संध्यावंदन प्रयोग

संध्यावंदन प्रयोग संध्यावंदन प्रयोग

“सुविधाभोगी व्यक्ति का पुण्य अर्जित करना सूर्य के पश्चिम में उदय होने के समान असम्भव है।”

सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु । यदन्यत्कुरुते किंचिन्न तस्य फलभाग्भवेत् ॥
सन्ध्यां नोपासते यस्तु ब्राह्मणो मन्दबुद्धिमान् । स जीवन्नेव शूद्रः स्यान्मृतः श्वा सम्प्रजायते ॥

स्कन्दपुराण/५ (अवन्तीखण्डः)/रेवा खण्ड/२००/२१ – २२

नित्यकर्म में संध्यावंदन अनिवार्य रूप से कर्त्तव्य है और यदि न किया जाय तो प्रायश्चित्ति हो जाते हैं। द्विजमात्र के लिये सदाचार का भी अनिवार्य भाग संध्यावंदन है। सदाचार-सदाचार लोग चिल्लाते हैं किन्तु कभी सदाचार का तात्पर्य समझने का प्रयास नहीं करते। सदाचार का तात्पर्य सत्पुरुषों का आचार हो या सत् आचार हो; व्याकरणादि विषयों से विस्तृत व्याख्या की जा सकती है किन्तु सदाचार में क्या-क्या आता है यह शास्त्रों द्वारा पूर्वनिर्धारित है। सदाचार का तात्पर्य सत्पुरुषों का आचार न होकर वो शास्त्रोक्त आचार है जिसका आचरण करने से सत्पुरष बना जा सकता है।

गोविंदं माधवं कृष्णं हरिं दामोदरं तथा। नारायणं जगन्नाथं वासुदेवमजं विभुम् ॥
सरस्वतीं महालक्ष्मीं सावित्रीं वेदमातरम्। ब्रह्माणं भास्करं चन्द्रं दिक्पालांश्च ग्रहांस्तथा ॥
शङ्करं च शिवं शंभुमीश्वरं च महेश्वरम्। गणेशं च तथा स्कन्दं गौरीं भागीरथीं शिवाम् ॥
पुण्यश्लोकोनलोराजा पुण्यश्लोकोजनार्दनः। पुण्यश्लोका च वैदेही पुण्यश्लोकोयुधिष्ठिरः ॥
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चीरजीविनः ॥
एतान्यस्तु स्मरेन्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥

संध्यावंदन प्रयोग

एक सत्पुरुष का दैनिक जीवन किस प्रकार मर्यादित रूप से व्यतीत होना चाहिये यह शास्त्रों में निर्धारित है एवं वही सदाचार कहलाता है, उसका पालन करने वाले सदाचारी कहलाता है। सदाचार का परित्याग करने वाला सदाचारी नहीं हो सकता और सज्जन भी नहीं कहा जा सकता। वर्त्तमान में यदि सार्वजनिक रूप से कोई किसी के बारे में सज्जन कहे तो वह उसे असज्जन/दुर्जन नहीं कह सकता इस बाध्यता से सज्जन शब्द का प्रयोग करता है किन्तु अर्थ लोग समझ जाते हैं कि ये दुर्जन कहना चाह रहे हैं। सदाचार सत्पुरुषों की नित्याचार का ही नाम है एवं इसमें संध्या का प्रमुख स्थान है।

संध्यावंदन प्रयोग
संध्यावंदन प्रयोग

यदि स्वस्थावस्था में संध्या का त्याग किया जाय तो सूर्य की हिंसा करने के समान पाप कहा गया है। यहां यह स्पष्ट है कि अस्वस्थ को छूट दी गयी है, किन्तु किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को छूट नहीं है। स्वस्थ का तात्पर्य शारीरिक और मानसिक दोनों सक्षमता से है। संध्या विषयक कुछ प्रमाण :

नोपतिष्ठन्ति ये संध्यां स्वस्थावस्थास्तु वै द्विजाः । हिंसन्ति वै सदा पापा भगवन्तं दिवाकरम् ॥
अत्रि (संस्काररत्नमाला)

प्रातः संध्यासमीपे च यावद्दंडचतुष्टयम्। तावत्पानीयममृतं पितॄणामुपतिष्ठते ॥
परतो घटिकायुग्मं यावद्यामैकमाह्निकम्। मधुतुल्यं जलं तस्मिन्पितॄणां प्रीतिवर्धनम् ॥
ततस्तु सार्द्धयामैकं जलं क्षीरमयं स्मृतम्। क्षीरमिश्रं जलं तावद्यावद्दण्डचतुष्टयम् ॥
अतः परं च पानीयं यावद्धि प्रहरत्रयम्। तत्परं लोहितं प्रोक्तं यावदस्तंगतो रविः ॥

पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्ड)/४९/२१ – २४

वेदोक्तैरागमोक्तैर्वा मंत्रैरर्घं प्रदापयेत् । अर्चितः सविता येन तेन त्रैलोक्यमर्च्चितम् ॥
अर्चितः सविता दत्ते सुतान्पशुवसूनि च । व्याधीन्हरेद्ददात्यायुः पूरयेद्वांछितान्यपि ॥
अयं हि रुद्र आदित्यो हरिरेष दिवाकरः । रविर्हिरण्यरूपोऽसौ त्रयीरूपोऽयमर्यमा ॥

स्कन्दपुराण/३ (ब्रह्मखण्ड)/धर्मारण्य खण्ड/५/९९ – १०१

पद्मा पद्मासनस्थेनाधिष्ठिता पद्मयोगिनी । सावित्रतेजःसदृशी सावित्री तेन चोच्यते ॥
पद्मानना पद्मवर्णा पद्मपत्रनिभेक्षणा । ध्यातव्या ब्राह्मणैर्नित्यं क्षत्रवैश्यैर्यथाविधि ॥
ब्रह्महत्याभयात्सा हि न तु शूद्रैः कदाचन । उच्चारणाद्धारणाद्वा नरके पतति ध्रुवम् ॥
वेदोच्चारणमात्रेण क्षत्रियैर्धर्मपालकैः । जिह्वाछेदोऽस्य कर्तव्यः शूद्रस्येतिविनिश्चयः ॥

बाला बालेन्दुसदृशी रक्तवस्त्रानुलेपना । उषःकाले तु ध्यातव्या सन्ध्यासन्धान उत्तमे ॥
उत्तुङ्गपीवरकुचा सुमुखी शुभदर्शना । सर्वाभरणसम्पन्ना श्वेतमाल्यानुलेपना ॥
श्वेतवस्त्रपरिच्छन्ना श्वेतयज्ञोपवीतिनी । मध्याह्नसन्ध्याध्यातव्या तरुणाभुक्तिमुक्तिदा ॥
प्रदोषे तु पुनः पार्थ श्वेता पाण्डुरमूर्धजा । सुमृता तु दुर्गकान्तारे मातृवत्परिरक्षति ॥

स्कन्दपुराण/५ (अवन्तीखण्डः)/रेवा खण्ड/२००/३ – १०

संध्या स्थान का चयन

प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर जो पवित्र स्थान निर्धारित हो वहां आसन, जल, पात्रादि लेकर बैठे। नदी आदि जलाशय के तट पर सामान्य प्रोक्षण आदि करने से शुद्धि मान्य, किन्तु गृह आदि वास अथवा मंदिर आदि में भी स्थान को शुद्ध (मार्जनादि) करना आवश्यक होता है। यदि मंदिरों, तीर्थों आदि की बात करें तो वहां की शास्त्रीय शुचिता को भंग कर दिया गया है, विशेष करके नगरों में और इस विषय में न्यायपालिका से प्रश्न है कि मंदिरों-तीर्थों की शास्त्रीय शुचिता का संरक्षण कौन करेगा ? सरकार तो नहीं करेगी। यदि ये प्रश्न कोई न्यायपालिका तक पंहुचा सके तो पंहुचा दे।

