“विचारशून्य व्यक्ति कभी विवेकवान मार्गदर्शक नहीं ढूंढ सकता।”
यहां वो ठग रहा है वहां वो ठग रहा है और जिधर देखो सबको – सब ठग रहा है अरे दूसरों को तो छोड़ो स्वयं को स्वयं ही सभी ठग रहे हैं और स्वयं को भी ठग रहे हैं तो ज्ञात है कि सबको सब ठग रहे हैं। प्रायः लोग ऐसा ही कहते हैं कि धर्म के नाम पर ठगा जा रहा है और कुछ लोगों का यह अनुभव भी होता है। कभी विचार किये हैं कि हमें धर्म के नाम पर कोई भी ठग क्यों लेता है? आज हम इसी विषय को समझने का प्रयास करेंगे।
धर्म के नाम पर हम ठगी का शिकार क्यों बन जाते हैं ?
मान लीजिए आप एक किसान हैं और दूध को देखकर भी पहचान जाते हैं कि शुद्ध है अथवा पानी मिलाया हुआ है। संभव है कि आपको एक ठग भी लिया जाय और देखकर न पहचान पायें कि पानी मिलाया हुआ है अथवा पाउडर का दूध है किन्तु एक घूंट पर्याप्त है दूध को समझने के लिये। अर्थात् दूध के विषय में आपको कोई अधिकतम एक बार ही ठग सकता है।
किन्तु जब आप स्वेच्छा से ही डेयरी का दूध लेते हैं तो उसमें डेयरी वाले ने आपको ठगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। दूध के पाउच पर ही उसका विवरण रहता है और यह जगजाहिर है कि डेयरी का दूध पुराना भी हो सकता है कम से कम एक दिन पुराना तो निश्चित ही साथ ही उससे तत्व भी निकाला गया है। यदि आप जानते हुए डेयरी का दूध, दही, घी ले रहे हैं तो वहां ठग डेयरी है नहीं आप स्वयं ही ठगी कराते हैं।
जब आपको ज्ञात है कि डेयरी का दूग्धादि एक गाय का नहीं है अर्थात् अनेकों गाय का मिश्रित है, जिनमें से कुछ गायें ग्राह्य थी और बहुत सारी अग्राह्य फिर भी पूजनादि धार्मिक कृत्य में जब आप उस दुग्धादि का प्रयोग करते हैं तो यहां पर आपको किसने ठगा, अरे स्वयं आपने ही ठगा डेयरी ने नहीं।
अब आइये पूजा दुकान पर, एक बार समिधा के विषय में माना जायेगा कि ग्राह्याग्राह्य विवेक नहीं है किन्तु पूजादि कराने वाला वर्मकांडी भी अविवेकी है ये आपको क्यों नहीं ज्ञात है ? ये इस कारण ज्ञात नहीं कि विचार ही नहीं करते, जानना ही नहीं चाहते, चाहते तो यह हैं कि कर्मकाण्डी ब्राह्मण हो किन्तु मेरी इच्छा के अनुसार बोलने-करने वाला मितभाषी-प्रियवक्ता हो, सेवकवत व्यवहार कुशल हो तो वो योग्य कैसे होगा, विवेकवान कैसे होगा, यह संभव ही नहीं है। फिर वह भी उसी समिधा का प्रयोग करेगा।

किन्तु पंचरत्न पर आइये क्या कोई कह सकता है कि पूजा दुकान में शुद्ध पंचरत्न मिलता है अर्थात् नहीं, यह सबको ज्ञात होता है कि प्लास्टिक, लोहा, टीना आदि अग्राह्य अपद्रव्य ही है किन्तु सबके-सब प्रयोग करते हैं या नहीं। क्या पूजा दुकानदार ने ठगा? अरे नहीं आप स्वयं को ही ठग रहे हैं।
जब अपने तिल-तेल की बोतल पूजा दुकान से अथवा अन्य किसी दुकान से क्रय किया तो क्या आपने यह नहीं सोचा कि यह भी अशुद्ध ही है विचार नहीं किया तो भी आपके स्वयं की त्रुटि है और जानते हुये लिया तो दोष स्वयं ही कर रहे हैं, किसी ने आपको नहीं ठगा। कोई भी वस्तु जो कंपनियां शुद्धतम कहकर बेचती हैं वो न्यूनतम अशुद्ध होता ऐसा तो कहा जा सकता और न्यूनतम का तात्पर्य सरकार द्वारा निर्धारित गुणवत्ता पर पूरा उतर सकता है किन्तु शुद्ध नहीं हो सकता, उसमें ढेरों ऐसे अपद्रव्य-रसायन प्रयुक्त किये ही गए होंगे जो उस सीमा के भीतर होगी जिससे तात्कालिक दुष्प्रभाव प्रकट न हो, दशकों या वर्षों पश्चात् हो।
यदि पूजा हेतु तिल-तेल लेते हैं तो उसमें स्पष्ट लिखा भी मिलता है “खाने योग्य नहीं” या यही भाव प्रकट करने वाली कोई पंक्ति किसी भी भाषा में, अर्थात उसको भोजन में प्रयोग नहीं कर सकते। तिल के तेल में ऐसा क्या होता है कि उसे आहार में प्रयोग नहीं किया जा सकता, तिल के तेल में नहीं अपितु जो मिलाबट है उस कारण से ऐसा लिखा गया है और आप भी समझते हैं कि अशुद्ध है एवं ज्ञात होते हुये प्रयोग करते हैं। बताईये आपको किसने ठगा ?
