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अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द

अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द

“पालन नहीं करने और विकल्प ग्रहण करने में जो भेद है, उसे केवल प्रज्ञावान ही समझ पाते हैं, मूढ़ नहीं।”

हम सभी यत्र-तत्र “अधिकस्य अधिकं फलं” का प्रयोग करते ही रहते हैं और इसपर मंथन की आवश्यकता है क्योंकि इसके विरुद्ध प्रमाण भी प्राप्त है किन्तु “अधिकस्य अधिकं फलं” का मूल क्या है यह अज्ञात है। प्रामाणिक आधार पर “विस्तरो हि विघ्नकरः” सूत्र इसका खंडन करने वाला है और यह सूत्र कर्मकांडियों के लिये अधिक उपयोगी होगा। साथ ही दोनों के द्वन्द का भी समापन अपेक्षित है क्योंकि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध हैं। निःसंदेह यह चर्चा कर्मकांड की सिद्धि हेतु अतिशय महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे नहीं समझने के कारण कर्मकांड में दोष उत्पन्न होता है जो उसके फल का ही नाश कर देता है।

अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द

कर्मकांड में विधि जो कि शास्त्र में वर्णित हो उसका पालन करना अनिवार्य होता है और जब हम उसका पालन नहीं करते तो वहां शास्त्र-उल्लंघन स्वतः हो जाता है। पालन नहीं करने और विकल्प ग्रहण में अथवा सामर्थ्याभाव से प्रयोगान्तर होने में भेद है जो प्रज्ञावान समझ पाते हैं मूढ़ नहीं।

भरपेट भोजन करना, अधिक भोजन कर लेना या अल्प करना तीनों में ही अंतर है एवं अल्प व अधिक दोनों में ही समस्या है। भरपेट भोजन का तात्पर्य भी अनेकानेक भेद से भिन्न-भिन्न होता है यदि कहीं पर १६ ग्रास कहा गया है तो वहां १७ ग्रास करना शास्त्र का उल्लंघन हो जायेगा, यह विस्तार उस प्रयोग का ही नाश कर देगा जो किया जा रहा था। वहीं कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी पाचन क्षमता १०० ग्राम घी की हो और वह २०० ग्राम घृतपान कर ले अथवा १ किलो दुग्धपान की क्षमता वाला व्यक्ति यदि २ किलो दुग्धपान कर ले तो यह विस्तार निःसंदेह हानिकारक होगा।

अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरेण फलं नाशं का द्वन्द
अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द

यहां क्या अधिकस्य अधिकं फलं प्रयुक्त हो सकता है ?

कदापि नहीं और इस विषय को गंभीरता से समझना आवश्यक है।

यदि किसी की क्षमता १०० किलो भार उठाकर चलने की है तो क्या वह १५० किलो लेकर गंतव्य तक पहुंच पायेगा। उत्कृष्ट उदाहरण किसी पात्र की क्षमता यदि १० किलो है तो उसमें १५ किलो देने से उसका नाश ही होगा। यदि किसी बालक को “अ” सीखने में एक दिन लग रहा है और उसे एक ही दिन में “अ से ऋ” तक बता ही दें तो उसका नाश ही होगा, अगले दिन पुनः “आ” बताना होगा। कदाचित यदि एक ही दिन में “अ” के साथ “आ” भी सीख ले तो बड़ी नहीं होगी और ऐसा भी मेधावी नहीं मिलेगा कि एक ही दिन में “इ – ई” भी सीख जाये।

अर्थात यदि शिक्षक ने एक ही दिन में “अ से ऋ” तक बताया भी तो वह नष्ट ही हुआ। यहां “अधिकस्य अधिकं फलं” का यदि प्रयोग किया जाता है तो बालक के लिये अहितकर ही होता है।

यदि एक क्षेत्र में जल सींचना है और निर्धारित मात्रा से दोगुना कर दें तो उसका नाश ही होगा। यदि रोटी को सेंकना है और उसमें अधिक काल लगा दें तो रोटी ही जल जाएगी उसका नाश हो जायेगा। यदि भूजा तैयार कर रहे हैं और अग्नि और पात्र की क्षमता से अधिक धान्य दे दिया जाय तो वह कच्चा ही रह जायेगा अथवा भलीभांति उपयोगी नहीं होगा।

