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अधिकस्य अधिकं फलं : मूल प्रयोजन और प्रामाणिक शास्त्रीय विस्तार

अधिकस्य अधिकं फलं : मूल प्रयोजन और प्रामाणिक शास्त्रीय विस्तार अधिकस्य अधिकं फलं : मूल प्रयोजन और प्रामाणिक शास्त्रीय विस्तार

“कृपणता का सर्वत्र निषेध प्राप्त होता है, और सक्षम होने पर विकल्प का चयन करना साक्षात् मोह है।”

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अधिकस्य अधिकं फलं : मूल प्रयोजन और प्रामाणिक शास्त्रीय विस्तार

“अधिकस्य अधिकं फलं का वास्तविक तात्पर्य है—सामर्थ्यानुसार कल्प-विकल्प में से अधिकतम (सर्वश्रेष्ठ) का चयन करना।”

फल की विशेषता जहां वर्णित हो वहां अधिकतम (यथासंभव/सामर्थ्यानुसार) न करना और विकल्प का ग्रहण करना भी निषिद्ध एवं निष्फल कहा गया है। इसमें यह शर्त्त कहा गया है कि वैभव/सामर्थ्य/सक्षम होने पर भी मोहवश कृपणता करने से फल का भागी नहीं होगा अपितु देवद्रोही होता है।

इस कृपणतानिषेध का यत्र-तत्र-सर्वत्र वर्णन दृष्ट है किन्तु कृपणता करने पर परिणाम सर्वत्र उल्लिखित नहीं । यहां कृपणता से परिणाम का भी स्पष्टीकरण है। उत्तरोत्तर सामर्थ्यानुसार ग्राह्य होता है अथवा सामर्थ्यवान भी विकल्प चयन कर सकता है यदि अनुपलब्ध हो तो किन्तु विकल्प में न्यूनतम नहीं उत्तरोत्तर क्रम में जो प्रथम विकल्प प्राप्त हो वही ग्राह्य होता है; यथा स्वर्ण में अक्षम होने पर रजत प्रथम विकल्प प्राप्त होता है किन्तु अथवा अनुपलब्ध हो तो भी, किन्तु कृपणतावश मृदा ही ग्रहण करे तो वह मोह है और देवद्रोही सिद्ध करता है।

अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरेण फलं नाशं का द्वन्द

इस कृपणतानिषेध का यत्र-तत्र-सर्वत्र वर्णन दृष्ट है किन्तु कृपणता करने पर परिणाम सर्वत्र उल्लिखित नहीं है। इसी प्रकार विकल्प सर्वत्र मिलता है किन्तु विकल्प ग्रहण कब करे और कब न करे इसको समझना आवश्यक है।

अधिकस्य अधिकं फलं – प्रामाणिक विमर्श

यहां जो भाव प्राप्त हो रहा है वही भाव “अधिकस्य अधिकं फलं” है और एक विशेष पौराणिक प्रसङ्ग की पूर्व चर्चा अपेक्षित है। यह चर्चा बलभद्र जी के सूतवध और उसके प्रायश्चित्त प्रकरण की है। बलभद्र ने सूतवध में प्रायश्चित्त की मांग करते हुये यह कहा कि मैं सर्वाधिक कठिन प्रायश्चित्त करूँगा। कारण कि वो सक्षम थे और उनके लिये विकल्प अथवा गौण का महत्व नहीं था।

करिष्ये वधनिर्वेशं लोकानुग्रहकाम्यया। नियमः प्रथमे कल्पे यावान्स तु विधीयताम् ॥
दीर्घमायुर्बतैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च। आशासितं यत्तद्ब्रूत साधये योगमायया ॥

श्रीमद्भागवतपुराण/१०/उत्तरार्ध/७८/३३ – ३४

मृत्कुंभात्ताम्रकुंभैस्तु स्नानंदशगुणंस्मृतम् । रौप्यैःशतगुणंपुण्यं हेमैःकोटिगुणंस्मृतम् ॥
एवमर्घे च नैवेद्ये बलिपूजादिषु क्रमात् । पात्रांतरविशेषेण फलंचैवोत्तरोत्तरम् ॥
विभवेसतियो मोहान्नकुर्याद्विधिविस्तरम् । न स तत्कर्मफलभाग्देवद्रोहीप्रकीर्त्यते ॥
देवानांदर्शनंपुण्यं दर्शनात्स्पर्शनंवरम् । स्पर्शनादर्चनंश्रेष्ठं घृतस्नानमतः परम् ॥
प्राहुर्गंगाजलैःस्नानं घृतस्नानसमंबुधाः । अर्घ्यंद्रव्यविशेषेण गंगातोयेन यः सकृत् ॥
मागधप्रस्थमात्रेण ताम्रपात्रस्थितेन च ॥

नारदपुराण/उत्तरार्ध/४१/१६ – २१

मूल लेख और प्रामाणिक विमर्श

“अधिकानि फलाधिकात्”

