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आत्मज्ञान या दम्भ ?

आत्मज्ञान या दम्भ ? आत्मज्ञान या दम्भ ?

“यदि इतनी मात्र अपेक्षा भी शेष है कि दुनिया में उसकी आत्मज्ञानी के रूप में सिद्धि हो, तो अकाट्य सत्य है कि उसने आत्मज्ञान प्राप्त ही नहीं किया।”

आत्मज्ञान अंतिम ज्ञान है इसके पश्चात् अन्य किसी ज्ञान की अपेक्षा ही नहीं रहती किन्तु वर्त्तमान युग में ढेरों दम्भी स्वयं को आत्मज्ञ, तत्वज्ञ, भगवान भी कहते मिलते हैं। वास्तविकता यह है कि सामान्यतः ऐसे दम्भी ही मिलते हैं जो केवल महाज्ञानी होने का दावा किया करते हैं, व्यष्टि-समष्टि आदि करके यह सिद्ध करने का प्रयास मात्र करते हैं कि वो आत्मज्ञ हैं। आत्मज्ञ की अपेक्षायें निर्मूल हो जाती है और उसे यह अपेक्षा भी नहीं रहती कि दुनियां में उसकी आत्मज्ञ सिद्धि हो।

यदि इतनी मात्र अपेक्षा भी शेष है कि दुनियां में उसकी आत्मज्ञ सिद्धि हो तो उसने आत्मज्ञान प्राप्त ही नहीं किया। इस आलेख में आत्मज्ञान और दम्भ के अंतर को समझने का प्रामाणिक प्रयास किया गया है।

आत्मज्ञान या दम्भ ?

आत्मज्ञान के विषय में अनेकों गंभीर प्रश्न होने ही चाहिये; अर्थात जो आत्मज्ञानी होने की घोषणा करता है उसके विषय में कुछ गभीर प्रश्न होंगे ही :

  • वह घोषणा करता है क्या ?
  • वह वेद-कर्मकांड आदि के बारे में सार्वजनिक रूप से क्या कहता है ?
  • वह आचरण के माध्यम से दुनियां को क्या दिखाता है ?
  • तदुपरांत व्यक्तिगत रूप से क्या कहते-करते हैं ?

आत्मज्ञान अत्यंत गुप्त

यहां इन सभी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होगा और आत्मज्ञानी एवं दम्भी का भेद भी स्पष्ट हो जायेगा। विषय का आरम्भ माहेश्वरतन्त्र में वर्णित आत्मज्ञान विषयक प्रमाण से करते हैं :

ज्ञानं तत्तु विजानीयात् येनात्मा भासतेस्फुटः । अज्ञानेनावृतो नित्यं मोहरूपेण नित्यदा ॥
तावत्संसारभावः स्याद्यावदज्ञानमुल्लसेत् । तावन्मोहो भ्रमस्तावत्तावदेव भयं भवेत् ॥
अहं ममेत्यसद्भावो विस्मृतिर्दुःखदर्शनम् । नानाधर्मानुरागश्च कर्मणां च फलैषणा ॥
बन्धमोक्षविभागश्च जडदेहाद्यहंकृतिः । तावदीश्वरभावः स्यात्पाषाणप्रतिमादिषु ॥
जलादौ तीर्थभावश्च यावदज्ञानमुल्लसेत् । उदिते तु परिज्ञाने नाऽयं लोको न कल्पना ॥
न त्वं नाहं न वै किञ्चिन्निवृत्ते मोहविभ्रमे । स्वयमेवात्मनात्मानमात्मन्यात्माभिपद्यते ॥
तदा सुखसमुद्रस्य स्वरूपनिरतो भवेत् । लयश्चात्यन्तिको देवि कदाचिद्वा भविष्यति ॥