मधु का विचार करें, यह संभव है कि गांव-घर में जो बेचता है उसने मधु में चीनी-शक्कर का घोल मिला दिया हो, चासनी मिला दिया हो किन्तु उसके उपरांत भी वह त्याज्य नहीं होता क्योंकि उसने कोई अपद्रव्य नहीं मिलाया। प्रयोग कौन सा करने लगे ब्रांडेड कंपनी का, जितनी बड़ी कंपनी का नाम उतना शुद्ध, जितना मंहगा उतना शुद्ध है न। यह संभव है कि उसमें चासनी न हो किन्तु यह संभव नहीं कि उसका तत्व निकाला नहीं गया हो, उसमें कुछ ऐसे रसायन न मिश्रित न किये गए हों जिससे अप्रयुज्य हो गया। किसने ठगा ?
वस्त्र का विचार करें, जब आप कर्मकांड हेतु वस्त्र लेते हैं तो क्या यह विचार करते हैं कि वस्त्र दुकान से उपयोगी वस्त्र लूं, एक बार ब्राह्मण वरण वाला वस्त्र इस भय से ले भी लें कि यदि धारणीय नहीं होगा तो कर्मकांडी धारण नहीं करेंगे किन्तु चढाने वाला वस्त्र तो अनुपयोगी लेते ही लेते हैं। अरे मैंने इधर ही एक रामार्चा में हनुमान जी के निमित्त लंगोट (वस्त्र) लिखा तो यजमान ने वो सिलाया नहीं अपितु एक बार भी धारण न किया जा सके हाँ दिखने में सजावटी अवश्य लग रहा था ऐसा क्रय करके लाया। किसने ठगा ?
अब कर्मकांडी का ही विचार कर लेते हैं : आपने किसी भी कर्मकांडी को बुलाया हो क्या आपको यह ज्ञात नहीं कि शिखा होनी चाहिये थी, यज्ञोपवीत होना चाहिये था, धोती पहनकर ही कुछ भी किया जायेगा, अनुपनीत हवनादि नहीं कर सकता, रात-दिन असत्य सम्भाषण करते हैं, मदिरा पान करते हैं, अभक्ष्य-भक्षण करते हैं, नित्यकर्म ज्ञात भी नहीं। क्या आपको ज्ञात नहीं कि अपने जो पूजनादि सामग्री संग्रह किया है उसमें से अधिकांश अग्राह्य है ? क्या आपको स्वयं के बारे में किसी और से अधिक ज्ञात नहीं कि आप कितने बड़े पापी हैं, सामग्री अशुद्ध है ?
