“व्यक्ति पर उसके परिवार और समाज का नियंत्रण अनिवार्य है, क्योंकि इस अधिष्ठान से भिन्न कोई भी बाह्य सत्ता सम्यक् नियंत्रण स्थापित कर ही नहीं सकती।”
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है —यह अकाट्य सत्य है। किंतु समाज और परिवार की इस सत्ता का आधार कोई लिखित आधुनिक विलेख (Document) या संविधान नहीं, बल्कि युगों-युगों से मानसपटल पर स्थापित मूल्य, मर्यादाएं और शास्त्रों में लिखित-अलिखित नियम आदि हैं । परिवार वह अधिष्ठान है जहाँ रहने वाले सदस्य एक-दूसरे के सुख हेतु ‘ममत्व’ का त्याग करते हैं, और समाज वह व्यापक नियंत्रण है जो व्यक्ति को पशुवत होने से रोककर मानवीय गरिमा प्रदान करता है।
देश में सामाजिक प्राणी कहां से आयेगा ?
“बच्चे का पालन-पोषण कैसे करें, यह स्वभाव में ही समाहित होता है, किसी लिखित पोथी को पढ़कर नहीं सीखा जाता।”
परिवार और समाज के ये नियम स्वभाव और आचरण से प्रकट होते हैं, लेखपत्रों से नहीं। जैसे पशु-पक्षियों के भी अपने समाज और नियम होते हैं, जिन्हें वे किसी पाठशाला में जाकर नहीं सीखते, उसी प्रकार मानवीय मूल्य भी परंपरा और संसर्ग से स्वतः अंतःकरण में समाहित होते हैं।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है—इसमें कोई आपत्ति नहीं। प्रत्येक परिवार में पुरुष, स्त्री अथवा अन्य सदस्य एक-दूसरे को सुखी देखना चाहते हैं। वास्तविक परिवार वही है जहाँ रहने वाले सदस्य एक-दूसरे के सुख हेतु त्याग करते हैं। परिवार का मुखिया सबका सुख चाहता है और सब सुखी रहें, इसके लिए वह त्याग के साथ-साथ एक सुदृढ़ नियंत्रण भी रखता है। समाज में यह नियंत्रण और अधिक व्यापक होता है, और यही नियंत्रण मनुष्य को पशु बनने से रोककर एक मर्यादित सामाजिक प्राणी बनाता है।
परिवार और समाज के इन नियमों का लिखित होना अनिवार्य नहीं होता; क्योंकि परिवार और समाज तो पशु-पक्षियों के भी होते हैं। इनके नियम कागज़ों के पत्रों पर नहीं लिखे जाते, बल्कि विचारों में स्थापित किए जाते हैं, जो कालान्तर में मनुष्य के स्वभाव का रूप ग्रहण कर लेते हैं। इसी स्वभाव के अनुसार व्यावहारिक जगत में आचरण-व्यवहार परिघटित होता है।
प्रत्येक परिवार और समाज अपने सदस्यों से यह अपेक्षा करता है कि वे इन नियमों-मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करें; क्योंकि जब सभी ऐसा करेंगे, तभी परिवार और समाज सुखी रह सकता है। यदि कुल का एक भी सदस्य मर्यादा का उल्लंघन करे, तो पूरा परिवार और समाज उसका भुक्तभोगी बनता है और दुःख पाता है। इस कारण, व्यक्ति पर उसके परिवार और समाज का नियंत्रण अबाधित और अनिवार्य है; क्योंकि इस सामाजिक अधिष्ठान से भिन्न कोई भी अन्य बाह्य सत्ता समाज पर वह सम्यक् नियंत्रण स्थापित कर ही नहीं सकती, जिसमें सबका सुख और कल्याण निहित हो।
कुल-मर्यादा का ह्रास और आधुनिकता का दंभ
प्रत्येक परिवार और समाज अपने सदस्यों से यह अपेक्षा करता है कि वे कुल की सीमाओं और मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करें। जब एक भी सदस्य इन मर्यादाओं का उल्लंघन करता है, तो संपूर्ण कुल और समाज उसका भुक्तभोगी बनता है, इसलिये नियंत्रित करने का अधिकार भी होना ही चाहिये।
