“७ पीढ़ी तक के सपिण्ड कुलटूट कर ही नहीं सकते।”
अशौच प्रकरण में विभिन्न विमर्शों के साथ एक महत्वपूर्ण विमर्श यह भी है कि पीढ़ी कब कटाये कैसे कटाये ? वास्तव में यह एक व्यावहारिक विषय अधिक है और प्रश्नकर्ता का भाव व्यावहारिक ही होता है किन्तु हम शास्त्रीय दृष्टिकोण से ही समझेंगे और जिसकी शास्त्र में रूचि होगी उसके लिये यह आलेख बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। शास्त्रदस्यु हेतु मेरा प्रत्येक आलेख प्रहार (वाक्प्रहार) ही होगा क्योंकि यह क्षमादान का अधिकारी ही नहीं है। ध्यातव्य मात्र इतना है कि यह प्रहार शास्त्रदस्यु वर्ग पर होता है ब्राह्मणों पर नहीं।
कुलटूट (पीढ़ी कटाना) : शास्त्रीय पक्ष क्या है ?
पीढ़ी कटाना सामान्य बोलचाल में प्रयोग किया जाता है जिसका भाव कि किस पीढ़ी से अशौच संबंध समाप्त किया जाये और कैसे किया जाये ? इसमें कुछ शास्त्रदस्यु कोई पीढ़िया (लकड़ी की पट्टी) आदि लेकर उस पर कुछ काट-छांट जैसी विधि भी करने लगे हैं और ऐसे शास्त्रदस्यु धिक्कार के ही पात्र हैं एवं उनकी निंदा अपेक्षित है।
पीढ़ी कटाना या कटवाना का क्या भाव है यह समझने में किसी को कोई समस्या नहीं होगी फिर भी थोड़ा और स्पष्ट कर दें कि इसका तात्पर्य यह है कि किस पीढ़ी से अशौच को मानना बंद किया जा सकता है। इसमें सन्निहित प्रश्न यह भी है कि किस पीढ़ी से अशौच मानना समाप्त करें जिससे कोई दोष भी न हो। मनमाना करने वाले तो ४ – ५ पीढ़ी में भी पृथक हो जाते हैं। इसके लिये एक दूसरा शब्द भी प्रयोग होता है जिसे “कुलटूट” कहा जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में और भी भिन्न-भिन्न शब्दों में व्यक्त किया जाता होगा।
कुलटूट का तात्पर्य हुआ कि जो कुल बहुत समय से एक था वह अब टूट गया और दो कुल हो गया है। एक कुल होने पर अशौच पुरे कुल में मान्य था, कुल का विस्तार होने से निःसंदेह अशौच का भी विस्तार होता ही है और एक बड़े कुल में तो बारम्बार अशौच एक विघ्न के समान हो जाता है। कोई मंगल कार्य हो, व्रत-पर्व हो बारम्बार अवरुद्ध होते रहते हैं और वर्त्तमान काल में सुनिश्चित उपनयन-विवाहादि को आगे बढ़ाना दुष्कर कार्य होता जा रहा है। इसके साथ किसी बड़े कुल में बारम्बार अशौच-संकर की भी समस्या बनती रहती है।
इस कारण प्रत्येक बड़ा कुल टूटने की प्रतीक्षा करता है अर्थात कब एक से दो कुल में विभाजित हो जाये कि अशौच की समस्या में कमी आये। चर्चा का मुख्य विषय यही है कि इसका शास्त्रीय अर्थात प्रामाणिक पक्ष क्या है और यहां हम प्रामाणिक चर्चा ही करेंगे साथ ही यह भी स्पष्ट कर दें कि शास्त्रदस्यु स्वतः हमसे दूर रहें और यदि निकट आयें तो शास्त्र और प्रमाणों के साथ आयें न कि देशाचार, व्यवहार, बाप-दादा, महाजनो येन गतः स पन्थाः, यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं…. आदि बकने आये। इन सभी विषयों की आवश्यकता तब होती है जब शास्त्रीय पक्ष ज्ञात ही न हो, यदि ज्ञात हो तो किसी निष्कर्ष पर न पहुंच सकें अर्थात बहुत ही विरोधाभास हो।