माहेश्वरतन्त्र/१/२२ – २८

आत्मज्ञान अंतिम ज्ञान है जिसे प्राप्त करने के पश्चात् अन्य ज्ञान की कोई अपेक्षा ही नहीं होती क्योंकि आत्मज्ञानी आत्मतत्व में आनंदित रहता है। कोई अपेक्षा-आकांक्षा शेष नहीं। एवं उसके लिये माहेश्वरतन्त्र में भगवान शिव कहते हैं कि ये संसार एवं सांसारिक वविषय यहां तक कि कर्म, फल, धर्म, बंधन, मोक्ष, प्रतिमा में ईश्वर भाव, जल में तीर्थभाव ये सभी तभी तक रहता है जब तक कि उसको अज्ञान हो। ज्ञान (आत्मज्ञान) प्राप्त होते ही सभी का लोप हो जाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार कहते हैं :

आत्मज्ञान अत्यंत गुप्त
आत्मज्ञान अत्यंत गुप्त

आत्मज्ञान अंतिम ज्ञान

यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: ॥
श्रीमद्भगवद्गीता/२/४६

अर्थात् जैसे चारों ओर जल होने पर जल की इच्छा समाप्त हो जाती है, ढूंढने की भी आवश्यकता नहीं रहती उसी प्रकार ब्राह्मण के लिये जब वह आत्मज्ञान/ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्चात् सभी वेदों में भी कोई प्रयोजन ही नहीं रहता।

दम्भी वो होता है जिसको यह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ किन्तु ऐसा सिद्ध करता है की वह आत्मज्ञानी है और अब उसके लिये अन्य किसी ज्ञान की आवश्यकता नहीं, सब आडम्बर है।

ऐसा सिद्ध करने वाला महाज्ञानी है। चारों ओर जल होने पर जल ढूंढना नहीं पड़ेगा यह सत्य है किन्तु जल की आवश्यकता ही समाप्त हो गयी यह सत्य नहीं है और न ही ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् वेद में प्रयोजन नहीं रह जाता यह कहा गया है न कि वेद ही निष्प्रयोजन है। आत्मज्ञ को प्रयोजन नहीं रहा ऐसा मात्र कहा गया है। आगे माहेश्वरतन्त्र के वचनानुसार यह अत्यंत गोपनीय होता है और इसलिये यह आवश्यक होता है कि इसको निष्प्रयोजन सिद्ध न किया जाय, आडम्बर न कहा जाय अपितु निष्प्रयोजन होते हुये भी आत्मज्ञानी भी वही आचरण करे।

आत्मज्ञान की कुञ्जी और द्वारोद्घाटन

“वेद, शास्त्र और कर्मकाण्ड वेदमार्ग के कपाट खोलने वाली साक्षात् ‘कुञ्जी’ हैं; द्वार खुलने के बाद कुञ्जी की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाती है।”

क्योंकि जो ज्ञान उसे प्राप्त हो गया वह चौराहे पर खड़ा होकर वितरण नहीं किया जा सकता, अपितु यदि कोई आत्मज्ञान की इच्छा से उपस्थित भी हो तो उसकी कठिन परीक्षा ले, पर्याप्त समय भी ले, ऐसा भी आभास कराये कि वह आत्मज्ञ नहीं है और भगाने का भी प्रयास करे क्योंकि अत्यंत गोपनीय है। आगे पुनः गीता के इस वचन का अवसर उपस्थित हो तो प्रदान करे। उसके लिए कहते हैं :

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता/४/३४

यह आत्मज्ञान देने के विषय में ही कहा गया है और प्रथम पंक्ति में परीक्षा है एवं द्वितीय पंक्ति में योग्य सिद्ध होने पर आत्मज्ञ उसे ज्ञान का उपदेश करें ऐसा कहा गया है।

इससे स्पष्ट होता है कि यह ज्ञान व्हाट्सप पर या चौराहे पर खड़ा होकर नहीं दिया जा सकता, इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि मैं आत्मज्ञ हूँ और ऐसा ज्ञान दे सकता हूँ। मेरे पास यह दिव्यज्ञान है ही नहीं किन्तु होती भी तो प्रकट नहीं करता। और हो जाये तो भी वेद-कर्मकांड सब आडम्बर है ऐसा कहने का अधिकार प्राप्त ही नहीं होता, वो उसको कहा जायेगा जो योग्य सिद्ध हुआ, जिसे ज्ञान आत्मज्ञान प्रदान करना है।

