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बलि व्यवस्था पर शास्त्रों में विरोध अथवा संगति, क्या कोई हल नहीं है ?

बलि व्यवस्था पर शास्त्रों में विरोध अथवा संगति, क्या कोई हल नहीं है ? बलि व्यवस्था पर शास्त्रों में विरोध अथवा संगति, क्या कोई हल नहीं है ?

“शास्त्र के एक पक्ष को स्वीकार करना और दूसरे पक्ष को नकारना साक्षात् अविद्याग्रस्त दुराग्रह और बौद्धिक दरिद्रता है।”

शास्त्रों के एक पक्ष को स्वीकार करना और दूसरे को नकारना बौद्धिक दरिद्रता और अविद्या है। भावशुद्धि ही धर्म का मूल आधार है। बिना अधिकार के धार्मिक विषयों पर निर्णय करना अनुचित है। विभिन्न परंपराएं देश और काल के अनुसार भिन्न हो सकती हैं, किंतु वे एक-दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। साधक को अपने देश-काल-कुल की परंपरा के अनुसार किसी एक मार्ग पर ही अनुगमन संभव है अस्तु एक पक्ष तो ग्रहण करे ही, किंतु दूसरे पक्ष का तिरस्कार करने से बचना चाहिए ताकि उसका आत्मकल्याण बाधित न हो।

शास्त्रीय प्रमाणों का यदि निष्पक्ष विवेकपूर्ण दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए, तो सनातन धर्म की विशालता और उसकी समन्वयवादी दृष्टि स्पष्ट रूप से सामने आती है । इस गंभीर विषय को समझने के लिए शास्त्रों के दृष्टिकोण, विरोधाभासों के समाधान (संगति) और अनधिकारियों के हस्तक्षेप पर विचार करना आवश्यक है।

भावशुद्धि धर्माधिकारी का मूल है

वेदाः साङ्गाश्च यज्ञाश्च व्रतानि नियमाश्च ये। न सिद्ध्यन्ति प्रदुष्टस्य भावदोष उपागते ॥
बहिः कर्माणि सर्वाणि प्रसिद्धयन्ति कदाचन। अन्तर्भावप्रदुष्टस्य कुर्वतोऽपि पराक्रमान् ॥
सर्वस्वमपि योदद्यात् कलुषेणान्तरात्मना। न तेन धर्मभाक् स स्याद्भाव एवात्र कारणम् ॥

वायुपुराण/पूर्वार्ध/८/१८१ – १८३

उपरोक्त वचन भावदोष का त्याग करने के लिये कहता है, जब तक भावदोष (मलिनहृदय) रहे तब तक उसका सभी विहित कर्म करने पर और यहां तक कि सर्वस्व समर्पण करने पर भी धर्म के भागी (भाजन) नहीं होते क्योंकि भाव की शुद्धि अनिवार्य है। अन्यत्र “भावे हि विद्यते देवः” भी कहा गया है इसी प्रकार शास्त्रों में सर्वत्र भावशुद्धि को अनिवार्य कहा गया है एवं इस विषय में कोई विरोधाभास भी नहीं है।

आगे यदि हम बलि विधान की बात करें तो यह मनगढंत नहीं है ये तथ्य भी स्पष्ट है हां इसके कुछ प्रारूप भले ही मनगढंत हों। यदि वैष्णव ग्रंथों की बात करें तो जितना खण्डन प्राप्त होता है शास्त्र ग्रंथों का अवलोकन करने पर उतना मण्डन भी प्राप्त होता है। अर्थात परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होते हैं और एक को स्वीकारें तो दूसरा खण्डित होगा एवं यदि दूसरे को स्वीकारें तो पहला खंडित होगा एवं संगति कदापि नहीं होगी। विवाद का मुख्य कारण यही है कि एक पक्ष खंडन को स्वीकारते हैं मण्डन को नहीं और खण्डन करने लगते हैं तो द्वितीय पक्ष मण्डन को स्वीकारता है और खण्डन को नहीं।

