संशोधित अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि – वाजसनेयी

संशोधित मासिक श्राद्ध विधि - वाजसनेयी संशोधित मासिक श्राद्ध विधि - वाजसनेयी

“तंत्र ही प्रशस्त है, क्योंकि यह विहित काल के मर्यादा की रक्षा करता है।”

आद्यश्राद्ध के उपरांत मासिक श्राद्ध विधि की आवश्यकता होती है। मासिक श्राद्ध का तात्पर्य १२ मास व ऊन मासिक कुल १४ एवं एकदश मास के मध्य में अधिकमास बढ़ने से १५ मासिक श्राद्ध है। मासिक श्राद्ध प्रकरण में भी अनेकानेक विचारणीय तथ्य हैं जिसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य पृथक-पृथक करें या तंत्र से एक बार में करें; यह है। यहां मासिक श्राद्ध भी संशोधनपूर्वक दिया गया है जो वर्त्तमान मूर्खाचार्यों के लिये तो स्वीकार्य होना दुष्कर है किन्तु परवर्ती काल में उपयोगी सिद्ध होगा।

संशोधित अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि – वाजसनेयी

पूर्व प्रकाशित एवं सुगम श्राद्ध विधि में व्यावहारिक अनुकरण करने से शास्त्रसम्मत होना कठिन था अस्तु व्यवहारानुकरण किया गया क्योंकि उस काल में मैं भी व्यावहारिक दृष्टि से ही कर्मकांड को देख पाता था शास्त्रीय दृष्टि से नहीं। अब हम शास्त्रीय दृष्टि से देखते हुये ऐसा संशोधन कर रहे हैं। यहां शास्त्रीय दृष्टि का तात्पर्य व्यावहारिक दृष्टि से रहित होना नहीं है अपितु व्यावहारिक दृष्टि से व्यवहार को समझते हुये शास्त्रीय दृष्टि से उसके औचित्य का, शास्त्र सम्मत होने का आकलन करना है।

मेरे जीवनकाल में ही इस संशोधित मासिक श्राद्ध विधि को स्वीकारा जायेगा और प्रचलन होगा इसकी संभावना नहीं दिखती और अपेक्षा भी नहीं कर सकता। इस कथन का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मैं अपने जीवित रहते इसके प्रचलन का निषेध कर रहा हूँ, विद्वद्जनों (मूर्खाचार्यों से भिन्न) की आस्था शास्त्रोचित में ही होती है और यदि वो चिंतन-मनन पूर्वक ग्रहण करें तो मेरे लिये तुष्टिकारक होगा साथ ही ऐसे विद्वद्जनों से सूचनाप्राप्ति की अपेक्षा रखूँगा। सूचनार्थ : 7992328206

संशोधित अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि - वाजसनेयी

अपात्रक श्राद्ध का तात्पर्य लगभग पूर्व आलेख संशोधित संशोधित आद्य श्राद्ध विधि – वाजसनेयी में कर चुके हैं जिसमें अनेकानेक विसंगतियां स्पष्ट करते हुये वास्तविक अपात्रक श्राद्ध कैसे होगा इसको स्पष्ट किया गया। पूज्यत्वेन कहकर ब्राह्मण (महापात्र) का वरण करना, दान-दक्षिणा आदि हस्तोदक पूर्वक ब्राह्मण (महापात्र) को प्रदान करना, प्रेतोत्सर्जित अन्न भक्षण हेतु बाध्य करना आदि विसंगतियां उजागर की गयी और यह स्पष्ट किया गया कि इससे अपात्रक होना खंडित होता है। उन्हीं तथ्यों की पुनरावृत्ति अनपेक्षित है, जिन्होंने अवलोकन नहीं किया है उनके लिए आलेख का लिंक समाहित कर दिया गया है अवलोकन कर सकते हैं।

अपात्रक होने का तात्पर्य वरण में भी संशोधन करके दान-दक्षिणादि में भी “यथानामगोत्राय” प्रयोग करना ही उचित है। यदि हस्तोदक पूर्वक ब्राह्मण (महापात्र) को प्रदान करते हैं तो यहां अपात्रक होना खंडित हो जाता है एवं दोष उत्पन्न होता है। अनर्हतावश उक्त स्थिति में ब्राह्मण और यजमान दोनों ही दोष के भागी बनते हैं। उक्त दोष का अभाव हो इस हेतु यह अनिवार्य है कि पूर्णरूपेण अपात्रक विधि को ही अंगीकार किया जाय।

अस्तु मासिक श्राद्ध में मुख्यतः यहां विचार करने का एक ही विषय है और वो है कि पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध क्यों न करें, तंत्र से ही क्यों करें एवं दक्षिणा में “यथानामगोत्राय” ही प्रयुक्त किया गया है जिसकी चर्चा अनावश्यक है।

पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध क्यों न करें, तंत्र से ही क्यों करें

सर्वप्रथम एक तथ्य जो ऊपर स्पष्ट हो चुका है कि एक पाक से एक ही विकिरदान किया जायेगा इसके आधार पर ही ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि यदि पृथक-पृथक मासिक श्राद्ध करना ही हो तो सबके पाक भी भिन्न-भिन्न होंगे, जबकि पाक तो एक ही होता है। यदि पाक भिन्न हो तो यह दोष नहीं होगा।