“देवताओं का दर्शन पुण्य है, दर्शन से स्पर्श, स्पर्श से अर्चन और अर्चन से घृत-स्नान उत्तरोत्तर अधिक फलदायी है।”

अब आगे पद्मपुराण में दान प्रकरण जो व्यास के लिये कहा गया है वहां अवलोकन करें :

षड्रसानन्नपानानि स्नेहद्रव्याणि यानि च । गृहं सोपस्करं राम पुराणज्ञाय दापयेत् ॥
पर्याप्तान्येव सर्वाणि अधिकानि फलाधिकात् । दद्याद्द्रव्यमतो भूयः सचैलं शोभितं मृदु ॥
भूषणानि यथार्हाणि स्वशक्त्या प्रतिपादयेत् । गंधपुष्पं प्रतिदिनं केवलं गंधमेव च ॥
केवलं च तथा पुष्पं फलकाले फलान्यपि। तांबूलं च तथा दद्यान्नमस्कुर्याच्च भक्तितः ॥
पुराणस्य समाप्तौ तु दद्याद्दानादिकं तथा । अधिकं तु तथा देयं भूहिरण्यादिकं नृप ॥

पद्मपुराण/५ (पातालखण्डः)/११५/५१ – ५५

यहां हमें जो सूत्र प्राप्त हो रहा है वह इस प्रकार है “अधिकानि फलाधिकात्” और इसी को दूसरे प्रकार से “अधिकस्य अधिकं फलं” कहा जाता है अर्थात इसका प्रयोग कहां-किस प्रकार से होगा ये स्पष्ट हो रहा है। आगे के प्रमाणों और उद्धरणों से इस तथ्य को और स्पष्ट किया जा रहा है :

एकभक्तेन नक्तेन तथैवाऽयाचितेन च । भिक्षाहारेण तोयेन फलाहारेण वा यदि ॥
उपवासेन कृच्छ्रेण शाकाहारेण वा जनाः । तीर्थयात्रां प्रकुर्वन्ति तेषां लोकास्तु शाश्वताः ॥

लक्ष्मीनारायणसंहिता/१ (कृतयुगसन्तान)/१५०/६२ – ६३

उपवासं तथा नक्तमेकभुक्तमयाचितम्। अशक्तस्तु यथा कुर्वन्सायं प्रातरखण्डितम् ॥
भविष्योत्तर (देवशयनी एकादशी माहात्म्य)

एकभुक्तेन जन्मोत्थम् नक्तेन द्विजनुर्भवम्। सप्तजन्मभवं पापमुपवासेन नश्यति ॥
स्कन्द (एकादशी माहात्म्य – देवोत्थान)

अधिकानि फलाधिकात्

देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च संतर्प्य विधिपूर्वकम्। कृत्वा श्राद्धं पितॄणां तु दद्याद्दानं स्वशक्तितः॥
स्कन्दपुराण/७ (प्रभासखण्डः)/वस्त्रापथक्षेत्रमाहात्म्यम्/१५/५९

सर्वाभरणसंयुक्तां कन्यकां यो ददाति च। तेन दत्ता धरा सर्वा सशैलवनकानना॥
अर्द्धाभरणदानेन फलं दातुर्भवेद्ध्रुवम्। अनाभरणकन्यायाः पादैकस्य फलं भवेत्॥

पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/५२/८५ – ८६

विस्तार का वास्तविक प्रयोग

अब हमें विस्तार का वास्तविक प्रयोग समझ लेना आवश्यक है। पूर्व विमर्श में “विस्तरो हि विघ्नकरः” स्पष्ट किया गया था जिसका तात्पर्य जिस कल्प वा विकल्प की शक्ति/आवश्यकता होने से ग्रहण किया गया उसके क्रिया-काल-देश-शौच और ब्राह्मण सम्पदा इन वर्णित विषयों का विस्तार तो कदापि न करे।

निष्कर्ष

कर्मकाण्ड में “विस्तरो हि विघ्नकरः” और “अधिकस्य अधिकं फलं (अधिकानि फलाधिकात्)” परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक ही सिक्के के दो शास्त्रीय पहलू हैं। जहाँ किसी निर्दिष्ट अनुष्ठान के भीतर उसकी नियत क्रिया, काल, देश, शौच और विप्रसंख्या का अपनी मर्जी से विस्तार करना ‘विघ्नकर और नाशक’ है; वहीं इसके विपरीत, अपनी सामर्थ्य और वैभव के अनुसार सर्वश्रेष्ठ कल्प (मुख्य पक्ष) का चयन करना और कृपणता का परित्याग करना ही ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का वास्तविक क्षेत्र है।

