“ब्राह्मण का बालक जन्म से ब्राह्मणपुत्र ही कहलाता है, शूद्र नहीं; अतः उसके लिए सिद्धान्न (श्राद्ध में पाक) वर्जित नहीं है।”
पिण्ड द्रव्य निर्णय का यहां मुख्य तात्पर्य कब पाक से पिण्ड बनेगा और कब नहीं यह है? वर्तमान काल में यह समस्या ब्राह्मण हेतु कर्त्ता के अनुपनीत होने पर देखने को मिलता है एक पक्ष कहता है किस चीज का पिंण्ड बनेगा दूसरा कहता है भात का तो नहीं बनेगा, खोया का बनेगा। उस निर्णय देने वाले को यदि पूछ लिया जाय कि वो भी न हो तो क्या अधिकम पीसा चावल कहेंगे इससे आगे नहीं। ऐसे लोगों की यहां भलीभांति पूर्ण सेवा की जाती है और इस आलेख में भी की जायेगी। यहां विचारणीय विषय यही है कि अनुपनीत किस द्रव्य का पिण्ड देगा और कब-किसे पाक से पिण्डदान नहीं करना चाहिये ?
अनुपनीत कर्त्ता और पिण्ड द्रव्य का विचार
“शूद्र के लिए सदैव आमान्न (आम श्राद्ध) का ही विधान है, किंतु द्विजाति के लिए यह केवल आपातकालीन विकल्प है।”
जिसके ज्ञान का ऐसा स्तर हो कि अगला विकल्प भी ज्ञात न हो और जो बोल रहा उसकी भी शास्त्रीय सिद्धि करने के लिये कहा जाय तो नहीं कर सकता वह निर्लज्ज व्यक्ति निर्णय देता किस मुंह से है। वह ब्रह्मघात दोष से लिप्त होता है और न चाहते हुए भी मैं ऐसे कुकर्मियों को धिक्कारने-दुत्कारने के लिये प्रेरित हो जाता हूँ । यही कुकर्मी शास्त्रदस्यु हैं जो उस तथ्य की भी शास्त्रीय विधि से सिद्धि नहीं कर सकते जो कह रहे हैं।
ऐसे लोगों की संख्या अधिक होती है और धृष्ट व दुराग्रही भी बड़े स्तर के होते हैं, ऐसे दुष्ट-धृष्टों के कारण ही जनमानस किंकर्तव्यविमूढ़ सा होता चला जा रहा है और जिसकी शास्त्र में निष्ठा जाग्रत भी हो तो ये मूर्खाचार्य उसकी हत्या कर देते हैं और निःसंदेह दुत्कारने योग्य हैं। मैं शास्त्रनिष्ठों का ही दिग्दर्शन करना चाहता हूं और उनकी समस्या से भलीभांति अवगत हूं अतः उनको समाधान भी बताना मेरा दायित्व है। सभी शास्त्रनिष्ठों शास्त्रीय विधि से विषय की सिद्धि करने का ज्ञान होना चाहिये और इस आलेख में भी यह सीख सकते हैं वैसे यहां आपको लगभग सभी आलेखों में यह सीखने का अवसर प्राप्त होगा।

आप जिस विषय पर निष्कर्ष वा निर्णय देना चाहते हैं पहले उसकी शास्त्र सिद्धि कर लें तदुपरांत अवगत करें और इस चुनौती के साथ कि यदि इसे शास्त्रीय विधि से खंडित करते दूसरा पक्ष सिद्ध कर दिया जाता है मैं स्वीकार करने के लिये तत्पर हूं, किन्तु यदि खंडित न किया जा सके तो विपरीत बोलने वाले को भी यह तथ्य स्वीकारना होगा। यदि आप इस प्रकार से निष्कर्ष और निर्णय देकर चुनौती दें तो ९०% मूर्खाचार्य मौन रहने के लिये बाध्य हो जायेंगे एवं थोड़े-बहुत उछल-कूद करके वंचना और दुत्कार के पात्र बनेंगे।
सर्वप्रथम आलेख के मुख्य प्रश्न का उत्तर समझ लेते हैं तदुपरांत उपरोक्त विषय को भी संक्षेप में समझेंगे और इस विषय को आत्मसात कर लेने वाले का निष्कर्ष और निर्णय ही स्थानीय रूप से सर्वमान्य हो सकेगा, कोई खंडन करने का दुःसाहस नहीं कर सकेगा।
पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है यह कुशाब्राह्मण
पिण्ड द्रव्य
“वेदाधिकार के संबंध में ही ‘शूद्रवत्’ होने की सिद्धि होती है, भोजन या भोजन के द्रव्य निर्माण में नहीं।”
