Headlines

ब्राह्मणों को किस प्रकार दोष से बचना चाहिये ?

ब्राह्मणों को किस प्रकार दोष से बचना चाहिये ? ब्राह्मणों को किस प्रकार दोष से बचना चाहिये ?

“समानता के नाम पर उच्छृंखलता और स्वतन्त्रता के नाम पर समाज को स्वछन्दता का आत्मघाती पाठ पढ़ाया जा रहा है।”

वर्त्तमान काल में देश की शासन व्यवस्था ने ऐसा विकराल संकट उत्पन्न कर दिया है कि वर्णन करना कठिन है। लोगों को स्वतंत्रता के नाम पर स्वछंदता का पाठ पढ़ाया जा रहा है, समानता के नाम पर उच्छृंखलता, मर्यादा का उल्लंघन आदि सिखाया जा रहा है। घोषित रूप से वर्णाश्रम व्यवस्था को समाप्त करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। येन-केन -प्रकारेण भारतीय अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं और सब शासकीय रूप से संपन्न किया जा रहा है।

ब्राह्मणों को किस प्रकार दोष से बचना चाहिये ?

“पतितों का संसर्ग भी मनुष्य को पतित ही बनाता है, जिसमें याजन, अध्यापन, योनि सम्बन्ध और सहभोजन सर्वाधिक विनाशकारी हैं।”

वर्त्तमान काल में शासन व्यवस्था द्वारा किस प्रकार से सनातन और शास्त्रों को पंगु किया जा रहा है किञ्चित विमर्श : एक ओर भेद-भाव मिटाने के नाम पर जातिव्यवस्था को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है तो दूसरी ओर अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करते हुये वर्णसंकरों की सेना बनाई जा रही है। एक ओर शादी-तलाक का खेल खेलने की प्रेरणा दी जा रही है तो दूसरी ओर विधवा विवाह करके संतान उत्पन्न करे ऐसे वातावरण का निर्माण किया जा चुका है। विवाह की आयु इस प्रकार निर्धारित किया गया है कि स्वाभाविक रूप से कामपीड़ित होकर दुराचारी बनें और आगे विवाहोपरांत भी दुराचार की छूट दे दी गयी है।

वार्षलेय, कुण्ड, गोलक, शूद्रयोनिज, माहिषेय, वर्णसंकर आदि की नित्य-निरंतर वृद्धि होती जा रही है।

धनार्जन मात्र जीवन का उद्देश्य हो गया है और किसी भी प्रकार से लोग धन मात्र अर्जित करने में लग गये हैं। कहीं किसी को कोई दोष दिख ही नहीं रहा है। लोग पूर्णतः धर्ममार्ग से भ्रष्ट होते जा रहे हैं और धर्म के नाम पर नारेबाजी और डुबकी लगाना सिखाया जा रहा है, मंदिर और तीर्थों में पर्यटन करना सिखाया जा रहा है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर म्लेच्छ संसर्गी ही नहीं बनाया जा रहा है म्लेच्छों से ही सम्बन्ध भी स्थापित करना सिखाया जा रहा है। इस दिशा में अधिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं है विमर्श हेतु पर्याप्त है।

याजन का निषेध

यहां हमें समझना यह है कि ऐसे लोग संसर्ग के योग्य भी नहीं होते और इनका याजन में भी दोष कहा गया है :

वार्षलेयश्च वै कुण्डो गोलकः शूद्रयोनिजः । तज्जश्चापि हि निन्द्यः स्युर्माहिषेयश्च विप्रजः ॥
एभिः सह वसेदेषां याजनं कुरुतेऽथ वा । वित्तमेषां द्विजो यस्तु भुङ्क्ते सोऽपि हि तत्समः ॥
एतेषां याजनं यस्तु ब्राह्मणः कुरुते यदि । स याति नरकं घोरं यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥
अद्विजानां चाध्ययनं याजनं च प्रतिग्रहम् । ब्राह्मणो नैव गृह्णीयादिति माहुर्मुनीश्वराः ॥

लघ्वाश्वलायन स्मृति/२१/११६ – ११९

प्रथम श्लोक में – वार्षलेय, कुण्ड, गोलक, शूद्रयोनिज, माहिषेय, वर्णसंकर आदि के याजन का निषेध किया गया है और आगे कुछ अन्य :

