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दूषित संभोग, व्यभिचार, बलात्कारादि दोष और परिहार – प्रमाण संकलन

दूषित संभोग, व्यभिचार, बलात्कारादि दोष और परिहार - प्रमाण संकलन दूषित संभोग, व्यभिचार, बलात्कारादि दोष और परिहार - प्रमाण संकलन

“परक्षेत्र (दूसरे की स्त्री) में व्यभिचार से उत्पन्न संतान परलोक और इस लोक में अन्न-जल देने वाले के हव्य-कव्य को समूल नष्ट कर देती है।”

भारतीय धर्मशास्त्रों की यह दूरदर्शिता रही है कि उन्होंने न केवल शारीरिक स्तर पर होने वाले दुराचार को, बल्कि मानसिक और वाचिक व्यभिचार को भी महापापों की श्रेणी में रखा है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने मनुस्मृति, विभिन्न स्मृतियों (जैसे पाराशर, अत्रि, संवर्त, अंगिरा, यम) और पुराणों (जैसे पद्म, कूर्म, गरुड़, अग्नि, नारद) में इन विषयों पर अत्यंत सूक्ष्मता, कठोरता और स्पष्टता के साथ विचार किया है।

इस शोधपरक आलेख में इन सभी शास्त्रीय प्रमाणों का एक प्रामाणिक संकलन किया गया है, जो दुराचार के दोषों को प्रकट करते हैं और साथ ही अनजाने या बलपूर्वक हुए दोषों के शास्त्रीय परिहार (प्रायश्चित्त) का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। यहां इस विषय से संबंधित प्रमाणों का संकलन करते हुये संक्षिप्त विश्लेषण भी किया गया है।

दूषित संभोग, व्यभिचार, बलात्कारादि दोष और परिहार – प्रमाण संकलन

“विधर्मियों में विवाह जैसा कोई संस्कार है ही नहीं; परंतु भारतीय संस्कृति में विवाह एक पवित्र जन्म-जन्मांतर का संस्कार है, जिसे आज मैरिज या अनुबंध समझने की विकृति पैदा की जा रही है।”

गृहस्थाश्रम में संतानोत्पत्ति के लिए महर्षि मनु ने अत्यंत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक नियम निर्धारित किए हैं। ऋतुकाल (मासिक धर्म के बाद का समय) में ही अपनी पत्नी के साथ रतिक्रिया करने का विधान है:

  • नियम और तिथियाँ: स्त्रियों के लिए मासिक धर्म के बाद की १६ रात्रियाँ स्वाभाविक ऋतुकाल मानी गई हैं। इनमें से प्रथम ४ रात्रियाँ, ११वीं और १३वीं रात्रि पूर्णतः निंदित (वर्जित) हैं। शेष १० रात्रियाँ गर्भाधान के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं।
  • विशेष : युग्म (सम – ६, ८, १० आदि) रात्रियों में गर्भाधान से पुत्र और अयुग्म (विषम – ५, ७, ९ आदि) रात्रियों में कन्या का जन्म होता है। जो पुरुष इन निंदित रात्रियों को छोड़कर गृहस्थ में रहता है, वह गृहस्थ होते हुए भी ब्रह्मचारी के समान ही पुण्य का भागी होता है।
  • कुल का नाश: इसके विपरीत, जो कुल कुविवाह (अधार्मिक विवाह), वेदों के अध्ययन के लोप और शास्त्रीय क्रियाओं के परित्याग में लिप्त रहते हैं, वे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ।
दूषित संभोग, व्यभिचार, बलात्कारादि दोष और परिहार - प्रमाण संकलन
दूषित संभोग, व्यभिचार, बलात्कारादि दोष और परिहार – प्रमाण संकलन

परस्त्री-गमन और व्यभिचार के भयंकर दोष

शास्त्रों के अनुसार परस्त्री-गमन महापापों की श्रेणी में आता है। इससे न केवल इहलौकिक समाज दूषित होता है, बल्कि पितरों का भी पतन होता है।

  • कुण्ड और गोलक दोष: पति के जीवित रहते यदि कोई स्त्री परपुरुष से संतान उत्पन्न करती है, तो वह ‘कुण्ड’ कहलाता है; और पति की मृत्यु के बाद उत्पन्न संतान ‘गोलक’ कहलाती है। महर्षि मनु कहते हैं कि ये परक्षेत्र (दूसरे के खेत/स्त्री) में उत्पन्न जीव परलोक और इस लोक में अन्न-जल देने वाले के हव्य-कव्य (पितृ तर्पण और देव पूजा) को समूल नष्ट कर देते हैं (मनुस्मृति ३/१७३-१७४)।
  • पितरों का अधोगति को जाना: बृहद्यम स्मृति (४/३६-३९) के अनुसार दुष्ट और व्यभिचारिणी स्त्री के दर्शन मात्र से पितर नरक की ओर उन्मुख होते हैं। वशिष्ठ स्मृति (११/३४-३५) में स्पष्ट कहा गया है कि श्राद्ध का अन्न खाने या देने के बाद जो मैथुन करता है, उसके पितर उस पूरे महीने वीर्य का भोजन करते हैं और उससे उत्पन्न संतान अल्पायु एवं विद्याहीन होती है।

बलात्कार, बलपूर्वक उपभोग और पीड़ित स्त्रियों की शुद्धि

जहां स्वेच्छा से किए गए व्यभिचार के लिए कठोर दंड का विधान किया गया है, वहीं बलात्कार (बलपूर्वक किए गए कुकर्म) या धोखे की शिकार स्त्रियों के प्रति शास्त्र परम दयालु और व्यावहारिक दृष्टिकोण रखते हैं। अत्रि संहिता और पाराशर स्मृति में इसके लिए स्पष्ट परिहार (शुद्धि) विधान है :

  • अनैच्छिक संसर्ग में शुद्धि: यदि किसी स्त्री का बलपूर्वक (बलात्कार), धोखे से, या चोरों/म्लेच्छों द्वारा डरा-धमकाकर उपभोग किया गया हो, तो वह स्त्री त्याज्य नहीं है। क्योंकि उसमें उसकी स्वयं की कामना या सम्मति नहीं थी।
  • ऋतुकाल से पवित्रता: ऋषि अत्रि और पाराशर कहते हैं—“यथा भूमिस्तथा नारी” (जैसे भूमि हल चलने या दूषित होने के बाद पुनः शुद्ध हो जाती है, वैसे ही नारी अपने मासिक चक्र यानी ऋतुकाल के आने पर स्वतः पवित्र हो जाती है)। उसे केवल प्राजापत्य या सांतपन कृच्छ्र व्रत करना होता है (पाराशर स्मृति १०/२६-२७).
  • असवर्ण गर्भ की स्थिति: यदि बलपूर्वक किए गए कुकर्म से गर्भ ठहर जाए, तो स्त्री तब तक अशुद्ध रहती है जब तक वह गर्भ मुक्त (प्रसव) नहीं हो जाता। शिशु जन्म और पुनः मासिक धर्म के दर्शन के बाद वह स्त्री स्वर्ण के समान शुद्ध हो जाती है (अत्रि स्मृति ५/६-७)।