अरे इतने बड़े पापी हैं कि किसी भी कर्म में अनर्ह हैं और जो कर्मकांडी कराने वाला है यदि वह शास्त्रज्ञ हो तो आपको करायेगा ही नहीं। अविवेकी होने के कारण ही आपके स्वेच्छाचार को पूजा-हवन आदि कहकर कराता है। आप ही शास्त्रज्ञ कर्मकांडी के योग्य नहीं है और यदि मिल भी जाये तो एक बार मिलेगा और त्याग कर देगा अथवा अगले बार से कड़े नियम स्थापित करेगा। प्रियवचन-मितभाषिता आदि का प्रदर्शन नहीं करेगा बात-बात में डांटेगा, गलत कहेगा। आप स्वयं ही दुबारा योग्य शास्त्रज्ञ कर्मकांडी को बुला नहीं सकेंगे। फिर बताइये आपको किसने ठगा ?
आपको वही कर्मकांडी पूजनादि करा सकता है जिसे स्वयं ही ज्ञात नहीं कि पहले आचमन करे या पवित्री धारण करे, पहले शिखा ग्रंथि करे या आचमन करे। यदि ज्ञात होगा तो शिखा के लिये भी कुछ न कुछ अप्रिय वचन अवश्य कहेगा क्योंकि शिखा रहित ही होते हैं यदि हो भी तो ऐसी कि ग्रंथियुक्त नहीं हो सकती। ये प्रारंभिक स्तर (पवित्रीकरण) ही सिद्ध कर देता है कर्मकांडी योग्य है अथवा नहीं फिर भी यदि आप वैसे कर्मकांडी को ही बुलाते हैं कि आप जैसे हैं, जो सामग्री उपलब्ध किया गया वैसे में उसी सामग्री से सबकुछ संपन्न करा दे, कहीं पर भी कोई शास्त्रसम्मत बात न करे।
शास्त्रज्ञ शास्त्रसम्मत बात न करे ऐसा संभव नहीं वो अशास्त्रज्ञ हेतु ही संभव है। और दोषी वह कर्मकांडी कम आप स्वयं अधिक हैं। आपको किसी और ने नहीं ठगा है स्वयं आप ही आजीवन ठगते रहे हैं। यदि आपको आचमन का सामान्य ज्ञान भी नहीं है तो सीधी बात है स्वयं ही अनर्ह हैं। यदि आपको हवन विधि ज्ञात नहीं है तो सीधी बात है अनर्ह हैं। कर्मकांडी योग्य मिले इसके लिये यह भी आवश्यक है कि आप स्वयं योग्य बने।
अब कथावाचक की बात कर लेते हैं : कहने के लिये तो सभी कहते हैं कि ये सब (प्रसिद्ध) व्यापारी है किन्तु जब अपनी बारी आये और सक्षम हो तो उसी में से किसी एक को आमंत्रित करता है, अक्षम होने पर ही किसी अन्य को। आपको ये ज्ञात क्यों नहीं कि कौन विद्वान हैं और कौन व्यापारी हैं। विद्वान का तात्पर्य एक मात्र रामायण या किसी एक-दो पुराण की कथा को रटने वाला व्यक्ति नहीं होता है वो तो अल्पज्ञ है।
विद्वान रामायण, महाभारत, पुराणादि की कथाओं को रटते नहीं हैं, अपितु शास्त्रीय विषयों के ज्ञाता होते हैं और जो भी कथा करनी हो सभी कथा कर सकते हैं एवं कथाक्रम में ही धर्म का सामान्य ज्ञात जितना पालन किया जा सके प्रदान कर सकते हैं।
मैंने ऐसे कथावाचक को भी देखा है जो रामकथा की तो प्रशंसा कर रहा था क्योंकि वो कथावाचक है किन्तु नित्यचर्या (प्रातः स्नानादि) को अनावश्यक सिद्ध कर रहा था, भोजन पूर्व स्नान को अनपेक्षित कह रहा था, किन्तु भक्ति के परम स्तर पर पहुंचने की बात कर रहा था। उस धूर्त ने बड़ी चतुराई से भक्ति को श्रेष्ठ सिद्ध करते हुये सबरी की तपश्चर्या की उपेक्षा कर दिया। भक्ति श्रेष्ठ है, ज्ञानियों को भी भक्ति की प्राप्ति हो ऐसी आकांक्षा रखते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं किन्तु तपश्चर्या अवांछित है ऐसा कैसे कह सकते हैं ?
