Headlines

फादर्स डे, मदर्स डे मातृ-पितृभक्ति या बौद्धिक दरिद्रता ?

फादर्स डे, मदर्स डे मातृ-पितृभक्ति या बौद्धिक दरिद्रता ? फादर्स डे, मदर्स डे मातृ-पितृभक्ति या बौद्धिक दरिद्रता ?

वर्तमान काल में सनातनी लोक-व्यवहार की दशा अत्यंत दयनीय और विद्रूप हो चुकी है। एक ओर जहाँ अंतर्जाल (गूगल, सोशल मीडिया) और आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से जनमानस स्वयं को अत्यधिक ‘प्रगतिशील’ और विवेकवान सिद्ध करने की चेष्टा करता है, वहीं दूसरी ओर वैचारिक चेतना का स्तर इतना संकीर्ण हो चुका है कि वह अपनी मूल जड़ों को भूलकर सर्वथा पराई परम्पराओं का दास बन चुका है। इसका सबसे प्रत्यक्ष और लज्जाजनक उदाहरण प्रतिवर्ष देखने को मिलता है, जब संपूर्ण देश में ‘मदर्स डे’ (मातृ दिवस) और ‘फादर्स डे’ (पितृ दिवस) जैसी पाश्चात्य कुप्रथाओं का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

ये बौद्धिक दरिद्रता से भिन्न कुछ और नहीं है और आज हम इसी विषय को गंभीरता से समझेंगे।

फादर्स डे, मदर्स डे मातृ-पितृभक्ति या बौद्धिक दरिद्रता ?

हे सनातनियों जब भी भगवान से कुछ मांगो तो सर्वप्रथम बौद्धिक दरिद्रता का निवारण मांगो – “जहां सुमति तहं संपति नाना। जहां कुमति तहं विपति निदाना ॥” शताब्दियों से जो विघ्नोपद्रव उत्पन्न हो रहे हैं वो कुमति की उपज हैं । वर्तमान में तो कुमति रूपी दलदल में ऐसे फंस गये हैं कि धर्म-सनातन-जय श्री राम आदि एक राजनीतिक नारा मात्र रह गया है और राजनीति करने वाले दल/संगठन इसका केवल लाभ लेते हैं किन्तु धर्म और सनातन के हित में कुछ नहीं करते। जो करते दिखते हैं वो भी केवल प्रदर्शन और लॉलीपॉप थमाना है, वास्तव में धर्म की हानि ही कर रहे हैं ।

उदाहरण – तीर्थों/मंदिरों का विकास तो कहते हैं किन्तु तीर्थाटन को पर्यटन बना चुके हैं। किसे-कब-कैसे तीर्थयात्रा करनी चाहिये वो लोग अन्वेषण करें जो जहां-तहां डुबकी लगा चुके हैं या आगे लगाने वाले हैं।

सनातनी की पहचान हनुमान चालीसा से होगी जिसकी ऐसी कुबुद्धि हो वो व्यक्ति/संस्था/संगठन सनातन के लिये क्या-क्या कर सकते हैं अनुमान लगाया जा सकता है। आज जनमानस को दिग्भ्रमित करके देश में हिन्दू होने का मतलब ये सिद्ध किया जा रहा है कि राममंदिर दर्शन गया तो हिन्दू, कुम्भ में डुबकी लगाया तो हिन्दू और जनमानस भ्रमित भी है। शिक्षा-शिक्षा-शिक्षा दशकों से चिल्लाते हुए शिक्षा के नाम पर सनातनियों का मानसिक ईसाईकरण किया जा रहा है और जनमानस भी दिग्भ्रमित हैं भी ।

फादर्स डे, मदर्स डे मातृ-पितृभक्ति या बौद्धिक दरिद्रता ?
  • धोती कहा जाय तो उन्नीसवीं सदी की और पैंट-पैजामा आधुनिक, किन्तु कैसे यह नहीं सोच पाते।
  • मातृ-पितृ भक्ति पिछड़ापन और मदर्स डे, फादर्स डे आधुनिकता, किन्तु कैसे?

ऐसे ढेरों उदाहरण दिये जा सकते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि : शिक्षित, आधुनिक आदि होने का तात्पर्य ईसाई बनना है और यदि नहीं बनें तो पिछड़े, उन्नीसवीं सदी के आदि ।

यही बौद्धिक दरिद्रता है कि हम इसको समझ भी नहीं पा रहे हैं, नेताओं और संगठनों का पिछलग्गू बनकर उनके नारे से हिन्दुत्व सिद्ध करते हैं। एक बार सोचना तो होगा कि जो सनातनी है उसे सिद्ध करने की आवश्यकता है क्या?