अगम्यागमन (निषिद्ध सम्बन्ध) और उनके भयानक दण्ड

शास्त्रों में कुछ सम्बंधों को ‘अगम्या’ (जहां गमन नहीं करना चाहिए) माना गया है, जैसे—माता, बहन, पुत्री, पुत्रवधू, गुरुपत्नी, मौसी, मामी, सगोत्र स्त्री, शरणागत स्त्री आदि। इनके साथ संसर्ग को ‘गुरुतल्पग’ (गुरु की शय्या का अपमान करने वाला महापाप) कहा गया है।

  • कठोर शारीरिक दण्ड: नारद स्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार इन अगम्या स्त्रियों के पास कामवश जाने वाले पुरुष के लिए ‘शिश्नच्छेदन’ (गुप्तांग काट देना) अथवा मृत्युदण्ड ही एकमात्र विधान है।
  • अग्नि प्रवेश: बृहद्यम स्मृति और कूर्म पुराण के अनुसार यदि कोई मोहवश माता, बहन या पुत्री के पास जाता है, तो जलती हुई तीक्ष्ण अग्नि में प्रवेश करके प्राण त्यागने के अतिरिक्त उसकी कोई अन्य शुद्धि नहीं है।
  • विकृत मानसिकता का परिहार: वशिष्ठ स्मृति के अनुसार जो पुरुष अपनी पाणिगृहीता (पत्नी) के साथ भी अप्राकृतिक मैथुन करता है, उसके पितरों को उस महीने वीर्यपान करना पड़ता है। ऐसी अनित्य और विकृत रति पूर्णतः अधर्म है।
अगम्यागमन
अगम्यागमन

मनु स्मृति

ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा । पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया ॥
ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडश स्मृताः । चतुर्भिरितरैः सार्धं अहोभिः सद्विगर्हितैः ॥
तासां आद्याश्चतस्रस्तु निन्दितैकादशी च या । त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दशरात्रयः ॥

युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु । तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम् ॥
पुमान्पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः । समेऽपुमान्पुं स्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ॥
निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥

मनु स्मृति/३/४५ – ५०

कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥
मनु स्मृति/३/६३

भ्रातुर्मृतस्य भार्यायां योऽनुरज्येत कामतः । धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः ॥
परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलकौ । पत्यौ जीवति कुण्डः स्यान्मृते भर्तरि गोलकः ॥
तौ तु जातौ परक्षेत्रे प्राणिनौ प्रेत्य चेह च । दत्तानि हव्यकव्यानि नाशयन्ति प्रदायिनाम् ॥

मनु स्मृति/३/१७३ – १७४

चाण्डालिकासु नारीषु द्विजो मैथुनकारकः । कृत्वाऽघमर्षणं पक्षं शुध्यते च पयोव्रतात् ॥
बृहद्यम स्मृति १/१५

अन्यदत्ता तु या कन्या पुनरन्त्यत्र दीयते । तस्याश्चैव न भोक्तव्यं पुनर्भूः कीर्तिता बुधैः ॥
पूर्वं तु स्रवते गर्भो यस्याश्चैवाथ संस्कृतः । द्वितीयो गर्भसंस्कारः पुनरेता तु सोच्यते ॥
या चाऽऽदौ दशभिर्वर्षैर्जीवत्तिष्ठति गर्भिणी । धारितं तु न रेतो वै रेतोधा सा तथोच्यते ॥
भर्तुः शयनमुल्लङ्घय या चान्येषु प्रवर्तते । तस्या अन्नं न भोक्तव्यं विज्ञेया कामचारिणी ॥

पुनर्भूः पुनरेता च रेतोधा कामचारिणी ॥
अंगिरा स्मृति ११० – ११४

महिषीत्युच्यते नारी या चैव व्यभिचारिणी ॥
अंगिरा स्मृति १२४ – १२५

अगम्या गमने चैव शुद्ध्यै चान्द्रायणं चरेत् । एकैकं ह्रासयेद्ग्रासं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत् ॥
अमावास्यां न भुञ्जीत ह्येष चान्द्रायणो विधिः । कुक्कुटाण्डप्रमाणं तु ग्रासं वै परिकल्पयेत् ॥
अन्याथा भावदोषेण न धर्मो न च शुध्यति । प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद्ब्रह्मणभोजनम् ॥
गोद्वयं वस्त्रयुग्मं च दद्याद्विप्रेषु दक्षिणां । चण्डालीं वा श्वपाकीं वा ह्यभिगच्छति यो द्विजः ॥
त्रिरात्रं उपवासित्वा विप्राणां अनुशासनम् । सशिखं पवनं कृत्वा प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥

गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा चण्डालीं गच्छतो यदि ॥
प्राजापत्यद्वयं कुर्याद्दद्याद्गोमिथुनद्वयं । श्वपाकीं वाथ चण्डालीं शूद्रो वा यदि गच्छति ॥
प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं चतुर्गोमिथुनं ददेत् । मातरं यदि गच्छेत्तु भगिनीं स्वसुतां तथा ॥
एतास्तु मोहितो गत्वा त्रीणि कृच्छ्राणि संचरेत् । चान्द्रायणत्रयं कुर्याच्छिश्नच्छेदेन शुध्यति ॥
मातृष्वसृगमे चैवं आत्ममेढ्रनिकर्तनं । अज्ञानेन तु यो गच्छेत्कुर्याच्चान्द्रायणद्वयम् ॥

दश गोमिथुनं दद्याच्छुद्धिं पारशरोऽब्रवीत् । पितृदारान्समारुह्य मातुराप्तां तु भ्रातृजाम् ॥
गुरुपात्नीं स्नुषां चैव भ्रातृभार्यां तथैव च । मातुलानीं सगोत्रां च प्राजापत्यत्रयं चरेत् ॥
गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुध्यते नात्र संशयः । पशुवेष्यादिगमने महिष्युष्ट्रीकपीस्तथा ॥
खरीं च सूकरीं गत्वा प्राजापत्यव्रतं चरेत् । गोगामी च त्रिरात्रेण गां एकां ब्राह्मणे ददन् ॥
महिष्युष्ट्रीखरीगामी त्वहोरात्रेण शुध्यति । डामरे समरे वापि दुर्भिक्षे वा जनक्षये ॥

बन्दिग्राहे भयार्ता वा सदा स्वस्त्रीं निरीक्षयेत् । चण्डालैः सह संपर्कं या नारी कुरुते ततः ॥
विप्रान्दश वरान्कृत्वा स्वकं दोषं प्रकाशयेत् । आकण्ठसंमिते कूपे गोमयोदककर्दमे ॥
तत्र स्थित्वा निराहारा त्वहोरात्रेण निष्क्रमेत् । सशिखं वपनं कृत्वा भुञ्जीयाद्यावकौदनम् ॥
त्रिरात्रं उपवासित्वा त्वेकरात्रं जले वसेत् । शंखपुष्पीलतामूलं पत्रं वा कुसुमं फलम् ॥
सुवर्णं पञ्चगव्यं च क्वाथयित्वा पिबेज्जलम् । एकभक्तं चरेत्पश्चाद्यावत्पुष्पवती भवेत् ॥

