“अयोग्यों से शास्त्र साक्षात् भयभीत होते हैं और अपना रहस्य गुप्त रख लेते हैं, ऐसे ही लोग ‘शास्त्रदस्यु’ कहलाते हैं।”
क्या गीता का ज्ञान भी भ्रमित करने वाला है ? यह प्रश्न विचारणीय इसलिये है क्योंकि जहां देखो जिसे देखो गीता के ही एक श्लोक-वचन आदि से निर्णय देते रहता है, कोई हिंसा में दोष नहीं होने का तो कोई याज्ञिक बलि को भी हिंसा सिद्ध करने तो कोई अन्य वर्णवयवस्था के जन्मना सिद्धांत को खंडित करते हुये कर्मणा सिद्ध करने लगता है। ऐसे में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या यह गीता का ज्ञान दिग्भ्रमित करने वाला है ? आलेख में उदाहरण, प्रमाणों सहित इस विषय का विस्तृत विश्लेषण किया गया है एवं अपण्डित/शास्त्रदस्यु को धिक्कारा गया है, कटुनिन्दा की गयी है क्योंकि ये लोग सम्मान के पात्र ही नहीं हैं।
क्या गीता का ज्ञान भी भ्रमित करने वाला है ?
सर्वप्रथम विद्वद्जनों/शास्त्रज्ञों से विनम्र निवेदन है कि कृपया अपण्डित/शास्त्रदस्यु के प्रति हुये दुत्कारात्मक वचनों का स्वयं के लिये ग्रहण न करें, जो पूज्य हैं उनको नहीं दुत्कारा गया है, दुत्कारा उसे गया है जो अपण्डित/शास्त्रदस्यु होकर स्वयं को पण्डित के रूप में प्रतिष्ठित करते हुये शास्त्रविरुद्ध ही कहता, सुनता और करता भी है, शास्त्रसम्मत न तो कहता है न ही सुनता है और न ही किसी अन्य को भी करने देना चाहता है। ये निन्दनीय हैं, धिक्कार के योग्य हैं, सम्मान के पात्र नहीं हैं। हां अशास्त्रज्ञों के समूह में अवश्य ही पूज्य होंगे और अयोग्य होते हुये भी सम्मान प्राप्त कर लेते हैं जो अपच हो जाता है और भ्रष्ट कर देता है।
सामान्य पुरोहित अथवा सामान्य कर्मकांडी जिसे स्वयं ही ज्ञात होता है कि वो शास्त्रज्ञ नहीं है उसमें यह दोष नहीं होता, वो स्वयं शास्त्रीय/प्रामाणिक चर्चा नहीं कर सकता ये सत्य है किन्तु सुनता भी नहीं ऐसा नहीं है, अन्य विद्वानों से पूछता है, सुनता है और कहीं पर शास्त्रसम्मत चर्चा हो तो उसमें विघ्न भी नहीं करता। ये अपण्डित/शास्त्रदस्यु की श्रेणी में नहीं आते कारण कि इस वास्तविकता को वो स्वीकारते हैं।
यद्यपि कुछ कठिनाईयां हैं जिसके कारण पुरोहितवर्ग की स्वतंत्र कर्मकाण्डीय धारा भी होती है। इसका कारण यह होता है कि पुरोहित को नवरात्रा में ५ – १० – १५ – २५ तक यजमान को सम्हालना होता है और सभी यजमान सक्षम हो तो भी उतने योग्य ब्राह्मण ही नहीं कि सबका शास्त्रीय मर्यादा में कर्मकांड संपादन किया जा सके। कुछ अपवादस्वरूप ही होते हैं जो मदांध हो जाते हैं, सामान्यतः नहीं।
अपण्डित/शास्त्रदस्यु जिसे कहा जा रहा है उसको स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जा सकता है।
ये वर्ग मुख्य रूप से वैसे अपण्डितों का समूह है जो व्याकरण/साहित्य/ज्योतिष आदि विषयों से आचार्य की डिग्री धारण करने वाले होने के कारण शिक्षक/प्राध्यापक आदि (सरकारी सेवक) बन जाते हैं और इसके फलस्वरूप स्वयं को कर्मकांडी पण्डित के रूप में भी स्थापित कर लेते हैं। ये लोग कर्मकांड और शास्त्र के विषय में रत्तीभर ज्ञान नहीं रखते हैं हां व्याकरणाचार्य हो सकते हैं, ज्योतिषाचार्य हो सकते हैं, साहित्याचार्य हो सकते हैं अर्थात अपने विषय के ज्ञाता हो सकते हैं।

