“शास्त्र सम्मत कर्म ही मनुष्य को दोषों से मुक्त रखते हैं।”
श्राद्ध में भोजन को लेकर प्रश्न भी उठते हैं और उसके सही-गलत उत्तर भी लोग देते रहते है, कुछ कुतर्क भी गढ़ते हैं। हम प्रामाणिक चर्चा करते हैं अर्थात शास्त्रों में लिखा क्या है या बताया क्या गया है ? प्रामाणिक वही है जिसका प्रमाण शास्त्र-पुराणों में हो। इस आलेख में हम श्राद्ध भोज सम्बन्धी एक प्रामाणिक चर्चा करेंगे अर्थात प्रमाण के साथ समझेंगे की श्राद्ध के भोजन में क्या दोष होता है, क्यों नहीं करना चाहिए, कब नहीं करना चाहिये, किसके लिये विशेष रूप से वर्जित है ?
श्राद्ध का भोजन करना चाहिए या नहीं शास्त्र क्या कहता है
सीधी सी बात है यदि हम व्यावहारिक दृष्टिकोण से किसी विषय का विचार करते हैं तो उसका यह भी तात्पर्य होता है कि शास्त्रसिद्ध नहीं है अर्थात प्रामाणिकता का अभाव हो जाता है। और जब हम शास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार करते हैं तो वह प्रामाणिक कहलाता है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से वह विचार करता है जिसके पास शास्त्रीय दृष्टि का अभाव होता है।
किन्तु शास्त्रीय दृष्टियुक्त विद्वान शास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार करते हुये उससे लौकिक व्यवधान का भी आकलन कर लेते हैं क्योंकि शास्त्रीय दृष्टि होने का तात्पर्य व्यावहारिक दृष्टि का अभाव नहीं अपितु व्यावहारिक दृष्टि के औचित्य की सिद्धि-असिद्धि का भी विवेक प्राप्त हो जाना है। अर्थात शास्त्रीय दृष्टि से रहित व्यक्ति बात-बात पर व्यवहार/देशाचार/लोकाचार/बाप-दादा/यद्यपि शुद्धं/महाजनो येन गतः स पन्थाः आदि राग अलापते रहते हैं क्योंकि इसका मूल कारण ही शास्त्रीय दृष्टि का अभाव है।
सबसे पहले तो हमें पृच्छक (प्रश्नकर्ता) को समझना होगा कि पृच्छक कौन है ? श्राद्ध का करना चाहिए या नहीं यह प्रश्न करने वाले 3 प्रकार के व्यक्ति होते हैं ? इसके बाद हमें श्राद्ध भोजन को समझना होगा श्राद्ध भोजन के भी 3 प्रकार होते हैं ? उसके बाद हम इन तीनों के विषय में करना चाहिये या नहीं इस बात को शास्त्र के प्रमाणों सहित समझेंगे।
ध्यातव्य : इस आलेख में श्राद्ध भोज का तात्पर्य मृताह श्राद्ध अर्थात प्रेत श्राद्ध अर्थात द्वादशाह भोज है।
पृच्छक के 3 प्रकार :
- पृच्छक में प्रथम वो आते हैं जो महापात्र हैं – महापात्र का प्रश्न श्राद्धोपरांत श्राद्धकर्म में प्रेत के लिये समंत्र उत्सर्ग किये गये अन्न को भक्षण करने के सम्बन्ध में होता है।
- पृच्छक में द्वितीय वो आते हैं जिनका उपनयन-विवाह आदि संस्कार हुआ हो – मुख्य रूप से जिसका उपनयन और विवाह होता है उसका प्रश्न उठता है कि करना चाहिये या नहीं, और यह प्रश्न कठिन तब होता है जा श्राद्ध अपने ही घर में हो, उसके बाद उत्तर और मुश्किल तो तब होता है जब मृतक माता-पिता की ही मृत्यु हुई हो।
- पृच्छक में तृतीय क्रम पर सामान्य लोग आते हैं जो भोजन करते हैं और कुछ नहीं भी करते हैं – उनका प्रश्न भी भोजन करने और न करने को लेकर होता है लेकिन जो मुख्य प्रश्न होना चाहिये वो नहीं होता है, मुख्य प्रश्न ये होना चाहिये था कि श्राद्ध का भोजन कब नहीं करना चाहिये ?