गांवों में भी जिन मंदिरों के गर्भगृह में परम्परागत रूप से ही प्रवेश निषिद्ध रहा हो वहीं शास्त्रीय शुचिता होगी अन्यत्र नहीं। जिस मंदिर में शास्त्रीय शुचिता का समापन कर दिया जाता है वहां देवता का अधिष्ठान भी नहीं होता। एक अन्य विषय यह भी है कि कोई भी धर्माचरण प्रदर्शन का विषय तो नहीं है किन्तु गोपनीय अवश्य होता है। लोगों की भीड़ हो अथवा कुत्ते-सूअर आदि के झुंड हों दोनों ही स्थानों पर संध्या आदि कुछ भी प्रशस्त नहीं होता। मंदिर में मंदिर से सम्बंधित कार्य बाधित नहीं होगा एवं तीर्थों में तीर्थ संबंधी कर्म भी भीड़ से बाधित नहीं होता तथापि शांत स्थान हो तो ही उचित।

लोगों को तो यातायात की सुविधा, भोजन-आवासादि की सुविधा चाहिये एवं सुविधाभोगी पुण्य अर्जित करेगा यह सूर्य के पश्चिम में उदय होने के समान है। गंगाजल भी यदि उपानद् धारण करके लाया गया हो तो उससे आचमन करके अशुद्धि ही होती है, किन्तु कूप का जल भी यदि विधिपूर्वक ग्रहण किया जाय तो उससे शुद्धि होगी।

आशा है शास्त्रीय शुचिता का भाव स्पष्ट हो गया है। तीर्थों-जलाशयों-मन्दिरों में अधिक फल कहा गया है किन्तु वहां की शास्त्रीय शुचिता बची हो, भीड़-भाड़ न हो तो वहां तो। तात्पर्य यह है कि केवल एक विषय को लेकर संध्या स्थान का निर्धारण न करे कि मंदिर-तीर्थ-जलाशय आदि में उत्तम होता है। शास्त्रीय शुचिता और शांत वातावरण का भी विशेष विचार करे।

सप्रमाण प्रयोग

उर्ध्वपुण्ड्र-त्रिपुण्ड्रादि यथापरम्परा धारण करे। यथापरम्परा का तात्पर्य भी स्पष्ट होना आवश्यक है क्योंकि आजकल कुछ विशेष सम्प्रदाय वाले स्वयं को परम्पराप्राप्त घोषित करते हुये परोक्षतः हम जैसों को परम्परारहित सिद्ध करने लगे हैं। इस प्रकार से विचार करना भ्रामक है, द्विजमात्र परम्परा से ही सिद्ध होता है परम्परारहित होने पर तो द्विज ही सिद्ध न हो। इस प्रकार विचार करने पर तो वैष्णवों के अनुसार शैव परम्परा अमान्य हो जाएगी और शैवों के लिये वैष्णव परम्परा।

यहां एक समस्या यह भी है कि लोकतांत्रिक परम्परा में जुड़कर सन्यासी अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं और गृहस्थों को परम्पराविहीन घोषित करके ही अपनी परम्परा में जोड़ सकते हैं, क्योंकि यदि परम्पराविहीन सिद्ध न करें तो अपनी परम्परा में जोड़ेंगे कैसे ? गृहस्थ की भिन्न परम्परा होती है और सन्यासियों की भिन्न, गृहस्थों को दीक्षा भी गृहस्थ गुरु से ही लेनी चाहिये। अस्तु जो भी परम्परा हो ऊर्ध्वपुण्ड्र, त्रिपुण्ड्र, पुण्ड्र उसी परम्परा का पालन करना उचित है।

इसी प्रकार शिखाग्रंथि (गायत्री मंत्र से) करे, आसन में भी कुशासन को ही श्रेष्ठ कहा गया है। दर्भादि धारण करके विष्णुस्मरण करे, प्रोक्षणादि करके आचमन करे, आसन शुद्धि आदि करे। पूर्व-ईशान-उत्तराभिमुख होकर संध्या करने के लिये कहा गया है। जलपात्र में ताम्रपात्र ही अधिक प्रशस्त है, कांस्य-पित्तलादि निषिद्ध ही है। अर्घ्यपात्र पृथक होना चाहिये जिसे अर्घा (बोलचाल) भी कहते हैं।

(कुशासने समाविश्य संध्याकर्म समारभेत् । ईशानाभिमुखो विप्र गायत्र्याचम्य वै द्विज ॥)

(प्राङ्‌मुखः सततं विप्रः सन्ध्योपासनमाचरेत् ॥)
मार्जन – गरुडपुराण/आचारकाण्ड/५० /२१

(संकल्प : ॐ अद्यैतस्य ……मासीय ……पक्षीय ……तिथौ ……गोत्रस्य ……. शर्माऽहं (वर्मादि) उत्पात्तदूरितक्षयपूर्वक श्रीपरमेश्वर प्रीतये प्रातः संध्योपासनं करिष्ये ॥)

विनियोग : अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृतो देवताश्वमेधावभृथे विनियोगः

यदि ऋचा का ज एक बार ही होगा तो आचमन ३ बार कैसे हो सकता है और यदि ऋचा को तीन भाग में विभक्त करके ३ आचमन किया जाय तो ऐसा हो सकता है; किन्तु प्रमाण होना चाहिये जो स्पष्ट करे और प्रमाण के अनुसार दोनों ही प्रकारों से किया जा सकता है अर्थात ३ ऋचाओं भिन्न-भिन्न जप और समेकित जप ऐसा भी प्रतीत होता है किन्तु आचमन मात्र ३ बार ही नहीं अपितु ४ बार भी किया जा सकता है जब ४ बार आचमन किया जायेगा तो भिन्न-भिन्न करके जप खंडित हो जाता है अस्तु पूरी ऋचा का जप करके १ आचमन होगा और इस प्रकार से ३ बार अथवा ४ बार भी किया जा सकता है।

सप्रमाण प्रयोग

वैसे आचमन में उपरोक्त ऋचा से एक बार आचमन करके पुनः दो बार आचमन करने का अथवा अन्यान्य मंत्रों से भी करने का वचन मिलता है।

(अघमर्षणं त्र्यृचं तोयं यथावेदमथापि वा । उपपापैर्न लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
त्र्यापं हि कुरुते विप्र उल्लेखत्रयमाचरेत् । चतुर्थं कारयेद्यस्तु ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥
स्कन्दपुराण/५ (अवन्तीखण्डः)/रेवा खण्ड/२००/१४ – १५)

आचमन के उपरांत दाहिने हाथ में जल लेकर अगला मन्त्र पढ़े (जल को देखते हुये) :

इस मन्त्र को पढ़कर उस जल को सव्य (प्रदक्षिण) क्रम से शरीर के चारों ओर घुमाते हुये त्याग करे। आगे प्राणायाम का विनियोग करे :

प्राणायाम विनियोग :

  • ॐकारस्य ब्रह्मऋषिर्गायत्रीच्छन्दोऽग्निर्देवता शुक्लोवर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।
  • सप्तव्याहृतीनां प्रजापतिर्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपङ्क्ति त्रिष्टुब्जगत्यश्छन्दांस्यग्नि वाय्वादित्य बृहस्पतिवरुणेन्द्रविश्वेदेवा देवता अनादिष्ट प्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः।
  • गायत्र्या विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता प्राणायामे विनियोगः।
  • शिरसः प्रजापतिर्ऋषिर्ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवता यजुः प्राणायामे विनियोगः।