हमारा मुख्य प्रश्न अनुपनीत के पिण्ड द्रव्य से संबंधित है जिसका विवाद होता रहता है किन्तु हम मात्र इसका प्रमाण या उत्तर नहीं ढूंढेगे अपितु पिण्ड द्रव्य, अनुपनीतकर्तृक श्राद्ध कर्म, वर्णानुसार पिण्ड द्रव्य और श्राद्ध विधि आदि अनेकों विषय का प्रमाण लेंगे और इस दुराग्रह का त्याग करके कि केवल जो मन में उत्तर है उससे सम्बंधित प्रमाण लेंगे। नहीं ऐसा करना भारी त्रुटि होगी अपितु हम परस्पर विरुद्ध प्रमाणों को भी संकलित करेंगे।
प्रमाण हमें सूत्र ग्रन्थ, स्मृतियों, पुराणों में तो प्राप्त होते हैं और अंतर्जाल पर सहजता से उपलब्ध भी हैं, किन्तु कुछ अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ भी बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं जैसे : निर्णय सिंधु या धर्म सिंधु, कृत्यसार समुच्चय, स्मृत्यर्थ सार, स्मृति रत्नाकर, स्मृति कौस्तुभ, स्मृति चन्द्रिका (अनेकों काण्ड), स्मृति मुक्ताफल (अनेकों काण्ड), वीरमित्रोदय (अनेकों काण्ड), संस्कार रत्नमाला आदि एवं जो संबंधित विषय हो उस विषय की विशेष प्राचीन और प्रामाणिक पुस्तकें जैसे; यह प्रश्न श्राद्ध से संबंधित है तो श्राद्ध कल्पलता, श्राद्ध चिंतामणि एवं इसी प्रकार के अन्य।
“संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर भी प्रमाणों का संग्रह किया जा रहा है जो भविष्य में आपके लिये बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा।
पुत्रस्त्वनुपनीतोऽपि पित्रोः संस्कारमर्हति। अन्योऽप्युच्चारयेन्मन्त्रान् सर्वास्तेनैव कारयेत् ॥
स्मृत्यंतरे (स्मृति मुक्ताफल श्राद्ध कांड) इसी प्रकार समंत्र करने के बहुशः प्रमाण, विरुद्ध में कतिपय मात्र पुनः
अनुपेतोऽपि कुर्वीत मन्त्रवत्पैतृमेधिकं। यद्यसौ कृतचूडः स्याद्यदि वा स्यात् त्रिवत्सरः ॥ – विश्वामित्र
पित्रोरनुपनीतोऽपि विदध्यान्मन्त्रवत्सुतः। और्ध्वदेहिकमन्ये तु संस्कृताः श्राद्धकारिणः ॥ – सुमन्तु
कृतचौलस्तु कुर्वीत उदकंपिण्डमेव च। स्वधाकारं प्रयुञ्जीत वेदोच्चारं न कारयेत् ॥ – व्याघ्रपाद
पुत्रस्त्वकृतचौलोऽपि पित्रोः संस्कारमर्हति। न तस्य वपनं कुर्यात्तेन कर्माणि कारयेत् ॥ – कालादर्श
पुत्रेषु विद्यमानेषु नान्यं वै कारयेत् स्वाधां। पितरो हिंसितास्तेन यस्त्वैवं कुरुते नरः ॥ – ऋष्यश्रृंग
स्मृति मुक्ताफल श्राद्ध कांड
उपरोक्त प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि स्त्री-शूद्र के अतिरिक्त अनुपनीत वर्ग में द्विजाति के पुत्र को भी अधिकार प्राप्त है। इसके कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु समझें तो इस प्रकार हैं :
- यदि पुत्र हो तो पुत्र से भिन्न किसी भी व्यक्ति को श्राद्ध करने का अधिकार नहीं है।
- पुत्र यदि अनुपनीत हो तो भी अधिकार है यदि मुण्डन संस्कार हो गया हो तो।
- यदि मुंडन भी न हुआ हो किन्तु तीन वर्ष से अधिक आयु हो तो भी पुत्र को अधिकार है।
- द्विजाति के लिये असंस्कृत पुत्र को ही अधिकार होता है, किसी अन्य असंस्कृत को नहीं।
- अनुपनीत को अमंत्रक श्राद्ध का अधिकार होता है अर्थात वेदमंत्र का प्रयोग नहीं किया जा सकता, प्रणव-स्वाहा-स्वधा आदि का भी अधिकार नहीं है।
- किन्तु द्विजाति असंस्कृत हो तो भी पितृकर्म में अधिकारी होता है एवं वह वेदमंत्र का अधिकारी तो नहीं होता किन्तु स्वधा का अधिकार है।
- मन्त्रवत भी किया जा सकता है किन्तु पुत्र मन्त्र का उच्चारण नहीं करेगा, अन्य (सपिण्ड/पुरोहितादि) उसके स्थान पर मंत्रोच्चार (वेदमन्त्र) कर सकते हैं।