एकेनैव तु पाकेन श्राद्धानि कुरुते सुतः । एकं तु विकिरं कुर्यात्पिण्डान्दद्यद्बहूनपि ॥
गरुडपुराण/२/२६/४७

किन्तु उस अवस्था में काल का उल्लंघन होगा। यद्यपि विघ्न, प्रमाद आदि के कारण बिलम्ब होने पर प्रदोष काल तक भी श्राद्ध किया जा सकता है किन्तु ध्यातव्य है कि विघ्न होने पर कर सकते हैं न कि स्वयं ही विघ्न उपस्थित करके करेंगे। जैसे चिकित्सक भी हो, ओषधि भी हो किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि मतिपूर्वक स्वास्थ्य की हानि की जाय अपितु इसका तात्पर्य यह है कि यदि स्वास्थ्य बिगड़ जाये तो चिकित्सक-ओषधि की आवश्यकता होगी।

जब एक-एक करके मासिक श्राद्ध करते हैं तो मतिपूर्वक श्राद्ध के विहित काल का उल्लंघन करते हैं, स्वयं ही विघ्न करते हैं न कि विघ्न होता है। पूर्वाह्न में आरंम्भ करना भी निषिद्ध काल में आरम्भ करना है और सायाह्न में करना भी निषिद्ध काल में मतिपूर्वक करना है। क्योंकि तंत्रमार्ग है और तंत्र से करने पर विहित काल में सम्पन्न किया जा सकता है।

आगे यह तो तब है न जब अपात्रक श्राद्ध करते हैं, यदि भिन्न पाक हो तो भी सपात्रक में तंत्र की ही सिद्धि होती है, पृथक-पृथक करने की नहीं। सपात्रक होने पर दो स्थिति हो सकती है या तो अनेकों ब्राह्मण हों अथवा एक ही ब्राह्मण हों। यदि अनेकों ब्राह्मण हों, पाक भी भिन्न हो तो भी सबको भोजन उचित काल में ही कराना होगा, ऐसा नहीं हो सकता कि ८ बजे एक को करा दें और जिनका क्रम अंतिम में आये उनको सायाह्न तक भूखा रखें अर्थात अंतिम मासिक सायाह्न में करें।

सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें - Shodasha shraddh

दूसरी बात यदि एक-एक करके करेंगे तो भिन्न पाक के साथ-साथ प्रत्येक बार मंडल की भी आवश्यकता होगी जिसमें ५ – १० मिनट लगेंगे। भले ही थोड़ा दूर भोजन करायें किन्तु निकट में उच्छिष्ट रहते नहीं कराया जा सकता। स्थान में अंतर होने पर भी प्रत्येक बार मंडल करना ही होगा। अब यदि एक या तीन ब्राह्मण ही हों तब तो निःसंदेह तंत्र से ही किया जायेगा।

इसकी सिद्धि हेतु और भी प्रमाण हैं और इतने प्रमाणों का आधार होते हुये भी यदि कोई देशाचार/व्यवहार आदि ही कहे तो फिर शास्त्र की आवश्यकता ही क्या है ? उचित-अनुचित का निर्णय तो शास्त्र से ही किया जायेगा। इसके विरुद्ध एक भी प्रमाण तो प्रस्तुत होना चाहिये न कि द्वादशाह को एक-एक करके ही मासिक श्राद्ध होने चाहिये। एक भी प्रमाण नहीं होने पर बोलना क्या ब्रह्मघात नहीं सिद्ध होता है ?

एकादशेऽह्निनिर्व्वर्त्त्य अर्व्वाग्दर्शाद्यथाविधि । प्रकुर्व्वीताग्निमान्पुत्रो मातापित्रोः सपिण्डताम् ॥
गोभिल स्मृति/प्रपाठक ३/७१

द्वादशाहे यदा कुर्यात्सपिंडीकरणं सुतः। मध्याह्ने चैव सर्वाणि कुर्याच्छ्राद्धानि षोडश 
स्मृत्यंतरे – (स्मृति मुक्ताफलं श्राद्ध काण्ड)

आपदाद्यकृतं यत्तु कुर्यादूर्ध्वं मृताहतः। न पृथक् पाकहोमादिः पिण्डदानं पृथक्पृथक् 
कालादर्शे – (स्मृति मुक्ताफलं श्राद्ध काण्ड)

इस अपकर्षण के लिये एकादशाह और द्वादशाह दोनों दिन का ही वचन प्राप्त होता है अर्थात मासिक श्राद्ध एकादशाह को भी तंत्र से किये जा सकते हैं एवं द्वादशाह को सपिंडीकरण अथवा जिस देश में एकादशाह को किये जाते हैं वहां एकादशाह को ही करे और जहां द्वादशाह को मासिक श्राद्ध किये जाते हैं वहां द्वादशाह को ही तंत्र से मासिक श्राद्ध करे।