जो लिखित शास्त्र भी हैं, वे वर्णाश्रम, पति-पत्नी, पिता-पुत्र आदि रूपों में लिखित होकर भी मूलतः परिवार और समाज की मर्यादा ही सिखाते हैं। यह ज्ञान परंपरा से मनुष्यों के मानसपटल पर स्थापित होता है, चाहे कोई लिखित शास्त्र को पढ़े या न पढ़े। यदि कहीं यह लिखा भी हो कि बच्चे का पालन-पोषण कैसे करें, तो कोई माता-पिता उसे पढ़कर अपने बच्चे को नहीं पालते, बल्कि स्वाभाविक रूप से परिवार और समाज में रहकर इसे सीखते और करते हैं। बच्चे को कब बैठना सिखाना है और कब चलना, यह सब स्वभाव में ही समाहित होता है, किसी पोथी को पढ़कर नहीं सीखा जाता।

जो लिखित भाग है, वह तो पढ़ने पर ही ज्ञात होगा; और यदि कोई पढ़ना ही न सीखे तो उसे ज्ञान कैसे होगा? इस गंभीर प्रश्न का उत्तर यही है कि वह आवश्यक ज्ञान परिवार और समाज मनुष्य को स्वाभाविक रूप से प्रदान करता है, न कि केवल पढ़कर जाना जाता है।
ग्रामीण परिवेश की शुचिता बनाम महानगरों का म्लेच्छाचार
यदि आप ग्रामीण परिवेश में जाकर देखें, तो एक अल्पबुद्धि (मूर्ख) व्यक्ति भी सहजता से स्वीकार करेगा कि वह अल्पबुद्धि है, और वह नीतिवचन बताते हुए कहेगा कि “यह मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार है।”
इसके विपरीत, महानगरों में स्थिति सर्वथा भिन्न है। वहाँ कोई नीति बची ही नहीं है। भले ही कोई Ph.D. धारक हो, किंतु उसकी महत्वपूर्ण नीतियां इस घृणित विचार पर आधारित होती हैं कि “जंग और इश्क में सब जायज है।” वहाँ परिवार और समाज के भीतर भी केवल घृणित राजनीति चलती रहती है। महानगरों में जो प्रेम दिखाई भी देता है, वह पूर्णतः बनावटी है, यह दंभ और म्लेच्छाचार निम्नलिखित विसंगतियों के माध्यम से साक्षात् सिद्ध होता है:
- विवाह और तलाक का खेल: विवाह जैसे पवित्र और सनातन बंधन को खिलौना बना देना।
- स्वेच्छाचार की प्रधानता: विवाह के पावन संस्कार में कुल-मर्यादा को छोड़कर स्वयं की इच्छा को सर्वोपरि रखना।
- कैरियर का व्यामोह: विवाह और बच्चे जैसे महत्वपूर्ण पारिवारिक सुखों को गौण कर देना और केवल कैरियर को ही अधिक महत्वपूर्ण बना लेना।
- संस्कारों का अभाव: बच्चों की देखभाल न कर पाना (चाहे समय का अभाव हो या दायित्व निर्वहन की विफलता) और उनके प्रति वास्तविक प्रेम का विलोप हो जाना।
- वृद्धजनों का तिरस्कार: अपने ही जन्मदाताओं (माता-पिता) की उपेक्षा करना और संयुक्त परिवार से पृथक हो जाना।
- म्लेच्छाचार को अंगीकार करना: सभी शास्त्रीय नियमों को तिलांजलि देकर पूर्णतः म्लेच्छ आचरण अपनाना।
- प्रदर्शन मात्र हिन्दुत्व: पूजा-पाठ करना, मंदिर जाना या हनुमान चालीसा पढ़ना केवल एक बाह्य प्रदर्शन मात्र है ताकि समाज में सनातनी होने का ढोंग सिद्ध किया जा सके।
- ब्राह्मणों का अपमान: समाज के मार्गदर्शक ब्राह्मणों को उचित सम्मान न देना। फिल्मों और सीरियलों में जो ब्राह्मणों का सुनियोजित अपमान दिखाया जाता है, वह वास्तव में इन महानगर के लोगों के ही व्यावहारिक आचरण का प्रतिबिंब है।