श्राद्ध भोजन के 3 प्रकार :
- श्राद्ध भोजन का प्रथम या मुख्य प्रकार जो है वह श्राद्ध कर्म में प्रेत या पितर के निमित्त जो भोजन समंत्र उत्सर्ग किया जाता है वह है।
- श्राद्ध भोजन का द्वितीय प्रकार वह है जो भोज के लिये बनाया जाता है और बहुत सारे लोग श्राद्ध के अंत में भोजन करते हैं।
- श्राद्ध भोजन का तृतीय प्रकार वह है जो भोज के निमित्त बना भोजन श्राद्ध के अंत में न करके मध्य में ही किया जाता है अर्थात एक ओर श्राद्ध भी हो रहा होता है और दूसरी और भोज में निमंत्रित अतिथिगण भोजन करने लगते हैं।
पुनः आगे भोक्ता (निमित्त) के अनुसार भी तीन प्रकार हैं उपरोक्त सामान्य प्रकार से भिन्न :
- प्रेत निमित्त भोक्ता (महापात्र) : एकादशाह में भी और द्वादशाह में भी प्रेत के निमित्त ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। यह भोजन महापात्र को कराया जाता है।
- देव निमित्त (पुरोहित वर्ग) : सपिंडीकरण में देवश्राद्ध भी होता है जिसे विश्वेदेव श्राद्ध कहते हैं। इनके निमित्त वही ब्राह्मण भोजन कर सकते हैं जो प्रेत संसर्ग से रहित हों अर्थात सपिंडीकरण से पूर्व कुछ भी ग्रहण न किया हो। यदि सपिंडीकरण से पूर्व वरण आदि ग्रहण करते हैं तो वहां प्रेत संसर्ग दोष उपस्थित होता है और देव निमित्त में अनर्हता उत्पन्न होती है।
- पितर निमित्त (पुरोहित वर्ग) : पितर के निमित्त भी द्वादशाह को भी भोजन कराया जाता है। पितरों का श्राद्ध सपिंडीकरण में होता है और पितरों के निमित्त भी वो ब्राह्मण अग्राह्य हो जाते हैं जिनका प्रेत संसर्ग हो गया हो।
उपरोक्त तीनों प्रश्न परस्पर संबद्ध हैं और अब इनपर शास्त्र प्रमाणों को देखते हुए विचार करेंगे। उपरोक्त तीनों प्रश्न परस्पर संबद्ध हैं और अब इनपर शास्त्र प्रमाणों को देखते हुए विचार करेंगे जिसके बाद श्राद्ध भोजन से सम्बंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का सही उत्तर सरलता से प्राप्त हो जायेगा और भ्रम का निवारण हो जायेगा। वर्त्तमान समय में यह आलेख बहुत उपयोगी सिद्ध होगा क्योंकि इस प्रकार विस्तृत चर्चा प्रमाणों सहित कहीं भी उपलब्ध नहीं है और न ही मौखिक रूप से भी किया जाता है।
सुगम श्राद्ध विधि पुस्तक की बात करें अथवा यहां जो विधि दी गयी है वो पूर्वकालिक व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है। श्राद्ध कर्म में बहुशः विकृतियां व्याप्त हो गयी है जिसका दुष्परिणाम यह है कि सभी पितृदोष के भाजन बन रहे हैं, पितृकोप से पीड़ित हैं। पूर्वाचार्य भी समय-समय पर संशोधन-परिष्करण करते रहे हैं और जो विकृतियां वर्त्तमान में हैं उसे संशोधित करने हेतु पूर्वाचार्य नहीं आने वाले ये वर्त्तमान में जो उपस्थित हों उन्हीं का दायित्व होता है।
किसी भी काल में उपस्थित सभी विद्वद्जन एक ही कार्य नहीं करते अपितु यह सौभाग्य कुछ कृपाप्राप्त को ही मिलता है। कृपाप्राप्त को ही दायित्व प्रदान किया जाता है और वर्त्तमान काल में यह दायित्व मैंने (मिथिला हेतु) ग्रहण किया है, मैथिलेत्तरों हेतु तो मिथिला के शिष्टविद्वद्जनों का व्यवहार ही निर्णय कहा गया है। अस्तु हमने श्राद्धकर्म को संशोधित करने का दायित्व ग्रहण किया। जो संशोधित अपात्रक श्राद्ध विधि का प्रयोग करना चाहें उनके लिये नीचे लिंक संलग्न है :
भोज और भोजन दोष
विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर। नैते निर्माल्यताम क्रियमाणाः पुनः पुनः॥ गरुडपुराण – में कहा गया है कि ब्राह्मण, मंत्र, कुशा, अग्नि और तुलसी ये निर्माल्य नहीं होते और बार-बार उपयोग में लाये जा सकते हैं। लेकिन फिर सबका अपवाद भी बताया गया है।
दर्भाः पिण्डेषु निर्माल्या ब्राह्मणाः प्रेत भोजने। मंत्रागौस्तुलसी नीचैः चितायां च हुताशने ॥ अर्थात पिण्ड में प्रयुक्त कुशा, प्रेत-भोजन करने से ब्राह्मण, नीच गृह में मंत्र, गाय और तुलसी एवं चिता में अग्नि निर्माल्य हो जाती है अर्थात दूषित हो जाते हैं।
प्रेत भोजन करने पर निर्माल्य न होने वाले ब्राह्मण भी दूषित हो जाते हैं अर्थात प्रेत-भोजन करने में विशेष दोष है। कुछ लोग इसका भी अनर्थ लगा लेते हैं और श्राद्ध संपन्न होने के बाद भी भोज के अन्न को प्रेत-भोजन ही समझते हैं। जबकि श्राद्ध संपन्न होने के बाद मृतक प्रेत नहीं रहता, श्राद्ध संपन्न होने के बाद प्रेतत्व की निवृत्ति हो जाती है। जब प्रेतत्व ही समाप्त हो जाये उसके बाद प्रेत-भोजन कैसे हो सकता है ?
इस प्रकार कुछ तथ्य स्पष्ट होते हैं जो बिन्दुबार समझा जा सकता है :
- श्राद्ध संपन्न हो जाने के बाद जो भोज होता है वह प्रेत-भोज नहीं होता है, अर्थात द्वादशाह को सपिंडीकरण से अथवा सपिंडीकरण के पश्चात् पुरोहित वर्ग का भोजन।
- अर्थात श्राद्ध संपन्न होने से पूर्व होने वाला भोज प्रेत-भोज ही होता है। महापात्र को कराये जाने भोजनादि प्रेत के निमित्त होता है और यही प्रेत संसर्ग है जिसके कारण महापात्र देव और मांगलिक कर्म की अर्हता नहीं रखते।
- प्रेत के लिये ब्राह्मण और स्वजातीय भोज का विशेष महत्व भी शास्त्रों में बताया गया है।
- स्वजातीय (भइयारी) भोज तो अशौच में करने के लिये कहा गया है।
उपरोक्त बिंदुओं के अतिरिक्त जो प्रथम प्रश्न का विषय है वह महापात्र से सम्बंधित है और श्राद्ध में समंत्र उत्सर्ग किये गए भोजन के संबंध में है। प्रेत-भोजन का मुख्य दोष उसी अन्न में है जो श्राद्ध करते समय समंत्र उत्सर्ग किया जाता है और इसी कारण महापात्र उस अन्न का भक्षण करना नहीं चाहते किन्तु यजमान भक्षण करने के लिये आग्रह करते हैं। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि अन्य विधि से किये गए भोजन में दोष नहीं होगा, केवल उत्सर्जित प्रेतान्न में ही दोष है ऐसा नहीं समझना चाहिये।

महापात्र का पक्ष होता है कि अपात्रक श्राद्ध होने से इसकी अपेक्षा नहीं रहती। यजमान का पक्ष रहता है कि यह पुराने समय से चलती आ रही परंपरा है जिसका पालन करना आवश्यक है अन्यथा प्रेत की तृप्ति कैसे होगी ?