ऐसे-ऐसे वैयाकरण भी होते हैं जो स्वयं को वैयाकरणी कहते हैं। जैसे ज्योतिष का ज्ञाता ज्योतिषी उसी प्रकार व्याकरण का ज्ञाता व्याकरणी वा वैयाकरणी।
विद्वान का अर्थ अपने विषय का ज्ञाता होना नहीं होता और ऐसे व्याकरणाचार्यों को आप कर्मकांड कराते तो देखते होंगे किन्तु ये वेदमंत्रों का पाठ नहीं कर पाते। इनके अपण्डित/शास्त्रदस्यु होने का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि ये लोग वेदमंत्रों का पाठ नहीं कर पाते। हां शब्दों की व्याख्या-व्युत्पत्ति आदि कर सकते हैं तो वही करें न, कर्मकांडी क्यों बन जाते हैं जबकि कर्मकांड में वृत्तिवश अग्राह्य हो जाते हैं, सेवावृत्ति (सरकारी सेवक या जनसेवक) होने के कारण ये अग्राह्य हो जाते हैं।
इनकी तो बात जाने दीजिये जो गुरुकुल में भी धन प्राप्त करके अध्यापन करने वाले प्राध्यापक होते हैं उन्हें भी अग्राह्य कहा गया है। गुरुकुल में जो ऐसे अध्यापक होते हैं शास्त्रों में उन्हें भृतकाध्यापक/वृतकाध्यापक कहा गया है और निन्दित/अग्राह्य भी कहा गया है।
भृतकाध्यापकः क्लीबः कन्यादूष्यभिशस्तकः । एते विप्राः सदा त्याज्याः परिभाव्य प्रयत्नतः ॥
स्कंदपुराण, खण्ड ५ (अवन्ती/रेवाखण्ड), ५०/१०
अभिशस्तस्तथा स्तेनः पिशुनो ग्रामयाजकः । वृतकाध्यापकस्तदूदूभृतकाध्यापितश्च यः ॥
विष्णुपुराण/तृतीयांश/१५/७
तथा देवलकश्चैव भृतको वेदविक्रयी। एते वर्ज्याः प्रयत्नेन एवमेव यमोऽब्रवीत् ॥
बृहद्यम स्मृति ३/३४
सप्रमाण यह स्पष्ट हो चुका है कि ये लोग भोजन/दान/दक्षिणा आदि के अधिकार से वंचित होते हैं और शास्त्रों में ही ऐसा निर्णय है। तो किस अधिकार से ये लोग कर्मकांडी बनते हैं। ये जिस कला में निपुण होते हैं उसका नाम है प्रियवक्ता और मधुरवक्ता जिसका तात्पर्य असत्यवक्ता भी होता है। सत्य न बोलना भी असत्य बोलने के समान ही दोषपूर्ण होता है।
एक शास्त्रज्ञ प्रियवक्ता/मधुरवक्ता नहीं हो सकता क्योंकि उसे सत्य और शास्त्रसम्मत ही बोलना होता है अर्थात वो सत्यवादी होता है किन्तु उसका सत्य लोगों को अप्रिय/कटु भी लग सकता है। जैसे यहां मेरा सत्यवचन मधुर तो नहीं है, इन भृतकाध्यापकों को कटु लगेगा।
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥
मनुस्मृति, गरुडपुराण, स्कन्दपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण आदि
उपरोक्त वचन भी शास्त्र का ही है और प्रमाण है किन्तु यह एक विद्वान को सत्यलोप करने की छूट नहीं देता। ये सामान्य जीवन और व्यावहार में चारों वर्णों का सामान्य नियम है और धर्म है। किन्तु एक शास्त्रज्ञ के लिये शास्त्रीय चर्चा में यह वचन प्रयुक्त नहीं होता। ब्राह्मणों के लिये धर्म के सर्वाधिक कठोर नियम भी हैं और सामान्य नियमों से छूट भी है अर्थात सामान्य जनों के लिये सामान्य व्यवहार में जो पाप है शास्त्रज्ञ ब्राह्मण को उसमें छूट है।
