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ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन

ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन

“अविधि से की गई आठ करोड़ आहुति भी निरर्थक है, विधिपूर्वक की गई आठ आहुति ही कल्याणकारी होती है।”

यद्यपि किसी भी प्रकार का हवन हो वहां नवग्रह होम होता ही है, कुछ अपवादों के अतिरिक्त। जैसे संस्कार, वृषोत्सर्ग आदि में नवग्रह होम नहीं होता अन्यत्र सामान्यतः सभी होम में भी नवग्रह होम होता ही है किन्तु हम यहां जो विमर्श करने जा रहे हैं वह इस सामान्य होम से भिन्न विषय है। ग्रहशान्ति प्रकरण में अधिक आहुति दी जाती है और उस स्थिति में विचार करना होता है कि आहुति द्रव्य क्या हों। इस आलेख में ग्रहशान्ति होम द्रव्य से संबंधित प्रामाणिक चर्चा की गयी है।

ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन

वर्त्तमान समय में प्रामाणिक होने का भी अनर्थ ही कर दिया गया है और अधिकांशतः जो प्रमाणित न हो सके उसी को प्रामाणिक समझा जाता है। ये कार्य निश्चितरूपेण स्वार्थी सनातनद्रोहियों ने किया है। इसको समझने के लिये दो-तीन उदाहरण को देखना आवश्यक होगा :

  • तिलक आदि करते समय सिर के पीछे हाथ लगाना एक प्रचलन हो गया और नाना प्रकार के कुतर्क गढ़कर इसे उचित सिद्ध करने का प्रयास कुछ भगवाधारियों ने भी किया है।
  • आसन की आवश्यकता इसलिये होती है कि हम जो ऊर्जा प्राप्त करते हैं वो पृथ्वी अवशोषित न कर ले।
  • बेटी के घरवाले दुःखी न हों इसलिये पिता उसके घर का भोजन कर ले।
  • जप करने से एकाग्रता बढती है इसलिये जप करना चाहिये।
  • हवन करने से वातावरण शुद्ध होता है इसलिये प्रतिदिन हवन करें।
ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन
ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन

ये सभी तथ्य कुतर्क पर आधारित है जिनमें से कुछ सही भी हैं कुछ गलत भी, किन्तु इनमें से प्रामाणिक कुछ भी नहीं है। धर्म के विषय में प्रामाणिक का तात्पर्य होता है शास्त्र द्वारा पुष्ट तथ्य, शास्त्र वचनों के आधार पर पुष्ट तथ्य। वैज्ञानिक सिद्धि होने और न होने से प्रामाणिकता पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता। यहां एक समस्या यह भी है कि वर्त्तमान काल में उसी विषय को आगे बढ़ाया जाता है जो शास्त्र प्रमाणित न होकर राजनीतिक स्वार्थ पूर्ण करने वाला हो चाहे पक्ष का हो अथवा विपक्ष का।

वही व्यक्ति प्रसिद्धि प्राप्त कर सकता है जो पक्ष अथवा विपक्ष की राजनीति में प्रत्यक्ष-परोक्ष कोई योगदान कर सके। जो विषय/सामग्री वास्तव में प्रामाणिक होते हैं उससे इनके स्वार्थों की सिद्धि संभव नहीं होती साथ ही अंतर्जाल माध्यमों के लिये भी परोक्षतः विरुद्ध ही होती हैं, वास्तविकता यह है कि राजनीति हो अथवा अंतर्जाल माध्यम ये सब धर्म के विरुद्ध हैं इस कारण जो प्रामाणिक सामग्रियां होती है वो इनको विरोधी ही लगती हैं और उसके प्रसारण में यथासंभव अवरोध ही उत्पन्न करते हैं।

यह विदित होते हुये भी “सम्पूर्ण कर्मकाण्ड विधि” पर प्रामाणिक विमर्श ही किया जाता है और यहां भी प्रामाणिक चर्चा ही की जायेगी। भले ही आज प्रामाणिक तथ्यों में रुचि भी नहीं है किन्तु जब रुचि उत्पन्न होगी तभी सही उपलब्ध तो होगा। समय का चक्र चलायमान ही रहता है यदि पूर्व में रुचि थी तो वर्त्तमान में नहीं है और यदि वर्त्तमान में नहीं है तो भविष्य में पुनः होगा।