वास्तव में जब तक सपात्रक श्राद्ध होता रहा तब तक प्रत्यक्ष वह भोजन महापात्र करते रहे और श्राद्ध के समय में ही, श्राद्ध के पश्चात् नहीं। लेकिन जब अपात्रक श्राद्ध का आरम्भ हुआ तो व्यावहारिक रूप से (मौखिक) निर्णय हुआ कि श्राद्ध संपन्न होने के बाद प्रेत के निमित्त उत्सर्ग किये गये अन्न का किञ्चित भाग महापात्र भक्षण करेंगे जो वर्त्तमान में भी पाया जाता है।
अब आगे यह स्पष्ट होता है कि जो महापात्र उस किञ्चित प्रेतान्न (उत्सर्जित) का भक्षण नहीं करना चाहते उन्हें श्राद्ध का दान-आदि भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। यदि श्राद्ध का दानादि ग्रहण करते हैं तो उस प्रेतान्न (उत्सर्जित) का किञ्चित भक्षण भी करें। भक्षण करने से जो दोष है उसके निवृति का भी उपाय शास्त्रों में वर्णित है और दोष निवृत्ति का उपाय करें न कि भक्षण से निवृत्त हों।
यहां एक विशेष तथ्य यह भी है कि जो (किंचित) अन्न उत्सर्ग किया गया होता है वह अपात्रक श्राद्ध में किया गया और वह महापात्र को भक्षण करना अनिवार्य नहीं है। क्योंकि यदि भक्षण करे ही तो फिर अपात्रक होने का औचित्य ही समाप्त हो जायेगा अर्थात सपात्रक ही होना चाहिये। किन्तु महापात्र को भी यह नहीं समझना चाहिये कि जो दोष है वह मात्र उस अन्न में ही है, अन्य भोजन में नहीं।
इसके बाद अगले प्रश्न में वो लोग आते हैं जिनका उपनयन-विवाह आदि हुआ हो और गर्भिणीपति अर्थात जिसकी पत्नी गर्भवती हो। ऐसे लोगों के लिये 1 वर्ष पर्यन्त श्राद्ध भोजन मात्र ही नहीं प्रेत-कर्म भी निषिद्ध है।
- विवाहव्रतबंधोर्ध्वं वर्षमब्दार्थमेव वा । पिण्डान्सपिण्डान् नो दद्यु र्न कुर्युस्तिलतर्पणम् ॥ पूर्वकालामृत – में कहा गया है कि विवाह और उपनयन के वर्ष अथवा अर्द्धवर्ष पर्यन्त सपिण्डों को पिंड न दे, तिल से तर्पण न करे।
- मुंडनंपिंडदानंचप्रेतकर्मच सर्वशः । नजीवत्पितृकः कुर्याद्भुर्विणीपतिरेवच ॥ हेमाद्रि में कहा गया है कि जीवित्पितृक और गर्भिणीपति – मुंडन, पिण्डदान और प्रेत कर्म न करे।
- पुनः आश्वालयन का कथन है – वपनं मैथुनं तीर्थं वर्ज्जयेद्गर्भिणीपतिः । श्राद्धं च सप्तमान्मासादूर्ध्वं चान्यत्र वेदवित् ॥ अर्थात क्षौर कर्म, मैथुन और तीर्थयात्रा गर्भिणीपति न करे। सप्तम मास के बाद श्राद्ध न करे।
- पुनः गालव की उक्ति है :- दहनं वपनं चैव चौलं वै गिरिरोहणं । नावारोहणं चैव वर्जयेद्गर्भिणीपतिः ॥ – गालव ने दाह, क्षौर, चौल (मुंडन), पर्वतारोहण, नाव पर चढ़ना वर्जित कहा है। उपरोक्त प्रमाणों में पिण्ड-श्राद्ध-दाहादि निषेध का तात्पर्य श्राद्ध भोजन भी लेना चाहिये।
- निर्णय सिंधु में यह वचन ज्योतिष का बताया गया है – स्नानंसचैलं तिलमिश्रकर्म प्रेतानुयानं कलशप्रदानम् ॥ अपूर्वतीर्थामरदर्शनंच विवर्जयेन्मंगलतोब्दमेकम् ॥ – विवाहादि मङ्गल कार्य के वर्षमध्य में सचैल स्नान, तिलमिश्रित कार्य (तिलाञ्जलि आदि), श्मशान यात्रा, घटदान, अपूर्वतीर्थ व देवदर्शन आदि न करे।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मङ्गलकार्यों के बाद और गर्भिणी पति के लिये क्षौर, श्राद्ध भोजन, पिण्डदान आदि कई क्रियायें निषिद्ध हैं, किन्तु हम यहां श्राद्ध भोजन मात्र की चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही व्रत-यज्ञ-अनुष्ठान आदि में स्थित व्यक्ति श्राद्ध भोजन न करे। व्रत में निषेध का तात्पर्य व्रत के पूर्व दिन और पर दिन समझे। अर्थात यदि एकादशी व्रत करे तो दशमी और द्वादशी के दिन श्राद्ध भोजन न करे।
अब इस निषेध के संबंध में एक अन्य प्रश्न भी उत्पन्न होता है वह ये कि यदि माता-पिता की ही मृत्यु हो जाये तब क्या करे ? उपरोक्त निषेध का पालन करे या श्राद्ध करे, भोजन करे या न करे ? इसका उत्तर हमें इस प्रकार उत्तर कालामृत में प्राप्त होता है – महालये गयाश्राद्ध मातापित्रोः क्षयेऽहनि । कृतोद्वाहोऽपि कुर्वीत पिंडदानं यथाविधि ॥ अर्थात जिसके पिता मृत हों भले ही उसका विवाहादि मङ्गलकार्य क्यों न हुआ हो महालय, गया जाने पर गया श्राद्ध, क्षयाह (वार्षिक श्राद्ध) विधिपूर्वक अवश्य करे।
इसके सम्बन्ध में और भी बहुत सारे प्रमाण हैं, जो निर्णय सिंधु आदि ग्रंथों में सरलता से मिलते हैं। यहां स्पष्ट यह होता है कि जब महालय, क्षयाह आदि की अनिवार्यता होती है तो मृताह में पुत्र के लिये किसी प्रकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं हो सकता।