यदि अपण्डित बिना प्रमाण के भी चिल्ला सकता है तो चिल्लाये उसके चिल्लाने से सत्य और शास्त्रीय तथ्य खंडित नहीं हो सकते एवं प्रामाणिक तथ्य को प्रस्तुत करने में हमें कोई संशय नहीं। ये लोग आज नहीं मानेंगे तो न सही परवर्ती विद्वानों के लिये तो यह आधार बनेगा ही, वो इन मूर्खों की मूर्खता पर हंसेगे भी और प्रामाणिक तथ्य को स्वीकारेंगे भी।

अर्थात एक-एक करके मासिक श्राद्ध करना खंडित होता है। अपण्डितों को ये विषय समझ ही नहीं आएगा किन्तु विद्वान कर्मकांडियों के लिये समझना सरल ही है।

इस विषय को और अधिक समझने के लिये कुछ अन्य प्रमाण भी प्रस्तुत हैं, यद्यपि ये प्रमाण अन्य स्थिति में उद्धृत किये गए हैं किन्तु मासिक श्राद्ध में भी मान्य हैं ऐसा प्रतीत होता है किन्तु विद्वद्जनों को मनन करना आवश्यक है कि मासिक श्राद्ध में अग्रांकित प्रमाण ग्राह्य होंगे अथवा नहीं –

नैकः श्राद्धद्वयं कुर्यात्समाऽहनि कुत्रचित्र – प्रचेता
श्राद्धं कृत्वा तु तस्यैव पुनः श्राद्धं न तद्दिने। नैमित्तिकं तु कर्तव्यं निमित्तानुक्रमोदितम्॥ – जाबालि
द्वे बहूनि निमित्तानि जायेरन्नेकवासरे । नैमित्तिकानि कार्याणि निमित्तोत्पत्त्यनुक्रमात् ॥ – कात्यायन
काम्यतन्त्रेण नित्यस्य तन्त्रं श्राद्धस्य सिध्यति – स्मृतिसंग्रह
वीरमित्रोदय (श्राद्ध प्रकाश), संस्काररत्नमाला, श्राद्धकल्पलता आदि ग्रन्थ में उद्धृत

मृताहनि समासेन पिण्डनिर्वपणं पृथक् । नवश्राद्धं च दम्पत्योरन्वारोहण एव तु ॥ – लौगाक्षि
वीरमित्रोदय (श्राद्ध प्रकाश) में उद्धृत

इसके साथ ही और एक महत्वपूर्ण तथ्य श्राद्ध काल का विचार करना है। एवं श्राद्ध काल का विचार करने पर यदि विधिपूर्वक शास्त्रविहित काल में मासिक और सपिण्डी श्राद्ध करना हो तो तंत्र ही ही करना होगा, दूसरा मार्ग ही नहीं है। अधिक विस्तृत विश्लेषण “सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें” आलेख में किया गया है यहां संक्षेप में ही बिंदुवार समझने का प्रयास करेंगे :

  • मासिक श्राद्ध एकादशाह को भी किया जा सकता है और द्वादशाह को भी। व्यवहार/लोकाचार/देशाचार चिल्लाने वालों के लिये यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि दोनों ही प्रशस्त है एवं इस कारण जहां जो ग्रहण किया गया हो वह वहां का देशाचार आदि भी कहलायेगा।
  • मासिक श्राद्ध एकोद्दिष्ट के अंतर्गत आता है, अपकर्षण होने के कारण एक दिन में ही सभी करने से पिण्ड की संख्या बढती है।
  • एकोद्दिष्ट श्राद्ध का मुख्य उचित काल कुतप काल है और गौण काल मध्याह्न है।
  • पूर्वाह्ण और सायाह्न दोनों ही काल में श्राद्ध प्रशस्त नहीं है अपितु निषिद्ध है, एकोद्दिष्ट मध्याह्न में ही प्रशस्त है।
  • मुख्यकाल मात्र में १४ मासिक श्राद्ध तंत्र से भी संपन्न होना कठिन है अस्तु मध्याह्न काल को ग्रहण किया जायेगा।
  • मासिक श्राद्ध के पश्चात् सपिण्डीकरण भी करना आवश्यक होगा, सपिंडीकरण पार्वण में गण्य है (विधि से) और उसका काल अपराह्न सिद्ध होता है किन्तु सायाह्न या रात में नहीं। अस्तु यदि मासिक श्राद्ध मध्याह्न में संपन्न कर लिये जायें तभी अपराह्न में सपिण्डीकरण का आरम्भ होना भी संभव हो सकता है। आरम्भ होने के पश्चात् यदि विलम्ब हो ही जाये तो हो सकता है।

तंत्र में सावधानी

अर्ध्येऽक्षय्योदके चैव पिण्डदानेऽवनेजने । तन्त्रस्य तु निवृत्तिः स्यात्स्वधावाचन एव च ॥
गोभिल स्मृति/प्रपाठक ३/७४

व्यावहारिक समस्या

मासिक श्राद्ध आरम्भ करने से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी

मुख्यं श्राद्धं मासि मासि अपर्याप्तावृतुं प्रति । द्वादशाहेन वा कुर्यादेकाहे द्वादशापि वा ॥
मरीचि (वीरमित्रोदय में उद्धृत)