- चौल न हुआ हो तो मुंडन निषेध का भी विषय एक स्थान पर आया है किन्तु इस चर्चा को करना विषयांतर होना होगा।
अनुपनीत पुत्र के विषय में समंत्र के भी अनेकों प्रमाण हैं, किन्तु अनेकों निषेध भी हैं अस्तु सङ्गति इसी प्रकार बैठती है कि अनुपनीत केवल स्वधा उच्चारण करे, और वेदमंत्र का उच्चारण ब्राह्मण करें। यदि एकपक्षीय संकलन करें तो निषेध भी सिद्ध होगा और दूसरे पक्ष से प्रशस्त भी किन्तु यही त्रुटि है। दोनों पक्षों के साथ अन्य भी वचन होते हैं जो दोनों में संगति स्थापित कर देते हैं जैसे यहां मन्त्रप्रयोग के विषय में संगति स्थापित हुई और प्रामाणिक रूप से। न तो निषेध करने वाले इतने प्रमाण देंगे न ही प्रशस्त कहने वाले। ये भिन्न विषय है कि यहां कुछ ही प्रस्तुत किया गया है।

नाभिव्याहारयेद्ब्रह्म यावन्मौञ्जी न बध्यते। मंत्राननुपनीतोऽपि पठेदेवैक औरसः ॥
सुमन्तु (श्राद्ध कल्पलता)
उपरोक्त विश्लेषण में एक सूक्ष्म विषय भी स्पष्ट हुआ है वो यह कि असंस्कृत होने पर भी केवल पुत्र को ही श्राद्ध का अधिकार होता है, पुत्रेत्तर के लिये संस्कृत (उपनीत) होना अनिवार्य शर्त्त है अर्थात यदि पुत्र न हो तो भ्रातृ-भ्रातृज्य-सपिण्डादि में जो अनुपनीत होगा वह श्राद्ध का अधिकारी नहीं होगा अपितु जो उपनीत होगा वही अधिकारी होगा।
पिण्ड द्रव्य के विषय में मृताह, सपिण्डी, महालय, वार्षिक आदि के विषय में द्विजाति हेतु पक्वान का ही विधान है। शूद्र हेतु सर्वत्र आम श्राद्ध का ही विधान है :
आपद्यनग्नौ तीर्थे च प्रवासे पुत्रजन्मनि । आमश्राद्धं द्विजैः कार्यं शुद्रेण तु सदैव हि ॥ – कात्यायन
आपद्यनग्नौ तीर्थे च प्रवासे पुत्रजन्मनि । आमश्राद्धं द्विजो दद्याच्छूद्रः दद्यात्सदैव हि ॥ – उशना
आर्तवे देशकालानां विप्लवे समुपस्थिते । अमश्राद्धं द्विजः कुर्याच्छूद्रः कुर्यात्सदैव हि ॥ – व्याघ्रपाद
हेमश्राद्धं प्रकुर्वीत भार्यारजसि संक्रमे ।
संक्रमेऽन्नद्विजाभावे प्रवासे पुत्रजन्मनि । हेमश्राद्धं सग्रहे च द्विजः शूद्रः सदाचरेत् ॥ – बौधायन
आमानस्याप्यभावे तु श्राद्धं कुर्वीत बुद्धिमान् । धान्याचतुर्गुणेनैव हिरण्येन सुरोचिषा ॥ – मरीचि
अपत्नीकः प्रवासी च यस्य भार्या रजस्वला। सिद्धान्नेन न कुर्वीत आमं तस्य विधीयते ॥
या तु पिंडक्रिया तत्र ब्राह्मणानान्तु भोजनम् । यजमानस्य पूर्वेषां सन्तुर्गच्छति नान्यथा ॥
आमश्राद्धं यदा कुर्यात्पिण्डदानं कथं भवेत् । गृहपाकसमुद्धृत्य सक्तुभिः पायसेन वा ॥
पिण्डदानं प्रकुर्वीत हेमश्राद्धे कृते सति ॥ भविष्य
आमं तु द्विगुणं प्रोक्तं हेमतद्वच्चतुर्गुणम् । अन्नाभावे द्विजातीनां ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥
पुत्रजन्मनि कुर्वीत श्राद्धं हेम्नैव बुद्धिमान् | न पक्वेन न चामेन कल्याणान्यभिकामयन् ॥
शूद्रस्तु गृहपाकेन तत्पिण्डान्निर्वपेत्तथा । सकतुर्मूलं फलं तस्य पायसं वा भवेत्स्मृतम् ॥
नामन्त्रणं नागौकरणं विकिरो नैव विद्यते । तृप्तिः प्रश्नोऽपि नैवात्र कर्तव्यः केनचिद्भवेत् ॥
