रयोग का ककहरा भी नहीं जानते एवं शब्दों का उच्चारण करते-कराते हैं उसमें भी कहीं उचित संधि विच्छेद पूर्वक तो कहीं अनुचित इसका ज्वलंत उदाहरण आपको भी देखने-सुनने को मिलता ही होगा “मुतोषसो” विवाद। अरे धूर्तों मुतोषसो है ही नहीं “मधुनक्तमुतोषसो” है।
जो मधुनक्त ; मुतोषसो पढ़ाते हैं अथवा जो मधुनक्तं ; उतोषसो पढ़ाते हैं दोनों ही प्रज्ञाविहीन हैं किन्तु विवाद यही देखने को मिलता है।
इसी प्रकार तीन बार पितृगायत्री के स्थान पर एक बार और नौ बार के स्थान पर तीन बार पढ़ाते हैं अर्थात एक तिहाई पढ़ाते हैं और दो-तिहाई निगल जाते हैं। इसी प्रकार मधुमती ऋचा का मात्र एक अथवा दो बार पाठ करते हैं, आचमन विलुप्त है अर्थात् शुद्धि समाप्त, स्वंय और अपसव्य के स्थान पर निवीति कर देते हैं क्योंकि ज्ञात ही नहीं। किन्तु इतनी त्रुटियों के साथ मात्र एक विषय कि एक-एक मासिक करके किया तो विधिपूर्वक किया का दम्भ भरते हैं, अरे धूर्तों ऐसा विधान है ही नहीं और जिसे लगता हो वो इसका प्रमाण प्रस्तुत करें ।
इस प्रकार हम यदि श्राद्ध विधि को समझना चाहें तो हमें इन विषयों को समझना होगा :
- अपात्रक विचार
- श्राद्धदेश (स्थान)
- श्राद्ध काल
- श्राद्ध का अधिकार
- श्राद्धकर्ता के लिये नियम
- द्रव्य और शुद्धि
- पात्र विचार
- दर्भ विचार
- क्रिया और मंत्रादि प्रयोग
- वृषोत्सर्ग
- उत्सर्ग सामग्री पर अधिकार
- भोज का विचार
देशकालोचितश्रद्धा द्रव्यपात्रार्हणानि च । सम्यग्भवन्ति नैतानि विस्तरात् स्वजनार्पणात् ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण/७/१५/४
उपरोक्त तथ्य की पुष्टि शास्त्रों से भी होती है अर्थात प्रामाणिक तथ्य हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में विधिपूर्वक को सम्यक् कथन से स्पष्ट किया गया है एवं विस्तार (भोजादि का) करना निषिद्ध बताया गया है। हम यहां क्रमशः सभी विषयों को संक्षेप में यहां समझने का प्रयास करेंगे। विस्तृत विचार तो पृथक-पृथक आलेखों में बहुशः प्रमाणों के साथ किये जायेंगे अस्तु यहां प्रमाण भी अल्प मात्रा में ही प्रस्तुत करेंगे। इनमें से यहां “क्रिया और मंत्रादि प्रयोग” भाग की चर्चा अधिक करेंगे।
बाप-दादा चिल्लाने वालों को स्पष्ट सन्देश दिया जाता है कि इस विषय में भूल से भी बाप-दादा का नाम मत लेना। चोर अपनी चोरी को बाप-दादा के नाम पर बचना चाहे तो नहीं बच सकता। बाप-दादा नाम पर तुम्हारे पास ऐसे लोगों के नाम होंगे जिनका कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकोगे, किन्तु मेरे पास महामहोपाध्याय रुद्रधर झा (१४वीं शताब्दि) और वाचस्पति मिश्र (१५वीं शताब्दि) का नाम है जो अपात्रक श्राद्ध की गंगोत्री और यमुनोत्री हैं।
एक पद्धतिकार के रूप में यदि स्वीकार करूँ तो वो मेरे पूर्व पद्धतिकार हैं एवं मैं परवर्ती हूँ, मध्य में कुछ विकृति उत्पन्न करने वाले भी हैं जिनके मत का मैं खंडन कर रहा हूँ। बाप-दादा, गुरु या श्रेष्ठ जनों से भी सद्गुण ही ग्रहण करना चाहिये दुर्गुण नहीं। दुर्गुणों को ग्रहण करके विकृतियों को अंगीकार करके बाप-दादा कहने से बचाव नहीं हो सकता।
अपात्रक विचार
पितुर्नियुक्ताः पितरो भवंति क्रियासु दैवीषु भवंति देवाः।
द्विजोत्तमा हस्तनिषक्ततोयास्तेनैव देहेन भवंति देवाः ॥
षट्कर्मतत्त्वाभिरतेषु नित्यं विप्रेषु वेदार्थकुतूहलेषु।
न तेषु भक्त्या प्रविशंति घोरं महाभयं प्रेतभवं कदाचित् ॥
यद्ब्राह्मणाः स्तुत्यतमा वदन्ति तद्देवता कर्मभिराचरंति ।
तुष्टेषु तुष्टाः सततं भवन्ति प्रत्यक्षदेवेषु परोक्षदेवाः ॥
स्कन्दपुराण/(७) प्रभासखण्डः)/प्रभासक्षेत्र माहात्म्य/२२/६९ – ७१
अपात्रक विचार में मुख्य विसंगति जो है वो वर्त्तमान में उपलब्ध पद्धतिकारों द्वारा उत्पन्न किया गया है क्योंकि यदि हम मुख्य रूप से पूर्वाचार्य में एक प्रमुख नाम जानना चाहें तो वो वाचस्पति मिश्र हैं। जो भी पद्धतियां विद्यमान हैं उनमें न चाहकर भी इनका उल्लेख करने को पद्धतिकार बाध्य दिखे। जहां अपनी पुष्टि की आवश्यकता हुई वहां इनके नाम को उद्धृत किया और जहां विरुद्ध करना चाहे भले ही वो शास्त्रविरुद्ध भी क्यों न हो तो स्वेच्छा से किया जिससे वर्त्तमानोपलब्ध अपात्रक श्राद्ध पद्धतियां न तो अपात्रक हैं और न ही सपात्रक।
विद्यातपोभ्यां संयुक्तः शान्तः शुचिरलम्पटः । अलुब्धाह्लादनिष्पापा भूदेवा नात्र संशयः ॥
पात्रीभूताश्च विज्ञेया विप्रास्ते नात्र संशयः । तेभ्यो दत्तमनन्तं हि इत्याह भगवान्यमः ॥
बृहद्यम स्मृति ४/५३-५४
वाचस्पति मिश्र से प्राप्त श्राद्धविधि तो पूर्णतः अपात्रक है, किन्तु दान में इसका पालन नहीं किया गया। संभवतः समकालीन प्रतिग्रहाधिकारवश प्रतिग्रह में तो कुशोदक स्वीकार किया गया किन्तु श्राद्ध की अन्य विधियों से लेकर दक्षिणा तक भी अपात्रक ही मिलता है। यदि आप वाचस्पति का अवलोकन करें तो श्राद्ध दक्षिणा में आपको “यथानामगोत्राय” प्राप्त होगा, मेरे पास उपलब्ध है और इसी के आधार पर मैं कह रहा हूँ।
परवर्तियों ने शोधन-विस्तार तो नहीं किया किन्तु विकृत करके उनके ही नाम का लाभ भी प्राप्त किया। हमें तो ऐसा लगता है कि उनकी ही कृति में उनका नाम बाध्यता के कारण दिया गया अन्यथा उसे भी मिटा देते। “पितृभक्तितरङ्गिणी” में आप “यथानामगोत्राय” अवलोकन कर सकते हैं और सोचिये कब १४९० ई० से पूर्व तो आज की उपलब्ध पद्धतियों में “……….. गोत्राय ………. शर्मणे ब्राह्मणाय” कहां से आ गया ? निश्चित रूप से परवर्तियों ने विसंगति उत्पन्न किया एक ओर उनके नाम का आश्रय भी ग्रहण करते रहे और दूसरी ओर विसंगति भी उत्पन्न करते रहे।
हम पुनः इस विसंगति का ही निस्तारण करने जा रहे हैं एवं अन्य अपेक्षित संशोधन भी। संशोधन-परिष्करण घोषित करने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि अवलम्बन तो लिया जायेगा किन्तु आवश्यकतानुसार संशोधित भी किया जायेगा। इस संशोधन का तात्पर्य उनके काल में जो संशोधन आरम्भ हुआ था, उन्होंने जो कालानुसार विस्तार दिया था उसी को गति प्रदान करते हुये वर्त्तमान काल के अनुसार और विस्तार किया जायेगा; विकृत नहीं।
जैसे उस काल में श्राद्ध की अर्हता से तो रहित हो गये थे तभी अपात्रक किया गया किन्तु प्रतिग्रह की अर्हता रही होगी इस कारण प्रतिग्रह में अनधिकारी नहीं माना गया। वर्त्तमान काल में प्रतिग्रह संबंधी अर्हता भी नष्ट हो चुकी है इस कारण इसका भी संशोधन किया जायेगा साथ ही अपात्रक होने पर श्राद्ध (आद्य) के मध्य में छत्रोपानद् दान संगत नहीं है, दक्षिणा पूर्व गोदान तो प्राप्त ही नहीं होता अर्थात ये गोदान तो विद्वद्जनों द्वारा अनुमोदित भी नहीं है।
यदि श्राद्ध के मध्य में दान को स्वीकार किया जाय तो शय्यादान भी भोजनोपरांत होना चाहिये किन्तु वो प्रारम्भ में ही है। दान-विषयक विसंगतियों का निस्तारण अपेक्षित है क्योंकि वर्त्तमान में जो उपलब्ध हैं वो प्रतिग्रहाधिकार भी नहीं रखते।
श्राद्ध में अपात्रकत्व सिद्धि : आगे विभिन्न श्राद्धों में भोजन करने वालों के लिये प्रायश्चित्त वर्णित है अर्थात जो पात्र श्राद्ध में नियुक्त होते हैं उनको प्रायश्चित्त भी श्राद्धानुसार करना आवश्यक होता है। जिस काल में प्रायश्चित्त का लोप देखा गया उस काल में नियुक्ति के अधिकार का भी लोप सिद्ध किया गया। यही अपात्रक श्राद्ध की सिद्धि का मूल मंत्र है एवं इसके साथ ही ज्ञान-तप का विचार भी समाहित है।
भुक्तं चेन्मासिकश्राद्धं प्राजापत्येन शुध्यति
अष्टकां हि ततो भुक्त्वा पूर्वोकेन विशुध्यति
एकोद्दिष्टं ततो भुक्त्वा तत्र चान्द्रायणं चरेत्
अतिकृच्छ्रं चरेद् विद्वान् भुक्त्वा नक्षत्रभोजनम्
कृच्छ्रातिकृच्छ्रं षण्मासे त्रिपक्षे तप्तमेव च
तथा संवत्सरे श्राद्धे सपिण्डे तु तथैव च
बलिं नारायणं भुक्त्वा कृच्छ्रमेकं चरेद् बुधः
अशक्तौ तु तथा सर्वं कृच्छ्रमेकं चरेद् बुधः
अथवापि त्रिरात्रं स्यादेकाहं वापि दुर्बलम्
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धगेहं न गच्छति
इत्याग्निवेश्यगृह्यसूत्रे तृतीयप्रश्ने द्वादशोऽध्याये
अपात्रे ह्यपि यद्दत्तं दहत्यासप्तमं कुलम् । हव्यं देवा न गृह्णन्ति कव्यं च पितरस्तथा ॥
अत्रि संहिता १५२
प्रतिग्रह में अपात्रकत्व सिद्धि : किन्तु जिस काल में श्राद्ध हेतु नियुक्ति खंडित हुआ उस काल में प्रतिग्रह खंडित नहीं हुआ, इसका तात्पर्य है दोनों के लिये भिन्न विधान हैं। यद्यपि कुछ विशेष प्रतिग्रह में भी प्रायश्चित्त प्राप्त होता है किन्तु ज्ञान-तप से युक्त ब्राह्मण जो षट्कर्म में निरत हो वह प्रतिग्रहाधिकार रखता है। प्रतिग्रहाधिकार में मुख्य भाग ज्ञान एवं संध्या (गायत्री जप) है जो प्रतिग्रह के दोष का नाश कर देता है।
वेदविच्चापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम् । विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ॥
मनुस्मृति/३/१७९
यथा वातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान् । तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः ॥
मनुस्मृति/१२/१०१, वशिष्ठ स्मृति २७/२
श्राद्ध में नियुक्ति जिस काल में खंडित हुई उस काल में प्रतिग्रह का अधिकार सिद्ध हुआ जिस कारण वाचस्पति मिश्र ने भी कुशोदकपूर्वक विधान किया किन्तु अब यदि वर्त्तमान काल में विचार करते हैं तो ज्ञात होता है कि प्रतिग्रहाधिकार भी नष्ट हो चुका है। अस्तु जिस प्रकार पात्रत्वाधिकार नष्ट होने से पूर्वकाल के आचार्यों ने अपात्रक श्राद्ध का विधान किया उसी विषय को विस्तार देते हुये वर्त्तमान काल में प्रतिग्रहाधिकार खंडित होने के कारण इसका समापन भी अपेक्षित है। यहां वाचस्पतिमिश्रादि द्वारा ग्राहकता का खंडन न करके उक्त मार्ग का ही अवलम्बन लिया जा रहा है।
नष्टशौचे व्रतभ्रष्टे विप्रे वेदविवर्जिते । दीयमानं रुदत्यन्नं किं मया दुष्कृतं कृतम् ॥
वेदपूर्णमुखं विप्रं सुभुक्तमपि भोजयेत् । न च मूर्खं निराहारं षड्रात्रं चोपवासिनम् ॥
वेदव्यास स्मृति ४/५३ – ५४
नापात्रे विदुषा किञ्चिदात्मनः श्रेय इच्छता । अपात्रे जातु गौर्दत्ता दातारं नरकं नयेत् ॥
कुलैकविंशतियुतं ग्रहीतारं च पातयेत् । देहान्तरं परिप्राप्य स्वहस्तेन कृतं च यत् ॥
गरुडपुराणम्/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/१४/६ – ७
पात्रे दानं प्रदातव्यं कृत्वा यज्ञवरं द्विजाः । नापात्रे दीयते किंचिद्दत्तं न तु सुखावहम् ॥
स्कन्दपुराण/खण्डः ३ (ब्रह्मखण्डः)/धर्मारण्य खण्डः/३३/२
आमपात्रे यथा न्यस्तं क्षीरं दधि घृतं मधु । विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्च पात्रं रसाश्च ते ॥
एवं गां च हिरण्यं च वस्त्रमश्वं महीं तिलान् । अविद्वान्प्रतिगृह्णानो भस्मी भवति दारुवत् ॥
वशिष्ठ स्मृति ६/२९ – ३०
निधाय वा दर्भबटुनासनेषु समाहितः । मैषासुप्रैषसंयुक्तं विधानं प्रतिपादयेत् ॥
देवल
सुपात्रं मनसां ध्यात्वा दानं दत्वा कुशोपरि। दाता दानफलं भुंक्ते ग्रहीता न हि दोषभाक् ॥
स्मृत्यंतर
ब्राह्मणानामसंपत्तौ कृत्वा दर्भमयान्द्विजान्। श्राद्धं कृत्वा विधानेन पश्चाद्विप्रे प्रदापयेत् ॥
अपात्र को दिया गया दान दाता को भी नरक का भागी बनाता है। वाचस्पति मिश्र ने भी यदि कुशोदक पूर्वक दान स्वीकार किया था तो इसका कारण यह है कि आवाहन (प्रेत) के अभाव से पात्रत्व का अभाव सिद्ध होने पर अपात्रक श्राद्ध का उन्होंने विधान किया किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि प्रतिग्रहाधिकार भी नष्ट हो गया। उस काल में प्रतिग्रहाधिकार की उपस्थिति होने के कारण उन्होंने कुशोदक पूर्वक दान-प्रतिग्रह विहित माना क्योंकि उस काल में तो अग्निहोत्री भी थे। यदि वर्त्तमान काल की बात करें तो त्रिकाल संध्या की क्या कहें शौचाचार भी नष्ट हो गया है, स्नान मात्र भी सकाल-सविधि नहीं किया जाता।
ऐसी स्थिति में प्रतिग्रहाधिकार भी नष्ट हो चुका है इस कारण कुशोदक पूर्वक दान को भी संशोधित किया जा रहा है। यह इसलिये किया जा रहा है कि ऐसा ही शास्त्र से सिद्ध हो रहा है। यहां अनुकरण के साथ संशोधन को भी स्वीकार करना होगा, अनुकरण किया जा रहा है किन्तु जो विषय संशोधन योग्य है “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” में उसका संशोधन भी किया जा रहा है कारण कि कुशोदक पूर्वक अयोग्य को दान देने से दाता भी नरकगामी बनेगा।
पूज्याधिकार : जिस प्रकार पात्राधिकार, प्रतिग्रहाधिकार का विचार किया गया उसी प्रकार पूज्याधिकार का विचार भी अपेक्षित है क्योंकि यदि वृषोत्सर्ग किया जायेगा तो द्विजदंपत्ति पूजन प्रकरण में पूजा की जायेगी। पूज्याधिकार नष्ट नहीं होता “येषु देशेषु ये द्विजाः” पूजन-अनुष्ठान-यज्ञ-कथा आदि में पूजा विहित है और इसका नाश नहीं होता। वृत्तिवश भी जो उपस्थित होते हैं वो पूज्याधिकारी होते हैं।