पद्मपुराण, नारदपुराण और स्कन्दपुराण के साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि जो यजमान स्वर्ण या ताम्र पात्रों के प्रयोग में सक्षम होकर भी मोहादि के वशीभूत होकर मिट्टी (मृत्पात्र) का विकल्प चुनता है, अथवा जो उपवास में समर्थ होकर भी ‘यथाशक्ति’ के नाम पर केवल फलाहार का शॉर्टकट लेता है, वह अनुष्ठान के फल से वंचित होकर साक्षात् ‘देवद्रोही’ कहलाता है। अतः सामर्थ्य होने पर ‘प्रथम कल्प’ (विशिष्ट कोटि) को अंगीकार करना ही धर्म है; विकल्प केवल अक्षमों, बालकों और वृद्धों के लिए शास्त्रों की दयालुता है, सक्षमों के स्वेच्छाचार का आवरण नहीं।

FAQ

प्रश्न १: “विस्तरो हि विघ्नकरः” और “अधिकस्य अधिकं फलं” के मध्य क्या शास्त्रीय समन्वय है?

उत्तर: ‘विस्तरो हि विघ्नकरः’ का नियम वहाँ प्रभावी होता है जहाँ किसी अनुष्ठान के भीतर उसकी नियत क्रिया, काल या विप्रसंख्या को अपनी मर्जी से बढ़ाया जाए (वह सर्वथा वर्जित है)। इसके विपरीत, ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का नियम अनुष्ठान की श्रेणी (गुणवत्ता) पर प्रभावी होता है, जो कहता है कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वश्रेष्ठ (जैसे मिट्टी के स्थान पर स्वर्ण कलश) का चयन करें।

प्रश्न २: नारदपुराण के अनुसार सामर्थ्य होने पर भी विकल्प (न्यून कोटि) चुनने वाले को क्या संज्ञा दी गई है?

उत्तर: नारदपुराण के अनुसार, यदि यजमान के पास वैभव और सामर्थ्य उपलब्ध हो, फिर भी वह मोह या कृपणता के कारण उत्तम विधि का विस्तार न करके न्यूनतम विकल्प चुनता है, तो वह कर्म के फल का भागी नहीं होता। शास्त्रों में उसे ‘देवद्रोही’ कहा गया है।

प्रश्न ३: बलभद्र जी के सूतवध और प्रायश्चित्त के प्रसंग से ‘प्रथम कल्प’ का क्या सिद्धांत सिद्ध होता है?

उत्तर: श्रीमद्भागवतपुराण के अनुसार, बलभद्र जी ने सूतवध के प्रायश्चित्त हेतु ऋषियों से स्पष्ट कहा था—”नियमः प्रथमे कल्पे” अर्थात मुझे प्रथम कल्प (सर्वोच्च और सबसे कठिन विधान) का नियम बताएं। चूंकि वे समर्थ थे, इसलिए उन्होंने किसी शिथिल विकल्प का आश्रय नहीं लिया, जो प्रत्येक सक्षम व्यक्ति के लिए एक आदर्श शास्त्रीय शिक्षा है।

प्रश्न ४: नारदपुराण में विभिन्न धातु के कुम्भों (कलशों) के स्नान का क्या फल-क्रम बताया गया है?

उत्तर: मिट्टी के कुम्भ की अपेक्षा ताम्बे का कुम्भ दस गुना, चांदी का कुम्भ सौ गुना और स्वर्ण (सोने) का कुम्भ कोटि (करोड़) गुना अधिक पुण्य और फल प्रदान करने वाला माना गया है।

प्रश्न ५: ‘यथाशक्ति’ शब्द का वास्तविक शास्त्रीय तात्पर्य क्या है?

उत्तर: स्कन्दपुराण के अनुसार, यथाशक्ति का अर्थ ‘अपनी चरम क्षमता और वैभव के अनुसार’ देना है, न कि ‘अपनी इच्छानुसार कृपणता करना’। यदि आपकी शक्ति स्वर्णमुद्रा दान की है, तो ताम्र या रजत देना यथाशक्ति नहीं, अपितु स्वेच्छाचार और शास्त्राज्ञा का उल्लंघन है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में वर्णित सिद्धान्त स्मृतियों, पुराणों तथा बलभद्र जी के प्रायश्चित्त प्रसंग के अकाट्य साक्ष्यों पर आधारित हैं। अनुष्ठानगत विसंगतियों (जैसे सक्षम यजमानों द्वारा यज्ञों में मिट्टी के पात्रों का प्रयोग, कृपणता, अथवा पुरोहितों को लांछित करना) पर किए गए कड़े प्रहार किसी व्यक्ति विशेष के प्रति द्वेष से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि ‘वैभव होने पर भी मोहवश की जाने वाली कृपणता’ के प्रति एक ‘तिक्त ओषधि’ हैं। इस विश्लेषणात्मक सूत्र-प्रतिष्ठा पर लेखक का वैधानिक बौद्धिक सम्पदा (कॉपीराइट) अधिकार सुरक्षित है। यह चर्चा शास्त्रानुसार समझने के लिये है निर्णय नहीं, निर्णय स्वविवेक से लें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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