अस्थिसंचय प्रयोग में अनेकानेक पक्ष हैं – प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम और नवम दिवस को अस्थिसंचयन कहा गया है। इसका सूक्ष्म अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम दिवस एकाह वा सद्यःशौच से सम्बंधित है, प्रथम-द्वितीय अथवा त्रिरात्राशौच के से सम्बंधित है। तृतीय-चतुर्थ दशरात्राशौच या ब्राह्मण के विषय में है, पंचम क्षत्रिय विषयक, सप्तम वैश्य के लिये और नवम शूद्र के लिये भी हो सकता है। इसके साथ ही विघ्न वा अन्यान्य कारणों से न हो सके तो अगले विकल्प को ग्रहण करे यह भी पक्ष है। दशरात्राशौच में चतुर्थ दिवस महत्वपूर्ण पक्ष है क्योंकि वहां तीन-दिन स्पर्शाशौच होता है।
अस्थिसंचय प्रयोग
यहां अस्थिसंचय प्रयोग में अत्यधिक विचार न करके मिथिलादेशीय परंपरानुसार प्रयोग दिया जा रहा है, यदि इस विषय में कोई सुझाव-परामर्श आदि विद्वान देना चाहें तो स्वागत है। अस्थिसंचय में कोई संशोधन नहीं किया जा रहा है। अस्थिसंचय विषयक सभी महत्पूर्ण चर्चा पूर्वकृत है इस कारण यहां चर्चा का विस्तार किये बिना प्रयोग को ही प्रस्तुत किया गया है। किन्तु वर्त्तमान में जो मैथिल पद्धति विशेषरूप से उपलब्ध है और प्रयोग भी किया जा रहा है उसमें विकृतियों को देखकर कुछ विशेष महत्वपूर्ण तथ्य को स्पष्ट करना आवश्यक है :
शर्मा या प्रेत प्रयोग : अस्थिसंचय की वाजसनेयी पद्धति को देखेंगे तो उसमें “शर्मणः” (संकल्प में) है किन्तु छन्दोगी में “प्रेतस्य” है। अस्थिसंचय में प्रेत पद ही प्रयुक्त किया जायेगा।
सूर्य नमस्कार करे अथवा नहीं : आप उपलब्ध पद्धति में यदि अवलोकन करें तो “सूर्यं प्रणमेत्” निर्देश प्राप्त होगा। अशौच में सूर्य नमस्कार भी नहीं किया जा सकता है।
दक्षिणा प्रयोग सपात्रक या अपात्रक विधि से : यदि वाजसनेयी पद्धति में अवलोकन करें तो अपात्रक है अर्थात “यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे” है किन्तु यदि छन्दोगी में देखें तो “यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणांतुभ्यमहं सम्प्रददे” करके तदुपरांत “ॐ स्वस्ति” प्रतिवचन भी निर्देशित है। सोचिये कितना विरोधाभास है साथ ही जब श्राद्ध में सर्वत्र सपात्रक की भांति “अमुक गोत्राय …..” का प्रयोग किया गया है तो अस्थिसंचय में यथानाम गोत्राय कैसे हो सकता है ? यह एक गंभीर प्रश्न है, यहां पूर्ण अपात्रक प्रयोग प्रतिष्ठित किया जा रहा है अस्तु सर्वत्र ही “यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे” प्रयोग दिया गया है एवं “ॐ स्वस्ति” इस प्रतिवचन के बिना साथ ही अस्थिसंचय में भी यही विधि होनी चाहिये।
श्राद्धोपरांत स्नान : एकोद्दिष्ट श्राद्ध के उपरांत स्नान आवश्यक है किन्तु दोनों ही पद्धतियों में विलोप कर दिया गया है। बहुत पंडित ऐसा कहते मिलते हैं कि पुस्तक में कहां लिखा है अथवा ऐसा ही लिखा है तो वो स्नान ढूंढें कहां लिखा है और यदि नहीं लिखा है तो क्यों नहीं ? एकोद्दिष्ट के उपरांत बांधवों सहित स्नान होना चाहिये तदुत्तर अस्थिसञ्चय।
अस्थिप्रक्षेप (विसर्जन) की दक्षिणा : अस्थिप्रक्षेप की दक्षिणा का दोनों पुस्तकों में अवलोकन करें वाजसनेयी में “हिरण्यमग्निदैवतं” है तो छन्दोगी में “रजतंचन्द्रदैवतं” ऐसी विकृति असह्य है। तदुपरांत दोनों में “यथानामगोत्राय” प्रयोग तो है होकर भी प्रतिवचन “ॐ स्वस्ति” उल्लिखित है, प्रतिवचन कौन देगा ?