व्रतं चरति तद्यावत्तावत्संवसते बहिः । प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥
गोद्वयं दक्षिणां दद्यच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । चातुर्वर्ण्यस्य नारीणां कृच्छ्रं चान्द्रायणं व्रतम् ॥
यथा भूमिस्तथा नारी तस्मात्तां न तु दूषयेत् । बन्दिग्राहेण या भुक्ता हत्वा बद्ध्वा बलाद्भयात् ॥
कृत्वा सांतपनं कृच्छ्रं शुध्येत्पाराशरोऽब्रवीत् । सकृद्भुक्ता तु या नारी नेच्छन्ती पापकर्मभिः ॥
प्राजापत्येन शुध्येत ऋतुप्रस्रवणेन च ॥

पतत्यर्धं शरीरस्य यस्य भार्या सुरां पिबेत् । पतितार्धशरीरस्य निष्कृतिर्न विधीयते ॥
गायत्रीं जपमानस्तु कृच्छ्रं सांतपनं चरेत् । गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकं ॥
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सांतपनं स्मृतम्। जारेण जनयेद्गर्भं मृतेऽव्यक्ते गते पतौ ॥
तां त्यजेदपरे राष्ट्रे पतितां पापकारिणीम्। ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत्परपुंसा समन्विता ॥
सा तु नष्टा विनिर्दिष्टा न तस्यागमनं पुनः। कामान्मोहात्तु या गच्छेत्त्यक्त्वा बन्धून्सुतान्पतिं ॥

सा तु नष्टा परे लोके मानुषेषु विशेषतः। मदमोहगता नारी क्रोधाद्दण्डादिताडिता ॥
अद्वितीया गता चैव पुनरागमनं भवेत्। दशमे तु दिने प्राप्ते प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥
दशाहं न त्यजेन्नारीं त्यजेन्नष्टश्रुतां तथा। भर्ता चैव चरेत्कृच्छ्रं कृच्छार्धं चैव बान्धवाः ॥
तेषां भुक्त्वा च पीत्वा च अहोरात्रेण शुध्यति। ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत्परपुंसा विवर्जिता ॥
गत्वा पुंसां शतं याति त्यजेयुस्तां तु गोत्रिणः। पुंसो यदि गृहे गच्छेत्तदशुद्धं गृहं भवेत् ॥

पतिमातृगृहं यच्च जारस्यैव तु तद्गृहम्। उल्लिख्य तद्गृहं पश्चात्पञ्चगव्येन सेचयेत् ॥
त्यजेच्च मृण्मयं पात्रं वस्त्रं काष्ठं च शोधयेत्। संभारान्शोधयेत्सर्वान्गोबालैश्च फलोद्भवान् ॥
ताम्राणि पञ्चगव्येन कांस्यानि दश भस्मभिः। प्रायश्चित्तं चरेद्विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम् ॥
गोद्वयं दक्षिणां दद्यात्प्राजापत्यद्वयं चरेत्। इतरेषां अहोरात्रं पञ्चगव्यं च शोधनम् ॥

पाराशर स्मृति/१०/१ – ३९

स्त्रिया म्लेच्छस्य संपर्काच्छुद्धिः सांतपने तथा । तप्तकृच्छ्रे पुनः कृत्वा शुद्धिरेषाऽभिधीयते ॥
संवर्तेत यथा भार्या गत्वा म्लेच्छस्य संगताम् । सचैलं स्नानमादाय घृतस्य माशनेन च ॥
स्नात्वा नद्युदकैश्चैव घृतं प्राश्य विशुध्यति । संगृहीतामपन्यार्थमन्यैरपि तथा पुनः ॥
चाण्डलम्लेच्छश्वपचकपालव्रतधारिणः । अकामतः स्त्रियो गत्वा पराकेण विशुध्यति ॥
कामतस्तु प्रसूतो वां तत्समो नात्र संशयः । स एव पुरुषस्तत्र गर्भो भूत्वा प्रजायते ॥

अत्रि संहिता १८३ – १८८

असवर्णैस्तु यो गर्भः स्त्रीणां योनौ निषिच्यते । अशुद्धा सा भवेन्नारी यावद्गर्भं न मुञ्चति ॥
विमुक्ते तु ततः शल्ये रजश्चापि प्रदृश्यते । तदा सा शुध्यते नारी विमलं काञ्चनं यथा ॥
स्वयं विप्रतिपन्ना या यदि वा विप्रतारिता । बलान्नारी प्रभुक्ता वा चौरभुक्ता तथाऽपि वा ॥
न त्याज्या दूषिता नारी न कामोऽस्या विधीयते । ऋतुकाल उपासीत पुष्पकालेन शुध्यति ॥
रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च। कैवर्तमेदभिल्लाश्च सप्तैते चान्त्यजाः स्मृताः ॥

एषां गत्वा स्त्रियो मोहाद्भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च । कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञानादज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥
सकृद्भुक्ता तु या नारी म्लेच्छैर्या पापकर्मभिः । प्राजापत्येन शुध्येत ऋतुभस्रवणेन तु ॥
बलाद्धृता स्वयं वाऽपि परप्रेरितया यदि । सकृद्भुक्ता तु या नारी प्राजापत्येन शुध्यति ॥
प्रारब्धदीर्घतपसां नारीणां यद्रजो भवेत् । न तेन तद्व्रतं तासां विनश्यति कदाचन ॥

अत्रि संहिता १९५ – २०३

असवर्णेन यो गर्भः स्त्रीणां योनौ निषिच्यते । अशुद्धा तु भवेन्नारी यावच्छल्यं न मुञ्चति ॥
निःसृते तु ततः शल्ये रजसोऽपीह दर्शनात् । ततः सा शुध्यते नारी विमला काञ्चनोपमा ॥

अत्रि स्मृति ५/६ – ७

पतिमुल्लङ्घ्य मोहात्स्त्री कं कं न नरकं व्रजेत् । कृच्छ्रान्मानुषतां प्राप्य किं किं दुःखं न पश्यति ॥
गोभिल स्मृति २/१६२

नटीं शैलूषिकां चैव रजकीं वेणुजीविनीम् । गत्वा चान्द्रायणं कुर्यात्तथा चर्मोपजीविनीम् ॥
कापालिकान्नभोक्तृणां तैनयागामिनां तथा । अज्ञानात्कृच्छ्रमुद्दिष्टं ज्ञात्वा चैव व्रतद्वयम् ॥

बृहद्यम स्मृति २/१ – २

राज्ञीमाचार्याशिष्यां वा उपाध्यायस्य योषितः । एता गत्वा स्त्रियो मोहात्षण्मासं कृच्छ्रमाचरेत् ॥
द्वौ मासौ भक्ष्यभोज्यं च द्वौ मासौ यावकेन तु । द्वौ मासौ पञ्चगव्येन षण्मासं कृच्छ्रमाचरेत् ॥
मातरं गुरुपत्नीं च स्वसारं दुहितां तथा। गत्वा तु प्रविशेदग्निं नान्या शुद्धिर्विधीयते ॥

बृहद्यम स्मृति ३/६ – ७

यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः । तैद्भक्षणे जपेन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥
वृषलीं यस्तु गृह्णाति ब्राह्मणो मदमोहितः । सदा सूतकिता तस्य ब्रह्महत्या दिने दिने ॥
वृषलीगमनं चैव मासमेकं निरन्तरम् । इह जन्मनि शूद्रत्वं पुनः श्वानो भविष्यति ॥

