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संशोधित मिथिलादेशीय अपात्रक श्राद्ध पद्धति - "सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं"

संशोधित मिथिलादेशीय अपात्रक श्राद्ध पद्धति – “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं”

पण्डित दिगम्बर झा कृत “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” (प्रथम संस्करण – गंगादशहरा २०८३)। वाजसनेयी परम्परा के अनुसार आद्यश्राद्ध, तन्त्र मासिक, सपिण्डीकरण, सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट, अस्थिसंचय एवं वृषोत्सर्ग विधि का प्रामाणिक ऐतिहासिक-शास्त्रीय विमर्श।

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अधिकमास में वृषोत्सर्ग करें या न करें प्रामाणिक सिद्धि

अधिकमास में वृषोत्सर्ग करें या न करें प्रामाणिक सिद्धि

क्या अधिकमास (मलमास) में एकादशाह को वृषोत्सर्ग करना चाहिए? जानें काम्य और नैमित्तिक वृषोत्सर्ग का शास्त्रीय भेद तथा पंडित दिगम्बर झा का प्रामाणिक व अकाट्य निर्णय।

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अनुपनीत कर्त्ता और पिण्ड द्रव्य का विचार

अनुपनीत कर्त्ता और पिण्ड द्रव्य का विचार

क्या अनुपनीत बालक भात (सिद्धान्न) से पिण्डदान कर सकता है? जानें द्विजाति असंस्कृत पुत्र के कर्माधिकार और पिण्ड द्रव्य का प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय निर्णय।

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अपात्रक श्राद्ध का आरंभ कब हुआ?

अपात्रक श्राद्ध का आरंभ कब हुआ?

अपात्रक श्राद्ध और मासिक श्राद्ध के अपकर्षण का ऐतिहासिक प्रारंभ कब हुआ? महामहोपाध्याय रुद्रधर झा और वाचस्पति मिश्र के प्रमाणों के साथ पंडित दिगम्बर झा का शास्त्रीय विमर्श और अधिकार सिद्धि।

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सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं - siddham susiddham shraddham

सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं – siddham susiddham shraddham

संशोधित श्राद्ध पद्धति “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” ग्रंथ की प्रामाणिक प्रस्तावना एवं भूमिका। जानें क्यों कर्मकांड में शास्त्रीय संशोधन अनिवार्य है और ‘मूर्खाचार्यों’ के दुराग्रहों का शास्त्रसम्मत समाधान क्या है।

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संशोधित सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट अर्थात वार्षिक श्राद्ध - वाजसनेयी

संशोधित सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट अर्थात वार्षिक श्राद्ध – वाजसनेयी

वाजसनेयी संशोधित ‘सांवत्सरिक (वार्षिक) श्राद्ध विधि’। जानें क्यों वार्षिक श्राद्ध में महापात्र का प्रवेश वर्जित है और स्वभूमि में भूस्वामि भाग का निषेध क्यों है। प्रामाणिक मंत्रों सहित क्षयाह श्राद्ध विमर्श।

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संशोधित मासिक श्राद्ध विधि - वाजसनेयी

संशोधित अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि – वाजसनेयी

वाजसनेयी संशोधित ‘अपात्रक मासिक श्राद्ध विधि’: जानें क्यों १४ मासिक श्राद्ध पृथक के बजाय ‘तंत्र’ विधि से करने चाहिए। अर्घ्य, पिण्डदान और अक्षय्योदक के सूक्ष्म नियमों का शास्त्रीय विश्लेषण।

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संशोधित आद्य श्राद्ध विधि - वाजसनेयी

संशोधित आद्य श्राद्ध विधि – वाजसनेयी

मैथिल वाजसनेयी परम्परा के अनुसार संशोधित ‘एकादशाह (आद्य) श्राद्ध विधि’। जानें पञ्चदान, अपात्रक श्राद्ध के नियम और शास्त्रीय संशोधन जो कर्मकांड की शुद्धता सुनिश्चित करते हैं।

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कुलटूट (पीढ़ी कटाना) : शास्त्रीय पक्ष क्या है ?

कुलटूट (पीढ़ी कटाना) : शास्त्रीय पक्ष क्या है ?

यह आलेख ‘कुलटूट’ (पीढ़ी अलग करना) की शास्त्रीय प्रक्रिया और अशौच के सूक्ष्म नियमों का विस्तृत विश्लेषण करता है। इसमें मनुस्मृति, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण और मिताक्षरा जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर यह सिद्ध किया गया है कि सापिण्ड्य ७ पीढ़ियों तक अक्षुण्ण रहता है। आलेख में ‘शास्त्रदस्युओं’ (अल्पज्ञ पंडितों) द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का खंडन करते हुए सपिण्ड (१-७ पीढ़ी), सोदक/सकुल्य (८-१४ पीढ़ी) और सगोत्र (१५-२१ पीढ़ी) के बीच के अंतर और उनके लिए निर्धारित अशौच काल की स्पष्ट व्याख्या की गई है।

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अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार

अधिकमास में श्राद्ध का सप्रमाण विचार

यह शोधपरक आलेख अधिकमास (मलमास/पुरुषोत्तम मास) के दौरान होने वाले श्राद्ध विधानों पर विस्तृत प्रकाश डालता है। इसमें विशेष रूप से ‘षोडश बनाम सप्तदश’ श्राद्ध के विवाद, एकादशमासाभ्यन्तरे की व्याकरणिक मीमांसा और संवत्सर २०८२-२०८३ के पंचांगीय गणित के माध्यम से यह समझाया गया है कि किस माह के मृतक का श्राद्ध अधिकमास में होगा और किसका नहीं।

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