संशोधित वृषोत्सर्ग पद्धति – वाजसनेयी
वाजसनेयी संशोधित ‘वैकल्पिक वृषोत्सर्ग पद्धति’। लोकविरुद्ध विसंगति का परिहार करते हुए एकादशाह को पिष्ट, दर्भ या मृत्तिका निर्मित वृष से प्रेतत्व विमुक्ति की प्रामाणिक समन्त्रक विधि।
पितृ कार्य एवं श्राद्ध महिमा : श्राद्ध रत्नाकर श्रेणी में आपका स्वागत है। सनातन धर्म में पितरों की संतुष्टि और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ‘श्राद्ध’ को एक अनिवार्य कर्तव्य माना गया है। हमारी इस श्रेणी का मुख्य उद्देश्य पाठकों को श्राद्ध कर्म से जुड़ी समस्त शास्त्रीय जानकारी, विधि-विधान और मंत्रों का प्रमाणिक संकलन प्रदान करना है। इस श्रेणी में आपको निम्नलिखित विषयों पर विस्तृत लेख और प्रयोग विधि प्राप्त होगी:
श्राद्ध विधि-विधान: महालय (पितृ पक्ष), वार्षिक श्राद्ध, और गया श्राद्ध की चरण-दर-चरण पद्धति।
मंत्र और प्रयोग: तर्पण विधि, पिंडदान के मंत्र, अन्य श्राद्ध कर्म के विशेष मंत्र।
श्राद्ध के प्रकार: नित्य, नैमित्तिक, काम्य और पार्वण श्राद्ध के साथ-साथ ‘नारायण बलि’ और ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ की विशेष जानकारी।
जिज्ञासा समाधान: सूतक-पातक में श्राद्ध, अकाल मृत्यु होने पर श्राद्ध का नियम और पितृ दोष निवारण के उपाय।
शास्त्रोक्त संदर्भ: निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु और गरुड़ पुराण के अनुसार श्राद्ध कर्म की प्रामाणिकता।
विशेष: “श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्” अर्थात जो श्रद्धापूर्वक किया जाए, वही श्राद्ध है। यहाँ दी गई सभी विधियाँ विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार संकलित की गई हैं।
वाजसनेयी संशोधित ‘वैकल्पिक वृषोत्सर्ग पद्धति’। लोकविरुद्ध विसंगति का परिहार करते हुए एकादशाह को पिष्ट, दर्भ या मृत्तिका निर्मित वृष से प्रेतत्व विमुक्ति की प्रामाणिक समन्त्रक विधि।
अस्थिसंचय के पश्चात् अस्थिविसर्जन में एक महत्वपूर्ण कर्त्यव्य होता है क्योंकि गंगा में अस्थि विसर्जन करने से प्रेतत्व का निवारण होता है। यदि दशरात्र के मध्य में हो तो उत्तम पक्ष अन्यथा वर्ष के पश्चात्।
मैथिल परम्परागत परिष्कृत ‘अस्थिसञ्चय एवं एकोद्दिष्ट पद्धति’। पद्धतिकारों की विसंगतियों का निवारण, पूर्ण अपात्रक दक्षिणा विधि और श्मशान-बलि का प्रामाणिक समन्त्रक प्रयोग।
पितृ दिवस (फादर्स डे) और मातृ दिवस (मदर्स डे) के नाम पर फैली वैचारिक दासता का खण्डन। सांवत्सरिक श्राद्ध और महालय पितृपक्ष के शास्त्रोक्त दायित्वों पर को उजागर करने वाला महत्वपूर्ण आलेख।
अशौच (सूतक) काल में अस्थिसञ्चय के समय वेदमन्त्र प्रयोग की प्रामाणिक शास्त्रीय सिद्धि। “तदपि ग्राह्यं” और “त्यागेन लब्धं” सूत्रों के आलोक अन्वेषण और श्रीरामकृत श्राद्ध विमर्श।
लोकविरुद्ध विसंगतियों के मध्य एकादशाह (प्रेतश्राद्ध) में वृषोत्सर्ग की अपरिहार्यता और उसके शास्त्रसम्मत विकल्प (मृत्तिका, दर्भ या पिष्ट वृष)। पण्डित दिगम्बर झा का प्रामाणिक ऐतिहासिक-शास्त्रीय विमर्श।
पण्डित दिगम्बर झा कृत “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” (प्रथम संस्करण – गंगादशहरा २०८३)। वाजसनेयी परम्परा के अनुसार आद्यश्राद्ध, तन्त्र मासिक, सपिण्डीकरण, सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट, अस्थिसंचय एवं वृषोत्सर्ग विधि का प्रामाणिक ऐतिहासिक-शास्त्रीय विमर्श।
क्या अधिकमास (मलमास) में एकादशाह को वृषोत्सर्ग करना चाहिए? जानें काम्य और नैमित्तिक वृषोत्सर्ग का शास्त्रीय भेद तथा पंडित दिगम्बर झा का प्रामाणिक व अकाट्य निर्णय।
क्या अनुपनीत बालक भात (सिद्धान्न) से पिण्डदान कर सकता है? जानें द्विजाति असंस्कृत पुत्र के कर्माधिकार और पिण्ड द्रव्य का प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय निर्णय।
अपात्रक श्राद्ध और मासिक श्राद्ध के अपकर्षण का ऐतिहासिक प्रारंभ कब हुआ? महामहोपाध्याय रुद्रधर झा और वाचस्पति मिश्र के प्रमाणों के साथ पंडित दिगम्बर झा का शास्त्रीय विमर्श और अधिकार सिद्धि।