वर्त्तमान में ये जो शास्त्रदस्यु भरे-पड़े हैं वो शास्त्रसम्मत किसी भी विमर्श में सक्षम ही नहीं हैं तो वो न करें, जो सक्षम है उसके लिये विघ्न करने का अधिकार नहीं मिलता। मैं व्यवहार में देखता हूँ शास्त्रीय विमर्श आरम्भ नहीं हुआ कि यही सब रटने लगते हैं अर्थात चर्चा करने वाले को भी चर्चा करने से रोकते हैं। यही प्रश्न जिसका यहां विचार किया जा रहा है ३ दिन पूर्व एक व्हाट्सप समूह में किया गया था, उस समूह में कुछ यजमान भी है और अधिकांशतः जिले के कर्मकांडी हैं।

मैंने व्यस्ततावश तीन दिनों का समय लिया किन्तु विमर्श से निष्कर्ष तक के जो मुख्य प्रमाण हैं वो मैंने प्रस्तुत कर दिया। २०० में से एक भी इस विषय पर कुछ भी चर्चा करने को आगे नहीं आया जबकि प्रमाण भी उपलब्ध करा दिया गया।
किन्तु जब कभी ये सब मिलते हैं तो बड़े ज्ञाता बनकर बात करते हैं और कितने बड़े ज्ञाता हैं वो प्रश्नकर्त्ता भलीभांति समझ लेगा क्योंकि किसी ने चूं भी नहीं किया हां यदि इस प्रकार से इनको दुत्कारा न जाये तो ये उटपटांग बकवास से पीछे नहीं हटते, इसलिये भली-भांति विचार करके दुत्कारा जा रहा है ताकि भविष्य में कभी मिले तो बकवास न किया करे, जब शास्त्रीय विषय आये तो सुनने-समझने का प्रयास करे न कि बकवास।
विश्लेषण के मुख्य प्रमाण
अब विश्लेषण में आगे बढ़ेंगे और आगे बढ़ने से पूर्व यह आवश्यक है कि संबंधित प्रमाणों का अवलोकन कर लें। प्रमाणों के अवलोकन से दो पक्ष प्राप्त होगा और तदुपरांत उसका निष्कर्ष भी आएगा।
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते । समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥
मनुस्मृति/५/६०, कूर्मपुराण/उत्तरभाग/२३/५२
दशाहेन सपिण्डास्तु शुद्ध्यन्ति प्रेतसूतके । त्रिरात्रेणसकुल्यास्तु स्नानात्शुद्ध्यन्ति गोत्रिणः ॥
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु निवर्तेताचतुर्दशात् ॥
अग्निपुराण/१५८/२९ – ३०
एकपिण्डास्तु दायादाः पृथग्दारनिकेतनाः । जन्मन्यपिविपत्तौ च तेषां तत्सूतकं भवेत् ॥
तावत्तत्सूतकं गोत्रे चतुर्थपुरुषेण तु । दायाद्विच्छेदमाप्नोति पञ्चमो वात्मवंशजः ॥
चतुर्थे दशरात्रं स्यात्षण्णिशाः पुंसि पञ्चमे । षष्ठे चतुरहाच्छुद्धिः सप्तमे तु दिनत्रयात् ॥
पराशरस्मृति/३/७ – ९
सपिण्डानां तु सर्वेषां गोत्रजः साप्तपौरुषः । पिण्डांश्चोदकदानं च शावाशौचं तथाऽनुगम् ॥
चतुर्थे दशरात्रं स्यात्षडहः पञ्चमे तथा । पष्ठे चैव त्रिरात्रं स्यात्सप्तमे त्र्यहमेव वा ॥
अष्टमे दिनमेकं तु नवमे प्रहरद्वयम् । दशमे स्नानमात्रेण सूतके तु शुचिर्भवेत् ॥
अत्रि संहिता/८६ – ८८
दशाहेन सपिण्डास्तु शुध्यन्ति मृतसूतके । त्रिरात्रेण सकुल्यास्तु स्नात्वा शुध्यन्तिगोत्रजाः ॥
विष्णु, बृहस्पति स्मृति
पित्रादयस्त्रयश्चैव तथा तत्पूर्वजास्त्रयः । सप्तमः स्यात्स्वयं चैव तत्सापिण्ड्यं बुधैः स्मृतम् ॥
सापिण्ड्यं सोदकं चैव सगोत्रं तच्च वै क्रमात् । एकैकं सप्तकं चैव सापिण्ड्यादि उदाहृतम् ॥
लघु आश्वलायनस्मृति
समानोदकानां त्र्यहो गोत्रजानामहः स्मृतं ॥
जाबालि
दशाहं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते । जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणां शुद्धिमिच्छताम् ॥
जन्मन्येकोदकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते । शवस्पृशो विशुद्धन्ति त्र्यहात्तूदकदायिनः ॥
मिताक्षरा
मुख्य सिद्धांत के खंडन का खंडन