अचीर्णिव्रतवेदा ये विकर्मफलमाश्रिताः। ब्राह्मणा नाममात्रेण तेऽपि पूज्या युधिष्ठिर॥
महाभारत/आश्वमेधिकपर्व (१४)/९९/२८
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥
मनु स्मृति/९/३१७
चूँकि पूज्याधिकार नष्ट ही नहीं होता इस कारण “द्विज-दंपत्ति पूजन” उचित सिद्ध होता है और उसे स्वीकार किया जा रहा है। केवल इतना अवश्य ध्यातव्य है कि जिस “द्विज-दंपत्ति” का पूजन किया जाये वो कम से कम वस्त्राभूषण से द्विज दिखें, क्षौरादि करके उपस्थित हों।
श्राद्धदेश (स्थान)
श्राद्ध देश का तात्पर्य है कि श्राद्ध करने योग्य स्थल, तीर्थ आदि का विचार एवं निषिद्ध स्थान का ज्ञान। चूंकि हम षोडश श्राद्ध विषयक चर्चा करने जा रहे हैं तो इसमें भी अनेक विषय विचारणीय है : यथा स्वयं की भूमि में श्राद्ध करना, भूमि पर ही श्राद्ध करना, शांत स्थान में श्राद्ध करना, वृक्ष-जलाशयादि का विचार करना, गोपनीयता का ध्यान रखना आदि।
अन्य के भूमि-घर में श्राद्ध का निषेध है किन्तु वर्त्तमान काल में सबके पास श्राद्ध हेतु अपनी भूमि उपलब्ध नहीं है किन्तु किसी वंश-कुल के लिये सामूहिक रूप से भूमि निर्धारित किया जाता है। यहां विसंगति यह आ जाती है कि वो स्थान (निजी) जिस कुल के लोगों ने निर्धारित किया अन्यान्य कुल-जाति के व्यक्ति भी उसे अपने लिये उचित समझ लेते हैं, अभाव में तो किया जा सकता है किन्तु यदि अभाव न हो तो न ही करें।
अभाव में करने पर भूस्वामि पितरों के भाग का निर्धारण किया जाता है, किन्तु अब यह सामान्य व्यवस्था सी हो गयी है यदि अपनी भूमि पर भी करते हैं तो भूस्वामि भाग निर्धारित कर देते हैं। श्राद्धभूमि दक्षिणप्लव हो यह भी आवश्यक कहा गया है, किन्तु इसका तनिक भी विचार व्यवहार में करते नहीं मिलते, उत्तरप्लव (विपरीत) में भी करते दिखते हैं।
पुनः श्राद्ध के लिये भूमि पर ही हो यह ध्यान रखना भी आवश्यक है ताकि मंडल आदि किया जा सके। शांत स्थान का तात्पर्य है कि एकांत भी हो जो कि लोग भूलते जा रहे हैं अब प्रदर्शन का भाव बढ़ता जा रहा है और सड़कों के निकट जहां तनिक भी शांति नहीं होती श्राद्ध करते हैं। श्राद्ध हेतु जलाशय के निकट अनेकों वृक्षादि का वर्णन प्राप्त होता है। यहां यह भी पुनः ध्यान रखना आवश्यक है कि वृक्ष के मूल में तो चबूतरा बना दिया जाता है तो श्राद्ध चबूतरे पर न करके भूमि पर ही करें।

तीर्थादि में एकांतादि विषयक अन्यान्य नियमों का अभाव हो जाता है अर्थात विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।
तिलैः सर्षपैर्वा यातुधानान्विसर्जयेत् ॥ संवृते च श्राद्धं कुर्यात् ॥
न रजस्वलां पश्येत् ॥ न श्वानं ॥ न विड्वराहं॥ न ग्रामकुक्कुटं ॥
प्रयत्नात्श्राद्धं अजस्य दर्शयेत् ॥ अश्नीयुर्ब्राह्मणाश्च वाग्यताः ॥
न वेष्टितशिरसः ॥ न सोपानत्काः ॥ न पीठोपहितपादाः ॥
न हीनाङ्गा अधिकाङ्गाः श्राद्धं पश्येयुः ॥ न शूद्राः ॥
न पतिताः ॥ न महारोगिणः ॥
विष्णुस्मृति/८१/४ – १८
श्राद्ध में गोपनीयता बहुत ही आवश्यक है और इस कारण भी एकांत स्थान होना चाहिये। बहुत सारे लोग तो मंडप बनाते भी नहीं और यदि बनाते भी हैं तो इतना संकीर्ण कि उसमें कठिनाई से सपिंडीकरण हो पाता है, मासिक श्राद्ध तो संभव ही नहीं होता अर्थात मंडप से बाहर ही किया जाता है। श्राद्धस्थला में भी म्लेच्छ, चाण्डाल, पतितादि का आगमन भी निषिद्ध है। श्वान-सूकर-काक-उलूक-कुक्कुट-पतित आदि का आगमन तो छोड़िये दृष्टि का भी निषेध है।
ऐसे में उतने भाग को साइडर आदि द्वारा घेरा जाना चाहिये क्योंकि श्राद्ध के पाक पर श्वान-सूकर-काक-उलूक-कुक्कुट-पतितादि की दृष्टि भी नहीं पड़नी चाहिये। इसी प्रकार एक नया दोष सोशल मीडिया पर प्रदर्शन का बढ़ता जा रहा है जो किसी भी प्रकार उचित नहीं है एवं गोपनीयता भंग करने वाला है; इस कारण इससे बचना चाहिये।
धातृबिल्ववटाऽश्वत्थ मुनि चैत्य गजान्विताः। श्राद्धं छायासु कर्तव्यं प्रसादादौ महावने॥ प्रजापति
गोमयेनानुलिप्ते तु दक्षिणाप्लवनस्थले। श्राद्धं समारभेद्भक्त्या गोष्ठे वा जलसन्निधौ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/८७
अटव्यः पर्व्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च । सर्व्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तेषु परिग्रहः ॥
तस्मात् श्राद्धानि देयानि पुण्येष्वायतनेषु च । नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ तु प्रयत्नतः ॥
उपह्वरनितम्बेषु तथा पर्वतसानुषु । गोमयेनोपलिप्तेषु विविक्तेषु गृहेषु च ॥
दक्षिणाप्रवणे देशे तीर्थादौ वा गृहेऽथवा | भूसंस्कारादिसंयुके श्राद्धं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥
गोगजाश्वादिपृष्ठेषु कृत्रिमायां तथा भुवि । न कुर्याच्छ्राद्धमेतेषु परक्यासु च भूमिषु ॥
श्राद्ध काल
श्राद्ध काल की बात करें तो इसमें दो प्रकार से विचार होता है एक तो विविध तिथि, नक्षत्र, ग्रहणादि अवसर संबंधी जिसकी चर्चा यहां नहीं करेंगे एवं द्वितीय श्राद्ध के दिन किस समय करें अर्थात दिन के किस भाग में करें।
अनेकानेक श्राद्धों के लिये अनेक विधान है जैसे नान्दी श्राद्ध के लिये पूर्वाह्न, एकोद्दिष्ट के लिये मध्याह्न, पार्वण के लिये अपराह्ण इस प्रकार से निर्धारण किया गया है। इसी विषय में कुतप काल को भी विशेष महत्व प्रदान किया गया है जो कि दिवस का अष्टम मुहूर्त होता है। इस विषय को समझने हेतु प्रथम तो दिन के भागों को जानना-समझना आवश्यक हो जाता है एवं यह अतिमहत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांशतः श्राद्ध में काल का उल्लंघन ही देखने को मिलता है।
मुहूर्तत्रितयं प्रातः तावानेव च सङ्गवः। मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्स्यादपराह्णोपि तादृशः ॥
सायाह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु सर्वकर्म बहिष्कृतः ॥
अह्नो मुहूर्ता विख्याता दशपञ्च च सर्वदा। तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतपस्मृतः ॥
प्रारभ्यकुरुते श्राद्धं कुर्यादारौहिणं बुधः। विधिज्ञोविधिमास्थाय रौहिणं न तु लङ्घयेत् ॥
ऊर्ध्वं मुहूर्तं कुतुपाद्यन्मुहूर्तचतुष्टयं। मुहूर्त पञ्चकं ह्येतत्स्वधाभवनमिष्यते ॥
आमश्राद्धं तु पूर्वाह्णे एकोद्दिष्टं तु मध्यमे। पार्वणंचापराह्णे तु प्रातर्वृद्धि निमित्तकं ॥
नान्दीमुख श्राद्ध के अतिरिक्त अन्यान्य श्राद्धों के लिये जो विधान है वो दिन के अष्टम मुहूर्त (कुतप) से लेकर अगले चार मुहूर्तों तक अर्थात बारहवें मुहूर्त तक के मुहूर्त पञ्चक को स्वधाभवन कहा गया है और दिन में कुल १५ मुहूर्त होते हैं अर्थात उसके पश्चात् के तीन मुहूर्त जो कि सायाह्न होते हैं उसका निषेध किया गया है एवं सूर्योदय से ७ मुहूर्त तक के भाग का भी निषेध है जिसमें विशेष रूप से प्रातः का निषेध है अर्थात ३ मुहूर्त तो पूर्णतः निषिद्ध है।
उसमें से भी एकोद्दिष्ट हेतु अष्टम कुतप और नवम रौहिण का ही विशेष महत्व है। इस प्रकार एकादशाह और द्वादशाह में जो षोडश श्राद्ध किया जाता है उसके उचित काल का निर्धारण करें तो इन बिंदुओं में स्पष्ट होता है :
- एकादशाह को आद्य श्राद्ध (संशोधित आद्य श्राद्ध विधि – वाजसनेयी) अर्थात एकोद्दिष्ट होता है और एकोद्दिष्ट का उचित काल अष्टम और नवम मुहूर्त है, विशेष परिस्थिति में अथवा बिलम्ब होने पर द्वादश मुहूर्त तक किया जा सकता है।
- द्वादशाह को १४/१५ मासिक (संशोधित अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि – वाजसनेयी) और सपिंडीकरण श्राद्ध (संशोधित अपात्रक सपिंडीकरण श्राद्ध विधि – वाजसनेयी) होते हैं जिसके लिये अधिकतम समय की आवश्यकता होगी अर्थात मुहूर्त पञ्चक को ग्रहण किया जायेगा। पांच मुहूर्त का तात्पर्य लगभग ४ घंटे होते हैं अर्थात ४ घंटों में ही होना चाहिये।
- द्वादशाह हेतु ४ घंटा भी अल्प ही प्रतीत होता है किन्तु यह अल्पज्ञों की सोच है, तथापि इसमें सप्तम मुहूर्त को भी ग्रहण किया जा सकता है जिस कारण 48 मिनट लगभग और बढ़ जायेंगे अर्थात लगभग पौने पांच घंटे। इतने काल में भलीभांति द्वादशाह का श्राद्ध भी विधिवत संपन्न हो सकता है यदि मूर्ख व्यक्ति न करा रहा हो तो। लगभग एक-डेढ़ घंटे में मासिक श्राद्ध, आधे घंटे में स्नानादि व सपिण्डीव्यवस्थापन, पुनः लगभग २ घंटे में सपिण्डीकरण श्राद्ध।
प्रथम पक्ष तो यह है कि विहित काल से पूर्व कर्म किया ही नहीं जा सकता और द्वितीय पक्ष यह भी है कि विहित काल में ही कर्म करे, विशेष परिस्थिति (प्रमादादि) में आरम्भ तो करे ही करे फिर समापन आगे किया जा सकता है, विघ्नादि के कारण बिलम्ब होने पर विहित काल के पश्चात् भी कर्म किया जा सकता है किन्तु मतिपूर्वक विहित काल का परित्याग करना कर्म को निष्फल करना है। विहितकाल के पश्चात् किये जाने वाले कर्म को इसी भाव में निष्फल कहा गया है।
कालातीतं तु यत्कुर्याच्छ्राद्धं होमं जपं तथा। व्यर्थीभवति तत्सर्वं अमृते तु विषं यथा ॥
शातातप उद्धृत (स्मृतिचन्द्रिका श्राद्धकाण्ड)
एकादशाह को जो मध्याह्न में दान और सायाह्न में एकोद्दिष्ट करते हैं एवं द्वादशाह को विधिपूर्वक कहकर एक-एक मासिक करते हुये पूर्वाह्ण से सायाह्न और रात्रि पर्यन्त जो सपिण्डन करते हैं वो दोनों ही मतिपूर्वक विहित काल का परित्याग कहलायेगा न कि प्रमाद या विघ्न। क्योंकि यदि विहित काल में करना चाहें तो संभव है।
यहां अब व्यवहार की दो चुनौतियों को समझना अपेक्षित है वो यह कि एकादशाह के दिन आद्यश्राद्ध भी जहां एकोद्दिष्ट मात्र करना है वो लगभग सायाह्न में किया जाता है अर्थात निषिद्ध काल में किया जाता है। श्राद्ध के काल में मात्र उत्सर्गादि का आरम्भ किया जाता है जबकि उत्सर्ग पूर्व ही कर लेना चाहिये। एकादशाह का एकोद्दिष्ट मध्याह्न काल में ही होना विधिपूर्वक कहलायेगा, सायाह्न में होना नहीं। इसी प्रकार द्वादशाह को एक-एक करके १४/१५ मासिक श्राद्ध करना आवश्यक नहीं है और ऐसा करने से कलविधान का पालन नहीं होता अपितु पूर्वाह्ण में आरम्भ करके सायाह्न तक करते रहते हैं जो विधि का उल्लंघन है, विधि का पालन नहीं।
यदि विधिपूर्वक करना चाहें तो उचित काल में ही करना होगा और इस प्रकार एक-एक करके करना संभव नहीं अर्थात तंत्र से एक ही बार में सभी (१४/१५) मासिक श्राद्ध करे तदनंतर सपिण्डीकरण करे। एक-एक मासिक करके श्राद्ध करना अपण्डितों का विचार है, क्योंकि एक-एक मासिक करने पर ढेरों विधियों का उल्लंघन ही किया जाता है, जिसमें से एक तो यहां स्पष्ट हो गया है शेष आगे स्पष्ट होंगे।
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः । पञ्चैतान्विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥
मनु स्मृति/३/१२६
क्रिया, देश, काल, शौच और ब्राह्मणसंपदा; इन पांचों का विस्तार करने से हनन हो जाता है। ये पांचों ही निर्धारित मात्रा से अधिक न करे। श्राद्ध में क्रिया और काल पूर्णतः निर्धारित हैं और इनका विस्तार करना अनुचित है। स्वधाभवन मुख्य काल है जिसका तात्पर्य ४ घंटा (लगभग) है और अधिकतम मध्याह्न व अपराह्न ग्रहण किया जा सकता है जिसका तात्पर्य ६ घंटा (लगभग) है।
अब यदि पूर्वाह्न से सायाह्न तक श्राद्ध करें तो काल का विस्तार होगा। एक-एक करके मासिक श्राद्ध करें तो क्रिया का विस्तार होगा क्योंकि सभी मासिक एक बार में ही होने चाहिये और क्रिया विस्तार होने से वह नाशक हो जाता है। एक-एक करके मासिक श्राद्ध करने से क्रिया का विस्तार तो होता है किन्तु क्रिया का लोप भी होता है जो नाश सिद्ध भी करता है एवं इसकी चर्चा कर चुके हैं।
विधिपूर्वक श्राद्ध करने के लिये कर्मकाल का निर्धारण भी अनिवार्य है और निर्धारित कर्मकाल में श्राद्ध संपन्न करना आवश्यक है तथापि प्रमादादिवश विलम्ब की भी मान्यता दी गयी है। किन्तु विलम्ब की मान्यता होने से विलम्ब होना तो प्रशस्त सिद्ध होता है किन्तु कर्मकाल से पूर्व आरम्भ करने की सिद्धि नहीं होती।
महामहोपाध्याय पंडित रुद्रधर झा स्पष्ट रूप से कहते हैं कि श्राद्ध निषेद्धेत्तर काल से भिन्न काल अर्थात पूर्वाह्ण और संध्या का त्याग करके श्राद्ध करे। मैं तो उस पूर्वाचार्य (बाप-दादा) की बात कर रहा हूँ जिसके वचन लिखित रूप में उपलब्ध हैं। तुम किस बाप-दादा की बात कर रहे हो कोई लिखित सिद्धि है कि निषिद्ध काल में श्राद्ध किया जा सकता है ?
महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र एक स्थान पर अपकृष्ट प्रेतषोडशी को अपात्रक सिद्ध करते हैं, निःसंदेह यहां रुद्रधरीय “श्राद्ध विवेक” में जो आद्य श्राद्ध सपात्रक है एवं मासिक अपात्रक है पुनः सपिंडीकरण में श्राद्धचतुष्टय तो अपात्रक किन्तु प्रेतश्राद्ध सपात्रक है इसको खंडित करते हैं एवं सम्पूर्ण प्रेतकर्म को अपात्रक विधि से ही करने का निष्कर्ष भी प्रदान करते हैं। यहां उन्होंने निष्कर्ष में यह कहा है कि –
अपात्रके च कर्मणि बहुतराङ्गहानिस्तस्मात्प्रेतषोडशी सपात्रकैव कार्या । एवमेव सोपान लिखनमपीति केचित । तत्रोच्यते – सोपनकृतो हि प्रभाकराः, ते तु स्वसिद्धान्तावष्टम्भेन निबद्धनन्तु नाम किन्तु तन्मतं मुनिवचनविरुद्धम् । तथाहि – एकाहे द्वादशाथवेति तावन्मुनिवाक्यम् । तच्चतुर्दशानां साग्निकानां तथा सपिण्डीकरणस्य च सपात्रकत्वे सर्वथा न घटते, नह्येतावान् श्राद्धप्रयोगराशिः सपात्रको रोहिणसमाप्तिपर्यन्तेन केनापि कर्तुं शक्यते तस्मात्तत्रापात्रकत्वे सर्वत्रापात्रकतैवास्तु नत्वाद्यश्राद्ध सपात्रकत्वमन्यत्रापात्रकत्वमित्वर्द्ध जरती युज्यत इति । – महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र
वाचस्पति मिश्र ने उस काल में सग्निकों हेतु सपात्रक विधि को सर्वथा अस्वीकार किया इस तर्क के साथ कि ऐसा घटित ही नहीं हो सकता। यदि एक दिन में रौहिण पर्यन्त १४ मासिक और सपिंडीकरण रौहिण पर्यन्त सपात्रक विधि से घटित नहीं हो सकता अपात्रक ही किया जा सकता है (ध्यातव्य यह है कि तंत्र से मासिक करने पर भी सपात्रक विधि से नहीं हो सकता) और इसी आधार पर अपकृष्ट श्राद्ध विधि में अपात्रक ही किया जा सकेगा।
इस तथ्य का भी खंडन करते हैं कि आद्य श्राद्ध सपात्रक करके शेष मासिक अपात्रक करे इसमें उन्होंने आद्य को भी अपात्रक विधि से ही एकरूपता स्थापित करने का पक्ष लिया। आज मैं भी उन्हीं का अनुकरण करते हुये कहता हूँ कि “द्वादशाह को विहित काल में अथवा निषिद्ध काल से भिन्न काल में (पूर्वाह्ण और सायाह्न का त्याग करके) यदि किया जाय तो किसी के नाना भी एक-एक करके नहीं करा सकते क्योंकि संभव नहीं है। यदि कोई निषिद्धवेला का त्याग करते हुये विधि-मंत्रादि का त्याग किये बिना एक-एक मासिक व सपिण्डीकरण श्राद्ध करा सकता है तो करने और कराने वाला दोनों ही निश्चितरूपेण मनुष्य नहीं होगा।
यदि कर्त्ता स्वयं ही पंडित हो अर्थात स्वयं ही करे और अभ्यस्त भी हो तो उसे एक मासिक में विधिपूर्वक मंत्रादि का लोप किये बिना करने पर न्यूनतम २० मिनट लगेगा। इस प्रकार भी लगभग ५ घंटे से अधिक लगेंगे यदि हस्त-पाद प्रक्षालन पूर्वक करे तो। फिर स्नान करके सपिंडीकरण कब करेगा निषिद्धवेला में ही करेगा न ! इस कारण यदि निषिद्धवेला का त्याग यदि करना चाहे तो तंत्र से ही मासिक श्राद्ध किया जा सकता है। मैं उन लोगों की बात नहीं कर रहा हूँ जो विधि और मंत्रों का लोप करके १५ मिनट या उससे भी कम में एक मासिक करा देते हैं और तीसमारखाँ होने का डंका पीटते हैं।
श्राद्ध का अधिकार
यदि अधिकार की बात करें तो इसमें भी दो विषय समाहित हैं प्रथम तो मृतक के श्राद्ध का अधिकारी अर्थात जिसे करना चाहिये और द्वितीय यह कि जो श्राद्ध करना चाहे उसे श्राद्ध का अधिकार अर्थात कर्माधिकार है अथवा नहीं ? कर्माधिकार संबंधी चर्चा तो पीछे अनेकों आलेखों में कर चुके हैं यहां श्राद्ध के अधिकारी को ही संक्षेप में समझते हैं।
पुत्त्रः पौत्त्रः प्रपौत्त्रो वा भ्राता वा भ्रातृसन्ततिः । सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रियार्हा नृप जायते ॥
तेषामभावे सर्व्वेषां समानोदकसन्ततिः । मातृपक्षस्य पिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा ॥
कुलद्वयेऽपि चोत्सन्ने स्त्रीभिः कार्य्या क्रिया नृप । संघातान्तर्गतैर्व्वापि कार्य्याः प्रेतस्य याः क्रियाः ॥
पितृमातृसपिण्डैस्तु समानसलिलैस्तथा । संघातान्तर्गतैश्चैव राज्ञा वा धनहारिणा ॥
पूर्व्वाः क्रियास्तु कर्त्तव्याः पुत्त्राद्यैरेव चोत्तराः । दौहित्रैर्व्वा नरश्रेष्ठ कार्य्यास्तत्तनयैस्तथा ॥
पुत्रः पौत्रश्च तज्जश्च पुत्रिकापुत्र एव च। पत्नी भ्राता च तज्जश्च पिता माता स्नुषा तथा ॥
भगिनी भागिनेयश्च सपिण्डो धनहार्यपि। पूर्वपूर्वविनाशे स्युरुत्तरोत्तर पिंडदाः ॥
यहां एक अधिकारी के विषय में एक तथ्य को ही स्पष्ट करना अधिक महत्वपूर्ण है और वो है दौहित्र एवं भ्राता अथवा भ्रातृज्य के मध्य का अधिकार संबंधी विवाद। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि के होने पर तो जो जीवित हो उसीका उत्तरोत्तर अधिकार होता है। किन्तु इनका अभाव होने पर दौहित्र व भ्राता-भ्रातृज्य, सपिण्ड, सगोत्र आदि का उत्तरोत्तर अधिकार संबंधि विवाद उत्पन्न होता है। उक्त विषय में पुत्रिकापुत्र (दौहित्र) पूर्वाधिकारी होता है, तदन्तर भ्राता-भ्रातृज्य आदि का अधिकार होता है।

औरसः क्षेत्रजश्चैव पुत्रिकापुत्र एव च । कानीनश्च सहोढश्च गूढोत्पन्नस्तथैव च ॥
पौनर्भवोऽपविद्धश्च लब्धः क्रीतः कृतस्तथा । स्वयं चोपगतः पुत्रा द्वादशैते उदाहृताः ॥
तेषां षड्बन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः । पूर्वः पूर्वः स्मृतः श्रेयाज्जघन्यो यो य उत्तरः ॥
क्रमाद्ध्येते प्रपद्येरन्मृते पितरि तद्धनम् । ज्यायसो ज्यायसोऽभावे जघन्यस्तदवाप्नुयात् ॥
पुत्राभावे तु दुहिता तुल्यसंतानदर्शनात् । पुत्रश्च दुहिता चोक्तौ पितुः संतानकारकौ ॥
अभावे तु दुहितॄणां सकुल्या बान्धवास्ततः । ततः सजात्याः सर्वेषां अभावे राजगामि तत् ॥
नारदस्मृतिः/व्यवहारपदानि/दायभागः(१३)/४३ – ४८
उपरोक्त के अभाव में भी बहन, भागिनेय का अधिकार प्रथम होता है और सपिण्ड का उत्तर और उसके अभाव में भी धनहारी का अधिकार होता है।
श्राद्धाधिकार के विषय में एक महत्वपूर्ण विषय यह भी है कि पुत्र यदि असंस्कृत हो किन्तु ३ वर्ष से अधिक आयु हो तो असंकृत होने पर भी पुत्र को श्रद्धाधिकार प्राप्त है एवं विविपूर्वक विवाहिता से उत्पन्न दौहित्र को भी असंस्कृत होने पर भी श्राद्धाधिकार है। इसके अतिरिक्त अन्य हेतु अधिकार नहीं है अर्थात इनसे इतर का श्राद्धाधिकार होते हुये संस्कृत होना भी अनिवार्य है, असंस्कृत होने पर अर्ह नहीं अर्थात उत्तरोत्तर विचार करते हुये जो संस्कृत हो वह श्राद्धाधिकारी होगा।
नाभिव्याहारयेद्ब्रह्म यावन्मौञ्जी निबध्यते । मन्त्राननुपनीतोऽपि पठेदेवैक औरसः ॥
अनुपेतोऽपि कुर्वीत मन्त्रवत्पैतृमेधिकम् । यद्यसौ कृतचूडः स्याद्यदि स्याच्च त्रिवत्सरः ॥
सुमंतु
पित्रोरनुपनीतोऽपि विदध्यादौरसः सुतः । और्ध्वदेहिकमन्ये तु संस्कृताः श्राद्धकारिणः॥ – स्कंदपुराण
श्राद्धं कुर्य्यादवश्यं तु प्रमीतपितृकोद्विजः । व्रतस्थो वाऽव्रतस्थो वा एकएव भवेद्यदि ॥ – वृद्धमनु
वर्त्तमान काल में श्राद्धाधिकार संबंधी व्यवहार प्रमाणविरुद्ध देखने को मिल रहा है जिसमें असंस्कृत निषेध वचन का उल्लंघन होता है अर्थात पुत्रेत्तर/दौहित्रेत्तर असंस्कृत व्यक्ति से भी दाह, श्राद्ध कराया जा रहा है। इस शास्त्रविरुद्ध व्यवहार को कर्मकांडियों की अल्पज्ञता ही कहा जा सकता है, अन्यथा शास्त्रविरुद्ध सिद्ध होगा। इस विषय पर भी गंभीरता पूर्वक चिंतन करने की आवश्यकता है।
श्राद्धाधिकारी होने के जो वचन हैं उसमें संस्कृत होना अनिवार्य शर्त की भांति स्वीकारना होगा अर्थात यदि प्रथम अधिकारी असंस्कृत है तो वह अधिकारी होते हुये भी अनर्ह है और द्वितीय अधिकारी का विचार करना चाहिये। इस अर्ह नियम में औरस पुत्र और दौहित्र अपवाद है अर्थात वह असंस्कृत होने पर भी श्राद्धाधिकारी होगा।
तदुपरांत इस विषय में एक अन्य तथ्य भी प्रकट होता है कि असंस्कृत व्यक्ति (पुत्रेत्तर) जो भी होता है वह जीवितपितृक होता है और जीवितपितृक भी श्राद्ध का अनधिकारी होता है। इसके कुछ अपवाद भी हैं –
- माता, मातामह, मातामही के मृत्यु होने पर मृतक श्राद्ध में असंस्कृत होने व जीवितपितृक होने पर भी अधिकार होता है, किन्तु पितामह में अधिकार नहीं होता।
- स्वयं के द्वितीय विवाह, पुत्र के जातकर्म, उपनयनादि में; पिता जिसको पिण्ड देने का अधिकारी होता है उसके लिये जीवितपितृक को भी पिंडरहित/आमान्न (वृद्धिश्राद्ध) का अधिकार होता है।
- यदि पिता सन्यासी, उन्मत्त, पतित, मूक-बधिरादि हो तो पितामहादि के श्राद्ध में जीवितपितृक पौत्र का भी अधिकार होता है।
- असंस्कृत और कनिष्ठ भ्राता को कन्यादान का अधिकार नहीं होता अर्थात नहीं कर सकता किन्तु कोई अन्य व्यक्ति भी यदि कन्यादान करे तो भी वृद्धिश्राद्ध का अधिकार कनिष्ठ और असंस्कृत हो तो भी भ्राता को ही होता है यदि वह ३ वर्ष से अधिक का हो। अन्य कोई भी व्यक्ति उसके श्राद्धाधिकार का हरण नहीं कर सकता यदि उसका पिता मृत है और उसकी आयु ३ वर्ष से अधिक है।
श्राद्धकर्ता के लिये नियम
यद्यपि श्राद्धकर्ता हेतु ही नहीं श्राद्धभोक्ता हेतु भी ढेरों नियम कहे गए हैं किन्तु यहां हम श्राद्धकर्त्ता हेतु कुछ महत्वपूर्ण नियमों को समझने का प्रयास करेंगे :
श्राद्धकर्त्ता और भोक्ता दोनों के लिये ही कुछ विशेष निषेध प्राप्त होता है : पुनर्भोजन अर्थात दुबारा भोजन करना और यह दोष ब्राह्मणों में अधिक देखने को मिलता है एक बार ब्राह्मण भोजन में सम्मिलत हो जाते हैं और दूसरी बार पुनः घर में बना विशेष भोजन करते हैं। यान पर चढ़ना, यात्रा करना, भार वहन करना और परिश्रम करना, कलह करना, मैथुन, हिंसा, दिन में शयन आदि।
पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्। श्राद्धकृच्छ्राद्धभुग्यो वा सर्वमेतद्विवर्जयेत्।
स्वाध्यायं कलहं चैव दिवास्वापं च सर्वदा ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/११९-१२०
श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों का यथान्याय पूजन सत्कार न करना भी पाप कहा गया है। ब्राह्मणों के साथ अन्यान्य व्यक्तियों को भोजन कराना ब्राह्मण की अवज्ञा है और ऐसे पाप हेतु अतिकृच्छ्र प्रायश्चित्त भी कहा गया है। ब्राह्मणों के साथ यदि हम किसी अन्य को भोजन कराते हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणभोजन का महत्व नहीं समझते और अवज्ञा कर रहे हैं।