यह पद्धतिकार का अन्तर्द्वन्द था जिससे उन्हें दोनों ही पक्षों को यथाकाल सिद्ध करने के लिये उपयोगी लगा। इस प्रकार से प्रथम संस्करण (PDF) में कुछ भी स्पष्ट उल्लेख करने से बचने का प्रयास किया गया था किन्तु बहुतों को प्रामाणिक प्रतीत होता है तो कुछ ऐसे विषय को उद्धृत किया गया है जिससे प्रामाणिकता का खंडन हो रहा है।
प्रयोग (एकोद्दिष्ट)
चतुर्थ दिन स्नानादि करके उर्ध्वपुण्ड्र धारण करके चर्तुथ पिंड (दशगात्र विषयक) प्रदान करके श्राद्धदेश निर्धारण करके गोमयादि से लेपन, उल्मुक भ्रमण, गौरमृत्तिका आच्छादन आदि करके पीलीसरसों-तिलादि से भूतोपसारण करके पाक कर्म करे। पाक के पश्चात् रक्षादीप प्रज्वलित करके श्राद्ध सामग्री यथास्थान असादित करे। पूर्वाभिमुख-सव्य पवित्रीधारण, भगवान विष्णु का स्मरण आचमन आदि करके श्राद्ध सामग्री का प्रोक्षण कर ले। तदनन्तर त्रिकुशा-तिल-जल लेकर संकल्प करे –

संकल्प (स.पू.त्रि.): ॐ अद्य ……… मासि ….… पक्षे ……… तिथौ ……. गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्टश्राद्धमहं करिष्ये ॥
संकल्प कर तिल जलादि भूमि पर गिराये त्रिकुशा सहित। भूस्वामि का भाग प्रदान करना श्राद्ध का अंग नहीं है, यदि स्वभूमि पर श्राद्ध करे अथवा नदी-तीर्थ-पर्वत आदि ऐसा स्थान हो जिसका कोई स्वामी नहीं होता तो अनावश्यक है और यदि परकीयभूमि पर श्राद्ध कर रहे हों तभी आवश्यक। अपने बांये भाग में अर्थात पिंड वेदी के पूर्वभाग में अथवा श्राद्धभूमि के अग्निकोण में भूस्वामि के अन्न का उत्सर्ग करे –
भूस्वामि अन्नोत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ इदमन्नं एतद् भूस्वामि पितृभ्यो नमः ॥
यदि परकीयभूमि पर श्राद्ध कर रहे हों तो भूस्वामि का अन्न उत्सर्ग करके सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन करके त्रिकुशा लेकर तीन बार गायत्री मंत्र (शिष्टाचार रूप में ग्राह्य) जप करे।
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥
तदनन्तर सव्य-पूर्वाभिमुख-त्रिकुशहस्त होकर तीन बार पितृगायत्री का जप करे : दक्षिणाभिमुख-अपसव्य-पातितवामजानु होकर पूर्वकल्पित दक्षिणाग्र आसन को तिल-जल से प्रोक्षित करे, फिर मोटक, तिल, जल से आसन उत्सर्ग करे :
आसन (अ.द.मो.): ॐ अद्य ……….. गोत्र पितः ……….. प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धे इदमासनं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
पितृतीर्थ से पूर्वकल्पित आसन पर छिड़के। तिल विकिरण (अ.द.त्रि.) : ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः ॥ श्राद्धभूमि में तिल बिखेरे।
आवाहन (अ.द.त्रि) : ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽअग्निष्वात्ता: पथिभिर्देवयानै: अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ (मिथिला का मान्य पक्ष)
अर्घ्य स्थापन – अर्घ्यपात्र में दक्षिणाग्र पवित्री देकर, शन्नो देवी मंत्र से जल दे, तिलोऽसि मंत्र से तिल दे : फिर बिना मंत्र के पवित्री-पुष्प-चंदन भी दे :
- जल (अ.द.त्रि.) : ॐ शन्नो देवीरभिष्टय ऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभि स्रवन्तुनः॥ अर्घ्य पात्र में जल दे।
