प्रेतश्राद्ध में एकादशाह के दिन एकोद्दिष्ट करने का विधान है इसे महैकोद्दिष्ट भी कहा जाता है। षोडश श्राद्ध का प्रथम/आदि होने से इसे आद्यश्राद्ध भी कहा जाता है। इस आलेख में छन्दोग एकादशाह के दिन पञ्चदान पूर्वक श्राद्ध करने की सम्पूर्ण विधि और मंत्र दी गई है। सरलता से समझने के लिये सभी निर्देश हिंदी में दिया गया है। अंत में सुगम श्राद्ध विधि डाउनलोड करने के लिये pdf का लिंक भी दिया गया है।
एकादशाह श्राद्ध विधि | छन्दोग | shraddh vidhi
एकादशाह श्राद्ध के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी पूर्व आलेखों में दी गयी है यदि आप पढ़ना चाहें तो आगे उनके लिंक दिये गए हैं। यहां अन्य चर्चाओं की पुनरावृत्ति न करके छन्दोग एकादशाह के श्राद्ध की विधि और मंत्र पञ्चदान विधि सहित दिये जा रहे हैं।
- एकादशाह श्राद्ध विधि pdf – सहित | वाजसनेयी
- श्राद्ध कर्म विधि मंत्र की विस्तृत जानकारी – shraddh
- जानिये 16 श्राद्ध में क्या करना चाहिए ? षोडश श्राद्ध विधि – shraddh karm
- दौहित्र (नाती) मातामह श्राद्ध (नाना) का – श्राद्ध कैसे करें
प्रायश्चित्त गोदान की विधि भी वाजसनेयी एकादशाह श्राद्ध विधि में ही दी गई है।
आद्य श्राद्ध विधि – छन्दोग
1 – शय्यादान विधि
- शय्या पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छींटे : ॐ सोपकरणशय्यायै नमः ॥३॥
- ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- इस मंत्र से ब्राह्मण के दाहिने हाथ में तिल-जल दे दे : ॐ इमां सोपकरणां शय्यां ददानि ॥
- शय्या को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इमां सोपकरणां शय्यां विष्णु दैवताम् …….. गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण तिल-कुश-जलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें ।
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत्सोपकरण शय्यादान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले और शय्या का स्पर्श करे ।
2 – काञ्चनपुरुषदान विधि
- काञ्चनपुरुष पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुषाय नमः ॥३॥
- ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इदं फलवस्त्रसमन्वितं काञ्चनपुरुषं ददानि ॥
- काञ्चनपुरुष को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इदं फलवस्त्र समन्वितकाञ्चनपुरुषं विष्णु दैवतम् ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुष दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले और फलवस्त्र सहित काञ्चनपुरुष का स्पर्श करे ।
3 – गोदान विधि
गोदान विधि भी यहीं दी जा रही है, किन्तु जहां जिस काल में किया जाता हो उस काल में गोदान करे।
- तीन बार गाय की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
- ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां ददानि ॥
- ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ ददस्व’ कहें।
- गाय को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां हेमशृंगीं रौप्यखुरां ताम्रपृष्ठां वस्त्रयुगच्छनां कांस्योपदोहां मुक्तांगुलभूषितां रुद्रदैवतां ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले और गाय का पुच्छ ग्रहण कर पढ़े : ॐ क इदं कस्मा ऽअदात् कामः कामायाऽदात् । कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमाविशत् । कामेन त्वा प्रतिगृह्णामि कामैतत्ते ॥