अब गुरु की बात करते हैं : आप इतने अयोग्य हैं, पापी हैं कि ईश्वरप्राप्ति का विचार भी मन में उत्पन्न नहीं होता प्रयास की तो बात ही क्या करें। कदाचित किसी कथाओं में कुछ क्षण के लिये विचार उत्पन्न हो भी जाये तो तुरंत ही विलुप्त हो जाता है और वो उत्पन्न ही इसलिये होता है कि कथावाचक को ही गुरु बना लिया जाय और ये कथावाचक के वाक्चातुर्य और प्रदर्शन का प्रभाव होता है। यहां कथावाचक का तात्पर्य किसी विद्वान व्यक्ति से न होकर एक अल्पज्ञ और व्यवसायी धूर्त से है जिसमें से अधिकांशतः प्रसिद्धि प्राप्त करते ही हैं।
जनमानस की स्वाभाविक रूचि धर्म में न होकर पाप में है और जो धर्म का उपदेश करने वाले योग्य विद्वान हैं उनके पास पहुंचना भी उसके लिये कठिन होता है क्योंकि उसका पाप ही अवरोध उत्पन्न करता है। उसका पाप उसे पापी के प्रति ही आकर्षित करता है और वह किसी न किसी पापी के पास ही पहुँचता है जो धर्म के नाम पर आडम्बर करते हुये पापों में संलिप्त है। आपकी रुचि धर्म में होगी, आचरण में पालन करेंगे तभी जहां धर्म है वहां तक पहुंच पाएंगे, अवरोध फिर भी आ सकता है किन्तु उसको पार कर सकेंगे।
यदि कुछ विशेष पापियों को योग्य गुरु मिलने की कथायें हैं तो वहां उसका वर्त्तमान जीवन पापमय होना है पूर्व जीवन आदि का नहीं। यदि उसके पूर्वजन्मादि में भी ऐसा कोई विशेष पुण्य होता है तभी उसके लिए आगे उचित संयोग बनाता है, सामान्य पुण्यों का तो भोग में ही क्षय होता रहता है। दुःख काटता नहीं अर्थात तपश्चर्या करता नहीं इसलिये संचित पाप का क्षय नहीं होता, विशेष पाप बड़े दुःख के रूप में उपस्थित होकर क्षय होते हैं सामान्य पाप निरंतर संचित ही होता जाता है जिसे तपश्चर्यादि से नष्ट करना चाहिये था।
यह पाप स्वाभाविक रूप से आगे भी पाप के प्रति ही आकृष्ट करेगा और योग्य गुरु नहीं मिलते ऐसा कथन भी स्वतः एक पाप सिद्ध होता है एवं जहां भी स्थान प्राप्त होगा उसमें पाप या पुण्य का योगदान निःसंदेह रहेगा ही रहेगा। सामान्य जन तो इन तथ्यों को गंभीरता से समझ भी नहीं सकता किन्तु विवेकी जन समझ सकते हैं एवं सावधान हो सकते हैं कि उन्हें प्रयास क्या करना चाहिये।
सामान्य जन तो पढ़कर भी तुरंत ही सारी बातें भुला देंगे उन्हें इसमें कुछ भी ग्राह्य ज्ञान लगेगा ही नहीं। जो पूजा सामग्री संग्रह करने जा रहा होगा वो भी तुरंत भुला देगा और जैसे जो करता था वही करेगा। शिखा धारण करनी चाहिये कैसे करूँ यह विचार भी उसके मन यदि उत्पन्न हो जाये तो बड़ी बात है और उत्पन्न होने के पश्चात् भी क्षणिक होगा। सामान्य जन गुरु को ढूंढते ही क्यों हैं, दीक्षा लेते ही क्यों हैं ? कोई न कोई उसे कहता है कि कान फुकाये बिना जो भी कर रहे हो वह निष्फल होगा इसलिये कान फुंकवा लो अरे और तो और ऐसे कान फूंकने वाले भी कहा करते हैं।

अर्थ भी स्पष्ट है कि क्या फल मिलेगा, अरे (शुभ) फल वाला कोई कर्म करो तब तो फलित होगा तुम जो भी करते हो पूजा, पाठ, हवन, तीर्थ सब कुछ शास्त्रविरुद्ध ही करते हो वो स्वाभाविक रूप से निष्फल और आसुरी होता ही है तो उसमें है कौन सा फल जो तुम्हें प्राप्त होगा ? यदि है तो आसुरी कर्म का आसुरी फल ही होगा और क्या होगा, शास्त्रविरुद्ध कर्म का फल नाश/पतन ही होगा और क्या होगा ?