जहां धीमी आंच की आवश्यकता होती है वहां तेज करने से नाश हो जाता है। चूल्हे के अनुसार ही पाकपात्र भी प्रयोग किया जा सकता है, एक छोटे चूल्हे पर बड़ा कड़ाह चढाने से और उसमें कड़ाह के अनुसार द्रव्य देने से उसका नाश ही होगा अर्थात फल प्राप्ति नहीं होगी।

अर्थात “अधिकस्य अधिकं फलं” का वास्तविक तात्पर्य कुछ और है एवं यह कोई सामान्य नियम नहीं है कि सर्वत्र प्रयोग किया जा सके। कर्मकांड में ही “अधिकस्य अधिकं फलं” प्रयुक्त किया जाता है अस्तु इसे कर्मकांड में समझना होगा उपरोक्त उदाहरण इस विषय की गंभीरता को समझने मात्र के लिये प्रस्तुत किये गए।

मूल लेख और प्रामाणिक विमर्श

अत ऊर्द्ध्वं न कर्तव्यं अल्पारम्भ तु वर्जितम् । क्रिया विस्तारसंयुक्तं बहुविघ्नकरं भवेत् ॥
कालोत्तरम्

सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः । पञ्चैतान्विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥
मनु स्मृति/३/१२६

सामान्य रूप से अधिकस्य अधिकं फलं का अविवेकपूर्ण प्रयोग ही देखने को मिलता है, यह कहां का वचन है और संदर्भ क्या है यह तो ज्ञात है ही नहीं (मुझे भी), यदि किन्हीं को विदित हो तो अवगत करें एवं पूर्ण श्लोक भी प्रदान करें। सामान्यतः यह दान, नाम जप, संध्या में गायत्री जप (परिधिगत) एवं उन स्थानों पर प्रयोज्य प्रतीत होता है जहां संख्या/मात्रा आदि निर्धारित न हो।

इससे इतर जहां कहीं भी संख्या/मात्रा निर्धारित है वहां विस्तार को विघ्नकर कहा गया है। सत्क्रिया उपचार, जप, आहुति आदि, देश (मंडल, मंडप आदि), काल (निर्धारित से अधिक अथवा व्यतीत करना), शौच (शुद्धि विधान) और ब्राह्मण के लिये संपदा (संपत्ति के विस्तार से ब्राह्मणोचित कर्म का लोप होता है और दुष्परिणाम ब्राह्मणत्व की हानि) इनका विस्तार विशेषरूप से वर्जित किया गया है। ब्राह्मण के विषय में कृषि और वेद को एक दूसरे का नाशक कहा गया है एवं किसी एक का ही चयन करने के लिये कहा गया है, समर्थ के लिये दोनों भी कहा गया है ।

किन्तु मंडल/वेदी की चर्चा में अधिक, और अधिक ऐसी परम्परा सी चल पड़ी है, आहुति विषयक चर्चा कल हो चुकी है कि अधिक भी नहीं किया जा सकता। इसको इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि यदि खिचड़ी में नमक अधिक हो जाये या खीर में चीनी-दूध-चावल कुछ भी अधिक हो जाये तो वह रुचिकर नहीं रह जाता। तेल-घी में तला हुआ पूरी अच्छा तो लगता है किन्तु यदि उसमें तेल-घी प्रविष्ट हो जाये (अधिक हो जाये) तो अच्छा नहीं लगता।

इन उदाहरणों का कर्मकांड में भी आवश्यक विचार होना चाहिये यदि अधिकस्य अधिकं फलं जैसे पार्थिव पूजन के साथ वर्त्तमान में सत्यनारायण पूजा को एक प्रकार से जोड़ दिया गया है, वेदियां अनिवार्य (व्यावहारिक) होती जा रही हैं, भजन आदि के द्वारा काल का अनावश्यक विस्तार किया जाता है, विवाह में स्टेज प्रोग्राम, फोटो सेशन आदि का सीमा से अधिक विस्तार कर दिया गया है, श्राद्ध में काल, क्रिया (वास्तविक क्रिया और मन्त्र का लोप) और भोज का विस्तार कर दिया गया है, महामृत्युंजय पुरश्चरण में पूजा का विस्तार कर दिया गया है ऐसे सभी विस्तार नाशक ही हैं।

