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आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य: शास्त्रीय मर्म एवं विशेष विहित-निषिद्ध विचार

आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य: शास्त्रीय मर्म एवं विशेष विहित-निषिद्ध विचार आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य: शास्त्रीय मर्म एवं विशेष विहित-निषिद्ध विचार

“सूर्य का आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश केवल एक खगोलीय घटना नहीं, अपितु पृथ्वी के ऋतु चक्र का महा-रूपांतरण है।”

शास्त्रों में आर्द्रा नक्षत्र के अधिपति भगवान शिव (रुद्र) माने गए हैं। आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में आता है। जब सूर्य इस तीक्ष्ण और आर्द्रता से युक्त नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तो पृथ्वी पर वर्षा ऋतु का प्रारंभ होता है। आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य की उपस्थिति वाले इस कालखंड को शास्त्र पृथ्वी के ‘रजस्वला’ (अम्बुवाची) होना भी बताते हैं, जिसके कारण इस विशेष कालखण्ड में सामान्य नियमों से भिन्न कुछ विशेष नियम कहे गए हैं। कुछ विशेष विहित और निषिद्ध शास्त्रों में वर्णित है जिसको जानना अत्यावश्यक है।

आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य: शास्त्रीय मर्म एवं विशेष विहित-निषिद्ध विचार

“जब सूर्य आर्द्रा के प्रथम पाद में होते हैं, तब पृथ्वी स्वयं को नव-सृजन के लिए तैयार करते हुए रजोयुक्त होती है।”

मुहूर्त चिंतामणि, राजमार्तण्ड आदि ग्रंथों में आर्द्रा नक्षत्र विषयक अनेकों विशेष तथ्य प्राप्त होते हैं जैसे : पृथ्वी का रजस्वला होना, पृथ्वी संबंधी जुताई-वपन आदि का निषेध, क्षीर प्राशन, शिववास विचार का परिहार आदि। हम इन्हीं विषयों को यहां प्रामाणिक आधार से समझने का प्रयास करेंगे।

अम्बुवाची योग और पृथ्वी का रजस्वला होना

ज्योतिषीय ग्रंथों (शब्दकल्पद्रुम, वाचस्पत्यं) के अनुसार, जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण में प्रवेश करते हैं, तो पृथ्वी रजोयुक्त मानी जाती है:

रजोयुक्क्ष्माम्बुवाची च रौद्राद्यपादगे रवौ। तस्यां पाठो बीजवापो नाहिभीर्दुग्धपानतः॥
ज्योतिष (शब्दकल्पद्रुम, वाचस्पत्यं)

मुहूर्त चिंतामणि और तिथि निर्णय जैसे ग्रंथों से भी इसकी पुष्टि होती है कि सूर्य के आर्द्रा के प्रथम पाद में रहने तक (प्रथम तीन दिन) भूमि में ‘रज’ की उत्पत्ति होती है, अतः तीन दिनों तक बीज बोना (बीजवाप) पूर्णतः वर्जित है:

रवौ रौद्राद्यपादस्थे भूमेः संजायते रजः।
तस्माद्दिनत्रयं यावद् बीजवापं परित्यजेत्॥

तिथीनिर्णय, मुहूर्त चिंतामणि

आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य: शास्त्रीय मर्म एवं विशेष विहित-निषिद्ध विचार

अम्बुवाची काल में वर्जित कर्म

आर्द्रा नक्षत्र के तीन दिनों तक पृथ्वी रजोवती होती है और इस कालखंड में आध्यात्मिक और कृषि संबंधी कार्यों के लिए कड़े निषेध बताए गए हैं:

  • वेदाध्ययन एवं तर्पण निषेध: इन तीन दिनों में स्वाध्याय (वेदपाठ), वषट्कार और देव-पितृ तर्पण वर्जित है।
  • कृषि कार्य निषेध: भूमि को हल से जोतना या सूई की नोक के बराबर भी भूमि का खनन करना (खोदना) सर्वथा निषिद्ध है। इसके साथ ही वाहन चलाना और बीज वपन भी निषिद्ध किया गया है।
  • काम्य-नैमित्तिक कर्म: मत्स्य पुराण के अनुसार, पूर्व संकल्पित कार्यों को छोड़कर कोई भी नया काम्य, नैमित्तिक कर्म, मन्त्र क्रिया या यात्रा इस अवधि में नहीं करनी चाहिए।

न स्वाध्यायं वषट्कारं न देवपितृतर्पणम्। हलानां वाहनञ्चैव बीजानां वपनं तथा ॥
दिनत्रयं न कुर्व्वीत यावत् पृथ्वी रजस्वला। यतिनोव्रतिनश्चैव विधवा च द्विजस्तथा ॥
अम्बुवाचीदिने चैव पाकं कृत्वा न भक्षयेत्। स्वपाकं परपाकं वा अम्बुवाचीदिने तथा ॥
भक्षणं नैव कर्त्तव्यं चण्डालान्नमयं स्मृतम् ॥

राजमार्तण्ड (शब्दकल्पद्रुम, वाचस्पत्यं)

यदार्द्रर्क्षं समादाय भानोर्मन्मथगामिता । पुनस्तत्स्थेनमादाय यजनं त्रिदिनं त्यजेत् ॥
काम्यं नैमित्तिकं चैव यात्रां मन्त्रक्रियां तथा । ऋतुमत्यां न कुर्व्वीत पूर्व्वसङ्कल्पितादृते ॥
न कुर्य्यात् खननं भूमेः सूच्यग्रेणापि शाङ्करि ॥

मत्स्य (वाचस्पत्यं)

अम्बुवाची काल में वर्जित कर्म
अम्बुवाची काल में वर्जित कर्म

आर्द्रा में क्षीर (दुग्ध) भोजन का महामाहात्म्य

जहाँ एक ओर अम्बुवाची काल में सामान्य भोजन का निषेध है, वहीं शास्त्रों ने आर्द्रा के प्रथम चरण में दूध (क्षीर) पीने या क्षीरान्न ग्रहण करने का एक अद्भुत चमत्कारिक लाभ बताया है और यही इसका परिहार भी है। चण्डेश्वर कृत ‘कृत्यरत्नाकर’ तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है:

आर्द्रायाः प्रथमे पादे क्षीरं पिबति यो नरः। अपि रोषान्वितस्तस्य तक्षकः किं करिष्यति ॥
स्मृति वचन

क्षीर प्राशन/भोजन के लिये प्रशस्त प्रथम चरण निर्धारण :

  • आर्द्रा में सूर्य का प्रवेश – ज्येष्ठ (द्वितीय) शुक्ल अष्टमी, सोमवार, (२२/६/२०२६) – मध्याह्न १२/२९ पर (अदृश्य पञ्चाङ्गों में रात्रि ९ बजे के निकट)
  • पुनर्वसु में सूर्य का प्रवेश – आषाढ़ कृष्ण षष्ठी, सोमवार, (६/७/२०२६) – मध्याह्न १२/०७ पर (अदृश्य पञ्चाङ्गों में रात्रि ११ बजे के निकट)

आर्द्रा प्रथम चरण (दृश्यानुसार) : ज्येष्ठ (द्वितीय) शुक्ल अष्टमी, सोमवार, (२२/६/२०२६) – मध्याह्न १२/२९ से – ज्येष्ठ (द्वितीय) शुक्ल एकादशी, गुरुवार (२५/६/२०२६) – रात्रि १२/२१ तक

पाक निषेध और क्षीरप्राशन में विरोध और सङ्गति

क्षीर प्राशन/भोजन के लिये प्रशस्त प्रथम चरण निर्धारण :
क्षीर प्राशन/भोजन के लिये प्रशस्त प्रथम चरण निर्धारण :