ग्रहशान्ति होम द्रव्य

अर्कः पालाशखदिरावपामार्गोऽथपिप्पलः। औदुम्बरः शमीदूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्॥
एकैकस्याष्टकशतमष्टाविंशतिमेव वा। होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना चैव समन्विताः॥
देवानामपि सर्वेषामुपांशु परमार्तवित्। स्वेन स्वेनैव मन्त्रेण होतव्याः समिधः पृथक्॥
होतव्यं च घृताभ्युक्तं चरुभक्षादिकं पुनः। मन्त्रैर्दशाहुतीर्हुत्वा होमं व्याहृतिभिस्ततः॥

मत्स्यपुराण/९३/२७ – ३१, बृहत्पाराशरहोराशास्त्र/८४/२१ – २२

यहां सर्वप्रथम नवग्रहों की समिधा बताई गयी है : सूर्य की अकान, चन्द्र की पलाश, मंगल की खैर, बुध की चिड़चिड़ी, गुरु की पीपल, शुक्र की गुल्लड़, शनि की शमी, राहु की दूर्वा और केतु की कुशा समिधा बताई गयी है। तदनन्तर समिधा के साथ मधु, घृत और दधि तीन द्रव्यों का प्रयोग भी कहा गया है अर्थात इन तीन द्रव्यों से युक्त समिधा की आहुति मुख्य पक्ष है। पुनः आगे चरु और भक्ष्य से समन्वित समिधा भी कहा गया है जो आगे स्पष्ट किया जायेगा।

होमं समारभेत्सर्पिर्यवव्रीहितिलादिना । अर्कः पलाशखदिरौ ह्यपामार्गोऽथ पिप्पलः ॥
उदुंबर शमीदूर्वाकुशाश्च समिधः क्रमात् । एकैकस्य चाष्टशतमष्टाविंशति वा पुनः ॥
होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना वा पायसेन वा । प्रादेशमात्रा ऋजवो विशाखा विफलाः शुभाः ॥
कल्प्यंते समिधः प्राज्ञैः सर्वकर्मसु सर्वदा । देवानामपि सर्वेषामुपांशु परमार्थवित् ॥

स्वेन स्वेनैव मंत्रेण होतव्याः समिधः पृथक् । आकृष्णेन इमं देवा अग्निर्मूर्द्धा दिवः क्रमात् ॥
उद्बुध्यस्वेति बोध्यश्च यथासंख्यमुदाहृताः । बृहस्पते अतियदस्तथैवान्नात्परिस्रुतः ॥
शन्नोदेवीति च कया केतुं कृण्वन्नितीति च । होतव्यं यद्वदाज्यं चरुं भक्ष्याणि वा पुनः ॥
मंत्रैर्दशाहुतीर्दत्त्वा होमो व्याहृतिभिस्ततः ॥

भविष्यपुराण/४ (उत्तरपर्व)/१४१/३० – ३८

यहां समिधा के साथ नवग्रहों के वैदिक मन्त्र भी बताये गए हैं : सूर्य का आकृष्णेन रजसा, चन्द्र का इमं देवा, मंगल का अग्निर्मूर्द्धा दिवः, बुध का उद्बुध्यस्वाग्ने, गुरु का बृहस्पते अतियदर्यो, शुक्र का अन्नात्परिस्रुतः, शनि का शन्नोदेवीरभीष्टय, राहु का कयानश्चित्र और केतु का केतुं कृण्वन्न मन्त्र कहा गया है। आहुति द्रव्य समिधा, घृत, मधु, दधि के साथ पायस भी कहा गया है और अंत में पुनः भक्ष्य भी कहा गया। यहां शाकल्य भी ग्रहण किया गया है।