  • द्वादशाह को प्रातः काल उठकर श्राद्धस्थला जाये एवं श्राद्धभूमि कल्पित करे। ध्यान रखें यह एक महत्वपूर्ण विधान है।
  • श्राद्ध भूमि का निरीक्षण करते हुए निर्धारित करे अर्थात आवश्यक लिपाई आदि के लिये निर्देश दे दे।
  • ब्राह्मण को निमंत्रण स्वयं दे या प्रतिनिधि द्वारा दे, लेकिन ब्राह्मण को निमंत्रण भी पवित्र होकर ही दे ।
  • श्राद्ध सामग्री आदि लेकर श्राद्ध स्थला जाकर स्नान करे।
  • तत्पश्चात नित्यकर्म (संध्या-वन्दनादि) करे। संध्या-वंदनादि से ही सिद्ध हो जाता है कि प्रातःकाल न कि मध्याह्न में। वो धूर्ताचार्य हैं जो मध्याह्न में संध्या कराकर अपनी विद्वत्ता और शास्त्रनिष्ठा का पाखंड करते हैं।
  • सामान्यतजन नित्यकर्म से रहित ही होते हैं अस्तु निःसंदेह ब्राह्मण ही करायेंगे और कराते हैं। उक्त स्थिति में सूर्यनारायण को अर्घ्य प्रदान करके १० बार गायत्री जप करे। फिर तर्पण, पंचदेवता-विष्णु पूजन करे।
  • द्वादशाह को प्रायश्चित्तांग गोदान की पुनरावश्यकता नहीं होगी।
  • श्राद्ध का आरम्भ मध्याह्न काल में करना चाहिये।
  • मध्याह्न काल में श्राद्ध आरम्भ करने का तात्पर्य एकोद्दिष्ट आरम्भ करना है न की पाकारम्भ करना।
  • चूंकि मध्याह्न काल में एकोद्दिष्ट करना चाहिये इसलिये अन्य पाक-दानादि कार्य कुतुप काल से पूर्व कर ले।

पाकक्रिया

  • यदि पाचक का सर्वथा अभाव हो तो।
  • यदि किसी अन्य सपिण्डादि की मृत्यु संभावित हो तो।

पिण्ड निर्माण

पिण्ड निर्माण

शास्त्रानुकूल विधि समझें

“देशाचार तभी मान्य है जब वह शास्त्र के स्पष्ट सिद्धांतों का बाध न करे।”

  • विहितकाल का उल्लंघन किया जा रहा है जिसको खंडित करते हुये यहां विहितकाल में करना स्थापित किया गया है।
  • एक पाक होने पर भी पृथक-पृथक मासिक किया जा रहा है, इस विषय में तन्त्र को सिद्ध किया गया है।
  • सव्यापसव्य का त्याग करते हुये माला बनाकर श्राद्ध किया जा रहा है, जिसको खंडित किया गया है।
  • मंत्रादि को लोप किया जा रहा है (देवताभ्यः, मधुव्वाता), जिसको खंडित किया गया है।
  • वेदमन्त्र में परिवर्त्तन (ऊह) किया जा रहा है, यहां वेदमंत्रों का यथावत प्रयोग किया गया है क्योंकि ऊह नहीं किया जा सकता। वेदमंत्र में किञ्चित परिवर्तन होने से वह स्खलित होकर वेदबाह्य हो जाता है।
  • जब तन्त्र किया जाता है तो तन्त्र निषेध का पालन नहीं किया जाता, इसका खंडन करते हुये अर्घ्य, अक्षय्योदक, पिण्ड, अवनेजन (अत्रावन और प्रत्यवन) में तन्त्र नहीं किया जा सकता ऐसा सिद्ध किया गया है।
  • अनुष्णान्न परिवेषण किया जा रहा है, इसका खंडन करते हुये उष्ण अन्न परिवेषण की विधि स्थापित की गई है।
  • आचमन का विलोप कर दिया गया है, यहां आचमन को भी प्रमाणानुसार स्थापित किया गया है।
  • दक्षिणा हस्तोदक पूर्वक महापात्र को दिया जा रहा है जिससे अपात्रकत्व खंडित होता है, यहां सम्पूर्ण रूप से अपात्रकत्व विधि स्थापित की गई है।

मासिक श्राद्ध विधि

निर्देश :

  1. जिस क्रिया में स.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
  2. जिस क्रिया में स.पू.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, पूर्वाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
  3. जिस क्रिया में अ.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
  4. जिस क्रिया में अ.द.मो. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, मोटकहस्त।

सव्य-अपसव्य क्रम और त्रिकुशा-मोड़ा आदि के सम्बन्ध में अन्य पद्धतियों में किञ्चित अंतर संभव है।

यदि पाककर्त्ता द्वारा पाककर्म हुआ हो तो श्राद्धकर्त्ता पाककर्त्ता से पूछे “सिद्धम्” और पाककर्त्ता कहे “ॐ सिद्धम्” ॥ यदि पाककर्ता न हो तो पूछने की आवश्यकता नहीं है।