भावशुद्धि धर्माधिकारी का मूल है
भावशुद्धि धर्माधिकारी का मूल है

शास्त्र वचनों में विरोध

इस प्रकार जो एक पक्ष को स्वीकारना और दूसरे को न स्वीकारने की प्रवृत्ति है यह स्वयं में ही अविद्याग्रस्त दुराग्रह है, भावदोष है। स्वीकारने का तात्पर्य शास्त्र को स्वीकारना है तो अस्वीकारने का तात्पर्य भी शास्त्र को ही अस्वीकारना है। जो इतना दुर्बुद्धि हो कि शास्त्र को भी अस्वीकार करे उसका ज्ञानी होना ही संदिग्ध है प्रथम तो उसे ज्ञान प्राप्ति का प्रयास अपेक्षित है। अनभिज्ञ होने पर ही तर्क-वितर्क मात्र का आश्रय लेना पड़ता है और जो मात्र तर्क-वितर्क करके चर्चा करते हैं उन्हें तो इस विषय में पड़ना ही नहीं चाहिये। इस विषय की चर्चा वही कर सकते हैं जो दोनों ही शास्त्रीय पक्षों को स्वीकार करे। इसको एक उदाहरण से समझते हैं :

स्नाने दाने जपे होमे, सन्ध्यायां देवतार्चने । शिखाग्रन्थिं विना कर्म न कुर्याद् वै कदाचन ॥
स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने । शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ॥

इन वचनों से स्नान में शिखाग्रंथि अनिवार्य सिद्ध होता है अर्थात शिखाग्रंथि करके ही स्नान किया जाना चाहिये। अब दूसरा वचन देखें :

स्नाने च भोजने चैव तथा मूत्र पुरीषयो । मैथुने च शवस्कन्धे शिखां षट्सु विववर्जयेत ॥

यहां स्नान में शिखाग्रंथि का निषेध प्राप्त हो रहा है, दोनों ही परस्पर विरोधाभासी है और एक को स्वीकारें तो दूसरा खंडित होगा एवं दूसरे को स्वीकारें तो पहला।

शास्त्र वचनों में विरोध

मुक्तकेशैर्न कर्तव्यं प्रेतस्नानं क्वचित् । बिना स्नानं दानं जपं होमं मुक्तकेशं न कारयेत् ॥
वृद्ध वशिष्ठ

अब सर्वथा संगति बैठ रही है और दोनों ही ग्राह्य है। अब सोचें वो क्या कर रहा था जो दोनों में से किसी एक को उचित और दूसरे को अनुचित सिद्ध कर रहा था, अस्वीकार कर रहा था ? दोनों ही अल्पज्ञ था, शास्त्रनिष्ठ नहीं था और दोनों में से कोई भी उचित नहीं था। इसी प्रकार इस उदाहरण में एक अन्य विषय को भी ग्रहण कर सकते हैं “मुंह से अग्नि को फूंकें या न फूंके”

इस विषय में तो संगति स्थापित होती है किन्तु ऐसे भी विषय होते हैं जहां किसी प्रकार संगति संभव भी नहीं, यद्यपि ये बौद्धिक अक्षमता भी हो;

विरोध अथवा संगति सोदाहरण

उदाहरण : पञ्चदेवता और षड्देवता विषयक पक्ष। दोनों ही शास्त्र से है और मिथिला में षड्देवता पक्ष को ग्रहण किया गया है एवं मैथिलेत्तरों ने पंचदेवता पक्ष को ग्रहण किया है। यहां दोनों में से एक पक्ष ही हो सकता है दोनों नहीं। यहां देश भेद से जो पक्ष ग्रहण किया गया वहां वही परम्परावत मान्य है और आगे भी मान्य रहेगा। यहां जो ध्यातव्य है वो यह कि मिथिला में यदि षड्देवता पक्ष को ग्रहण किया गया है तो इससे पंचदेवता पक्ष का निषेध या खंडन नहीं किया जा रहा है और मैथिलेत्तरों ने यदि पंचदेवता पक्ष को ग्रहण किया तो वो षड्देवता वाले पक्ष का खंडन नहीं कर सकते।

इसी प्रकार सौर, गाणपत्य, शाक्त, वैष्णव, शैव ये मुख्य संप्रदाय हैं और स्कान्द भी ग्रहण किये जाते हैं। इनमें से शाक्त और वैष्णव संप्रदाय में अनेकानेक शाखायें भी हैं जो एक-दूसरे से भिन्न हों। एक कालखंड ऐसा भी था जब वैष्णव और शैव परस्पर उग्र विरोधी थे, जबकि दोनों ही संप्रदाय स्वयं के ग्रंथों का ही अवलोकन करें तो वहां भेदबुद्धि का त्याग करने के लिये कहा गया है। एक कालखंड ऐसा भी था जब राम को इष्ट मानने वाले और कृष्ण को इष्ट मानने वाले भी परस्पर विरोधी रहे। 

विमर्श करने वाला अधिकारी है अथवा नहीं ?