गोमूल्य दान विधि : यदि गोदान न कर सके तो गोमूल्य दान करे। गोमूल्य दान विधि इस प्रकार है।
- तीन बार गोमूल्य की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ एतावत् द्रव्यमूल्यक सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
- ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां ददानि ॥
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम एतावत् द्रव्यमूल्योपकल्पितां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां रुद्रदैवतां ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् द्रव्यमूल्योपकल्पित सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले।
अन्य वस्तुओं के दान विधि के लिये एक स्वतंत्र आलेख प्रकाशित किया जायेगा।
निर्देश :
- जिस क्रिया में स.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
- जिस क्रिया में अ.द.मो. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, मोटकहस्त।
- जिस क्रिया में स.पू.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, पूर्वाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
सव्य-अपसव्य क्रम और त्रिकुशा-मोड़ा आदि के सम्बन्ध में अन्य पद्धतियों में किञ्चित अंतर संभव है।
सर्वप्रथम शुद्धिकरण करे, तीन बार आचमन कर कुशादि धारण करते हुए आत्मशुद्धि करे :
- पवित्रीकरण मंत्र : ॐ अपवित्रः पवित्रोऽ वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याऽभ्यन्तरः शुचिः पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥ श्राद्ध की सभी वस्तुओं पर जल छिड़क कर शरीर पर भी जल छिड़के।
- दिग्रक्षण मंत्र : ॐ नमो नमस्ते गोविन्द पुराण पुरूषोत्तम । इदं श्राद्धं हृषीकेश रक्ष त्वं सर्वतो दिशः ॥
पञ्चगव्य निर्माण, प्राशन, प्रोक्षण आदि भी करे। अंगारभ्रमण, गौरमृत्तिका आच्छादनादि भी विधि के अनुसार करे।
दीप जलाकर यदि पाककर्त्ता द्वारा पाककर्म हुआ हो तो श्राद्धकर्त्ता पाककर्त्ता से पूछे “सिद्धम्” और पाककर्त्ता कहे “ॐ सिद्धम्” ॥ यदि पाककर्ता न हो तो पूछने की आवश्यकता नहीं है।
पूर्वाभिमुख सव्य त्रिकुशा, तिल, जल आदि द्रव्य लेकर संकल्प कर। एकादशाह के दिन दो बार संकल्प किया जाता है प्रथम संकल्प षोडश श्राद्ध का और द्वितीय संकल्प आद्यश्राद्ध का। पूर्वाभिमुख-सव्य-त्रिकुशा-तिल-जल लेकर पहले षोडश-श्राद्ध का संकल्प करे :-
षोडश श्राद्ध संकल्प : ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ….. प्रेतस्य (माता के श्राद्ध में …….. गोत्रायाः ……… मातुः ………. प्रेतायाः कहे) प्रेतत्वविमुक्ति हेतु अद्यादि यथाकालं षोडश (सप्तदश) श्राद्धानि अहं करिष्ये ॥ स.पू.त्रि.
संकल्प कर तिल जलादि भूमि पर गिराये त्रिकुशा सहित। पुनः त्रिकुशा-तिल-जल आदि लेकर आद्यश्राद्ध का संकल्प करे :
आद्य श्राद्ध संकल्प : ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य (माता के श्राद्ध में …….. गोत्रायाः ……… मातुः ………. प्रेतायाः कहे) प्रेतत्वविमुक्ति हेतु षोडश (सप्तदश) श्राद्धान्तर्गत आद्य श्राद्धं अहं करिष्ये ॥ स.पू.त्रि.
- संकल्प कर तिल जलादि भूमि पर गिराये त्रिकुशा सहित।
- त्रिकुशा लेकर तीन बार गायत्री मंत्र जप करे। तीन बार देवताभ्यः मंत्र पढ़े : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते ॥३॥ स.पू.त्रि.