अब तीसरे प्रकार अर्थात निमंत्रित मित्रादि अतिथियों के श्राद्ध भोजन संबंधी चर्चा करेंगे। यह तो पूर्व ही स्पष्ट हो गया है कि किस-किस के लिये श्राद्ध भोज का निषेध है। जिसके लिये निषिद्ध है उसके अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के लिये श्राद्ध भोज का निषेध नहीं है, यद्यपि दोष की निवृत्ति भी नहीं है।
लेकिन बात जब दोष की हो रही है तो पहले श्राद्धभोज और प्रेतभोज का अंतर भी समझना आवश्यक है, चर्चा ऊपर भी की जा चुकी है किन्तु पुनः स्पष्ट कर दें कि श्राद्ध संपन्न हो जाने के बाद जो भोज होता है वह श्राद्ध भोज होता है, किन्तु श्राद्ध संपन्न होने से पहले जो भोज होता रहता है वह प्रेत भोज होता है।
सपिंडीकरण से पूर्व जो भोजन कराया जाता है उसमें एक मात्र प्रेत ही निमित्त होता है। सपिंडीकरण के पश्चात् जो ब्राह्मण भोजन कराया जाता है उसमें प्रेत, देव और पितर तीनों ही निमित्त होते हैं। ब्राह्मण भोजन के अनन्तर दौहित्रादि का भी महत्व होता है। स्वजातीय और मित्रवर्गों का भोज मुख्य भाग नहीं है। यदि गंभीरता से विचार करें तो श्राद्ध भोज में मित्र और शत्रु दोनों का निषेध ही किया गया है।
प्रश्न श्राद्ध भोज का है और व्यवहार में तो यह देखा जा रहा है कि लोग प्रेत भोज करने के लिये भी व्यग्र रहते हैं, 2 बजे दिन ही पहुंच कर भोजन कर लेते हैं और रात में पुनर्भोजन का दूसरा दोष दोष भी निश्चित प्राप्त करते होंगे। जहां दिन के २ – ३ बजे ही सपिंडीकरण से पूर्व आमंत्रित मित्रादि भोजन ग्रहण करने लगते हैं निःसंदेह प्रेत संसर्ग दोष को प्राप्त करते हैं।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है मित्रादि जनों श्राद्ध भोजन कब ग्राह्य होगा ? जब श्राद्ध संपन्न हो जाये अर्थात प्रेतत्व विमुक्ति सुनिश्चित हो जाये और कलश पूजन आदि करके ब्राह्मण भोजन हो जाये तत्पश्चात ही वह घर-भूमि-अन्न आदि निर्मलता की प्राप्ति कर सकता है और निर्मलता प्राप्ति के बाद ही ग्राह्य हो सकता है उससे पूर्व नहीं।
ब्राह्मण से भिन्न जो कोई भी हो चाहे दौहित्रादि वर्ग अथवा साधु-महात्मा (महंथ आदि) का वर्ग ब्राह्मण भोजन से पूर्व अथवा ब्राह्मण के साथ भी किसी का भोजन नहीं हो सकता यदि करता है तो दोषी है। कई स्थानों पर ऐसा देखा जाता है कि पुरोहित वर्ग के साथ दौहित्रादि, कर्त्ता, कुछ साधु-महंत आदि को भी भोजन कराया जाता है एवं साथ में नापित-मालाकार आदि को भी।
यह एक सामान्य व्यवहार से बन गया है किन्तु जो शास्त्रनिष्ठ हो उसे ध्यान रखना आवश्यक होता है कि ब्राहण के साथ आमंत्रित ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य कोई भी भोजन नहीं कर सकता। अन्य का तात्पर्य कर्त्ता, दौहित्र, साधु-महंत, नापित-मालाकार आदि सभी है। सामान्यतः पुरोहितों को भोजन कराते समय इनमें से जो भी उपस्थित होता है सबको एक साथ ही भोजन कराया जाता है और यह शास्त्रविरुद्ध है।
श्राद्ध का भोजन करना चाहिये या नहीं में एक और विषय जो व्यवहार से दिखता है वो यह है कि द्वादशाह के दिन श्राद्ध के उपरांत भोज सामग्री में तुलसी-दल देकर भगवान विष्णु को अर्पित कर दिया जाता है जिस कारण वह प्रसाद सिद्ध हो जाता है और श्राद्धान्न संबंधी दोष का अभाव हो जाता है। हां एकादशाह के दिन ऐसा नहीं होता इसलिये वह श्राद्धान्न सिद्ध नहीं होता। वैसे एक तथ्य यह भी है कि श्राद्ध में तुलसी का निषेध होता है और श्राद्ध संपन्न होने के उपरांत तुलसी दल का प्रयोग किया जाता है। विद्वानों को इस विषय में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

यावद्विप्रा न पूज्यन्ते अन्नदानहिरण्ययोः । तावच्चीर्णव्रतस्यापि तत्पापं न प्रणस्यति ॥ – अङ्गिरा स्मृति : जब तक अन्नदान-हिरण्य आदि से ब्राह्मण पूजा न हो जाये तब तक न तो किया गया व्रतादि पूर्ण होता है और न ही पाप नष्ट होता है।
अर्थात जिन लोगों के लिये श्राद्ध भोज निषेध किया गया है उनके अतिरिक्त अन्य सभी श्राद्ध का भोजन कर सकते हैं। श्राद्ध भोज का तात्पर्य बताया जा चुका है, प्रेत भोज निषिद्ध होता है।