मतलब कान फुंकवाने से तुम्हारा रत्तीभर कल्याण नहीं होने वाला है और भी अशुभ-अनिष्ट ही होगा, ऐसे कान फुंकवाने से तो अच्छा यही है कि मत फुंकवाओ। तुम्हारा कान फूंकने वाला निःसंदेह रूप से धनलोलुप पातकी है गुरु संज्ञा को धारण ही नहीं करता है, तुम सोच रहे थे गुरु को ठगकर कान फुंकवा लूंगा और वो कथित गुरु (पाखंडी) तुमसे धन ठगने की सोच रहा था, दोनों के पाप ने एक-दूसरे को आकृष्ट किया और प्रतिफल में धर्म रत्तीभर नहीं होने वाला।
प्रह्लाद, ध्रुव, बाल्मीकि ने गुरु को तो ढूंढा ही नहीं था, ध्रुव ने दुर्घटना और माता की आज्ञा से प्रेरित होकर ईश्वर प्राप्ति का प्रयास भी किया था किन्तु प्रह्लाद ने गर्भ में कौन सा प्रयास किया था, बाल्मीकि जी ने तात्कालिक जीवन में कौन सा प्रयास किया था ? बिना प्रयास के भी पूर्व पुण्यों के प्रभाव से ईश्वर कृपा की प्राप्ति हुई योग्य गुरु उपलब्ध हुये। ये ईश्वरीय विधान से ही हुआ न, कान फुंकवाने के विधान से थोड़ी न हुआ।
अब कान फुंकवाने की सोच रखने वाला यदि कहे कि कहीं योग्य गुरु नहीं मिलते तो यह भी एक नया पाप कर रहा है। क्योंकि वो अयोग्य है ऐसा भाव तो आता ही नहीं, उसे योग्यता की प्राप्ति हो पुण्यों का उदय हो ऐसा तो कुछ करता नहीं, फुंकवाना कान है तो हीरा मिलने पर भी कोयला ही लगेगा एवं त्याग देगा। न्यूनतम कोयले में छिपे हीरे को पहचान सकें कान फुंकवाने से पहले इतनी बुद्धि तो होनी ही चाहिये।
वर्त्तमान काल में योग्य गुरु तो प्रसिद्ध भी नहीं हो सकते अर्थात यदि सोशल मीडिया पर ढूंढेंगे तो मिलेंगे ही नहीं। योग्य को तो स्वयं ही बचना कैसे है इसकी चिंता सताती है, यदि छिपें न तो स्वयं का बचाव भी न कर पायें जैसे ये प्रसिद्ध होने वाले हैं वो इनसे भी अधिक प्रसिद्ध हो जायें किन्तु स्वयं ही भटक जायेंगे, भ्रष्ट हो जायेंगे, बचाव का मार्ग ही छिप जाना है। जहां-जिसकी आवश्यकता होगी उसके समक्ष प्रकट करना ईश्वरीय विधान से स्वतः होगा, यथाकाल संयोग बन जायेगा।
होने को तो मेरे मन में भी विचार आता है कि मेरी भी शिष्यमंडली हो क्योंकि जितनी बड़ी शिष्यमंडली उतना प्रभाव जगत में दिखता है। किन्तु स्वयं के बारे में विचार करने पर ज्ञात होता है कि मैं तो शिष्य बनाने में अनर्ह हूँ। कदाचित अनर्ह होते हुये भी किसी का कल्याण मेरे माध्यम से ही होना हो तो वो दैवीय विधान स्वतः करे हमें दीक्षागुरु नहीं बनाना।
हमें गुरु प्राप्त हो गये यही ईश्वर की महती कृपा है और मैं आत्मकल्याण के विषय में निश्चिंत हूँ । मुझे ऐसा संयोग प्राप्त हुआ बिना किसी प्रयास के, न चाहते हुये, अंतिम क्षणों तक भी मैं तैयार नहीं हो पाया था, मैं बचने का प्रयास कर रहा था किन्तु यही दैवीय संयोग था कि मेरी अनिच्छा होते हुये भी मुझे प्राप्ति हो गयी। मुझे अपने गुरु का प्रचार-प्रसार भी नहीं करना है, ऐसी भी इच्छा नहीं कि मेरे गुरु के बड़े-बड़े लोग शिष्य हो जायें तो उसका सांसारिक लाभ मुझे भी प्राप्त होगा। मेरे गुरु भी छिपे हुये ही हैं और मुझे भी छिपकर ही रहना है।