इस प्रकार ऋषि, देवता एवं वेद के छन्दों का ध्यान कर तीन बार प्राणायाम करें। प्राणायाम में अपने शरीर की नाभि पर श्याम वर्ण के भगवान् विष्णु का ध्यान करें। हृदय पर कमलासन पर बैठे ब्रह्माजी का ध्यान करें तथा शुद्ध स्फटिक के समान श्वेत वर्ण के भगवान् शंकर का ध्यान अपने मस्तक पर करें। अब अगले मन्त्र से तीन बार प्राणायाम करे :

प्राणायाम विधि :

  • पूरक : प्राणायाम की विधि इस प्रकार है कि नाक के दाहिने छिद्र को अंगुष्ठ से बंद करके नाभि में श्यामवर्ण चतुर्भुज विष्णु का ध्यान करते हुये वायें छिद्र से श्वास ले, इस क्रम में तीन बार मन्त्र जप करें।
  • कुम्भक : तदनंतर अनामिका (चारों अंगुलियों) से वायें नाक को भी बंद करके श्वास रोके और हृदय में कमलासनस्थ रक्तवर्ण चतुर्भुज ब्रह्मा का ध्यान करते हुये तीन बार मंत्र जप करें।
  • रेचक : फिर अंगुष्ठ को दाहिने नाक से हटाकर ललाट मे शुक्लवर्ण त्रिनेत्र शिव का ध्यान करते हुये श्वास छोड़े, श्वास त्याग करते हुये भी तीन बार मन्त्र जप करें।

इस प्रकार से एक प्राणायाम होता है, तीन प्राणायाम करे।

(पञ्चाङ्गुलिभिर्नासाग्रं पीडयेत्प्रणवेन वै । मुद्रेयं सर्वपापघ्नी वानप्रस्थगृहस्थयोः ॥)
कनिष्ठानामिकाङ्गुष्ठैर्यतेश्च ब्रह्मचारिणः ॥ – स्मृतिसंग्रह (संस्काररत्नमाला)

आचमन प्रातःकाल – दो बार आचमन करे (द्विराचामेत्ततः पश्चात्प्रातः सूर्यश्चमेति च)

विनियोग : सूर्यश्चमेति ब्रह्मऋषिः प्रकृतिश्छन्दः सूर्यो देवता प्रातराचमने विनियोगः।

प्रातः संध्या में उपरोक्त मन्त्र से आचमन करे। मध्याह्न और सायं संध्या में प्राणायाम के भिन्न मन्त्र हैं जिनका जो संध्या हो उस संध्या के अनुसार प्रयोग करे अर्थात प्रातः संध्या में इनमें से किसी का प्रयोग नहीं करना है। मध्याह्न में मध्याह्न संध्या का और सायाह्न में सायं संध्या के मन्त्र से आचमन करे। (1)

मार्जन :

विनियोग : आपोहिष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्रीछन्दः आपोदेवता मार्जने विनियोगः।

उपर्युक्त पात्र-पत्र में (गृह में संध्या करे तो पात्र आवश्यक) जल लेकर अगले ७ बार मार्जन (कुशा से) करे :

८वीं बार में जल भूमि पर त्यागे :

९वीं बार पुनः सिर पर मार्जन करे :

(ब्राह्मं तु मार्जनं मन्त्रैः कुशैः सोदकबिन्दुभिः ॥)
मार्जन – गरुडपुराण/आचारकाण्ड/५० /१०

आपोहीति त्रिभिर्मन्त्रैः शिरस्यंसे च विप्रुषः । यस्य क्षयायेत्यधस्तात्क्षिप्त्वाऽद्भिः परिषेचयेत् ॥
मध्यमानामिकाङ्गुष्ठैः क्षेपणं तु कुशोदकैः । रक्षस्तमोमोहजाताञ्जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिजान् ॥
वाङ्मनःकायजान्दोषान्नवैतान्मार्जनं दहेत् ॥ – स्मृतिसंग्रह (संस्काररत्नमाला)

नद्यां तीर्थे हृदे वाऽपि भाजने मृन्मयेऽपि वा । औदुम्बरेऽथ सौवर्णे राजते दारुसंभवे ॥
कृत्वा तु वामहस्ते वा संध्योपास्तिं समाचरेत् ॥ – संस्काररत्नमाला

वामहस्ते जलं कृत्वा ये तु संध्यामुपासते । सा संध्या वृषली ज्ञेया असुरास्तैस्तु तर्पिताः ॥
संस्काररत्नमाला

(प्रयोगान्तर – भूमौ शिरसि चाकाश आकाशे भुवि मस्तके । मस्तके च तथाकाशं भूमौ च नवधा क्षिपेत् ॥)

आचम्य विधिवन्नित्यं पुनराचम्य वाग्यतः । संमार्ज्य मन्त्रैरात्मानं कुशैः सोदकबिन्दुभिः ॥
मार्जन – गरुडपुराण/आचारकाण्ड/५० /१६

पुनः अगला विनियोग करे –

विनियोग : द्रुपदादिवेति कोकिलो राजपुत्र ऋषिरनुष्टुप्छन्दः आपो देवता सौत्रामण्यवभृथे विनियोगः।

जल ग्रहण करके अगले मन्त्र से मार्जन करे (दाहिने हाथ की अनामिक एवं अंगुष्ठा से जल लेकर मस्तक पर छिड़के, यहां प्रमाणानुसार एक बार ही स्पष्ट होता है – मन्त्र प्रयोग पूर्वक अभिमन्त्रण ३ बार, मार्जन १ बार) :

(द्रुपदाख्यश्च यो मन्त्रो वेदे वाजसनेयके । अन्तर्जले सकृज्जप्तः सर्वपापक्षयंकरः ॥)
स्कन्दपुराण/५ (अवन्तीखण्ड)/रेवा खण्ड/२००/१६

(अन्तर्जलमवाङ्‌मग्नो जपेत्त्रिरघमर्षणम् । द्रुपदां वाथ सावित्री तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
आवर्त्तयेद्वा प्रणवं देवदेवं स्मरेद्धरिम् । आपः पाणौ समादाय जप्त्वा वै मार्जने कृते ॥)
गरुडपुराण/आचारकाण्ड/५०/४९ – ५०

अघमर्षण विनियोग : अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप्छन्दो भाववृतो देवताश्वमेधावभृथे विनियोगः

अघमर्षण :दाहिने हाथ में जल लेकर नासापुटस्पर्श करके (नासास्पृष्टजलेन च) श्वास त्याग करने पर जल में जाये। वामनासापुट से श्वास खींचकर वामकुक्षि में पापपुरुष है और उसको बाहर निकाला जा रहा है इस प्रकार के भाव से दक्षिण नासापुट से श्वास का परित्याग करे, जल को बिना देखे वाम भाग में त्याग दे :

(कुयादृतं च मंत्रेण विधिज्ञस्त्वघमर्षणम् । निमज्ज्याप्सु च यो विद्वाञ्जपेत्त्रिरघमर्षणम् ॥
जले वापि स्थले वापि यः कुर्यादघमर्षणम् । तस्याघौघो विनश्येत यथा सूर्योदये तमः ॥)

उद्धृत्य दक्षिणे हस्ते जलं गोकर्णवत्कृते । निःश्वसन्नासिकाग्रेषु पाप्मानं पुरुषं स्मरेत् ॥
ऋतं चेतितृचं वाऽपि द्रुपदां वा जपेदृचम् । दक्षनासापुटेनैव पाप्मानमपसारयेत् ॥
तज्जलं नावलोक्याथ वामभागे क्षितौ क्षिपेत् ॥ – प्रजापति

