“पुत्र का विवाह कुल में ‘प्रवेश’ है और कन्या का विवाह कुल से ‘निर्गम’ है।”
वर्त्तमान काल में जहां १६ में से १० संस्कार विलुप्त हो चुके हैं और उसके लिये प्रायश्चित्तादि भी नहीं किया जाता जो कि चिंताजनक है और हास्यास्पद यह है कि ऐसे में कट्टर हिन्दू, सनातन-सनातन आदि का राग अलापा जाता है। जब थोड़ा समझते हैं तो ज्ञात होता है कि हनुमान चालीसा जिसे आता हो वह सनातनी है, हिन्दू है और कदाचित न आये तो वो हिन्दू ही नहीं। विषय की गंभीरता को समझें यहां हिन्दू को प्रमाणित कौन करता है ? संस्कार लोप के अतिरिक्त एक अन्य समस्या भी है और वो है एक साथ अनेकानेक संस्कार करना जो कि निषिद्ध है। यहां हम इसी विषय को प्रामाणिक रूप से समझेंगे।
संस्कार विसंगति विमर्श: मुण्डन-मण्डन, प्रवेश-निर्गम के शास्त्रीय नियम और निषेध
सनातन धर्मशास्त्रों में षोडश संस्कारों को मानव जीवन के आत्मिक और व्यावहारिक परिष्कार का मुख्य साधन माना गया है। गृह्यसूत्रों और स्मृति-निबंधों में इन मङ्गल कार्यों को संपन्न करने के लिए ‘काल’ (समय) और ‘सहोदर/सगोत्र संबंध’ की अनुकूलता पर विशेष बल दिया गया है। जब एक ही कुल या परिवार में अल्प समय के भीतर कई मङ्गल कार्य (यथा विवाह, उपनयन, मुण्डन) उपस्थित होते हैं, तो शास्त्रों ने ‘मङ्गल विसंगति’ (निषेध और अपवाद) के सूक्ष्म नियम निर्धारित किए हैं। प्रस्तुत आलेख में विभिन्न ऋषियों के वचनों के आलोक में इन्हीं विसंगतियों का क्रमबद्ध विवेचन किया गया है।
एक साथ दो – तीन अग्निकार्य का निषेध है, और एक साथ दो संस्कार, दो भाई अथवा बहन या भाई-बहन का संस्कार आदि निषेध मिलता है। इस विषय को यदि समझना चाहें तो प्रथम हमें जो समझना होगा वो है : मुण्डन और मण्डन, प्रवेश और निर्गम।
पारिभाषिक संज्ञाएँ: मुण्डन, मण्डन, प्रवेश और निर्गम
संस्कारों के काल-निर्णय को समझने के लिए शास्त्रों द्वारा दी गई तकनीकी संज्ञाओं को जानना आवश्यक है। कात्यायन के अनुसार इनका वर्गीकरण इस प्रकार है:
पुत्रोद्वाहः प्रवेशाख्यः कन्योद्वाहस्तु निर्गमः । मुण्डनं चौलमित्युक्तं व्रतोद्वाहौ तु मण्डनम् ॥
चौलं मुण्डनमित्युक्तं वर्जयेन्मण्डनात्परम् । मौञ्जी चोभयतः कार्या यतो मौञ्जी न मुण्डनम् ॥
कात्यायन (संस्काररत्नमाला, निर्णयसिंधु)
पुत्र का विवाह प्रवेश है (वधूप्रवेश) और कन्या का विवाह निर्गम है (घर से विदाई), चौल मुण्डन है तो व्रत और विवाह मण्डन।
- प्रवेश (पुत्रोद्वाह): पुत्र के विवाह को ‘प्रवेश’ कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा कुल में वधू का आगमन होता है।
- निर्गम (कन्योद्वाह): कन्या के विवाह को ‘निर्गम’ कहते हैं, क्योंकि इससे कन्या का अपने कुल से गमन होता है।
- मुण्डन (चौल): बालक के मुण्डन संस्कार को ‘चौल’ या ‘मुण्डन’ संज्ञा दी गई है।