मिताक्षरा में विश्लेषण : इत्येतैर्वाक्यैस्त्रिरात्रदशरात्रयोः समानोदकसपिण्डविषयत्वेन व्यवस्थाकृता । अतः सपिण्डानां सप्तमपुरुषावधिकानामविशेषेण दशरात्रम् । समानोदकानां त्रिरात्रमिति । यत्पुनः स्मृत्यन्तरवचनम् :
चतुर्थे दशरात्रं स्यान्षण्निशाः पुंसि पञ्चमे । षष्ठे चतुरहाच्छुद्धिः सप्तमे त्वहरेव तु ॥
मिताक्षरा
इति तद्विगीतत्वान्नादरणीयम् । यद्यप्यविगीतं तथापि मधुपर्काङ्गपश्वालम्भनवल्लोकविद्विष्टत्वान्नानुष्ठेयम् – अस्वर्ग्यं लोकविद्विष्टं धर्म्यमप्याचरेन्न तु । (या०ध० १.१५६)
इति मनुस्मरणात् । न च सप्तमे प्रत्यासन्ने सपिण्डे एकाहो विप्रकृष्टाष्टमादिषु समानोदकेषु त्र्यहमित्युक्तम् । एवमविशेषेण सपिण्डानामाशौचे प्राप्ते क्वचिन्नियमार्थमाह । ऊनद्विवर्षे संस्थिते उभयोरेव मातापित्रोर्दशरात्रमाशौचं न सर्वेषां सपिण्डानाम् । तेषां तु वक्ष्यति “आदन्तजन्मनः सद्यः” इति । तथा च पैङ्ग्यः : “गर्भस्थे प्रेते मातुर्दशाहं, जात उभयोः, कृते नाम्नि सोदराणां च” इति । अथ वा अयमर्थः : ऊनद्विवर्षे संस्थिते उभयोर्मातापित्रोरेव अस्पृश्यत्वलक्षण्माशौचं च सपिण्डानाम् । तथा स्मृत्यन्तरे, “ऊनद्विवर्षे प्रेते मातापित्रोरेव नेतरेषाम्” इत्यस्पृश्यत्वलक्षणमभिप्रेतम् । इतरस्य पुनः कर्मण्यनधिकारलक्षणस्य सपिण्डेष्वपि “आ दन्तजन्मनः सद्यः” इत्यादिभिर्विहितत्वात् । अत्र दृष्टान्तः “सूतकं मातुरेव हि” इति । यथा सूतकं जनननिमित्तमस्पृश्यत्वलक्षणमाशौचं मातुरेव केवलं तथोनद्विवर्षोप्रमे मातापित्रोरेवास्पृश्यत्वमिति । ऊनद्विवर्षे सपिण्डानामस्पृश्यत्वं प्रतिषेधतान्यत्रास्पृश्यत्वमभ्यनुज्ञातं भवति ।
चतुर्थे दशरात्रं स्यात्षण्णिशाः पुंसि पञ्चमे । षष्ठे चतुरहाच्छुद्धिः सप्तमे तु दिनत्रयात् ॥
…
चतुर्थे दशरात्रं स्यात्षडहः पञ्चमे तथा । पष्ठे चैव त्रिरात्रं स्यात्सप्तमे त्र्यहमेव वा ॥
अष्टमे दिनमेकं तु नवमे प्रहरद्वयम् । दशमे स्नानमात्रेण सूतके तु शुचिर्भवेत् ॥
इस प्रकार के जो वचन हैं उनका कुछ विशेष भाव है न कि जो प्रथम भाव या अर्थ प्रकट होता है। मिताक्षरा का उपरोक्त विश्लेषण इसी कारण यथावत प्रस्तुत किया गया और विद्वद्जन समझ सकेंगे एवं मूर्खों को समझाना भी मूर्खता है अस्तु उसे समझाने की इच्छा का ही समापन कर चुका हूँ। इस पक्ष के क्रमशः पीढ़ीवार जो अशौच का उल्लेख करने वाले वचन हैं वो यथावत (अथवा जो प्रथम अर्थ प्रदान करते हैं) ग्राह्य नहीं हैं क्योंकि अन्यान्य सभी वचनों खंडित हो जाते हैं। इनमें संगति की आवश्यकता है किन्तु तत्काल मैं संगति नहीं कर पा रहा हूँ, विद्वद्जन संगति का प्रयास कर सकते हैं और कृपा हो तो सूचित भी करें।
मिताक्षरा के इस विश्लेषण को उद्धृत करने का उद्देश्य यह है कि जो मुख्य व ग्राह्य पक्ष है उसमें इस पक्ष से व्यवधान तो उत्पन्न होता है किन्तु द्वितीय पक्ष की किसी भी प्रकार से सिद्धि नहीं होती अपितु यदि यथावत अर्थ ग्रहण किया जाय तो यह स्वतः खंडित हो जाता है एवं उनके वचनों से भी खंडित होता है जिनका वचन है। अस्तु वचन का जो विशेष अर्थ है वो यदि हमारी बुद्धि में न आये तो ये हमारी बौद्धिक दुर्बलता है किन्तु ये बौद्धिक दुर्बलता उतनी अधिक भी नहीं होनी चाहिये कि इन वचनों से जो स्थापित सिद्धांत है और सभी एकमत दिखते हैं उसका खंडन हेतु प्रयोग करें।