- श्वान-संसर्ग: कुत्ते (श्वान) के साथ ही भोजन करना और उसी के साथ शयन करना।
- संसर्ग दोष की स्वीकृति: शास्त्रों में वर्णित संसर्ग दोष के नियमों को सर्वथा अस्वीकार करना और असंसर्गियों (अपवित्र लोगों) से अधिक संसर्ग रखना।
- व्रत का व्यवसायीकरण: व्रत के फलाहार (सिद्धान्न) को भी स्वयं पवित्रता से पकाने के स्थान पर ऑनलाइन होटलों से मँगाना।
गाँवों में जितनी अधिक पारिवारिक और सामाजिक भूमिका का निर्वहन किया जाता है, उतना ही कम प्रदर्शन होता है; इसके विपरीत महानगरों में जितना कम निर्वहन होता है, उतना ही अधिक आडंबर किया जाता है। गाँव के लोग यदि रुष्ट या खिन्न होंगे, तो उसे स्पष्ट व्यक्त कर देंगे; वे दाँत निपोरकर बनावटी हँसना जानते ही नहीं। किंतु नगरों के लोग तो दाँत निपोरने का प्रशिक्षण (Training) लेते हैं कि कब, कहाँ, कितना और किधर हँसना है। तात्पर्य यह कि उनके मुखमंडल पर कोई स्वाभाविक भाव होता ही नहीं, वे केवल दंभ में आकंठ डूबे रहते हैं और बाहर प्रदर्शन विपरीत करते हैं।
गाँवों में आज भी ‘वचन’ का महत्व होता है, किंतु नगरों में विधिक समझौते (Agreement) भी इसी सोच के साथ किए जाते हैं कि कब और कैसे इससे पीछे भागा जा सके। गाँवों में सहयोग उपकार और कृतज्ञता के भाव से होता है, जबकि नगरों में सहयोग के पीछे व्यापार होता है—कि “बदले में मेरा क्या लाभ होगा?”
जब अंतःकरण से उपकार और कृतज्ञता ही विलुप्त हो जाए, तो वह सहयोग कैसा? जो मनुष्य स्वभाव से कृतघ्न (अहसानफ़रामोश) हो, वह पशु से भी निकृष्ट है; क्योंकि पशु भी कृतज्ञ होते हैं, जबकि उन्हें कोई ग्रंथ पढ़ाकर या स्कूल-कॉलेज भेजकर यह नहीं सिखाया जाता। दया, प्रेम, करुणा, निष्ठा, ग्लानि और कृतज्ञता जैसे भावों में पशु भी आज के शहरी मनुष्यों से बहुत आगे हैं; वे केवल “I Love You” बोल नहीं सकते, किंतु व्यक्त करना जानते हैं।
नगरों के लोग व्यवहार करना नहीं जानते, वे केवल बोलना सीखते हैं। बात-बात पर ‘सॉरी’ (Sorry) तो बोल देंगे, किंतु उनके मन में कोई ग्लानि नहीं होती। यदि विश्वास न हो, तो सॉरी कहने वाले को एक बार डपटकर देखें, वह तुरंत प्रतिरोध पर उतारू हो जाएगा। इसके विपरीत, पशु से यदि कोई भूल हो जाए और उसे पीटा भी जाए, तो वह ग्लानि से भरा रहता है, कभी प्रतिरोध नहीं करता।
(नोट: यहाँ गाँवों की जो बात की गई है, वह एक आदर्श स्थिति है; वर्तमान में नगरों के संसर्ग और घटती दूरियों के कारण गाँवों में भी यह विकृति प्रवेश कर रही है, क्योंकि लोग गुणग्राही नहीं रहे। वे संसर्ग होने पर दूसरों के गुणों को नहीं, बल्कि अवगुणों को ग्रहण कर अहंकार की तृप्ति कर रहे हैं।)
महानगरों के लोग आचरण करना नहीं, केवल बोलना सीखते हैं। वे बात-बात पर ‘सॉरी’ (क्षमा) तो बोल देंगे, किंतु उनके भीतर अंतःकरण की ग्लानि नहीं होती। इसके विपरीत, पशु भी दया, करुणा, निष्ठा और कृतज्ञता व्यक्त करना जानते हैं; यदि उनसे कोई त्रुटि हो जाए, तो वे ग्लानि से भर जाते हैं, प्रतिरोध नहीं करते। किंतु नगरों का शिक्षित (दम्भी) मनुष्य आज कृतघ्नता की पराकाष्ठा पर पहुँचकर पशु से भी निकृष्ट हो चुका है। उल्लेख करने का उद्देश्य यह है कि देश को नियंत्रित वही लोग करते हैं, उनके अनुसार ही नियम-कानून बनाये जाते हैं और देश दंश झेल रहा है।