- मण्डन (व्रतोद्वाह): उपनयन (व्रतबन्ध) और विवाह—इन दोनों संस्कारों को ‘मण्डन’ कहा जाता है।
- मौञ्जी : मुण्डन या मण्डन के पश्चात् मौञ्जी तो करे किन्तु मौञ्जी के पश्चात् मुण्डन न करे।

ऋतुत्रय (६ मास) के भीतर मुण्डन-मण्डन, प्रवेश-निर्गम निषेध
मण्डन के बाद ६ महीने के भीतर मुण्डन और प्रवेश के पश्चात् निर्गम का निषेध किया गया है :
षण्मासमध्ये मुनयः समूचुर्न मुण्डनं मण्डनतोऽपि कार्यम् ॥
वसिष्ठ
कुले ऋतुत्रयादर्वाङ्मुण्डनान्न तु मण्डनम् । प्रवेशान्निर्गमो नेष्टो न कुर्यान्मङ्गलत्रयम् ॥
कात्यायन (संस्काररत्नमाला, निर्णयसिंधु)
एकोदरप्रसूतानां नाग्निकार्य्यत्रयं भवेत् । भिन्नोदरप्रसूतानां नेति शातातपोऽब्रवीत् ॥
वसिष्ठ (वाचस्पत्यम्, निर्णयसिंधु)
- मण्डन (विवाह/व्रत) के पश्चात् मुण्डन के बाद तीन ऋतुओं (६ महीने) के भीतर न करे।
- कुल में ‘प्रवेश’ (पुत्र विवाह) के तुरंत बाद ‘निर्गम’ (कन्या विवाह) करना सर्वथा नेष्ट (वर्जित) है।
- एक ही वर्ष के भीतर एक ही कुल में तीन बड़े मांगलिक कार्य/अग्निकार्य कदापि न करे।
पुरुषत्रयपर्यन्तं प्रतिकूलं स्वगोत्रिणाम् । प्रवेशनिर्गमौ तद्वत्तथा मण्डनमुण्डने ॥
मेधातिथि (संस्काररत्नमाला)
स्वगोत्रियों में उपरोक्त विचार कितने पुरुष तक करे इसका स्पष्ट उत्तर दिया गया है – तीन पुरुष (पीढ़ी) पर्यन्त। इन तीन पुरुष पर्यन्त के स्वगोत्री उपरोक्त प्रतिकूलता न करें। अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामह के कुल से उत्पन्न जितने भी सगोत्र भाई-बन्धु हैं, वे सभी इस तीन पीढ़ी की सीमा के भीतर आते हैं। प्रतिकूलता – मण्डन के बाद ६ महीने के भीतर मुण्डन और प्रवेश के पश्चात् निर्गम।
इस प्रकार यहां यह भी स्पष्ट होता है कि मण्डन से मुण्डन और प्रवेश से निर्गम वाली प्रतिकूलता तीन पुरुष (पीढ़ी) पर्यन्त के सगोत्री बरतें। इसके अतिरिक्त अन्यान्य सहोदर आदि का विचार पृथक विषय है – “न मण्डनाच्चापि हि मुण्डनं च गोत्रैकतायां यदि नाब्दभेदः ।”
यहां एक अन्य विचार ज्येष्ठ और लघु मंगल कार्यों का भी बताया गया है। ज्येष्ठ मंगल कार्य के पश्चात् लघु मांगलिक कार्य भी ३ ऋतु अर्थात ६ महीने तक निषिद्ध कहा गया है। अर्थात इसका विपरीत निषिद्ध नहीं होगा।
मातृयज्ञक्रियापूर्वं ज्येष्ठं कृत्वा तु मङ्गलम् । ऋतुत्रयं पुनर्यावन्न कुर्याल्लघुमङ्गलम् ॥
ज्योतिर्निबन्ध (संस्काररत्नमाला)
एकोदर (सहोदर) संस्कार निषेध
न पुंविवाहोर्ध्वमृतुत्रयेऽपि विवाहकार्यं दुहितुः प्रकुर्यात् ।
न मण्डनाच्चापि हि मुण्डनं च गोत्रैकतायां यदि नाब्दभेदः ।
एकोदरभ्रातृविवाहकृत्यं स्वसुर्न पाणिग्रहणं विधेयम् ।
षण्मासमध्ये मुनयः समूचुर्न मुण्डनं मण्डनतोऽपि कार्यम् ॥
वसिष्ठ (मदनरत्न, संस्काररत्नमाला, निर्णयसिंधु)
पुत्रोद्वाहात्परं पुत्रीविवाहो न ऋतुत्रये। न तयोर्व्रतमुद्वाहान्मङ्गले नान्यमङ्गलम् ॥