“यदि आप शास्त्र की एक आज्ञा को सत्य और दूसरी को असत्य सिद्ध करने का दुःसाहस करते हैं, तो प्रमाणित होता है कि आप साक्षात् शास्त्रविरोधी हैं।”

आगे जो महत्वपूर्ण प्रश्न है वो यह कि : 

  • इस प्रकार के विवाद कर कौन रहे हैं ?
  • क्या वो अधिकारी हैं ?
  • क्या जगज्जननी स्वयं ही अपने बच्चों (जीव) की बलि ग्रहण करेंगी ? यह प्रथम प्रश्न अथवा तर्क होता है कि देवी तो सबकी माता है और माता अपने ही बच्चों की बलि कैसे ग्रहण कर सकती है ? किन्तु जब यह पक्ष तर्कों से ही पराजित होने लगता है तो दूसरा तर्क भी आता है : 
  • बलि का अर्थ तो भेंट/उपहार आदि होता है, जीव हिंसा/मांस आदि नहीं। 

ऐसा कुतर्क करने वाले विषय की चर्चा के ही अनधिकारी होते हैं। क्योंकि दोनों ही तर्क के पीछे भी शास्त्रीय आधार होता है किन्तु कहीं से कोई प्रमाण उद्धृत करके तर्क नहीं करते। स्पष्ट है शास्त्रज्ञान से रहित होते हैं केवल यत्र-तत्र कही सुनी बातों से बहस करते हैं। ऐसे लोग स्वयं ही अनधिकारी सिद्ध हो जाते हैं, यदि शास्त्र का ज्ञान न हो तो शास्त्रीय विषयों पर प्रश्न (जिज्ञासा) उचित है किन्तु खंडन-मंडन का अधिकार नहीं होता।

ऐसा तर्क करने वाले जिज्ञासा से प्रश्न नहीं करते हैं अपितु खंडन करने का प्रयास करते हैं। दुर्भाग्य से दूसरा पक्ष भी इन्हें अनधिकारी नहीं कहता और यही दुर्भाग्य है। अधिकारियों में शास्त्रार्थ होता है इस तरह के निरर्थक बहस नहीं और अनादिकाल से होता रहा है। 

भावदुष्ट कौन ?

“वास्तविक भावदुष्ट वह नहीं जो शास्त्रविहित बलि देता है, बल्कि वह है जो बलि देने वालों की निंदा कर उनकी उपासना में विघ्न डालता है।”

ये सभी बस एक ही कार्य करते हैं लोगों के भाव-बुद्धि को दूषित करते हैं, आस्था को भंग करते हैं और इस कारण उचित विधि ग्रहण किया हो ऐसा मान भी लें तो उसका भाव ही दूषित हो जाता है न वह अब धर्मभाक् नहीं रहता है ।

भावदुष्टोऽम्भसि स्नात्वा भस्मना च न शुद्ध्यति । भावशुद्धश्चरेच्छौचमन्यथा न समाचरेत् ॥
सरित्सरस्तडागेषु सर्वेष्वाप्रलयं नरः । स्नात्वापि भावदुष्टश्चेन्न शुध्यति न संशयः ॥

लिङ्गपुराण/पूर्वभाग/२५/१० – ११

यहां समझने का विषय यह है कि भावदुष्ट वो नहीं जो बलि प्रदान करता है अपितु वो है जो बलिप्रदान करने वालों की निंदा करता है। कारण कि बलिप्रदान करने वाला तो शास्त्रीय आधार से करता है किन्तु जो भावदुष्ट है वह उसमें विघ्न उपस्थित करता है। विघ्न उपस्थित करने वाला ही भावदुष्ट है और वह स्वयं ही शास्त्र के उस पक्ष को अस्वीकार करता है अर्थात शास्त्र में ही अनास्था रखता है। बलि देने वाला तो उनके पक्ष जो नहीं देते हैं उनके पक्ष को अस्वीकार नहीं करता है और ढेरों स्थानों पर उदाहरण भी देखने को मिले हैं जहां बलि को रोका गया।