कोई व्यक्ति विशेष सबका माता या पिता नहीं हो सकता

वैचारिक और शास्त्रीय सत्य यही है कि समष्टि में कोई भी एक व्यक्ति विशेष सम्पूर्ण सृष्टि के मनुष्यों का माता या पिता नहीं हो सकता। प्रत्येक जीव के अपने माता-पिता होते हैं, जिन्होंने उसे जन्म दिया, पालित किया और संस्कारित किया। जब सबके माता-पिता वैयक्तिक रूप से भिन्न हैं, तो उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का काल, दिन और क्षण भी प्रत्येक कुल, वंश और व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न होना ही न्यायसङ्गत है।

ईसाइयों के मत में जो ‘मदर्स डे’ या ‘फादर्स डे’ निर्धारित किए गए हैं, उनका अपना एक ऐतिहासिक संदर्भ है, जो केवल उन्हीं के मत के अनुयायियों के लिए विहित है, सनातनियों के लिए नहीं। क्योंकि जिस व्यक्ति के लिये मदर्स-फादर्स आदि डे मनाये जाते हैं वो उनके ही अनुकूल है, सनातनी यदि उसके लिये मदर्स-फादर्स डे मनाता है तो ये उसकी बौद्धिक जड़ता व मानसिक दासता है।

मानसिक दासता की पराकाष्ठा

जिस सनातनी की बुद्धि कलियुग के प्रभाववश विकृत हो गई है, वह अपने साक्षात् जन्मदाताओं के प्रति जीवित रहते हुए और उनके मरणोपरांत भी शास्त्रोक्त दायित्वों का किञ्चित् भी निर्वहन नहीं करता; किन्तु पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण में अंधा होकर प्रतिवर्ष मतिच्छिन्न होकर ‘मदर्स डे’ और ‘फादर्स डे’ का स्वांग रचने लगता है। इसे निश्चितरूपेण ‘मानसिक रूप से ईसाई होना’ ही कहा जा सकता है।

यदि ये लोग वास्तव में सनातनी होते, तो केवल मंचों से ‘सनातन-सनातन’ का कोलाहल नहीं करते, अपितु स्मृतियों और पुराणों द्वारा निर्धारित उन परम पवित्र दायित्वों को अंगीकार करते जो वर्णाश्रम व्यवस्था के रूप में शास्त्रों द्वारा निर्धारित हैं।

संस्कार, नित्य-नैमित्तिक-काम्य आदि कर्मों के रूप में वर्णित है, पुरुषार्थ चतुष्टय प्रदायक है उसको जानते-समझते और पालन करते। अभी देखा जा रहा है कि जो व्यक्ति अपना सब कुछ बेचकर भी संतानों को पढ़ाता-लिखाता है वो बेटा-बेटी ‘माय लाइफ, माय बॉडी, स्वतंत्रता’ आदि का राग अलापने लगता है, विवाह में भी पारिवारिक कुलीनता, मर्यादा का परित्याग कर देता है और अपने पितरों को नरकगामी बनाकर मदर्स-फादर्स डे का स्वांग रचता है। मरणोपरांत कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो अंतिम क्रिया, श्राद्धादि भी नहीं करते। धिक्कार है….. धिक्कार है…..

मानसिक दासता की पराकाष्ठा
मानसिक दासता की पराकाष्ठा

मानसिक दासता की पराकाष्ठा क्या है इसको एक तथ्य से समझें कि भारत में सनातनियों के लिये यह सनातन शास्त्रसम्मत विश्लेषण है किन्तु आलेख के अंत में एक डिस्क्लेमर लगाना आवश्यक है। पता न कौन किस विषय को अपने ऊपर ले ले ? ये व्यवस्था भारत सरकार स्वीकारती है। गूगल आदि की तो बात ही क्या करें, ऐसी चर्चा ही यहां की जाती है इस कारण रीच को ही घटा दिया जाता है। यदि विधर्मियों के अनुकूल चर्चा की जाय तो रीच बढ़ जायेगी जैसे सनातन विरोधियों के लिये देखने को मिलता है।