इसके बाद दक्षिणाभिमुख-अपसव्य-पातितवामजानु होकर पूर्वकल्पित दक्षिणाग्र आसन को तिल-जल से प्रोक्षित करे, फिर मोटक, तिल, जल से आसन उत्सर्ग करे :
आसन : ॐ अद्य ……….. गोत्र पितः ……….. प्रेत इदं आसनं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो. ॥ (स्त्रीलिंगे : ……… गोत्रे मातः ……… प्रेते) पितृतीर्थ से पूर्वकल्पित आसन पर छिड़के।
छत्रदान : आद्यश्राद्ध में आसन उत्सर्ग करने के बाद छत्र और उपानद् दान किया जाता है।
- सव्य पूर्वाभिमुख होकर छाता पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ छत्राय नमः ॥३॥
- ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इदं छत्रं ददानि ॥
- ब्राह्मण दाहिने हाथ से ग्रहण करके “ॐ ददस्व” कहे।
- छाते को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) आवरण काम इदं छत्रं उत्तानाङ्गिरो दैवतम् ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् छत्र दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले और छत्रदण्ड धारण करे।
उपानद्दान :
- सव्य पूर्वाभिमुख होकर उपानद् पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ उपानद्भ्यां नमः ॥३॥
- ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
- ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इमे उपानहौ ददानि ॥
- ब्राह्मण दाहिने हाथ से ग्रहण करके “ॐ ददस्व” कहे।
- उपानद् को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
- पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) तप्त-बालुकासि-कण्टकित-भूदुर्ग-सन्तरण काम इमे उपानहौ उत्तानाङ्गिरो दैवते ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
- पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् उपानद्दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
- ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले और उपानद् धारण करे।
दान करने के बाद हाथ-पैर पर जल छिड़क कर पुनः दक्षिणाभिमुख-पातितवामजानु हो जाये :
तिल विकिरण : ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षां सि वेदिषदः ॥ स.द.त्रि. ॥ भोजन पात्र पर तिल बिखेरे।
अर्घ्य स्थापन – अर्घ्यपात्र में दक्षिणाग्र पवित्री देकर, शन्नो देवी मंत्र से जल दे, तिलोऽसि मंत्र से तिल दे : फिर बिना मंत्र के पुष्प-चंदन भी दे :
- जल : ॐ शन्नो देवीरभिष्टये शन्नो भवन्तु पीतये शंय्योरभि स्रवन्तुनः॥ अर्घ्य पात्र में जल दे। स.द.त्रि.
- तिल : ॐ तिलोऽसि पितृ देवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्नद्भिः पृक्त: स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वधा ॥ स.द.त्रि.
अर्घ्य पात्र में जल-तिल देकर बिना मंत्र के पुष्प-चंदन भी दे। अर्घ्य पात्र को बांये हाथ में लेकर पवित्री निकाल कर भोजन पात्र पर उत्तराग्र रखे, अन्य जल से सिक्त करे। दांये हाथ से अर्घ्य पात्र को ढंककर अगले मंत्रों से अभिमन्त्रण, उत्सर्जन और न्युब्जीकरण करे : –
- अर्घ्याभिमंत्रन : ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूबुर्या आंतरिक्षा उत पार्थिवीर्या:। हिरण्यवर्णा याज्ञियास्ता न आपः शिवा: शं स्योना: सुहवा भवन्तु ॥ स.द.त्रि.; फिर दाहिने हाथ में मोटक, तिल, जल लेकर अर्घ्योत्सर्ग करे :
- अर्घ्योत्सर्ग : ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो.; फिर अर्घपात्र दाहिने हाथ में लेकर पूर्वसिक्त कुशा पर पितृतीर्थ से दे ।
- न्युब्जीकरन : ॐ पित्रे स्थानमसि ॥ (ॐ मात्रे स्थानमसि) अ.द.मो.; भोजन पात्रस्थित कुशा को पुनः अर्घ्य पात्र में रखकर आसन के पश्चिम भाग में अधोमुख कर दे। यह अधोमुखी पूड़ा दक्षिणा देने तक न हिले ऐसी व्यवस्था रखे।
- फिर श्राद्ध भूमि पर तिल बिखेर कर भूतल पर (दोनों हाथ गट्टे-से-गट्टे को मिलाकर रखते हुये) प्रेत का आवाहन करे (व्यवहार में इसी समय प्रेत द्वारा उपभोग किया गया उपयोगी और प्रिय वस्तु भी रखा जाता है जिससे प्रेत आकृष्ट हो सके) : ॐ इहलोकं परित्यज्य गतोऽसि परमां गतिं ॥ (स्त्री श्राद्ध में – ॐ इहलोकं परित्यज्य गताऽसि परमां गतिं ॥)
गन्धादि : ॐ अद्य ………….. गोत्र पितः ……….. प्रेत एतानिगन्धपुष्पधूपदीपताम्बूल वस्त्रादिऽआच्छादनानि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो.; पितृतीर्थ से गन्धादि सभी वस्तुओं पर छिड़के।
अ.द.मो. भोजन पात्र और आसन को अपसव्य क्रम से जल से घेरे (यह ध्यान रखे कि आसन और भोजन पात्र के मध्य अन्य सामग्रियां न रहे)। वाम भाग अर्थात पिंडवेदी के पूर्व में भूस्वामि का अन्न देकर अगले मंत्र से उत्सर्ग करे :-