मुख्य नियम
- सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते : ७ पीढ़ी तक सपिण्ड कहलाते हैं।
- समानोदकभावस्तु निवर्तेताचतुर्दशात् : ८ – १४ पीढ़ी तक सोदक कहलाते हैं।
- सापिण्ड्यं सोदकं चैव सगोत्रं तच्च वै क्रमात् । एकैकं सप्तकं चैव सापिण्ड्यादि उदाहृतम् : १५ – २१ तक सगोत्र कहलाते हैं।
इसमें सकुल्य (अशौच निर्धारण हेतु) ८, ९, १० पीढ़ी कहलाते हैं। वास्तव में १० पीढ़ी तक तो सकुल्य होते ही हैं किन्तु अशौच निर्धारण में ७ पीढ़ी सपिण्ड संज्ञक होती है। जैसे १५ – २१ पीढ़ी सगोत्र संज्ञक होने का तात्पर्य १४ पीढ़ी तक का असगोत्र होना नहीं है अपितु अशौच निर्धारण हेतु विशेष संज्ञा हैं।

दशाहेन सपिण्डास्तु शुध्यन्ति मृतसूतके । त्रिरात्रेण सकुल्यास्तु स्नात्वा शुध्यन्तिगोत्रजाः ॥ यद्यपि ऐसे वचनों से सोदक/समानोदक का ही सकुल्य होना भी स्पष्ट होता है किन्तु यहां सोदक हेतु सकुल्य का प्रयोग किया गया है समान भाव स्पष्ट हो जाता है कि सपिण्ड व गोत्रज से भिन्न जो सप्तक है वह। जैसे सपिण्ड का अगोत्रज होना सिद्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार अकुल्य भी नहीं हो सकता इस लिये सोदक हेतु यदि प्रयुक्त हुआ तो सोदक अर्थ प्रदान करेगा। इस प्रकार सकुल्य का दोनों ही भाव स्पष्ट होता है और सोदक से विशेष भी सिद्ध करता है।
त्रिसप्तक विचार : सपिण्ड, सोदक और सगोत्र
पित्रादयस्त्रयश्चैव तथा तत्पूर्वजास्त्रयः । सप्तमः स्यात्स्वयं चैव तत्सापिण्ड्यं बुधैः स्मृतम् ॥
सापिण्ड्यं सोदकं चैव सगोत्रं तच्च वै क्रमात् । एकैकं सप्तकं चैव सापिण्ड्यादि उदाहृतम् ॥
लघु आश्वलायनस्मृति
हम यहां सकुल्य का समानोदक अर्थ लेकर अर्थात पर्याय मानकर ही विचार करेंगे क्योंकि यह प्रमाणों से भी पुष्ट होता है।
कुल मिलाकर अशौच विषयक चर्चा में त्रिसप्तक विचार अपेक्षित है और कुलटूट प्रसंग का यही मूल आधार है। त्रिसप्तक कहें तो प्रथम सप्तक सपिण्ड, द्वितीय सप्तक सोदक या सकुल्य/खूट और तृतीय सप्तक सगोत्र/गोत्रज/गोतिया कहलाता है इससे आगे अर्थात २१ पीढ़ी से आगे का जाति आदि। अब सपिण्ड को समझना आवश्यक है एवं सपिण्ड का स्पष्टीकरण होने के पश्चात् सकुल्य-सगोत्र आदि को समझना कठिन नहीं होगा। केवल सपिण्ड को समझना ही कठिन है।

सपिण्ड का विचार विवाह प्रकरण में बहुत विस्तृत है किन्तु उसका अशौच प्रकरण में कोई अस्तित्व नहीं है। द्वितीय अवयव के आधार पर सपिण्ड के एक विचार इस प्रकार भी किया जाता है मध्यस्थ पुरुष (जिसका पिता मृत हो) ककुत्स्थ के तीन पूर्वज (पिता, पितामह और प्रपितामह) जिनका वह पिंडदान करता है अर्थात जो पिण्ड के अधिकारी हैं एवं तीन पुत्रादि जिसका पिंडदान में अधिकार होगा। ककुत्स्थ से तीन पीढ़ी आगे का तात्पर्य है पुत्र-पौत्र और प्रपौत्र। प्रपौत्र का पिण्डाधिकार पिता-पितामह-प्रपितामह तक होगा और ककुत्स्थ यहां प्रपितामह होता है।
अवयव के आधार पर सपिण्ड विषयक यह प्रकरण सपिण्ड प्रकरण को समझने का मूल आधार है किन्तु अशौच प्रकरण में यह पक्ष भी ग्रहण नहीं किया जाता है। इसी प्रकार सपिण्ड विषयक अन्यान्य विचार भी अशौच प्रकरण से संबंधित नहीं है। यहां पर जो संबंधित/ग्राह्य है वो प्रामाणिक तथ्य (अशौच/श्राद्ध संबंधी) है वही है। आइये सपिण्ड विषयक प्रमाणों का अवलोकन करें :