बृहद्यम स्मृति ३/१२ – १४

व्यभिचारादृतौ शुद्धिः स्त्रीणां चैव न संशयः । गर्भे जाते परित्यागो नान्यथा मम भाषितम् ॥
दुष्टस्त्रीदर्शनेनैव पितरो यान्त्यधोगतिम् । घृतं योन्यां क्षिपेद्घोरं परपुंसगता हि या ॥
हवनं च प्रयत्नेन गायत्र्या चायुतत्रयम् । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छतमष्टोत्तरेण हि ॥
विधवा चैव या नारी पुंसोपगतसेविनी । त्याज्या सा बन्धुभिश्चैव नान्यथा यमभाषितम् ॥

बृहद्यम स्मृति ४/३६-३९

विधवागमने पापं सकृच्चैव तु यद्भवेत् । असकृच्च यदा ज्ञात्वा प्रायश्चित्तं प्रवर्तते ॥
असकृद्गमनाच्चैव चरेच्चान्द्रायणद्वयम् । सकृद्गमने यत्पापं प्राजापत्यद्वयेन हि ॥
पुर्नर्भूर्विकृता येन कृता विप्रेण चैव हि । विना शाखाप्रभेदेन पुनर्भूर्मण्यते हि सा ॥

सवर्णश्च सवर्णायामभिषिक्तो यदा भवेत् । ब्राह्मणः कामलुब्धोऽपि श्राद्धे यज्ञे च गर्हितः ॥
क्षत्रियो ब्राह्मणीसक्तः क्षत्रिण्यां विश एव वा । वैश्याया गमने शूद्रः पतिताया भवान्यथा ॥
प्रातिलोम्ये महत्पापं प्रवदन्ति मनीषिणः । प्रायश्चित्तं चाऽऽनुलोम्ये न भवत्येव चान्यथा ॥

बृहद्यम स्मृति ४/४३-४८

अगम्यागमने विप्रो मद्यगोमांसभक्षणे । तप्तकृच्छ्र परिक्षिप्तो मौञ्जीहोमेन शुध्यति ॥
महापातककर्तारश्चत्वारोऽप्यविशेषतः । अग्निं प्रविश्य शुध्यन्ति स्थित्वा वा महति क्रतौ ॥
रहस्यकरणेऽप्येवं मासमभ्यस्य पूरुषः । अघमर्षणसूक्तं वा शुध्येदन्तर्जले स्थितः ॥
रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च । कैवर्तमेदभिल्लाश्च सप्तैते अन्त्यजाः स्मृताः ॥
भुक्त्वा चैषां स्त्रियो गत्वा पीत्वाऽपः प्रतिगृह्य च । कृच्छ्राब्दमाचरेज्ज्ञानादज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥

मातरं गुरुपत्नीं च स्वसृदुहितरौ स्नुषाम् । गत्वैताः प्रविशेदग्निं नान्या शुद्धिर्विधीयते ॥
राज्ञीं प्रव्रजितां धात्रीं तथा वर्णोत्तमामपि । कृच्छ्रद्वयं प्रकुर्वीत सगोत्रामभिगम्य च ॥
अन्यासु पितृगोत्रासु मातृगोत्रगतास्वपि । परदारेषु सर्वेषु कृच्छ्रं सांतपनं चरेत् ॥
वेश्याभिगमने पापं व्यपोहन्ति द्विजातयः । पीत्वा सकृत्सुतप्तं च पञ्चरात्रं कुशोदकम् ॥

यम स्मृति ३० – ३८

श्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च मैथुनं योऽधिगच्छति । भवन्ति पितरस्तस्य तन्मासं रेतसो भुजः ॥
यस्ततो जायते गर्भो दत्त्वा भुक्त्वा च पैतृकम् । न स विद्यां समाप्नोति क्षीणायुश्चैव जायते ॥

वशिष्ठ स्मृति ११/३४ – ३५

ऋतुकालगामी स्यात्पर्ववर्जं स्वदारेषु ॥
अतिर्यगुपेयात् ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥
यस्तु पाणिगृहीताया आस्ये कुर्वीत मैथुनम् । भवन्ति पितरस्तस्य तन्मासं रेतसो भुजः ॥
या स्यादनित्यचारेण रतिः साऽधर्मसंश्रिता ॥ अपि च काठके विज्ञायते ॥
अपि नः श्वो विजनिष्यमाणाः पतिभिः सह शयीरन्निति स्त्रीणामिन्द्रदत्तो वर इति ॥

वशिष्ठ स्मृति १२/१८ – २४

आधिः सीमा बालधनो निक्षेपोपनिधिः स्त्रियः । राजस्वं श्रोत्रियद्रव्यं न संभोगेन हीयते ॥
वशिष्ठ स्मृति १६/१६

चण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च । पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात्साम्यं तु गच्छति ॥
लघु शातातप स्मृति १५५

ऋतुमतीं तु यो भार्यां सन्निधौ नोपगच्छत्ति। तस्या रजसि तन्मासं पितरस्तस्य शेरते ॥
कृत्वा गृह्याणि कर्माणि स्वभार्यापोषणे रतः । ऋतुकालाभिगामी च प्राप्नोति परमां गतिम् ॥
उषित्वैनं गृहे विप्रो द्वितीयादाश्रमात्परम् । बलीपलितसंयुक्तस्तृतीयं तु समाश्रयेत् ॥
वनं गच्छेत्ततः प्राज्ञः सभार्यस्त्वेक एव वा । गृहीत्वा चाग्निहोत्रं च होमं तत्र न हापयेत् ॥

संवर्त स्मृति/९८ – १०१

यश्चाण्डालीं द्विजो गच्छेत्कथंचित्काममोहितः । त्रिभिः कृच्छ्रैस्तु शुध्येत प्राजापत्यानुपूर्वकैः ॥
पुंश्चलीगमनं कृत्वा कामतोऽकामतोऽपि वा । कृच्छ्रचान्द्रायणे तस्य पावने परमे स्मृते ॥
शैलूषीं रजकीं चैव वेणुचर्मोपजीविनी । एता गत्वा द्विजो मोहाच्चरेच्चान्द्रायणं व्रतम् ॥
क्षत्रियामथ वैश्यां वा गच्छेद्यः काममोहितः । तस्य सांतपनः कृच्छ्रो भवेत्पापापनोदनः ॥
शूद्रां तु ब्राह्मणो गत्वा मासं मासार्धमेव वा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्धेन विशुध्यति ॥

विप्रस्तु ब्राह्मणीं गत्वा प्राजापत्येन शुध्यति । स्वजनां तु द्विजो गत्वा प्राजापत्यं समाचरेत् ॥
क्षत्रियां क्षत्रियो गत्वा तदेव व्रतमाचरेत् । नरो गोगमनं कृत्वा कुर्याच्चान्द्रायणव्रतम् ॥
मातुलानीं तथा श्वश्रूं सुतां वै मातुलस्य च । एता गत्वा स्त्रियो मोहात्पराकेण विशुध्यति ॥
गुरोर्दुहितरं गत्वा स्वसारं पितुरेव च । तस्या दुहितरं चैव चरेच्चाद्रायणं व्रतम् ॥
पितृव्यदारगमने भ्रातृभार्यागमे तथा । गुरुतल्पव्रतं कुर्यान्निष्कृतिर्नान्यथा भवेत् ॥