ब्लॉग-सोशल मीडिया पर एक शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण (वास्तविक अनर्ह) होने के कारण शास्त्रसेवा भाव से शास्त्रोक्त चर्चा-विमर्श करता रहता हूँ, वृत्तिवश अनर्ह यजमानों का ही अल्प-मात्रा में कर्मकांड करा देता हूँ अन्यथा जीवन यापन कैसे हो ? जब मैं स्वयं ही अनर्ह हूँ यह भी एक सच्चाई है तो यजमान कहां से अर्ह प्राप्त होगा वैसे चतुर्दिक अनर्ह ही हैं, अनधिकारी ही हैं। अर्ह हो जाऊं तो आस-पास के कई जिलों में एक भी अर्ह यजमान नहीं है। अस्तु गुरु प्रसंग में यह मेरा भी अनुभव है कि आप योग्य गुरु को ढूंढे ऐसी आवश्यकता ही नहीं है, आप स्वयं योग्य बनने का प्रयास करें दैवीय विधान से अनिच्छा होते हुये भी गुरु प्राप्त हो ही जायेंगे।
“पाप का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि वह मनुष्य को पापी गुरु के प्रति ही आकर्षित करता है।”
स्वयं ढूंढना कठिन क्यों है ?
“ब्राह्मण का विरोध और शास्त्र का विरोध ही वर्तमान पाखंड की नींव है।”
यदि आप स्वयं ही ढूंढेंगे तो कठिनाई है क्या वो भी स्पष्ट करना आवश्यक है; यदि आप स्वयं ही ढूंढेंगे तो :
- आप शिखारहित हैं आपको मात्र शिखायुक्त भी श्रेष्ठ लगेंगे।
- आप तिलक नहीं करते तो बड़े-बड़े और चित्र-विचित्र तिलक के आधार पर श्रेष्ठ लगेंगे।
- आप धोती नहीं पहनते तो विचित्र-विचित्र धोती पहने हुये व्यक्ति भी श्रेष्ठ लगेंगे।
- आप जप नहीं करते तो जिसके हाथ में माला दिखे वही श्रेष्ठ लगेगा।
- आप शास्त्रविरोधी हैं तो आपको धर्म-कथा-कर्मकांड आदि के नाम पर शास्त्रविरुद्ध कहने-करने वाला ही लगेगा।
- यदि आपके बाल छोटे हैं तो बड़े बालों वाला ही अच्छा लगेगा।
- इसी प्रकार आपके पास शास्त्रदृष्टि नहीं है, व्यावहारिक दृष्टि मात्र है तो व्यावहारिक दृष्टि से ही विचार करेंगे और व्यावहारिक बातें करने वाला ही विद्वान लगेगा जबकि वो अधिकांशतः शास्त्रविरुद्ध ही कहता है।
उदाहरण : यदि आपको कर्मणा वर्णव्यवस्था सिद्ध करने वाला विद्वान प्रतीत होता है तो इसमें कारण दोनों का पाप है। यदि आपको “ढोल गंवार सूद्र पसु नारी” का यथावत न करके विपरीत अर्थ करने वाला विद्वान प्रतीत होता है तो इसमें कारण दोनों का पाप है। यदि आपको ब्राह्मण विरोध सुनकर अच्छा रकता है तो इसमें भी दोनों का पाप ही कारण है। गायत्री परिवार, आर्यसमाज आदि जितने भी हैं सबका प्रसार तो ब्राह्मण विरोध और शास्त्र विरोध करके ही हुआ है।
यदि आपका पाप उदित न हो तो आप ब्राह्मण का विरोध सुनेगे भी नहीं और यदि पुण्य उदित हो तो ब्राह्मण विरोधी को ….। यदि आपका पुण्य उदित होगा तो टीवी-सोशलमीडिया आदि पर कथा सुनना भी अच्छा नहीं लगेगा, टीवी पर चलने वाली व्यावसायिक कथा अच्छी लगती है इसका भी तात्पर्य यही है कि पाप ही उदित है। इससे आगे और कहना क्या बचा ? जो रात दिन पापी-पागलों वाली बहस देखते हैं उसकी चर्चा क्या करें ?