विवाहश्चैकजन्यानां षण्मासाभ्यंतरे यदि। असंशयं त्रिभिर्वर्षैस्तत्रैका विधवा भवेत् ॥
प्रत्युद्वाहो नैव कार्यो नैकस्मै दुहितृद्वयम्। न चैकजन्ययोः पुंसोरेकजन्ये तु कन्यके ॥
नैवं कदाचिदुद्वाहो नैकदा मुंडनद्वयम्॥
नारदपुराण/पूर्वार्ध/५६/५१५ – ५१८
- पुत्र-पुत्री विवाह अंतराल: पुत्र के विवाह के बाद ३ ऋतुओं (६ मास) के भीतर पुत्री का विवाह वर्जित है।
- विधवा योग का संकट: एक ही उदर से जन्मी (एकजन्यानां/सगी) बहनों का विवाह यदि ६ महीने के भीतर किया जाता है, तो नारदपुराण के अनुसार तीन वर्षों के भीतर उनमें से एक के विधवा होने का दारुण संकट रहता है।
- अन्य निषेध: दो बहनों का विवाह एक ही वर से करना (नैकस्मै दुहितृद्वयम्), विपरित कुल में परस्पर विवाह (प्रत्युद्वाह), दो सगे भाइयों का दो सगी बहनों से विवाह और एक ही समय पर दो बालकों का मुण्डन—ये सभी कृत्य भी निषिद्ध हैं।

ध्यातव्य : इन विषयों का ऋषि-महर्षि के आचरण द्वारा तुलना करना अनुचित है। प्रायः ऐसा कुतर्क लोग करते ही रहते हैं। उनका आचरण नहीं अपितु वचन ग्राह्य होता है।
संवत्सर मध्य में निषेध
सहोदर संबंधी मांगलिक कार्यों (समान क्रिया) का संवत्सर मध्य में भी निषेध प्राप्त होता है आगे इसका भी परिहार कहा गया है। संवत्सर मध्य में सहोदर के लिये जो निषेध कहा गया है वह मातृभेद होने पर मान्य नहीं होता है। समान क्रिया का तात्पर्य मुण्डन में मुण्डन, उपनयन में उपनयन, विवाह में विवाह इस प्रकार है।
एकमातृजयोरेकवत्सरे पुरुषस्त्रियोः । न समानक्रियां कुर्यान्मातृभेदे विधीयते ॥
वृद्धमनु (संस्काररत्नमाला, निर्णय सिन्धु)
पुत्री के विवाहोपरांत मातृभेद होने से पुत्र का विवाह निषेध नहीं होता भले ही समान क्रिया हो अथवा गृहभेद में भी प्रशस्त कहा गया है। गृहभेद का तात्पर्य मण्डप भेद है। इस प्रकार एक मण्डप में दो सहोदरों का संस्कार भी निषिद्ध ज्ञात होता है चाहे वह मुंडन हो या उपनयन।
पुत्रीपरिणयादूर्ध्वं पुत्रस्योद्वाहनक्रिया । न दुष्टा स्यान्मातृभेदे गृहभेदेऽपि चैव हि ॥
अत्रि (मदनरत्न, संस्काररत्नमाला)
न मण्डनान्मुण्डनमूर्ध्वमिष्टं न पुत्रयोर्मण्डनमेकवर्षे ।
न पुंविवाहोर्ध्वमृतुत्रयेऽपि विवाहकार्यं दुहितुः प्रकुर्यात् ॥
सारावली (संस्काररत्नमाला, निर्णय सिन्धु)
यहां वर्त्तमान में एक बड़ा विपरीत व्यवहार देखने को मिलता है वो है उपनयन के पश्चात् विवाह करना। वास्तव में विवाह से कुछ दिन पूर्व उपनयन करने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है जिसका परिणाम यह है कि इस निषेध का उल्लंघन होता है। उपनयन के पश्चात् ६ महीने के भीतर विवाह नहीं करे, अथवा पुत्र या पुत्री का विवाह किया हो तो अन्य पुत्र का उपनयन भी न करे।
पुत्रोपनयनादूर्ध्वं षण्मासाभ्यन्तरं तथा । पुत्रोद्वाहं न कुर्वीत विवाहाद्व्रतबन्धनम् ॥
मिहिर (संस्काररत्नमाला)