आगे यदि वह दिव्यज्ञान प्राप्त नहीं है तो उसका मार्ग पुनः वेद-कर्मकांड से ही आगे खुलता है, कुञ्जी यहीं है और विस्तार से तन्त्र पर्यन्त। कुञ्जी प्राप्त होने के पश्चात् द्वार जब खोल ले तो पीछे कुञ्जी की भी आवश्यकता समाप्त हो जाती है और इस कुञ्जी की पुनः कभी आवश्यकता भी नहीं हो सकती, एक बार ही कुञ्जी प्राप्त करके द्वार खोलना पड़ता है, दुबारा वह बंद ही नहीं होता। उदाहरण “जड़ भरत

आत्मज्ञान प्राप्त होने पर

न त्वं नाहं तदा विष्णुर्लक्ष्मीर्ब्रह्मासरस्वती । नेश्वरो न शिवश्चापि यथापूर्वं भविष्यति ॥
मृदुद्भवानि कार्याणि मृच्छेशाणि यथाप्रिये । तथैवाखिललोकोऽयं ब्रह्मभूतो भविष्यति ॥
यथा वायुवशाद्देवि समुद्रे तरलोर्मय। प्रादुर्भवन्ति देवेशि तस्मिन् शान्ते तु पूर्ववत् ॥
तथा विस्मारितज्ञानान्मोहाद्भ्रान्तं चराचरम् । चतुर्विंशतितत्त्वोत्थं सत्यमित्येव रूपितम् ॥

तत्र जाता इमे लोकाश्चतुर्दश महेश्वरि । अधः सप्त तथा चोर्ध्वमेवं संख्याश्चतुर्दश ॥
अतलं वितलं चैवं सुतलं च तलातलम् । रसातलं च पातालं भूर्भुवः स्वस्तथोपरि ॥
महर्जनस्तप इति सत्यं वैकुण्ठ इत्यपि । शिवलोको देवलोकस्तथाऽवान्तर्गता अपि ॥
मोहशान्तौ भविष्यन्ति सर्वे ब्रह्ममया इमे । यावत्सर्पमयी भ्रान्ती रज्जौ तावद्भयं प्रिये ॥
रज्जुत्त्वेन तु विज्ञाता भयं नोद्वहते पुनः ॥

माहेश्वरतन्त्र/१/३४ – ४२

आत्मज्ञ के लिये अन्य सभी ज्ञान भी निरर्थक हो जाते हैं क्योंकि अन्य सभी विषय ही विलीन हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती इत्यादि तक का भी जो पूर्वज्ञान प्राप्त होता है वह भी नष्ट हो जाता है। क्योंकि सर्वत्र वह एक तत्व ही दिखता है, उस एक तत्व से भिन्न कुछ भी नहीं। उदाहरण के लिये बताया गया है कि जैसे समुद्र का जल वायुवेग चलायमान होता है किन्तु वायु के शांत होते ही पुनः स्वाभाविक रूप से शांत हो जाता है। ठीक उसी प्रकार आत्मज्ञान के अभाव में मोहवश अन्यान्य सभी विषय पृथक प्रतीत होते हैं किन्तु ज्ञान प्राप्त होते ही मोह (अविद्या) का नाश हो जाता है और परमशांत हो जाता है।

आत्मज्ञान प्राप्त होने पर
आत्मज्ञान प्राप्त होने पर

वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में स्थित हो जाता है अथवा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसमें। उदाहरण में रज्जु-सर्पाभास रूपी अज्ञान को लिया गया है। जब तक रज्जु है यह ज्ञात न हो तभी तक उसमें सर्पाभास रहता है, जैसे ही रज्जु होना ज्ञात होता है सर्पाभास व भय दोनों ही समाप्त हो जाता है।

आत्मज्ञानी का शेष जीवन

यहां तक तो ठीक है कि कुञ्जी यदि प्राप्त हो जाये और उस कुञ्जी से द्वार खोल कर परम ज्ञान प्राप्त कर ले तो आगे क्या ?

