अपात्रक श्राद्ध का आरंभ कब हुआ?
अपात्रक श्राद्ध और मासिक श्राद्ध के अपकर्षण का ऐतिहासिक प्रारंभ कब हुआ? महामहोपाध्याय रुद्रधर झा और वाचस्पति मिश्र के प्रमाणों के साथ पंडित दिगम्बर झा का शास्त्रीय विमर्श और अधिकार सिद्धि।
“प्रमाण” (Praman) श्रेणी का उद्देश्य कर्मकांड और धर्म के गूढ़ रहस्यों को ‘कथा-वाचकीय’ प्रपंचों से मुक्त कर सीधे शास्त्रों के मूल स्वरूप में प्रस्तुत करना है। वर्तमान में धर्म के नाम पर जो व्यावसायिकता व्याप्त है, उसने यजमान और कर्मकांडी दोनों को भ्रमित कर दिया है।
यह श्रेणी वेदों, स्मृतियों, पुराणों और धर्मशास्त्रों के उन श्लोकों और सूत्रों का प्रामाणिक संकलन है, जो कर्मकांड की शुद्धता का निर्धारण करते हैं। यहाँ केवल तथ्यों का संग्रह है, मानसिक विश्लेषण नहीं; क्योंकि शास्त्र स्वयं सिद्ध और पूर्ण हैं। यदि इन प्रमाणों का सम्यक् अनुशीलन किया जाए, तो किसी भी ‘कालनेमि’ के पाखंड को परास्त कर शुद्ध सनातन धर्म की मर्यादा को अक्षुण्ण रखा जा सकता है।
यह श्रेणी तीन स्तरों पर पाठकों का मार्गदर्शन करेगी:
यहाँ संकलित प्रमाण जैसे — स्मृति, पुराण, निर्णय ग्रन्थ, रामायण, महाभारत आदि महत्वपूर्ण ग्रंथों से लिये गए हैं जो पंडितों के लिए ‘प्रमाण-पत्र’ और यजमानों के लिए ‘ज्ञान-चक्षु’ का कार्य करेंगे।
“यह श्रेणी निरंतर वर्धमान है। यहाँ दिए गए प्रमाणों का उद्देश्य विद्वानों और जिज्ञासुओं को शास्त्र के मूल पाठ से जोड़ना है।”
अपात्रक श्राद्ध और मासिक श्राद्ध के अपकर्षण का ऐतिहासिक प्रारंभ कब हुआ? महामहोपाध्याय रुद्रधर झा और वाचस्पति मिश्र के प्रमाणों के साथ पंडित दिगम्बर झा का शास्त्रीय विमर्श और अधिकार सिद्धि।
संशोधित श्राद्ध पद्धति “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” ग्रंथ की प्रामाणिक प्रस्तावना एवं भूमिका। जानें क्यों कर्मकांड में शास्त्रीय संशोधन अनिवार्य है और ‘मूर्खाचार्यों’ के दुराग्रहों का शास्त्रसम्मत समाधान क्या है।
यह आलेख ‘कुलटूट’ (पीढ़ी अलग करना) की शास्त्रीय प्रक्रिया और अशौच के सूक्ष्म नियमों का विस्तृत विश्लेषण करता है। इसमें मनुस्मृति, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण और मिताक्षरा जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर यह सिद्ध किया गया है कि सापिण्ड्य ७ पीढ़ियों तक अक्षुण्ण रहता है। आलेख में ‘शास्त्रदस्युओं’ (अल्पज्ञ पंडितों) द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का खंडन करते हुए सपिण्ड (१-७ पीढ़ी), सोदक/सकुल्य (८-१४ पीढ़ी) और सगोत्र (१५-२१ पीढ़ी) के बीच के अंतर और उनके लिए निर्धारित अशौच काल की स्पष्ट व्याख्या की गई है।
धर्म निर्णय और पर्षद विधान का प्रामाणिक विश्लेषण। जानें क्यों न्यायाधीश, नेता और कथावाचक धर्म-निर्णय के अधिकारी नहीं हैं? स्मृतियों के अनुसार ‘पर्षद’ का गठन, योग्य ब्राह्मण की पहचान और शास्त्र-विरुद्ध ‘लोकाचार’ का खंडन। धर्म संशय निवारण हेतु एक विस्तृत शोधपत्र।
धर्म का निर्णय कौन करे और कैसे? जानें शास्त्रसम्मत धर्म-निर्णय की प्रक्रिया, विद्वान ब्राह्मण के वचन का महत्व और अदृष्ट निर्णय से उत्पन्न होने वाले ब्रह्मघात दोष का समाधान। क्या वर्तमान कथावाचक धर्म निर्णय के अधिकारी हैं? एक विस्तृत शास्त्रीय विश्लेषण।
यह आलेख जाति व्यवस्था की शास्त्रीय और ऐतिहासिक जड़ों पर एक गंभीर शोधपूर्ण संकलन है। इसमें मनुस्मृति, औशनस स्मृति, वशिष्ठ स्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथों के माध्यम से यह प्रमाणित किया गया है कि विभिन्न जातियों की उत्पत्ति वर्णों के मिश्रण और विशिष्ट संस्कारों से हुई है। यह आलेख उन भ्रामक दावों का खंडन करता है जो जाति व्यवस्था को अंग्रेजों की देन बताते हैं। यह संकलन उन पाठकों के लिए है जो भारतीय समाज के वास्तविक सांस्कृतिक और सामाजिक ढांचे को मूल शास्त्रों के चश्मे से देखना चाहते हैं।
यह आलेख सनातन धर्म की आधारशिला ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ पर आधारित एक विस्तृत प्रमाण-संग्रह है। इसमें मनुस्मृति, पाराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और अत्रि संहिता जैसे प्रामाणिक धर्मग्रंथों के श्लोकों के माध्यम से यह प्रमाणित किया गया है कि वर्ण व्यवस्था जन्मना है। आलेख में उन कुतर्कों का भी खंडन किया गया है जो आधुनिकता के नाम पर शास्त्रीय मर्यादाओं को दूषित कर रहे हैं। यह संकलन जिज्ञासुओं के लिए मार्गदर्शक और अधर्मियों के कुतर्कों के लिए एक अकाट्य वाग्दंड है।
कलयुग में पाप मुक्ति का वास्तविक मार्ग क्या है? जानें शास्त्रसम्मत प्रायश्चित्त और अनुग्रह विधान। ब्रह्मकूर्च विधि, स्मृतियों के प्रमाण और वर्तमान ढोंगी गुरुओं से बचाव का विस्तृत विश्लेषण।
“कलयुग में प्रायश्चित्त विधान का शास्त्रीय विश्लेषण। अंगिरा, पराशर, देवल और दक्ष स्मृतियों के प्रमाणों के साथ जानें अशुद्ध देह, अभक्ष्य भक्षण और कर्माधिकार लोप का समाधान। आत्मकल्याण का सरल मार्ग और नाम-महिमा के प्रमाणों का अनूठा संग्रह।”
जनन-मरण अशौच (सूतक-पातक) पर आधारित विस्तृत शास्त्र प्रमाण संकलन। मनुस्मृति, पराशर स्मृति और विभिन्न पुराणों के मूल श्लोकों के साथ जानें—किस वर्ण के लिए कितने दिन का अशौच है और किन परिस्थितियों में सद्य:शौच (तत्काल शुद्धि) का विधान है।