लेपभाजस्चतुर्थाद्याः पित्राद्याः पिण्डभागिनः। पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम् ॥
मत्स्यपुराण/१८/२९, पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्ड)/१०/३४ – ३५
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । लेपभाजस्रयो ज्ञेयाः सापिण्ड्यं साप्तपौरुषण् ॥
कूर्मपुराण/उत्तरभाग/२३/५४
ये चैकजाता बहवो भिन्नयोनय एव च । भिन्नवर्णास्तु सापिण्ड्यं भवेत्तेषां त्रिपूरुषम् ॥
कूर्मपुराण/उत्तरभाग/२३/५६
- पिता, पितामह और प्रपितामह पिंडभाज होते हैं अर्थात इनको पिंड प्रदान किया जाता है।
- इनसे ऊपर के तीन वृद्धप्रपितामह, अतिवृद्धप्रपितामह और परमातिवृद्धप्रपितामह (प्रपितामह के प्रपितामह) ये तीनों लेपभाज संज्ञक पितर होते हैं।
- इन ६ के अतिरिक्त जो पुरुष इनके लिये अधिकृत है, जीवित है वह ककुत्स्थ होता है।
- यहां पर परमातिवृद्धप्रपितामह मूल पुरुष हैं और गणना उनसे आरम्भ होती है। अर्थात परमातिवृद्धप्रपितामह से गणना करने पर उनके जितने भी परमातिवृद्धप्रपौत्र होंगे सभी आपस में भाई होंगे और सभी सपिण्ड होते हैं।
- इनसे ऊपर के भी सभी सपिण्ड संज्ञक ही होंगे अर्थात यदि परमातिवृद्धप्रपितामह के एक भाग वाले वृद्धप्रपौत्र दूसरे भाग वाले परमातिवृद्धप्रपौत्र के भी पितामह लगेंगे न कि भाई, इसी आधार पर जिस घर में जन्म से ही कोई अन्य घर के लिये बाबा (पितामह) पदवी धारण करता है उसे बाबा घराना तक भी कहा जाता है। ये भी आपस में सपिण्ड होंगे यदि मूल पुरुष (परमातिवृद्धप्रपितामह) सप्तम स्थान पर आते हों तो।
- इस नियम से यह भी स्पष्ट होता है कि यदि नीचे से गणना की जाय तो जो पिण्डदान के अधिकारी पुरुष जिसे ककुत्स्थ भी कहा गया है वहां से गणना की जायेगी, न कि नीचे जन्म लेने वाले बच्चों से।
- नीचे जन्म लेने वाले बच्चे के अशौच का निर्धारण ककुत्स्थ के अशौच से होगा अर्थात बच्चे कितनी पीढ़ी में आते हैं, उसे अशौच होगा अथवा नहीं इस प्रकार का विचार किया ही नहीं जा सकता।
विचार पिता-पितामह जो जीवित वृद्ध हों उनको अशौच होगा अथवा नहीं इसके आधार पर किया जायेगा और यदि पितामह को अशौच होता है तो उसके पौत्र को भी यथावत होगा भले ही वह सपिण्ड में न आकर सकुल्य में आये। पितामह की मृत्यु के पश्चात् वह सकुल्य होगा और आगे का विचार होगा, पितामह के जीवित रहते नहीं। मुखिया के अनुसार ही परिवार के अशौच का निर्धारण होता है और दूसरा तथ्य यह भी है कि यदि किसी कारणवश ससुराल आदि संसर्ग से बच्चों को अशौच हो जाये तो वह अल्पकालिक होता है एवं संसर्ग रहित होने पर परिवार के सदस्यों (माता-पिता) आदि के लिये अमान्य होता है। यदि पाक, वास आदि संसर्ग हो तो मान्य होगा।
सपिण्ड से ऊपर के सात अर्थात यदि ककुत्स्थ से गणना करें तो १४वें मूल पुरुष से संबंधित सभी परस्पर सकुल्य/सोदक होते हैं। सोदक का तात्पर्य पिण्डाधिकारी न होकर उदकाधिकारी होना है। सपिण्ड को श्राद्ध का अधिकार होता है और सपिण्ड के अभाव में सोदक आदि भी अधिकारी होंगे अन्यथा नहीं। इससे भी ७ पीढ़ी ऊपर से गणना करने पर अर्थात २१वें को मूलपुरुष बनाकर गणना करने पर सभी उसके गोत्रज या सगोत्र होते हैं उससे आगे जाति।