पितृभार्यां समारुह्य मातृवर्जं नराधमः । भगिनीं मातुराप्तां च स्वसारं चान्यमातृजाम् ॥
एतास्तिस्रः स्त्रियो गत्वा तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् । कुमारीगमने चैव व्रतमेतत्समादिशेत् ॥
पशुवेश्याभिगमने प्राजापत्यो विधीयते । सखिभार्यां समारुह्य श्वश्रूं वा शालिकां तथा ॥
मातरं योऽभिगच्छेच्च स्वसारं पुरुषाधमः । न तस्य निष्कृतिं दद्यात्स्वां चैव तनुजां तथा ॥
नियमस्थां व्रतस्थां वा योऽभिगच्छेत्स्त्रियं द्विजः । स कुर्यात्प्राकृतं कृच्छ्रं घेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ॥

रजस्वलां तु यो गच्छेद्भर्भिणीं पतितां तथा । तस्य पापविशुद्ध्यर्थमतिकृच्छ्रो विधीयते ॥
वेश्यां तु ब्राह्मणो गत्वा कृच्छ्रमेकं समाचरेत् । एवं शुद्धिः समाख्याता संवर्तस्य वचो यथा ॥
कथंचिद्ब्राह्मणीं गत्वा क्षत्रियो वैश्य एव च । गोमूत्रयावकाहारो मासेनैकेन शुध्यति ॥

शुद्रस्तु ब्राह्मणीं गच्छेत्कदाचित्काममोहितः । गोमूत्रयावकाहारो मासनैकेन शुध्यति ॥
ब्राह्मण्याः शुद्रसंपर्के कदाचित्समुपागते । कृच्छ्रचाद्रायणं तस्याः पावनं परमं स्मृतम् ॥
चाण्डालं पुल्कसं चैव श्वपाकं पतितं तथा । एताः श्रेष्ठाः स्त्रियो गत्वा कुर्युश्चान्द्रायणत्रयम् ॥

संवर्त स्मृति/१५० – १७०

मातुलपितृष्वसा भगिनी भागिनेयी स्नुषा मातुलानी सखिवधुरित्यगम्याः ॥
अगम्याना गमणे कृच्छ्रातिकृच्छ्रो चान्द्रायणामति प्रायश्चित्तिः ॥
एतेन चण्डालीव्यवायो व्याख्यातः ॥

बौधायन स्मृति/२/२/७१ – ७३

नाथवत्या परगृहे संयुक्तस्य स्त्रिया सह । दृष्टं संग्रहणं तज्ज्ञैर्नागतायाः स्वयं गृहे ॥
प्रदुष्टत्यक्तदारस्य क्लीबस्य क्षमकस्य च । स्वेच्छयोपेयुषो दारान्न दोषः साहसो भवेत् ॥
परस्त्रिया सहाकालेऽदेशे वा भवतो मिथः । स्थानसंभाषणामोदास्त्रयः संग्रहणक्रमाः ॥
नदीनां संगमे तीर्थेष्वारामेषु वनेषु च । स्त्री पुमांश्च समेयातां ग्राह्यं संग्रहणं भवेत् ॥

दूतीप्रस्थापनैश्चैव लेखासंप्रेषणैरपि । अन्यैरपि व्यभिचारैः सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥
स्त्रियं स्पृशेददेशे यः स्पृष्टो वा मर्शयेत्तथा । परस्परस्यानुमते तच्च संग्रहणं भवेत् ॥
भक्षैर्वा यदि वा भोज्यैर्वस्त्रैर्माल्यैस्तथैव च । संप्रेष्यमानैर्गन्धैश्च सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥
दर्पाद्वा यदि वा मोहाच्छ्लाघया वा स्वयं वदेत् । ममेयं भुक्तपूर्वेति सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥

पाणौ यश्च निगृह्णीयद्वेण्यां वस्त्रान्तरेऽपि वा । तिष्ठ तिष्ठेति वा ब्रुयात्सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥
स्वजात्यतिक्रमे पुंसामुक्तमुत्तमसाहसम् । विपर्यये मध्यमस्तु प्रातिलोमे प्रमापणम् ॥
कन्यायामसकामायां द्व्याङ्गुलस्यावकर्तनम् । उत्तमायां वधस्त्वेव सर्वस्वहरणं तथा ॥
सकामायां तु कन्यायां सवर्णे नास्त्यतिक्रमः । किंत्वलंकृत्य सत्कृत्य स एवैनां समुद्वहेत् ॥

नारद स्मृति/व्यवहारपदानि/१२/६० – ७१

माता मातृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृष्वसा । पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी स्नुषा ॥
दुहिताचार्यभार्या च सगोत्रा शरणागता । राज्ञी प्रव्रजिता धात्री साध्वी वर्णोत्तमा च या ॥
आसां अन्यतमां गत्वा गुरुतल्पग उच्यते । शिश्नस्योत्कर्तनं दण्डो नान्यस्तत्र विधीयते ॥
पशुयोन्यामतिक्रामन्विनेयः स दमं शतम् । मध्यमं साहसं गोषु तदेवान्त्यावसायिषु ॥

अगम्यागामिनः शास्ति दण्डो राज्ञा प्रचोदितः । प्रायश्चित्तविधावत्र प्रायश्चित्तं विशोधनम् ॥
स्वैरिण्यब्राह्मणी वेश्या दासी निष्कासिनी च या । गम्याः स्युरानुलोम्येन स्त्रियो न प्रतिलोमतः ॥
आस्वेव तु भुजिष्यासु दोषः स्यात्परदारवत् । गम्या अपि हि नोपेयास्ताश्चेदन्यपरिग्रहाः ॥

नारद स्मृति/व्यवहारपदानि/१२/७२ – ७८

स्त्रियं पुत्रवतीं वन्ध्यां नीरजस्कामनिच्छन्तीम् । न गच्छेद्गर्भिणीं निन्द्यामनियुक्तां च बन्धुभिः ॥
अनियुक्ता तु या नारी देवराज्जनयेत्सुतम् । जारजातमरिक्थीयं तमाहुर्धर्मवादिनः ॥

नारद स्मृति/व्यवहारपदानि/१२/८२ – ८३

अंगारसदृशी योषित्सर्पिः कुंभसमः पुमान् । तस्याः परिसरे ब्रह्मन्न स्थातव्यं कदाचन ॥
जारेण जनयेद्गर्भं या च नारी कुलांतका । त्याज्या सा सर्वथा ब्रह्मस्तत्र दोषो न विद्यते ॥

पद्मपुराण/४ (ब्रह्मखण्डः)/१८/१९ – २०

रेतोविण्मूत्रपानाच्च सुरापा ब्राह्मणी तथा। पतिलोकपरिभ्रष्टा गृध्री स्यात्सूकरी शुनी ॥
गरुडपुराण/आचारकाण्डः/१०५/२६