शासन-व्यवस्था का कुत्सित हस्तक्षेप और उसकी सीमा
“देश संविधान से चल सकता है, किंतु परिवार और समाज केवल धर्म, संस्कृति और पारंपरिक मूल्यों से ही चलते हैं।”
वर्तमान भारत अपने आदर्शों और मर्यादाओं से विरक्त होकर विदेशी दुराचारों और कुविचारों की ओर आकृष्ट हो रहा है। सूचना-प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग केवल घृणित राजनीति के लिए किया जा रहा है। देश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे तंत्र भारतीय समाज और संस्कृति को अपना गुप्त शत्रु समझते हैं। उन्हें यह भय है कि यदि परिवार और समाज स्वतः सुखी, मर्यादित और अनुशासित रहेंगे, तो इन राजकीय संस्थाओं का महत्व ही समाप्त हो जाएगा; इनके पीछे लोग भागना बंद कर देंगे, अहर्निश इनकी चर्चा नहीं करेंगे।
इसके पीछे वह विदेशी समूह कार्य करता है जो इनसे मनोनुकूल कानून और निर्णय करवाता है। ये संस्थाएं अपने वास्तविक दायित्व को समझ ही नहीं रही हैं, या समझकर भी जानबूझकर विपरीत वर्ताव कर रही हैं। विदेशी विचारधाराओं की दासता में विभोर होकर ये लोग ‘संविधान’ की ओट लेकर भारतीय मूल्यों, आदर्शों और मर्यादाओं पर निरंतर प्रहार कर रहे हैं।
ये लोग घोर बौद्धिक दरिद्रता से ग्रसित हैं और अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए परिवार, समाज, जाति और वर्ण से संबंधित सभी सनातन मूल्यों को नष्ट करने पर तुले हैं। “देश संविधान से चलेगा”—यह वाक्य आज एक मुहावरे जैसा बना दिया गया है। इन मूर्खों को यह समझ नहीं आता कि संविधान से केवल देश (राज्य की बाह्य व्यवस्था) चलाया जा सकता है, परिवार और समाज नहीं। परिवार, समाज, जाति और वर्णाश्रम व्यवस्था के अलिखित मूल्य ही सर्वोपरि हैं, और शासन को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई विधिक अधिकार नहीं होना चाहिए।

इस आलेख का मुख्य संदेश यही है कि देश को चलाने वाली ये संस्थाएं और उन्हें प्रभावित करने वाले संगठन अपनी सीमा निर्धारित करें। वर्तमान में न्यायपालिका और विधायिका अपनी सीमा का घोर अतिक्रमण कर रही हैं, जिससे सामाजिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है। इनकी दुर्बलता का ही दुष्परिणाम है कि व्यक्ति गुणग्राही नहीं रहा, अवगुणों को ग्रहण करता है और मूल्यों का ह्रास करके अहंकार की तृप्ति करता है।
यदि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अपनी सीमा निर्धारित कर लें, मर्यादाओं का अतिक्रमण न करने का प्रण लें, और समाज के पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो जाएं, तो समाज की अन्य सभी संस्थाएं (जैसे शैक्षणिक संस्थान, मीडिया, सिने जगत आदि) स्वतः नियंत्रित हो सकती हैं, जिन्हें नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है।