जैसे किसी के पाप की चर्चा सुनने में भी पाप है अर्थात सुने भी न, किन्तु शास्त्रज्ञ ब्राह्मण को छूट है क्योंकि प्रायश्चित्त वही प्रदान करेंगे। यदि वो पाप सुनेंगे नहीं तो उसके प्रायश्चित्त का विधान कैसे करेंगे और यदि प्रायश्चित्त प्रदान नहीं करेंगे तो पापी के पाप का शमन कैसे होगा ? अर्थात सामान्य जनों की भांति शास्त्रज्ञ भी किसी के पाप की चर्चा न करे न सुने किन्तु प्रायश्चित्त के इच्छुक का पाप भलीभांति सुने, उसका सम्यक विचार करे और शास्त्रसम्मत प्रायश्चित्त प्रदान करे इसमें वह पाप का भागी नहीं होगा अपितु पापी का पाप नष्ट होगा।
इसी प्रकार एक विद्वान ब्राह्मण सामान्य चर्चा में तो प्रियवक्ता बने, कटुवचन न बोले, असत्य भी न बोले आदि सामान्य नियम है किन्तु जब चर्चा शास्त्र/धर्म/कर्मकांड के विषयों की हो तो वहां सत्य ही बोले भले ही वो कितना भी कटु क्यों न हो, वहां सत्य का लोप भी न करे। एक परिस्थिति में छूट है और वो है भय होने पर :
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥
यदि भयवश प्रिय बोलने के लिये बाध्य हो तो वह दोषी नहीं होगा अपितु जिससे भयभीत होकर सत्य नहीं बोलता है, प्रिय बोलता है उस भयाक्रांत रखने वाले व्यक्ति के धर्म का नाश होगा।
ये जो भृतकाध्यापक होते हैं ये भयवश नहीं, लोभवश प्रिय असत्य बोलते हैं, शास्त्रविरुद्ध बोलते हैं और करते भी हैं। इनका सबसे बड़ा असत्य और शास्त्रविरुद्ध आचरण तो यही है कि ये अनधिकारी होकर भोजन/दान/दक्षिणा आदि लेते हैं अर्थात कर्मकांडी बन जाते हैं। ये सम्मान/धन आदि के लोभ से ही कर्मकांडी बनते हैं न !
ब्राह्मण का वचन ही शासन है
ऐसे ही अपण्डित शास्त्रदस्यु जब शास्त्रों की तनिक चर्चा करें भी तो वहां भी दिग्भ्रमित करने का ही प्रयास करते हैं क्योंकि प्रियवक्ता भी तो बने रहना है, मधुरभाषी भी तो कहलाना है। लेकिन जैसे ही प्रियवक्ता और मधुरभाषी बनते हैं शास्त्रज्ञ होने का लोप हो जाता है। जिसका वचन ही शासन हो वो प्रियवक्ता और मधुरभाषी हो कैसे सकता है, यदि हो गया तो शासन कैसे करेगा। शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण का वचन ही शासन होता है। वास्तविक शासक शास्त्र ही हैं और शास्त्र के आधार पर व्यावहारिक रूप से वो अधिकार ब्राह्मण को हस्तांतरित होता है इस कारण ब्राह्मण का वचन ही शासन है।

ये शास्त्रदस्यु/अपण्डित शास्त्रज्ञान से रहित होने के कारण प्रियवक्ता और मितभाषी बनते हैं। प्रत्येक समाज में हर काल में कोई न कोई विद्वान होते ही हैं किन्तु वो न तो मितभाषी होते हैं न ही प्रियवक्ता सामान्य व्यवहार के अतिरिक्त। चूंकि शास्त्रीय विषय में वो अप्रियसत्यवक्ता होने के अभ्यासी हो जाते हैं इस कारण सामान्य व्यवहार में भी वही परिलक्षित होता है।
यदि ब्राह्मण का वचन ही शासन है और मूल शासक शास्त्र है तो ब्राह्मण को सुयोग्य भी होना अनिवार्य है। ज्ञान का अभाव होने पर शास्त्रदस्यु बनना एक प्रकार से सुनिश्चित ही होता है। क्योंकि ऐसे अनेकानेक उदाहरण यत्र-तत्र दिखते ही रहते हैं, आपने भी कई लोगों के मुख से किसी शास्त्रीय विषय पर सुना ही होगा : “जो कह दिया सो कह दिया”
