“साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे—शास्त्र का ऐसा सन्तुलित मार्ग ही गृहस्थ के संकट का वास्तविक निवारण है।”
पीपल वृक्ष को साक्षात् विष्णु स्वरूप ही कहा गया है और भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी कहा है “अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां” एवं भगवान विष्णु के स्थान पर अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की पूजा भी करने तक का शास्त्रीय विधान है। किन्तु पीपल वृक्ष घर में, छत पर, दीवार पर भी उग आते हैं और ऐसी स्थिति में विकट समस्या उत्पन्न हो जाती है। कारण कि अश्वत्थ वृक्ष को काटना तो दूर डाली-पत्ते आदि को तोड़ना भी निषिद्ध है और घर में हटाना अनिवार्य होता है। प्रामाणिक विश्लेषण में यहां हम ढेरों प्रमाणों का भी अवलोकन करेंगे।
घर में यदि पीपल का वृक्ष उग जाये तो क्या करें ?
भविष्य पुराण और पद्म पुराण के श्लोक स्पष्ट करते हैं कि जिसके पुत्र न हों, उसके लिए पीपल का वृक्ष पुत्र के समान है। हजारों कुपुत्रों से श्रेष्ठ एक पीपल का वृक्ष लगाना है, जो मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाता है। विशेष रूप से जलाशय (कुआं, बावड़ी, नदी) के समीप पीपल का वृक्ष लगाने का फल सैकड़ों यज्ञों से भी अधिक बताया गया है।
ऐसी अवस्था में करें तो क्या उसमें भी तब जब गूगल पर ढेरों अप्रामाणिक बातें भरी पड़ी हैं तो चिंताजनक भी है। दुर्भाग्य से गूगल उन्हीं अप्रामाणिक तथ्यों का प्रचार-प्रसार भी करता है जिसमें कुतर्क हो किन्तु प्रमाण नहीं, प्रामाणिक तथ्यों के प्रचार-प्रसार में तो अवरोध ही उत्पन्न करता है। यहां प्रामाणिक रूप से विमर्श करते हुये शास्त्रीय मार्ग का विचार किया गया है किन्तु गूगल इसके प्रचार-प्रसार में अवरोध उत्पन्न कर सकता है भले ही स्वाभाविक रूप से क्यों न हो, अल्गोरिथम ही इस प्रकार है कि स्वाभाविक रूप से कुतर्कों को आगे रखा जाता है ।
घर में यदि पीपल का वृक्ष उग आये तो हटाने में दोष होगा ही किन्तु यहां “यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं” विपरीत भाव से लगेगा भी । किन्तु किसी अन्यान्य के माध्यम से हटाया जा सकता है। प्रायश्चित्त ब्राह्मण ही दे सकते हैं किन्तु सद्यः व्हाट्सप पर नहीं। एक बात तो पूर्णतः सिद्ध है कि शास्त्र से ही निषेध है और मार्ग भी शास्त्रानुसार ही ढूंढना होगा, बिना शास्त्र के यदि कोई तर्क-कुतर्क करके मार्ग ढूंढा जाय तो उसमें घोर अनर्थ संभावित है। शास्त्र से मार्ग ढूंढने पर अनर्थ व दोष का अभाव हो जायेगा। अब यदि वो प्रकार ढूंढें जहां सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे तो वो भी है ।

अश्वत्थ विषयक प्रमुख प्रमाण
पीपल एक ऐसा वृक्ष है जिसके बीज पक्षियों के माध्यम से घरों की छतों, दीवारों या नींव की दरारों में पहुँच जाते हैं और वहाँ पीपल का पौधा उग आता है। व्यावहारिक रूप से पीपल की जड़ें इतनी शक्तिशाली होती हैं कि वे कंक्रीट और ईंटों को फाड़ देती हैं, जिससे पूरा भवन धराशायी हो सकता है।