आचमन विनियोग : अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप्‌छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः।

इस मन्त्र से आचमन (१) करे –

आचमन करके अञ्जलि (इस प्रकार कि अंगुष्ठ पृथक रहे, तर्जनी और अंगुष्ठ का संयोग नहीं होना चाहिये) में चन्दन, फूल और जल लेकर खड़ा होकर प्रणवव्याहृति सहित गायत्री मन्त्र जप करते हुए सूर्यदेव को ३ बार अर्घ्य दे।

(सहायार्थं च सूर्यस्य यो द्विजो नांजलित्रयम्। क्षिपेन्मंदेहनाशाय सोपि मंदेहतां व्रजेत् ॥)

(कराभ्यां तोयमादाय गायत्र्या चाभिमन्त्रितम् । आदित्याभिमुखस्तिष्ठंस्त्रिरूर्ध्वमथ तत्क्षिपेत् ॥)
व्यास (संस्काररत्नमाला)

(जलाभावे महामार्गे बन्धने त्वशुचावपि । उभयोः संध्ययोः काले रजसा चार्घ्यमुत्सृजेत् ॥)
अग्निस्मृति (संस्काररत्नमाला)

(मुक्तहस्तेन दातव्यं मुद्रां तत्र न कारयेत् । तर्जन्यङ्गुष्ठयोगे तु राक्षसी मुद्रिका स्मृता ॥
राक्षसीमुद्रिकार्घ्येण तत्तोयं रुधिरं भवेत् । जलेष्वर्घ्यं प्रदातव्यं जलाभावे शुचिस्थले ॥)
संग्रह (संस्काररत्नमाला)

सूर्योपस्थान : इसके बाद खड़ा होकर प्रातःकाल पूर्वाभिमुख बद्धाञ्जलि होकर, मध्याह्न में उर्ध्वबाहु होकर, सन्ध्याकाल पश्चिमाभिमुख अंजलिबद्ध होकर सूर्योपस्थान करे। (उदुत्यमिति मन्त्रेण पूजयित्वा दिवाकरम् । “नमस्कार प्रियोभानुः”)

विनियोग : उद्वयमिति हिरण्यस्तूप ऋषिरनुष्टुप्‌ छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।

विनियोग : उदुत्यमिति प्रस्कण्व ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।

विनियोग : चित्रमिति कौत्स ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दः सूर्योदेवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।

विनियोग : तच्चक्षुरिति दध्यङ्गाथर्वण ऋषिरक्षरातीतपुर उष्णिक्‌ छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।

मन्त्रैस्तु विविधैः सारैः ऋग्‌यजुःसामसंज्ञितैः । उपस्थाय महायोगं देवदेवं दिवाकरम् ॥
उपस्थान – गरुडपुराण/आचारकाण्ड/५०/२७

तदनन्तर पुनः आसन पर बैठकर न्यास करे :

  1. ॐ हृदयाय नमः।
  2. ॐ भूः शिरसे स्वाहा।
  3. ॐ भुवः शिखाय वषट्।
  4. ॐ स्वः कवचाय हुम्।
  5. ॐ भूर्भुवः स्वर्नेत्रत्रयाय वौषट्।
  6. ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्।

विनियोग :

  • ॐकारस्य ब्रह्मऋषि र्गायत्रीच्छन्दोऽग्निर्द्देवता सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।
  • व्याहृतित्रयस्य प्रजापतिर्ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्नि वाय्वादित्या देवता जपे विनियोगः।
  • गायत्र्या विश्वामित्र-ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः।

गायत्री ध्यान :

गायत्री आवाहन तथा उपस्थान :

विनियोग : तेजोऽसीति देवा ऋषयः शुक्रं दैवतं गायत्रीच्छन्दो गायत्र्यावाहने विनियोगः

विनियोग : परोरजस इति विमलऋषिरनुष्टुप्‌छन्दः परमात्मादेवता गायत्र्युपस्थाने विनियोगः

गायत्री मन्त्र यथाशक्ति १०, १०८ अथवा सहस्र जप ।

(गृहस्थस्य सतारः स्याज्जप्य एवंविधो मुने)

(गायत्रीसारमात्रोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥)
स्कन्दपुराण/५ (अवन्तीखण्डः)/रेवा खण्ड/२००/२०

(करंसर्पफणाकारं कृत्वा तु ऊर्ध्वमुद्रितम् । आनम्रमूर्द्धमचलं प्रजपेत्प्राङ्मुखो द्विजः ॥
अनामिकामध्यदेशादथो वामक्रमेण च । तर्जनीमूलपर्य्यन्तं जपस्यैष क्रमः करे ॥)
करमाला – ब्रह्मवैवर्तपुराण/खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)/२३/१७ – १९, देवीभागवतपुराण/९/२६/१७ – १८

(कृत्वोत्तानौ करौ प्रातः सायं चाधोमुखौ ततः । मध्ये संमुखहस्ताभ्यां जप एवमुदाहृतः ॥)
शौनक (संस्काररत्नमाला)

(यदि वाग्यमलोपः स्याज्जपादिषु कदाचन । व्याहरेद्वैष्णवं मन्त्रं स्मरेद्वा विष्णुमव्ययम् ॥)
योगयाज्ञवल्क्य (संस्काररत्नमाला)

(लोकवार्तादिकं श्रुत्वा श्रुत्वा तु परुषं वचः । संख्यां विना च यज्जप्तं तत्सर्वं निष्फलं भवेत् ॥)
संवर्त (संस्काररत्नमाला)

जपार्पण व विसर्जन :

प्रातः, मध्याह्न मे पूर्व तथा सन्ध्या मे पश्चिम मुख होकर सूर्य को अर्घ्य दे :

कुर्वीत प्रणतिं भूमौ मूर्धानमभिमन्त्रितः ॥
ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे। निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे ॥
त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम्। भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वो रुद्रः सनातनः ॥
एतद्वै सूर्यहृदयं जप्त्वा स्तवनमुत्तमम्। प्रातः काले च मध्याह्ने नमस्कुर्य्याद्दिवाकरम् ॥
गरुडपुराण/आचारकाण्ड/५०/२८ – ३१

(1)

मध्याह्नकाल : आपः पुनन्त्विति विष्णुर्ऋषिर्नुष्टुपच्छन्द आपो देवता मध्याह्नाचमने विनियोगः।

ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्। पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम्॥
यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम सर्वं पुनन्तु मामापोऽहसताश्च प्रतिग्रहग्वंस्वाहा॥

सायंकाल – अग्निश्चमेति रुद्रऋषिः प्रकृतिश्छन्दोऽग्निर्देवता सायमाचमने विनियोगः।

ॐ अग्निश्च मामन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यदह्ना
पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्नाऽअहस्तदवलुम्पतु
यद्किञ्चिद्दुरितं मयि इदमहम्मामृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा॥

इति वाजसनेयिनां सन्ध्याविधिः।

(पादशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च । श्वानमूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत॥)

कालातिक्रम हो तो ?