इन शास्त्रदस्यु/अपण्डितों को चिह्नित करना, दुत्कारना अपेक्षित था क्योंकि विषय जो है वो यहीं से आरम्भ होता है। जो प्रश्न है उसका उत्तर इनसे ही सम्बंधित है। प्रश्न और उत्तर को समझने के लिये एक व्हाट्सप समूह के कुछ संदेशों को यथावत प्रस्तुत करना होगा जो इस प्रकार हैं :
सभी विद्वत जनों को साष्टांग प्रणाम स्वीकार हो।
आज एक भारी भयंकर समस्या हो गई। है। जिस से मुझे बहुत दुख हो रहा है। और बात ये है कि।। हमारे घर के बाहर दरवाजा के ऊपर जो छज्जा होता है। उस पे कुछ दिनों पहले कबूतर ने अंडे दे दिए थे। तो उस जब भी बच्चे निकले तो ।। एक आज बच्चा नीचे गिर गया।।
और तो बाहर जब आस पड़ोस के बच्चे उसे उठाकर खेलने लगे ।। और कुछ देर बाद मेरे पास ले आये।। और जब मैने सोचा की जब ये बच्चे घर चले जायेंगे तब।। इसे कुत्ते या बिल्ली खा जाएंगे।। तो ये सोचकर मेने उसे थोड़ा ऊपर उछाल कर वापस उसी छज्जे पर डालने की कोशिश की। तो नीचे आ गिरा।। उसी तरह फिर से डालने के कोशिश की तो।। फिर से नीचे आ गिरा।। और मर गया ।।
कृपया दंड विधान ओर प्रायश्चित बताने की कृपा।। करें।।
मुझे बहुत आत्मग्लानि हो रही है।।।
(ये एक प्रश्नकर्ता का प्रश्न है जिसका उत्तर एक अशास्त्रज्ञ/शास्त्रदस्यु ने इस प्रकार दिया) :
मृत्यु का एक निश्चित समय,निश्चित माध्यम, निश्चित कारण होता है
तुम माध्यम बने, कारण भी तुम्हारे द्वारा निश्चित था और मृत्यु का समय भी तुम्हारे द्वारा निश्चित तय था इसलिए
ज्यादा सोचने समझने की कोई जरूरत नहीं है
जीवन और मृत्यु का निश्चित कारण,माध्यम,और निश्चित समय जरूर होता है
बाकी तुम खुद समझदार ही हो
(ये गीता का ही ज्ञान बघारना है जो एक शास्त्रदस्यु ने बघारा, ऐसे वचनों को यत्र-तत्र गीता का ज्ञान कहकर ही प्रचारित किया जाता है। ऐसा उत्तर प्राप्त होने पर प्रश्नकर्त्ता ने पुनः उत्तर इस प्रकार दिया) :
परंतु भीष्म पितामह ने भी सर्प के भले के लिए ही दूसरी ओर फ़ेंकन चाहा था।। परंतु वह कांटो में जा गिरा ।। और काँटे उसके शरीर मे धंसे ओर वह ओर तडपकर मरा। फलस्वरूप भीष्म पितामह। । को तीरों की शय्या पर लेटना पडा।। कृपया प्रायश्चित बताईये।।
(गीता का ज्ञान बघारने वाले को मैंने भी वहां इस प्रकार प्रत्युत्तर प्रदान किया) :
अनुचित वक्तव्य, विषयांतरित और भ्रमित करने वाला ।
ऐसे में पाप का दोष निर्णायक को भी।
यहीं से यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या गीता का ज्ञान भी दिग्भ्रमित करने वाला होता है ? वास्तव में उसका जो गीता का ज्ञान था वो रणक्षेत्र में पीठ दिखाने वाले अर्जुन के प्रति भगवान श्री कृष्ण का हो सकता है, यथावत नहीं भिन्न शब्दों में भी। रणभूमि के युद्ध करना ही क्षात्रधर्म होता है, पीठ दिखाना या पीछे हटना अधर्म। वहां हिंसा का विचार नहीं किया जा सकता। किन्तु यह नियम रणभूमि हेतु है प्रश्नकर्त्ता का प्रश्न सामान्य जीवन की घटना से सम्बंधित था किन्तु उत्तरदाता ने गीता का ज्ञान बघार दिया।
इसी प्रकार एक व्हाट्सप समूह में विस्तार निषेध सम्बन्धी प्रामाणिक चर्चा करने पर एक मदांध प्रमाण तक को ही अस्वीकार नहीं किया अपितु कर्मकांड को भी आडम्बर कहने से नहीं चूका। कारण ज्ञान का मद और स्वयं भी बारम्बार उद्घोषित कर रहा था कि वो ज्ञानी है। ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात् अन्य विषय (कर्मकांड आदि) आडम्बर ही होते हैं और प्रमाणस्वरूप गीता का वचन भी प्रस्तुत कर देता है :