आपत्ति में, अनग्निक हो तो, प्रवासी, पत्नी के रजस्वला होने पर, पुत्र जन्म, ग्रहण, बाढादि विप्लव में, अपत्नीक हो तो आदि अनेकानेक स्थितियों में आमश्राद्ध वा कुछ विशेष स्थितियों में हेमश्राद्ध करना चाहिये। यहां द्विजाति के लिये ये विधान होने से अन्न श्राद्ध का निषेध सिद्ध नहीं होता अपितु अभाव की संभावना में आम श्राद्ध करने की आज्ञा है वो इसलिये की श्राद्ध का त्याग न हो। आम श्राद्ध, हेमश्राद्ध में सक्तु, पिष्ट, पायस आदि के पिंड का विधान भी कहा गया है। यहां किसी भी वचन में असंस्कृत द्विजाति पुत्र हेतु पक्वान्न का निषेध प्राप्त नहीं होता हां अपत्नीक होना एक कारण है जिसमें अभाव मात्र के कारण आम का विकल्प है न कि अन्न का निषेध।
आमं ददतु कौन्तेय तदामं द्विगुणं भवेत् । त्रिगुणं चतुर्गुणं वापि नत्वेकगुणमर्पयेत् ॥ – व्यास
स्त्री शूद्रः स्वपचश्चैव जातकर्मणि चाप्यथ । आमश्राद्धं तदा कुर्याद्विधिना पार्वणेन तु ॥ – प्रचेता
सर्वं श्राद्धं तथा कार्यं शूद्रेणाप्येवमेव तु । मन्त्रवर्जन्तु शूद्रस्य सर्वकामो विधीयते ॥ – मार्कण्डेय
इसी प्रकार कुछ और भी परिस्थिति बताई गयी है। स्त्री हेतु भी ऐसा वचन प्राप्त हो रहा है। ध्यातव्य यह है कि शूद्र के लिये निषेधात्मक रूप से सदैव आमश्राद्ध का ही विधान किया गया है अन्यों (स्त्री, पत्नीरहित, प्रवासी आदि) के लिये अभाव ही सिद्ध होता है। अर्थात यदि अन्न संभव न हो, बाधा हो तो आम श्राद्ध करे।
न भवेद्यस्य सामग्री दारा वा गृहमेव वा। आमश्राद्धं प्रकुर्वीत वृद्धो बालश्च यो भवेत् ॥ – जमदग्नि
अभाव की सिद्धि अब जमदग्नि के वचन से सिद्ध होते हैं : सामग्री, पत्नी या गृह न हो (अभाव हो) साथ ही वृद्ध और बालक हो तो भी आम श्राद्ध करे। यहां बालक कहा गया है अनुपनीत या उपवीत नहीं। बालक यदि उपवीत हो तो भी आमश्राद्ध करे, पाक का अभाव हो तो। क्योंकि यहां तो वृद्ध हेतु भी यही कहा गया है अर्थात विकल्प दिया गया है न कि निषेध किया गया है। आगे जमदग्नि के वचन से ही और भी स्पष्ट हो जाता है :
श्राद्धज्ञः श्रद्धया श्राद्धं श्राद्धकाले यथाविधि। पक्वेन वाऽश्रितेनापि नूनं कुर्यात्पितुः सुतः ॥ – जमदग्नि
यहां काल और विधि का पालन करना विशेष महत्वपूर्ण बताते हुये कहा गया है कि श्राद्धज्ञ के अनुसार पुत्र अपने पितादि का श्रद्धापूर्वक उचित काल में उचित विधि से श्राद्ध करे, यदि उचित काल में पाक संभावित न हो तो आमश्राद्ध ही करे किन्तु काल और विधि का लोप न करे।
न पक्वं भोजयेद्विप्रान् सच्छूद्रोऽपि कदाचन । भोजयेत्वश्नतां पापं तस्यापि प्रभवेत्सताम् ॥ वायुपुराण
पक्व का पूर्ण निषेध केवल शूद्र के लिये ही प्राप्त हो रहा है किन्तु अनुपनीत द्विजाति वा स्त्री के लिये भी निषेध नहीं प्राप्त होता हां अभाव में विकल्प अवश्य दिया गया है। “जन्मना जायते शूद्रः” से अनुपनीत द्विजाति को शूद्र के समान “शूद्रवत्” कहा गया है किन्तु यहां भाव केवल और केवल वेदाधिकार मात्र का है अन्य कुछ भी नहीं। वेदाधिकार में अनुपनीत बालक वा स्त्री को शूद्र के समान समझना चाहिये इससे भिन्न विषय में नहीं।
जैसे भोजन के विषय में शूद्र के समान नहीं होते, पत्नी का बना ही भोजन किया जाता है और श्राद्ध में भी पत्नी को पाकाधिकार है, क्या द्विजाति अनुपनीत पुत्र का भोजन-जल ग्रहण नहीं करेगा अथवा शास्त्र में कहीं निषेध है ? नहीं है अस्तु मात्र वेदाधिकार के संबंध में ही “जन्मना जायते शूद्रः” की सिद्धि होती है इससे भिन्न विषय में नहीं, वास्तव में ब्राह्मण का बालक ब्राह्मणपुत्र ही कहलाता है शूद्र नहीं। “जन्मना जायते शूद्रः” यह कहता है कि द्विजाति भी जन्म मात्र से वेदाधिकारी नहीं है अपितु संस्कार अनिवार्य है और यह नियम तो अनुपनीत द्विजाति पुत्र के लिये श्राद्ध में प्रभावी है ही।