इसके अतिरिक्त एक अन्य विषय विचारणीय होता है कि अन्न का गुण-संसर्ग आदि। लेकिन इसका विचार तो कोई करना ही नहीं चाहता और अप्रत्याशित बढते अपराध-अनाचार-अनीति-अधर्म का एक महत्वपूर्ण कारण दूषित अन्न भक्षण भी है। दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते । यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा ॥ – चाणक्य नीति, किन्तु इस विषय में विस्तृत चर्चा करना इस आलेख के अनुकूल नहीं है। यह विषय स्वतंत्र आलेख की मांग करता है।
देव-पितर ब्राह्मणों का भोज
अब श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन से संबंधित एक अन्य विषय भी आता है और वो है एकादशाह के दिन पुरोहित वर्ग के ब्राह्मणों का भोज अर्थात देव-पितर ब्राह्मणों का भोज। यहीं पर ध्यातव्य है कि प्रेतभोजी होने का दोष ही महापात्र को देव-पितृ में अनर्ह करता है। यदि पुरोहित वर्ग भी प्रेतभोजी हो जायें तो क्या वो देव-पितृ में अनर्ह नहीं होंगे ? इसके अन्तर्गत दो प्रकार से विचार होगा एक तो पुरोहित का एकादशाह के दिन भोजन और द्वितीय अन्य कर्मकांडी-वैदिक-पुराणादि पाठक देव-पितृ भोजी ब्राह्मण का भोजन। इसमें भोजन के साथ ही वरण-दान की चर्चा भी समाहित हो जाती है।
- कई स्थानों पर एकादशाह को पुरोहित का वरण, प्रांगण में दान और भोजन सब कुछ होता तो कुछ स्थानों पर भोजन के अतिरिक्त।
- इसी प्रकार कई ऐसे स्थान भी हैं जहां पुरोहित का वरण तो एकादशाह को होता है किन्तु दान-भोजन आदि द्वादशाह को, इनमें से कुछ स्थानों पर सबकुछ द्वादशाह को ही होता है अर्थात एकादशाह को कुछ भी नहीं।
- कुछ स्थानों पर द्वादशाह को भी न होकर त्रयोदशाह को होता है।
यदि शास्त्रदृष्टि रहित व्यक्ति से प्रश्न करेंगे तो सीधा और सरल उत्तर प्राप्त होगा जहां जो व्यवहार है उचित है, सही है। अर्थात कोई भी न तो अनुचित है और न ही उचित है अथवा तीनों ही उचित है या अनुचित है। मतलब कुछ ज्ञात ही नहीं बस ये नहीं कह सकते कि मुझे ज्ञात नहीं इसलिये कुछ भी तो कहना ही होगा और कहेंगे ही। इसीलिये अशास्त्रज्ञ को निर्णय हेतु अयोग्य कहा गया है कि वह निर्णय दे ही न।
इन लोगों के अनुसार तो जो ३ – ४ दिन में ही हवन आदि करके सब कुछ संपन्न कर लेते हैं वो भी उचित ही होगा क्योंकि ये तो उसको भी अनुचित, अशास्त्रीय सिद्ध ही नहीं कर सकते यदि शास्त्रदृष्टि से रहित हैं तो अनुचित भी नहीं कह सकते और अनुचित नहीं कह सकते तो मौन भी नहीं रहेंगे, कुछ न कुछ कहेंगे और कहेंगे तो यही कहेंगे कि जहां जो होता है सब सही है।
अरे बैलों तुम्हारा ऐसा वक्तव्य ही सिद्ध करता है कि तुम शास्त्रदृष्टिरहित हो किन्तु बोलना बंद नहीं करोगे, इससे अच्छा यह होता कि मैं नहीं जानता ऐसा कह देते, उस अवस्था में दुत्कार नहीं होगा, किन्तु यदि बिना जाने कुछ भी बकोगे तो दुत्कार के पात्र बनोगे। इन गंवारों को दुत्कारा इसलिये जाता है कि ये अन्य भाषा में समझ ही नहीं सकते। इनका यदि उपकार भी करना है तो दुत्कारपूर्वक ही किया जा सकता है। ये बात व्यावहारिक रूप से कई गंवारों से बात करने पर अनुभवसिद्ध है। आओ बैलों, समझो कि शास्त्रीय दृष्टिकोण से कैसे विचार किया जाता है :
- सम्पूर्ण प्रेतकर्म में जो सम्मिलित होता है अर्थात प्रेत निमित्त कुछ भी ग्रहण करता है वह देव-पितृ में अनर्ह हो जाता है।
- भोजन में सर्वाधिक दोष है किन्तु ये मत समझो कि वरण-प्रतिग्रह आदि में दोष नहीं है।
- इसी दोष के कारण अर्थात प्रेत निमित्त वशात् महापात्र देव-पितृ कर्म में अनर्ह हो जाते हैं। अन्य कोई कारण नहीं है।
यदि पुरोहित भी इस दोष से दूषित हो जाये तो देव-पितृ कर्म में अनर्ह ही हो जायेगा और ये तथ्य यजमानों को भी समझना चाहिये देव-पितृ कर्म हेतु जिनका चयन किया जाय उनको सपिण्डी पूर्व वरण-भोजन-दान आदि कुछ भी नहीं दिया जायेगा और पुरोहित वर्ग को भी समझना चाहिये कि सपिंडीकरण से पूर्व कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकते क्योंकि देव-पितृ श्राद्ध सपिंडीकरण में ही होता है, उससे पूर्व के श्राद्धों का निमित्त प्रेत मात्र ही होता है।