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
कई बार वास्तव में विभिन्न दोषों से उत्पन्न अविद्या इस प्रकार ग्रास बनाती है कि शास्त्र का अध्ययन करके भी अनर्थ ही करते रहते हैं। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि जो शास्त्र का अध्ययन करता है शास्त्र उसे अपना रहस्य प्रकट कर ही देते हैं अपितु वास्तविकता यह है कि अयोग्यों से शास्त्र भयभीत ही होते हैं और अपना रहस्य गुप्त ही रखते हैं एवं ऐसे के प्रति ही शास्त्रदस्यु प्रयुक्त होता है। गीता में ही तो कहा गया है :
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
अब यदि गीता के अनुसार (उपरोक्त दोनों वचनों के आधार पर) विचार करें तो स्पष्ट होता है कि आत्मज्ञानी का वेदादि में भी प्रयोजन शेष नहीं रहता किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि वो वेदादि निंदा करे, कर्मकांड को आडम्बर कहे, स्वेच्छाचार में प्रवृत्त हो जाये। आत्मज्ञान होने के पश्चात् भी कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता अर्थात कर्म में प्रवृत्त होना ही पड़ेगा तो किस प्रकार करे शास्त्रमर्यादित अथवा स्वेच्छाचार से ?
ऐसे ढेरों व्यक्ति आपको देखने को मिलेंगे जो कहेंगे अब मुझे कुछ भी आवश्यक नहीं, मैं मुक्त हूँ, ज्ञानप्राप्त हूँ, भगवान हूँ और शास्त्रीय मर्यादा का पालन नहीं करते हैं। यहां यह सिद्ध होता है कि वह स्वेच्छाचारी बनने के लिये स्वयं को मुक्त/ज्ञानी आदि सिद्ध करता है। जब भगवान स्वयं अवतरित होते हैं तो शास्त्रीय-मर्यादा को अंगीकार करते हैं, स्वेच्छाचार में प्रवृत्त नहीं होते।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
ढेरों लोग मिलेंगे जो उक्त गीता के वचन से ही कहते फिरते हैं कि गुण और कर्म के आधार पर चारों वर्णों को उत्पन्न किया अस्तु जो जिस कर्म को करेगा उसका वही वर्ण हो जायेगा। और यह भाव गीता के ही अन्य वचन से खंडित हो जाता है – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”; कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कदापि नहीं।
किन्तु कुछ नीच/पापी पहले ही फल में अधिकार सिद्ध कर लेते हैं उसके पश्चात् कर्म में प्रवृत्त होना बताते हैं। किसी भी वर्ण-जाति में जन्म हुआ हो जिसके पास कर्मकांड कराने का ज्ञान होगा वह कर्मकांडी ब्राह्मण बन सकता है दुष्ट इसी प्रकार की बकवास करते हैं।
अरे दुर्मति वर्ण-जाति तो जन्म से निर्धारित है कि तदनुसार गुण को धारण करेगा और कर्म में प्रवृत्त होना चाहिये और वह भी फल में अधिकार का भाव त्याग करके। यदि तुम प्रथम किसी भी व्यक्ति को ब्राह्मण बना तो उसके बाद ही तो वह ब्राह्मणोचित कर्म करेगा न अर्थात तुमने फल पर अधिकार ही नहीं किया अपितु पहले फल को ही प्राप्ति सिद्ध कर रहे हो। यदि किसी ने शास्त्र का अध्ययन कर लिया तो वह ब्राह्मण हो ही जायेगा यह फल में अधिकार नहीं तो और क्या है ?