शासन-तंत्र के कुकर्मों के प्रत्यक्ष प्रमाण
जब परिवार और समाज को उनकी पूर्ण स्वायत्तता (Autonomy) प्रदान की जाएगी और उन्हें संरक्षित किया जाएगा, तभी व्यक्ति वास्तव में पारिवारिक और सामाजिक बन सकता है। शासन को समाज के आंतरिक विषयों में पड़ने का कोई अधिकार नहीं है; क्योंकि जब भी वे इसमें पड़ते हैं, केवल क्षरण करते हैं। संविधान और कानून से कभी व्यक्ति का निर्माण नहीं हो सकता; ये देश चलाने के लिए हैं, परिवार और समाज चलाने के लिए नहीं।
ये लोग दुराग्रहपूर्वक संपूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में लेते जा रहे हैं। आज कानून के नाम पर व्यक्ति को जो ‘स्वतंत्रता और समानता’ दी जा रही है, वह वास्तव में स्वछंदता है, जिससे व्यक्ति यह मान बैठा है कि पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों का कोई औचित्य ही नहीं है। इस व्यवस्था के कुकर्मों के उदाहरण साक्षात् देखे जा सकते हैं:
जब शासन-व्यवस्था व्यक्ति को कानून के नाम पर ऐसी ‘स्वतंत्रता’ और ‘समानता’ प्रदान करती है जो अंततः ‘स्वछंदता’ (उच्छृंखलता) में बदल जाती है, तो पारिवारिक और सामाजिक मूल्य स्वतः नष्ट हो जाते हैं। इसके कुछ प्रत्यक्ष कुकर्म इस प्रकार हैं:
- मर्यादा विरोधी आयु विलेख: विवाह की आयु विधिक रूप से निर्धारित कर दी गई है कि उससे पूर्व विवाह अपराध है, किंतु विवाह से पूर्व दुराचार करने, गर्भधारण करने और गर्भपात करने की पूर्ण छूट दे दी गई है क्योंकि वहां दुराचार कुछ होता ही नहीं न, यदि भारतीय संस्कृति में है तो ये भारत की न्यायपालिका थोड़े न है। यदि भारत की न्यायपालिका होती है सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण करती क्षरण नहीं।
- पारिवारिक विघटन को प्रश्रय: पति के ऊपर पत्नी द्वारा बलात्कार (Marital Rape) का आरोप लगाने का मार्ग खोला जा रहा है, जबकि परपुरुषों से संबंध बनाने (Adultery) की विधिक छूट दे दी गई है। अरे कोई चुल्लू भर पानी क्यों नहीं देता ऐसे जजों को।
- सनातन व्यवस्था पर आघात: विधिक घोषणाओं द्वारा जाति व्यवस्था (वर्णाश्रम) के उन्मूलन की बात की जाती है और अंतर्जातीय विवाहों को बढ़ावा देकर सनातन कुल-शुद्धि की परंपरा पर सीधा आघात किया जा रहा है। यहां विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों ही संयुक्त रूप से कार्य करती दिखाई पड़ती है। इस विषय में कभी न्यायपालिका ने सांस्कृतिक संरक्षक की भूमिका का निर्वहन किया है क्या ? वर्त्तमान में कुछ संरक्षण संबंधी भाव देखने को मिल रहे हैं इसलिये जगाने के उद्देश्य से ऐसा सन्देश दिया जा रहा है।
- सवर्णों का संवैधानिक उत्पीड़न: सवर्णों के विरुद्ध समाज में एक ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि सवर्ण समाज अपनी बहू-बेटियों की अस्मिता को लेकर सदैव भयाक्रांत रहता है। आए दिन ‘भीम-मीम’ के नाम पर सार्वजनिक रूप से न केवल अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं, बल्कि सीमा से अधिक उपद्रव मचाया जाता है। साथ ही, SC/ST Act जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामान्य वर्ग का निरंतर संवैधानिक उत्पीड़न किया जा रहा है।