अर्थात यहां पर यह सिद्ध होता है कि सपिंडीकरण से पूर्व पुरोहित वर्ग का किसी कर्म में कोई अधिकार नहीं होता क्योंकि सम्पूर्ण रूप से उपरोक्त सभी प्रेत कर्म है। इसमें एक कर्म जो कि गरुडपुराण कथा है उसकी छूट पुरोहित वर्ग को है इसके अतिरिक्त अन्य किसी कर्म की नहीं। किन्तु गरुडपुराण के निमित्त भी सपिंडीकरण से पूर्व कुछ ग्रहण नहीं किया जा सकता।
- भोजन क्यों नहीं : सर्वाधिक निषिद्ध भोजन ही तो है।
- वरण क्यों नहीं : वरण होने का तात्पर्य भोजन की बाध्यता भी है, जिस ब्राह्मण का वरण किया जायेगा वो भोजन नहीं करूंगा ऐसा कह ही नहीं सकता उसे भोजन करना होगा और यदि न करे तो दोषी होगा।
- दान क्यों नहीं : यदि वरण-भोजन ही नहीं होगा तो दान कैसे होगा अर्थात प्रतिग्रह कैसे करेंगे उससे पूर्व तो वरण अनिवार्य है।
- प्रेत तो सपिंडीकरण में भी होता है तो उसमें दोष क्यों नहीं होगा : हाँ सपिण्डीकरण में भी प्रेत होता है किन्तु वहां भी प्रेत के निमित्त महापात्र ही होंगे, पुरोहित नहीं। सपिंडीकरण में देव और पितरों का भी श्राद्ध होता है एवं वहां पुरोहित ही होंगे महापात्र नहीं। इसका व्यावहारिक प्रमाण सरलता से समझ आ जायेगा : देव-पितृ श्राद्ध की दक्षिणा महापात्र का नहीं होता है वो पुरोहित का होता है।
पंचदेवता व विष्णु पूजा भी तो देवकर्म है फिर पुरोहित क्यों नहीं होगा : अरे वो नित्यकर्म है उसमें किसी ब्राह्मण की कहीं कोई आवश्यकता ही नहीं है। संध्या-तर्पण-पंचदेवता/विष्णु पूजन में ऐसी किसी सामग्री की आवश्यकता भी नहीं है जो ब्राह्मण को दिया जाय, यह नित्यकर्म है और प्रतिदिन करना चाहिये। एवं इसमें यदि कुछ नैवेद्यादि अर्पित हुआ भी तो महापात्र अनधिकारी है यह कैसे सिद्ध हो गया ?
श्राद्ध में एकादशाह के अनेकों दान में शालिग्राम की पूजा करके, कांचनपुरुष की पूजा करके वो भी तो महापात्र को दान दिया जायेगा, वो इस विषय में अनधिकारी कैसे हो गया ? यदि इस प्रकार से विचार करोगे तब तो महापात्र पूजन-सामग्री का दान भी न ले पाये वो भी पुरोहित का ही हो जाये। अब इन तथ्यों के प्रमाणों का अवलोकन किया जाय :
निमन्त्रितान्हि पितर उपतिष्ठन्ति तान्द्विजान्। वायुभूतानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते॥
मत्स्यपुराण/१६/१८
निमंत्रित विप्र में ही पितर वायुरूप से विराजमान हो जाते हैं वह ब्राह्मण फिर अन्यत्र (अन्य यजमान के यहां) भोजनादि सभी कर्मों के लिये अनर्ह होता है। जिसके पितर वायुरूप से विराजमान होते हैं वहीं भोजन करने के लिये शास्त्र से ब्राह्मण बाध्य होता है।
आमंत्रितस्तु यो विप्रो भोक्तुमन्यत्रगच्छति। नरकाणां शतं गत्वा चाण्डालेष्वभिजायते॥
पूर्वनिमन्त्रितोऽन्येन कुर्यादन्य प्रतिग्रहं। भुक्ताहारोथवाभुंक्ते सुसंस्कृतस्य नश्यति॥
निमंत्रित ब्राह्मण अन्यत्र भोजन भी नहीं कर सकता, प्रतिग्रह अर्थात दानादि भी नहीं ले सकता यदि लेता है तो सुसंस्कृत होने पर भी नष्ट हो जाता है अर्थात अनर्ह हो जाता है। पुरोहित को तो अन्यत्र भी जाना ही होता है किसी के विवाह में तो किसी के पूजा में और वरण ग्रहण करके नहीं जा सकता। इस कारण एकादशाह को पुरोहित का वरण ही नहीं होगा क्योंकि अनावश्यक है और विघ्न उत्पन्न होता है।
पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्। श्राद्धकृच्छ्रादभुक्चैव सर्वमेतद्विवर्जयेत्॥
स्वाध्यायं कलहं चैव दिवा स्वप्नञ्च सर्वदा। अनेन विधिना श्राद्धं निरद्वस्येह निर्वपेत्॥
मत्स्यपुराण/१६/५६, पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्म)/९/११८ – ११९
पुनर्भोजनमध्वानं भाराध्ययनमैथुनम् । दानं प्रतिग्रहं होमं श्राद्धं भुक्त्वाष्ट वर्जयेत् ॥
श्राद्धार्थं वरणं कृत्वा न प्रयच्छति यः पुमान्। तस्मै प्रार्थयते सोऽयं रोरवं नरकं व्रजेत् ॥
प्रणीत श्राद्ध तन्त्रो यो न भुङ्क्ते श्राद्धकर्मणि। सोऽयं नरकमाप्नोति कुंभीपाकं न संशयः ॥
कामिकागम/उत्तरभाग/५४ – ५७
इन प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि श्राद्धकर्त्ता और भोक्ता दोनों के लिये बहुत से निषेध हैं और निमंत्रित ब्राह्मण हेतु भी बहुत सारे नियम हैं फिर जो वरण ग्रहण कर ले उसके लिये तो कहना ही क्या ? इन सारे विषयों को अब उन पंडित वर्ग के संबंध में भी समझना अपेक्षित है जो पुरोहितवर्ग से होते हुये भी श्राद्ध में एकादशाह के दिन वरण ग्रहण करते हैं (कर्मकांड/वेद/भागवत पाठ आदि का) किन्तु वरण लेकर भोजन को अस्वीकार करते हैं अथवा करते हैं और अन्यत्र भी पूजा-गृहप्रवेश-विवाहादि में सम्मिलित होते हैं। यहां जो प्रमुख तथ्य स्पष्ट हुये वो इस प्रकार हैं :