पुत्र का उपनयन अथवा विवाह करने के पश्चात् ६ महीने के भीतर पुत्री का विवाह भी निषिद्ध है जो यहां स्पष्ट होता है।किंतु महर्षि कश्यप ने स्पष्ट किया है कि यह नियम केवल अविभक्त परिवारों के लिए है – ये सहोदरों के लिये ही है, विभक्त हों (पारिवारिक बंटवारा किया गया हो तो) मान्य नहीं। यदि संपत्ति विभक्त न हों तो चचेरे भाई-बहन आदि के लिये भी निषिद्ध।
मौञ्जीबन्धस्तथोद्वाहः षण्मासाभ्यन्तरेऽपि वा । पुत्र्युद्वाहं न कुर्वीत विभक्तानां न दोषकृत् ॥
कश्यप (संस्काररत्नमाला)
संवत्सर निषेध का परिहार
संवत्सर संबंधी जो निषेध कहा गया है उसका परिहार भी बताया गया है। यहां संवत्सर का मुख्य तात्पर्य भले ही वर्ष होता है किन्तु संवत्सर परिवर्तन हो जाये तो भी प्रशस्त कहा गया है अर्थात यह उक्त नियम का विशेष परिहार है। अपितु तीन ऋतु (६ माह) संबंधी निषेध के लिये भी संवत्सर भेद होने पर परिहार स्वीकार किया गया है। यह परिहार एकोदर (सहोदर) के लिये भी कहा गया है।
ऋतुत्रयस्य मध्ये चेदन्याब्दस्य प्रवेशनम् । तदा ह्येकोदरस्यापि विवाहस्तु प्रशस्यते ॥
(संस्काररत्नमाला)
यथा यदि एक कार्य फाल्गुन मास में किया गया हो तो चैत्र में संवत्सर परिवर्तन होने पर द्वितीय मंगल कार्य किया जा सकता है।
फाल्गुने चैत्रमासे तु पुत्रोद्वाहोपनायने । भेदादब्दस्य कुर्वीत नर्तुत्रयविलङ्घनम् ॥
(संस्काररत्नमाला, निर्णय सिन्धु)
कन्या विवाह के उपरांत विशेष परिहार
कन्या के विवाह (निर्गम) के पश्चात् अन्य मांगलिक कार्यों हेतु कुछ विशेष परिहार भी प्राप्त होता है। अर्थात आवश्यकता हो तो पूर्वोक्त संवत्सर-ऋतुत्रय संबंधी निषेध का भी परिहार है जो अगले प्रमाणों से समझा जा सकता है :
पुत्रीपरिणयादूर्ध्वं यावद्दिनचतुष्टयम् । पुत्र्यन्तरस्य कुर्वीत नोद्वाहमिति सूरयः ॥
गर्ग (संस्काररत्नमाला)
उद्वाह्य पुत्रीं न पिता विदध्यात्पुत्र्यन्तरस्योद्वहनं कदाऽपि ।
यावच्चतुर्थं दिनमत्र सर्वं समाप्य चान्योद्वहनं विदध्यात् ॥
कपर्दिकारिका (संस्काररत्नमाला)
यदि आवश्यक हो तो भी पुत्री का विवाह संपन्न करने के बाद पिता ४ दिन तक किसी अन्य कन्या का विवाह न करे। किन्तु चतुर्थ दिन (चतुर्थी) के पश्चात् संपन्न किया जा सकता है। यह विशेष विषय दो पुत्रियों के विषय में है और यदि एकोदरा हो तो। यदि माता भिन्न हो तो एक दिन, एक मंडप में भी किया जा सकता है :
पृथङ्मातृजयोः कार्यो विवाहस्त्वेकवासरे । एकस्मिन्मण्डपे कार्यः पृथग्वेदिकयोस्तथा ॥
पुष्पपट्टिकयोः कार्यं दर्शनं न शिरस्थयोः । भगिनीभ्यामुभाभ्यां च यावत्सप्तपदी भवेत् ॥
मेधातिथि (ज्योतिर्निबन्ध, संस्काररत्नमाला)