मृताहं च सपिण्डं च गयाश्राद्धं महालयं। आपन्नोऽपि न कुर्वीत श्राद्धमामेन कर्हिचित् ॥
गालव (स्मृति दर्पण, संस्काररत्नमाला, निर्णयसिंधु)
मासिकानि सपिण्डानि अमावास्या तथाऽऽब्दिकम् । अन्नेनैव तु कर्तव्यं यस्य भार्या रजस्वला ॥
कालिकापुराण (संस्काररत्नमाला)
वैदेशिको वा विगताग्निको वा रजस्वलायामपि धर्मपत्न्याम्।
श्राद्धं मृताहे विदधीत पाकैर्नाऽऽमेन हेम्ना न तु पञ्चमेऽह्नि॥
(श्राद्धकल्पलता)
अब देखिये मासिक, सपिण्डी, आब्दिक, महालय, अमावास्या, गया श्राद्ध यदि भार्या रजस्वला हो तो भी अन्न से ही करे। इन श्राद्धों में आमान्न का ही स्पष्ट निषेध प्राप्त हो रहा है। अब यहां वर्ण का उल्लेख न होने पर भी द्विजाति की ही सिद्धि होती है क्योंकि शूद्र हेतु तो स्पष्ट निषेध कहा ही गया है यदि यहां शूद्र के अतिरिक्त नहीं कहा गया तो क्या शूद्र को भी पक्व से ही श्राद्ध करना चाहिये, क्या ऐसा अर्थ किया जा सकता है ?
अन्यान्य श्राद्धों में से प्रेत के निमित्त षोडश के अतिरिक्त और कौन सा श्राद्ध है – आब्दिक, महालय, गया। ये भी नाममात्र का बचा है और इनमें से किसी में भी छूट नहीं दी गयी है। जिसमें आम श्राद्ध की छूट दी गयी है वो तो विलुप्तप्राय है।
उपरोक्त प्रमाणों का चयन करने में मैंने अन्यान्य प्रमाणों का भी अवलोकन किया एवं मूलग्रंथों (स्मृति-पुराणादि) में नहीं देखा; क्योंकि एक विषय हेतु ढूंढा नहीं जा सकता यदि स्मरण रहे तो उसे देखा जा सकता है। उपरोक्त सभी प्रमाण (लगभग) अनेक पुस्तकों में द्रष्टव्य हैं जिनमें से कुछ पुस्तकों का नाम ऊपर वर्णित भी किया गया है। स्मृति-पुराणादि के महत्वपूर्ण वचनों का स्मरण होना अथवा किसी विशेष स्थान पर लिखा रहना आवश्यक होता है तभी लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
इन श्राद्धों (महालय आदि) में यदि कन्द-मूल-फल आदि कहा गया है तो इसका तात्पर्य अन्नाभाव में त्याग न करे ऐसा है। उक्त परिस्थिति के अनुसार वर्त्तमान में जिस काल (अपराह्न) में आद्य श्राद्ध (एकोद्दिष्ट) आरम्भ किया जाता है उससे उत्तम होगा कि ब्राह्मण के पास इतना अधिकार हो कि कर्त्तामात्र को लेकर मुख्य आवश्यक सामग्रियां लेकर आमश्राद्ध ही मध्याह्न में करा दे। शेष दानादि श्राद्ध के पश्चात् भी किया जा सकेगा।
अभी अत्यधिक धन व्यय करने वाला भी और अल्प धन व्यय करने वाला भी सबके लिये २ बजे घर से निकलने की परम्परा सी बनती जा रही है और इसमें भी कहेंगे बाप-दादा। अरे ये तो मैंने देखा है कि मध्याह्न में ही किया जाता था पूर्ण न हो तो एकोद्दिष्ट का आरम्भ अवश्य ही किया जाता था। आद्यश्राद्ध में ये कुरीति संभवतः कथावाचकों (नट-नर्तकों) के अनर्थ से उत्पन्न हुआ है। कथावाचक (नट) यदि श्राद्ध का काल अपराह्न कहते हैं तो उन्हें यह ज्ञान ही नहीं कि कौन सा श्राद्ध अपराह्न में होगा और कौन नहीं ? वो ये नहीं बता सकते कि श्राद्ध अनेक होते हैं और सबके लिये भिन्न-भिन्न काल होता है।
अब थोड़ा विषयांतरित होकर भी समझना होगा : श्राद्ध में रजत-स्वर्ण-ताम्र-तिल-दर्भ-मन्त्र के बिना पितर स्थान भी ग्रहण नहीं करते। इनमें से रजत और स्वर्ण में धन की बात आती है तो दरिद्र के लिये अनिवार्य सिद्ध नहीं होगा अथवा उसे छूट मिल जायेगी किन्तु धनाढ्य (सक्षम) को छूट नहीं मिलेगी। ताम्र की पवित्री का व्यवहार मिथिला में था, अभी भी बहुत स्थानों पर मंगाया जाता है किन्तु कोई धारण नहीं करता। यह अवश्य धारणीय है। इसके साथ तिल-दर्भ भी कहा गया है एवं अंत में मन्त्र भी।