  • क्या उसका प्रारब्ध समाप्त हो जायेगा अथवा कर्मफल भोगना ही होगा।
  • यदि कर्मफल भोगना ही होगा तो कब तक एक जन्म ही अथवा अधिक भी ?

ये प्रश्न इस लिये क्योंकि ऐसा भी कहा जाता है कि आत्मज्ञान ही मोक्ष है और यदि मोक्ष है तो पुनर्जन्म नहीं हो सकता अर्थात जिस जन्म में आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है वही अंतिम जन्म होता है। यहां श्रीमद्भागवत महापुराण का यह वचन विशेष रूप से बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है :

भोगेन पुण्यं कुशलेन पापं कलेवरं कालजवेन हित्वा ।
कीर्तिं विशुद्धां सुरलोकगीतां विताय मामेष्यसि मुक्तबन्धः ॥

श्रीमद्भागवतपुराण/७/१०/१३

इस वचन की सुसंगत व्याख्या तो तत्काल नहीं कर सकते किन्तु इसके आधार पर संबंधित प्रसङ्ग का कुछ विशेष भाव स्पष्ट करने के लिये प्रयास कर सकते हैं।

परमज्ञान प्राप्ति के साथ ही मुक्ति मिल गई यह पक्ष ऐसे खंडित हो जाता है कि आगे प्रारब्ध तत्काल नष्ट ही नहीं होता। ये अवश्य है कि उसी जन्म में नष्ट करना चाहे तो किया जा सकता है अर्थात उस जन्म में जो पूर्वार्जित पुण्य-पाप होते हैं उसका समापन भी करना होता है एवं ऐसा एक बार सिद्ध भी होता है कि नष्ट हो जाता है किन्तु यह केवल भ्रम होता है, प्रारब्ध नाश के साथ जीवन भी समाप्त होगा ही होगा।

जब तक जीवन शेष है तब तक प्रारब्ध से बंधा हुआ ही होता है। हां ऐसा है कि सुख-भोग रूप में पुण्यफल कर दुःखादि रूप में पापफल को कुशलता पूर्वक यदि अंगीकार करे एवं उक्त विधि से जीवननिर्वहन करते हुये नयी कामना का बीज उत्पन्न न होने दे तो वह अंतिम जन्म होता है। कदाचित यदि नई कामना बीज अंकुरित हो जाये तो पुनः आवागमन का चक्र बना ही रहता है और इसका उदाहरण पुनः “जड भरत”

“जड भरत” प्रसङ्ग में ऐसे सभी प्रश्नों का उत्तर उपस्थित है।

  • आत्मज्ञानप्राप्ति के उपरांत भी जीवननिर्वहन करना ही होगा और यह प्रारब्ध से जुड़ा हुआ ही है। जीवन को समाप्त करना एक नये पाप बीज का प्रादुर्भाव होगा इस कारण जीवन को समाप्त नहीं किया जा सकता है यह कालानुसार स्वतः समाप्त होगा और जब तक समाप्त न हो तब तक धारण ही करना होता है।
  • जीवन निर्वहन में ऐसा प्रयास होना आवश्यक है कि प्रारब्ध का क्षय हो किन्तु नये बीजों का प्रादुर्भाव न हो इसी को “कुशलेन” कहकर स्पष्ट किया गया है। कुशलता का यही वास्तविक तात्पर्य है। यहां यह भी सिद्ध होता है कि आत्मज्ञान प्राप्ति के पश्चात् भी कर्मयोग से निवृत्ति नहीं होती अपितु कुशलता की आवश्यकता होती है जिससे उन लोगों की मूढ़ता स्पष्ट होती है जो लोग कहते हैं कि सब आडम्बर है। ऐसा प्रतीत होता है किन्तु जीवनपर्यन्त कुशलतापूर्वक कर्मयोग करना ही होता है।
  • जडभरत की कुशलता (पूर्वजन्म में) बाधित हो गई थी और हिरणशावक रूपी नया बीज बना जिससे उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़ा। किन्तु यहां यह भी सिद्ध होता है कि पुनर्जन्म होगा किन्तु वह आत्मज्ञान यथावत ही रहेगा, पुनः कुञ्जी प्राप्त करके द्वार को खोलना नहीं होगा। “कुशलेन” वास्तव में इसी विशेष तथ्य के लिये कहा गया है।