मूल लेख और प्रामाणिक विमर्श
मूल लेख और प्रामाणिक विमर्श

जहां दो बार आचमन कहा गया है वहां तीन बार नहीं किया जा सकता है।

यह एक मूल लेख है किन्तु इसमें कुछ ऐसे विषय (उदाहरण) सन्निहित किये गए हैं जो सामान्यतः देखने को मिलता है जैसे : महामृत्युञ्जय जप अनुष्ठान में पूजा का विस्तार करना, श्राद्ध (द्वादशाह) में एक-एक मासिक करके क्रिया का विस्तार करना, भजन आदि का अत्यधिक प्रयोग करना आदि।

ये विस्तार बहुधा देखने को मिलता है और करने वालों की दो श्रेणी होगी; प्रथम वो जो उचित तथ्य को समझकर त्रुटि से बचने का प्रयास करते हों और द्वितीय वो प्रज्ञाविहीन होंगे, अथवा वेदादि पाठ और कर्मकांड का सामान्य ज्ञान (अक्षत-पुष्पादि चढ़ाना) रखते हों और पंडित के रूप में प्रतिष्ठित हों और इसी कारण स्वीकारने में समस्या होगी और दुराग्रह के वशीभूत होकर प्रमाण को भी अस्वीकारने का दुस्साहस करेंगे किन्तु यदि सम्यक खंडन करने कहा जायेगा तो नहीं कर सकेंगे। यदि कोई सम्यक खंडन करने में समर्थ होंगे तो ऐसे विद्वान खंडन न करके इसके विरुद्ध जो प्रमाण होगा; दोनों में संगति स्थापित करने का ही प्रयास करेंगे।

यहीं पर सूत्र सिद्धि होती है “विस्तरो हि विघ्नकरः” और अन्यत्र के लिये कैसा क्या भाव होगा वो भिन्न विषय है किन्तु कर्मकांड में यह सिद्धांत के समान है तो “अधिकस्य अधिकं फलं” के विरुद्ध है, दोनों में संगति स्थापन अपेक्षित है।

“विस्तरो हि विघ्नकरः”

“अज्ञान होना बड़ी समस्या नहीं है, सबसे बड़ी समस्या तो सुनने, जानने और सीखने की प्रवृत्ति का समूल समाप्त हो जाना है।”

विस्तार को भलीभांति न समझें तो भ्रम उत्पन्न होगा जो कि सामान्यतः सभी विषयों में होता ही है। कुछ ऐसे तथ्य जो विषय के संबंध में भ्रामक होंगे – रुद्र, लघुरुद्र, महारुद्र, अतिरुद्र इस विस्तार में नहीं गिना जायेगा यद्यपि रूद्र का भी विस्तार अन्यान्य हैं किन्तु सभी भिन्न प्रयोग हैं और निर्द्दिष्ट हैं। राम ने सौ अश्वमेध यज्ञ किये तो यह विस्तार नहीं है क्योंकि एक-एक करके ही किये न। विस्तार नहीं है का तात्पर्य प्रसंगानुकूल विस्तार से है। प्रसंगानुकूल विस्तार का अर्थ इस प्रकार समझने का प्रयास किया जा सकता है :