श्राद्ध कर्ता हेतु जो सबसे बड़ा तथ्य भोजन विषय है और विसंगति देखने को मिलती है वो यह कि अपात्रक श्राद्ध होने के कारण ब्राह्मण भोजन श्राद्ध के पश्चात् होता है एवं घर में कलश पूजन के पश्चात् पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण का। तो वहां पर श्राद्ध कर्ता और नापित-मालाकार आदि भी ब्राह्मण के साथ ही भोजन करते हैं जो अनुचित है कई स्थानों पर कुछ पुजारी-महंथ आदि को भी ब्राह्मण के साथ भोजन कराया जाता है और यह भी अनुचित है। श्राद्धकर्त्ता तो ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें विदा करके तब भोजन करेगा ऐसा स्पष्ट विधान है न कि ब्राह्मण के साथ।
इसी कड़ी में ब्राह्मण भोजन में ब्राह्मणों में भी अपांक्तेय की व्यवस्था है कि जो ब्राह्मण नीचकर्मा, पापाचारी आदि हो वह अपांक्तेय होता है अर्थात भोजन कराने का अधिकारी नहीं होता और यदि कराया भी जाय तो मुख्य ब्राह्मण भोजन में न कराकर पृथक से कराये। फिर यहां नापित-मालाकार आदि को ब्राह्मण के साथ भोजन कराना शास्त्राज्ञा का उल्लंघन है। घर में शूद्रों को भोजन कराने का ही निषेध है उसमें भी ब्राह्मण के साथ निसंदेह दोषदायक है।
रही बात कुछ पुजारी-महंथ आदि को भोजन कराने की तो ये संत-साधु आदि की श्रेणी में आते हैं और ब्राह्मणभोजन में इनके भोजन की गणना नहीं होती है। यद्यपि इनके भोजन का भी महत्व है किन्तु ब्राह्मणभोजन में सम्मिलित नहीं किये जा सकते। इसी प्रकार नाती, भांजे, जामाता, बहनोई आदि। इनमें दौहित्र (नाती) का विशेष महत्व है विशेषरूप से श्राद्ध में किन्तु स्वतंत्र रूप से है और इनके साथ श्राद्धकर्त्ता भोजन करेगा न कि ब्राह्मणों के साथ इन सबका भोजन होगा। कुल मिलाकर ब्राह्मणभोजन में केवल और केवल ब्राह्मणों का ही भोजन हो सकता है।
द्रव्य और शुद्धि
द्रव्यशुद्धि कहने से दो भाव प्रकट होते हैं एक तो धन जो प्रयुक्त होगा उसकी शुद्धि और द्वितीय श्राद्ध में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों की शुद्धि और दोनों ही महत्वपूर्ण है। किसी भी धर्माचरण में द्रव्यशुद्धि अनिवार्य है अर्थात न्यायोपार्जित धन से ही धर्मकृत्य करे यह आवश्यक है। एवं इसके साथ ही किसी भी धर्मकृत्य में प्रयुक्त होने वाली सामग्री भी शुद्ध हो यह भी अनिवार्य है।
द्रव्य शुद्धि में जो भी द्रव्य प्रयोग किये जाते हैं सबकी शुद्धि आती है और शुद्धि का तात्पर्य मात्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शुद्धि नहीं है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शुद्धि मात्र को पर्याप्त माना जाय तो पिण्ड हेतु जिस भात की आवश्यकता होती है वह कर्त्ता/पाचक को स्वयं बनाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। भात ही चाहिये न होटल से भी मंगाया जा सकता है जैसे दही-घी आदि मंगाते हैं। भात ही नहीं दूध, दही, घी आदि भी डेयरी आदि से क्रय किया हुआ नहीं होना चाहिये अपितु शुद्ध है यह परीक्षित होना चाहिये। यदि घर का दूध है तो घी भी घर का ही हो, दूध घर का नहीं है तो भी दही घर में ही जमाना चाहिये।
वर्त्तमान में तो बेंती आदि का निर्माण भी हलवाई से कराया जाने लगा है जो अनुचित है। भात में तो चाण्डाल, श्वान आदि की दृष्टि भी नहीं पड़नी चाहिये। इसी प्रकार द्रव्यशुद्धि में शास्त्रान्वेषण करके उसका पालन करना चाहिये।
जब हम धर्माचरण की बात करते हैं तो इसमें जो शुद्धि विधान है वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कई गुणा अधिक सूक्ष्म है। यदि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करने लगें तो उसका ह्रास हो जायेगा। यह चर्चा इस लिये आवश्यक है क्योंकि वर्त्तमान काल में वैज्ञानिकता का एक अंधकारमय आवरण चढ़ाया जा रहा है। ध्यान रखें धर्म और धर्माचरण, कर्मकांड आदि का निर्णय शास्त्र से होता है साइंस से नहीं। इसलिये द्रव्य, शुद्धि आदि विषयों में तो रत्तीभर भी वैज्ञानिक सोच का स्थान नहीं है क्योंकि ये उसका विषय ही नहीं है।

सोचिये वैज्ञानिक सोच के अनुसार बोतल का पानी सही है किन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से नदी, तालाब, कुंआ आदि का जल शुद्ध है न कि बोतल का। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ब्रांडेड कंपनियों के घी, तेल, मधु आदि शुद्ध हैं किन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से अशुद्ध हैं।
श्राद्ध में पूड़ी-मिठाई आदि (गन्धादि) में प्रयोग करना अनुचित है उसमें शुद्धि विधान का पालन नहीं किया जाता है। डेयरी के दूध-दही-घृत आदि भी निषिद्ध हैं। दान की सभी वस्तुयें उपयोगी और टिकाऊ हो इसका विशेष परिक्षण करके ही दान करे क्योंकि कई बार ऐसे लाईट भी देखने को मिलते हैं जो जलाते समय ही टूट जाते हैं या छाता खोलते समय ही टूट जाता है। पुस्तक में वेद-पुराण आदि सामर्थ्यानुसार करे न कि ऐसी पुस्तक जिसको कभी खोलकर पढ़ा ही न जाये।
पात्र विचार
पात्र विचार में भी दो विषय होते हैं एक तो द्रव्यों का पात्र जिसमें मुख्य रूप से अर्घ्यपात्र आता है एवं द्वितीय महापात्र (ब्राह्मण) संबंधी विचार। इस विषय को भी सामान्य नहीं समझा जाना चाहिये क्योंकि अर्घ्यपात्र विषयक चर्चा भी विस्तृत है एवं ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण (पात्र) विषयक चर्चा भी बहुत ही विस्तृत है। अर्घ्य पात्र हेतु तो सामान्यतः पत्रों का ही प्रयोग सामान्यजनों के लिये उचित है जिसमें ढेरों पत्रों का प्रयोग कहा गया है और विहित पत्रों में से किसी भी पत्र का प्रयोग जिस क्षेत्र में किया जाता है वही उपर्युक्त है किन्तु यहां एक अन्य तथ्य भी है वो है अतिलघु भोजन पात्र, लोहे अथवा प्लास्टिक आदि के गिलास का प्रयोग, जलपात्र में अताम्र पात्र आदि का प्रयोग। इनसे बचना चाहिये :
- भोजन पात्र अत्यंत लघु न हो कि उसपर श्राद्ध की क्रियायें भी सही से न की जा सके, किञ्चित अन्न परोसने पर भी गिर जाये।
- यदि दुग्धधारा आदि भी प्रदान कर रहे हैं तो उसमें भी विहित पत्रों का ही प्रयोग करें न कि लोहे-प्लास्टिक आदि के गिलास का।
- आचमन आदि के लिये जिस जलपात्र का प्रयोग करते हैं वह ताम्र का ही प्रशस्त होता है।
- परिवेषण में एक-हाथ से परोसना भी निषिद्ध है एवं घृत-व्यंजनादि का हाथ से परोसना भी निषिद्ध है।
- अन्न (पाक का अन्न) उष्ण होना अनिवार्य कहा गया है।
यथा वातबलो वह्निर्दहत्त्यार्द्रानपि द्रुमान् । तथा दहति वेदाग्निः कर्मजं दोषमात्मनः॥
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्भुञ्जानोऽपि यत्तस्ततः । ऋग्वेदं धारयन्विप्रो नैनः प्राप्नोति किंचन ॥
न वेदबलमाश्रित्य पापकर्मरतिर्भवेत् । अज्ञानाच्च प्रमादाच्च दह्यते कर्म नेतरत् ॥
वशिष्ठ स्मृति २७/२ – ४
इसी प्रकार यदि ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण (पात्र) का विचार करें तो उसके लिये पृथक से प्रमाणों का संग्रह किया गया है। वर्त्तमान काल में पात्र की अनुपलब्धता के कारण ही अपात्रक श्राद्ध किया जाता है किन्तु जो उपस्थित होते हैं उनको भी अयोग्यता की सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते देखा जाता है यथा : तिलकविहीनता, म्लेच्छ स्वरूप (वस्त्रादि से), शिखा विहीनता, सेवकत्व की प्रवृत्ति, मन्त्र पाठ में अक्षमता, लोभाधिक्यता आदि।
एकादशाह के दिन सायाह्न में एकोद्दिष्ट होने का एक कारण यह भी है कि मतिपूर्वक विलम्ब किया जाता है जिससे सायंकाल अथवा रात्रि में भोजन करें, यदि मध्याह्न में ही एकोद्दिष्ट हो जाये तो उसी समय भोजन भी करना होगा और पुनर्भोजन निषिद्ध होने से क्षुधाबाधा न हो। पात्र में सेवकत्व की प्रवृत्ति ही यजमान को प्रसन्न करने वाली होती है जबकि पात्र पूज्य होते हैं, स्थिति तो यहां तक हो गयी है कि बहुत जगह यजमान का आसन भी पात्र ही लगाते दिखते हैं। लोभाधिक्यता का ही दुष्परिणाम है कि श्राद्ध में प्रयुक्त सामग्री अग्राह्यों को भी प्राप्त होता है अर्थात प्रत्यक्ष हानि भी होती है।
श्राद्ध में प्रेत का सम्पूर्ण भाग पात्र (महापात्र) का होता है अर्थात आद्यश्राद्ध से लेकर मासिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण में प्रेतश्राद्ध तक का और विश्वेदेव व त्रिक (पितरों) का भाग पुरोहित का होता है। किन्तु विवाद ऐसा होता है कि बंदरबांट किया जाता है एवं यह नापित-मालाकार आदि भी हड़प लेता है जो अशास्त्रीय है। इस बंदरबांट को तो सभी समस्या समझते हैं किन्तु स्वभाग का ज्ञान न होने से विवाद भी स्वयं ही करते हैं।
पुरोहित को प्रेतभाग नहीं ग्रहण करना चाहिये किन्तु ग्रहण करते हैं यही विवाद का कारण है, यदि पुरोहित विवाद करते हैं तो नापित-मालाकार आदि भी साथ में आ जाता है और वह भी अनधिकृत रूप से एक बड़ा भाग ले जाता है जिसकी पूर्ति हेतु पुनः पंचदेवता, विष्णु, तर्पण आदि में एकोद्दिष्ट की भांति ही सामग्री प्रयुक्त किया जाने लगा है जिससे की क्षतिपूर्ति हो जाये। इस भाग को इस प्रकार समझा जाना चाहिये :
- पात्र (महापात्र) का भाग : आद्यश्राद्ध, मासिक श्राद्ध, सपिण्डीकरण में प्रेतश्राद्ध का भाग व सपिंडीकरण के पश्चात् में कथावाचक हेतु किया जाने वाला दान।
- पुरोहित : विश्वेदेव और पितर (त्रिक) का भाग व प्रांगण का दान।
- नापित व मालाकार : कर्त्ता का धारण किया वस्त्रादि। इसके अतिरिक्त पारिश्रमिक ग्रहण करते ही हैं, श्राद्ध में किसी भी सामग्री अथवा दान सामग्री पर नापित, मालाकार का कोई भी अधिकार नहीं होता है। यदि यजमान देना चाहे तो बिना मंत्रप्रयोग के, बिना उत्सर्ग के जितना देना चाहे दे सकता है अर्थात श्राद्ध में अथवा दान में सभी वस्तुओं हेतु मन्त्र का प्रयोग होता है और वो सभी ब्राह्मण के ही अधिकार में होता है अन्य किसी का अधिकार नहीं होता और न दे।
- पंचदेवता, विष्णु, तर्पण आदि भाग : ये अविहित है, इसमें सामान्य रूप से ही सामग्रियों का प्रयोग होना चाहिये क्योंकि ये नित्यकर्म हैं। अर्थात विशेष सामग्री के रूप में कुछ होना ही नहीं चाहिये जिसपर अधिकार की बात हो अथवा पुरोहित या महापात्र कोई भी अधिकार स्थापित करने की चेष्टा करें।
दर्भ विचार
दर्भ विचार में भी ढेरों विषय आते हैं किन्तु सामान्य रूप से वो सभी तथ्य आपको अन्यान्य पुस्तकों में प्राप्त हो जायेंगे हम यहां उन तथ्यों से भिन्न श्राद्ध कर्म में जो अन्य विशेष महत्वपूर्ण तथ्य हैं उसे समझने का प्रयास करेंगे जैसे दर्भग्रहण विचार में क्या करें पुरोहित लेकर आते हैं उसमें इतना ही महत्वपूर्ण है कि दर्भ की जो दरिद्रता रहती है उसका निराकरण करना चाहिये, आवश्यकतानुसार उचित दर्भ (कुशा) की व्यवस्था करना यजमान का ही कार्य होता है और पुरोहित का कार्य समझने से समस्या उत्पन्न हो गयी है। यदि यजमान इसे अपना दायित्व समझे तो ही निवारण संभव है। यदि कुशा अनुपलब्ध हो तो उसका विकल्प भी कहा गया है श्राध्द के दिन ही कुशा अथवा विकल्प (पर्याप्त) व्यवस्था की जा सकती है।