यहां से गणना का मूल स्वरूप भली-भांति स्पष्ट हो जाता है। जहां तक के पूर्वजों का नाम आदि ज्ञात हो वहां से गणना आरम्भ करें, यदि आप ७वें हैं तो आपके समकक्ष के सभी भ्राता वर्ग चाचा/बाबा आदि भी सपिण्ड कहलायेंगे। किन्तु आपके पश्चात् आपके पुत्रादि सकुल्य या सोदक होंगे न कि सगोत्र।
सपिण्डादि का अशौच विचार
अब इन त्रिसप्तकों के लिये अशौच का निर्धारण क्या किया गया है उसे समझना होगा। प्रमाण तो ऊपर उपलब्ध ही हैं किन्तु उनमें से एक मुख्य प्रमाण यहां उद्धृत करते हुये समझते हैं :
दशाहेन सपिण्डास्तु शुध्यन्ति मृतसूतके । त्रिरात्रेण सकुल्यास्तु स्नात्वा शुध्यन्तिगोत्रजाः ॥
विष्णु, बृहस्पति स्मृति
यह विचार पूर्णाशौच और ब्राह्मण वर्ण के विधान से है अर्थात न्यूनाधिक्यता का विचार, वर्णभेद से विचार आवश्यकतानुसार होगा।
सपिण्ड (प्रथम सप्तक में स्थित ककुत्स्थ व उसका परिवार) की शुद्धि दशरात्र में होती है। (केवल पूर्णाशौच में)
सकुल्य या सोदक (प्रथम सप्तक से आगे ८वीं से १४वीं पीढ़ी तक) की शुद्धि तीन रातों में होती है अर्थात सपिण्ड से आगे जो ककुत्स्थ हो उसे और उसके परिवार को त्रिरात्राशौच ही होता है, पूर्णाशौच नहीं होता।
सगोत्र (तृतीय सप्तक १५वीं से २१वीं पीढ़ी तक) में आने वाले की सद्यःशुद्धि होती है अर्थात स्नानमात्र से शुद्धि होती है। अर्थात ज्ञात होने पर अशौच होता है और शुद्धि हेतु स्नान की आवश्यकता होती है।
इससे आगे अर्थात सगोत्र से आगे जाति का उल्लेख नहीं है तो इसका तात्पर्य यह है कि अशौच होता ही नहीं।
यद्यपि एक भाव यहां यह भी है कि जब तक जन्म-नाम आदि ज्ञात रहे तब तक समानोदक होता है : “सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते । समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥” किन्तु इसका स्पष्ट अर्थ पूर्ण नहीं है इसमें कुछ और विशेषता भी है और इसकी यही विशेषता कुलटूट के सिद्धांत को स्थापित करने वाली है।
इस वचन का तात्पर्य यह है कि यद्यपि सीधे भाव में ५० पीढ़ी का भी ज्ञात होने पर उसे सोदक/सकुल्य कहा जा सकता है किन्तु १५वीं पीढ़ी से ही गोत्रज संज्ञक हो जाता है और अज्ञात होने पर तो वह भी नहीं होगा, अर्थात गोत्रज हेतु भी तो ज्ञात होना अनिवार्य है। अस्तु यह वचन द्विसप्तक में ही विशेषता को प्रकट करता है कि सपिण्ड के पश्चात् जहां तक जन्म-नामादि ज्ञात हों ११, १२, १३ और १४ तक में से जितने तक का ज्ञात हो वहां तक सोदक होते हैं।
यहां ज्ञात होना अनिवार्य नियम स्थापित हो रहा है अर्थात यदि ज्ञात न हो तो कुछ विशेष विचार किया जायेगा। १०वीं पीढ़ी तक के सकुल्य वाले भाव की भी आवश्यकता यहीं पर आकर होती है और उसका औचित्य भी ज्ञात होता है। ज्ञात होने की बात करें और ज्ञात होने के कारण अशौच बंधन हो जाये तब तो लोग ८वीं पीढ़ी से ही आगे को ज्ञात ही न रखें, यथाशीघ्र भूलने का प्रयत्न करें।
यद्यपि आगे बिना वंशावली के अधिक स्मरण रहता भी नहीं तथापि सकुल्य की १०वीं पीढ़ी वाला पक्ष यहां आ जाता है, क्योंकि यदि यह ज्ञात न हो कि ८, ९, १०वीं पीढ़ी में क्या-कौन-कहां आदि तो फिर वो भी सोदक नहीं रहेगा अर्थात अशौचाभाव हो जायेगा। तो उसी अवस्था का एक विशेष नियम है कि यदि नामादि अज्ञात भी रहे किन्तु इतना ज्ञात रहे कि १०वीं पीढ़ी में ही आते हैं तो सकुल्य होगा और उसका त्रिरात्राशौच होगा। उक्त स्थिति में भी अशौच का अभाव ११वीं पीढ़ी से ही संभव है उससे पूर्व नहीं।