सर्वप्रथम कुशादि धारण कर शुद्धिकरण करे, तीन बार आचमन करते हुए आत्मशुद्धि करे :

पवित्रीकरण मंत्र (सव्य-पूर्वाभिमुख) : ॐ अपवित्रः पवित्रोऽ वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याऽभ्यन्तरः शुचिः पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥

मासिक श्राद्ध तंत्रपूर्वक करना ही शास्त्रसम्मत पक्ष है और पृथक-पृथक करने में अनेकों दोष उत्पन्न होते हैं अस्तु मासिक श्राद्ध में तंत्र का आरम्भ संकल्प से ही हो जायेगा अर्थात एक बार में ही संकल्प किया जायेगा। पूर्वाभिमुख-सव्य-त्रिकुशा-तिल-जल लेकर पहले मासिक-श्राद्ध का संकल्प करे :-

मासिक श्राद्ध संकल्प (स.पू.त्रि.): ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य प्रेतत्वविमुक्ति हेतु षोडश (सप्तदश) श्राद्धान्तर्गत प्रथममासिकाद्यारभ्य ऊनादिसहित द्वादशमासिक पर्यन्त चतुर्दशमासिकानि श्राद्धानि तन्त्रेण अहं करिष्ये ॥

  • संकल्प कर तिल जलादि भूमि पर गिराये त्रिकुशा सहित।
  • त्रिकुशा लेकर तीन बार गायत्री मंत्र जप करे। तीन बार देवताभ्यः मंत्र पढ़े (स.पू.त्रि.) : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥

आवाहन (अ.द.त्रि.) : ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽ अग्निष्वाता: पथिभिर्देवयानै: अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ करबद्ध पित्र्यावाहन करे ॥

अर्घ्य स्थापन – अपसव्य (पश्चिम-पूर्व) क्रम से क्रमशः सभी अर्घ्यपात्रों में दक्षिणाग्र पवित्री देकर, शन्नो देवी मंत्र से जल दे, तिलोऽसि मंत्र से तिल दे :

  • जल (अ.द.त्रि.) : ॐ शन्नो देवीरभिष्टय ऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभि स्रवन्तुनः॥ अर्घ्य पात्र में जल दे।
  • तिल (अ.द.त्रि.) : ॐ तिलोऽसि सोम देवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्नद्भिः पृक्त: स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वाहा ॥

जल-तिल देकर बिना मंत्र के पुष्प-चंदन भी दे। अर्घ्य पात्रों से पवित्री निकाल कर भोजन पात्र पर यथाक्रम उत्तराग्र रखकर अन्य जल से सिक्त करे। दोनों ही हाथों से सभी अर्घ्य पात्रों को ढंकने का उपक्रम करते हुये अगल मंत्र से अभिमन्त्रण करे :

अर्घ्याभिमंत्रन (अ.द.त्रि.) : ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूबुर्या आंतरिक्षा उत पार्थीवीर्या:। हिरण्यवर्णा याज्ञियास्ता न आपः शिवा: स ᳪ स्योना: सुहवा भवन्तु ॥

फिर क्रमशः अपसव्य क्रम से एक-एक करके अर्घ्य का उत्सर्ग करे क्योंकि अर्घ्य में तन्त्र का निषेध किया गया है। अर्घ्यपात्र को वामहस्त में लेने की अनिवार्यता नहीं है अर्थात जहां स्थित है वहीं पर उत्सर्ग किया जा सकता है, अभिमन्त्रण हेतु यदि एक अर्घ्य हो तो वामहस्त में ग्रहण किया जाता है न कि उत्सर्ग हेतु। मोटक, तिल, जल लेकर क्रमशः अर्घ्योत्सर्ग करे और उत्सर्ग करके दाहिने हाथ में लेकर पितृतीर्थ से भोजन पात्र पर रखे उत्तराग्र कुशा पर उसका जल देकर पुनः यथा स्थान रख दे और फिर आगे दूसरे का उत्सर्ग करके उत्तरोत्तर इसी प्रकार करे :

अर्घ्योत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत प्रथममासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

इस मन्त्र से उत्सर्ग करके अर्घपात्र दाहिने हाथ में लेकर पूर्वसिक्त कुशा पर पितृतीर्थ से उसका जल दे दे। फिर यथास्थान (जहां से उठाया गया था वहीं) अर्घ्यपात्र को रख दे एवं जिस कुशा पर जल दिया गया था उसे अर्घ्यपात्र में दक्षिणाग्र रख दे। इसी क्रम से अन्य सभी अर्घ्य उत्सर्ग से कुशा को अर्घ्यपात्र में रखने तक की क्रिया क्रमशः करे।

  1. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत द्वितीयमासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  2. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत तृतीयमासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  3. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत चतुर्थमासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  4. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत पंचममासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  5. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत ऊनषाण्मासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  6. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत षष्ठमासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  7. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत सप्तममासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  8. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत अष्टममासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  9. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत नवमममासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  10. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत दशममासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  11. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत एकादशमासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  12. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत ऊनवार्षिकमासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
  13. ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत द्वादशमासिक श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