- तिल (अ.द.त्रि.) : ॐ तिलोऽसि सोम देवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्नद्भिः पृक्त: स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वाहा ॥
अर्घ्य पात्र में जल-तिल देकर बिना मंत्र के पुष्प-चंदन भी दे, मिथिला में पवित्री आदि के मन्त्र को ग्रहण नहीं किया गया है। अर्घ्य पात्र को बांये हाथ में लेकर पवित्री निकाल कर भोजन पात्र पर उत्तराग्र रखे, अन्य जल से सिक्त करे। दांये हाथ से अर्घ्यपात्र को ढंककर अगले मंत्रों से अभिमन्त्रण, उत्सर्जन और न्युब्जीकरण करे : –
- अर्घ्याभिमंत्रन (अ.द.त्रि.) : ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूबुर्या आंतरिक्षा उत पार्थीवीर्या:। हिरण्यवर्णा याज्ञियास्ता न आपः शिवा: स ᳪ स्योना: सुहवा भवन्तु ॥ फिर दाहिने हाथ में मोटक, तिल, जल लेकर अर्घ्योत्सर्ग करे :
- अर्घ्योत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धे इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम्॥ फिर अर्घपात्र दाहिने हाथ में लेकर पूर्वसिक्त कुशा पर पितृतीर्थ से अर्द्ध जल दे ।
- न्युब्जीकरन (अ.द.मो.) : ॐ पित्रे स्थानमसि ॥ भोजन पात्रस्थित कुशा को पुनः अर्घ्य पात्र में रखकर आसन के वाम (पश्चिम) भाग में अधोमुखी कर दे। यह अधोमुखी पूड़ा दक्षिणा देने तक न हिले ऐसी व्यवस्था रखे।
अर्चन : गन्धादि उत्सर्ग (मोटकहस्त-तिल-जल-पुष्प-चन्दन लेकर अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………….. गोत्र पितः ……….. प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धे एतानिगन्धपुष्पधूपदीपताम्बूल वस्त्रादिऽआच्छादनानि ते मया दीयन्ते तवोपतिष्ठन्ताम् ॥ पितृतीर्थ से गन्धादि सभी वस्तुओं पर छिड़के।
अ.द.त्रि. भोजन पात्र और आसन को अपसव्य/अप्रदक्षिण क्रम से जल से मंडल करे। अन्नादि परोसकर अधोमुखी दाहिने हाथ से प्रेतान्न का स्पर्श कर (अथवा मधु दे) मधुव्वाता मंत्र पढ़े , दाहिने हाथ के नीचे अधोमुखी बांया हाथ लगाते हुए पृथिवी ते …… आदि मन्त्र पढ़े। (भोजनपात्र में तिल न रहे इसका ध्यान रखे अर्थात भोजनपात्र की सफाई कर ले) अवगाहन करने के लिये अन्य पूड़े में सतिल-जल-घृत (जलपात्र (पूड़े) में जल रखकर, घृतपात्र (पूड़ा) में घृत देकर) रखे :
मधु दे अथवा यदि पहले दिया गया हो तो दाहिने हाथ से भोजन पात्र का स्पर्श करे (अ.द.त्रि.) : ॐ मधुव्वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्न: सन्त्वोषधिः मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव ᳪ रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां२ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तुनः ॥ ॐ मधु मधु मधु ॥
पात्रालम्भन (अ.द.त्रि.) :
- ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते ऽअमृतं जुहोमि स्वाहा ॥
- ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पा ᳪ सुरे ॥
- ॐ कृष्ण कव्यमिदं रक्षमदियं ॥
बांये हाथ को अन्न में लगाकर रखते हुए दाहिने हाथ के अंगूठे से क्रमशः अन्न, जल, घी और अन्न का स्पर्श अगले मन्त्र से करे; बहुत जगह व्यवहार में यह नहीं देखा जाता अपितु दीप वाले घी का ही स्पर्श किया जाता है जो अनुचित है :-
अवगाहन (अ.द.त्रि.) : ॐ इदमन्नं ॥ इमा आपः ॥ इदं आज्यं ॥ इदं हविः ॥