भूस्वामी अन्नोत्सर्ग : ॐ इदमन्नं एतद् भूस्वामि पितृभ्यो नमः ॥ अ.द.मो.; अपने बांये भाग में अर्थात पिंड वेदी के पूर्वभाग में भूस्वामि के अन्न का उत्सर्ग करे।
अन्नादि परोसकर अधोमुखी दाहिने हाथ से प्रेतान्न का स्पर्श कर (अथवा मधु दे) मधुव्वाता मंत्र पढ़े , दाहिने हाथ के नीचे अधोमुखी बांया हाथ लगाते हुए पृथिवी ते …… आदि मन्त्र पढ़े। (भोजनपात्र में तिल न रहे इसका ध्यान रखे अर्थात भोजनपात्र की सफाई कर ले) अवगाहन करने के लिये अन्य पूड़े में सतिल-जल-घृत रखे
मधु दे अथवा यदि पहले दिया गया हो तो दाहिने हाथ से भोजन पात्र का स्पर्श करे : ॐ मधुव्वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्न: सन्त्वोषधिः मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां२ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तुनः ॥ ॐ मधु मधु मधु ॥ अ.द.त्रि.
पात्रालम्भन :
- ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते ऽअमृतं जुहोमि स्वाहा ॥
- ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पां सुले ॥
- ॐ कृष्ण कव्यमिदं रक्षमदियं ॥ अ.द.त्रि.
बांये हाथ को अन्न में लगाकर रखते हुए दाहिने हाथ के अंगूठे से क्रमशः अन्न, जल और अन्न का स्पर्श अगले मन्त्र से करे :-
अवगाहन : ॐ इदमन्नं ॥ इमा आपः ॥ इदं हविः ॥ अ.द.त्रि.
अन्नोत्सर्ग : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ………… प्रेत इदं अन्नं सोपकरणम् ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो.
सव्य-त्रिगायत्री जप , अपसव्य-दक्षिणाभिमुख मधुमती ऋचा पाठ करे।
ॐ अन्नहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यद्भवेत्। तत्सर्वमच्छिद्रमस्तु ॥ अ.द.त्रि. ॥
सव्य-पूर्वाभिमुख गायत्री मंत्र से संकल्प वाले कुश को थोड़ा तोड़ कर आसन के नीचे रखे। पुनः अपसव्य-दक्षिणाभिमुख “मधुमती ऋचा” पाठ करे ।
ॐ कृणुष्वपाजः प्रसितिन्न पृथिवीं याहि राजे वामवां इभेन । तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूनाणोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः । तवभ्रमास आसुया पतन्त्यनुस्पृस धृषता शोशुचानः । तपूं ष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसन्दितो विसृज विश्वगुल्काः । प्रतिष्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्याऽअदब्धः । यो नो दूरे अघसं सो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत । उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्वन्य मित्रां ओषता तिग्महेते । यो नो ऽअरातिं समिधानचक्रे नीचा तं धक्ष्यत सन्न शुष्कम् । उर्ध्वो भव प्रतिविध्या ध्यस्मदा विष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने अवस्थिरा तनुहि यातु यूनाम् जामिमजामिं प्रमृणीहि शत्रून् ॥ पाठ कर भूमि पर तिल छिड़के
ॐ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सौम्यासः । असूंऽयईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु अङ्गिरसो नः पितरः सौम्यासः । तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽअनुहिरे सोमपीथं वशिष्ठाः तेभिर्यमः सं रराणो हवीं स्युसन्नुसद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं सर्वतस्पृत्त्वात्त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ इत्यादि पुरुषसूक्त पाठ
- ॐ आशुः शिषाणो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभनश्चर्षनिनां । संक्रदनो निमिष एकवीरः शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥
- ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
- ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेनेक चक्षुषे । नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः ॥
- ॐ सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे ॥
- तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दूरमध्यानौ यूयं तेभ्योवसीदथ ॥
- ॐ नमस्येऽहं पितृन् स्वर्गे ये वसन्त्यधिदेवता। देवैरपि हि तृप्यन्तु ये च श्राद्धैः स्वधोत्तरैः ॥
- ॐ रुची रुची रुचिः ॥ पाठ करे।
विकिरदान : पिंडवेदी के पश्चिम भाग में एक त्रिकुशा रख कर जल से सिक्त कर दे, एक पुरे में अन्नादि लेकर मधुमती ऋचा से मधु दे, जल से आप्लावित करके बांये हाथ के पितृतीर्थ से मोड़ा द्वारा त्रिकुशा पर अगले मन्त्र से दे :-
विकिरदान मंत्र : ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा ये ऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम् ॥ अ.द.मो.