- एकादशाह के दिन अथवा द्वादशाह को भी सपिण्डी से पूर्व मासिक में प्रेत कर्म का ही वरण हो सकता है, जो भी इसमें सम्मिलित होता है वह दोष प्राप्त करता है एवं अन्यान्य कर्मों में अनर्ह हो जाता है। श्राद्ध के पश्चात अगले दिन पुनः यथाविधि अर्ह हो सकता है। इसी कारण महापात्र केवल प्रेतकर्म में ही सम्मिलित होते हैं अन्य किसी भी कर्म में अर्ह नहीं।
- वेद सूक्तादि पाठ सम्पूर्ण कार्य यजमान का ही है यदि पाठ में सक्षम नहीं तो श्रवण हेतु ब्राह्मण से पाठ करा सकता है। यहां भी प्रेतकर्म में केवल महापात्र ही वरण ग्रहण कर सकते हैं चाहे कर्मकांड हो, वेद हो, भागवत हो, गीता हो या और कुछ।
- अभाव में यदि पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण कर्मकांड/पाठ आदि करने जाते हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि कर्मलोप न हो, न कि दोष ग्रहण करने।
- आमंत्रित ब्राह्मण भोजन को अस्वीकार भी नहीं कर सकता और आमंत्रित के अनर्ह होने पर भी यजमान भोजन कराने हेतु बाध्य है।
- इस प्रकार यदि कर्मलोप न हो इस उद्देश्य से पुरोहित वर्ग यदि श्राद्ध में उपस्थित होते हैं तो वो वरण भी नहीं ले सकते एवं भोजन को तो पूर्व ही अस्वीकार करना होगा, यदि पूर्व में अस्वीकार न किये हों तो वरण लेकर अथवा बिना लिये भी भोजन देने पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
- अर्थात यह भी स्पष्ट होता है कि जब यजमान पुरोहित वर्ग को श्राद्ध में किसी भी कार्य के लिये आमंत्रित करता है तो उसी समय वरण-भोजन रहित उपस्थिति को स्पष्ट कर दे स्पष्ट है कह दे कि उपस्थिति मात्र होगी एकादशाह को कुछ भी ग्रहण नहीं किया जायेगा न ही भोजन किया जायेगा।
अब बकवास करने वालों का कहना होगा कि कर्मकांड कराने या वेदादि पाठ का आमंत्रण मिलने पर निमंत्रण कहां प्राप्त होता है कि भोजन करना अनिवार्य हो जाता है जिसको आमंत्रण में ही मना करना आवश्यक है। तो उन बकवास करने वालों को उन्हीं की शैली में समझाना आवश्यक है :
- यदि तुम्हें एकादशाह का निमन्त्रण नहीं मिला तो क्या द्वादशाह का निमंत्रण मिला था ?
- द्वादशाह को ही तुम जो भोजन करते हो क्या अनिमंत्रित होते हुये भोजन करते हो ?
- क्या सत्यनारायण पूजा, रुद्राभिषेक व अन्यान्य सभी पूजा-अनुष्ठानों में तुम्हें यजमान निमंत्रण देता है ?
- यदि निमंत्रण नहीं देता तो क्या भोजन नहीं करते हो ?
- यदि बिना निमंत्रण के भोजन करते हो तो अनिमंत्रित भोजन करना सिद्ध होगा अथवा नहीं ?
अब ध्यान से समझो यजमान किसी भी कर्म में तुम्हें आमंत्रित मात्र ही करता है तो वहां निमंत्रण सहित आमंत्रण है अर्थात भोजन अकथित होने पर भी सर्वाधिक अनिवार्य भाग है। जिसके यहां उपस्थित होते हो यदि विघ्नादिवश कोई कर्म न हो सके, संकल्प के उपरांत भी विघ्न हो जाये और करना संभव न हो तो भी ब्राह्मण भोजन से सबकी पूर्ति हो जायेगी। किन्तु सबकुछ करके भी यदि ब्राह्मण भोजन न हो तो उसको पूर्ण नहीं माना जायेगा। ब्राह्मण भोजन भी प्रत्येक कर्म का अनिवार्य और सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। प्रमाण चाहिये न कि कर्मकांड में कर्मकांड अधिक महत्वपूर्ण होता है अथवा ब्राह्मण भोजन तो लीजिये :
यदि भारसहस्रं तु गुग्गुल्वादि प्रधूपयेत्। करोति चेन्नमस्कारमुपहारं च कारयेत्॥
स्तौति यः स्तुतिभिर्मां च ऋग्यजुस्सामभिः सदा। न तोषयति चेद्विप्रान्नाहं तुष्यामि भारत॥
ब्राह्मणे पूजिते नित्यं पूजितोस्मि न संशयः। आक्रुष्टे चाहमाक्रुष्टो भवामि भरतर्षभ॥
परा मयि गतिस्तेषां पूजयन्ति द्विजं हि ये। यदहं द्विजरूपेण वसामि वसुधातले॥
महाभारत/आश्वमेधिकपर्व (१४)/९९/३८ – ४१
श्राद्ध में तो ब्राह्मण भोजन ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, यदि पिण्डदान न हो सके तो भी ब्राह्मण भोजन अवश्यमेव कराये।