तिल विकिरण (अ.द.त्रि.) :ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः ॥ प्रेतान्न के चारों ओर तिल बिखेरे।
अन्नोत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ………… प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धे इदमन्नं सोपकरणम् ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ उत्सर्ग करके तिल-जल भोजन पर न छिड़के अपितु निकट (पश्चिम भाग में) भूमि पर दे।
उपवीति-पूर्वाभिमुख-त्रिकुशहस्त होकर तीन बार गायत्री जप करे, अपसव्य-दक्षिणाभिमुख होकर मधुव्वाता पाठ। (मधुमती ऋचा पाठ का तात्पर्य पूरी ऋचा का पाठ है न कि ॐ मधु-मधु-मधु उच्चारण करना है), तदनन्तर अगले मन्त्र से अछिद्रकामना करे :
ॐ अन्नहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यद्भवेत्। तत्सर्वमच्छिद्रमस्तु ॥
कुशेषूपविश्य : गायत्री मंत्र (तीन बार) जपकर संकल्प वाली त्रिकुशा को आसन के नीचे रखे। पुनः अपसव्य-दक्षिणाभिमुख-त्रिकुशहस्त (द्वितीय त्रिकुशा लेकर) “मधुमती ऋचा” (पूरी ऋचा) ॐ मधु-मधु-मधु पाठ करे । तदनन्तर पुनः सव्य-त्रिकुशहस्त होकर रक्षोघ्नसूक्तादि पाठ अथवा श्रवण करे :
ॐ कृणुष्वपाजः प्रसितिन्न पृथिवीं याहि राजे वामवां इभेन । तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूनाणोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः। तवभ्रमास आसुया पतन्त्यनुस्पृस धृषता शोसुचानः । तपू ᳪ ष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसन्दितो विसृज विश्वगुल्काः । प्रतिष्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्याऽअदब्धः । यो नो दूरे अघश ᳪ सो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत । उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्वन्य मित्रां ओषता तिग्महेते । यो नो ऽअराति ᳪ समिधानचक्रे नीचा तं धक्ष्यत सन्न शुष्कम् । उर्ध्वो भव प्रतिविध्या ध्यस्मदा विष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने अवस्थिरा तनुहि यातु यूनाम् जामिमजामिं प्रमृणीहि शत्रून् ॥ पाठ कर तिल बिखेरे (श्राद्ध भूमि पर)।
ॐ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सौम्यासः । असूंऽयईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु अङ्गिरसो नः पितरः सौम्यासः । तेषा ᳪ वय ᳪ सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽअनुहिरे सोमपीथं वशिष्ठाः तेभिर्यमः स ᳪ रराणो हवी ᳪ स्युसन्नुसद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । भूमि ᳪ सर्वतस्पृत्त्वात्त्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ इत्यादि सम्पूर्ण पुरुषसूक्त पाठ (यदि संपूर्ण पुरुषसूक्त-अप्रतीरथसूक्त आदि पाठ न हो तो एक ऋचा न करे, करे तो सम्पूर्ण ही करे)
ॐ आशुः शिषाणो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभनश्चर्षणीनां ।
संक्रदनो निमिष ऽ एकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेऽ नेक चक्षुषे । नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः ॥
ॐ सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हन्साः सरसि मानसे ॥
तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दूरमध्यानौ यूयं तेभ्योवसीदथ ॥