मर्यादा निर्धारण हेतु शास्त्रीय प्रमाण एवं नीति संदर्भ
जब शासन व्यवस्था स्वयं संस्कृति और समाज को नष्ट करने के लिये तुल गई हो, तो उन्हें संस्कृति की बात करने का भी कोई अधिकार नहीं है। शास्त्रों में राजा (शासन), समाज और परिवार की सीमाओं को बहुत स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है। जब तक शासन धर्म के अधीन नहीं होगा, तब तक समाज का कल्याण संभव नहीं है।
(क) धर्म और नीति के वास्तविक लक्षण
मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनने के लिए ग्रन्थ पढ़ने की आवश्यकता नहीं है, अपितु अंतःकरण में धर्म के इन दस लक्षणों को स्वभाव के रूप में धारण करना अनिवार्य है, जिसका वर्णन मनुस्मृति (६/९२) में आता है:
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
अर्थात्: धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, शुचिता (पवित्रता), इंद्रिय-निग्रह, बुद्धि, ज्ञान, सत्य और क्रोध न करना — धर्म के ये दश लक्षण हैं और यही ही मनुष्य के वास्तविक सामाजिक और पारिवारिक मूल्य हैं।
(ख) कुल और आचार की रक्षा का महत्व
यदि कोई व्यक्ति लिखित कानूनों को मानता है किंतु अपने कुल और सदाचार की रक्षा नहीं करता, तो उसका पतन निश्चित है। मनुस्मृति (४/१७८) के अनुसार मनुष्य को अपने पूर्वजों के मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए:
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः। तेन यायात् सतां मार्गं तेन गच्छन् न रिष्यते॥
अर्थात्: जिस मार्ग पर हमारे पिता और पितामह (पूर्वज) चले हैं, उसी सनातन और सत्-मार्ग का अनुसरण मनुष्य को करना चाहिए। उस मार्ग पर चलने वाला कभी नष्ट नहीं होता। आज जो ये देश चलाने वाले हर विषय में पाश्चात्य का अनुकरण कर रहे हैं इससे कहीं न कहीं यही प्रकट होता है कि इनके बाप उधर ही हैं अथवा उनके कुछ बच्चे इधर हैं जो नियंत्रित कर रहे हैं। ऐसे लोगों को चिन्हिंत करना आवश्यक है और उनके हाथ में शक्ति न हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये। सीधा सा नियम होना चाहिये जो अपने देश की संस्कृति-सभ्यता में निष्ठावान नहीं है उसके हाथ में कोई शक्ति भी नहीं दी जायेगी।

(ग) राजा (शासन) की सीमा और धर्म की सर्वोच्चता
महाभारत के शांतिपर्व में स्पष्ट कहा गया है कि राजा या शासन स्वतः धर्म का निर्माता नहीं है, बल्कि वह धर्म के अधीन है। यदि शासन समाज के आंतरिक मूल्यों (वर्णाश्रम और पारिवारिक शुचिता) में हस्तक्षेप करता है, तो वह लोक का विनाश करता है। धर्म की रक्षा करने पर ही वह हमारी रक्षा करता है।
राजा का कर्तव्य केवल समाज के धर्म और मर्यादा की रक्षा करना है, उसमें हस्तक्षेप कर उसे नष्ट करना नहीं। वर्त्तमान में इसके विपरीत आचरण देखने को मिल रहा है और ओट संविधान का लेते हैं, देश संविधान से चलेगा। अरे धूर्तों संविधान का जो विषय देश और संस्कृति के प्रतिकूल है उसे बदला भी तो जा सकता है।