ऐसी स्थिति में गृहस्थ असमंजस में पड़ जाता है कि यदि इसे काटेगा तो महापाप लगेगा और यदि नहीं काटेगा तो घर नष्ट हो जाएगा। इस विषय में शास्त्रों और अन्यान्य प्रामाणिक ग्रंथों में स्पष्ट विधान दिया गया है:
अपुत्रस्य हि पुत्रत्त्वं पादपा इह कुर्वते । यत्नेनापि च विप्रेंद्रा अश्वत्थारोपणं कुरु ॥
शतैः पुत्रसहस्राणामेक एव विशिष्यते । कामेन रोपयेद्विप्रा एकद्वित्रिप्रसंख्यया ॥
मुक्तिहेतुः सहस्राणां लक्षकोटीनि यानि च । धनी चाश्वत्थवृक्षे च अशोकः शोकनाशनः ॥
भविष्यपुराण/२ (मध्यमपर्व)/१/१०/३७- ३९
मूर्त्यभावे पूजनीयोऽश्वत्थो वाऽथ वटोऽथ वा । अश्वत्थरूपी विष्णुः स्याद्वटरूपी शिवो यतः ॥
स्कन्दपुराण/२ (वैष्णवखण्डः)/कार्तिकमासमाहात्म्य/३/३८
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां पवित्रो मंगलान्वितः। मुक्तिदो रोपितो ध्यातश्चातुर्मास्येऽघनाशनः ॥
अश्वत्थे चरणं दत्त्वा ब्रह्महत्या प्रजायते। निष्कारणं संकुथित्वा नरके पच्यते ध्रुवम् ॥
स्कन्दपुराण/६ (नागरखण्डः)/२४७/३९ – ४०
अश्वत्थवृक्षमासाद्य सदाऽलक्ष्मि स्थिरा भव । ममांशसंभवो ह्येष आवासस्ते मया कृतः ॥
प्रत्यहं येऽर्चयिष्यंति त्वां ज्येष्ठां गृहधर्मिणः । तेष्वियं श्रीः कनिष्ठा ते भगिनी निश्चलास्तु वै ॥
पद्मपुराण/६ (उत्तरखण्डः)/११६/२४ – २५
अश्वत्थ वृक्ष पर ज्येष्ठा (लक्ष्मी की ज्येष्ठ भगिनी) अर्थात दरिद्रा का वास होता है इसलिये सामान्य रूप से स्पर्श का निषेध है अर्थात पीपल की पूजा तो प्रतिदिन करे किन्तु स्पर्श के बिना। विशेषता यह है कि शनिवार को लक्ष्मी सहित नारायण ज्येष्ठा से मिलने आते हैं और उस दिन स्पर्श पूर्वक पूजन प्रशस्त भी है। अन्यत्र स्पर्श विषयक जो भी चर्चा है वह शनिवार विषयक ही है, भिन्न दिनों में नहीं।
अश्वत्थपूजा स्पर्शेन कर्त्तव्या शनिवासरे । अन्यवारेऽश्वत्थसंगाद्दरिद्रो जायते नरः ॥
स्कन्दपुराण/२ (वैष्णवखण्डः)/कार्तिकमासमाहात्म्य/३/४८
मन्दवारे सदा ह्येनं लक्षमीरत्रागमिष्यति । अस्पृश्योऽसौ भवेत्तस्मान्मन्दवारं विना किल ॥
पद्मपुराण
शनिवार को भी यदि विष्टि का योग हो तो स्पर्श निषिद्ध ही कहा गया है :
बोधिस्त्वगादार्किदिने स्पृशत्वमस्पृश्यतामर्कजविष्टियोगात् ॥
पद्मपुराण/६ (उत्तरखण्डः)/११५/२९
अवज्ञानाद्द्विजश्रेष्ठ योऽश्वत्थं हन्ति मूढधीः । संसारे नास्ति तत्कर्म यत्कृत्वा स च शुद्ध्यति ॥
अश्वत्थो वृक्षराजोऽयं हरिमूर्तिः प्रकीर्तितः । तस्मादश्वत्थहंतॄणां त्राता कोऽपि न विद्यते ॥
अश्वत्थं पश्यतो विप्र स्पृशतः परतस्तथा । देहस्थं पातकं सर्वं हरेत्प्रणमतो हरिः ॥
विलोक्याश्वत्थहंतारं यः शक्तो न निवारयेत्। तन्नेत्रयुग्मं बडिशैर्यमेनोत्पाट्यते स्वयम् ॥
अश्वत्थच्छेदनं मूढो मा कुर्विति वदेन्न यः । तस्य जिह्वां छुरिकया स्वयं कृंतति प्रेतराट् ॥
अश्वत्थशाखामेकां यः स्वल्पामपि निहंति वै । स कोटिब्रह्महत्यानां फलमाप्नोति मानवः ॥