महाराज दशरथ, भीष्म पितामह आदि को शास्त्रज्ञान नहीं था क्या ? जिस अर्हता के आधार पर ब्राह्मणत्व की सिद्धि कर रहे हो उससे तो ब्राह्मणत्व की प्राप्ति होती ही नहीं है, दशरथ-भीष्म पितामह आदि शास्त्रज्ञ ही नहीं थे अपितु शास्त्रीय मर्यादा का पालन भी करते थे फिर भी ब्राह्मण नहीं बने और आज तुम केवल कुछ शास्त्रज्ञान मात्र से ही ब्राह्मण बनाने की सिद्धि कर रहे हो।
आशा है विषय और प्रश्न का भाव अब तक स्पष्ट हो चुका है और शास्त्रदस्यु/अपण्डितों को इतना लांछित क्यों किया गया ये भी स्पष्ट हो गया है।
गीता का वचन भी प्रमाण है किन्तु अनर्थ करने के लिये नहीं, भ्रमित करने के लिये नहीं
समस्या गीता के ज्ञान की नहीं अपितु मंदमति के विकृत बुद्धि की है। उसने कभी शास्त्र का अध्ययन नहीं किया अपितु कुछ दुराग्रह से ग्रस्त होकर उसकी सिद्धि के लिये शास्त्रों में कुछ ढूंढकर निकाल लेता है। भगवा धारण करना हो तो कर लेता है और मीडिया वाले तो ऐसे अधर्मियों को ही ढूंढते फिरते हैं क्योंकि उनकी दुकान यही चला सकते हैं, शास्त्रज्ञ तो शोधन करेंगे न।
अस्तु किसी को धर्मगुरु किसी को संत आदि का पट्टी चिपकाकर जनमानस को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। कोई भी इनको नियंत्रित करने वाला नहीं क्योंकि पूरा तंत्र (राज व्यवस्था) ही इसी दलदल में फंसा हुआ है। सरकारें ऐसा ही कानून बना रही है, भले ही जय श्रीराम का नारा लगाए किन्तु वर्णसंकरों की विशाल सेना तैयार करने में लगी है।
फलस्वरूप जिसे जहां धर्म की चर्चा करते (बड़े स्तरों पर) देखा जाता है वो वहीं अपने दुराग्रह को शास्त्रानुकूल सिद्ध करने में जुटा हुआ है। बड़े-बड़े कथावाचक सब इसी तंत्र के उपजाये हुए हैं (कुछ अपवाद हो सकते हैं) और वो भी अपने मंचों से ऐसा ही कुकृत्य करते रहते हैं। सभी गोशाला चला रहे हैं और गोशाला के नाम पर धनसंग्रह कर रहे हैं।
जाकर गोशाला में देखें कितने सांढ़ हैं यदि अत्यल्प २ – ४ % दिखें तो सिद्ध हो जायेगा कि ये बछड़े की किसी न किसी प्रकार से हत्या कर या करा रहे हैं। यदि सींग वाली गाय न दिखे तो समझ लें कि वो भी गाय के अंग की क्षति कर रहे हैं। बस धन के लिये गोशाला शब्द का प्रयोग कर रहे हैं, कथा के नाम पर व्यापार मात्र कर रहे हैं। उनका दिव्यज्ञान तो उनकी कथाओं से ही प्रकट होता रहता है लोगों को समझ नहीं आता ये भिन्न विषय है। यदि लोगों को समझ आ जाये तो इनकी ओर देखें भी न।

गीता का ज्ञान भ्रामक नहीं है, गीता का ज्ञान बांटने वाले पापी “शास्त्रदस्यु” दिग्भ्रमित कर रहे हैं, अधिकांशतः ऐसे ही शास्त्रदस्यु ज्ञान बांटते फिर रहे हैं, अपवादों के अतिरिक्त और उन विद्वद्जनों से क्षमायाचना करता हूँ कृपया अपने प्रति किसी पंक्ति को ग्रहण न करें।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान कदापि दिग्भ्रमित करने वाला नहीं है, अपितु मन्दमति, लोभी और अविद्याग्रस्त ‘शास्त्रदस्युओं’ की विकृत बुद्धि ही इसके वचनों का अनर्थ करके जनसामान्य को भ्रमित कर रही है। रणभूमि के क्षात्रधर्म (हिंसा-अदोष) के नियमों को सामान्य जीवन की दुर्घटनाओं (कबूतर के बच्चे की मृत्यु) पर थोपकर पाप-मुक्त सिद्ध करना घोर शास्त्रीय अपराध है, जिससे उत्तरदाता पुरोहित भी उस पाप का साक्षात् भागी बनता है।
व्याकरण, ज्योतिष या साहित्य की डिग्रियाँ लेकर सरकारी सेवा (चाकरी) में लगे ‘भृतकाध्यापक’ सेवकत्व दोष के कारण कर्मकाण्ड, भोजन और दान-दक्षिणा के अधिकार से पूर्णतः च्युत (अनर्ह) हैं; वे वेदमन्त्रों का सस्वर पाठ करने में अक्षम होकर भी केवल लोभवश पण्डित होने का पाखण्ड करते हैं। इसी प्रकार, गीता के “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं…” मन्त्र का कुतर्क देकर जो लोग वर्णव्यवस्था को जन्मना न मानकर कर्मणा सिद्ध करने का प्रपंच रचते हैं, वे वास्तव में ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ के सिद्धान्त की अवहेलना करते हुए ‘फल (ब्राह्मणत्व की पद-प्रतिष्ठा) पर पहले अधिकार’ सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं।
F&Q :
FAQ
प्रश्न : “सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्…” का नियम शास्त्रज्ञ विप्र पर शास्त्रीय चर्चा के समय क्यों प्रभावी नहीं होता?