विस्तरेण फलं नाशं
विस्तरो हि विघ्नकरः
  • १० बार गायत्री जप (करमाला) से करने के लिये प्रवृत्त हुआ है तो ११ करना विस्तार होगा।
  • जहां दो बार आचमन कहा गया है वहां ३ बार करना विस्तार होगा।
  • जहां तीन बार गायत्री जप निर्द्दिष्ट है वहां १० बार करना विस्तार होगा।
  • जहां तीन बार देवताभ्यः कहा गया है वहां ४ – ५ बार करना विस्तार होगा।
  • जहां तीन ब्राह्मण कहा निर्द्दिष्ट है वहां ४ करना विस्तार होगा।
  • जहां अष्टोत्तर शताहुति निर्द्दिष्ट है वहां १११ करना विस्तार होगा।
  • जहां रुद्रजप कहा गया है वहां संहिता पाठ करना विस्तार होगा।
  • जहां १० बार स्नान कहा गया है वहां ११ बार करना विस्तार होगा।
  • जहां केवल घृत निर्द्दिष्ट है वहां त्रिमधु करना विस्तार होगा।
  • जहां सप्ताह कहा गया है वहां नवाह करना विस्तार होगा।
  • जहां दशाहाशौच निर्द्दिष्ट है वहां एकादशाहाशौच करना विस्तार होगा।
  • जहां त्र्यहाशौच कहा गया है वहां दशाहाशौच करना विस्तार होगा।
  • जहां सद्यःशौच कहा गया है वहां एकाहाशौच करना विस्तार होगा।
  • जहां पल मात्र कहा गया है वहां २ पल करना विस्तार होगा।
  • जहां प्रदोषकाल में कहा गया है वहां निशीथपर्यन्त करना विस्तार होगा।
  • यदि एकादशिनी का प्रयोग करना हो तो उसमें रुद्राध्याय की एक आवृत्ति बढ़ा देना विस्तार हो जायेगा। लघुरुद्र करने में एकादशिनी का ११ प्रयोग विस्तार नहीं कहलायेगा।
  • यदि शतचण्डी प्रयोग की बात की जाये तो मुख्य पक्ष सौ आवृत्ति ही है। अष्टोत्तरशतावृत्ति भिन्न प्रयोग है।

इस प्रकार यहां जो स्पष्ट हो रहा है कि कर्मकांड के अन्तर्गत सभी प्रयोगों में क्रिया, काल, देश, शौच, ब्राह्मणसंख्या आदि भी निर्द्दिष्ट होते हैं एवं उसका विस्तार नहीं करना चाहिये। यह विस्तार उस प्रयोग के लिये न हो न कि भिन्न प्रयोग भी तदनुसार ही हो। जैसे शतचण्डी प्रयोग को देखें आवृत्ति कहें अथवा दिन की संख्या या पाठक ब्राह्मणों की संख्या सभी निर्द्दिष्ट हैं। अब यदि ब्राह्मण संख्या का ही विस्तार कर लें तो वह फल का नाशक होगा। १० पाठक ब्राह्मण के स्थान पर ११ रखें तो यह विस्तार कहलायेगा। प्रयोगभिन्न में भिन्न विधान होने पर वो भी तदनुसार ग्राह्य।

श्राद्ध में ब्राह्मण की संख्या देव-पितृ आदि के लिये निर्धारित है और अभाव में भी विधान है। किन्तु निर्धारित होने का तात्पर्य यह है कि देव के निमित्त दो-दो और पितृ के निमित्त तीन-तीन अधिकतम है। भोज का विधान भिन्न है और श्राद्ध में विधान जो है वह उससे भिन्न है। यदि अधिकस्य अधिकं फलं का आश्रय लेकर देव हेतु २ के स्थान पर ३ और पितृ के निमित्त ३ के स्थान पर ५ कर दिया जाय तो यह विस्तार होगा। इसी प्रकार देश-काल-शौच-क्रिया आदि भी निर्द्दिष्ट है व उसका विस्तार भी निषिद्ध है।

इस प्रकार यदि एक ओर “अधिकस्य अधिकं फलं” है तो दूसरी ओर “विस्तरो हि विघ्नकरः” भी है और शास्त्रोक्त कर्मों में ही नहीं अपितु सामान्य जीवन में भी यह घटित होता ही रहता है। “अधिकस्य अधिकं फलं” का प्रयोग वहीं किया जा सकता है जहां “विस्तरो हि विघ्नकरः” घटित न हो।

  • विस्तार विघ्नकारक होगा यह तो निश्चयात्मक पक्ष है।
  • विस्तार (केवल विस्तार) के फल का नाश होगा यह भी निश्चयात्मक ही है।
  • किन्तु सम्पूर्ण कर्म का फल नष्ट होगा यह निश्चयात्मक नहीं है। यद्यपि यह परिस्थति विशेष पर भी निर्भर करेगा कि क्या केवल विस्तार मात्र निष्फल होगा अथवा सम्पूर्ण ।