  • संसर्ग निषेध : एभिः सह वसेदेषां याजनं कुरुतेऽथ वा । वित्तमेषां द्विजो यस्तु भुङ्क्ते सोऽपि हि तत्समः ॥
  • याजन निषेध : एतेषां याजनं यस्तु ब्राह्मणः कुरुते यदि । स याति नरकं घोरं यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥
  • अद्विजों का अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह निषेध : अद्विजानां चाध्ययनं याजनं च प्रतिग्रहम् । ब्राह्मणो नैव गृह्णीयादिति माहुर्मुनीश्वराः ॥
  • अपात्रीकरण : निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् । अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥ विष्णुधर्मोत्तरपुराण/२/७३/६६, अग्निपुराण/१६८/४०, मनुस्मृति/११/६९
संसर्ग दोष
संसर्ग दोष

व्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामंत्यकर्म च । अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुध्यति ॥
विष्णुधर्मोत्तरपुराण/२/७३/७४, मनुस्मृति/११/१९७

व्रात्यों की तो बात ही क्या करें अनुमानतः ९०% व्रात्यता व्याप्त हो गई है। यदि हम प्रमाणों की बात करें तो इस प्रकार के प्रमाणों को संग्रह करने मात्र में वर्षों लगेंगे किन्तु प्रमाण संकलन पूर्ण नहीं हो पायेगा, इतने प्रमाण हैं अस्तु यहां इस विषय के प्रमाणों को और बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है अपितु आवश्यकता यह है कि ब्राह्मणों के लिये मार्ग क्या है यह समझें।

अब प्रश्न आयेगा कि याजन कराने में कैसा दोष और क्यों ? तो सीधा उत्तर है संसर्ग दोष उत्पन्न होता है और निषिद्ध है। पुनः प्रश्न उत्पन्न होगा कि ये तो ऊपर वर्णित है कि वर्त्तमान काल में ये रक्तबीज की तरह वृद्धि को प्राप्त करते जा रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी संबंधी में भी ये दोष मिल जायेगा और जहां सैकड़ों यजमान की बात हो तो वहां एक दोष की बात क्या करें अनेकानेक दोष देखने को मिलते हैं और सबसे बड़ी बात म्लेच्छाचार तो प्रकट रूप से दिखता है।

सीधी सी बात है पतितों का संसर्ग भी पतित ही बनाता है और संसर्ग कई प्रकार से होते हैं जिनमें अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह को अधिक दोषपूर्ण माना गया है। इसके साथ ही योनि संबंध, स्वाध्याय, सहभोजन भी विशेष दोषपूर्ण होता है।

याजनं योनि संबन्धं स्वाध्यायं सहभोजनम् । पातकैस्सह चेत्कुर्यात् सोऽपि तत्सम इष्यते ॥
कामिकागम/उत्तरभाग/५८७

शास्त्रों में सर्वत्र ही सामान्य रूप से यजन के साथ याजन भी ब्राह्मणों का एक कर्म कहा गया है किन्तु अयाज्य याजन को दोषपूर्ण भी कहा गया है यहां तक कि प्रायश्चित्त की व्याप्ति होती है ऐसा भी कहा गया है। प्रायश्चित्त विषयक वचन तो ऊपर ही वर्णित है आगे और भी मनुस्मृति का वचन देखते हैं :

शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः । गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ॥
अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम् । कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः ॥

मनु स्मृति/३/६४ – ६५

आगे क्या ?

यहीं जाकर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि जब अधिकांशतः अयाज्य की ही श्रेणी में आ गए हैं तो दोष तो सर्वत्र उपस्थित होता ही है आगे क्या ? आगे क्या का तात्पर्य है कि क्या आगे ब्राह्मण दोषी बने अथवा दोषनिवारण का प्रयास करे ? स्वाभाविक रूप से स्पष्ट है यदि युगधर्म के अनुसार सभी अयाज्य की श्रेणी को ही प्राप्त करते जा रहे हैं तो सबका त्याग भी संभव नहीं है, यद्यपि आत्मकल्याण कामना हो तो त्याग ही उत्तम पक्ष है किन्तु जीवन यापन भी तो है।

यदि शास्त्रोक्त वृत्ति को ग्रहण करे तो सामान्य दोष उत्पन्न होगा किन्तु शास्त्रोक्त वृत्ति से भिन्न वृत्ति का आश्रय ले तो भी संसर्ग से मुक्त नहीं हो सकता अपितु अधिक संसर्ग दोष उत्पन्न होगा एवं शास्त्रविरुद्ध आचरण का दोष ऊपर से अधिक ही होगा। अर्थात यदि अधिकांशतः अयाज्य की श्रेणी को प्राप्त करते जा रहे हैं और इस कारण याजन का त्याग करके अन्यान्य वृत्ति का आश्रय ग्रहण करे तो सर्वप्रथम एक दोष कर्म त्याग और निषिद्ध वृत्ति का उत्पन्न होगा, द्वितीय जितना संसर्ग दोष याजन में होता है उससे कई गुना अधिक संसर्ग दोष भी प्राप्त होगा। इस कारण इस दिशा में तो विचार किया ही नहीं जा सकता।

अयाज्य याजन में दोष तो आगे क्या ?