क्रमशः सभी अर्घ्य एक-एक करके देकर यथास्थान रखते हुये कुशाओं को अर्घ्यपात्र में देने के पश्चात् पश्चिम के अर्घ्यपात्र में क्रमशः अन्य सभी अर्घ्यपात्रों को रखकर आसन के वाम भाग (सबसे पश्चिम) में न्युब्ज करे :

न्युब्जीकरन (अ.द.मो.) : ॐ पित्रे स्थानमसि ॥ न्युब्ज करे; इनको मतिपूर्वक श्राद्ध संपन्न होने से पूर्व न हिलाये। यदि वायुवेगादि हो तो उसके अनुसार व्यवस्था भी कर दे।

अ.द.मो. भोजन पात्र और आसन को अपसव्य/अप्रदक्षिण क्रम से जल से मंडल करे (यह ध्यान रखे कि आसन और भोजन पात्रों के मध्य अन्य सामग्रियां न रहे)। वाम भाग अर्थात वेदी के पूर्व में भूस्वामि का (1) अन्न देकर अगले मंत्र से उत्सर्ग करे :-

तदनन्तर प्रेत भोजन पात्रों के तिल का निवारण करके सभी भोजनपात्रों पर अन्न, व्यञ्जन, दधि, घृत, मधु आदि परोसे। अन्नादि परोसकर अधोमुखी दाहिने हाथ से प्रेतान्न का स्पर्श कर (अथवा मधु दे) मधुव्वाता मंत्र पढ़े , दाहिने हाथ के नीचे अधोमुखी बांया हाथ लगाते हुए पृथिवी ते …… आदि मन्त्र पढ़े। (भोजनपात्र में तिल न रहे इसका ध्यान रखे अर्थात भोजनपात्र की सफाई कर ले) अवगाहन करने के लिये अन्य पूड़े में सतिल-जल-घृत जलपात्र (पूड़े) में जल रखकर, घृतपात्र (पूड़ा) में घृत देकर रखे :

  • ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते ऽअमृतं जुहोमि स्वाहा ॥
  • ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पा ᳪ सुरे ॥
  • ॐ कृष्ण कव्यमिदं रक्षमदियं ॥

बांये हाथ को अन्न में लगाकर रखते हुए दाहिने हाथ के अंगूठे से क्रमशः अन्न, जल, घी और अन्न का स्पर्श अगले मन्त्र से करे; बहुत जगह व्यवहार में यह नहीं देखा जाता अपितु दीप वाले घी का ही स्पर्श किया जाता है जो अनुचित है :-

गायत्री मंत्र से संकल्प वाली त्रिकुशा को आसन के नीचे रखे (कुशाभाव में किंचित कुशा तोड़कर रखा जाता है)। पुनः अपसव्य-दक्षिणाभिमुख “मधुमती ऋचा” (पूरी ऋचा) पाठ करे । तदनन्तर पुनः सव्य होकर रक्षोघ्नसूक्तादि पाठ अथवा श्रवण करे :

ॐ आशुः शिषाणो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभनश्चर्षनिनां ।
संक्रदनो निमिष एकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेनेक चक्षुषे । नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः ॥
ॐ सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हन्साः सरसि मानसे ॥
तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दूरमध्यानौ यूयं तेभ्योवसीदथ ॥
ॐ रुची रुची रुचिः ॥ पाठ करे।

विकिरदान : पिंडवेदी के पश्चिम भाग में एक त्रिकुशा रख कर जल से सिक्त कर दे, एक पूड़े में अन्नादि लेकर जल से आप्लावित करके (जल देकर) मधुमती ऋचा से मधु देकर बांये हाथ के पितृतीर्थ से मोड़ा द्वारा त्रिकुशा पर अगले मन्त्र से दे :-

स.पू.त्रि. – ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥

अत्रावन (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत प्रथम पिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

अत्रावन का उत्सर्ग करते हुए पूड़े का आधा जल पिंडवेदी के कुशाओं पर गिरावे और आधा प्रत्यवन वास्ते रखे। अवनेजन में तन्त्र निषेध प्राप्त होने से यहां अत्रावन १४ तो होगा किन्तु अर्घ्य की भांति पृथक-पृथक किया जायेगा अर्थात प्रथम अत्रावन की भांति ही “प्रथम” का क्रमशः “द्वितीय-तृतीयादि” ऊहपूर्वक अन्य अत्रावन भी प्रदान करें। अत्रावन पुटक का अर्द्धजल प्रदान करके उसे पुनः क्रमशः इस प्रकार वेदी के उत्तरभाग में रखें कि प्रत्यवन प्रदान करते समय कोई त्रुटि न होने पाए।

ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत द्वितीय/तृतीयादि पिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन करके पिण्ड निर्माण करे। पिण्ड निर्माण उसी समय करे जब उत्सर्ग करना हो न कि पहले, पिण्ड निर्माण करके हाथ धोये बिना ही पिण्ड का उत्सर्ग करे अर्थात पिण्डनिर्माण करके उत्सर्ग ही करे। पिण्ड निर्माण करके बांये हाथ में पिण्ड लेकर उत्सर्ग करे :-