शास्त्रोक्त दायित्व: सांवत्सरिक श्राद्ध और पितृपक्ष का विलोप

सनातन धर्म में माता-पिता के प्रति ऋण (पितृ-ऋण) से मुक्ति का मार्ग विधर्मियों की दासता करके मदर्स-फादर्स डे मनाने से प्रशस्त नहीं होता। शास्त्रों का विधान है कि प्रतिवर्ष माता-पिता की क्षय तिथि (मृत्यु की वार्षिक तिथि) पर कर्ता को विधिपूर्वक ‘सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध’ करे, यह अनिवार्य है। यह वह शास्त्रोक्त दायित्व है जिसे आधुनिक आधुनिकतावादियों ने पूर्णतः विस्मृत कर दिया है। जो जितना शिक्षित है वह उतना ही मूढ़ भी है, जितना ऋणी है उतना ही अधिक बड़ा कृतघ्न है। एक मूर्ख पुत्र जो अधिक ऋणी नहीं है वह करेगा, किन्तु एक शिक्षित और बड़ा व्यक्ति बन जाये जिसके लिये बाप सबकुछ बेच दे, वह नहीं करता है।

केवल माता-पिता ही नहीं, अपितु अपने समस्त पितरों की तृप्ति के लिए शास्त्रों ने वर्ष में एक पूरा पक्ष नियत कर रखा है, जिसे ‘आश्विन कृष्ण पक्ष’ या ‘पितृपक्ष (महालय)’ के नाम से जाना जाता है। इस पावन पक्ष में सभी पितरों के निमित्त ‘पार्वण श्राद्ध’ करना प्रत्येक गृहस्थ का दायित्व है, लोग गया जाकर पिण्ड से अपना पिण्ड छुड़ा लेते हैं, पितर सिर पर सवार होते हैं जिन्हें गया पहुंचा कर स्वयं मुक्त हो जाते हैं भले ही पितर नरकों में क्यों न भ्रमण करते रहें और मनायेंगे मदर्स डे, फादर्स डे।

गया श्राद्ध के नाम पर भ्रम का निवारण

यहाँ एक गम्भीर मतिभ्रम का निवारण भी नितान्त आवश्यक है। बहुत से लोग अज्ञानवश यह मान लेते हैं कि जीवन में एक बार गया जी जाकर पितरों का पिण्डदान कर दिया, तो उनके समस्त पारलौकिक दायित्व समाप्त हो गए और अब प्रतिवर्ष वार्षिक श्राद्ध या पितृपक्ष में पार्वण श्राद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह धारणा सर्वथा शास्त्रविरुद्ध, अविद्याग्रस्त और मनमुखी है। गयाश्राद्ध करने से पितरों को अक्षय तृप्ति और सद्गति अवश्य मिलती है, किन्तु उससे गृहस्थ का नित्य और नैमित्तिक वार्षिक कर्म कभी समाप्त नहीं होता।

गया जाने से वार्षिक, पार्वण आदि किसी भी श्राद्ध का परित्याग कर देना साक्षात् पितृद्रोही होने का लक्षण है।

विडम्बना की पराकाष्ठा देखिये कि जो समाज अपने विहित शास्त्रों की आज्ञा को मानने में संकोच करता है, जो अपनी संस्कृति के अनुसार माता-पिता की सांवत्सरिक तिथि पर तिल-जल लेकर बैठ नहीं पाता, वही विधर्मियों का बौद्धिक दासत्व स्वीकारते हुये स्वयं को गौरवान्वित समझता है। जब तक इस मानसिक दासता का उन्मूलन नहीं करेगा, तब तक उसका कोई भी लौकिक कर्म कल्याणकारी सिद्ध नहीं हो सकता। अपने शास्त्रोक्त मार्ग पर लौटें, अपनी कुल-परम्परा की शुचिता को सुरक्षित करें और छद्म प्रदर्शन का परित्याग कर विहित विधि से पितृ-ऋण का सम्मार्जन करें।

गया श्राद्ध के नाम पर भ्रम का निवारण

बौद्धिक दासता का त्याग करके दायित्व को जानो

उन लोगों के लिये यह आवश्यक है कि स्वयं को शिक्षित (पढ़ा-लिखा) घोषित करने से पूर्व स्वयं को जान लें कि वो कौन है और उनका दायित्व क्या है। क्योंकि जो अपने दायित्व तक को नहीं जान रहा है वह किस मुंह से स्वयं को शिक्षित (पढ़ा-लिखा, होशियार, तेज, विकसित आदि) कह सकता है ये तो पागलपन है। दायित्व का निर्वहन करने के लिये प्रथम तो दायित्व को जानना आवश्यक होता है और तदुपरांत सक्षमता के अनुसार निर्वहन किया जा सकता है।