इससे भी आगे एक अन्य महत्वपूर्ण शास्त्रीय पक्ष यह है कि धर्म के संस्थापक ब्राह्मण ही होते हैं और इस दायित्व का त्याग नहीं किया जा सकता अर्थात जो भी स्थिति है उसमें भी पुनः धर्मस्थापना का दायित्व तो है ही अर्थात आगे सुधार कैसे हो यह मार्ग निकालना और सुधार करना भी ब्राह्मणों का ही दायित्व है। किन्तु वो ब्राह्मण इस दायित्व को स्वीकारते ही नहीं जो धनमात्र के लिये अहर्निश कर्मकांड में व्यस्त रहते हैं। वो पूर्ण दोषी भी हैं और उनके लिये किसी मार्ग का यहां विचार भी नहीं किया जा रहा है हाँ ये मार्ग अवश्य रहेगा कि यदि दायित्वबोधपूर्वक निर्वहन हेतु तत्पर हो जायें तो मार्ग के अधिकारी होंगे अन्यथा नहीं।

अर्थात आगे का जो मार्ग है वो मात्र भिज्ञ ब्राह्मणों के लिये ही है सबके लिये नहीं।

दोष निवारण का सरल मार्ग

“वेदपारग और स्वधर्म में स्थित ब्राह्मण को पाप वैसे ही स्पर्श नहीं कर पाते, जैसे जल में रहते हुए भी कमल का पत्र सर्वथा सूखा रहता है।”

हमने जहां से दोष को मुख्यरूपेण विमर्श हेतु ग्रहण किया है समाधान भी वहीं पर दिया गया है, आगे के वचन को समझें :

ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि स्वधर्मेणानुवर्तयेत् । नाऽऽचरेत्परधर्मं च धर्मनाशाय चाऽऽत्मनः ॥
स्नानेन च बहिः शुद्धिरात्मज्ञानेन चान्तरा । सत्कर्मणा द्विजः शुद्धः सर्वकर्मसु चैव हि ॥
स्वधर्मनियतो विप्रः कुरुते पातकं यदि । स्वधर्मेणैव शुद्ध्येत नान्यथा शुचितामियात् ॥
न स्पृशन्तीह पापानि ब्राह्मणं वेदपारगम् । कदाचित्कुरुते मोहात्पद्मपत्रे यथा जलम् ॥

लघ्वाश्वलायन स्मृति/२२/६ – ९

यहां ब्राह्मण ही नहीं क्षत्रियों के लिये भी कहा गया है कि परधर्म में प्रवृत्त न हो, स्वधर्म का ही आचरण करे। अन्यत्र चारों वर्णों के लिये भी यही आज्ञा है – “परधर्मो भयावहः”, जो परधर्म को श्रेयस्कर समझ कर ग्रहण करे उसके धर्म का नाश तो होता ही है एवं आत्मनाश (पतन) भी होता है। स्नान से बाहरी शुद्धि होती है अर्थात शरीर की शुद्धि होती है और आत्मज्ञान से भीतर की शुद्धि।

जो द्विज सत्कर्म (शास्त्रविहित) में निरत रहते हैं वह सभी कर्मों में शुद्ध होते हैं। यदि स्वधर्म में निरत ब्राह्मण से कदाचित कोई पाप भी हो जाये तो उसका निवारण भी उनके स्वधर्म पालन से ही होता है अन्यान्य उपायों से नहीं। वेदज्ञ ब्राह्मण (जो स्वधर्म में स्थित हो) उसी प्रकार पाप से लिप्त नहीं होते जैसे जल में रहते हुये भी कमल का पत्र भींगता नहीं है। अन्यत्र सदाचार, गायत्री आदि का माहात्म्य शास्त्रों में भरा पड़ा है। मार्ग भी यहीं पर है और इसी को हमें गंभीरता से समझना आवश्यक है।

शास्त्रोक्त मार्ग

“यदि यजमान आपकी बात नहीं समझता, तो आप यजमान को दोष न दें; यह आपकी अपनी शास्त्रीय अक्षमता और अकर्मण्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।”