गत्वा दुहितरं विप्रः स्वसारं वा स्नुषामपि । प्रविशेज्ज्वलनं दीप्तं मतिपूर्वमिति स्थितिः ॥
मातृष्वसां मातुलानीं तथैव च पितृष्वसाम् । भागिनेयीं समारुह्य कुर्यात् कृच्छ्रातिकृच्छ्रकौ ॥
चान्द्रायणं च कुर्वीत तस्य पापस्य शान्तये । ध्यायन् देवं जगद्योनिमनादिनिधनं परम् ॥
भ्रातृभार्यां समारुह्य कुर्यात् तत्पापशान्तये । चान्द्रायणानि चत्वारि पञ्च वा सुसमाहितः ॥

पैतृष्वस्त्रेयीं गत्वा तु स्वस्त्रीयां मातुरेव च । मातुलस्य सुतां वाऽपि गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
सखिभार्यां समारुह्य गत्वा श्यालीं तथैव च । अहोरात्रोषितो भूत्वा ततः कृच्छ्रं समाचरेत् ॥
उदक्यागमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुध्यति । चाण्डालीगमने चैव तप्तकृच्छ्रत्रयं विदुः ॥
शुद्धि सांतपनेनास्यान्नान्यथा निष्कृतिः स्मृता। मातृगोत्रां समारुह्य समानप्रवरां तथा ॥

चाद्रायणेन शुध्येत प्रयतात्मा समाहितः । ब्राह्मणो ब्राह्मणीं गत्वा कृच्छ्रमेकं समाचरेत् ॥
कन्यकान्दूषयित्वा तु चरेच्चान्द्रायणव्रतम् । अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु ॥
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् । वार्द्धिकीगमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुद्ध्यति ॥
गवि मैथुनमासेव्य चरेच्चान्द्रायणव्रतम् । वेश्यायां मैथुनं कृत्वा प्राजापत्यं चरेद्द्विजः ॥

पतितां च स्त्रियं गत्वा त्रिभिः कृच्छ्रै र्विशुद्ध्यति । पुल्कसीगमने चैव क्रच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत् ॥
नटीं शैलूषकीं चैव रजकीं वेणुजीविनीम् । गत्वा चान्द्रायणं कुर्यात् तथा चर्मोपजीविनीम् ॥
ब्रह्मचारी स्त्रियं गच्छेत् कथञ्चित्काममोहितः । सप्तागारं चरेद्भैक्षं वसित्वा गर्दभाजिनम् ॥
उपस्पृशेत् त्रिषवणं स्वपापं परिकीर्त्तयन् । संवत्सरेण चैकेन तस्मात्पापात् प्रमुच्यते ॥

कूर्मपुराण/उत्तरभागः/३३/१ – १६

पितुः पत्नीञ्च भगिनीमाचार्यतनयान्तथा । आचार्याणीं सुतां स्वाञ्च गच्छंश्च गुरुतल्पगः ॥
गुरुतल्पेऽभिभाष्यैनस्तप्ते पच्यादयोमये । शूमीं ज्वलन्तीञ्चाश्लिष्यमृतुना स विशुद्ध्यति ॥
चान्द्रायणान् वा त्रीन्मासानभ्यस्य गुरुतल्पगः । एवमेव विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि ॥
यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां कारयेद्व्रतं । रेतः सिक्त्वा कुमारीषु चाण्डालीषु सुतासु च ॥

सपिण्डापत्यदारेषु प्राणत्यागो विधीयते । यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः ॥
तद्भैक्ष्यभुग् जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति । पितृव्यदारगमने भ्रातृभार्यागमे तथा ॥
चाण्डालीं पुल्कसीं वापि स्नुषाञ्च भगिनीं सखीं । मातुः पितुः स्वसारञ्च निक्षिप्तां शरणागतां ॥
मातुलानीं स्वसारञ्च सगोत्रामन्यमिच्छतीं । शिष्यभार्यां गुरोर्भार्यां गत्वा चान्द्रायणञ्चरेत् ॥

अग्निपुराण/१७३/४८ – ५५

अभिगच्छति चांडालीं श्वपाकीं यो द्विजोत्तमः । उपवासत्रयं कुर्यात्प्राजापत्यं चरेत्ततः ॥
सशिखं वपनं चैव दद्याद्गोद्वयमेव च । यथार्थदक्षिणां दत्वा शुद्धिमाप्नोति स द्विजः ॥
क्षत्त्रियो वापि चांडालीं वैश्यो वा यदि गच्छति । प्राजापत्यं सकृच्छ्रं च दद्याद्गोमिथुनद्वयम् ॥
अनुगच्छति शूद्रो हि श्वपाकीं च तपोधन । चतुर्गोमिथुनं दद्यात्प्राजापत्यं व्रतं चरेत् ॥
मातरं यदि वा गच्छेद्भगिनीं स्वसुतामपि । वधूं च मोहितो गच्छंस्त्रीणि कृच्छ्राण्यथाचरेत् ॥

चांद्रायणत्रयं कृत्वा दद्याद्गोमिथुनत्रयम् । सशिखं वपनं कृत्वा पंचगव्यं पिबेत्ततः ॥
हुते ह्यग्नौ तथाप्यत्र शुद्ध्यत्येवं तपोधन । पितृदारान्द्विजश्रेष्ठ मातुश्च भगिनीं तथा ॥
गुरुपत्नीं मातुलानीं भ्रातुर्भार्यां स्वगोत्रजाम् । यदि गच्छति मोहेन प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥
चांद्रायणत्रयं ब्रह्मन्पंचगोमिथुनानि च । विप्रेभ्यो दक्षिणां दद्याच्छुध्यते नात्र संशयः ॥
गां च गच्छति यो मूढ उपवासत्रयं चरेत् । धेनुं दत्त्वा तथा चान्नं शुद्ध्यत्यत्र न संशयः ॥

वेश्यां खरीं शूकरीं च कपिं तुं महिषीं द्विज । आकंठतः समाक्षिप्य गोमयोदककर्द्दमे ॥
तत्र तिष्ठेन्निराहारो त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति । सशिखं वपनं कृत्वा त्रिरात्रमुपवासयेत् ॥
एकरात्रं जले स्थित्वा शुद्ध्यत्येव न संशयः । ब्राह्मणीं तु यदा गच्छेत्यो नरः काममोहितः ॥
प्राजापत्यत्रयं कुर्य्याच्चांद्रायणत्रयं तथा । गोत्रयं तु तथा दद्याच्छुद्ध्यत्येव तपोधन ॥
ब्राह्मणी पंचगव्यं तु पंचरात्रं पिबेद्द्विज । गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुध्यत्यत्र न संशयः ॥

परांगनां यदागच्छेत्कृच्छ्रं सांतपनं चरेत् । यथार्गला तथा योषित्तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥
वर्णबाह्यां तथा नीचामनुगच्छेत्सकृन्नरः । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं शुद्ध्यत्येव न संशयः ॥
अंगारसदृशी योषित्सर्पिः कुंभसमः पुमान् । तस्याः परिसरे ब्रह्मन्न स्थातव्यं कदाचन ॥
जारेण जनयेद्गर्भं या च नारी कुलांतका । त्याज्या सा सर्वथा ब्रह्मस्तत्र दोषो न विद्यते ॥