अब उनके प्रति विनम्र निवेदन अपेक्षित है; जो भले ही शास्त्रज्ञ न हों किन्तु शास्त्रदस्यु भी नहीं हैं, तथापि शास्त्रनिष्ठ हैं अर्थात शास्त्रसिद्ध विषयों में कुतर्क करके अस्वीकार नहीं करते वरन स्वीकार करते हैं : सभी शास्त्रनिष्ठ ब्राह्मण पूज्य हैं भले ही शास्त्रज्ञान अल्प भी हो, आपको निवेदन पूर्वक ही कहा जायेगा कि प्रेतकर्म में केवल और केवल महापात्र अधिकृत होते हैं और जो भी प्रेतकर्म में संलिप्त होता है वह अन्यान्य कर्मों में अनर्ह होता है विहित प्रायश्चित्त पर्यन्त।
अस्तु अभाववश यदि आप लोग श्राद्ध में कर्मकांड-वेद आदि के लिये उपस्थित नहीं होंगे तो कर्मलोप होगा। यदि कर्मलोप न हो इस उद्देश्य से उपस्थित होने का तात्पर्य यह नहीं कि उसका दोष ग्रहण करें यदि अनधिकृत होकर भी कर्मलोप न हो इस उद्देश्य से उपस्थित होते हैं तो दोष से बचने का मार्ग है कि सर्वप्रथम जिस समय आमंत्रण मिले उसी समय एकादशाह को वरण-भोजन आदि का निषेध कर दें और सपिंडीकरण के काल में विहित है वहां ग्रहण करें।
जो शास्त्रनिष्ठ नहीं होते उसका लक्षण भी स्पष्ट कर देता हूँ। मैं एक पांडित्य का अहंकारी व्यक्ति (कर्त्ता) के यहां श्राद्ध में गया, वरण-भोजन (एकादशाह) का निषेध कर दिया और एकादशाह के दिन उपस्थित १५ – २० अपण्डितों में से अथवा पांडित्य का अहंकारी कर्त्ता ने भी यह प्रश्न नहीं किया कि ऐसा क्यों ? अपितु वरण ग्रहण हेतु चर्चा प्रयास किया गया। शेष सबने ग्रहण किया (मेरे एक संगी को भी छोड़कर) किन्तु भोजन नहीं किया, एक दोष यहां आ गया कि निमंत्रित ब्राह्मण ने भोजन नहीं किया, क्योंकि वरण के साथ तो भोजन बाध्यकारी हो जाता है।
दूसरी बात अगले दिन भले ही किसी ने भोजन नहीं किया किन्तु दोगुना गर्हित हो गए क्योंकि यहां प्रेतकर्म का दोष तो उपस्थित था ही साथ ही भोजन त्याग का भी दोष उपस्थित हो गया। यदि भोजन कर ले तो (सामान्य) प्रायश्चित्त से निवारण संभव है, किन्तु न करे तो गंभीर समस्या है। सबके सब देव-पितृ निमित्त भोजन में अनधिकृत हो गये यह तो सिद्ध होता ही है किन्तु पांडित्य का अहंकार रखने वाले कर्त्ता ने एक ब्राह्मण के साथ ही बकवाद किया और इसके कारण मैं द्वादशाह को गया भी नहीं।
अब द्वादशाह को उसके श्राद्ध में देव-पितृ निमित्त कोई ब्राह्मण उपस्थित तक नहीं था किन्तु उस अहंकारी अपण्डित को इतना भी विवेक नहीं कि कितना बड़ा अपराध कर बैठा। प्रेतकर्म से दूषित अनर्हों ने ही देव-पितृ निमित्त भी भोजन किया होगा। ऐसे ही अपण्डितों को जो पांडित्य का अहंकार भी पाल लेते हैं शास्त्रदस्यु कहकर धिक्कारा जाता है, दुत्कारा जाता है।
विद्वद्जनों से आग्रह है कि वो मेरे इस व्यवहार से स्वयं को कदापि सम्बद्ध न करें, मेरा उद्देश्य उनका भी सुधार करना है किन्तु वो है कि धिक्कार-दुत्कार के बिना सुनेगा ही नहीं।
श्राद्ध कर्म और विधि से सम्बंधित महत्वपूर्ण आलेख जो श्राद्ध सीखने हेतु उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं :
निष्कर्ष (Conclusion)
“सत्य और शास्त्र के मार्ग पर चलने वाला कभी भ्रमित नहीं होता।”
शास्त्रों के अनुसार विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि श्राद्ध में भोजन करना निषिद्ध तो है किन्तु यदि ब्राह्मण भोजन न करे तो श्राद्ध होगा कैसे ? अस्तु ब्राह्मण ही भोजन करेंगे किन्तु भोजनोपरांत दोष निवारण भी आवश्यक होता है। प्रेतकर्म में नियुक्त होना अधिक दोष उत्पन्न करता है और नियुक्त ब्राह्मण अन्य कर्मों में अनर्ह हो जाता है। पुरोहितों को प्रेतकर्म में कदापि नियुक्त नहीं होना चाहिये, सपिंडीकरण प्रेतकर्म होते हुये भी देव और पितृ से भी सम्बंधित है और वहां पुरोहित वर्ग ही अधिकारी होते हैं यदि प्रेतकर्म में नियुक्त न हों तो।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत जानकारी प्राचीन धर्मग्रंथों, शास्त्रीय प्रमाणों और कर्मकांड के सिद्धांतों पर आधारित है। व्यक्तिगत परिस्थितियों, कुल परंपराओं और स्थानीय रीति के अनुसार नियमों में न्यूनाधिक्यता संभव है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले अपने कुलगुरु या योग्य विद्वान ब्राह्मण से परामर्श अवश्य करें। यह सामग्री केवल ज्ञानवर्धन और धार्मिक जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है। आलेख में प्रयुक्त कटुशब्द उन अपण्डितों के लिये है जिनको शास्त्रज्ञान तो नहीं होता किन्तु अहंकार से युक्त होते हैं।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