दर्भ की व्यवस्था पाक से प्रथम अपेक्षित है क्योंकि आवश्यकता तो छाग को सिंचित करने में, दिग्बन्धन करने में भी होगी। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य जो है वो “पवित्री”, “त्रिकुशा”, “वेणी”, “मोटक”, “दर्भपिञ्जुलि”, “कुशेषूपविश्य” और “सपवित्रत्रिकुशा” आदि विषयक है। तीन कुशाओं में ब्रह्मग्रंथि देने से वह त्रिकुशा संज्ञक होता है, एक कुशा को द्विगुणित करने से मोटक संज्ञक होता है, वेणी की भांति बीनने पर वह वेणी कहलाता है, दर्भपिञ्जुलि का तात्पर्य कुशाओं का समूह होता है जिसे विशेष मुद्रा के साथ पकड़ा जाता है, वाजसनेयी हेतु एक कुशा का ही विधान है।
वाचस्पति मिश्र कहते हैं “वामहस्तेन दर्भपिञ्जुलिमादाय ततो दक्षिणहस्तेकृत्वा तन्मूलेन वामन्वारब्ध”, ये धारण करने की विशेष मुद्रा है और वाजसनेयी हेतु एक दर्भ ही पिञ्जलि हेतु कहा गया है। पवित्रीधारण का दोनों हाथों (अनामिका) में विधान है,मध्यपर्व पर धारण करना भी कहा गया है किन्तु मूल में भी विशेष रूप से ब्राह्मण हेतु प्रशस्त है। वामहस्त में दर्भधारण करके आचमन का निषेध है किन्तु इसका तात्पर्य यह है कि दक्षिणहस्त का दर्भ यदि आचमन काल में हटा लें तो केवल वामहस्त में ही दर्भ होगा ऐसा न करे, दोनों हाथों में दर्भ होना प्रशस्त है और आचमन करने पर उच्छिष्ट भी नहीं होता अपितु कुशाधारण करके ही आचमन करना चाहिये किन्तु तिलक नहीं।
पवित्री निर्माण की भी विशेष विधि होती है, ७ कुशाओं की सर्वश्रेष्ठ कही गयी है एवं सामान्यतः २ कुशाओं की कही गयी है जिसका आकार प्रादेश प्रमाण (१० अंगुल) हो। १० अंगुल (प्रादेश प्रमाण) की २ कुशा (न्यूनतम) को २ अंगुल में मोड़ने पर वह ५ अंगुल हो जायेगा, उसमें जब १ अंगुल पर ब्रह्मग्रंथि देंगे तो शेष ४ अंगुल अग्रभाग रहेगा, इस प्रकार से पवित्री होता है। अर्घ्य्पात्र में भी जो पवित्री देने के लिये कहा गया है वो इसी का संकेत करता है न कि कुशा को मात्र तोड़कर।
वारिधारा में पिण्ड पर सपवित्रत्रिकुश रखने के लिये कहा गया है इसका यही तात्पर्य है कि धारित त्रिकुशा और पवित्री दोनों ही (पवित्री में त्रिकुशा देकर) पिण्ड पर रखे। इसी प्रकार कुशेषूपविश्य कथन का तात्पर्य उसी पूर्वधारित त्रिकुशा पर बैठना है एवं वहां पुनः अन्य दूसरी त्रिकुशा ग्रहण किया जायेगा जिसका पिण्डोत्थान से पूर्व वारिधारा काल में त्याग होगा और वही पिण्ड पर दिया जायेगा। इसके विषय में यदि प्रमाण की बात करें तो दर्भत्याग का प्रमाण इस प्रकार मिलता है :
श्राद्धारम्भे तु ये दर्भाः पादशौचे विसर्जयेत्। अर्चनादौ तु ये दर्भा उच्छिष्टान्ते विसर्जयेत् ॥
मार्जनादौ तु ये दर्भाः पिण्डोत्थाने विसर्जयेत्। उत्थानादौ तु दक्षिणान्ते विसर्जयेत् ॥
स्मृत्यंतरे
श्राद्धारम्भ में धारित दर्भ (त्रिकुशा) का पादप्रक्षालन में त्याग करे जो सपात्रक में होगा; अपात्रक में नहीं, पुनः अर्चन में धारित दर्भ का उच्छिष्टांत में त्याग करे और यही (कुशेषूपविश्य) में प्रयोग होगा, पुनः मार्जनादि में धारित त्रिकुशा (पवित्री सहित) पिण्डोत्थान से पूर्व वारिधारा में ही त्याग किया जायेगा और वही सपवित्रत्रिकुशा पिण्ड पर रखा जायेगा। पुनः पिण्डोत्थान में अन्य दर्भ धारण किया जायेगा जिसका दक्षिणा के अंत में त्याग होगा।इसी प्रकार आगे एक बार और विधान है।
क्रिया और मंत्रादि प्रयोग
हस्तद्वयमितं कार्यं वैश्वदेविक मंडलम्। तद्दक्षिणे चतुर्हस्तं पितृणामङ्घ्रिशोधनम् ॥
लौगाक्षि उद्धृत (वीरमित्रोदय श्राद्ध प्रकाश)
क्रिया और मंत्रादि प्रयोग वह भाग है जो कर्त्ता श्राद्ध में कर्म करता है अर्थात यह मुख्य भाग है। इसे मुख्य भाग स्वीकार करते हुये भी वर्त्तमान कालीन अर्थातुर अपण्डितों (कथित पण्डित) ने छिन्न-भिन्न कर रखा है और ये विभिन्न क्रियाओं की चर्चा से पूर्णतः सिद्ध हो जायेगा।
स्नान : स्नान में दो महत्वपूर्ण तथ्य है प्रथम यह कि दो बार स्नान करे एवं दोनों स्नान की भिन्न विधियों को भी स्मरण रखे :
- मौशल स्नान : एकादशाह (आद्यश्राद्ध) के दिन सूर्योदय से पूर्व प्रथम मौशल स्नान करे अर्थात खड़ा रहकर स्नान करे, सामान्य स्नान बैठकर ही किया जाता है। एक अन्य बात यह भी है कि प्रेतस्नान शिखा ग्रंथि खोलकर विहित है।
- द्वितीय स्नान : द्वितीय तथ्य यह है कि श्राद्ध स्थलादि कल्पित (व्यवस्थित) करके पुनः स्नान करे इसमें एक विशेषता यह है कि सचैल स्नान कहा गया है अर्थात दो वस्त्रों को धारण करके एक धोती कमर से नीचे धोती की तरह और एक गमछा (द्वितीय वस्त्र) को शरीर पर धारण करके। द्वादशाह को भी इसी विधि से सचैल स्नान करे।
मुसलस्नान के संबंध में एक वचन इस प्रकार प्राप्त होता है : निरुद्धकर्णनासस्तु मुसलस्नानमाचरेत्।
पूर्वक्रिया : यदि हम कर्मारम्भ से पूर्वक्रिया की बात करें तो उसकी अनदेखी देखने को मिलती है जबकि उसका भी विधान है। पूर्वक्रिया में लगभग सभी विधानों का परित्याग देखा जा रहा है अस्तु उसे गंभीरता से समझना आवश्यक है। मौशल स्नान सर्वप्रथम क्रिया में है जो शौचादि के उपरांत सूर्योदय से पूर्व होगा। शौचादि कथन में दन्तकाष्ठ (दातुन) का निषेध है अस्तु अन्य प्रशस्त पत्रादिचूर्ण का प्रयोग तो होगा किन्तु ब्रश-पेस्ट का भी प्रयोग नहीं हो सकता। तदनन्तर मौशल स्नान के पश्चात् श्राद्ध सामग्री लेकर प्रातः काल ही श्राद्धभूमि पर जाने का विधान है न कि मध्याह्न में।
वहां जाकर सर्वप्रथम श्राद्धभूमि कल्पित करने का विधान है अर्थात श्राद्धभूमि सुनिश्चित करे, मण्डपादि निर्माण, वस्त्रादि से घेरना, समतल करके श्राद्धभूमि को ऊँचा करना, झाड़ू आदि से सफाई करना इस भाग में आता है। तत्पश्चात शुद्धस्थान को प्रोक्षित करके सामग्री रखे। दो वस्त्रों से युक्त होकर स्नान (सचैल स्नान) करे – तथैव यन्त्रितो दाता प्रातः स्नात्वा सहाम्बरः । आरभेत नवैः पात्रैरन्वारम्भं च बान्धवैः ॥ – देवल
स्नानोपरांत नित्यकर्म (संध्यावंदन, तर्पण, पंचदेवतादि पूजन) करे। संध्यावंदन में विशेषता यह है कि यदि विधि ज्ञात हो तो करे अन्यथा ब्राह्मण को कराने की आवश्यकता नहीं है। जो ब्राह्मण कराते हैं और अनिवार्य सिद्ध करते हैं उनसे प्रश्न होना चाहिये कि क्या सत्यनारायण पूजा, पार्थिव पूजा, नवरात्रा, लक्ष्मीपूजा, मकरसंक्रांति आदि में संध्यावंदन कराते हैं ? जो करता हो उसके लिये निषेध नहीं किया जा रहा है किन्तु जो कभी करता ही नहीं उसे केवल श्राद्ध में ही क्यों कराया जायेगा अन्यत्र क्यों नहीं कराया जायेगा। अन्यत्र कहीं नहीं कराया जाता इस कारण श्राद्ध में भी कराया नहीं जायेगा। सूर्यार्घ्यपूर्वक १० बार गायत्री जप किया जायेगा, अन्यथा यदि श्राद्ध में कराया जाये तो सर्वत्र कराना होगा।
तदूत्तर श्राद्धभूमि में अंगारभ्रमण करे, फिर पंचगव्य लेपन करे (प्रोक्षण करके) गोबर-गोमूत्र से लेपन करे, फिर गौरमृत्तिका आच्छादन करे। तदनन्तर तिल-पीला सरसों बिखेरे – अपहतेति मन्त्रेण द्वारदेशे विचिक्षिपेत्। पद्मपुराण/खण्डः ५ (पातालखण्ड)/११७/८३
तदनन्तर पवित्र छाग को श्राद्धदेश में बांधकर अपसव्य हो, तिल-जल-त्रिकुशा लेकर प्रोक्षित करे – “ॐ पित्रे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि”
ततः प्रातः समुत्थाय प्रातः कृत्यं समाप्य च । श्राद्धं समाचरेद्विद्वान्काले कुतपसंज्ञिते ॥
नारदपुराण (पूर्वार्ध)२८/२१
पाकारम्भ : काल, देश, अधिकारी आदि की चर्चा तो की जा चुकी है अब श्राद्ध के मुख्य भाग में पाक क्रिया से आरम्भ होता है। श्राद्ध मध्याह्न से अपराह्न अथवा स्वधाभवन (कुतुप से अगले पांच मुहूर्तों तक होना चाहिये। श्राद्ध का आरम्भ पाक से ही होता है इसका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि पाक भी उसी कालखण्ड में किया जाय किन्तु ऐसा नहीं है। पाकक्रिया पूर्व में कर सकते हैं मुख्य काल में श्राद्ध ही होना चाहिये। किन्तु उतना ही पूर्व किया जा सकता है जितने पूर्व करने से अन्न की ऊष्मा परिवेषण काल तक बनी रहे क्योंकि अन्न का उष्ण होना अनिवार्य है।
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावद्भुञ्जन्ति वाग्यताः अश्नन्ति पितरस्तावद्यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
यमस्मृति/प्रायश्चित्तवर्णन/३८, स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/४०९४
यावदूष्मा भवत्यन्ने यावदश्नन्ति वाग्यताः । तावदश्नन्ति पितरो यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥
विष्णुस्मृति/८१/२१, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/१/१४०/४५
पाकारम्भ में कुछ सावधानी की आवश्यकता होती है कि पाकारम्भ से पूर्व यदि अशौच हो जाये तो श्राद्ध नहीं हो सकेगा किन्तु पाकारम्भ होने से वह श्राद्ध हो सकेगा। अस्तु दानादि करके पाकारम्भ किया जाय तो विघ्न संभावित होती है एवं समस्या होगी अर्थात पाचक का होना अनिवार्य सिद्ध होता है।
क्योंकि यदि पाचक नहीं है तो कर्त्ता स्वयं यदि पाक करके दानादि करता है तो उष्णता समाप्त हो जायेगी एवं यदि प्रथम दानादि करता है और यदि अशौच प्राप्ति हो जाये तो विघ्न हो जायेगा। इस प्रकार पाचक होना अनिवार्य सिद्ध होता है जिससे एक और पाक होता रहेगा और दूसरी ओर दानादि कार्य जिससे न तो विघ्न उपस्थित होने पर श्राद्ध अवरुद्ध होगा और न ही उष्णता समाप्त होगी।
हरि स्मरण : आद्यंत और मध्य तीन स्थानों पर तो विष्णु स्मरण का विधान है ही किन्तु श्राद्ध में विकिरदान एवं पिण्डदान (लेपभाजी भाग देने) के पश्चात् भी “हरिस्मरण” है। ये दो वो विशेष स्थान हैं जहां पितरों के निमित्त प्रेत से भिन्न के प्रति भी भाग उत्सर्जित किया जाता है या दिया जाता है। प्रेत के भोजन में गायत्री जप व सूक्त-स्तोत्रादि का पाठ करना चाहिये किन्तु उनसे भिन्न के निमित्त जो प्रदान किया जाता वो जब तक हरिस्मरण किया जाता है तभी तक में भाग ग्रहण कर लेते हैं।
भूस्वामि भाग : वर्त्तमान पद्धतिकारों ने श्राद्ध विधि को कितना विकृत किया है इसका एक सर्वोत्तम उदाहरण भूस्वामि पितरों को भाग प्रदान करना है।
परकीयगृहे यस्तु स्वान्पितृस्तर्पयेज्जडः । तद्भूमिस्वामिनस्तस्य हरन्ति पितरो बलात् ॥
अग्रभागं ततस्तेभ्यो दद्यान्मूल्यं च जीवताम् ॥