या च नारी गृहाद्गच्छेत्त्यक्त्वा बंधून्स्वकानपि । नष्टा सा च कुलभ्रष्टा न तस्याः संगमः पुनः ॥
या च नारी यदा गच्छेन्मोहिता परपूरुषम् । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं पंचगव्यं पिबेत्ततः ॥
गोद्वयं तु ततो दद्याच्छुध्यत्येव न संशयः । ब्राह्मणी बालिशा ब्रह्मन्मोहिता परपूरुषम् ॥
यदा गच्छेत्तदा त्याज्या जनैर्दोषो न विद्यते । यो गच्छेद्ब्राह्मणीं विप्र भूसुरः काममोहितः ॥
गो तिलांश्च तदा दद्याच्छुद्ध्यत्यत्र न संशयः ॥

पद्मपुराण/४ (ब्रह्मखण्डः)/१८/२ – २४

गुरुतल्पगतानां च प्रायश्चित्तमुदीर्यते ॥
अज्ञानान्मातरं गत्वा तत्सपत्नीमथापि वा । स्वयमेव स्वमुष्कं तु च्छिंद्यात्पापमुदीरयन् ॥
हस्ते गृहीत्वा मुष्कं तु गच्छंद्वै नैर्ऋतीं दिशम् । गच्छन्मार्गै सुखं दुःखं न कदाचिद्विचारयेत् ॥
अपश्यन्गच्छतो गच्छेत्प्राणान्तं यः स शुद्ध्यति । मरुत्प्रपतनं वापि कुर्यात्पापमुदाहरन् ॥
स्ववर्णोत्तमवर्णस्त्रीगमने त्वविचारतः । ब्राह्महत्याव्रतं कुर्याद्वादशाब्दं समाहितः ॥

अमत्याभ्यासतो गच्छेत्सवर्णां चोत्तमां तथा । कारीषवह्निना दग्धः शुद्धिं याति द्विजोत्तम ॥
रेतःसेकात्पूर्वमेव निवृत्तो यदि मातरि । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्रेतः सेकेऽग्निदाहनम् ॥
सवर्णोत्तमवर्णासु निवृत्तो वीर्यसेचनात् । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यान्नवाब्दान्विष्णुतत्परः ॥
वैश्यायां पितृपत्न्यां तु षडब्दं व्रतमाचरेत् । गत्वा शूद्रां गुरोर्भार्यां त्रिवर्षं व्रतमाचरेत् ॥

मातृष्वसारं च पितृष्वसारमाचार्यभार्यां श्वशुरस्य पत्नीम् ।
पितृव्यभार्यामथ मातुलानीं पुत्रीं च गच्छेद्यदि काममुग्धः ॥

दिनद्वये ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्यथाविधि । एकस्मिन्नेव दिवसे बहुवारं त्रिवार्षिकम् ॥
एकवारं गते ह्यब्दंव्रतं कृत्वा विशुद्ध्यति । दिनत्रये गते वह्निर्दग्धः शुध्येत नान्यथा ॥
चांजालीं पुष्कसीं चैव स्नुषां च भगिनीं तथा । मित्रस्त्रियं शिष्यपत्नीं यस्तु वै कामतो व्रजेत् ॥

ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यात्स षडब्दं मुनीश्वर । अकामतो व्रजेद्यस्तु सोऽब्दकृच्छ्रं समाचरेत् ॥
महापातकिसंसर्गे प्रायश्चित्तं निगद्यते । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥
यस्य येन भवेत्संगो ब्रह्महादिचतुर्ष्वपि । तत्तद्व्रतं स निवृत्य शुद्धिमान्पोत्यसंशयम् ॥

नारदपुराण/पूर्वार्ध/३०/५६ – ७१

अगम्यागमनं नाम मातृस्वसृगुरुस्त्रियः । मातुलस्य प्रिया चेति गत्वेमा नास्ति निष्कृतिः ॥
मातृसङ्गे तु यदघं तदेव स्वसृसङ्गमे । गुरुस्त्रीसंगमे तद्वद्गुरवो बहवः स्मृताः ॥
ब्रह्मोपदेशमारभ्य यावद्वेदान्तदर्शनम् । एकेन वक्ष्यते येन स महागुरुरुच्यते ॥
ब्रह्मोपदेशमेकत्र वेदशास्त्राण्यथैकतः । आचार्यः स तु विज्ञेयस्तदेकैकास्तु देशिकाः ॥
गुरोरात्मान्तमेव स्यादायार्यस्य प्रियागमे । द्वादशाब्दं चरेत्कृच्छं एकैकं तु षडब्दतः ॥

मातुलस्य प्रियां गत्वा षडब्दं कृच्छ्रमाचरेत् । ब्राह्मणस्तु सजातीयां प्रमदां यदि गच्छति ॥
उपोषितस्त्रिरात्रं तु प्राणायामशतं चरेत् । कुलटां तु सजातीयां त्रिरात्रेण विशुध्यति ॥
पञ्चाहात्क्षत्रियाङ्गत्वा सप्ताहा द्वैश्यजामपि । चक्रीकिरातकैवर्तकर्मकारादियोषितः ॥
शुद्धिः स्याद्द्वादशाहेन धराशक्त्यर्चनेन च । अनन्त्यजां ब्राह्मणो गत्वा प्रमादादब्दतः शुचिः ॥
देवदासी ब्रह्मदासी स्वतन्त्राशूद्रदासिका । दासी चतुर्विधा प्रोक्ता द्वे चाद्ये क्षत्रियासमे ॥

अन्यावेश्याङ्गनातुल्या तदन्या हीनजातिवत् । आत्मदासीं द्विजो मोहादुक्तार्थे दोषमाप्नुयात् ॥
स्वस्त्रीमृतुमतीं गत्वा प्राजापत्यं चरेद्व्रतम् । द्विगुणेन परां नारीं चतुर्भिः क्षत्रियाङ्गनाम् ॥
अष्टभिर्वैश्यनारीं च शूद्रां षौडशभिस्तथा । द्वात्रिंशता संकरजां वेश्यां शूद्रामिवाचरेत् ॥
रजस्वलां तु यो भार्यां मोहतो गन्तुमिच्छति । स्नात्वान्यवस्त्रसंयुक्तमुक्तार्थेनैव शुध्यति ॥
उपोष्य तच्छेषदिनं स्नात्वा कर्म समाचरेत् । तथैवान्याङ्गनां गत्वा तदुक्तार्थं समाचरेत् ॥
पित्रोरनुज्ञया कन्यां यो गच्छेद्विधिना विना । त्रिरात्रोपोषणाच्छुद्धिस्तामेवोद्वाहयेत्तदा ॥

कन्यां दत्त्वा तु योऽन्यस्मै दत्ता यश्चानुयच्छति । पित्रोरनुज्ञया पाददिनार्धेन विशुध्यति ॥
ज्ञातः पितृभ्यां यो मासं कन्याभावे तु गच्छति । वृषलः स तु विज्ञेयः सर्वकर्मबहिष्कृतः ॥
ज्ञातः पितृभ्यां यो गत्वा परोढां तद्विनाशने । विधवा जायते नेयं पूर्वगन्तारमाप्नुयात् ॥
अनुग्रहाद्द्विजातीनामुद्वाहविधिना तथा । त्यागकर्माणि कुर्वीत श्रौतस्मार्तादिकानि च ॥
आदावुद्वाहिता वापि तद्विनाशेऽन्यदः पिता । भोगेच्छोः साधनं सा तु न येग्याखिलकर्मसु ॥