काललोपो न कर्त्तव्यो द्विजेन स्वहितेप्सुना। अर्द्धोदयास्तसमये तस्माद्वज्रोदकं क्षिपेत् ॥
विधिनापि कृता संध्या कालातीताऽफला भवेत् । अयमेव हि दृष्टांतो वंध्यास्त्रीमैथुनं यथा ॥

स्कन्दपुराण/३ (ब्रह्मखण्ड)/धर्मारण्य खण्ड/५/९३ – ९४

अब कालातिक्रम का विचार करना आवश्यक है क्योंकि कोई भी कर्म हो उचितकाल में ही करना आवश्यक होता है यदि काललोप करके विधिपूर्वक भी संध्या करें तो वह विफला कही गयी है। तथापि प्रमादादि के कारण हो या अन्य कोई कारण यदि कभी कालातिक्रम हो जाये तो उसके लिये अनेकों नियम कहे गए हैं। इन अनेकों नियमों में से एक ऐसा पक्ष है जो न्यूनतम किसी एक को ग्रहण करता है, द्वितीय अधिकतम को भी ग्रहण करता है एवं इन दोनों से भिन्न भी एक पक्ष है।

कालातिक्रम
कालातिक्रम

कालातिक्रमण का तात्पर्य संध्याहानि नहीं है अपितु विलंब होना है। इस स्थिति में कुछ विशेष नियम बताये गये हैं जो प्रमाणों में देखा जा सकता है :

नोपतिष्ठन्ति ये संध्यां स्वस्थावस्थास्तु वै द्विजाः । हिंसन्ति वै सदा पापा भगवन्तं दिवाकरम् ॥
अत्रि

उदयास्तमयादूर्ध्वं यावत्स्याद्घटिकात्रयम् । तावत्संध्यामुपासीत प्रायश्चित्तमतः परम् ॥
स्कंदपुराण

संध्याकाले त्वतिक्रान्ते स्नात्वाऽऽचम्य यथाविधि । जपेदष्टशतं देवीं ततः संध्यां समाचरेत् ॥
जमदग्नि

प्राणायामत्रयं प्रातः संगवे द्विगुणं चरेत् । मध्याह्ने त्रिगुणं प्रोक्तमपराह्णे चतुर्गुणम् ॥
सायाह्ने पञ्चगुणकं संध्यातिक्रमणे भवेत् ॥
– यम

कालातिक्रमणे चैव त्रिसंध्यमपि सर्वदा । चतुर्थ्यार्घ्यं प्रकुर्वीत भानोर्व्याहृतिसंपुटम्॥
वशिष्ठ

प्रातःसंध्यां सनक्षत्रां नोपास्ते यः प्रमादतः । गायत्र्यष्टशतं तस्य प्रायश्चित्तं विशद्धये ॥
यः संध्यां चैव नोपास्ते अग्निकार्यं यथाविधि । गायत्र्यष्टसहस्रं तु जपेत्स्नात्वा समाहितः ॥

  • एक पक्ष है कि आचमन आदि करके अष्टोत्तरशत गायत्री जप करे तत्पश्चात संध्या करे।
  • एक पक्ष प्राणायाम वृद्धि का है, प्रातःकाल (यथाकाल) तीन प्राणायाम, विलम्ब सङ्गव काल तक इसका दुगुना अर्थात ६, मध्याह्न काल हो जाये तो त्रिगुणित अर्थात ९, अपराह्न काल हो जाये तो चतुर्गुणित अर्थात १२ और यदि सायाह्न हो जाये तो पंचगुणित अर्थात १५ प्राणायाम करे।
  • एक पक्ष किसी भी संध्या का अतिक्रमण हो जाने पर तीन सूर्यार्घ्य प्रदान करके एक अतिरिक्त चौथा सूर्यार्घ्य व्याहृति और प्रणव सम्पुट गायत्री से प्रदान करने का है।
  • एक पक्ष अष्टशत गायत्री जप का है वो केवल संध्या में विलम्ब के लिये है, जो संध्या और अग्निकार्य दोनों में ही चूकता है उसके लिये अष्टसहस्र कहा गया है।

उपरोक्त सभी पक्ष यथाकाल यथाविधि संध्या करने के लिये है किन्तु वर्त्तमान में समयाभाव और अज्ञान के कारण, विकृत जीवनचर्यावश अन्यान्य सभी पक्ष संभव नहीं है क्योंकि समय अधिक लगेगा किन्तु यदि सूर्य को एक अर्घ्य बढ़ाने का पक्ष ग्रहण किया जाये तो इसमें अधिक समय नहीं लगेगा। इस कारण इसी पक्ष को सामान्यतः ग्रहण किया गया है।

अब इस विषय से किंचित आगे बढ़ें तो ज्ञात होता है कि अधिकांशतः के तो संस्कार नष्ट हो चुके हैं क्योंकि वर्षों तक संध्या से रहित होने के पश्चात् कर्मकांडी बनने के कारण संध्या आरम्भ करते हैं। यदि कर्मकांडी न बनते तो संध्या करते ही नहीं। यदि हम गंभीरता से विचार करें तो इस प्रकार से संध्या में अधिकार ही नष्ट हो जाता है, पुनःसंस्कार होने पर ही अधिकार की प्राप्ति संभव है। इस विषय को समझने के लिये हमें कालातिक्रम से आगे बढ़कर संध्याहानि को भी समझना होगा।

संध्याहानि

अराजक-आपातकाल-रोगादि भयकारक (दुर्भिक्ष, युद्ध, विप्लवादि) स्थिति होने पर, देवता-अग्नि-ब्राह्मण-राजा का कोई महान कार्य हो अथवा आज्ञा-सेवा आदि अथवा उपस्थिति मात्र भी होने से, अथवा इनमें से किसी के निमित्त भी संलग्न हो तो भी कदाचित संध्या हानि हो जाये तो दोष नहीं होता।

राष्ट्रक्षोभे नृपक्षोभे रोगार्तौ भय आगते । देवाग्निद्विजभूपानां कार्ये महति संस्थिते ॥
संध्याहानौ न दोषोऽस्ति यतस्तत्पुण्यसाधनम् ॥
– जमदग्नि

राजा की तो बात अब की ही नहीं जा सकती है तथापि आज्ञा तो बाध्यकारी ही होगी, इसके अतिरिक्त यदि गुरु-ब्राह्मण का अचानक बुलावा आ जाये (उस समय जब संध्या करने ही वाले थे) तो वहां जाने में संध्या बाधित होगी, किन्तु इसमें दोष नहीं होगा अथवा संध्याकाल में ही ब्राह्मण-गुरु आदि उपस्थित हो जायें तो भी उनका सत्कार करना अनिवार्य होगा भले ही संध्या बाधित हो जाये। पुनः अन्यान्य आज्ञा प्राप्त हो जिससे उस दिन संध्या कर भी न पायें। यह संध्या नष्ट होना है किन्तु उपरोक्त स्थितियों में संध्या नाश का भी दोष नहीं होगा। यथा जब विश्वामित्र यज्ञादि में लीन थे तो राम-लक्ष्मण सुरक्षा में।

यदि किसी श्रद्धावान के घर पर विद्वान द्विज आकर रुकें तो उस गृहस्थ का कर्तव्य उनकी सेवा है, उनकी संध्या आदि की व्यवस्था करना है जैसे जल-पुष्पादि द्रव्य व्यवस्थित करना। कदाचित वो स्वयं संध्या करने बैठ जाय और उधर ब्राह्मण जल मांग दें या किसी अन्य कारण से पुकारें।

एकाहं समतिक्रम्य संध्यावन्दनकर्म तु । अहोरात्रोषितो भूत्वा गायत्र्या अयुतं जपेत् ॥
द्विरात्रे द्विगुणं प्रोक्तं त्रिरात्रे त्रिगुणं स्मृतम् । त्रिरात्रात्परतश्चेत्स्याच्छूद्र एव न संशयः ॥

जमदग्नि

इससे भिन्न स्थिति में प्रमादादिवश संध्याहानि होने पर प्रायश्चित्त कहा गया है। संध्याहानि का तात्पर्य कालातिक्रम से भिन्न है। यदि ऐसा कोई धर्मनिमित्त न हो उस स्थिति में संध्याहानि होना प्रायश्चित्त प्रकट करता है। एक दिन की संध्याहानि में अहोरात्र उपवास पूर्वक अयुत गायत्री जप करे, इसी प्रकार दो दिन में दोगुना, तीन दिन में त्रिगुणित करे। यदि ३ दिन से भी अधिक हानि हो तो शूद्रत्व की प्राप्ति होती है।