यह वीरमित्रोदयादि में ब्रह्मपुराण का वचन बताया गया है एवं इसका तात्पर्य अन्नोत्सर्ग से पूर्व अग्रभाग प्रदान करना स्वीकार नहीं किया गया है अपितु आरम्भ में ही प्रदान करने का पक्ष स्वीकारा गया है। किन्तु गंभीर विषय तो यह है कि इसे श्राद्ध का अंग सिद्ध कर दिया गया एवं स्वभूमि में श्राद्ध करे तो भी करना ही होगा क्योंकि श्राद्ध का अंग हो गया न। ये विकृति वर्त्तमान पद्धतिकारों ने उत्पन्न किया है।
संभव है आप मेरे संशोधन को स्वीकारने का साहस न कर सकें किन्तु इस विषय को तो स्वीकार करेंगे ही कि जो श्राद्ध स्वगृह में ही किया जाता है जैसे सांवत्सरिक, पार्वण, वृद्धि आदि उसमें कहीं से भी भूस्वामी का भाग अर्पित करना उचित नहीं है अपितु विकार है, किन्तु करते हैं अथवा नहीं ? परस्पर चर्चा करना एक सामान्य सी बात है किन्तु संशोधन करना बड़ी बात है। परस्पर चर्चा से विसंगति का निवारण नहीं होता किन्तु संशोधन से होता है। यहां जो संशोधन शब्द प्रयोग किया जा रहा है उसका तात्पर्य विकार निवारण के भाव में है।
पारक्ये भूमिभागे तु पितॄणां नैव निर्वपेत् । स्वामिभिस्तद् विहन्येत मोहाद्यत् क्रियते नरैः ॥
अटव्यः पर्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च । सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न ह्येतेषु परिग्रहः ॥
कूर्मपुराण (उत्तरभाग)/२२/१६ – १७
तस्मात्क्रीत्वा महीं दद्यात्स्वल्पामपि विचक्षणः। पिण्डः पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वतः॥
महाभारत/१३/१०१/३३
सव्यापसव्य : सर्वप्रथम सव्यापसव्य क्रिया का विषय है जिसमें सूक्तादि पाठ, आचमन आदि सव्य होकर ही कर्तव्य होते हैं एवं शेष अपसव्य होकर। किन्तु सव्यापसव्य विधान विलुप्त होता जा रहा है और निवीति (कण्ठीवत जनेऊ) होकर कराया जाता है एवं यह तर्क दिया जाता है कि इस प्रकार से सव्य और अपसव्य दोनों का ही यथायोग्य विधान हो जाता है जबकि इसका तात्पर्य यह है कि न ही सव्य है न ही अपसव्य। ऐसा करने का कारण सव्यापसव्य का ज्ञान न होना है अर्थात अयोग्यता है। यदि सव्यापसव्य का ज्ञान पंडित को हो तो कराने में कोई समस्या नहीं है अपनी अयोग्यता को आवरण देने के लिये निवीति कराते हैं।

पितृगायत्री : पितृगायत्री श्राद्ध में तीन स्थानों पढ़ जपने के लिये कहा गया है और प्रत्येक स्थान पर ३ – ३ बार। प्रथम स्थान आरम्भ है अर्थात संकल्प के पश्चात्, द्वितीय स्थान मध्य है जो अंगारभ्रमण के पश्चात् अत्रावन से पूर्व होगा एवं अंत में अर्थात दक्षिणा के पश्चात्। तीनों स्थानों पर प्रयोग तो होता है किन्तु एक बार यह त्रुटि है। ३ बार का तात्पर्य ३ बार है एक बार पाठ करके दो बार नमो नमः अथवा भवन्त्विति (अंतिम शब्द) बोलने से तीन बार नहीं होता है। यथा यदि एक माला गायत्री मन्त्र का जप करना है तो प्रथम बार पूरा गायत्री मंत्र पढ़कर तत्पश्चात प्रचोदयात् – प्रचोदयात् मात्र करना अमान्य होगा अर्थात इस प्रकार से एक माला जप की मान्यता नहीं होगी।
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव भवन्त्विति॥
आद्यावसाने श्राद्धस्य त्रिरावृत्त्या जपेत्तदा। पिण्डनिर्वपणे वाऽपि जपेदेवं समाहितः॥
क्षिप्रमायान्ति पितरो राक्षसाः प्रद्रवन्ति च। प्रीयन्ते त्रिषु लोकेषु मन्त्रोऽयं तारयत्युत॥
ब्रह्मपुराण/२२०/१४३ – १४५
पितृगायत्री के पूर्व गायत्री जब विधान से प्राप्त नहीं होता किन्तु इसको वाचस्पति मिश्र द्वारा शिष्टाचार रूप में ग्रहण किया गया। इसमें शास्त्रविरोध भी सिद्ध नहीं होता अस्तु इसके लिये अधिक विचार करना अनपेक्षित है। अन्नोत्सर्गोपरान्त गायत्री जप का प्रमाण :
त्रिर्जपित्वा तु गायत्रीमुपवीती पुरोमुखः । प्राचीनावीतवान्ब्रूयान्मधुत्रयमतः परम् ॥
पद्मपुराण/खण्डः ५ (पातालखण्ड)/११७/१२३
अन्नोत्सर्ग के पश्चात् दक्षिणाभिमुख और अपसव्य में गायत्री जप को ही कुछ पद्धतिकारों ने उचित सिद्ध किया है एवं पूर्वाभिमुख का प्रमाण देने में संकोच किया। यहां पूर्वाभिमुख और उपवीति (सव्य) होकर गायत्रीजप का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है जो श्राद्धकर्म में रुचि रखने वाले विद्वद्जनों के लिये महत्वपूर्ण है।
मधुमती ऋचा : श्राद्ध में न्यूनतम ४ और अधिकतम ५ बार मधुमती ऋचा (मधुव्वाता) का प्रयोग है। प्रथम तो भोजन में तदनन्तर अन्नहीनं से पूर्व पुनः सूक्तपाठ से पूर्व, तदनन्तर विकिरदान से पूर्व और पर। किन्तु एक बार प्रयोग करके अन्यत्र मधु मधु मधु करके काम चलाया जाता है यह भी लोप ही सिद्ध होता है । मधुमती ऋचा के साथ ॐ मधु मधु मधु भी जप होगा न कि मधुमती ऋचा का त्याग करके।
आचमन : यदि हम आचमन की बात करें तो ६ स्थानों पर आचमन का विधान है आरम्भ और समापन, पादशौच (अपात्रक में नहीं होता), विकिरदान, पिण्डदान और अर्चन के पश्चात्। किन्तु व्यवहार में आरम्भ के पश्चात् अन्यान्य सभी आचमनों का लोप किया जाता है जो लोप है अर्थात विधि का उल्लंघन है।
तन्त्रनिषेध : एक विषय तंत्रनिषिद्ध क्रियाओं का भी आता है अर्थात श्राद्ध तंत्र से कर सकते हैं किन्तु कुछ विशेष क्रियाओं में तंत्र का निषेध है। जो इस प्रकार हैं : अर्घ्य, अवनेजन (अत्रावन और प्रत्यवन), पिण्ड, अक्षय्योदक और स्वधावाचन (स्वधावाचन अपात्रक श्राद्ध में नहीं होता है); इन ६ क्रियाओं में तंत्र का निषेध है अर्थात इन ६ क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य सभी क्रियायें एक साथ कर सकते हैं जैसे सपिण्डीकरण श्राद्ध (व्यवहार) में देखने को मिलता है।
अर्घेऽक्षय्योदके चैव पिण्डदानेऽवनेजने । तन्त्रस्य तु निवृत्तिः स्यात्स्वधावाचन एव च ॥
गोभिल स्मृति/३/७४
इसके साथ एक अन्य तथ्य भी है कि पृथक-पृथक श्राद्ध हेतु पाक भी पृथक-पृथक होना चाहिये। इस प्रकार यहां भी स्पष्ट होता है कि मासिक श्राद्ध एक बार में ही होना चाहिये न कि एक-एक करके।
गरुडपुराण के वचन में यही स्पष्ट होता है कि यदि एक पाक से श्राद्ध किया जा रहा है तो तंत्र से ही करे, विकिर एक ही करे अर्थात एक पाक से अनेक बार विकिरदान न करे, भले ही बहुत सारे पिण्ड भी क्यों न देना हो। एक विकिरदान का तात्पर्य तंत्र विधि से ही है कि एक बार में करे पृथक-पृथक न करे। यदि पृथक-पृथक करेंगे तो विकिरदान अनेक हो जायेंगे। यह एक प्रमाण ही इतना सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि १४ मासिक श्राद्ध तंत्र से ही होने चाहिये।
एकेनैव तु पाकेन श्राद्धानि कुरुते सुतः । एकं तु विकिरं कुर्यात्पिण्डान्दद्यद्बहूनपि ॥
गरुडपुराण/२/२६/४७
और भी प्रमाण हैं जो द्वादशाह को संक्षेप में श्राद्ध करने के लिये कहते हैं और यदि इसकी पुष्टि हो रही है तो कहना ही क्या :
श्राद्धं संवत्सरं कुर्यादथवाऽप्यर्थवत्सरं। द्वादशाहेऽथ वा सर्वं संक्षेपेण समाचरेत् ॥
अंत में एक-एक करके मासिक श्राद्ध का खंडन भी किया जायेगा।
पिण्ड वेदी : पिंडवेदी प्रथम ही निर्मित होता है इससे कोई बाधा नहीं है यदि अत्रावन से पूर्व उस वेदी को पुनः व्यवस्थित कर दिया जाय क्योंकि पिंडवेदी का निर्माण उसी काल में होना चाहिये। साथ ही आकर के विषय में हस्तमात्र (लम्बाई-चौड़ाई) व चार अंगुल ऊँची कहा गया है न कि ५ – ६ अंगुल का। सपिण्डीकरण में पिंडवेदी पर विशेष विमर्श अपेक्षित है क्योंकि एक ही पिंडवेदी पर प्रेतपिण्ड व पितृपिण्ड प्रदान करने का असंगत प्रचलन है। प्रेतपिण्डवेदी और पितृपिण्डवेदी दोनों भिन्न होना चाहिये।
पिंड निर्माण : पिंड का निर्माण जब उत्सर्ग करना हो तभी करना चाहिये और भोजन से पूर्व नहीं किया जा सकता अन्यथा शेष अन्न पिण्डशेषान्न हो जाता है, किन्तु व्यवहार में जो दिखता है वो श्राद्ध आरम्भ से पूर्व ही निर्माण करते दिखता है यह विधि का उल्लंघन है। अपण्डितों को जब सामान्य बातें समझ नहीं आती तो ये सूक्ष्म ज्ञान होना संभव ही नहीं है। किन्तु पंडित होने के अहंकार में चूर रहते हैं एवं कुतर्क से ही सब कुछ सिद्ध करते रहते हैं।
पिण्ड निर्माण करके तत्क्षण हस्तप्रक्षालन के बिना उसका उत्सर्ग होना चाहिये और उत्सर्ग के पश्चात् हाथ में पिण्ड का जो भी अवशेष हो रसमात्र भी वही पिण्डतलस्थ कुशाओं में लेपभाजी का भाग होता है। उसके साथ अतिरिक्त घृत-मधु भी संलिप्त करे जिसका रस हाथ में शेष रहे।
ऊह : वेद मंत्रों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है किन्तु ये व्याकरण-व्याकरण चिल्लाते हुये वेदमंत्रों में भी परिवर्तन कर देते हैं। परिवर्तन होते ही वह वेद से बाहर का हो जाता है और मन्त्र संज्ञक नहीं रहता है।
उदाहरण : आयन्तु नः पितरः में पितरः का परिवर्तन, मधुमती में पिता का परिवर्तन, इहलोकं परित्यज्य गतोसि में गतासि परिवर्तन, अत्र पितरो में पितरो का परिवर्तन, पितृन् अहम् आवाहयिष्ये में पितृन् का परिवर्तन, पितृन् हविषे अत्तवे में पुनः पितृन् का परिवर्तन, अमीमदन्त पितरो में पुनः, तर्पयत मे पितृन् में पुनः पितृन् का परिवर्तन करना अनुचित है।
सीधा तात्पर्य यह है कि जैसे ही हम वेद मंत्र में किञ्चित भी परिवर्तन करते हैं वह वेद का भाग नहीं रहता अर्थात वेदमंत्र नहीं रहता। इस कारण वेदमंत्रों में ऊह नहीं करना चाहिये हाँ जिन शाखाओं में ऊह की आज्ञा हो वो कर सकते हैं किन्तु इसका प्रमाण तो चाहिये न कि हमारी शाखा में ऊह करने की आज्ञा है।
ऊह प्रसङ्ग में व्यावहारिक पक्ष तो ग्रहण करने का ही है किन्तु कहीं कोई स्थिरता नहीं मिलती। श्राद्ध पद्धतियों में मंत्र ऊहपूर्वक दिया गया है किन्तु नीचे टिप्पणि में नोहः कार्यः भी बताया गया है और उन मंत्रों का भी उल्लेख किया गया है जिसमें ऊह न करे। समस्या श्राद्ध कराने वालों को होती है और कोई ऊह करते हैं, तो कोई कुछ मंत्रों का लोप करते हैं तो वहीं को ऊह नहीं भी करते अथवा कई स्थानों पर करते हैं और कई स्थानों पर नहीं करते हैं।
जैसे अत्र पितरमादयस्व, तर्पयत मे पितरं में ऊह किया गया और मधुद्यौरस्तु नः पिता में ऊह नहीं किया गया और ये स्थिति श्राद्ध पद्धतियों की भी है अर्थात किसी भी पक्ष में स्थिरता का अभाव है। यहां एक पक्ष ऊह निषेध को स्थिर किया जा रहा है कि कहीं भी ऊह न करे क्योंकि यही सर्वाधिक उचित पक्ष है।
- प्रथम पक्ष ऊह निषेध का है।
- द्वितीय पक्ष कुछ विशेष स्थानों में ऊह करने का भी है जैसे आवाहन में।
- तृतीय पक्ष उन मंत्रों के त्याग का है जिनमें ऊह की आवश्यकता लगे। यह पक्ष भी बहुवचन होने पर ग्रहण करने को कहता है, मात्र बहुवचन न होने पर त्याग की बात करता है।
इनमें से प्रबल पक्ष की बात करें तो ऊह निषेध का पक्ष ही प्रबल है क्योंकि यदि ऊह की सिद्धि करें तो सर्वप्रथम “देवताभ्यः पितृभ्यश्च” में देवता और पितृ दोनों का ऊह सिद्ध हो जायेगा जिसपर किसी का ध्यान भी नहीं जाता है। यदि इसमें ऊह नहीं करते हैं जबकि यह पौराणिक मन्त्र है तो वेदमंत्रों में ऊह करना ही नहीं चाहिये।