विनारूप्यसुवर्णाभ्यां विना ताम्रतिलैस्तथा। विनादर्भैश्च मन्त्रैश्च पितॄणां नोपतिष्ठते ॥
वर्द्धमान
मन्त्र की अनिवार्यतावश द्विजाति के लिये असंस्कृत पुत्र को भी स्वधा का अधिकार स्पष्ट रूप से दिया गया एवं मंत्र का भी। मन्त्र में केवल एक शर्त कि वो अन्य पढ़े अर्थात यदि सपिण्डादि में वेदज्ञ हो तो वह वेदज्ञ पढ़े अथवा ब्राह्मण पढ़ें। मन्त्र का तात्पर्य वेद मन्त्र है।
अनुपनीत (द्विजाति) श्राद्धकर्त्तृक हो तो पक्व का निषेध ढूंढने से भी प्राप्त नहीं हो रहा है अपितु समंत्र तक का वचन प्राप्त हो रहा है। यदि समंत्र तक का वचन उपलब्ध है तो पक्व का निषेध कैसे हो सकेगा ? यदि किन्तु विद्वान के पास अनुपनीत के लिये पाक निषेध परक को स्पष्ट प्रमाण हों तो अवश्य प्रेषित करें क्योंकि यह नहीं कहा जा सकता कि कहीं नहीं है, संभव है हो हमें नहीं मिला। तो इसका समाधान यही है कि यदि कहीं अनुपनीत (द्विजाति) हेतु पाक निषेध का कोई प्रमाण विद्वानों के पास हो तो वो अवश्य प्रेषित करें : 7992328206
मूल प्रश्न और निष्कर्ष
आगे अब इस प्रकार से समझते हैं सामान्य द्विजाति का नियम होने के उपरांत शूद्र हेतु स्पष्ट निषेध है अर्थात शूद्र सिद्धान्न से श्राद्ध न करे अपितु आमान्न से करे। कदाचित यदि स्त्री हेतु भी एकाध प्रमाण हो तो भी खंडित हो जायेगा क्योंकि श्राद्ध में तो पत्नी (द्विजाति) के लिये पाक कर परिवेषण प्रशस्त है।
जिस प्रकार शूद्र हेतु सिद्धान्न का स्पष्ट निषेध है तो वह विधान स्त्री पर यथावत नहीं प्रचलित होता एवं उसी प्रकार असंस्कृत पुत्र (द्विजाति) पर भी प्रभावी नहीं होगा। क्योंकि यदि इसको सिद्धांत बनाया जाये तो पुनः असंस्कृत पुत्र (द्विजाति) को समंत्र (भले ही कोई अन्य पाठ करे) अधिकार है, स्वधा का भी अधिकार है फिर तो यह शूद्र पर भी प्रभावी हो जायेगा।
किन्तु शूद्र हेतु ऐसा सिद्धांत नहीं हो सकता और इसी प्रकार शूद्रवत (जन्मना जायते शूद्रः से) ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह वचन एक स्थान पर है एवं “जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः” ऐसा वचन अनेक स्थानों पर है। अस्तु “जन्मना जायते शूद्रः” से शूद्रवत का सिद्धांत ही सिद्धान्न प्रयोग के विषय में खंडित हो जाता है। एवं असंस्कृत द्विजाति के लिये सिद्धान्न निषेध का जो कुतर्क किया जाता है उसका मूल आधार ही “जन्मना जायते शूद्रः” से शूद्रवत है जो कि इस संदर्भ में अग्राह्य है।

यहां असंस्कृत पुत्र (द्विजाति) के लिये आमश्राद्ध का (विशेष परिस्थिति) के अतिरिक्त निषेध सिद्ध होता है एवं सिद्धान्न के निषेध का कोई स्पष्ट प्रमाण प्राप्त नहीं होने से सिद्धान्न निषेध वाला पक्ष खंडित होता है। एवं यदि हो तो विद्वानों से निवेदन है कि कृपया प्रेषित करें जिससे संशोधन किया जा सके। ये निवेदन दुराग्रही-मूर्खाचार्यों से नहीं है वो दम्भ न करें उनको दुत्कारा गया है और दुत्कारा ही जायेगा। तुम जो कहीं भी ऐसा बोलते हो तो तुम्हारे पास आधार क्या है दिखाओ ? निराधार बकवास करते हो इसी कारण मूर्खाचार्य कहा जाता है और दुत्कारा भी जाता है।