संध्यातिक्रमणे यस्य सप्तरात्रं गमिष्यति। उन्मत्तदोषयुक्तोऽपि पुनः संस्कारमर्हति ॥
शातातप

शातातप ने सात दिनों की बात कही है किन्तु यहां उन्मत्तदोष कहा गया है। अर्थात सामान्य स्थिति में तीन दिन की संध्याहानि से ही शूद्रत्व प्राप्ति (संस्कारनाश) कहा गया है। संस्कार नष्ट होने पर पुनःसंस्कार (पुरुपनयन) कहा गया है। किन्तु उसके लिये संस्कारनाश का क्या जो शिक्षा-नौकरी आदि के लिये यज्ञोपवीत का ही त्याग कर देता है। जो यज्ञोपवीत त्याग रहा है, शिखाच्छेदन कर लेता है ऐसों को संध्या-सदाचार-संस्कार की शिक्षा से प्रयोजन ही क्या ?

जो पूर्ण सदाचारी ब्राह्मण गृह में जन्म लिये हों उन्होंने ही संध्याहानि नहीं किया होगा संक्षेप में मात्र इतना कहा जा सकता है। शेष ब्राह्मणेत्तरों की तो बात ही क्या करें ब्राह्मणों में भी उपनयन यथाकाल हो तो वर्षों तक संध्या नहीं करते, यदि कर्मकांडी बनेंगे तो करेंगे और अन्यत्र (नौकरी आदि) व्यस्त हो गए तब तो आगे भी नहीं करेंगे। एक बड़ा भाग व्रात्य भी हो जाता है एवं एक छोटा भाग शाखारण्ड भी हो रहा है। अब आगे की जो पंक्ति है वो बहुत ही कड़वी है :

कर्मकांडी बनने के कारण यदि संध्या करने लगे हैं तो ये संध्या थोड़े न कर रहे हैं, ये तो प्रदर्शन किया जा रहा है। कोई व्यक्तिविशेष स्वयं के बारे में ग्रहण न करे, कुछ अपवाद होंगे किन्तु यही सत्य है कि शास्त्रानुसार सबका संस्कार नष्ट हो चुका है। कर्माधिकार का विषय इस प्रकरण से भी जोड़कर देखना होगा, कर्माधिकार के विषय में अनेकों आलेख पूर्व प्रकाशित हैं :

“सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” में जो प्रतिग्रहाधिकार का अभाव सिद्ध किया गया है वो इस प्रकरण से ही मुख्यतः सम्बंधित है। अपात्र को दान देना दाता के लिये भी नरक का मार्ग प्रशस्त करता है। यहां बारम्बार मूर्खाचार्य कहकर जिसकी भर्त्सना की जाती है वो कोई व्यक्ति विशेष नहीं होते अपितु उनके कुछ लक्षण होते हैं जिनमें से एक इस विषय से सम्बंधित है।

जब यह सिद्ध हो रहा है कि वो व्यक्ति भी जो संध्या कर रहे हैं यदि कर्मकांडी न होते तो नहीं करते अर्थात कर्मकांडी होने के कारण कर रहे हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। अर्थात यजमान जो श्राद्धकर्ता होता है उसने जीवन में कभी संध्या किया ही नहीं होता है, ढेरों तो ऐसे भी होते हैं जिन्हें गायत्री मंत्र तक नहीं आता और मूर्खाचार्य वो हैं जो ऐसे यजमानों को संध्या कराते हैं, गायत्री भी पढ़ाते हैं। अरे वह प्रायश्चित्ति है, कर्माधिकारी नहीं।

इस विषय को अधिक विस्तार देने की आवश्यकता नहीं है किन्तु जिनके संस्कार बचे हैं वो साधुवाद के पात्र हैं, पूज्य हैं, वंदनीय हैं किन्तु चिंताजनक यह है १% भी नहीं होंगे। अन्य जो कर्मकांडी होने के कारण संध्या आरम्भ करने वाले हैं स्वयं विचार करें क्या आपका संस्कार बचा है ? दूसरा गंभीर प्रश्न यह भी है एक बार को प्रायश्चित्त भी कर लें, पुनरुपनयन भी कर लें तदुपरांत क्या संस्कार को सुरक्षित रखेंगे ? इसका भी उत्तर नहीं में ही मिलेगा, जीवनशैली ही कुछ ऐसी हो गयी है कि रक्षा तक भी नहीं कर सकेंगे, इसके भी कुछ अपवाद हो सकते हैं।

यदि उपरोक्त तथ्य पर संदेह हो तो उस व्यक्ति को ढूंढने का प्रयास करें जो कर्मकांडी न हो किन्तु संध्यावंदन आदि से युक्त हो। एड़ियां घिस जायेंगी पर कोई अपवाद ही मिलेगा। और उसने भी उपनयन से आरम्भ नहीं किया होगा अपितु कालक्रम से कुछ संसर्ग प्रभाव और प्रेरित होकर आरम्भ किया होगा।

कृते त्वस्थिगताः प्राणास्त्रेतायां मांसमाश्रिताः । द्वापरे रुधिरं चैव कलौ त्वन्नादिषु स्थिताः ॥
युगे युगे च ये धर्मास्तत्र तत्र च ये द्विजाः । तेषां निन्दा न कर्तव्या युगरूपा हि ते द्विजाः ॥

पराशर स्मृति/१/३२ – ३३

इस विषय में यही कहा जा सकता है कि युगप्रभाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है तथापि यदि शेष (कालातिक्रमपूर्वक संध्या) भी है तो मात्र कर्मकांडियों में ही भले ही वो कर्मकाण्डियों का भी २० – ३०% मात्र अंश क्यों न हो। एकाध प्रतिशत त्रिकाल संध्या करने वाले भी निःसंदेह हैं। ५ – १०% यथाकाल (उचितकाल में) प्रातः संध्या करने वाले भी हैं।

जो कालातिक्रम पूर्वक भी संध्या करने वाले हैं वो भी संध्या न करने वाले से श्रेष्ठ हैं, जो उचितकाल में मात्र प्रातःसंध्या करने वाले हैं वो कालातिक्रम करने वालों से श्रेष्ठ हैं और जो त्रिकालसंध्या करने वाले हैं वो तो श्रेष्ठ, पूज्य, वंदनीय, तीर्थस्वरूप हैं ही। किन्तु इनके अतिरिक्त अधिकांश जो संध्या से रहित भी हैं वो आत्मपरक दोषग्रस्त हैं, कर्मकांड ज्ञान मात्र के कारण यजमानों के लिये श्रेष्ठ ही हैं। यदि इनमें द्विजत्व खंडित किया जाय तो धर्म का ही लोप हो जाय।

वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्। आचारश्चैव साधूनां आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥
मनुस्मृति/२/६

विशेषावस्था व संक्षिप्त संध्या प्रयोग

अब विशेषावस्था में संक्षिप्त संध्या प्रयोग को भी समझना आवश्यक है, यद्यपि अनेकानेक स्थानों पर संक्षिप्त संध्याविधि कहकर मनमानी करते हुये अप्रामाणिक रूप से काट-छांट करके देखने को मिल सकता है। अप्रामाणिक का तात्पर्य शास्त्र से जो प्रमाणित नहीं हो सके अर्थात जिसका प्रमाण अनुपलब्ध हो। किन्तु यहां जो संक्षिप्त संध्या विधि दी जायेगी वह प्रामाणिक है और इसका कारण यही है कि उपलब्ध प्रमाण के अनुसार संपादन किया गया है, स्वेच्छा से कुछ भी न्यूनाधिक नहीं किया गया है। किंतु उससे पहले प्रयोग को समझ लेना आवश्यक है कि कब-कौन कर सकते हैं ?