उत्तर: यह नियम लोक-व्यवहार के लिए है। जब बात धर्मशास्त्र, कर्मकाण्ड और मर्यादा की शुद्धि की हो, तब विप्र का कर्तव्य ‘सत्य’ बोलना है भले ही वह अप्रिय क्यों न हो । यदि वह लोभ या प्रतिष्ठा के भय से ‘प्रिय असत्य’ या चुप रहता है, तो वह मतिभ्रष्टता और धर्म-नाश का कारण बनता है एवं दोनों को ही नरकगामी बनाने वाला होता है।
प्रश्न : “कर्मणा वर्णव्यवस्था” के आधुनिक कुतर्क का गीता के आधार पर कैसे खण्डन होता है?
उत्तर: आधुनिक पाखण्डी कहते हैं कि कर्म के अनुसार वर्ण बदल जाता है। गीता का सिद्धांत है ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’। यदि कोई अन्य जाति का व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्त कर स्वयं को ब्राह्मण घोषित करता है, तो वह कर्म से पूर्व ही ‘ब्राह्मणत्व रूपी फल’ पर अपना अधिकार सिद्ध कर रहा है, जो गीता के ही सिद्धांत “मा फलेषु कदाचन” के सर्वथा विरुद्ध है।
प्रश्न : “यावानर्थ उदपाने…” श्लोक का अर्थ निकालकर कर्मकाण्ड को ‘आडम्बर’ कहने वालों का क्या परिहार है?
उत्तर: इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि पूर्ण आत्मज्ञानी (ब्रह्मज्ञानी) का वेदों के कर्मकाण्ड में कोई निजी स्वार्थ या प्रयोजन शेष नहीं रहता। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह वेदों की निंदा करे या मनमाना स्वेच्छाचार करे। जब तक देह है, उसे शास्त्रमर्यादा के भीतर ही आचरण करना होगा।
प्रश्न : “सचिव बैद गुर तीनि जौं…” उक्ति का यहाँ क्या संदर्भ है?
उत्तर: यदि गुरु (पुरोहित) यजमान को प्रसन्न करने के लिए या धन के लोभ से शास्त्रविरुद्ध बातों को ‘सब ठीक है’ कहकर मीठा बोलता है, तो यजमान के धर्म और पुरोहित के तेज दोनों का समूल नाश निश्चित है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में प्रयुक्त तीखे और दुत्कारात्मक शब्द (जैसे शास्त्रदस्यु, भृतकाध्यापक, मूर्खाधिराज, मन्दमति, कमीशनखोर) किसी निष्कपट, नित्य-कर्मनिष्ठ विद्वान विप्र के प्रति नहीं हैं, अपितु महाभारत के शांतिपर्व के अनुसार शास्त्रों के मर्म को विकृत करने वाले ‘पद-प्रतिष्ठा से मदांध’ स्वेच्छाचारियों के प्रति ‘तिक्त ओषधि’ (कड़वी दवा) हैं। किसी भी व्यक्ति विशेष या वर्ग विशेष के प्रति कोई भाव व्यक्त नहीं किया गया है अपितु शास्त्रीय मर्यादा में शास्त्र के अनर्थ की प्रवृत्ति कैसे होती है उसे समझने का प्रयास किया गया है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