यहां स्पष्ट होता है कि यदि सौतेली बहन हो अथवा चचेरी बहन हो तो उसका एक मंडप में भी, वेदी भेद करके किया जा सकता है। केवल एक विशेष नियम कहा गया है कि जब तक दोनों की सप्तपदी क्रिया संपन्न न हो जाये तबतक एक-दूसरे के सिर पर सजे हुए आभूषणों (पुष्पपट्टिका) को न देखे। पुष्पपट्टिका के कुछ विशेष भाव भी हो सकते हैं यथा कोहवर आदि तथापि मुख्य भाव सिर पर सजे आभूषण लेना ही उचित प्रतीत होता है।
विद्वद्जन इस विषय में अथवा अन्यान्य विषय में भी सुझाव प्रदान कर सकते हैं : 7992328206
यह विशेष परिहार पुत्री विवाह के विषय में ही है न कि अन्यान्य विषयों के लिये। घर में दो मांगलिक कार्य अपरिहार्य हों तो उसके लिये अलग से विशेष नियम है :
अन्यान्य परिहार
“संस्कारों का लोप करके केवल ‘सनातन’ शब्द का राग अलापना विवेकहीनता का सूचक है।”
एक ही घर में एक साथ दो शुभ कार्य (द्विशोभन) वर्जित हैं। ऊपर हमने जाना कि ऋतुत्रय निषेध पक्ष मुख्य है किन्तु उसका मुख्य परिहार संवत्सर परिवर्तन होने पर हो जाता है। किन्तु वर्त्तमान काल में बड़ी समस्या है और जैसे-जैसे धनादि की वृद्धि होती है वैसे-वैसे शास्त्रनिष्ठा घटती जाती है। एक समांन्य व्यक्ति यथाकाल उपनयन करके उचित काल में विवाहादि कर सकता है किन्तु एक सामान्य धनी परिवार उसकी आधी आयु पढाई में ही समाप्त कर देता है और तदुपरांत विवाह के समय उपनयन करता है। कारण यही है कि धर्म में आस्था ही नहीं है, शास्त्र में निष्ठा ही नहीं है, प्रदर्शन मात्र करते हैं।

द्विशोभनं त्वेकगृहेऽपि नेष्टं शुभं तु पश्चान्नवभिर्दिनैस्तु ।
आवश्यकं शोमनमुत्सवो वा द्वारेऽथवाऽऽचार्यविभेदतो वा ॥
वसिष्ठ (संस्काररत्नमाला, निर्णय सिन्धु)
यदि अत्यंत आवश्यक हो, तो दो मांगलिक कार्यों के मध्य कम से कम ९ दिनों का अंतर रखे। यदि ऐसा भी न करे सके जैसा की वर्त्तमान में उपनयन होता है, अनेकों बटुकों/युवकों का एक ही मंडप में, अनेक संस्कार तो उसके लिये भी अन्य परिहार बताया गया है। समस्या यह है कि लोगों को शास्त्र का पालन करना ही नहीं है क्योंकि मुख्य भाव तो प्रदर्शन होता है।
जिसकी शास्त्र में निष्ठा हो वो इस परिहार (विकल्प) को ग्रहण कर सकते हैं : यदि मण्डप भेद भी न कर सके तो न्यूनतम ‘द्वारभेद’ अथवा ‘आचार्यभेद’ अवश्य करे ।
यमल (जुड़वां) के लिये विशेष परिहार
एकस्मिन्वत्सरे चैव वासरे मण्डपे तथा । कर्तव्यं मङ्गलं स्वस्रोर्भ्रात्रोर्यमलजातयोः ॥
स्मृत्यन्तर (संस्काररत्नमाला)
एकस्मिन्वासरे प्राप्ते कुर्याद्यमलजातयोः । क्षौरं चैव विवाहं च मौञ्जीबन्धनमेव च ॥
गर्ग (संस्काररत्नमाला)
जो यमल (जुड़वाँ) होते हैं, उनके लिए यह नियम मान्य नहीं कहा गया अर्थात उक्त नियम के अपवाद में आते हैं। उनका मुण्डन (क्षौर), व्रतबन्ध (मौञ्जी) और विवाह एक ही वर्ष, एक ही दिन, एक ही मण्डप और एक ही वेदी पर करना शास्त्रसम्मत है।
मांगलिक कार्य में विघ्न होने पर
उपरोक्त विषय से सम्बंधित एक अन्य प्रश्न भी है यदि मांगलिक कार्य सुनिश्चित होने पर विघ्न उपस्थित हो जाये तो क्या करे ?