नित्येप्रवर्तमाने तु यदा नैमित्तिकं भवेत् । समाप्याल्पेन कालेन नित्यनैमित्तिकञ्चरेत् ॥
सन्ध्यापरार्द्धकालाचेत् पूर्वार्धे विद्यते यदि । नैमित्तिकं स्वकाले तु कर्तव्यमविचारतः ॥
सन्ध्यामप्यल्पकालेन चापरार्धे समाचरेत् । तन्त्रैणैवाप्यनुष्ठानमुभयत्र समाचरेत् ॥

कामिकागम/उत्तरभाग/चतुर्थ पटल/२५२ – २५५

पहली बात तो नित्य और नैमित्तिक दोनों के उपस्थित होने पर प्रमाण के अनुसार नित्य को संक्षेप में संपन्न करके नैमित्तिक कर्म करे। उदाहरण यदि नवरात्रा के दिन प्रातःकाल कलश स्थापन कर रहे हैं तो वहां बहुत सारी व्यवस्था भी करनी होती है और उक्त स्थिति में संक्षिप्त रूप से नित्यकर्म संपन्न किया जाना चाहिये, ये शास्त्र की ही आज्ञा है – “समाप्याल्पेन कालेन नित्यनैमित्तिकञ्चरेत्”

दूसरी बात यह भी बताई गयी है कि यदि कोई नैमित्तिक कर्म संध्या के पूर्वार्द्ध में आ रहा हो और संध्या परार्द्ध में हो (मध्याह्न और सायाह्न में यह स्थिति हो सकती है) तो पहले नैमित्तिक कर्म ही संपन्न करे उसके पश्चात् संध्या के लिये अल्पकाल शेष रहने पर भी संक्षिप्त विधि से करे। यदि काल शेष रहने की संभावना न हो तो नैमित्तिक के साथ ही तंत्र करके संपन्न करे। इसका उदाहरण भी आवश्यक है : मध्याह्न में मुख्य रूप से श्राद्ध (एकोद्दिष्ट) को कह सकते हैं, एवं प्रदोषकाल में तो अनेकों व्रतादि निमित्त से पूजन हो सकता है, दीपदान हो सकता है।

इस प्रकार प्रामाणिक रूप से मुख्यतः दो विषय यहां स्पष्ट हुये कि संक्षिप्त संध्या विधि का प्रयोग कब कर सकते हैं। इसके साथ ही अन्यान्य अनेकों परिस्थिति जहां संध्याहानि को भी दोषमुक्त कहा गया है (पूर्वोक्त) यदि वहां संभव हो तो संक्षिप्त कर सकेंगे। अब द्वितीय प्रकार से भी समझते हैं :

  • जो आरम्भ कर रहा है वह पूरी विधि जब तक न सीखे तब तक संक्षिप्त विधि का आश्रय ले सकेगा, किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं होगा कि वह संध्या सीखे ही नहीं, संक्षिप्त का ही प्रयोग करता रहे।
  • यदि अत्यंत व्यस्त रहता हो (पेपर पढ़ने, टीवी देखने, सोशल मीडिया चलाने आदि निरर्थक कार्यों में नहीं) ।
  • जब अनुष्ठान, मङ्गल कार्य, उत्सव आदि उपस्थित हो जाये।
  • जो करता ही नहीं है उसके न करने से तो अच्छा संक्षिप्त करना माना ही जायेगा।

संक्षिप्त संध्या विधि

प्रातरावश्यकं शौचं कृत्वा स्नानं विधाय च । सूर्यश्चेत्यादिभिर्मन्त्रैः संध्यासु तिसृषूदकम् ॥
पीत्वा संमार्जयेत्तद्वद्दधिक्राविण्णेति चादिभिः ।
ओं भूर्भुवस्स्वरादि मन्त्रेण वारत्रयमथांजलिम् ॥
पुनस्तेनैव मन्त्रेण दशवारं जपन्नयेत् । एतत् प्रतिदिनं कार्यं द्विजत्वापत्ति सिद्धये ॥

कामिकागम/उत्तरभाग/प्रथम पटल/२ – ५

प्रातरावश्यकं शौचं कृत्वा स्नानं विधाय च : शौचादि से निवृत्त होकर स्नानादि करके यथाचार पुण्ड्र/तिलक धारण, ग्रंथि बंधन, दर्भधारण, विष्णुस्मरण, आचमन, आसनशुद्धि करके सामग्री प्रोक्षण सामान्य विधि से करे।

सूर्यश्चेत्यादिभिर्मन्त्रैः संध्यासु तिसृषूदकम् पीत्वा : संध्या “सूर्य्यश्च मा मन्युश्च” आदि मंत्रों से तीन बार आचमन करे। तात्पर्य अन्य मंत्रों में से विकल्प भाव ग्रहण करके किसी एक मन्त्र का एक जप करके ही तीन बार आचमन करे।

संमार्जयेत्तद्वद्दधिक्राविण्णेति चादिभिः – मार्जन में दधिक्राव्णो आदि जिस मन्त्रों में से जिसका प्रयोग किया जाता हो उसका वैकल्पिक रूप से ग्रहण करते हुये मार्जन करे। सामान्य प्रयोग में आपोहिष्ठा लिया जाता है तो इसी को ग्रहण करे क्योंकि इसका अभ्यास भी होगा। विकल्प का यही तात्पर्य है कि उसके निमित्त जो-जो मन्त्र कहे गए हैं उसमें से किसी एक का वैकल्पिक रूप से प्रयोग करते हुए मार्जन करे।

ओं भूर्भुवस्स्वरादि मन्त्रेण वारत्रयमथांजलिम् – सूर्य भगवान को तीन बार गायत्री प्रणव-व्याहृति आदि सहित गायत्री मन्त्र से तीन अञ्जलि जल दे अर्थात अर्घ्य प्रदान करे।

पुनस्तेनैव मन्त्रेण दशवारं जपन्नयेत् – पुनः उसी (गायत्री) मन्त्र का १० बार जप करे।

एतत् प्रतिदिनं कार्यं द्विजत्वापत्ति सिद्धये : आपत्ति में द्विजत्व सिद्धि (संरक्षण) हेतु इस विधि से प्रतिदिन संध्या करे।

प्रयोग

आचमन :

विनियोग : सूर्यश्चमेति ब्रह्मऋषिः प्रकृतिश्छन्दः सूर्यो देवता प्रातराचमने विनियोगः।

मार्जन :

विनियोग : आपोहिष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्रीछन्दः आपोदेवता मार्जने विनियोगः।

उपर्युक्त पात्र-पत्र में (गृह में संध्या करे तो पात्र आवश्यक) जल लेकर अगले ७ बार मार्जन (कुशा से) करे :

सूर्यार्घ्य दान :

जप :

करमाला पर दश बार प्रणव व्याहृति सहित गायत्री मन्त्र का जप करे।

तदनन्तर भगवान सूर्य को नमस्कार करे।

॥ इति पं० दिगम्बर झा सुसम्पादितं “करुणामयीटीकाऽलंकृतं” आपद्यादौ संक्षिप्तसंध्याविधिः ॥