स.पू.त्रि. आचमन करके हरिस्मरण करे । फिर अपसव्य दक्षिणाभिमुख-पातितवामजानु होकर तीन बार गायत्री मन्त्र जपे और मधुमती ऋचा पाठ करे।
उल्लेखन : तदुत्तर बालुका से एक हाथ लंबा-चौड़ा और 4 अंगुल ऊँचा दक्षिणप्लव वेदी निर्माण करे, बालुकामयी पिंडवेदी को जल से सिक्त कर प्रादेश प्रमाण रेखा दर्भपिञ्जलि से खींचे :- ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षां सि वेदिषदः ॥ अ.द.मो. ॥ दोनों हाथों से प्रादेशप्रमाण रेखा करके दर्भपिञ्जलि उत्तर में त्याग दे।
रेखा पर नौ (मुष्टिपरिमित) छिन्नमूल कुश देकर जल से सिक्त कर दे। स.पू.त्रि. तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े :-
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते ॥३॥ स.पू.त्रि.
दक्षिणाभिमुख-अपसव्य होकर एक पूड़े में तिल-जल-चंदन-पुष्प लेकर बांये हाथ में रखे, दांये हाथ में मोड़ा-तिल-जल लेकर अगले मंत्र से अवनेजन उत्सर्ग करे :
अत्रावन : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत आद्य श्राद्ध पिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो.
अत्रावन का उत्सर्ग करते हुए पुरे का जल पिंडवेदी के कुशाओं पर गिरावे। छन्दोग श्राद्ध में प्रत्यवन पिण्डपात्र प्रक्षालन जल का होता है अतः अत्रावन का शेष न रखे।
आद्य श्राद्ध पिंडदान
तदुत्तर तिल-जल-घृत-मधु मिश्रित पिण्ड निर्माण करे (पिण्ड निर्माण श्राद्ध से पहले न करे, पिण्ड-दान काल में ही करे), निर्मित पिण्ड पिण्डाधार पात्र में रखकर पिण्ड पर घृत और मधु दे । फिर पिण्ड निर्माण करके बांये हाथ में पिण्ड लेकर उत्सर्ग करे :-
पिण्ड : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत आद्य श्राद्धे एष पिण्डः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो.
पिण्ड दाहिने हाथ में लेकर पितृतीर्थ से वेदी के कुशाओं पर रखे। जलस्पर्श करे। पिंडतलस्थ कुशाओं में हाथ पोछ ले।
स.पू.त्रि. – दो बार आचमन करके हरिस्मरण करे।
फिर दक्षिणाभिमुख-अपसव्य होकर जिस पात्र में पिण्ड रखा गया था उस पात्र को प्रक्षाल कर उसी प्रक्षालन जल को एक पूड़े में ले, तिल-पुष्प-चंदन देकर बांये हाथ में रखे, दांये हाथ में मोड़ा-तिल-जल लेकर प्रत्यवन उत्सर्ग करे :
प्रत्यवन : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ………. प्रेत आद्यश्राद्धपिण्डे अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो.