यद्यपि स्वीकारा कि सकुल्य और सोदक समानार्थी या पर्याय के रूप में है किन्तु यहीं पर आकर सकुल्य और सोदक का भेद भी ज्ञात होता है। सकुल्य का तात्पर्य है १०वीं पीढ़ी तक अर्थात मूलपुरुष से गणना करने पर १०वीं पीढ़ी तक के सदस्य परस्पर सकुल्य होते हैं एवं इनका अशौच अबाधित है हां संकोच अवश्य है।
संकोच का तात्पर्य है कि सपिण्ड के पश्चात् दशरात्राशौच नहीं होता अपितु त्रिरात्राशौच ही होता है। १०वीं पीढ़ी तक इसका अभाव नहीं हो सकता किन्तु उससे आगे यदि ज्ञात हो तो भी होगा, अज्ञात होने पर नहीं होगा। नहीं होने का भी तात्पर्य अशौचाभाव ग्रहण करना अनुचित होगा सद्यःशौच होगा अर्थात स्नान की आवश्यकता होगी। अब जाकर कुलटूट/पीढ़ी कटाना/पीढ़ी अलग करना आदि को हम समझ सकते हैं, और यहां एक बार पुनः शास्त्रदस्युओं को धिक्कारना अपेक्षित है।
- अरे शास्त्रदस्युओं तुम जो कुलटूट के लिये ७ पीढ़ी की गणना करते हो उसका आधार क्या है ?
- पीढ़िया लेकर चाकू आदि से कुछ मूर्खतापूर्ण चलाने की क्रिया करते हो उसका आधार क्या है ?
ये तुम्हारे पापों का दुष्परिणाम है कि प्रत्येक विषय में मौन रखना होता है, सार्वजनिक रूप से किसी भी प्रश्न का प्रामाणिक उत्तर देने में समर्थ नहीं होते हो। व्यक्तिगत रूप से तीसमारखां बनते रहते हो। कहीं करा दोगे और तब प्रश्न उपस्थित हो जाये कि कैसे कराये तो कहोगे कि मैं तो मना कर रहा था और यदि वाहवाही होने लगे तो कहोगे कि मैंने ही कहा था। सार्वजनिक रूप से उत्तर देने का तात्पर्य यजमान के समक्ष न होकर विद्वानों के समक्ष सिद्ध करना।
और इसका ज्वलंत उदाहरण है कि लगभग २०० के बीच में कोई चूं तक नहीं कर रहा है किन्तु यही २०० यत्र-तत्र किसी एकाध प्रमाण को आधार बनाकर जो विषय सिद्ध होता है उसका खंडन भी करते रहते हैं। मासिक श्राद्ध का एक बार में होना सिद्ध किया जा चुका है किन्तु यही सब हैं जो बाप-दादा चिल्लाते रहते हैं। अरे यदि शास्त्रीय विषय में कुछ कहने का सामर्थ्य होता तो सप्रमाण सिद्ध करते न। इसी विषय में कुछ तो सिद्ध करके उत्तर देते।
कुलटूट/पीढ़ी कटाना/पीढ़ी अलग करना
अब तक जो तथ्य स्पष्ट हो चुके हैं वो इस प्रकार हैं :
- मूल पुरुष से गणना करने पर ७वीं पीढ़ी तक के पुरुष सपिण्ड कहलाते हैं एवं उन्हें पूर्णाशौच होता है। इसको बाधित नहीं किया जा सकता।
- मूल पुरुष के ८वीं पीढ़ी से १४वीं पीढ़ी तक के पुरुष सोदक/समानोदक/सकुल्य कहलाते हैं एवं इन्हें त्रिरात्राशौच होता है। नामादि ज्ञात होने पर इसको भी बाधित नहीं किया जा सकता।
- किन्तु विशेषता यह है कि मूल पुरुष के ८, ९ और १०वीं पीढ़ी का त्रिरात्राशौच बाधित हो ही नहीं सकता, उससे आगे का अज्ञात होने पर बाधित हो सकता है। इस वर्ग को सोदक में भी विशेष सिद्ध करने के लिये पृथक रूप से सकुल्य भी कहा जाता है।
- सकुल्य से आगे अर्थात १०वीं पीढ़ी से आगे अज्ञात होने पर बाधित हो सकता है। किन्तु ११, १२वीं आदि ज्ञात हो तो बाधित नहीं हो सकता।