दुःस्थान्ग्रहांश्च विज्ञाय ग्रहशान्तिं समाचरेत् । प्रादेशमात्राः कर्त्तव्याः समिधोऽथ प्रमाणतः ॥
अर्कमय्यो रवेः कार्या पालाश्यः शशिनः स्मृताः । खादिर्यश्चैव भौमाय आपामार्ग्योऽब्जसूनवे ॥
आश्वत्थ्यश्चाथ जीवाय औदुम्बर्यः सिताय च । असिताय शमीमय्यो दूर्वा कार्यस्तु राहवे ॥
केतवे तु कुशाः कार्याः दक्षिणाश्चाप्यतः शृणु ॥

भविष्यपुराण/१ (ब्राह्मपर्व)/५६/२१ – २३

यहां ग्रहों की समिधा का उल्लेख भी किया गया है और प्रमाण भी प्रादेश मात्र बताया गया है।

पूर्वोत्तरे च दिग्भागे रथस्याग्निं प्रकल्पयेत् । समिद्भिस्तु घृताक्ताभिर्होमयेज्जातवेदसम् ॥
स्वाहाकारान्वदन्सम्यग्दैवतेभ्यस्त्वनुक्रमात् । ग्रहेभ्यश्च प्रजाभ्यश्च नामान्युद्दिश्य होमयेत् ॥

भविष्यपुराण/१ (ब्राह्मपर्व)/५६/१३ – १४

यहां अग्नि के पूर्वोत्तर भाग में ग्रहों की आहुति देने के लिये कहा गया है। घृताक्त समिधा से होम कहा गया है।

घृताक्तैरक्षतैर्होमः कार्य्यश्च सतिलैर्भवेत् । अर्कः पलाशः खदिरश्चापामार्गोऽथ पिप्पलः ॥
उदुम्बरश्शमीदूर्वाः कुशाश्चेति यथाक्रमम् । समिदर्थं प्रशस्यन्ते सूर्यादीनां नराधिप ॥
होतव्यास्समिधश्चैव घृताक्ता मनुजेश्वर । तथा प्रादेशमात्राश्च प्रागग्रा नित्यमेव च ॥
ऊर्ध्वशुष्काः सपत्राश्च वित्वचश्च विवर्जयेत् ॥

विष्णुधर्मोत्तरपुराण/१/१०१/१ – ४

यहां अक्षत और तिल भी ग्रहण किया गया है (समिधा के साथ न कि शाकल्य मात्र) और समिधा के कुछ अन्य लक्षण भी स्पष्ट किये गए हैं जैसे : केवल ऊपर से शुष्क होना, पत्र युक्त होना, त्वचा (छाल) रहित होना ये निषिद्ध लक्षण हैं अर्थात भलीभांति शुष्क हो, पत्रादि से युक्त न हो, त्वचा (छाल) रहित न हो।

प्रामाणिक विमर्श

होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना चैव समन्विताः – यह प्रधान या मुख्य पक्ष है दधि, मधु, घृताक्त समिधा। इसी का गौण पक्ष घृताक्त (केवल घृताक्त) होगा – होतव्यास्समिधश्चैव घृताक्ता।  दधि के स्थान पर यदि चरु निर्मित करे तो चरु का प्रयोग होगा – होतव्या मधुसर्पिभ्यां दध्ना वा पायसेन वा। इसी का पुनः एक प्राकारान्तर आगे होतव्यं यद्वदाज्यं चरुं भक्ष्याणि वा पुनः केवल घृत अथवा केवल चरु से भी किया जा सकता है यह समिधा का अभाव होने पर प्रतीत होता है अर्थात विकल्प है।

ग्रहशान्ति होम द्रव्य
ग्रहशान्ति होम द्रव्य

दध्ना वा पायसेन वा : समिधा के साथ घृत, मधु और दधि तीन द्रव्यों का विशेष उल्लेख मिलता है। साथ में चरु का भी उल्लेख मिलता है तो चरु के लिये स्पष्ट ऐसा भी होता है “दध्ना वा पायसेन वा” अर्थात दधि अथवा पायस, इसका तात्पर्य दोनों नहीं है अपितु यदि चरु हो तो दधि नहीं होगा और यदि दधि हो तो चरु नहीं होगा। दोनों में से एक ही होगा अर्थात दधि न हो सके तो चरु निर्माण करे और यदि चरुनिर्माण संभव न हो तो दधि का प्रयोग करे।