ब्रह्माण्डपुराण/उत्तरभागः/८/२ – २२

अंगारसदृशी योषित्सर्पिः कुंभसमः पुमान् । तस्याः परिसरे ब्रह्मन्न स्थातव्यं कदाचन ॥
जारेण जनयेद्गर्भं या च नारी कुलांतका । त्याज्या सा सर्वथा ब्रह्मस्तत्र दोषो न विद्यते ॥

पद्मपुराण/४ (ब्रह्मखण्डः)/१८/१९ – २०

सखिभार्याकुमारीषु स्वयोनिष्वन्त्यजासु च। सगोत्रासु तथा स्त्रीषु गुरुतल्पसमं स्मृतम्॥
पितुः स्वसारं मातुश्च मातुलानीं स्नुषामपि। मातुः सपत्नीं भगिनीमाचार्य्यतनयां तथा॥
आचार्य्यपत्नीं स्वसुतां गच्छंस्तु गुरुतल्पगः। छित्त्वा लिङ्गं वधस्तस्य सकामायाः स्त्रियास्तथा ॥

गरुडपुराण/आचारकाण्डः/१०५/९ – ११, याज्ञवल्क्यस्मृतिः/प्रायश्चित्ताध्यायः(३)/२३१ – २३३

यहां प्रमाणों का विशेष विश्लेषण नहीं किया गया है केवल प्रमाणों का संकलन मात्र है। वर्त्तमान में जो कानून-व्यवस्था है वह भले ही शास्त्रविरुद्ध भी क्यों न हो किन्तु शास्त्र ही ऐसी आज्ञा करता है कि शासनादेश का पालन करना चाहिये। किन्तु यह प्रश्न तो उत्पन्न होता ही है कि भारत में भारतीय शास्त्रों के विरुद्ध विचार क्यों किया जाता है ? विदेशियों और विधर्मियों के नियम मानक किस आधार से हो गये ? आज विदेशी-विधर्मियों की विचारधारा का ही दुष्प्रभाव है कि विवाह की आयु को मनगढंत रूप से निर्धारित किया गया है।

विधर्मियों में विवाह संस्कार है ही नहीं और भारतीय संस्कृति में विवाह संस्कार है एवं संस्कार की आयु शास्त्रों द्वारा निर्धारित है तो विधर्मियों की विचारधारा को अंगीकार करते हुये भारतीय व्यवस्था में विवाह को संस्कार न मानकर मैरिज/शादी/अनुबंध क्यों समझा जा रहा है ? ऐसी विकृति क्यों उत्पन्न की जा रही है जो भारतीय संस्कृति को ही छिन्न-भिन्न कर रही है। १०० वर्ष पूर्व तक यदि विवाह की आयु शास्त्रों से निर्धारित किया जाता रहा तो आज की शासन को अपनी नाक अड़ाने की क्या पड़ गयी ? विधर्मियों के अनुगामी शासन में भरे पड़े हैं और इसी का दुष्परिणाम है कि :

  • दुराचार की छूट दी जा रही है – “माय बॉडी माय च्वाइश”
  • किन्तु पति बलात्कारी हो सकता है।

इस विषय को समझना सामान्य जनों के लिये जितना महत्वपूर्ण है उससे अधिक शासन व्यवस्था में सम्मिलित लोगों को समझना आवश्यक है, क्योंकि वो लोग नीतियां बनाते हैं और प्रभावी भी करते हैं। उनको अपने आंखों से विधर्मियों द्वारा जो पट्टी लगाई गयी है वह उतार फेंकना आवश्यक है।

शासन-व्यवस्था के सनातनविरोधी होने का इससे बड़ा साक्ष्य क्या हो सकता है कि भारत में भारतीय शास्त्रानुकूल विमर्श करने पर भी अस्वीकरण देना होगा, सफाई देनी पड़ेगी कि हमारा उद्देश्य किसी की भावना को अथवा किसी व्यक्ति-संगठन-संस्था को ठेंस पहुंचाने का उद्देश्य नहीं है। वो भी तब जबकि विस्तृत विमर्श किया भी नहीं गया है।

निष्कर्ष

“पाश्चात्य विचारधारा के अंधानुकरण के कारण आज व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर दुराचार को छूट दी जा रही है, जो भारतीय संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर रही है।”

शास्त्रोक्त प्रमाणों के इस गहन संकलन से यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि सनातन शास्त्र एक ओर जहाँ काम-वासना के अनियंत्रित, अमर्यादित और दूषित स्वरूप—जैसे व्यभिचार, अगम्यागमन और बलपूर्वक किए गए कुकर्मों (बलात्कार)—को नरक का द्वार और समाज के समूल विनाश का कारण बताते हैं, वहीं दूसरी ओर वे समाज में किसी भी प्रकार के छल या बल की शिकार हुई पीड़ित स्त्रियों के पुनर्वास, शुद्धि और समाज में ससम्मान स्वीकृति का परम करुणामयी मार्ग भी दिखाते हैं। “यथा भूमिस्तथा नारी” का सिद्धांत सनातन धर्म की उसी वैज्ञानिक और उदार दृष्टिकोण को रेखांकित करता है जो पीड़ित को दोषी नहीं मानता।

यह आलेख इस सत्य को उद्घाटित करता है कि हमारे ऋषियों द्वारा निर्मित आचार-संहिताएं और काल-गणना के नियम आज के आधुनिक समाज को नैतिक, मानसिक और चारित्रिक पतन के गर्त में गिरने से बचाने के लिए शत-प्रतिशत प्रासंगिक हैं। समकालीन नीति-निर्माताओं को पाश्चात्य और विधर्मी चश्मे को उतारकर भारत की इस महान धरोहर को स्वीकार करना होगा, अन्यथा संस्कारों के अभाव में सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह बिखर जाएगा। सनातन शास्त्रों के ये नियम आज भी समाज में शांति, मर्यादा और सुरक्षा स्थापित करने के सर्वोत्तम साधन हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer)

अस्वीकरण: यह आलेख विशुद्ध रूप से भारतीय शास्त्रों में वर्णित धार्मिक, सामाजिक एवं नैतिक नियमों के शैक्षणिक व शास्त्रीय विश्लेषण हेतु प्रस्तुत किया गया है। यहाँ वर्णित ‘प्रायश्चित्त’ और ‘दण्ड’ शास्त्रीय न्यायिक व्यवस्था और धार्मिक शुद्धि के सिद्धांतों पर आधारित हैं। सम्प्रति देश को चलाने वाले शास्त्रनिष्ठ नहीं हैं और विदेशी कुसंस्कारों से ग्रस्त हैं जिस कारण यहां यह अस्वीकरण करना आवश्यक है कि हम इस व्यवस्था के व्यावहारिक प्रयोग का समर्थन नहीं करते और जो देश की कानून-व्यवस्था विद्यमान है भले ही म्लेच्छानुकूल हो उसके अधीन हैं एवं स्वीकारना बाध्यकारी है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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