विशेष महत्वपूर्ण प्रमाण

भिन्नपादा तु गायत्री ब्रह्महत्याप्रणाशिनी । अभिन्नपादा गायत्री ब्रह्महत्यां प्रयच्छति ॥
अच्छिन्नपादागायत्रीजपं कुर्वन्ति ये द्विजाः । अथोमुखाश्च तिष्ठन्ति कल्पकोटिशतानि च ॥
सम्पुटैका षडोङ्‌कारा गायत्री विविधा मता । धर्मशास्त्रपुराणेषु इतिहासेषु सुव्रत ॥

देवीभागवतपुराण/११/१७/१ – ३

सहस्रकृत्वो गायत्र्याः शतकृत्वोथवा पुनः । दशकृत्वोथ देव्यैव कुर्यात्सौरीमुपस्थितिम् ॥
स्कंदपुराण/४/१/३५/१६०

दशभिर्जन्मभिर्लब्धं शतेन तु पुराकृतम् । त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हन्तिकिल्बिषम् ॥
स्कन्दपुराण/५ (अवन्तीखण्डः)/रेवा खण्ड/२००/१९

गायत्री का एक जप मात्र करने से दिन में हुये पापों का नाश होता है, यदि १० बार जप किया जाय तो अहोरात्र के पापों का नाश होता है। शत जप से मासभर के पापों का और सहस्र जप करने से वर्षभर के पापों का नाश होता है, इसी प्रकार लक्ष जप से जन्मभर के पापों का नाश, दशलक्ष से त्रिजन्म के पापों का और कोटि जप करने से सभी जन्मों के पापों का नाश होता है। गायत्री जप से जब पापों का नाश होता है तो गायत्री जप का अधिकार अवश्य ही सुरक्षित माना जायेगा अन्यथा धर्म का ही लोप हो जायेगा। अस्तु सभी ब्राह्मणों को संध्या में मात्र १० नहीं सहस्र जप या और भी अधिक जप करने का प्रयास करना चाहिये।

सकृज्जपश्च गायत्र्याः पापं दिनकृतं हरेत् । दशधा प्रजपान्नॄणां दिवारात्र्यघमेव च ॥
शतधा च जपाच्चैवं पापं मासार्जितं परम् । सहस्रधा जपाच्चैव कल्मषं वत्सरार्जितम् ॥
लक्षं जन्मकृतं पापं दशलक्षं त्रिजन्मनः । सर्वजन्मकृतं पापं शतलक्षो विनश्यति ॥

ब्रह्मवैवर्तपुराण/खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)/२३/१४ – १६, देवीभागवतपुराण/९/२६/१४ – १६

श्वेतपङ्कज बीजानां स्फाटिकानां च संस्कृताम् ॥
कृत्वा वा मालिकां राजञ्जपेत्तीर्थे सुरालये । संस्थाप्य मालामश्वत्थपत्रसप्तसु संयतः ॥
कृत्वा गोरोचनाक्तां च गायत्र्या स्नापयेत्सुधीः । गायत्रीशतकं तस्यां जपेच्च विधिपूर्वकम् ॥
अथवा पञ्चगव्येन स्नाता माला च संस्कृता । अथ गङ्गोदकेनैव स्नाता वाऽतिसुसंस्कृता ॥

माला – ब्रह्मवैवर्तपुराण/खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)/२३/१९ – २२, देवीभागवतपुराण/९/२६/१९ – २२

तिष्ठंश्च वीक्ष्यमाणोऽर्कं जपं कुर्य्यात्समाहितः । स्फटिकाब्जाक्षरुद्राक्षैः पुत्रजीवसमुद्भवैः ॥
माला – गरुडपुराण/आचारकाण्ड/५०/२८

ब्राह्मणों को आजन्म त्रिकाल संध्या करने का प्रयास करना चाहिये क्योंकि ऐसे ब्राह्मण तप के प्रभाव से सूर्यसदृश कहे गए हैं। ऐसे ब्राह्मणों के जहां चरण पड़ते हैं वो भूमि पवित्र हो जाती है, वो जीवन्मुक्त हो जाते हैं, उनके स्पर्श से तीर्थ भी पवित्र होते हैं।

यावज्जीवनपर्य्यन्तं यस्त्रिसन्ध्यां करोति च । स च सूर्य्यसमो विप्रस्तेजसा तपसा सदा ॥
तत्पादपद्मरजसा सद्यः पूता वसुन्धरा । जीवन्मुक्तः स तेजस्वी सन्ध्या पूतो हि यो द्विजः ॥
तीर्थानि च पवित्राणि तस्य स्पर्शनमात्रतः । ततः पापानि यान्त्येव वैनतेयादिवोरगाः ॥
न गृह्णन्ति सुराः पूजां पितरः पिण्डतर्पणम् । स्वेच्छया च द्विजातेश्च त्रिसन्ध्यरहितस्य च ॥

त्रिकालसंध्याफल – ब्रह्मवैवर्तपुराण/खण्डः २ (प्रकृतिखण्डः)/२३/२७ – ३०, देवीभागवत/९/२६/२७ – ३०

दिवोदितानि कर्माणि प्रमादादकृतानि चेत् । शर्वर्याः प्रथमे यामे तानि कुर्याद्यथाक्रमम् ॥
नारदपुराण/पूर्वार्द्ध/२७/६६

मध्यमाभिर्मुखं पूर्वं तिसृभिः समुपस्पृशेत् ॥
अंगुष्ठदेशिनीभ्यां च नासां च तदनंतरम्। अंगुष्ठानामिकाभ्यां च चक्षुषी समुपस्पृशेत् ॥
कनिष्ठांगुष्ठतश्श्रोत्रे नाभिमंगुष्ठकेन तु। तलेन हृदयं न्यस्य सर्वाभिर्मस्तकोपरि ॥
बाहूचाग्रेण संस्पृश्य ततः शुद्धो भवेन्नरः। अनेनाचमनं कृत्वा मानवः प्रयतो भवेत् ॥

पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्ड)/४९/११६ – ११९

विद्वद्जनों से विनम्र आग्रह : त्रुटि की संभावना सदैव रहती ही है जहां कहीं त्रुटि प्राप्त हो विवेक से शोधनपूर्वक प्रयोग करें एवं त्रुटि के प्रति सुझाव भी प्रेषित करें : 7992328206

निष्कर्ष

इस शोधपरक विमर्श का मूल निष्कर्ष यह है कि सन्ध्यावन्दन कोई वैकल्पिक उपासना नहीं, अपितु द्विजमात्र के कर्माधिकार और सदाचार की आधारशिला है। कलयुग के इस संक्रमण काल में भौतिक सुविधाओं की चकाचौंध में घिरे समाज ने ‘शास्त्रीय शुचिता’ और ‘नित्याचार’ का समूल लोप कर दिया है। शास्त्रों के साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि तीन दिन से अधिक सन्ध्या का मतिपूर्वक परित्याग करने पर द्विज का संस्कार नष्ट हो जाता है और उसे शूद्रत्व की प्राप्ति होती है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

सूचना: इस आलेख में समाहित शास्त्रीय निष्कर्ष और ‘म्लेच्छ जीवनशैली’ अथवा ‘मूर्खाचार्य’ जैसे शब्दों का प्रयोग किसी सम्प्रदाय या व्यक्ति विशेष के प्रति वैमनस्यवश नहीं, अपितु महाभारत के शांतिपर्व की मर्यादा के अनुसार ‘शास्त्रदस्युओं’ के दम्भ-दलन और यजमानों की आत्म-वंचना को जाग्रत करने हेतु ‘तिक्त ओषधि’ (कटु दवा) के रूप में किया गया है। तीर्थों और मन्दिरों की शासकीय व्यवस्था के कारण नष्ट हुई शास्त्रीय शुचिता के प्रति ध्यानाकर्षण करना भी इस विमर्श का परम लक्ष्य है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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