कृते तु निश्चये पश्चान्मृत्युभर्वति कस्यचित् । तदा न मंगलं कुर्यात्कृते वैधव्यमाप्नुयात् ॥
पुरुषत्रयपर्यंतं प्रतिकूलं सगोत्रिणाम् । प्रवेशनिर्गमौ तद्वत्तथामुंडनमंडने ॥
गर्ग (बृहद्दैवज्ञरञ्जन)
यदि विवाह सुनिश्चित होने पर तीन पीढ़ी के भीतर किसी की मृत्यु हो जाये तो उक्त विवाह ही न करे, अन्य से करे ऐसा भी कहा गया है। अन्यान्य मंगल कार्य वर्षपर्यन्त न करे अथवा न्यूनतम ६ महीना न करे। इससे भिन्न सपिण्ड की मृत्यु हो तो न्यूनतम एक मास न करे तदुपरांत शांति करके करे।
अन्येषां तु सपिंडानामाशौचं माससंमितम् । तदंते शांतिकं कृत्वा ततो लग्नं विधीयते ॥
मांडव्य (बृहद्दैवज्ञरञ्जन)
अब यहां शांति के विषय में भी एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि शांति में से कौन सी शांति करे ?
तो इसका मुख्य उत्तर विनायक शांति है अर्थात उपरोक्त प्रकार का विघ्न यदि सपिण्ड में हो तो एक मास के पश्चात् विनायक शांति करके मांगलिक कार्य करे।
विद्वद्जनों से आग्रह : उपरोक्त विषय का मत्यानुसार विश्लेषण किया गया है किन्तु अल्पज्ञतावश अनेकानेक त्रुटियां होंगी जिसके निस्तारण हेतु विद्वद्जनों का मार्गदर्शन अपेक्षित होता है। विद्वद्जनों के आवश्यक सुझावों का स्वागत है :
निष्कर्ष (Conclusion)
“धन और वैभव की वृद्धि के साथ शास्त्रनिष्ठा का घटना कलयुग का प्रकट लक्षण है।”
स्मृतियों, संहिताओं के प्रमाणों द्वारा किये गया निषेध-प्रशस्त-परिहारों के सांगोपांग अनुशीलन से यह स्पष्ट होता है कि संस्कारों का संपादन केवल एक सामाजिक आमोद-प्रमोद (फंक्शन) नहीं, अपितु शास्त्रोक्त संस्कार हैं। अतः जो धर्म में, शास्त्रों में आस्था रखते हैं वो शास्त्रीय मर्यादा को ध्यान में रखने का प्रयास करें, जो ढोंगी-पाखंडी-म्लेच्छाचारी हैं उनके लिये शास्त्रीय विधान का कोई औचित्य ही नहीं होता। अर्थात जो शास्त्रीय विधि-निषेध का पालन नहीं करते वो स्वेच्छाचारी आदि की श्रेणी में गण्य होते हैं।
संस्कारों का मूल उद्देश्य प्रदर्शन या अहंकार की संतुष्टि नहीं, बल्कि कुल की पवित्रता है। शास्त्रों के अनुसार, एक ही कुल में तीन पीढ़ी (पुरुषत्रय) के भीतर ६ महीने (ऋतुत्रय) के अंतराल के बिना मुण्डन-मण्डन (उपनयन/विवाह) या प्रवेश-निर्गम (पुत्र-पुत्री विवाह) करना सर्वथा निषिद्ध है। विशेषकर सगी बहनों का ६ मास के भीतर विवाह ‘वैधव्य योग’ जैसे दारुण संकट को आमंत्रण देता है। यदि अपरिहार्य परिस्थितियों में ऐसे कृत्य करने भी हों, तो मनमर्जी करने के बजाय शास्त्रों द्वारा दिए गए ‘द्वारभेद’, ‘आचार्यभेद’ या ‘संवत्सर भेद’ जैसे प्रामाणिक परिहारों और ‘विनायक शांति’ का आश्रय लेना चाहिए।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
महत्वपूर्ण सूचना: यह आलेख विशुद्ध रूप से सनातन धर्म के गृह्यसूत्रों, स्मृतियों और पुराणों के प्रमाणों के संकलन पर आधारित है जो केवल ज्ञानवर्द्धन के लिये है। संस्कारों के समय का निर्धारण, प्रतिकूलता का विचार और शांति विधान अत्यंत सूक्ष्म विषय हैं। किसी भी मांगलिक कार्य के आयोजन से पूर्व अपने कुल-पुरोहित या किसी मूर्धन्य ज्योतिर्विद व शास्त्रज्ञ ब्राह्मण से व्यक्तिगत कुंडली, देश-काल और गोत्र के अनुसार परामर्श अवश्य लें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