प्रत्यवन का उत्सर्ग कर पिण्ड पर दे दे। जलस्पर्श करे।
- ॐ अत्र पितर्मादयस्व यथाभाग मा वृषायस्व ॥ सूर्य स्वरूप पिता का ध्यान करते हुए उत्तर से श्वास ले।
- ॐ अमीमदत पिता यथाभाग मा वृषायिष्ट॥ दक्षिण की ओर श्वास छोड़े।
नीवीं विसर्जन या डाँरकडोर ससारे। फिर स.पू.त्रि. आचमन करे। हरिस्मरण करे। फिर दक्षिणाभिमुख-अपसव्य होकर
पिण्डपूजन : ॐ एतत्ते पितर्वासः ॥ (ॐ एतत्ते मातर्वासः) दोनों हाथों से (बांया हाथ आगे, दाहिना पीछे) पकड़ कर सूता पिण्ड पर दे। अ.द.मो.; फिर तिल, जल लेकर वस्त्रोत्सर्ग करे :
ॐ अद्य ………… गोत्र पितः ………… प्रेत आद्यश्राद्धपिण्डे एतद्वास्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो. ॥ जलस्पर्श करे ।
पान, पुष्प, चन्दन, द्रव्यादि भी चुपचाप पिण्ड पर चढ़ा दे। पिंडशेषान्न पिंड के चारों और अपसव्य क्रम से बिखेड़ दे । पुष्प लेकर अगला मंत्र पढ़े –
ॐ वसंताय नमस्तुभ्यं ग्रीष्माय च नमो नमः। वर्षाभ्यश्च शरत्संज्ञ ऋतवे च नमः सदा॥
हेमंताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शिशिराय च। मास संवत्सरेभ्यश्च दिवसेभ्यो नमः सदा॥
ॐ वसन्तादि षडऋतुभ्यो नमः॥ – पुष्प पिण्ड पर चढ़ा दे।
- ॐ शिवा: आपः सन्तु ॥ भोजनपात्र पर जल दे।
- ॐ सौमनस्यमस्तु ॥ भोजनपात्र पर फूल दे।
- ॐ अक्षतंचारिष्टमस्तु ॥ भोजनपात्र पर अक्षत दे।
फिर शान्त्युदक कल्पित करके अर्थात एक पूड़े में तिल-जल-पुष्प-चंदन-घृत-मधु आदि लेकर भूमि पर रखे। दोनों हाथों को गट्टे-से-गट्टा मिलाकर भूमि पर रखकर भूमि को प्रणाम करते हुये अगला मंत्र पढ़े – ॐ नमो नमो मेदिनी लोकधर्त्री उर्वि महि शैलगिरिधारिणी नमः। धरिणि काश्यपि जगत्प्रतिष्ठे वसुधे नमोऽस्तु वैष्णवी भूतधात्री। नमोऽस्तु ते सर्वरसप्रतिष्ठे निवापनावीचि नमो नमोऽस्तु ते॥
तिल, मधु, घृत मिश्रित जल (अक्षय्योदक) एक पूड़े में लेकर बांये हाथ में रखे, दांये हाथ में मोड़ा-तिल-जल लेकर उत्सर्ग करके दांये हाथ से पिण्ड पर दक्षिणाग्र दे :
अक्षय्योदक : ॐ अद्य ………. गोत्रस्य पितु: ……… प्रेतस्य आद्यश्राद्धपिण्डे दत्तैतदन्न पानादिकमुपतिष्ठताम् ॥ अ.द.मो. ॥
फिर सव्य-पूर्वाभिमुख होकर एक अन्य पूड़े में जल लेकर दक्षिण की ओर देखते हुये पिण्ड पर पूर्वाग्र दे :
जलधारा : ॐ अघोर: पिताऽस्तु ॥ ( अघोरा माताऽस्तु) पिण्ड पर पूर्वाग्र वारिधारा दे। स.पू.त्रि.