शास्त्रोक्त मार्ग का तात्पर्य उपरोक्त वचन के साथ अन्यत्र जो भरे पड़े हैं उनका भी आश्रय ग्रहण करना है। ब्राह्मण का दायित्व धर्म की स्थापना है यह स्पष्ट किया जा चुका है। ब्राह्मण के लिये शास्त्रों में षट्कर्म विहित है और इसके लिये भी प्रमाणों को प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। षट्कर्म इस प्रकार हैं : अध्ययन, यजन, दान, अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह। इनमें से प्रथम तीन जो हैं अध्ययन, यजन और दान यह आत्मकल्याण के लिये हैं एवं द्वितीय त्रिक जो है अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह ये मुख्य रूप से वृत्ति संबंधी है, यद्यपि अध्यापन और याजन भी अन्य भाव से कल्याणकारी है।

इन षट्कर्मों में ही पञ्चमहायज्ञ भी समाहित हो जाते हैं। वर्त्तमान जीवनशैली और युगधर्म ऐसा है कि पंचमहायज्ञ सिद्ध नहीं हो पाता किन्तु यदि प्रयास करें तो संध्या, तर्पण, वैश्वदेव, स्वाध्याय आदि संभव है इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण नहीं। किन्तु जो संभव है वो भी नहीं कर पाते ये समस्या है, इसका कारण वृत्ति मात्र से याजन-प्रतिग्रह को ग्रहण करना है एवं शेष चारों कर्मों का त्याग कर देना है। ब्राह्मण को सर्वप्रथम स्वयं के षट्कर्म का बोध होना आवश्यक है तदुपरांत ही वह आत्मकल्याण और धर्म की स्थापन करने में समर्थ हो सकता है।

शास्त्रोक्त मार्ग

मार्जन

यदि ब्राह्मण अपने षट्कर्म का निर्वहन करे तो ही वह दोषमुक्त हो सकता है अन्यथा नहीं। इसलिये यह आवश्यक है कि पहले षट्कर्मों का बोध हो तदुपरांत निर्वहन। ऐसे ब्राह्मण ही धर्म की स्थापना का उद्देश्य धारण करते हुये याजन वृत्ति करें तो दोषरहित हो सकते हैं इनसे इतर नहीं। कारण की जो भी युगव्यवस्था है उसका मार्जन कैसे होगा यह ब्राह्मण का ही दायित्व है और मार्जन करते चलें तो पुण्य के भागी होंगे, न कि दोषी।

अब मार्जन कैसे यह भी समझना होगा; ब्राह्मण का कार्य केवल कर्मकांड कराना अर्थात याजन मात्र नहीं है, यह एक है अन्य पांचों को भी ग्रहण करें। मार्जन अर्थात धर्म की स्थापना का प्रयास करें और इसके लिये निम्न प्रकार के प्रयास किये जा सकते हैं :

  • आप व्रात्यता को समझ रहे हैं तो आपका यजमान व्रात्य न हो ऐसा उपदेश करना आपका दायित्व है अर्थात यजमान को उपदेश करें और आपका यजमान व्रात्य न हो इसका पूर्ण प्रयास करें।
  • वर्णसंकर दोष के बारे में भी यजमानों को भली भांति अवगत करें।
  • तलाक और पुनर्विवाह नहीं हो सकता ये समझायें।
  • विधवा विवाह नहीं हो सकता ये समझायें।
  • संसर्गदोष के बारे में समझायें।
  • कर्तव्य और अकर्तव्य, सदाचार आदि का ज्ञान प्रदान करें।

इसी प्रकार और भी ढेरों विषय हैं जो समझाना ब्राह्मण का दायित्व होता है, यजमान तभी प्रवृत्त होगा जह उसे ब्राह्मण प्रेरित करें। यजमान को ये सब बताने के लिये सर्वप्रथम स्वयं समझें यह भी आवश्यक है; क्योंकि अभी आपके मस्तिष्क में एक ही विचार आ रहा होगा कि कोई समझता ही नहीं, किन्तु एक बार यह भी तो विचार करें कि आप स्वयं ही जब नहीं समझते तो यजमान को क्या समझाते होंगे जो वह नहीं समझता है।

अर्थात पहले स्वयं समझें फिर यजमान को समझायें, विद्वानों की बात यजमान समझता ही है और विद्वान केवल समझाना नहीं अपितु अपनी आज्ञा का पालन कराना भी जानते हैं। अर्थात जब आप यह कहते हैं कि कोई समझता ही नहीं तो अपनी ही अक्षमता व्यक्त करते हैं।