यत्पापं ब्रह्महत्यायां गुरुस्त्रीगमनेन च । सुरापाने तथास्तेये न्यासापहरणेऽपि च ॥
यत्पापं भ्रूणहत्यायां गोहत्यायां द्विजोत्तम । स्त्रीहत्यायां च यत्पापं परस्त्रीगमने तथा ॥
शरणागत हत्यायां हत्यायां सुहृदस्तथा । विश्वासवाक्याकथने पतिहिंसाविधौ च यत् ॥
यत्पापं परनिंदायां हरिवासरभोजने । अश्वत्थच्छेदनाद्धोरं तत्पापं प्राप्यते जनैः ॥
विष्णुमूर्त्तेर्जनो मोहादश्वत्थस्य निहंति यः । तत्तुल्यः पातकी कोऽपि न श्रुतः क्षितिमंडले ॥
पद्मपुराण/७ (क्रियाखण्डः)/१२/४५ – ५५
स्नात्वाश्वत्थं स्पृशेद्यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते। अस्नातो यः स्पृशेन्मर्त्यो लभते स्नानजं फलम् ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/५८/१४
संकलित श्लोक संग्रह इस बात का अकाट्य साक्ष्य है कि सनातन धर्म में पर्यावरण का रक्षण कोई सामाजिक कर्तव्य मात्र नहीं, बल्कि परम आध्यात्मिक साधना है। पीपल केवल एक वनस्पति नहीं, बल्कि साक्षात् नारायण की चेतना है। उसे काटना आत्मघाती है और उसकी सेवा करना मुक्ति का मार्ग है।
किंचिच्छेदं च यः कुर्यादश्वत्थस्य वटस्य च। श्रीवृक्षस्य च विप्रेंद्राः स भवेद्ब्रह्मघातकः॥
मूलच्छेदेन विप्रेंद्राः कुलपातो भवेदनु। वृक्षच्छेदी भवेन्मूक आधिव्याधिशतं भजेत् ॥
भविष्यपुराण/२ (मध्यमपर्व)/१/१०/५९ – ६०
किंचिच्छेदं तु यः कुर्यादश्वत्थस्य तनौ नरः। कल्पैकं निरयं भुक्त्वा चांडालादौ प्रजायते ॥
मूलच्छेदेन तस्यैव स च यात्यपुनर्भवम्। पुरुषास्तस्य तिष्ठंति रौरवे घोरदर्शने ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/५८/२६ – २७
किञ्चिच्छेदन से भी ब्रह्मघात दोष प्रकट होता है और कल्पपर्यन्त नरक भोगना पड़ता है तदनन्तर चाण्डालादि योनियों में। यदि समूल छेदन किया जाय तब तो कुल का ही पतन हो जाता है और उसे (वृक्षच्छेदी) अनंतकाल के लिये नरक में वास करना होता है। वृक्षच्छेदी मूक, सैकड़ो आधिव्याधि से ग्रस्त होता है।
एक मात्र हेतु है जो छेदन की अनुमति देता है और पाप न होकर पुण्य होता है वो है यज्ञ के निमित्त छेदन करना। यज्ञीय प्रमुख वृक्षों का यज्ञ से भिन्न कार्यों के लिये छेदन नहीं करना चाहिये उसमें भी अश्वत्थ, वट, श्रीवृक्ष, धात्री, तुलसी आदि।
यज्ञार्थं छेदितेऽश्वत्थे ह्यक्षयं स्वर्गमाप्नुयात्। छिन्नो येन वृथाऽश्वत्थश्छेदिता पितृदेवताः ॥
अश्वत्थ स्तोत्र/२९
यदि यज्ञ के निमित्त छेदन करना भी हो तो विशेषकर चातुर्मास्य में न ही करे :
एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत् ॥
चातुर्मास्ये विशेषेण विना यज्ञादिकारणम्। एतदुक्तमशेषेण यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ॥
स्कन्दपुराण/६ (नागरखण्डः)/२५२/४६ – ४७
आगे एक विषय अश्वत्थ वृक्षारोपण का भी है और इसमें बहुत सारे शंकाओं का निवारण भी हो जाता है :
जलानां निकटे रम्ये रसानां क्रयविक्रये। मार्गे जलाशये वृक्षान्रोपयेद्यो महाशयः ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/५८/१२