चरु में विशेषता यह भी है कि इसका स्वतंत्र प्रयोग भी कहा गया है अर्थात यदि समिधा का अभाव हो तो चरु (घृत-मधु मिश्रित) से भी आहुति दी जा सकती है और इस अवस्था में दधि का प्रयोग नहीं होगा।

भक्ष्य : यद्यपि भक्ष्य का तात्पर्य यह भी हो सकता है कि अन्यान्य भक्ष्य द्रव्य किन्तु यहां विशेषार्थ की ही सिद्धि हो सकती है। ग्रहों के जो विशेष नैवेद्य कहे गए हैं वो उसके भक्ष्य हैं और ग्रह संबंधी हवन में यदि भक्ष्य प्रयोग होगा तो ग्रह का भक्ष्य द्रव्य होगा। “भक्ष्यादिकं” जिसका तात्पर्य ग्रहविशेष का जो विशेष नैवेद्य वर्णित है उस भक्ष्य द्रव्य की आहुति। होतव्यं च घृताभ्युक्तं चरुभक्षादिकं पुनः – यहां घृताक्त तो कहा ही गया है चरु के साथ एक विकल्प और बढ़ाया गया है।

होमं समारभेत्सर्पिर्यवव्रीहितिलादिना – इससे शाकल्य प्रयोग भी सिद्ध होता है किन्तु इसमें द्वितीय भाव भी है कि शाकल्य प्रयोग आरम्भ में अन्यान्य आहुति के लिये करे। शाकल्य भी गौण पक्ष है, यदि मुख्य द्रव्य का अभाव हो तो शाकल्य भी प्रयोग किया जा सकता है किन्तु ध्यातव्य यह है कि गौण पक्ष है।

उपरोक्त तथ्य को बिन्दुवार समझें तो इस प्रकार है :  

  • प्रथम पक्ष घृताक्त समिधा जो मधु और दधिमिश्रित भी हो। 
  • द्वितीय पक्ष यदि चरु निर्माण किया जायेगा तो दधि के स्थान पर चरु प्रयोग भी होगा। चरु में ध्यातव्य यह भी है कि किसी भी प्रकार से बनाया गया खीर हो तो वह चरु नहीं होगा। घृत से भिन्न आहुति होने पर घृत से स्विष्टकृद्धोम नहीं हो सकता अर्थात चरु निर्माण आवश्यक ही है किन्तु केवल स्विष्टकृतार्थ चरु बने तो दधि का प्रयोग और यदि पर्याप्त बने तो चरु का प्रयोग। 
  • उतना न करना चाहे तो केवल घृताक्त समिधा से भी। इस पक्ष को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता और वैकल्पिक रूप से ग्राह्य है ही।
  • समिधा का अभाव हो तो चरु, भक्ष्य वा शाकल्य से भी किया जा सकता है। 
  • शाकल्य का तात्पर्य जो मुख्य वर्णित द्रव्य है उससे भिन्न स्वेच्छाचार पूर्वक अनेकानेक द्रव्य मिश्रित करना नहीं है। जैसे खस, जटामसी, कमलगट्टा, भोजपत्र, धूप, गुग्गुल, धूना और भी न जाने क्या-क्या। ये सब जहां वर्णित हैं उसी प्रयोग के लिये हैं न कि सामान्य विधान, प्रायः शाकल्य में बिना आहुति द्रव्य का विचार किये अनेकानेक द्रव्य मिश्रित कर दिया जाता है। 
  • कारण कि घृत-मधु-दधि (विशेष में चरु) ये मुख्य द्रव्य कहा गया तो यहां त्रिमधु नहीं किया जा सकता अर्थात शर्करा नहीं मिला सकते।