अपनी अक्षमता, अकर्मण्यता का एक ही तथ्य से आकलन कर सकते हैं कि आप जो कर्मकांड कराते हैं वो शास्त्रसम्मत कराते हैं अथवा शास्त्रविरुद्ध प्रदर्शन ? इसके लिये भी आपको पहले तो जो-कुछ कराते हैं उसके शास्त्रसम्मत विधि क्या है इसका ज्ञान होना चाहिये। यदि यह ज्ञान भी नहीं है तो निश्चितरूपेण प्रदर्शन मात्र करते हैं जिसका मुख्य कारण कर्मकांड को व्यवसाय मात्र समझना है। यदि आप अक्षम-अकर्मण्य हैं तो आप यजमान को कुछ भी समझाने में सफल नहीं हो सकते, उपदेश नहीं दे सकते, आज्ञा का पालन नहीं करा सकते। सक्षम कैसे होंगे तो षट्कर्मों का बोधपूर्वक निर्वहन करें यही आपको समर्थ बनाएगा।

इस प्रकार हम अब इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि :

  • यदि दोष का मार्जन करना है तो भी अपने षट्कर्म में प्रवृत्त होना होगा।
  • यदि दायित्व निर्वहन करना है तो भी अपने षट्कर्म में प्रवृत्त होना होगा।
  • यदि भविष्य में दोष ही उत्पन्न न हो ऐसा प्रयास करना है है तो भी अपने षट्कर्म में प्रवृत्त होना होगा।

निष्कर्ष (Conclusion)

मूल निष्कर्ष यह है कि वर्तमान कलियुग में शासन व्यवस्था और सामाजिक स्वछन्दता के कारण व्रात्यता, वर्णसंकर दोष, और म्लेच्छाचार जिस विकराल रूप में व्याप्त हो चुके हैं, उससे ब्राह्मणों का ब्रह्मतेज गम्भीर संकट में है। लघ्वाश्वलायन स्मृति के अनुसार, निन्दित जनों (कुण्ड, गोलक, वर्णसंकरों) का याजन कराने वाला विप्र घोर नरकगामी होता है, क्योंकि अयाज्य-याजन दोष उत्पन्न होता है।

परन्तु, इस देश-काल-परिस्थिति में याजन का सर्वथा परित्याग करके सेवावृत्ति (नौकरी) या वाणिज्य जैसी निषिद्ध वृत्ति अपनाना और अधिक संसर्ग दोष तथा स्वधर्म-त्याग के महापाप को आमन्त्रित करना है। इस विकट परिस्थिति से बचने और दोषों के मार्जन का एकमात्र शास्त्रोक्त मार्ग लघ्वाश्वलायन स्मृति के वचनानुसार — “स्वधर्मनियतो विप्रः कुरुते पातकं यदि, स्वधर्मेणैव शुद्ध्येत…” — अर्थात अपने विहित षट्कर्मों (अध्ययन, यजन, दान, अध्यापन, याजन, प्रतिग्रह) में पुनः दृढ़तापूर्वक प्रवृत्त होना है।

जब वेदपारग ब्राह्मण स्वधर्म में स्थित होकर यजमानों को केवल ‘व्यवसाय मात्र’ के लिए अनुष्ठान कराने के स्थान पर, उन्हें व्रात्यता, संसर्ग दोष और सदाचार के प्रति उपदेश देकर मर्यादा में बांधे, तब वह याजन करते हुए भी पापों से वैसे ही निर्लेप रहेगा जैसे जल में कमल का पत्र।

अस्वीकरण (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में वर्णित सिद्धान्त स्मृतियों, मनुस्मृति तथा लघ्वाश्वलायन स्मृति के मूल ऋषि-वचनों के अन्वेषण पर आधारित हैं। अनुष्ठानगत विसंगतियों, अकर्मण्यता और कर्मकाण्ड को केवल व्यापार समझने वाले कर्मकांडियों पर किए गए कठोर प्रहार किसी व्यक्ति विशेष के प्रति द्वेष से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि वर्तमान युग में लुप्त हो रहे ब्राह्मणोचित तपोबल की पुनर्प्राप्ति और सम्मार्जन हेतु एकमात्र शास्त्रोक्त मार्ग है। पाठक अपने विवेक, कुलाचार और स्थानीय विद्वानों के परामर्श के अनुसार ही निर्णय करें।

Leave a Reply