जैसे हवन में यदि आहुति संख्या विस्तार की बात करें तो यहां केवल विस्तार निष्फल होगा और उससे दोष भी उत्पन्न होगा जिसका शमन किया जायेगा। आहुति संख्या में न्यूनाधिक्यता होना संभव है इस कारण दोष उत्पन्न होगा और दोषशमन का भी विधान विद्यमान है। अस्तु जहां दोष उत्पन्न होना सदैव संभावित हो और दोष शमन का विधान हो तो उस स्थिति में केवल विस्तार मात्र ही निष्फल होगा, दोष शमन करने पर ।

वहीं यदि पार्थिवपूजन की बात करें तो स्वाभाविक रूप से अधिकस्य अधिकं फलं करके पार्थिव संख्या की वृद्धि करने की परम्परा सी बन गई है। यहां क्या दोष भी उत्पन्न होगा अथवा केवल विस्तार (वृद्धि मात्र) निष्फल होगा। निर्द्दिष्ट संख्या से अधिक जो वृद्धि हुई हो वह निष्फल होगा यह तो निश्चित है किन्तु यहां दोषादि का शमन क्षमाप्रार्थना आदि से हो जायेगा। ये अर्चन की अपनी विशेषता होती है “मूर्खो वदति विष्णाय” यदि इसमें भी दोष नहीं है तो वहां भी क्षम्य अवश्य होगा। हां लिंग प्रमाण का विस्तार अधिक दोषद होगा वर्तमान में बहुत बड़े-बड़े आकार के महादेव बनाये जाने लगे हैं उनमें नाक-मुंह-आंख-मूंछ आदि भी बनाये जाते है, ये पूर्णतः आडम्बर है दोषकारक है।

यदि श्राद्ध में काल का विस्तार किया जाय और अतिक्रमण करते हुये निर्धारित काल के पश्चात् सायाह्न – रात्रि में करे तो वहां सम्पूर्ण कर्म ही निष्फल हो जाता है और मात्र निष्फल या आसुरी ही नहीं होता अपितु दुष्परिणाम भी होता है। यहां अन्य समाधान यह प्राप्त होता है कि पूर्व में आरम्भ कर्म अथवा विघ्न-प्रमादादि से विलम्ब हो तो करे अर्थात मतिपूर्वक न करे। मतिपूर्वक उचित काल में ही करे, जहां कर्मलोप न हो इस भाव से विलम्ब होने पर भी किया जायेगा वहां दोषभाव होगा।

कालातीतं तु यत्कुर्याच्छ्राद्धं होमं जपं तथा। व्यर्थीभवति तत्सर्वं अमृते तु विषं यथा ॥
शातातप (स्मृतिचन्द्रिका श्राद्धकाण्ड)

इस प्रकार से विस्तार होने पर विभिन्न परिस्थतियों में विभिन्न प्रकार से विचार करना होगा और “अधिकस्य अधिकं फलं” में तो विशेष सावधानी की आवश्यकता होगी।

व्यावहारिक समस्या

वर्त्तमान में एक व्यावहारिक समस्या है कि “अधिकस्य अधिकं फलं” निर्विरोध समझा जाने लगा है और इसका अभ्यास भी हो गया है। साथ ही अन्यान्य कर्मों में विशेष कर पूजन में और उसमें भी शिवपूजन, महामृत्युंजय जप आदि में आडम्बर बढ़ता ही जा रहा है। यहां समस्या यह है कि जो आडम्बर करने वाले हैं उनके लिये स्वीकार करना कठिन ही नहीं दुष्कर है एवं नाना प्रकार से कुतर्क करके इस तथ्य को नकारने का ही प्रयास करेंगे। यह एक प्रकार से शास्त्र को अस्वीकार करने के ही समान है और इसका कारण स्वार्थी और मदांध (पांडित्य का अहंकार) होना है, आडम्बर करते हैं अस्तु पाखंडी तो हैं ही।

किन्तु सभी ऐसे नहीं होते कुछ शास्त्रनिष्ठ भी होते हैं उन्हें स्वीकारने में समस्या नहीं होगी, वो ऐसे विषयों के प्रति सजग रहते हैं और सदैव प्रयत्नशील रहते हैं कि उनसे कोई दोष न हो। किन्तु यही तथ्य स्वयं के प्रति स्वीकार करेंगे क्योंकि ज्ञात होने के पश्चात् भी मतिपूर्वक करें तो बड़ा दोष होगा और दुष्परिणाम की सिद्धि होगी। यदि यजमान समझ जाये तो भी स्वीकारना ही होगा। किन्तु वर्त्तमान की तो यह चिंता है ही, स्वीकार करें अथवा न करें परवर्ती इस विषय को गंभीरता से ग्रहण करेंगे यह विश्वास है।