स्वायत्तता की आवश्यकता और अंतिम सन्देश
यदि भारत के नागरिकों को वास्तव में एक ‘पारिवारिक और सामाजिक प्राणी’ बनाना है, तो परिवार, समाज, जाति और वर्णाश्रम व्यवस्था को उनकी स्वायत्तता (Autonomy) पुनः लौटानी होगी। संविधान और कानून से कभी चरित्र-निर्माण या व्यक्ति-निर्माण नहीं हो सकता; वे केवल राज्य की बाह्य व्यवस्था को चलाने के साधन हैं।
यदि देश की प्रमुख तीनों संस्थाएं — “विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका” — अपनी सीमाओं को निर्धारित कर लें, मर्यादाओं का अतिक्रमण न करने का प्रण लें, और समाज के पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो जाएं, तो समाज की अन्य सभी संस्थाएं (जैसे शैक्षणिक संस्थान, मीडिया, सिने जगत आदि) स्वतः नियंत्रित हो जाएंगी। वर्तमान में इन दृश्य माध्यमों (फिल्मों और सीरियलों) में ब्राह्मणों और सनातन प्रतीकों का जो सुनियोजित अपमान दिखाया जाता है, वह इसी महानगरीय म्लेच्छाचार और शासन की शिथिलता का दुष्परिणाम है।
सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को यह समझना होगा कि वे जनता के मतों से केवल बाह्य व्यवस्था के संचालन के लिए चुने गए हैं, वे संस्कृति और धर्म के नियंता नहीं हैं। इसी प्रकार अन्यान्य पदों पर जो अवस्थित होते हैं वो भी धर्म के नियंता नहीं हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
“देश के लोग स्वछंद और पशुवत न बनें, इसका एकमात्र मार्ग यही है कि वे पुनः कुल-मर्यादाओं को स्वीकार कर सच्चे पारिवारिक व सामाजिक प्राणी बनें।”
समाज और सामाजिक मूल्य रहेंगे तभी मनुष्य सामाजिक प्राणी बन सकता है। यदि समाज और सामाजिक मूल्यों को ही नष्ट कर दिया जाय तो सामाजिक प्राणी भी नहीं हो सकते। देश का संचालन करने वाले अपनी कुम्भकर्णी निद्रा का त्याग करके विषय को गंभीरता से ग्रहण करें और समाज, सामाजिक मूल्य, सांस्कृतिक परम्परा आदि का संरक्षण करें न कि कुरीति, कुप्रथा कहकर सबका नाश।
देश चलाने वाली सभी संस्थाओं को अपनी मर्यादा और सीमा को जानना होगा और परिवार तथा समाज के औचित्य को स्वीकारना होगा। देश के लोग स्वछंद और पशुवत न बनें, इसका एकमात्र मार्ग यही है कि वे पुनः कुल-मर्यादाओं को स्वीकार कर सच्चे पारिवारिक व सामाजिक प्राणी बनें। मनुष्य को गुणग्राही बनना होगा, अपने दायित्वों को स्वीकार करना होगा और अंतःकरण में दया, करुणा, प्रेम, कृतज्ञता, कर्तव्यनिष्ठा तथा अनुशासन जैसे सनातन गुणों को आत्मसात करना होगा।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत विचार पूर्णतः सनातन परंपरा के पारंपरिक सामाजिक मूल्यों, वर्ण व्यवस्था और शास्त्र-मर्यादा पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी विधिक संस्था का अनादर करना नहीं, बल्कि आधुनिक व्यवस्था के कारण समाज और परिवार में आ रहे नैतिक व व्यावहारिक क्षरण को मूल रूप में उजागर करना है। पाठक एवं संस्थायें इसे शास्त्रीय और सुधारात्मक दृष्टिकोण से ग्रहण करें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