आत्मज्ञानी की सभी कामनाओं का नाश हो जाता है, उसे यह भी कामना नहीं हो सकती कि दुनियां उसे आत्मज्ञानी माने क्योंकि किसी के मानने और न मानने से उसपर कोई प्रभाव ही नहीं होता। वह तो मात्र प्रारब्ध का क्षय करता है। जडभरत उपाख्यान का इस प्रसङ्ग में अत्यंत महत्व है।

दम्भ

“कुशलता का वास्तविक तात्पर्य यही है कि प्रारब्ध के भोगों को भोगते हुए भी, चित्त में नई कामना का कोई भी बीज अङ्कुरित न होने दिया जाए।”

कुछ लोगों को आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता किन्तु शास्त्रों का अध्ययन करके वो ऐसा भाव गढ़ लेते हैं जबकि शास्त्रों में ही कहा गया है कि यह शास्त्रों के अध्ययन से नहीं प्राप्त होता। शास्त्रों का अध्ययन सहायक होता है और इसी को कुछ लोग आत्मज्ञान समझ लेते हैं एवं ऐसा करने वाले ही दम्भी होते हैं। इस भाव को गढ़ लेने से समस्या यह होती है कि वो आत्मज्ञान के मद में चूर होकर कर्मकांड, वेद, शास्त्र सबकी निंदा करने लगते हैं। जबकि आत्मज्ञान प्राप्त होने के पश्चात् और अधिक कुशलता की आवश्यकता कही गयी है।

ऐसे लोग जो आत्मज्ञानी नहीं होते मात्र ऐसा गढ़ लेते हैं वो यह भी गढ़ने लगते हैं कि अब उन्हें और कोई आवश्यकता ही नहीं है। अब वेद की आवश्यकता नहीं, शास्त्रों की आवश्यकता नहीं, कर्मकांड की आवश्यकता नहीं। वो एक प्रातिभासिक आधार लेकर ऐसा सिद्ध करते हैं कि अब मुक्त हो गए हैं और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। जबकि यहां एक नए पाप बीज का प्रादुर्भाव हो रहा होता है।

दम्भी भी दो प्रकार के होते हैं एक अशास्त्रीय घोर नियम-विधान आदि बना लेते हैं अर्थात स्वेच्छाचारी हो जाते हैं। तपस्या भी करेंगे तो उसका भी शास्त्रीय होना आवश्यक है, किन्तु जिसे दम्भ हो जाये वो तपस्या भी अशास्त्रीय करने लगता है। यदि सामान्य रूप से समझें तो श्राद्ध में प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है, द्वादशाह के दिन एक-एक करके मासिक श्राद्ध करना ज्वलंत उदाहरण है। इसके कारण श्राद्ध ही अशास्त्रीय हो जाता है और आगे ऐसे कर्मों को आसुरी भी कहा गया।

एक-एक करके मासिक करना एक ऐसा दुराग्रह बन गया है कि समझाने पर भी विशेष रूप से ब्राह्मणों में ही शास्त्रीय विधान का परित्याग किया जाता है। श्राद्ध के उचितकाल, उचित विधि आदि का रत्तीभर भी विचार नहीं करता है। वह बस एकमात्र इस दुराग्रह से ग्रस्त होता है कि जितना अधिक समय लगेगा उतना विधिपूर्वक होगा। एक-एक करके मासिक श्राद्ध करने में अधिक समय लगेगा इससे यही सही है, जबकि यह दुराग्रह मात्र है, इस विधि से काल का पूर्णतः अतिक्रमण होता है, विधि और मंत्रों का भी लोप होता है।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥

श्रीमद्भगवद्गीता/१७/५ – ६

दूसरा प्रकार होता है जो सरलता ढूंढता है, अर्थात प्रथम के विपरीत होता है। प्रथम दम्भ के कारण अशास्त्रीय विधि से उग्रकर्म का आश्रय लेता है तो द्वितीय सभी विधानों का परित्याग करके जो मन करे ग्रहण करता है जो मन न करे त्याग देता है अथवा जहां नियम कुछ कठोर दिखे उसका परित्याग कर देता है। उपनयन-विवाहादि में इसका बहुत अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है। विवाह में पैंट आदि पहने ही हवन करना है और सबके-सब कुतर्क करने में दक्ष भी होते हैं।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
श्रीमद्भगवद्गीता/१६/२३, स्कन्दपुराण/५ (अवन्तीखण्ड)/रेवा खण्ड/२२७/२२

अंत में मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ की उपरोक्त चर्चा मात्र शास्त्र परिधि में रहकर यथामति प्रयास है। इस चर्चा में त्रुटियां और विसंगतियां होंगी यह सुनिश्चित ही है क्योंकि एक आत्मज्ञानी ही वास्तविकता को व्यक्त कर सकता है और मैं आत्मज्ञानी नहीं हूँ अर्थात मैं यह घोषणा भी कर रहा हूँ कि इस आलेख के आधार पर कोई मुझे आत्मज्ञानी समझने का भ्रम न पाले। यदि कोई आत्मज्ञ पुष्टि करें तो यह मेरा सौभाग्य होगा कि भले ही आत्मज्ञानी नहीं हूँ फिर भी यथामति जो प्रयास किया गया वह सार्थक रहा।

निष्कर्ष

मूल निष्कर्ष यह है कि आत्मज्ञान पूर्णतः परम-गोपनीय, निरहङ्कार और परम-शान्त अवस्था है, जिसकी चौराहा या ‘व्हाट्सऐप’ जैसे माध्यमों पर सार्वजनिक घोषणा करना सर्वथा असम्भव है। यदि किसी तथाकथित ‘महाज्ञानी’ में इतनी मात्र भी आकांक्षा अवशिष्ट है कि संसार उसे आत्मज्ञ या तत्त्वज्ञ के रूप में स्वीकार करे, तो प्रमाणित होता है कि वह साक्षात् अविद्याग्रस्त दम्भी है।

श्रीमद्भगवद्गीता के “यावानर्थ उदपाने…” श्लोक का कुतर्क देकर जो दम्भी वेदों, शास्त्रों और कर्मकाण्ड को ‘आडम्बर’ कहकर उनकी निन्दा करते हैं, वे वास्तव में संकीर्ण मतिभ्रष्ट हैं। आत्मज्ञान प्राप्त होने पर ज्ञानी का वेदों में निजी प्रयोजन (फलेच्छा) समाप्त होता है, न कि स्वयं वेद निष्प्रयोजन हो जाते हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण के “भोगेन पुण्यं कुशलेन पापं…” सिद्धान्त के अनुसार, आत्मज्ञान प्राप्ति के उपरान्त भी देह रहने तक ‘प्रारब्ध’ का भोग अनिवार्य है। वास्तविक आत्मज्ञानी विरक्त होकर कर्मों का परित्याग नहीं करता, अपितु ‘जडभरत’ की भाँति कर्मयोग में और अधिक ‘कुशलता’ धारण करता है, जिससे नए कर्म-बीज अङ्कुरित न हों और प्रारब्ध का पूर्ण क्षय हो सके।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में समाहित तात्विक निष्कर्ष माहेश्वरतन्त्र, गीता और भागवत पुराण के मूल श्लोकों के अन्वेषण पर आधारित हैं। पाखण्डी गुरुओं और स्वघोषित ‘तत्त्वज्ञानियों’ के प्रति किए गए तीखे प्रहार किसी सच्चे साधक या सम्प्रदाय के प्रति द्वेषवश नहीं, अपितु मर्यादा नष्ट करने वाले ‘मनमुखी मद’ के सम्मार्जन हेतु ‘तिक्त ओषधि’ (कड़वी दवा) हैं। इस मौलिक संयोजन पर लेखक का वैधानिक बौद्धिक सम्पदा (कॉपीराइट) अधिकार सुरक्षित है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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