कुल मिलाकर उपरोक्त प्रमाणों से ही यह सिद्ध हो जाता है कि असंस्कृत पुत्र (द्विजाति) को भी सिद्धान्न का अधिकार है। मासिक से लेकर सपिण्डीपर्यन्त ही तो मुख्य रूप से श्राद्ध किया जाता है शेष वार्षिक भी एकाध अथवा ५ तक सीमित हो चुका है किन्तु अधिकांश तो तेरहवीं को करने कराने लगे हैं इसमें प्रज्ञा कहां चली जाती है। इसमें क्यों नहीं देखते हो कि पूर्व में ऐसा नहीं होता था और शास्त्र से भी निषिद्ध है।
संशोधित अपात्रक श्राद्ध के महत्वपूर्ण आलेख :
निष्कर्ष
“अनुपनीत (द्विजाति) श्राद्धकर्त्तृक हो तो पक्व (सिद्धान्न) का निषेध ढूंढने से भी प्राप्त नहीं होता।”
जैसे शीर्षक में अनुपनीत कर्त्ता शब्द से ही द्विजाति होना सिद्ध हो जाता है उसी प्रकार से आमश्राद्ध कहने पर शूद्र हेतु एवं विशेष परिस्थितियों में द्विजाति हेतु सिद्ध होता है जिसका स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है। यदि स्पष्ट प्रमाण से आम सिद्धि नहीं होती तो इसका सीधा तात्पर्य सिद्धान्न ही होगा।
जैसे मन्त्र प्रयोग का निषेध होने से सिद्ध होता है, पितृकर्म में स्वधा का स्पष्टाधिकार देखा जा रहा है और अन्य के माध्यम से मन्त्र श्रवणाधिकार भी सिद्ध हो रहा है। मंत्राधिकार अभाव का तात्पर्य प्रयोग का अभाव है न कि श्रवण का भी अभाव, शूद्र के लिये श्रवण का भी निषेध है किन्तु अनुपनीत द्विजाति के लिये श्रवण का निषेध नहीं है। आशा है शूद्रवत का तात्पर्य स्पष्ट हो गया है।
अब हम उस विषय पर आते हैं जहां अनुकरण करने वालों का दिग्दर्शन करना है। सबसे पहली शर्त यह स्वीकारें कि शास्त्र में निष्ठा रखनी ही होगी, यदि ब्राह्मण होने के कारण कोई आपको प्रणाम भी कर रहा है, भोजन भी करा रहा है तो उसका आधार शास्त्र ही है।
यदि आप शास्त्र की प्रतिष्ठा से अपनी प्रतिष्ठा को बड़ा समझ लेंगे तो शास्त्र में आस्था नहीं है यह सिद्ध होगा। यदि पूर्वकाल में अथवा वर्त्तमान में भी कोई त्रुटि है और शास्त्र से सिद्ध हो तो उसका सम्मार्जन करना होगा यही सबसे बड़ी शर्त है। इसके पश्चात् ही आप शास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं अन्यथा नहीं। शास्त्रज्ञान अवलोकन मात्र से नहीं होता, आस्था-श्रद्धा-विश्वास अनिवार्य है।
आज के समय में लोगों का एक सामान्य व्यवहार सा हो गया है केवल निष्कर्ष पर ध्यान केंद्रित करना। जैसे यही आलेख अथवा मेरा कोई भी आलेख हो बहुत लोगों को उबाऊ लगता होगा और जिनको उबाऊ लगता है उनके लिये निष्कर्ष का कोई महत्व नहीं रहता। सम्पूर्ण आलेख को एक बार नहीं अपितु कई बार पढ़ेंगे तब समझ आयेगा, और विद्वानों का यही नियम भी होता है, मूढ़ों को केवल दो-चार पंक्तियों में निष्कर्ष चाहिये होता है। इसलिये मूढ़ के लक्षण का त्याग करके विद्वानों का लक्षण ग्रहण करें।अब आगे कुछ बिंदुओं में समझें :
- इसमें (आलेख में) भी कई महत्वपूर्ण प्रमाण हैं जिनका संकलन आवश्यक है एवं इसी प्रकार से “संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर ढेरों प्रमाण उपलब्ध हैं।
- एक बड़ी कॉपी या डायरी लेकर शास्त्रों से विषयवार प्रमाणों का संकलन करें।
- प्रमाणों के लिये आरम्भ में वर्णित पुस्तकों एवं उसी प्रकार के अन्य ग्रंथों अथवा PDF का संग्रह करें।
- प्रमाणों के लिये AI का प्रयोग कदापि न करें क्योंकि यहां छद्म प्रमाण भी अत्यधिक दिया जाता है।