ॐ रुची रुची रुचिः ॥ पाठ करे।
विकिरदान : पिंडवेदी के पश्चिम भाग में (भोजन के उत्तर ६ अंगुल की दूरी पर) एक त्रिकुशा रख कर जल से सिक्त कर दे, एक पूड़े में अन्नादि लेकर जल से आप्लावित करके (जल देकर) बांये हाथ के पितृतीर्थ से मोड़ा द्वारा त्रिकुशा पर अगले मन्त्र से दे :-
विकिरदान मंत्र (अ.द.मो.) : ॐ अनग्निदग्धाश्च ये जीवा ये प्रदग्धा: कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु पराङ्गतिम् ॥
सव्य-पूर्वाभिमुख-त्रिकुशहस्त दो बार आचमन करके हरिस्मरण कर तीन बार गायत्री मन्त्र जपे। फिर अपसव्य दक्षिणाभिमुख-पातितवामजानु होकर मधुमती ऋचा पाठ करके, बालुका से एक हाथ लम्बी-चौड़ी और 4 अंगुल ऊँची दक्षिणप्लव वेदी निर्माण करे; वेदी पूर्वनिर्मित हो तो वेदी को सही कर ले ।
उल्लेखन (अ.द.त्रि.) : बालुकामयी पिंडवेदी को जल से सिक्त कर दर्भ पिञ्जुलि (वाजसनेयी के लिये एक कुशा) से पिण्डवेदी के मध्य में प्रादेश प्रमाण रेखा करे :- ॐ अपहता ऽअसुरा रक्षा ᳪ सि वेदिषदः ॥ दर्भ पिञ्जुलि का उत्तरदिशा में त्याग कर दे।
अंगारभ्रमण (अ.द.मो.) : ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरंत्यग्निष्टांलोकात् प्रणुदात्यस्मात् ॥
रेखा पर तीन छिन्नमूल कुश देकर जल से सिक्त कर दे। स.पू.त्रि. तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े :-
स.पू.त्रि. – ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥
अत्रावन (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धपिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
अत्रावन का उत्सर्ग करते हुए पूड़े का आधा जल पिंडवेदी की कुशाओं पर गिरावे और आधा प्रत्यवन वास्ते रखे। पिण्ड निर्माण उसी समय करे जब उत्सर्ग करना हो न कि पहले, पिण्ड निर्माण करके हाथ धोये बिना ही पिण्ड का उत्सर्ग करे अर्थात पिण्डनिर्माण करके उत्सर्ग ही करे। बिल्वाकार पिण्ड निर्माण करके बांये हाथ में पिण्ड रखे, दाहिने हाथ में मोड़ा-तिल-जल लेकर उत्सर्ग करे :-
पिण्ड (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धे एष पिण्डः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
पिण्ड दाहिने हाथ में लेकर पितृतीर्थ से वेदी के कुशाओं पर रखे। अब पिंडतलस्थ कुशाओं में हाथ पोंछ ले तदुपरांत हाथ धोया जाना चाहिये… सव्य-पूर्वाभिमुख तीन बार आचमन करके हरिस्मरण करे। फिर दक्षिणाभिमुख हो जाये –
- ॐ अत्र पितरमादयस्व यथाभागमावृषादयस्व ॥ सूर्य स्वरूप देदीप्यमान पिता का ध्यान करते हुए उत्तर से क्लान्ति पर्यन्त श्वास ले।
- ॐ अमीमदत् पिता यथाभाग मा वृषायिष्ट ॥ पश्चिम की ओर श्वास छोड़े।
फिर अवनेजन पूड़ा शेष जल सहित बांयें हाथ में ले, दाहिने हाथ में तिल-जल-मोड़ा लेकर प्रत्यवन उत्सर्ग करे :
प्रत्यवन (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ………. प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धपिण्डे अत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
प्रत्यवन का उत्सर्ग कर पिण्ड पर दे दे। नीवीं विसर्जन।
पिण्डपूजन (अ.द.मो.) : ॐ एतत्ते पितर्वासः ॥ दोनों हाथों से (बांया हाथ आगे, दाहिना पीछे) पकड़ कर सूता पिण्ड पर दे। फिर तिल, जल लेकर वस्त्रोत्सर्ग करे :