इसी प्रकार यहां केवल कुछ विषयों पर ही निष्कर्ष किया गया है, सभी विषयों पर विमर्श तो किया नहीं जा सकता और निष्कर्ष हेतु विवेक की आवश्यता होगी।

निष्कर्ष

मूल निष्कर्ष यह है कि कर्मकाण्ड में “अधिकस्य अधिकं फलं” कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है, अपितु जहाँ संख्या, मात्रा, काल और विधि पूर्वनिर्धारित हैं, वहाँ यह नियम सर्वथा वर्जित और आत्मघाती है। कालोत्तरम् के साक्ष्य ‘क्रिया विस्तारसंयुक्तं बहुविघ्नकरं भवेत्’ तथा मनुस्मृति के अनुसार क्रिया, देश, काल, शौच और विप्रसंख्या का अनावश्यक विस्तार साक्षात् ‘फल का नाशक’ (विस्तरो हि विघ्नकरः) होता है।

जहाँ दो बार आचमन विहित है वहाँ तीन बार करना, जहाँ १० बार गायत्री जप नियत है वहाँ ११ बार करना — यह सब ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ के अविवेकपूर्ण दुराग्रह जनित विकार हैं। ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का क्षेत्र केवल परिधिरहित नाम-जप, मानसिक ध्यान और दान तक ही सीमित है। अतः नियत वेदोक्त मर्यादा के भीतर ‘बिन्दुवत् शुद्धता’ से अनुष्ठान करना ही अभीष्ट फल की सिद्धि का एकमात्र मार्ग है, अन्यथा सीमा से अधिक विस्तार यज्ञ को साक्षात् निष्फल बना देता है।

FAQ

प्रश्न १: कर्मकाण्ड में “अधिकस्य अधिकं फलं” के नियम का अविवेकपूर्ण प्रयोग क्यों हानिकारक है?

उत्तर: क्योंकि कर्मकाण्ड के सभी अनुष्ठान देश, काल, मात्रा और मन्त्र संख्या से पूर्णतः बद्ध होते हैं। वहाँ अपनी मर्जी से मात्रा बढ़ाना शास्त्रों की मर्यादा का उल्लंघन (शास्त्र-उल्लंघन) है, जिससे पूरा कर्म विकृत हो जाता है।

प्रश्न २: “विस्तरो हि विघ्नकरः” सूत्र की स्थापना किस शास्त्रीय आधार पर की गई है?

उत्तर: इस सूत्र की स्थापना मनुस्मृति (३/१२६) के ‘पञ्चैतान्विस्तरो हन्ति’ तथा कालोत्तरम् के वचन ‘क्रिया विस्तारसंयुक्तं बहुविघ्नकरं भवेत्’ के आधार पर की गई है, जो स्पष्ट करते हैं कि विहित मर्यादा से अधिक विस्तार करने से विघ्न उत्पन्न होता है।

प्रश्न ३: ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का नियम वास्तव में शास्त्रों में कहाँ और किस संदर्भ में प्रयोज्य है?

उत्तर: यह नियम केवल उन स्थानों पर प्रभावी होता है जहाँ संख्या या परिमाण निर्धारित न हो; जैसे—असीमित नाम-जप, मानसिक कीर्तन, देव-चिन्तन और सात्त्विक दान-पुण्य की क्रियाओं में, न कि नियत वेदोक्त यज्ञीय आहुतियों में।

प्रश्न ४: क्या सामग्री बच जाने पर आहुति की संख्या बढ़ाई जा सकती है?

उत्तर: कदापि नहीं। यदि सामग्री बच भी जाए, तो ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का कुतर्क देकर आहुति की संख्या बढ़ाना मनमुखी निर्णय है। निर्धारित संख्या (जैसे १०८ या २८) पर ही पूर्णाहूति होनी चाहिए; अधिक आहुति देना यज्ञ को आसुरी बना देता है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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