फिर भी यदि आप इस पक्ष में स्थिर न हो सकें तो आपके पास अन्य दो विकल्प हैं या तो कहां-कहां ऊह होगा कहां नहीं, कब होगा कब नहीं इसको सुनिश्चित कर लें अथवा ऊहपरक मंत्रों का त्याग करें और यह अतिदुष्कर है। ऐसी अवस्था में ऊह न करने का पक्ष ही उचित है जिससे विसंगति उत्पन्न न हो, अन्यथा तो “देवताभ्यः पितृभ्यश्च” में भी ऊह करना आवश्यक हो जायेगा।
मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥
पाणिनीयशिक्षा (खण्ड १०) ५२
स्वरश्चैव तु हस्तश्च द्वावेतौ युगपद्भवेत्। हस्तभ्रष्टः स्वरभ्रष्टो न वेदः फलमश्नुते ॥
न करालो न लम्बोष्ठो नाव्यक्तो नानुनासिकः। गद्गदो बद्धजिह्वश्च न वर्णान्वक्तुमर्हति ॥
याज्ञवल्क्यशिक्षा
ऊह निस्तारण : ऊह सदैव विवादित रहा है और आज भी है किन्तु हम इस विवाद का निस्तारण करना चाहते हैं अस्तु दोनों ही पक्षों को समझना आवश्यक है। ऊह की सिद्धि करने वाले मुख्य वचन इस प्रकार हैं :
- एकवन्मन्त्रानूहेदेकोद्दिष्टे ॥ विष्णु स्मृति/२१/२
- मन्त्रोहाश्चात्र कर्तव्यास्तथैकवचनेन च ॥ विष्णुधर्मोत्तरपुराण/२/७७/२
- आवाहने स्वधाकारे मन्त्रा ऊह्या विसर्जने । अन्यकर्मण्यनूह्याः स्युरामश्राद्धविधिः स्मृतः ॥ – मरीचि
आवाहनमन्त्रे “पितॄन्हविषे अत्तव” इत्यत्र स्वीकर्तव इत्यूहः | विसर्जनमन्त्रे “तृप्ता यातु” इत्यत्र तवतेत्यूहः | स्वधाकारमन्त्रे “नमोवः पितर इष” इत्यत्रामा येत्यूह इति हेमाद्रिः ।
अब ऊह निषेध :
- सर्वपितृवाचित्वे उत्तरमन्त्रद्वयवैयर्थ्यात् ॥
- बहुवचनन्तुनोह्यते ॥
- ऋगंतेचनोहः ॥
एकोद्दिष्ट में भी ऊह करने की आज्ञा दी गयी है किन्तु समस्या यह है कि ऋचाओं में ऊह किया ही नहीं जा सकता और यदि ऐसा है तो ऊह की आज्ञा निरर्थक हो जायेगी। यह ऊह की आज्ञा भी निरर्थक नहीं हो सकती एवं ऋचाओं में ऊह किया भी नहीं जा सकता अब निर्णयसिन्धु में कमलाकरभट्ट लिखते हैं : “यद्यपितस्मादृचंनोहेदितिऋच्यूहोनिषिद्धस्तथापि वचनाद्भवति” – यद्यपि वेदमंत्रों (ऋचाओं) में ऊह निषिद्ध है तथापि वचन में होता है और यही संगति है।
किन्तु समस्या यहां भी समाप्त नहीं होती क्योंकि वचन का अर्थ भी अनेक होता है और दुर्भाग्य से इसका जो सामान्य रूप से अर्थ ग्रहण किया गया वो है बहुवचन और एकवचन। अर्थात बहुवचन का एकोद्दिष्ट में एकवचन करना यह अर्थ ग्रहण करना ही मूल समस्या है। यहां वचन के तीन भाव होंगे :
- एकवचन-द्विवचन-बहुवचन परक (यह पक्ष खंडित होता है किन्तु वैयाकरणों का मुख्य पक्ष यही है)
- जप न होकर वाक्य परक (ऋचाओं में जप भी कहा गया है इसका ध्यान करें), यह ऋचा के एक अंश वाले का ही अगला स्वरूप समझा जा सकता है जहां पूरी ऋचा होती है वहां जप कहा गया है और जहां ऋचा का अंश मात्र होता है उसका जप नहीं कहा गया है अपितु उस वाक्य से क्रिया का निर्देश किया गया है। यह पक्ष भी खंडित होता है क्योंकि अनेकों ऋचाएं हैं जिनसे क्रिया भी होती है : “मधुद्यौरस्तु नः पिता, पितृन्लोकान्”
- पूर्ण ऋचा न होकर एक अंश (जैसे विष्णु, हारीत, शातातप, यम, याज्ञवल्क्य आदि का वचन कहकर कोई अंश बताया जाता है), वास्तव में यही मुख्य पक्ष है। जहां पूर्ण ऋचा न हो वहां ऋचा/मंत्र न होकर वाक्य होगा और उसमें ऊह किया जायेगा।
बहुवचन का एकवचन ऊह वाला पक्ष है उसका पूर्णतः खंडित होता है क्योंकि जिसने भी ऊह ग्रहण किया है उसने “आयन्तु नः पितरः, मधुद्यौरस्तु नः पिता, पितृन्लोकान्” आदि में ऊह नहीं किया है किन्तु “पित्रे स्थानमसि, एतत्ते पितर्वासः, अत्रपितर, अघोरः पितास्तु, तर्पयत मे पितरं” आदि ऊह किया है।
इसमें एक मुख्य पक्ष क्रिया को तो लिया गया है किन्तु सम्पूर्ण ऋचा होने वाले पक्ष को ग्रहण नहीं किया गया है और ये विसंगति है – जैसे “नमस्तेपिता, तर्पयत मे पितरं” यह अंश मात्र नहीं है अपितु पूर्ण ऋचा है एवं इसमें ऊह नहीं होगा। इसके अतिरिक्त शेष स्थानों पर अंश है : “पित्रे स्थानमसि, एतत्ते पितर्वासः, अत्रपितर, अघोरः पितास्तु”, यहां अंश होना ही मुख्य रूप घटित हो रहा है, क्रिया गौण पक्ष है कि इनमें क्रिया भी होगी है अर्थात निष्कर्ष क्रिया में प्रयोग से न करके ऋचा और अंश के आधार पर होगा। सीधी सी बात है कि वेदमंत्रों में रत्तीभर उच्चारण के अंतर का भी निषेध है।
यहां यदि “पितृस्थानमसि, अत्रपितर, एतत्ते पितरवासः, अघोरः पितास्तु” को स्वीकार किया गया है तो वो वाक्यमात्र (अंश) मानकर क्योंकि ये पूर्ण ऋचा नहीं हैं। किन्तु “आयान्तु नः पितरः, तर्पयत मे पितृन्” आदि पूर्ण ऋचा होने से इसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता अस्तु यथावत ही लिया गया है।
सूक्त पाठ : रक्षोघ्नादि सूक्त पाठ हेतु पृथक वैदिक रहते हैं यद्यपि वेदज्ञ को ही श्राद्ध कराना भी चाहिये किन्तु अवैदिक (मात्र व्याकरण को प्रधान सिद्ध करते हुये) श्राद्ध कराते हैं और सूक्त पाठ अन्य वैदिकों के द्वारा कराते हैं। यहां अन्य ब्राह्मण के पाठ से कोई व्यतिक्रम नहीं है समस्या यह है कि वो कर्त्ता श्रवण भी नहीं कर पाता है जब तक वैदिक रुची-रुची रुचिः करते हैं तब तक कर्ता दक्षिणा करने पहुंच जाता है अर्थात श्राद्ध कराने वाले श्रवण नहीं करने देते हैं श्राद्ध कराते रहते हैं।
ये पाठ भी कर्त्ता का ही कार्य है यदि स्वयं न पढ़ सके तो श्रवण करे यही विकल्प है किन्तु इसके लिये तो वहां कर्म को रोकना होगा न, यदि कर्त्ता आगे की क्रिया कर रहा है तो वह सूक्त कैसे श्रवण कर रहा है ?
वेदमंत्र पढ़ाना : वर्त्तमान में सामान्य उत्सर्गादि वाक्यों के अनुसार ही वेद मन्त्र भी पदच्छेदपूर्वक पूर्वक पढ़ाये जाते हैं और इसी कारण “मुतोषसो” वाला विवाद भी उत्पन्न होता है। वेदमंत्र को स्वरपूर्वक पाठ करना चाहिये जैसे रक्षोघ्नादि सूक्त पाठ करते हैं न कि पदच्छेद पूर्वक पढ़ाना चाहिये। ऐसा करने से भी विसंगति आती है और वेदमंत्र का प्रभाव विलुप्त हो जाता है। यदि रक्षोघ्न सूक्तादि का श्रवण फलदायी है तो क्या अन्य वेदमंत्रों का श्रवण फलदायी नहीं होगा ? कर्त्ता को मात्र उत्सर्गादि वाक्य ही पढ़ाना चाहिये वेदमंत्र नहीं। यदि कर्त्ता को भी मन्त्र आता हो तो वो साथ-साथ ही पढ़ सकता है अन्यथा श्रवण मात्र करे।
वृषोत्सर्ग
शास्त्रों का अवलोकन करने पर सामर्थ्यवानों के लिये वृषोत्सर्ग पूर्वतः अनिवार्य प्रतीत होता है। जो सक्षम ही नहीं है उसके लिये अनिवार्य नहीं हो सकता क्योंकि अक्षम होने पर तो श्राद्ध का भी परिहार हो जाता है। अस्तु वर्त्तमान में बहुत सारे लोग श्राद्ध में भोज का तो सीमा से अधिक विस्तार करते हैं एवं प्रदर्शन के नाम पर न जाने श्राद्ध में भी क्या-क्या नहीं करते। उन लोगों के लिये यह गंभीरता से समझने का विषय है कि उन्हें वृषोत्सर्ग करना चाहिये था। अब प्रश्न यह आता है कि फिर किये क्यों नहीं या करते क्यों नहीं ?
इसका उत्तर है मदान्ध दुराग्रही मूर्खाचार्यों की अल्पज्ञता के कारण ऐसा नहीं होता। कारण कि वृष उपलब्ध नहीं, यदि है भी तो दोष व्याप्त है उसकी व्यवस्था नहीं की जा सकेगी और उक्त स्थिति में वैकल्पिक मार्ग इन मूर्खाचार्यों को ज्ञात ही नहीं क्योंकि ऐसा विधान करके कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं है। इन मूर्खाचार्यों का ज्ञान तो तभी दिखता है न जब कोई कर्मकांड की पुस्तक उपलब्ध हो, शास्त्र में तो प्रवेश ही नहीं है।
यदि शास्त्र में प्रवेश होता तो विकल्प को ग्रहण करते क्योंकि शास्त्र विकल्प प्रदान करता है। मेरे द्वारा जिस प्रकार संशोधन करके श्राद्ध विधि सम्पादित किया गया है उसी प्रकार संशोधित वृषोत्सर्ग पद्धति भी संपादन में है। जिन मूर्खाचार्यों को इस संशोधन का महत्व नहीं ज्ञात वो विवाह पद्धति का संशोधन करने की दिशा में प्रयास कर सकते हैं। कुछ प्रयास करेंगे तभी तो समझ होगी कि संशोधन करना कितना कठिन और दुष्कर होता है। यदि कोई ऐसा करें तो मुझे प्रेषित भी करें : 7992328206
यदि संशोधित अपात्रक श्राद्ध विधि में कोई विषय शास्त्रविरुद्ध है तो वो भी हमें सूचित किया जा सकता है।
उत्सर्ग सामग्री पर अधिकार
यदि हम श्राद्ध में उत्सर्ग सामग्रियों पर अधिकार की बात करें तो यह पूर्णरूपेण ब्राह्मण का ही है एवं ब्राह्मणेत्तर किसी का भी नहीं है। इसमें भी विभाग किया गया है जो केवल प्रेत कर्म में सम्मिलित होते हैं उन्हें महापात्र कहा जाता है और जो प्रेतकर्म के अतिरिक्त शेष कर्मों में सम्मिलित होते हैं वो पुरोहित कहलाते हैं। प्रेत के निमित्त जितने भी श्राद्ध किये गये अर्थात आद्य श्राद्ध, १४/१५ मासिक और सपिण्डीकरण के प्रेत श्राद्ध में प्रयुक्त/उत्सर्ग किये सभी सामग्रियों पर महापात्र का अधिकार होता है। इसी प्रकार एकादशाह को प्रेत के निमित्त किये जाने वाले दान पर भी महापात्र का ही अधिकार होता है।
सपिण्डीकरण में विश्वेदेव व तीन पितरों के श्राद्ध की सामग्री पर पुरोहित का अधिकार होता है साथ ही गरुडपुराण वाचक के निमित्त भी श्राद्ध की भांति ही सम्पूर्ण दान करना चाहिये जो द्वादशाह को करे और इसपर भी प्रथम अधिकार पुरोहित का ही होता है। इसी प्रकार कुटुम्बादि द्वारा भी दान किये जाते हैं उसपर भी पुरोहित का ही अधिकार होता है और किसी भी ब्राह्मणेत्तर का कोई भाग शास्त्रसिद्ध नहीं होता है। यजमान यदि सम्पूर्ण सामग्री भी ब्राह्मणेत्तर को देना चाहे तो दे सकता है किन्तु वहां ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होगी अर्थात मन्त्र प्रयोग ही नहीं होगा, कोई विधान ही नहीं होगा।
स्पष्ट है विधि और मन्त्र प्रयोग पूर्वक ब्राह्मण हेतु जो कुछ भी “ब्राह्मणाय” पद से दान दिया गया उसपर ब्राह्मण का ही होगा किसी ब्राह्मणेत्तर का नहीं होगा। हां यदि ब्राह्मणेत्तर को ही देना हो तो मन्त्र और विधान का प्रयोग किये बिना दिया जा सकता है, अर्थात वहां ब्राह्मण की आवश्यकता ही नहीं होगी।
कुछ स्थानों पर बकवास करने वाले बकवादी ब्राह्मणेत्तर “ब्राह्मणाय” को ब्राह्मनाय सिद्ध करते हुये ब्राह्म से ब्राह्मण और नाय से नाइ सिद्ध करते दिखते हैं, उन धूर्तों को यह समझ नहीं है कि नाइ के जो शब्द है वह नापित है नाय नहीं। एवं ब्राह्मणाय में जो णाय है यह तो कृष्णाय में भी है वहां क्या किया जायेगा। जब हम भगवान कृष्ण की पूजा करेंगे तो क्या भगवान कृष्ण के साथ नापित को भी बैठाकर अथवा उसकी प्रतिमा बनाकर पूजा करेंगे ?