आद्य श्राद्ध पिंडदान

पिण्ड (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत प्रथम मासिकश्राद्धे एष पिण्डः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

पिण्ड दाहिने हाथ में लेकर पितृतीर्थ से वेदी के कुशाओं पर रखे। पिंडतलस्थ कुशाओं में हाथ पोछ ले। अब हाथ धोया जाना चाहिये… पिण्डनिर्माण संबंधी विश्लेषण ऊपर किया जा चुका है पुनरावृत्ति अनपेक्षित है। क्रमशः एक-एक करके पिण्डनिर्माण; “प्रथम” का “द्वितीय-तृतीयादि” ऊहपूर्वक अन्य पिण्ड भी प्रदान करें एवं पिण्डदान के पश्चात् पिण्डतलस्थ कुशाओं में हाथ पोंछे। पुनः हाथ धोकर द्वितीय पिण्ड निर्माण करें।

ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत द्वितीय/तृतीयादि मासिकश्राद्धे एष पिण्डः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

सभी पिण्ड प्रदान करने के पश्चात् सव्य-पूर्वाभिमुख होकर दो बार आचमन करके हरिस्मरण करे। फिर दक्षिणाभिमुख हो जाये –

  1. ॐ अत्र पितरोमादयध्वं यथाभाग मा वृषादयध्वम् ॥ सूर्य स्वरूप पिता का ध्यान करते हुए उत्तर से श्वास ले।
  2. ॐ अमीमदन्त पितरो यथाभाग मा वृषायिषत ॥ पश्चिम की ओर श्वास छोड़े।

अत्रावन के पश्चात् जो जिस क्रम से पूर्व में रखा गया पुनः उसी क्रम से पृथक-पृथक तत्तत् पिंडों पर प्रत्यवन प्रदान करे; दाहिने हाथ में तिल-जल-मोड़ा लेकर प्रत्यवन उत्सर्ग करे :

पिण्डपूजन (अ.द.मो.) : ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरो शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो द्वेष्म ॥ ॐ एतद् वः पितरो वासः ॥ दोनों हाथों से (बांया हाथ आगे, दाहिना पीछे) पकड़ कर सूता पिण्ड पर दे। प्रत्येक पिण्ड पर कच्चासूत्र देकर तिल, जल लेकर वस्त्रोत्सर्ग करे :

वस्त्रोत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………… गोत्र पितः ………… प्रेत प्रथमाद्द्वादशपर्यन्त मासिकश्राद्धपिण्डेषु इमानि वासांसि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥

पिंडार्चन (अ.द.मो.) : पान, पुष्प, चन्दन, द्रव्यादि भी चुपचाप सभी पिण्डों पर चढ़ा दे। पिण्डनिर्माण के क्रम से त्रुटि किये बिना जिस पिण्ड का जो शेषान्न हो तत्तत् पिण्डो के चारों अपसव्य (अप्रदक्षिण) क्रम से बिखेड़ दे ।

  • ॐ शिवा: आपः सन्तु ॥ भोजनपात्र पर जल दे।
  • ॐ सौमनस्यमस्तु ॥ भोजनपात्र पर फूल दे।
  • ॐ अक्षतंचारिष्टमस्तु ॥ भोजनपात्र पर अक्षत दे।

तिल, मधु, घृत मिश्रित जल (अक्षय्योदक) पूड़े से पिण्ड पर दे। अक्षय्योदक का निर्माण एकत्रित ही कर ले और पृथक-पृथक पूड़े में लेकर पृथक-पृथक उत्सर्जन करके पिण्ड पर दे :

अपसव्य-दक्षिणाभिमुख-पवित्रीहस्त पिण्डस्थ सूत्रादि हटा दे। सभी पिण्डों पर त्रिकुशा रख कर जल या दुग्धधारा दे (मन्त्र की पुनरावृत्ति अनपेक्षित) :-

वारिधारा (अ.द.मो.) : ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत् मे पितृन् ॥

थोड़ा नम्र होकर पिण्डों को सूँघ ले और थोड़ा उठाकर फिर रख दे। पिण्ड के नीचे वाले कुशों को निकाल कर और पूर्व में वेदी पर भ्रमण किया गया अंगार लेकर आग में प्रक्षेप कर दे। अर्घ्यपात्रों को उत्तान कर दे। मोड़ा, तिल, जल, द्रव्यादि लेकर दक्षिणा करे :-

दक्षिणा (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य कृतैतानि प्रथममसिकादारभ्य ऊनादिसहित द्वादशमासिक पर्यन्त श्राद्धानि प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यक रजतं चन्द्रदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥ दक्षिणा कुशा पर दे न कि महापात्र के हाथ में।

दो बार आचमन कर तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥

द.अप. दीप का किसी पत्रादि से आच्छादन कर दे। हाथ-पैर धोकर सव्य-पूर्वाभिमुख होकर अगला मन्त्र पढे :-

ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेत्ताध्वरेषुयत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥

॥ ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः ॥

पिण्डवेदि को कनिष्ठिका अङ्गुलि से थोड़ा तोड़ दे। सूर्य भगवान को प्रणाम कर ले। श्राद्ध की सभी उपयोगी वस्तुयें ब्राह्मण को दे, पत्र-पुष्पादि जल में प्रवाहित करे।

॥ इति पं० दिगम्बर झा सुसम्पादितं “करुणामयीटीकाऽलंकृतं” वाजसनेयिनां संशोधितापात्रक मासिकश्राद्धविधिः ॥

इस प्रकार यह तन्त्र विधि से अपात्रक मासिक श्राद्धविधि का संशोधित स्वरूप था। इसके संशोधन में भी विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज का पर्याप्त सुझाव प्राप्त हुआ जिसके लिये उनका बारम्बार साधुवाद। हमारे जिले में शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण के रूप में तत्काल एकमात्र गिरधारी जी ही देखे जा रहे हैं।

शेष कोई यदि करते भी हैं तो प्रदर्शन मात्र करते हैं शास्त्र-सम्मत चर्चा तक नहीं कर पाते। बात-बात में बाप-दादा, देशाचार/कुलाचार/लोकाचार/महाजनो येन गतः स पंथाः/यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं आदि ही चिल्लाते हैं, किन्तु शास्त्रदृष्टियुक्त ब्राह्मण ही यह समझ सकता है कि जब शास्त्रों के अनुसार विचार करके थक जायें किन्तु निष्कर्ष प्राप्त न हो सके तब पंथ/देशाचार आदि को ढूंढा जाता है।

हम अन्य विद्वानों को भी साधुवाद देने के लिये तत्पर हैं शास्त्रसम्मत सुझाव व परामर्श आमंत्रित करते हैं : 7992328206

विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज
विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज

निष्कर्ष (Conclusion)

मासिक श्राद्धों का पृथक-पृथक अनुष्ठान व्यावहारिक रूप से काल का उल्लंघन और दोषपूर्ण पाक की स्थिति उत्पन्न करता है। इस संशोधित विधि के माध्यम से यह स्थापित किया गया है कि १२ मास, ऊनमासिक और ऊनवार्षिक सहित कुल १४ (या अधिकमास होने पर १५) श्राद्धों को ‘तंत्र’ विधि से मध्याह्न काल में संपन्न करना ही शास्त्रसम्मत है। अर्घ्य, पिण्डदान, अवनेजन और अक्षय्योदक जैसी क्रियाओं में तंत्र निषेध का पालन करते हुए, उन्हें पृथक-पृथक ऊहपूर्वक करना ही वास्तविक शास्त्रीय मर्यादा है। यह संशोधन उन विसंगतियों को दूर करता है जो वर्तमान में एक-एक मासिक करने को विधिपूर्वक कहते हुये सबकुछ विधिविरुद्ध ही किया जा रहा है।

विद्वद्जनों से विनम्र आग्रह है कि यह आपके ऊपर बाध्यकारी न होकर शास्त्रीय दृष्टिकोण से समीक्षा पूर्वक त्रुटियों के प्रति ध्यानाकर्षण पूर्वक शास्त्रोचित होने पर ग्राह्य है। धूर्ताचार्य, मूर्खाचार्य आदि कहकर उलाहना शास्त्रनिष्ठ विद्वद्जनों की नहीं की गयी है अपितु धूर्तों की करी गई है जो अपण्डित होकर भी पाण्डित्य के अहंकार से भरे हैं, किसी भी शास्त्रोचित विषय पर विचार-विमर्श करने में तो अक्षम हैं ही, समझने का भी सामर्थ्य नहीं रखते किन्तु शास्त्र से सिद्ध तथ्यों को भी अस्वीकार करते हुये अहंकार तृप्ति करते हैं।

इन मूर्खाचार्यों के समक्ष खंडन का पर्याप्त अवसर है, जिस किसी विषय को शास्त्र से सिद्धि करके अवगत करेंगे वो स्वीकार होगा किन्तु स्वयं भी शास्त्रसिद्ध पक्ष को स्वीकार करना सीखें। जब शास्त्रसिद्ध विषयों को अस्वीकार करना छोड़ देंगे तो मैं भी दुत्कारना छोड़ दूंगा। ऐसा करने का कारण यह है कि जो प्रत्यक्ष रूप से वार्तालाप करने वाले हैं वो चर्चा की योग्यता तो धारण नहीं करते किन्तु वही देशाचार आदि गाकर पांडित्य सिद्ध करते रहते हैं, पांडित्य की सिद्धि ही शास्त्रज्ञान से होता है, देशाचार-देशाचार करने से अपण्डित होना ही सिद्ध होता है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत संशोधित विधि शास्त्रीय विमर्श और प्राचीन धर्मग्रंथों के गहन अध्ययन पर आधारित है। प्रचलित व्यावहारिक विधियों से भिन्नता होने की स्थिति में विद्वान पाठक शास्त्र और शास्त्रीय विवेक का आश्रय लें। यह सामग्री धार्मिक जागरूकता और श्राद्ध की विसंगतियों का निवारण करने के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है। व्यक्तिगत प्रयोग से पूर्व योग्य शास्त्रज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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