जहां तक पाक निषेध और क्षीरप्राशन में विरोध का प्रश्न है तो यह परस्पर विरुद्ध न होकर एक-दूसरे के पूरक ही हैं और सङ्गति स्थापन करना आवश्यक है।

  • पाकक्रिया निषेध का तात्पर्य सभी पाक का निषेध होता है।
  • पायस सिद्धान्न संज्ञक न होकर परमान्न संज्ञक होता है और प्रशस्त होने के कारण सामान्य नियम का अपवाद सिद्ध होता है, अर्थात पायस से भिन्न पाक नहीं होगा।

वर्ष २०२६ में आर्द्रा प्रवेश एवं अम्बुवाची काल गणना

अब उक्त काल को जानना-समझना भी आवश्यक है कि २०२६ में सूर्य का आर्द्रा प्रवेश कब हो रहा है और पृथ्वी कब अम्बुवाची होगी एवं, प्रथम चरण कब तक है। यहां हम दृश्य पंचांगों के अनुसार इसे समझेंगे :

अम्बुवाची : ज्येष्ठ (द्वितीय) शुक्ल अष्टमी, सोमवार, (२२/६/२०२६) – मध्याह्न १२/२९ बजे सूर्य का आर्द्रा प्रवेश हो रहा है अर्थात यह प्रथम दिवस है और आगे दो दिन मंगलवार व बुधवार को मिलाकर जो तीन दिन होंगे २२/६/२०२६ – २४/६/२०२६ तक यह अम्बुवाची संज्ञक होगा एवं जो भी निषेध कार्य वर्णित हैं वो इन्हीं दिनों के लिये।

शिववास विचार का अपवाद: “आर्द्रायाञ्च गते रवौ”

श्रावणेऽधिकमासे च “आर्द्रायाञ्च गते रवौ।” शिवभेन्दुगते योगे, शुक्ले च व्यतिपातके ॥
हरानङ्ग हरीणाञ्च तिथिषु करणे चतुष्पदे। सोमवार शुभे ब्राह्मे प्रदोषाख्येऽभिजित्क्षणे ॥
शिवरात्र्यादि पर्वेषु उत्सवेषु निमित्तके । नित्याराधनकाले च शिववासं न चिन्तयेत् ॥

इस परिहार (Exemption) सूची में “आर्द्रायाञ्च गते रवौ” (जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में हों) प्रमुख है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में रहेंगे (२२ जून २०२६ से ६ जुलाई २०२६ तक), तब तक किसी भी दिन रुद्राभिषेक करने के लिए पंचांग में शिववास देखने की आवश्यकता नहीं है। इस संपूर्ण अवधि में किया गया शिव-पूजन साक्षात् फलदायी और अमोघ होता है। किन्तु एक विशेष तथ्य जो पूर्व में स्पष्ट है कि अम्बुवाची संज्ञक तीन दिनों का निषेध भी मान्य होगा। अर्थात २२ जून २०२६ से ६ जुलाई २०२६ तक शिववास परिहार ग्रहण न करके २५/६/२०२६ से ६/७/२०२६ तक ही ग्राह्य होगा।

निष्कर्ष (Conclusion)

आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य का संचरण सनातन जीवन पद्धति की सूक्ष्मता को दर्शाता है। यह काल हमें सिखाता है कि प्रकृति (पृथ्वी) के प्रति हमारी क्या कृतज्ञता होनी चाहिए और किस प्रकार संतुलन स्थापित करना चाहिये। जब पृथ्वी स्वयं को नव-सृजन के लिए तैयार कर रही होती है, तब उसे विश्राम देना (खनन व वपनादि कृषि कार्य का निषेध) और स्वयं की आंतरिक शुद्धि करना ही वास्तविक धर्म है।

इस विषय से संबंधित प्रमाण सुझाव आदि विद्वानों से सादर आमंत्रित हैं – 7992328206

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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