- इस प्रकार से प्रमाण संकलन करने में एक अन्य विशेष तथ्य का भी ध्यान रखें वो यह कि उसका अध्याय/श्लोक संख्या आदि भी अंकित करें।
- उपरोक्त विषय के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ होकर न्यूनतम ५ वर्षों की तपस्या करें, ये मेरा अनुभव है।
इस प्रकार से प्रमाण संकलन करने में आप अनेकों बार उपरोक्त ग्रंथों का अवलोकन कर लेंगे और इससे कहां कौन सा विषय है यह स्मृति में रहेगा। अथवा किस विषय का प्रमाण कहां-कहां मिल सकता है इसका अनुमान करना सरल होगा।
जब ऐसा हो जाये तब आप उन प्रश्नों के विषय में जो आपके स्थानीय स्तर पर निरंतर उठा करते हैं और विवादित रहते हैं अर्थात एक व्यक्ति कुछ कहता है और दूसरा कुछ; ऐसे प्रश्नों के प्रमाणों को ढूंढे और जितना प्रमाण प्राप्त हो जैसा कि आपने यहां देखा उसके आधार पर निष्कर्ष निकालें। इस निष्कर्ष को लिखित रूप में रखें और आवश्यता पर प्रस्तुत करके खंडित करने की चुनौती दें। खंडन की चुनौती में एक शर्त्त भी रखें यदि प्रमाणों से खंडित होगा तो मैं स्वीकार करूँगा और यदि खंडित न किया जा सके तो प्रतिवादी को स्वीकारना होगा।
यहां इससे अधिक दिग्दर्शन नहीं किया जा सकता किन्तु इसके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण तथ्य होते हैं।
निष्कर्ष
“यदि प्रामाणिक खंडन करने का सामर्थ्य नहीं है, तो मौन रहना ही मूर्खाचार्यों के लिए श्रेयस्कर है।”
इस शास्त्रीय विमर्श का मूल निष्कर्ष यह है कि असंस्कृत अथवा अनुपनीत द्विजाति पुत्र को अपने माता-पिता के और्ध्वदेहिक (श्राद्ध) कर्म का पूर्ण अधिकार है, यदि उसका चौल (मुंडन) संस्कार हो चुका हो अथवा उसकी आयु तीन वर्ष से अधिक हो। शास्त्रों के सूक्ष्म समन्वय से यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि अनुपनीत द्विजाति पुत्र को भी ‘सिद्धान्न’ (पक्व अन्न/भात) से पिण्डदान करने का अधिकार है।
“जन्मना जायते शूद्रः” का सिद्धांत केवल वेदमंत्रों के उच्चारण के अधिकार (वेदाधिकार) तक सीमित है, जिसे ‘शूद्रवत्’ कहकर श्राद्ध के पिण्ड द्रव्य पर थोपना नितांत अज्ञानता है और यह “जन्मना ब्राहणो ज्ञेयः” से खंडित (वेदाधिकार के अतिरिक्त) भी हो जाता है । पक्व अन्न (सिद्धान्न) का पूर्ण निषेध केवल शूद्रों के लिए है। अनुपनीत द्विजाति पुत्र स्वयं मंत्र न पढ़कर ब्राह्मणों या पुरोहित के माध्यम से समंत्रक श्राद्ध संपन्न करा सकता है और खोया, पिष्ट या आमान्न का विकल्प केवल पाक के सर्वथा अभाव या विशेष आपात स्थिति में ही ग्राह्य है, न कि सामान्य नियम के रूप में।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में वर्णित सिद्धांत निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु, स्मृतिमुक्ताफल और प्राचीन सूत्र ग्रंथों के परस्पर विरोधी वचनों में संगति स्थापित कर प्रस्तुत किए गए हैं। प्रचलित व्यावहारिक मतभेदों (जैसे खोया या पीसे चावल का पिण्ड) से भिन्नता होने पर सुधी पाठक शास्त्र सम्मत प्रमाणों को वरीयता दें। लेख में प्रयुक्त कटु शब्द शास्त्र की अवहेलना करने वाले स्वेच्छाचारियों के प्रति उपकार भाव से प्रेरित ‘तिक्त ओषधि’ हैं। इस मौलिक वैचारिक विश्लेषण पर लेखक का कॉपीराइट सुरक्षित है किन्तु शास्त्रीय प्रमाणों पर नहीं।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।