जलाशय के निकट पीपल वृक्ष लगाने से जो फल प्राप्त होता है वह सैकड़ों यज्ञ करने से भी नहीं प्राप्त होता :
अश्वत्थरोपणं कृत्वा जलाशयसमीपतः। यत्फलं लभते मर्त्यो न तत्क्रतुशतैरपि ॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/५८/५
सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे
“यज्ञ से भिन्न कार्यों के लिए अश्वत्थ, वट, श्रीवृक्ष, धात्री और तुलसी का छेदन साक्षात् ब्रह्मघात के समान पाप देता है।”
अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि अश्वत्थ वृक्षच्छेदन दो दूर की बात है उसकी डाली अथवा पत्रों का छेदन करने में भी बड़ा पाप होता है। एक ही अवस्था में अश्वत्थ को हटाया भी जा सकता है और दोष भी नहीं होगा अर्थात “सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे” और वो व्यवस्था यज्ञ के निमित्त है। पूर्णतः दोष का अभाव हो जायेगा ऐसा भी नहीं कहा जा सकता किन्तु घर में होने से समस्या है इस कारण यज्ञ निमित्त करके ही हटाया जा सकता है ताकि दोष अल्प से अल्प हो।
घर में होने से समस्या है इस कारण लोकविरुद्ध होने का नियम लगेगा क्योंकि उससे समस्या उत्पन्न हो रही है। दूसरी बात हटाने में यदि निमित्त हो जाये तो दोष के स्थान पर पुण्य ही सिद्ध होगा।
क्योंकि यज्ञ के निमित्त अश्वत्थच्छेदन भी प्रशस्त ही है और पुण्यदायक भी तो यज्ञ के निमित्त से छेदन किया जा सकता है किन्तु यदि विचार करें तो मूल निमित्त यज्ञ से भिन्न घर में होना प्रतीत होता है जिसको हटाना है एवं केवल ऐसा मार्ग ढूंढा जा रहा है जिससे दोष उत्पन्न ही न हो। यहां दो स्थिति का भी ध्यान रखना आवश्यक है और दोनों स्थितियां क्रमशः इस प्रकार हैं :

- प्रथम यह कि छोटा सा पौधा मात्र हो।
- द्वितीय यह कि किसी कारण से बड़ा हो गया हो।
यदि नया पौधा हो अर्थात छोटा सा हो
यदि नया पौधा हो अर्थात छोटा सा ही हो तो उसमें छेदन का विषय नहीं आएगा। यहां भी तीन मार्ग उत्पन्न होंगे :
- प्रथम पूर्णतः शास्त्रानुकूल जिसमें केवल पुण्य हो किन्तु कहीं से दोष न हो ।
- द्वितीय अक्षमों के लिये विकल्प जिसमें “लोकविरुद्धं” होने से दोषाभाव सिद्ध हो रहा है और निस्तारण किया जा सकता है।
- तृतीय अत्यंत सरल विकल्प जो उपरोक्त दोनों ही न कर सके उसके लिये।
प्रथम पक्ष में अश्वत्थ को किसी अन्य पात्र में लगाकर सेवा करके अश्वत्थ विवाह करे। तुलसी विवाह में भी अश्वत्थ वृक्ष मूल में भगवान को रखने का विधान देखने को मिलता है वहां भी प्रयोग किया जा सकता है एवं स्वतंत्र रूप से भी अश्वत्थ-शमी, अश्वत्थ-धात्री विवाह किया जा सकता है। तदुपरांत वृक्ष को किसी जलाशय अथवा मंदिर आदि में लगाया जा सकता है और उसके संरक्षण का भी प्रबंध होना चाहिये। जो सामर्थ्यवान है वह अपनी भूमि में भी लगा सकता है। किन्तु यहां एक और समस्या है कि ऐसा तो एक बार ही किया जा सकता है न और पीपल यदि बारम्बार उगे तो क्या करे ?