वस्त्रोत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………… गोत्र पितः ………… प्रेत अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्धपिण्डे एतद्वास्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥
पान, पुष्प, चन्दन, द्रव्यादि भी चुपचाप पिण्ड पर चढ़ा दे। पिंडशेषान्न पिंड के निकट चारों और अपसव्य क्रम से बिखेड़ दे ।
- ॐ शिवा: आपः सन्तु ॥ भोजनपात्र पर जल दे।
- ॐ सौमनस्यमस्तु ॥ भोजनपात्र पर फूल दे।
- ॐ अक्षतंचारिष्टमस्तु ॥ भोजनपात्र पर अक्षत दे।
तिल, मधु, घृत मिश्रित जल (अक्षय्योदक) पूड़े से पिण्ड पर दे।
अक्षय्योदक (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………….. गोत्रस्य पितु: ………… प्रेतस्य अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्टश्राद्धे दत्तैतदन्न पानादिकमुपतिष्ठताम् ॥
जलधारा (स.पू.त्रि.) : ॐ अघोरः पिताऽस्तु ॥ सव्य-पूर्वाभिमुख होकर पिण्ड पर पूर्वाग्र जलधारा दे।
आशीष प्रार्थना (स.पू.त्रि.) दक्षिण दिशा में देखते हुये पढ़े : ॐ गोत्रन्नोवर्द्धताम् दातरो नोऽभिवर्द्धन्ताम् वेदा: सन्ततिरेव च। श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयञ्च नो ऽअस्तु। अन्नञ्च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि। याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कञ्चन। एताः सत्याशिषः सन्तु ॥
अपसव्य-दक्षिणाभिमुख होकर पिण्डस्थ सूत्रादि हटा दे। पिण्ड पर सपवित्रत्रिकुशा (धारित पवित्री खोलकर उसमें त्रिकुशा देकर) रख कर, अन्य पवित्री धारण करके वारिधारा दे :-
वारिधारा (अ.द.मो.) : ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत् मे पितृन् ॥
थोड़ा नम्र होकर पिण्ड को सूँघ ले और उठाकर फिर रख दे। पिण्ड के नीचे वाले कुशों को निकाल कर और वेदी पर भ्रमण किया गया अंगार आग में दे दे। अर्घ्यपात्र को उत्तान कर दे। मोड़ा, तिल, जल, द्रव्यादि लेकर दक्षिणा करे :-
दक्षिणा (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य कृतैतत् अस्थिसञ्चयननिमित्तक एकोद्दिष्ट श्राद्ध प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यक रजतं चन्द्रदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
सव्य होकर तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥
द.अप. दीप का किसी पत्रादि से आच्छादन कर दे। हाथ-पैर धोकर सव्य-पूर्वाभिमुख होकर दो बार आचमन करके अगला मन्त्र पढे :-
ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेत्ताध्वरेषुयत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥
॥ ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः ॥
तदनन्तर श्राद्ध सामग्री ब्राह्मण को प्रदान करे अथवा जल में दे। पिण्डीच्छेदन करे।
अस्थिसञ्चय
तदनन्तर सगोत्र-बन्धु आदि के साथ स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे। तदनन्तर जाति व्यवस्था के अनुसार आठ पात्रों में नाना प्रकार के फल-मूल-भक्ष्य-पेय आदि भरकर, गंध-पुष्प-धूप-दीपादि भी लेकर श्मशान चिता के निकट जाकर शीघ्रतापूर्वक सभी दिशाओं में अन्यान्य वस्तुयें पुष्प-माला-धूप-दीप-पेय- अक्षतादि भी चारों ओर कहीं-कहीं एक-एक द्रव्य करके अर्पित कर दे। फिर अहंकाररहित भाव से चारों दिशाओं में भक्ष्यादि के पात्र और जल पात्र रखे अर्थात चार पात्रों में भक्ष्यादि और चार में जल देकर रखे। तदुपरांत सर्वप्रथम चिता के उत्तर भाग में बैठकर अगले मन्त्र से बलिप्रदान करे :