स्वयं ही स्वयं को ठग रहे हैं
आलेख का मुख्य विषय ठगी से सम्बंधित है तो इसमें भी मैं अपने अनुभव से जो कहना चाहूंगा वो इस प्रकार है :
ब्राह्मणेत्तरों की चर्चा करने योग्य ही नहीं है, ब्राह्मणों की दुर्दशा यह है कि शास्त्र और शास्त्रसम्मत विषयों में तनिक भी रुची नहीं। ये मैं अपने क्षेत्रीय स्तर की बात कर रहा हूँ, गणमान्य विद्वान श्रीगंगाधर पाठक मेरे क्षेत्रीय ही हैं। उनके शास्त्रीय विचार अधिकांशतः शास्त्रसम्मत ही होते हैं किन्तु प्रश्न यह है कि राम मंदिर के शिलान्यास में वैदिक मंत्रों का प्रयोग कैसे किये, जबकि यजमान तो वैदिक मंत्रों में अनधिकृत था। व्यक्तिगत कोई संपर्क या पहचान नहीं किन्तु जो प्रश्न है उसका उत्तर तो नहीं मिलने वाला।
अब क्षेत्रीय स्तर पर अन्यों की क्या चर्चा करूँ सबके-सब स्त्री-अनुपनीत आदि सबसे हवन के नाम पर हुआ-हुआ कराते रहते हैं। यदि किसी अवसर पर कुछ ब्राह्मणों का समागम भी हो जाये तो किसी विषय पर शास्त्रीय चर्चा आरम्भ होना भी कठिन होता है, यदि कुछ प्रयासपूर्वक विषय उठा भी दूँ तो कोई न ही चर्चा करने का इच्छुक होते न ही चर्चा होने देना चाहते। केवल और केवल बाप-दादा, देशाचार, लोकाचार, व्यवहार, मिथिला व्यवहार, महाजनो येन गतः स पन्थाः आदि का राग ही अलाप पाते हैं।
स्तर ये है कि कुछ वर्षों में पैंट-पैजामा पहनकर हवन-विवाहादि, व्रात्यता, एकादशाह को भोजनादि (पुरोहित वर्ग का), प्रातः से रात्रि पर्यन्त द्वादशाह को श्राद्ध, नान्दीमुख श्राद्ध का विलोप, अशौच में उपनयन-विवाह, जब मन करे तब कुलटूट, दौहित्र के लिये श्राद्धकर्त्ता होने पर भी त्रिरात्राशौच, अनुपनीत बालक व स्त्रियों का हवन करना आदि को भी देशाचार, व्यवहार, लोकाचार आदि ही सिद्ध करेंगे। आज यदि ये अपने बाप-दादा को बात-बात में शास्त्रविरोधी सिद्ध कर रहे हैं तो कल इनके वंशज इनको भी शास्त्रविरोधी क्यों न सिद्ध करेंगे।
इन्हें इतना भी विवेक नहीं कि यदि बाप-दादा चोर रहे हों हमें ज्ञात हो जाये कि चोरी करना पाप है तो हमें चोरी नहीं करना चाहिये, बात-बात पर बाप-दादा को ही घसीट कर शास्त्रविरोधी सिद्ध करते रहते हैं। अधिकांशतः मैं ब्राह्मणवर्ग के ही कर्मकांड में उपस्थित होता हूँ किन्तु विधि-विधान केवल बोलने का शब्द मात्र रह गया है करने के लिये कुछ नहीं। इनका स्तर ये हो गया है कि वर्षों से सामान्य विचार-विमर्श करके कुछ समझाना चाहें भी तो नहीं समझते और अब दुत्कारना-धिक्कारना ही शेष बचा और अब वो भी आरम्भ कर चुका हूँ।
विधिपूर्वक कोई कर्मकांड कराना ही मेरे लिये कठिन हो गया है क्योंकि वो ब्राह्मणेत्तर यजमान नहीं ब्राह्मण यजमान को भी स्वीकार्य नहीं है, तथापि अल्प मात्रा में अनुकूल भी प्राप्त हो जाते हैं। जब ब्राह्मण यजमान के ये दुर्दशा है तो ब्राह्मणेत्तर यजमानों की चर्चा करने की आवश्यकता कहां है। ऐसे में यदि ब्राह्मणेत्तर यजमान यह कहे कि धर्म-कर्मकांड के नाम पर उसे कोई अन्य ठग रहा है तो उसे क्या कहें शब्द नहीं मिलता है। अरे तुम्हें कोई और नहीं ठग रहा है तुम स्वयं ही स्वयं को ठग रहे हो।