द्वितीय पक्ष में एक विशेष प्रयोग तो यह है कि जड़ी के रूप में प्रयोग शास्त्रविहित है और विधान से जड़ी प्राप्त करने में छेदन दोष का निवारण होगा। किन्तु इसके लिये जड़ी की आवश्यकता वाला व्यक्ति है चाहिये जो ढेरों मिल जाते हैं। विशेष कर जिस कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो वहां भी निर्देश दिया जाता है।
तृतीय पक्ष में दूसरे निर्धारित स्थान पर लगाना ही उत्तम पक्ष है अर्थात सावधानी पूर्वक छोटे से पौधे को इस प्रकार उखाड़े कि सूखने आदि की कोई संभावना ही न बने और मूल का तनिक अंश भी न टूटे इसका ध्यान रखे। मूल का अंश न टूटे इसका तात्पर्य यह नहीं होना चाहिये कि शेष टूट सकता है। तदुपरांत वृक्ष को किसी जलाशय अथवा मंदिर आदि में लगाया जा सकता है और उसके संरक्षण का भी प्रबंध होना चाहिये।
यहां शास्त्रसम्मत मार्ग हो इसका विशेष विचार किया गया है अब पशु को चारा में देने की बात आती है तो वहां जो सामान्य रूप से पशुपालक है उसके लिये भिन्न विचार होगा और जो पशुपालक नहीं है उसके लिये यह विकल्प ही नहीं हो सकता। सामान्य रूप से पशुपालक भी यदि कभी करते हैं तो अज्ञात अवस्था में ही मतिपूर्वक नहीं। इस पक्ष में शास्त्रसम्मति नहीं दिखती। जब पशु के लिये चारे का अभाव हो जाये तो ग्रहण करने में दोष नहीं होगा किन्तु सामान्य अवस्था में उचित नहीं कहा जा सकता और उसमें भी तब जबकि शास्त्रसम्मत मार्ग उपलब्ध हो।

यदि पौधा बड़ा हो
यदि पौधा बड़ा हो गया हो अर्थात उसको उखाड़ने में भी छेदन की संभावना बन रही हो तो मुख्य मार्ग छेदन ही उचित प्रतीत होता है। छेदन का सामान्य अवस्था में निषेध है किन्तु एक विशेष प्रयोग से प्रशस्त भी है और वो प्रयोजन यज्ञ है। सामान्य अवस्था में तो चातुर्मास्य का त्याग करके ही छेदन हो सकता है किन्तु यज्ञ निमित्त होने पर चातुर्मास्य में भी छेदन की आज्ञा है।
चातुर्मास्ये विशेषेण विना यज्ञादिकारणम्। एतदुक्तमशेषेण यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ॥
स्कन्दपुराण/६ (नागरखण्डः)/२५२/४७
यज्ञ के निमित्त छेदन किया जा सकता है तो प्रश्न उत्पन्न होता है कि मुख्य प्रयोग क्या होगा ? वास्तव में मुख्य प्रयोग इध्म या ईंधन होगा, समिधा नहीं यद्यपि गुरु की समिधा होती है। विशेष परिस्थिति में जहां समिधा का भी अभाव होता है वहां विचार किया जा सकता है। आगे छेदन संबंधी वार का भी प्रश्न आता है अब वार के विचार में अनेकों स्थान पर रविवार प्रयुक्त किया गया है किन्तु शास्त्रसम्मत प्रतीत नहीं होता है। वृक्ष की पूजा आदि हो क्षमायाचना आदि की जाय ये सभी उचित और अपेक्षित है। किन्तु वार विचार में जिस प्रकार जड़ी के लिये गुरुवार प्रशस्त है उसी प्रकार यज्ञार्थ छेदन में भी गुरुवार ही उचित प्रतीत होता है।