ब्राह्मणाय के णाय का जो अर्थ लगाकर बहस किया जाता है वह असंस्कृत होने के कारण किया जाता है और यह मूढ़ता की पराकाष्ठा है।
ब्राह्मणेषु च यद्दत्तं यच्च वैश्वानरे हुतम्। तद्धनं धनमाख्यातं धनं शेषं निरर्थकम् ॥
वेदव्यास स्मृति ४/४१
ब्राह्मण के निमित्त उत्सर्ग करके नापितादि को प्रदान करना महादोष उत्पन्न करता है किन्तु यजमान की क्या बात करें यह विकृति तो ब्राह्मणों में भी देखने को मिलती है। ब्राह्मण वर्ग प्रथम स्वयं का तो सुधार करें। प्रथम स्वयंदत्त ब्राह्मण को प्रदान करना आरम्भ करें, अभी भी बहुत सारे स्थानों पर म्लेच्छाचारी कुटुम्बों को देने का प्रचलन है। ये तब उचित था जब वो ब्राह्मणवृत्ति से युक्त थे अब नौकरी भी कर रहे हैं कहीं से ब्राह्मणत्व धारण नहीं करते फिर भी उन्हें दिया जाता है, नापितादि को भी दिया जाता है।
दूसरी बात यजमान के यहां महापात्र का जो प्रेतभाग है उसको ग्रहण करना छोड़ें देव-पितृ भाग पर ही अधिकार बनता है एवं उसी पर अधिकार करें तब तो आगे भी सुधार का मार्ग प्रशस्त होगा। स्वयं का सुधार नहीं करना और शेष सबका सुधार करना ऐसा नहीं होगा पहले स्वयं का ही सुधार करें। प्रांगण में पुरोहित द्वारा एकोद्दिष्ट के निमित्त प्रयुक्त भोजनपात्र के लिये एक अतिरिक्त भोजनपात्र भी उत्सर्ग कराया जाने लगा है यदि ऐसे लोभी बनेंगे तो प्रसंशा कैसे की जा सकेगी।
पुरोहित वरण और दान : पुरोहित व अन्य देव ब्राह्मणों का वरण सपिण्डीकरण में करना चाहिए। देव सम्बंधी अन्य ब्राह्मणों का वरण भी इससे पूर्व एकादशाह में उचित नहीं है। इसी प्रकार पुरोहित को एकादशाह के दिन दान देना भी उचित नहीं है, सपिण्डन के पश्चात् द्वादशाह को देना चाहिये। इसी प्रकार पुरोहित एवं देव सम्बंधी अन्य ब्राह्मणों को एकादशाह के दिन भोजन कराना भी उचित नहीं है किन्तु वरण ग्रहण करने वालों का भोजन न करना भी उचित नहीं है। यदि एकादशाह को भोजन न करना हो तो वरण भी ग्रहण न करें और यदि वरण ग्रहण करते हैं तो भोजन हेतु शास्त्रबंधन है उसे भी स्वीकार करें । यदि उचित पक्ष की बात करें तो द्वादशाह को ही वरण, भोजन आदि उचित है।
देव-पितृ ब्राह्मण का वरण एकादशाह को एक ही परिस्थिति में किया जा सकता है और वो है यदि वृषोत्सर्ग किया जा रहा हो तो आचार्य/ब्रह्मा/होता। वर्त्तमान में महापात्र इन कर्मों के अधिकार से पूर्णतः रहित हैं, यदि योग्य हों तो श्राद्ध में नियोजित महापात्र से भिन्न महापात्र हो सकते हैं। किन्तु ऐसा होना कठिन है और कर्मलोप न हो इस कारण देव-पितृ ब्राह्मण को ही उक्त पदों पर नियोजित करना होगा। अब बात भोजन की आयेगी तो दो विकल्प है कि केवल फलाहार ही करें अथवा एक पृथक ब्राह्मण पाचक हो जो केवल इन्हीं के लिये पाक करे, इससे इतर कुछ भी पाक न करे। ये वैकल्पिक मार्ग निकाला गया है।
भोज का विचार
“भोज का विस्तार करना पितृ-कार्य को गौण और सामाजिक अहंकार को प्रधान बनाना है।”
भोज का विचार तो विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि भोज वाली व्यवस्था ने तो श्राद्ध को ही पूर्णतः विधिहीन कर दिया है। जितना बड़ा भोज होता है श्राद्ध का विधान उतना ही छोटा हो जाता है, सामग्रियों की मात्रा भले बढ़ जाती हो। यद्यपि यदि हम प्रमाणों के अनुसार विचार करें तो श्राद्ध में भोज के विस्तार का पूर्णतः निषेध किया गया है जो आगे अनेकों वचन से स्पष्ट हो जायेगा किन्तु शास्त्रविरोधी प्रवृत्ति और प्रदर्शन की भावना के कारण ही विस्तार दिया जाता है किन्तु कोई भी उसका निषेध नहीं करता।
अब तो जिला और राज्य स्तरीय भोज का भी आयोजन होने लगा है और जनसामान्य श्राद्ध का तात्पर्य भोज वाली व्यवस्था ही समझता है यदि वह प्रदर्शन न करना चाहे तब भी।
सर्वप्रथम देवश्राद्ध में दो ब्राह्मण और पितृश्राद्ध में तीन ब्राह्मण की बात कही गयी है, किन्तु अभाव होने पर अथवा असमर्थता में एक-एक की भी व्यवस्था दी गयी। यहीं एक वचन पुनः न्यूनतम १० ब्राह्मण का भी वचन प्राप्त होता है और उसके पश्चात् एकादशाह में ११ ब्राह्मण का नियम मिलता है। द्वादशाह के लिये यदि २ और तीन के पक्ष से विचार करें तो २ विश्वेदेव के निमित्त, ३ पितरों के निमित्त ९, एवं प्रेत के निमित्त ४५ हो सकते हैं कुल ५९ ज्ञात होते हैं अथवा १ – १ करने पर १९ ब्राह्मण होते हैं।
अब एक बात आती है कि भोजन हेतु ब्राह्मणों की संख्या के बारे में इतना विचार क्यों करें ? तो इसका विचार इस कारण कि अनेकानेक ग्राह्यग्राह्य विषयक तथ्य का त्याग करके भी एक विशेष विषय और है – पिता-पुत्र, दो भ्राता इनको एक साथ भोजन न कराने का अर्थात एक परिवार से एक भी ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिये क्योंकि उसके पुत्र और भाई का निषेध हो जाता है। हां यहां पर भोजन करने वाले ब्राह्मण के पूरे परिवार का भोजन भी प्रदान करें तो करें।
अब जाति, कुटुम्बादि के भोजन की बात आती है तो यहां पर एक अन्य तथ्य भी श्राद्धकर्त्ता ब्राह्मण को विदा करके बान्धवादि के साथ शांतिपूर्वक भोजन करे ऐसा होने से भोज के विस्तार की सिद्धि नहीं होती है, क्योंकि भोज के विस्तार का निषेध मिलता है। रही बात जाति आदि के भोजन सम्बन्धी महत्व का तो उसके लिये प्रथम, तृतीय, सप्तम और दशम का विधान शास्त्र से प्राप्त होता है क्योंकि इससे मृतक को अधिक तृप्ति होती है।
अथवा अन्यत्र विस्तार वाली व्यवस्था हेतु पूर्व-पर दिन का मार्गदर्शन भी किया गया है कि विस्तार करना भी हो तो श्राद्ध के दिन विस्तार न करे क्योंकि उससे श्राद्ध में ही विघ्न होता है।
एकादशेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दद्याद्देकादशेऽहनि। भोजनं तत्र वै कस्मै ब्राह्मणाय महात्मने॥ भविष्यपुराण
प्रथमेऽह्नि तृतीये च सप्तमे दशमे तथा। ज्ञातिभिः सह भोक्तव्यमेतत् प्रेतेषु दुर्लभं ॥ मरीचि
आसुरं तद्भवेच्छ्राद्धं दश यत्र न भुञ्जते ॥
द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा। भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्येत विस्तरे ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण/७/१५/३, पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/१३५
द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकं चोभयत्र वा। भोजयेदीश्वरोपीह न कुर्याद्विस्तरं बुधः ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/९/९६
एकैकमपि भोजनीयाश्च दैवे पित्र्ये च भोजयेत्। पुष्कलं फलमाप्नोति नाऽमन्त्रज्ञान् बहूनपि ॥ शंख
यद्यपि अन्य स्थानों पर भोज की अत्यधिक प्रसंशा भी प्राप्त है और अयुत भोजन कराने के लिये भी कहा गया है तथापि विचारणीय यह है कि भोज इस प्रकार से किये जायें कि श्राद्ध में विघ्न न हो। आजकल तो सनातन द्रोही इसको आधार बनाकर भी लोगों को धर्मभ्रष्ट कर रहे हैं कि भोज करना होगा। विस्तृत भोज स्वेच्छा से ही कोई करता है न तो ब्राह्मण और न ही समाज इसके लिये किसी पर दबाव बनाता है, यदि कहीं अपवाद है भी तो उसका सुधार अपेक्षित है। मैं तो शास्त्रीय आधार से कह ही रहा हूँ की भोज का विस्तार करने से श्राद्ध का नाश होता है।
पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध का खंडन
एकेनैव तु पाकेन श्राद्धानि कुरुते सुतः । एकं तु विकिरं कुर्यात्पिण्डान्दद्यद्बहूनपि ॥
गरुडपुराण/२/२६/४७
ऊपर तंत्र से १४/१५ मासिक श्राद्ध करने को सप्रमाण सिद्ध किया जा चुका है अब तर्कपूर्वक एक-एक करके अर्थात पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध करने का खंडन किया जायेगा। सर्वप्रथम एक तथ्य जो ऊपर स्पष्ट हो चुका है कि एक पाक से एक ही विकिरदान किया जायेगा इसके आधार पर ही ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि यदि पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध करना ही हो तो सबके पाक भी भिन्न-भिन्न होंगे, जबकि पाक तो एक ही होता है। यदि पाक भिन्न हो तो यह दोष नहीं होगा।
किन्तु उस अवस्था में काल का उल्लंघन होगा। यद्यपि विघ्न, प्रमाद आदि के कारण बिलम्ब होने पर प्रदोष काल तक भी श्राद्ध किया जा सकता है किन्तु ध्यातव्य है कि विघ्न होने पर कर सकते हैं न कि स्वयं ही विघ्न उपस्थित करके करेंगे। जैसे चिकित्सक भी हो, ओषधि भी हो किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि मतिपूर्वक स्वास्थ्य की हानि की जाय अपितु इसका तात्पर्य यह है कि यदि स्वास्थ्य बिगड़ जाये तो चिकित्सक-ओषधि की आवश्यकता होगी।
जब एक-एक करके मासिक श्राद्ध करते हैं तो मतिपूर्वक श्राद्ध के विहित काल का उल्लंघन करते हैं, स्वयं ही विघ्न करते हैं न कि विघ्न होता है। पूर्वाह्न में आरंम्भ करना भी निषिद्ध काल में आरम्भ करना है और सायाह्न में करना भी निषिद्ध काल में मतिपूर्वक करना है। क्योंकि तंत्रमार्ग है और तंत्र से करने पर विहित काल में सम्पन्न किया जा सकता है।
आगे यह तो तब है न जब अपात्रक श्राद्ध करते हैं, यदि भिन्न पाक हो तो भी सपात्रक में तंत्र की ही सिद्धि होती है, पृथक-पृथक करने की नहीं। सपात्रक होने पर दो स्थिति हो सकती है या तो अनेकों ब्राह्मण हों अथवा एक ही ब्राह्मण हों। यदि अनेकों ब्राह्मण हों, पाक भी भिन्न हो तो भी सबको भोजन उचित काल में ही कराना होगा, ऐसा नहीं हो सकता कि ८ बजे एक को करा दें और जिनका क्रम अंतिम में आये उनको सायाह्न तक भूखा रखें अर्थात अंतिम मासिक सायाह्न में करें।
दूसरी बात यदि एक-एक करके करेंगे तो भिन्न पाक के साथ-साथ प्रत्येक बार मंडल की भी आवश्यकता होगी जिसमें ५ – १० मिनट लगेंगे। भले ही थोड़ा दूर भोजन करायें किन्तु निकट में उच्छिष्ट रहते नहीं कराया जा सकता। स्थान में अंतर होने पर भी प्रत्येक बार मंडल करना ही होगा। अब यदि एक या तीन ब्राह्मण ही हों तब तो निःसंदेह तंत्र से ही किया जायेगा।
इसकी सिद्धि हेतु और भी प्रमाण हैं और इतने प्रमाणों का आधार होते हुये भी यदि कोई देशाचार/व्यवहार आदि ही कहे तो फिर शास्त्र की आवश्यकता ही क्या है ? उचित-अनुचित का निर्णय तो शास्त्र से ही किया जायेगा। इसके विरुद्ध एक भी प्रमाण तो प्रस्तुत होना चाहिये न कि द्वादशाह को एक-एक करके ही मासिक श्राद्ध होने चाहिये। एक भी प्रमाण नहीं होने पर बोलना क्या ब्रह्मघात नहीं सिद्ध होता है ?
द्वादशाहे यदा कुर्यात्सपिंडीकरणं सुतः। मध्याह्ने चैव सर्वाणि कुर्याच्छ्राद्धानि षोडश ॥
स्मृत्यंतरे – (स्मृति मुक्ताफलं श्राद्ध काण्ड)
आपदाद्यकृतं यत्तु कुर्यादूर्ध्वं मृताहतः। न पृथक् पाकहोमादिः पिण्डदानं पृथक्पृथक् ॥
कालादर्शे – (स्मृति मुक्ताफलं श्राद्ध काण्ड)
इस अपकर्षण के लिये एकादशाह और द्वादशाह दोनों दिन का ही वचन प्राप्त होता है अर्थात मासिक श्राद्ध एकादशाह को भी तंत्र से किये जा सकते हैं एवं द्वादशाह को सपिंडीकरण अथवा जिस देश में एकादशाह को किये जाते हैं वहां एकादशाह को ही करे और जहां द्वादशाह को मासिक श्राद्ध किये जाते हैं वहां द्वादशाह को ही तंत्र से मासिक श्राद्ध करे।
यदि अपण्डित बिना प्रमाण के भी चिल्ला सकता है तो चिल्लाये उसके चिल्लाने से सत्य और शास्त्रीय तथ्य खंडित नहीं हो सकते एवं प्रामाणिक तथ्य को प्रस्तुत करने में हमें कोई संशय नहीं। ये लोग आज नहीं मानेंगे तो न सही परवर्ती विद्वानों के लिये तो यह आधार बनेगा ही, वो इन मूर्खों की मूर्खता पर हंसेगे भी और प्रामाणिक तथ्य को स्वीकारेंगे भी।
अर्थात एक-एक करके मासिक श्राद्ध करना खंडित होता है। अपण्डितों को ये विषय समझ ही नहीं आएगा किन्तु विद्वान कर्मकांडियों के लिये समझना सरल ही है।
इस विषय को और अधिक समझने के लिये कुछ अन्य प्रमाण भी प्रस्तुत हैं, यद्यपि ये प्रमाण अन्य स्थिति में उद्धृत किये गए हैं किन्तु मासिक श्राद्ध में भी मान्य हैं ऐसा प्रतीत होता है किन्तु विद्वद्जनों को मनन करना आवश्यक है कि मासिक श्राद्ध में अग्रांकित प्रमाण ग्राह्य होंगे अथवा नहीं –
नैकः श्राद्धद्वयं कुर्यात्समाऽहनि कुत्रचित्र – प्रचेता
श्राद्धं कृत्वा तु तस्यैव पुनः श्राद्धं न तद्दिने। नैमित्तिकं तु कर्तव्यं निमित्तानुक्रमोदितम्॥ – जाबालि
द्वे बहूनि निमित्तानि जायेरन्नेकवासरे । नैमित्तिकानि कार्याणि निमित्तोत्पत्त्यनुक्रमात् ॥ – कात्यायन
काम्यतन्त्रेण नित्यस्य तन्त्रं श्राद्धस्य सिध्यति – स्मृतिसंग्रह
वीरमित्रोदय (श्राद्ध प्रकाश), संस्काररत्नमाला, श्राद्धकल्पलता आदि ग्रन्थ में उद्धृत
मृताहनि समासेन पिण्डनिर्वपणं पृथक् । नवश्राद्धं च दम्पत्योरन्वारोहण एव तु ॥ – लौगाक्षि
वीरमित्रोदय (श्राद्ध प्रकाश) में उद्धृत
निष्कर्ष
श्राद्ध का अर्थ केवल पिण्डदान या ब्राह्मण भोजन नहीं, बल्कि ‘विधि’ और ‘श्रद्धा’ का संतुलित समन्वय है। आलेख का निष्कर्ष यह है कि वर्तमान में श्राद्ध काल (कुतप काल), मंत्रोच्चार की शुद्धता और अधिकारी के चयन में भारी त्रुटियां हो रही हैं। विशेषकर ‘षोडश श्राद्ध’ को समय के अभाव में संकुचित करना या मंत्रों में मनमाना ‘ऊह’ (परिवर्तन) करना पितरों की अतृप्ति का कारण बनता है। आत्मकल्याण और पितृ-प्रसन्नता के लिए प्रदर्शन (भोज का विस्तार) त्यागकर शास्त्रोक्त विधि (मन्त्र, पात्र और काल) को अपनाना ही एकमात्र मार्ग है।
आलेख का मूल निष्कर्ष यह है कि श्राद्ध केवल ‘भोज’ या ‘पिण्डदान’ का नाम नहीं, बल्कि ‘काल, पात्र और मन्त्र’ के त्रिवेणी संगम का नाम है। वर्तमान में ‘एक-एक मासिक’ करने के नाम पर जो समय का अपव्यय और निषिद्ध काल (सायाह्न) में श्राद्ध किया जा रहा है, वह शास्त्र विरुद्ध है। पितरों की अक्षय तृप्ति के लिए कुतप काल की मर्यादा, मन्त्रों का अविकृत पाठ और न्यायोपार्जित द्रव्य की शुद्धि अनिवार्य है। यदि विधि दूषित है, तो भारी सामग्री और श्रद्धा भी निष्फल हो जाती है।
॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
“संबंधित प्रश्न” (FAQ)
FAQs
प्रश्न: क्या एक दिन में सभी मासिक श्राद्ध हो सकते हैं?
उत्तर: हाँ, द्वादशाह को ‘तंत्र’ विधि से एक साथ विधान किया जा सकता है।
प्रश्न: ब्राह्मण भोजन में कितने ब्राह्मण होने चाहिए?
उत्तर: देव कार्य में २ और पितृ कार्य में ३ (अभाव में १-१)।
प्रश्न: षोडश श्राद्ध कब किया जाता है?
उत्तर: मृत्यु के ११वें और १२वें दिन (एकादशाह-द्वादशाह)।
प्रश्न: क्या ब्राह्मण के साथ कर्ता भोजन कर सकता है?
उत्तर: नहीं, ब्राह्मण विसर्जन के उपरांत ही भोजन का विधान है।
प्रश्न: ब्राह्मण भोजन में विस्तार का निषेध क्यों है?
उत्तर: क्योंकि अधिक विस्तार से विधि और शुद्धि प्रभावित होती है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: यह आलेख पूर्णतः शास्त्रीय शोध, मिथिला की प्राचीन परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विश्लेषण पर आधारित है। यहाँ व्यक्त विचार कर्मकाण्ड की सूक्ष्मताओं को समझने हेतु शैक्षिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। किसी भी क्षेत्र विशेष की परंपरा (देशाचार) में परिवर्तन करने से पूर्व स्थानीय विद्वानों और आचार्यों से परामर्श अवश्य लें। लेखक का उद्देश्य किसी भी वर्ग या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि शास्त्रीय मर्यादा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