महत्वपूर्ण तथ्य

“धर्म के विषय में प्रामाणिक का तात्पर्य होता है शास्त्र द्वारा पुष्ट तथ्य; वैज्ञानिक सिद्धि होने या न होने से प्रामाणिकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।”

अब विशेष महत्वपूर्ण तथ्य भी समझना आवश्यक है। केवल आहुति द्रव्य का ही इतना विचार न किया जाय, हवन विधान और ग्रहशांति विधि का भी विचार अवश्य करे। प्रायः ग्रहशांति का तात्पर्य मात्र मंत्र जप करना समझा जाता है जो यथार्थ नहीं है। अब इसमें स्वेच्छाचार को समझें जो कि अत्यावश्यक है, सामान्यतः हम सभी अनजाने में स्वेच्छाचार करते रहते हैं अर्थात स्वेच्छाचारी बन जाते हैं जो उचित नहीं है और इसके लिये सावधान रहना अनिवार्य होता है। सामान्य नियम जैसे बनता जा रहा है :

दधि और चरु
दधि और चरु
  • शाकल्य प्रधान पक्ष नहीं है यह सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
  • जहां कहीं शाकल्य बने उसमें नाना द्रव्य मिश्रित करना, इसको भी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया गया है जो जितना अधिक द्रव्य प्रयोग करेगा (स्वेच्छाचार पूर्वक) वह उतना बड़ा पंडित कहलायेगा इस बुद्धि से। यह स्वेच्छाचार की ही श्रेणी में ही आता है, जहां द्रव्य स्पष्ट वर्णित हो वहां अन्यान्य मिश्रित नहीं किया जा सकता।
  • प्रायः शाकल्य या तो घट जाता है या बढ़ जाता है ये भी त्रुटि है। थोड़ा-बहुत बढ़ना तो चाहिये किन्तु घटना नहीं चाहिये घटने पर आहुति में मात्रा अल्प कर दिया जाता है जो दोषद है। बढ़ने पर आहुति की संख्या ही बढ़ा दी जाती है और इससे भी दोष ही उत्पन्न होता है। हवन की आहुति संख्या में “अधिकस्य अधिकं फलं” का नियम मान्य नहीं है। किन्तु प्रायः करते हैं यह भी स्वेच्छाचार की ही श्रेणी में आता है।
  • शाकल्य बच जाने पर प्रायः मनमुखी निर्णय ही लिया जाता है और उसका आधार “अधिकस्य अधिकं फलं” बनाया जाता है। आहुति निर्धारित संख्या से न कम होनी चाहिये और न ही अधिक। अधिक आहुति भी निषिद्ध है इसको भलीभांति समझें। कितना भी शाकल्य बचे आहुति बढ़ाई नहीं जा सकती बढ़ाने पर वह मनमुखी निर्णय होता है जो स्वेच्छाचार की श्रेणी में आता है और दोषद है।

कारण हवन विधान से अनभिज्ञता है, सीखते ही केवल रुद्री और सप्तशती का पाठ हैं, महामृत्युंजय जप के लिये माला पकड़ना। संगतिवश कुछ और तथ्य कालक्रम से ज्ञात होता जाता है, जब हवन विधान जाना ही नहीं तो अज्ञात ही है। अज्ञान होने भी बड़ी समस्या नहीं है बड़ी समस्या सुनने-जानने-सीखने की प्रवृत्ति का समापन है।

प्रायः २५ – ५० यजमान हो गये रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जप, सप्तशती पाठ करने लगे और पंडित उपाधि धारण कर लिये जिससे अहंकार जग गया एवं यदि किसी से सीखें-समझें तो वहां पांडित्य हनन का भाव उत्पन्न होता है कि ऐसे में तो ये मेरे गुरु सिद्ध हो जायेंगे और मैं शिष्य फिर मेरा पांडित्य दाव पर लग जायेगा। इस भाव का यथाशीघ्र त्याग आवश्यक है एक विद्वान के लिये भी, सामान्य कर्मकांडी की तो कोई बात ही नहीं है। वैसे विद्वानों में यह लक्षण होता भी नहीं है।