एक विशेष ध्यातव्य तथ्य यह भी है कि वेधन हेतु धातु के रूप में स्वर्ण अथवा ताम्र को अधिक प्रशस्त कहा गया है।
महत्वपूर्ण प्रश्न और विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज के प्रामाणिक उत्तर
यहां एक अन्य विकल्प यदि स्वतः प्राप्त हो तो उत्तम कहा जा सकता है वो है महावत का। किन्तु यदि स्वतः आये तो, अथवा बकरी आदि स्वतः ही आकर खा ले तो दोष नहीं होगा। किन्तु यदि मतिपूर्वक महावत को बुलाया जाय अथवा बकरी आदि को लाकर खिला दिया जाय तो इसमें वृक्ष नष्ट होगा और यह मतिपूर्वक होगा एवं इसका दोष होगा।
यहां मुख्य विषय दोषरहित विधि ही है। इस प्रकरण में और अधिक गंभीरता तब आयेगी जब इसके भीतर के और ४ प्रश्नों को समझेंगे। इसमें जो मुख्य ४ (३) प्रश्न उत्पन्न हुये उसका प्रामाणिक समाधान हमारे अनुजसम विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज ने प्रामाणिक समाधान किया है जो इस प्रकार है :
प्रश्न १: यदि घर में पीपल हो और समस्या हो तो क्या करें?

उत्तर : शास्त्रों में घर के भीतर पीपल का स्वतः उगना वास्तु दोष माना गया है, क्योंकि इसकी जड़ें भवन का नाश करती हैं। यदि पौधा छोटा है, तो उसे काटना नहीं है, बल्कि उखाड़कर दूसरी जगह लगाना (प्रतिरोपण) है। शौनक स्मृति के अनुसार:
गृहमध्ये च यो जातः अश्वत्थः सर्वदोषदः । तमुत्पाट्य प्रतिष्ठाप्य नृपं जनपदे यथा॥
अर्थ: घर के भीतर (या दीवारों पर) उगा हुआ पीपल का वृक्ष सभी प्रकार के दोष और कष्ट देने वाला होता है। इसलिए, जैसे किसी राजा को उसके उचित राज्य में स्थापित किया जाता है, वैसे ही उस पौधे को अत्यंत आदर के साथ जड़ सहित उखाड़कर (उत्पाट्य) किसी खुले स्थान या मंदिर में प्रतिष्ठित (प्रतिस्थापित) कर देना चाहिए।
प्रश्न २: यदि हटाना हो तो कैसे हटाये?
उत्तर : यदि वृक्ष बड़ा हो गया है और उसे हटाना ही एकमात्र विकल्प है, तो बिना सूचना दिए या बिना क्षमा माँगे कुल्हाड़ी चलाना वर्जित है। स्कन्द पुराण (वैष्णव खंड) के अनुसार, काटने या हटाने से एक दिन पहले वृक्षराज से अनुमति (अनुज्ञा) लेनी होती है:
अश्वत्थ योनिजो देव पूजितोऽसि सदा मया। गृहबाधा विनाशाय गच्छ त्वं देवसंसदि॥
अर्थ: हे अश्वत्थ योनि से प्रकट हुए देव! मैंने सदा आपकी पूजा की है। परंतु मेरे घर की बाधा (मकान टूटने के संकट) के निवारण के लिए, मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप यहाँ से देवों की सभा (किसी अन्य पवित्र स्थान) में प्रस्थान करें। इसके बाद अगले दिन, भगवान विष्णु और विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए उसे हटाया जाता है।
प्रश्न ३ : क्या प्रायश्चित्त भी करना होगा ?