अब आप कहेंगे कि मैं इस आलेख में भी तो ब्राह्मणों को ही धिक्कार-दुत्कार रहा हूँ। तो यहां पर दो दृष्टिकोण उत्पन्न होता है एक सामान्य व्यक्ति का दृष्टिकोण जो व्यावहारिक दृष्टिकोण भी कहा जा सकता है और दूसरा शास्त्रीय दृष्टिकोण। आपको व्यावहारिक दृष्टिकोण से हमारे आलेख में ब्राह्मण निंदा दिखाई पर सकती है किन्तु शास्त्रीय दृष्टिकोण से ऐसे अनर्हो को दुत्कारने-धिक्कारने का मुझे अधिकार प्राप्त होता है और यह मेरे लिये पाप नहीं सिद्ध होता। इनको थोड़ा-बहुत सुधारने का भी यही एक मार्ग शेष है। बहुत विचार-विमर्श करके थक गया हूँ किसी की कोई रुचि ही नहीं है।
निष्कर्ष
इस आलेख का सार यह है कि धर्म के नाम पर होने वाली ठगी के लिए हम दूसरों को दोष देते हैं, किंतु सूक्ष्मता से विचार करने पर ज्ञात होता है कि हम स्वयं ही स्वयं को ठग रहे हैं। जब हम अपनी सुविधा के अनुसार शास्त्रविरुद्ध सामग्री, अयोग्य कर्मकांडी और व्यापारिक कथावाचकों का चयन करते हैं, तो दोष व्यवस्था का नहीं, हमारी अपनी पात्रता और विवेकशून्यता का है। वास्तविक धर्म और योग्य गुरु की प्राप्ति तब तक संभव नहीं, जब तक मनुष्य स्वयं को शास्त्रीय मर्यादाओं में ढालने का प्रयास न करे और उसका पुण्य उदित न हो जाये।
F&Q :
FAQ
प्रश्न : हमें धर्म के नाम पर लोग क्यों ठग लेते हैं?
उत्तर : क्योंकि हम स्वयं शास्त्र का अध्ययन नहीं करते और अपनी सुविधा के अनुसार ‘शॉर्टकट’ मार्ग ढूंढते हैं। हमारी अपनी अपात्रता ही ठगों को अवसर देती है। वास्तव में हमें कोई और नहीं ठग रहा है हम स्वयं ही स्वयं को ठग रहे हैं।
प्रश्न : योग्य गुरु कैसे प्राप्त करें?
उत्तर : गुरु को ढूंढने के स्थान पर अपने पुण्यों को बढ़ाएं और तपश्चर्या करें। शास्त्रानुसार, जब शिष्य तैयार होता है, तो गुरु ईश्वरीय विधान से स्वतः मिल जाते हैं।
प्रश्न : क्या बिना दीक्षा (कान फुंकवाए) के पूजा निष्फल है?
उत्तर : शास्त्र विरुद्ध और अशुद्ध मन से की गई पूजा वैसे ही निष्फल है। किसी पाखंडी से केवल कान फुंकवाने से कोई लाभ नहीं होता।
प्रश्न : भक्ति और तपश्चर्या में क्या संबंध है?
उत्तर : भक्ति श्रेष्ठ है, पर वह तपश्चर्या का विकल्प नहीं है और न ही निषेध है। बिना नियम और संयम के भक्ति केवल एक मानसिक भ्रम हो सकती है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी अनुभव और शास्त्रीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, अपितु धार्मिक क्रियाओं में व्याप्त विसंगतियों के प्रति जागरूक करना है। पाठक अपने विवेक, शास्त्रीय विचारों, परंपराओं के अनुसार निर्णय लेने हेतु स्वतंत्र हैं।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