जो माता-पिता के प्रति अपना दायित्व मदर्स डे और फादर्स डे समझ ले वह तो बौद्धिक रूप से दरिद्र है, मतिछिन्न है। सनातनी यदि सामान्य शब्दों में माता-पिता के प्रति अपने दायित्व को समझना चाहें तो कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु इस प्रकार है :

  • जीवित माता-पिता की सेवा करना (नौकर रख देना नहीं)
  • आज्ञा का पालन करना (मेरा जीवन मेरी स्वतंत्रता चिल्लाना नहीं)
  • वचन से तुष्ट करना, प्रत्येक माता-पिता की ये आकांक्षा होती है (उनको छोड़कर जिन्होंने बाल्यावस्था से ही वचन रूपी एक गढ़े व्यवहार को अंगीकार किया जिसमें वार्तालाप ही नहीं होता)
  • तीर्थाटन कराना, प्रत्येक माता-पिता वृद्धावस्था में तीर्थाटन करना चाहते हैं किन्तु यह दायित्व संतानों का ही होता है।
  • दान-धर्म आदि करवाना, जब माता-पिता संतानों पर आश्रित होने तो उनसे दान-पुण्य कराना भी संतानों का दायित्व होता है।
  • अंतिम अवस्था में शास्त्रीय विधान से मुमूर्षु कृत्य संपन्न करना ताकि यमदूतों का दर्शन न करें।
  • मृत्यु के उपरांत विधिपूर्वक अंतिम संस्कार और श्राद्ध-दानादि कृत्य।
  • तदुपरांत विभिन्न अवसरों पर श्राद्ध-दानादि, विशेष कर वार्षिक और पितृपक्ष में पार्वण।

अब आप स्वयं विचार करें तो अपने दायित्वों को जानता तक नहीं वो मदर्स डे और फादर्स डे मनाकर स्वयं को कृतकृत्य सिद्ध करता है औरों को प्रेरित भी करता है। जो व्यक्ति अपने दायित्वों को न जानता है न स्वीकारता है, निर्वहन की तो बात ही क्या करें, विवाह में स्वयं की संवैधानिक स्वतंत्रता सिद्ध करता है, माता-पिता-जाति-समाज के विरुद्ध जाकर विवाह कर लेता है, किन्तु विधर्मियों की व्यवस्था को आधुनिकता समझकर स्वीकार लेता है वह मतिछिन्न, बौद्धिक दास नहीं है तो क्या है ?

निष्कर्ष (Conclusion)

मूल निष्कर्ष यह है कि आधुनिक युग में प्रचलित ‘फादर्स डे’ (पितृ दिवस) और ‘मदर्स डे’ (मातृ दिवस) जैसी व्यवस्थाएं सनातन सिद्धांत के विरुद्ध, जिनका सनातन धर्म और उसकी व्यवस्था से कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई व्यक्ति विशेष सबका मां-बाप नहीं हो सकता; प्रत्येक जीव के अपने माता-पिता होते हैं। अतः अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करें किसी और के मां-बाप को अपना न सिद्ध करें।

सनातन परम्परा में माता-पिता की सेवा कोई एक दिन का उत्सव नहीं, अपितु जीवनपर्यन्त का नित्य व्रत है। जीवित रहते आज्ञापालन करना और मृत्यु के उपरान्त प्रतिवर्ष उनकी क्षय तिथि पर ‘सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट श्राद्ध’ तथा आश्विन कृष्ण पक्ष में ‘महालय पार्वण श्राद्ध’ करना अनिवार्य शास्त्रीय दायित्व है। इन सर्वोपरि कर्त्तव्यों को भुलाकर केवल वर्ष में एक दिन पश्चिमी उत्सव मनाना घोर मतिभ्रष्टता और ‘मानसिक दासता’ का अकाट्य साक्ष्य है। अतः अन्धानुकरण का परित्याग कर अपने विहित शास्त्रोक्त दायित्वों का निर्वहन करना ही सच्चा सनातन आचरण है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रयुक्त तीक्ष्ण शब्द (जैसे मतिभ्रष्ट, मानसिक दासता, विधर्मी) किसी निष्कपट व्यक्ति के प्रति द्वेषवश नहीं, अपितु शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार सनातन परम्पराओं का लोप करने वाली आधुनिक कुरीतियों के प्रति प्रयुक्त हुए हैं। सनातन में जो रुचि रखते हैं उनके ज्ञानवर्द्धन के उद्देश्य से आलेख लिखा गया है। पाठक कोई भी निर्णय स्वविवेक से लें, और हमारी बाध्यता को समझें की किस प्रकार से डिस्क्लेमर देने के लिये बाध्य हूँ।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

Leave a Reply