उत्तर : हाँ, अनिवार्य रूप से प्रायश्चित्त करना होगा। वृहत् पराशर स्मृति (अध्याय १०) में पीपल को काटना घोर पाप माना गया है:
न छिन्द्यात्कपिलां गां च न च छिन्द्यात्तथाश्वत्थम्। अश्वत्थ छेदनात्प्राहुः ब्रह्महत्या समं विदुः॥
अर्थ: कपिला गाय और अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष को कभी न काटें। पीपल को काटना ब्रह्महत्या (किसी परम ज्ञानी की हत्या) के समान पाप कहा गया है।
प्रश्न ४: प्रायश्चित्त क्या होगा?
उत्तर : इस दोष से मुक्ति का प्रामाणिक प्रायश्चित्त (वराह पुराण): यदि विवशता में यह कृत्य हुआ है, तो प्रकृति के संतुलन और धार्मिक क्षमा के लिए सृजन (नया जीवन देना) ही एकमात्र प्रायश्चित्त है:
एकमाश्वत्थमेकं च पिचुमन्दं च पंचाम्रान्। रोपयित्वा तथा नूनं निरयं नैव गच्छति॥
अर्थ: विवशतावश किए गए दोष के प्रायश्चित्त स्वरूप जो मनुष्य एक पीपल, एक नीम और पाँच आम के पौधे किसी सार्वजनिक स्थान या मंदिर में लगाता है (रोपयित्वा) और उनकी रक्षा करता है, वह कभी भी नरक या उस पाप के दोष को प्राप्त नहीं होता।
सार रूप में अंतिम प्रामाणिक व्यवस्था: सनातन धर्म में “आपद्धर्म” (Emergency Law) के अंतर्गत आत्मरक्षा और संपत्ति की रक्षा की अनुमति है। यदि पीपल आपके घर को गिरा रहा है, तो आप ऊपर दिए गए क्षमा मंत्र का पाठ करके उसे हटा सकते हैं, किन्तु यह आवश्यक है कि आप प्रायश्चित्त स्वरूप अन्य स्थान पर नए पौधों का रोपण और उनकी सेवा करने का संकल्प लें। यही शास्त्रों का अंतिम और सबसे सटीक एवं महत्वपूर्ण निर्णय है।
निष्कर्ष
मूल निष्कर्ष यह है कि अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष साक्षात् नारायण की विग्रह-मूर्ति है, अतः सामान्य स्थिति में उसका छेदन, उसकी डाली या पत्तों को तोड़ना भी ब्रह्महत्या के समान घोर पाप का कारक है। परन्तु, कलयुग के प्रभाव और व्यावहारिक संकटवश यदि पक्षियों के माध्यम से भवन की छतों, दीवारों या नींव की दरारों में पीपल स्वतः उग आए, तो उसे वैसे ही छोड़ देना ‘गृहमध्ये च यो जातः अश्वत्थः सर्वदोषदः’ के अनुसार साक्षात् भीषण वास्तु दोष और भवन-विनाश का कारण बनता है। ऐसी विकट स्थिति में शास्त्रों का “आपद्धर्म” और ‘नीर-क्षीर-विवेक’ यजमान को आत्मरक्षा तथा सम्पत्ति की रक्षा का अधिकार प्रदान करता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में सङ्कलित मन्त्र और विधान भविष्यपुराण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, शौनक स्मृति तथा वराह पुराण के साक्ष्यों पर आधारित हैं। गूगल और अंतर्जाल (सोशल मीडिया) पर व्याप्त अप्रामाणिक कुतर्कों से बचकर, गृहस्थों को भवन-रक्षा हेतु केवल इस शास्त्रीय पद्धति का ही आश्रय लेना चाहिए ताकि पाप से निवृत्ति हो सके। लेखक के इस वैधानिकता-युक्त युगांतरकारी विश्लेषण और संयोजन पर वैधानिक बौद्धिक सम्पदा (कॉपीराइट) अधिकार पूर्णतः सुरक्षित है, प्रमाणों को छोड़कर । विमर्श का उद्देश्य ज्ञानवर्द्धन मात्र है, प्रयोग स्वविवेक से करें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