आशीष प्रार्थना : पूर्वाभिमुख प्रणाम करते हुए पढ़े – ॐ गोत्रन्नो वर्द्धतां ॥
अपसव्य-दक्षिणाभिमुख-पवित्रीहस्त पिण्डस्थ सूत्रादि हटा दे। पिण्ड पर त्रिकुशा रख कर जल या दुग्धधारा दे । अ.द.मो. :-
वारिधारा : ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत् मे पितरम् ॥
थोड़ा नम्र होकर पिण्ड को सूँघ ले और उठाकर फिर रख दे। पिण्ड के नीचे वाले कुशों को निकाल कर आग में दे दे। अर्घ्यपात्र को उत्तान कर दे। मोड़ा, तिल, जल, द्रव्यादि लेकर दक्षिणा करे :-
दक्षिणा : ॐ अद्य …… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य कृतैतत् आद्य श्राद्ध प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यक रजतं चन्द्रदैवतं ………. गोत्राय ………. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥ दक्षिणा लेकर ब्राह्मण ॐ स्वस्ति कहे ।
फिर सव्य-पूर्वाभिमुख होकर आचमन करे। दक्षिण की ओर देखते हुये प्रणाम करके आशीष प्रार्थना करे :
ॐ दातरो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदा: सन्ततिरेव च। श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयञ्च नो ऽअस्तु। अन्नं च नो बहु भवेत् अतिथींश्च लभेमहि। याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कञ्चन। एताः सत्याशिषः सन्तु ॥ स.पू.त्रि. ॥
तदुत्तर 3 छन्दोगी ब्राह्मण ताम्रपात्र में तिल-जल भरकर “ॐ भूर्भुवः स्वः” कहकर श्राद्धकर्ता यजमान के हाथ में दे। श्राद्धकर्ता “ॐ भूर्भुवः स्वः” पढ़ते हुये सभी श्राद्ध सामग्रियों को ताम्रपात्र के जल से सिक्त करे।
- पू.स.त्रि. होकर एक अन्य त्रिकुशा भूमि पर पूर्वाग्र रखकर जौ सहित जल दे : ॐ अग्निमुखा देवास्तृप्यन्ताम्॥
- पाकपात्र का शेष अन्न से भूतबलि प्रदान कर दे – एक पूड़े में अन्न लेकर पुष्प-जल आदि अगले मंत्र से छिड़के – ॐ भूतेभ्यः एष बलिर्नमः॥
- आचमन कर तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते ॥३॥ फिर वामदेव गान करे :
वामदेव गान : कयान इति महावामदेव ऋषिर्गायत्रीच्छन्दोऽग्निर्देवता ऽअग्निष्टोमादौ द्वितीयपृष्ठे शान्तिकर्मणि च जपे विनियोगः ।
- ॐ कयानश्चित्र आ भुव दूती सदा वृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ॥ कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः । दृढाचिदारु ये वसु ॥ अभीषुणः सखीनामविता जरितॄणां शतं भवास्यूतये ॥
- स्वस्ति न ऽइन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो ऽअरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु । ॐ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
- ॐ प्राजापत्यं वै वामदेव्यं प्रजापतावेव प्रतिष्ठायोतिष्ठन्ति । ॐ पशवो वै वामदेव्यं पशुष्वेव प्रतिष्ठायोत्तिष्ठन्ति । ॐ शान्तिर्वै वामदेव्यं शान्तावेव प्रतिष्ठायोत्तिष्ठन्ति । ॐ अत एतत्कर्माच्छिद्रमस्तु ॥
द.अप. दीप को हाथों से ढंके या किसी पत्रादि से आच्छादन कर दे। हाथ-पैर धोकर पू.स. आचमन कर अगला मन्त्र पढे :-
ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेत्ताध्वरेषुयत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥
॥ ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः ॥
पिण्डवेदि को कनिष्ठिका अङ्गुलि से थोडा तोड़ दे। सूर्य भगवान को प्रणाम कर ले। श्राद्ध की सभी उपयोगी वस्तुयें ब्राह्मण को दे, पत्र-पुष्पादि जल में प्रवाहित करे।
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कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।