यदि ये भावदुष्ट होते तो शास्त्र के उस पक्ष को ही कहते कि मैं नहीं स्वीकारता। किन्तु दूसरा पक्ष जो है वो तो स्पष्ट रूप से नहीं स्वीकारता है अर्थात शास्त्रविरोधी है, अधर्मी है। ये अधर्मी जब भावदुष्ट हैं, बलिप्रदान करने वालों की शास्त्रीयता को भी नहीं स्वीकारते तो ये स्वयं ही अपवित्र हैं, धर्मभाक् नहीं हैं। इनका संसर्ग भी दूषित करने वाला होता है, इनके संसर्ग से भी बचना चाहिये क्योंकि ये भाव को ही दूषित कर देते हैं।

समाधान का मार्ग

  • जैसे पञ्चदेवता और षड्देवता में से किसी एक पक्ष को अंगीकार करने का तात्पर्य दूसरे पक्ष का खंडन या तिरष्कार नहीं है अपितु एक ही पक्ष को ग्रहण किया जा सकता है इस कारण ग्रहण किया गया। 
  • जैसे उर्ध्वपुण्ड्र और त्रिपुण्ड्र दोनों एक साथ धारण नहीं किया जा सकता, कोई एक धारण करने का तात्पर्य दूसरे का खंडन या तिरष्कार नहीं होता।

उसने स्वयं के लिये एक पक्ष को ग्रहण किया है किन्तु इससे दूसरे पक्ष को खंडित नहीं किया जा सकता। क्योंकि यदि ऐसा ही दूसरा पक्ष भी करने लगे तो क्या होगा ? यदि दूसरा पक्ष उसके यहां जाकर बलि विधान को स्थापित करने लगे जिसने बलि निषेध का पक्ष ग्रहण किया है तो क्या होगा ? एक बार अवश्य विचार करें।

यदि बलि विधान को ग्रहण करने वाला ऐसा नहीं कर रहा यही तो बलि निषेध ग्रहण करने वाले पक्ष को भी अपनी सीमा स्वीकारते हुये सीमा में रहने का ही प्रयास करना अपेक्षित है। आपने जो मार्ग चयन किया है वो अपने आत्मकल्याण के लिये किया है न कि भावदुष्टता प्राप्ति के लिये। यदि आप भावदुष्ट हो गये हैं तो उसका कारण ढूंढे, निवारण करें न कि दूसरे पक्ष की उपासना में विघ्न करें।

सभी कुतर्कों की बलि श्रीदुर्गासप्तशती के एक श्लोक से

कारण कि बलि के विरुद्ध जितने भी तर्कादि होते हैं उन सबकी बलि श्रीदुर्गासप्तशती के तेरहवें अध्याय का यह श्लोक ले लेता है :

उत्थान या पतन ?
उत्थान या पतन ?

“ददातुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुच्छितम्”,

निष्कर्ष

मूल निष्कर्ष यह है कि सनातन वाङ्‌मय में वर्णित ‘बलि विधान’ और ‘बलि निषेध’ परस्पर विरोधी सिद्धान्त नहीं हैं, अपितु ये एक ही शास्त्र के दो पृथक और मान्य पक्ष हैं। कलियुग के प्रभाववश कतिपय ‘अशास्त्रज्ञ’ धर्मनिर्णय के अनधिकारी होकर भी “क्या माता अपने बच्चों की बलि लेगी?” जैसे सतही कुतर्क गढ़कर जनमानस को भ्रमित कर रहे हैं। श्रीदुर्गासप्तशती के तेरहवें अध्याय का महावाक्य — “ददातुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुच्छितम्” —बलि शब्द को केवल ‘उपहार या भेंट’ सिद्ध करने वाले धूर्तों के कुतर्कों को समूल निष्प्राण कर देता है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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