यहां भी शाकल्य की सिद्धि ही समिधा व चरु दोनों के अभाव में होती है अर्थात् विकल्प में अंतिम क्रम पर अवस्थित है। विधिपूर्वक की गईं ८ आहुति भी कल्याणकारी हो सकती है किन्तु अविधि से आठ करोड़ आहुति भी निरर्थक ही सिद्ध होगा यदि फल होगा भी तो अशुभ ही । आज ढेरों यज्ञ-महायज्ञ कहकर किये जा रहे हैं सभी (कुछ अपवादों को छोड़कर) निरर्थक ही हैं क्योंकि वहां कोई विधि है ही नहीं केवल स्वेच्छाचार दिखता है।

निष्कर्ष

ग्रहशान्ति अनुष्ठान में “दधि, मधु और घृताक्त समिधा” ही मुख्य और प्रधान आहुति द्रव्य है। वर्तमान काल में विलासप्रिय यजमानों और लालची व्यापारियों द्वारा यज्ञ की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए जो शाकल्य (हवन सामग्री) में स्वेच्छाचार पूर्वक नाना प्रकार के द्रव्य (कमलगट्टा, भोजपत्र, जटामसी आदि) मिश्रित किए जाते हैं, वह सर्वथा अशास्त्रीय और मनमुखी आचरण है। यहां इन द्रव्यों का निषेध नहीं किया जा रहा है अपितु ये द्रव्य वहीं प्रयुक्त हो सकते हैं जहां कहे गए हैं, जैसे दधि नवग्रह में विशेष रूप से वर्णित है तो अन्यत्र भी प्रयोग किया ही जायेगा ऐसा नहीं है।

FAQ

प्रश्न १: ग्रहशान्ति हवन का मुख्य और प्रधान आहुति द्रव्य शास्त्रों में क्या बताया गया है?

उत्तर: मत्स्यपुराण और भविष्यपुराण के अनुसार, नवग्रहों की विशिष्ट समिधाओं को घृत, मधु और दधि से भलीभाँति युक्त करके आहुति देना ही मुख्य और प्रधान पक्ष है।

प्रश्न २: नवग्रहों की विहित समिधाएँ कौन-कौन सी हैं?

उत्तर: शास्त्रों के अनुसार नवग्रहों की समिधाएँ क्रमशः इस प्रकार हैं: सूर्य हेतु अर्क (अकवन), चन्द्र हेतु पालाश, मंगल हेतु खदिर (खैर), बुध हेतु अपामार्ग (चिड़चिड़ी), गुरु हेतु अश्वत्थ (पीपल), शुक्र हेतु औदुम्बर (गूलर), शनि हेतु शमी, राहु हेतु दूर्वा और केतु हेतु कुशा प्रशस्त मानी गई हैं।

प्रश्न ३: समिधा का चयन करते समय किन दोषों (वर्जनाओं) का ध्यान रखना अनिवार्य है?

उत्तर: विष्णुधर्मोत्तरपुराण के अनुसार, समिधा प्रादेश मात्र (सीधी और गाँठ रहित) होनी चाहिए। जो समिधा ऊपर से शुष्क हो (भीतर गीली हो), पत्तों से युक्त हो, अथवा जिसकी छाल (त्वचा) निकल चुकी हो, वह सर्वथा निषिद्ध और वर्जित है।

प्रश्न ४: आहुति बच जाने पर पुरोहितों द्वारा अपनाए जाने वाले ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ के नियम का खण्डन क्या है?

उत्तर: हवन में आहुति की संख्या शास्त्रों द्वारा पूर्वनिर्धारित होती है (जैसे १०८ या २८)। यदि सामग्री बच भी जाए, तो मतिपूर्वक आहुति की संख्या बढ़ाना या घटाना घोर दोषपूर्ण है। निर्धारित संख्या से अधिक आहुति देना भी दोषद ही होता है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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