ॐ नमः क्रव्यादमुख्येभ्यो देवेभ्य इति सर्वदा । येऽस्मिन् स्मशाने देवाः स्युर्भगवन्तः सनातनाः ॥
तेऽस्मत्सकाशाद्गृह्णन्तु बलिमष्टाङ्गमक्षयम् । प्रेतस्यास्य शुभाँ लोकान् प्रयच्छन्तु च शाश्वतान् ॥
अस्माकमायुरारोग्यं सुखं च ददतां वरम् । ॐ एषोऽष्टाङ्गबलिः शङ्करादिदेवताभ्यो नमः ॥
इसी प्रकार अन्य पूर्वादि दिशाओं में (प्रदक्षिण क्रम) भी श्मशान देवताओं के निमित्त बलि उत्सर्ग करके फिर दुग्ध से अभ्युक्षण करते हुये श्मशान देवताओं का विसर्जन कर दे – ॐ शङ्करादिदेवाः स्वीय-स्वीय स्थानं गच्छन्तु ॥
तत्पश्चात शेषदुग्ध से चितास्थान की अस्थियों को भी अभिसिक्त कर दे। तदुपरांत प्रथम शिरस्थानीय अस्थियों को शमी और पलाश की लकड़ियों से ग्रहण करके अन्य स्थानों से भी अस्थि ग्रहण करे अर्थात चिता से निकालकर अलग रखे आज्य और गंधोदक से अभिसिक्त करे। तदुपरांत अपसव्य होकर दाहिने हाथ के अंगुष्ठ व अनामिका से अस्थियों को ग्रहण करके पञ्चगव्य व गन्धोदक से अभिसिक्त करके पलाश के पूड़ों में रखे। पुनः रेशमी वस्त्रों में लेकर (लपेटकर) नूतन मृद्भाण्ड में रखे। भाण्ड मुख को भी वस्त्रावेष्टित कर दे।
तदुत्तर यदि संभव हो तो उसी दिन स्वयं अथवा अन्यान्य व्यक्ति द्वारा गंगा में प्रवाह करे यदि संभव न हो तो देववृक्ष (पीपल-वट) आदि के जड़ में अथवा किसी जलाशय के उस भाग में जहां पंक-शैवाल आदि हो अथवा गढ्डा करके उसमें पंक-शैवाल सहित करके रख दे। चिताभस्म को जलाशय में प्रवाहित कर दे और यदि जलाशय निकट में न हो तो भूमि में ही निक्षेप कर दे।
तदुपरांत गोमय-जलादि से चिताभूमि को पुनः शुद्ध करके (मण्डलादि पूर्वक) पुनः पूर्ववत उत्तर आदि चारों दिशाओं में श्मशान देवताओं को पूर्ववत बलि प्रदान करे। बलि का भक्ष्यादि अन्य व्यक्तियों को दे अथवा जल में प्रक्षेप करे। तदुत्तर चिताभूमि को आच्छादित करने के लिये वहां तुलसी, पीपल, वट आदि देववृक्ष लगाये अथवा ईंट आदि से चैत्य बनाये।
तदुत्तर बांधवादि सहित जलाशय जाकर सचैल स्नान करे।
निष्कर्ष
दशरात्राशौच के मध्य ‘चतुर्थ दिवस’ को किया जाने वाला अस्थिसञ्चय साग्निक और निरग्निक दोनों ही कल्पों में सर्वथा प्रधान और अनिवार्य कर्म है। अशौचमध्य में वेदमन्त्रों का प्रयोग “प्रेतपिण्डक्रियावर्ज्जमाशौचे” तथा “तदपि ग्राह्यं” सूत्र के अकाट्य सिद्धान्त से स्वतः सिद्ध है, क्योंकि यहाँ क्रिया-परक मन्त्रों का निषेध नहीं है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत निष्कर्ष प्राचीन गृह्यसूत्रों, पुराणों और निर्णयसिंधु आदि प्रामाणिक ग्रंथों के सूक्ष्म अंतर्संबंधों के समन्वय पर आधारित हैं। पारंपरिक रूप से प्रचलित देश-भेद या कुलाचार जनित भ्रम की स्थिति में सुधी पाठक शास्त्रीय साक्ष्यों को ही सर्वोपरि मानें। उपरोक्त विश्लेषण समझने के लिये है किसी भी प्रकार का निर्णय स्वविवेक, शास्त्रमंथन और विद्वानों के निर्देशन में लें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।