सामान्यतः १० पीढ़ी के भी नामादि का ज्ञात रहना कठिन है और जो धर्म व शास्त्रादि के प्रति सजग है उसी को ज्ञात हो सकता है, उसी के कुल में ज्ञात रखा जा सकता है। अब आगे दो तथ्य आते हैं :
एक तो यह कि कोई ऐसा भ्रष्ट भी होता है जो प्रपितामह से गणना करके यदि सातवीं पीढ़ी के बच्चे का जन्म हो गया तो उस बच्चे को सातवीं पीढ़ी मानकर कुल से मनमाना टूट जाता है; तो कोई इतना मूर्ख भी होता है कि अशौचसंकर होने पर कितना बढ़ेगा आदि को स्वीकार न करके स्वयं के मृतक के अनुसार पूर्णाशौच ही स्वीकार करता है और वहां भी कुलटूट हो जाता है, तो कोई अशौच में विवाहादि कर लेता है किन्तु इस कारण से अधिक नहीं होता वहां संकल्प आदि कुछ बहाना बना देता है।
इसी में एक प्रकार है कि येन-केन-प्रकारेण कुलटूट की मनमानी विधि से भी करता है और वो कराने वाला शास्त्रदस्यु अपण्डित तो धिक्कार के योग्य होता ही है। इन सभी अथवा मिलते-जुलते विषयों में कोई भी शास्त्रसम्मत नहीं है और सभी दोषयुक्त है।
दूसरा वो है जो सपिण्ड न होकर भी पूर्णाशौच ही करता है, सोदक होकर भी त्रिरात्राशौच न करके दशरात्राशौच करना एक बड़ी मूर्खता है और इसका कारण नित्यकर्म से रहित होना है। यदि नित्यकर्म करने वाला हो तो वह त्रिरात्राशौच ही स्वीकारेगा और चतुर्थ दिवस से पुनः नित्यकर्म आरम्भ करेगा। यदि १० बार गायत्रीमात्र भी जप करता है तो उसे त्रिरात्राशौच ही मानना चाहिये, दशरात्राशौच होता ही नहीं है।
यदि दशरात्राशौच नहीं हुआ फिर भी सप्ताह पर्यन्त नित्यकर्म (गायत्री मात्र जप भी) का लोप करना प्रत्यवाय दोष को उत्पन्न करता ही है। अशौच में लोप होना दोषद नहीं है किन्तु मनगढंत अशौच मानकर लोप करना दोषद है और वैसे व्यक्ति के लिये आमरण अशौच कहा गया है, उसे सभी कर्मों में गर्हित कहा गया है – संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यः अनर्हः सर्वकर्मसु ।
एवं इसी कारण अशौचवश अधिक विघ्न-विवाद उत्पन्न होते दिखते भी हैं। जहां मात्र त्रिरात्राशौच होगा और अगले सप्ताह का पूजा-विवाहादि कोई भी कार्य बाधित ही नहीं होने वाला वहां भी दशरात्राशौच करने से विघ्न-विवाद होता है। ७ पीढ़ी तक के सपिण्ड कुलटूट कर ही नहीं सकते, ऐसा कोई विधान है ही नहीं और आगे ८वीं पीढ़ी से भी पूर्णाशौच मानना शास्त्रविरुद्ध ही है।
इसका तात्पर्य है जैसे दौहित्र-पुत्री आदि पक्ष में त्रिरात्राशौच होता है और केवल उसी परिवार को होता है सबको नहीं, अंतिम क्रिया में भाग लेने वाला जाति-गोत्रादि से भिन्न हो तो अगले ही दिन शुद्धिक्रिया कर लेता है उसी प्रकार जो सपिण्ड से निकल गया हो उसे किसी प्रकार से कुछ भी किये बिना मात्र सामूहिक विचार पूर्वक कि हम सब अब सपिण्ड नहीं रहे अस्तु अब परस्पर पूर्णाशौच नहीं होगा, किन्तु त्रिरात्राशौच होगा ऐसा निर्णय विद्वान ब्राह्मणों से विचार-विमर्श पूर्वक निर्णय प्राप्त कर सकते हैं।

यहां केवल विद्वानों द्वारा सुनिश्चित करना ही मान्य होगा कर शास्त्रसम्मत है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। पुनः आगे १० पीढ़ी तक त्रिरात्राशौच का त्याग नहीं किया जा सकता यदि नामादि अज्ञात हो तो भी, नामादि अज्ञात होने पर १० पीढ़ी के पश्चात् अर्थात ग्यारहवीं पीढ़ी में जाकर कुलटूट कर सकते हैं किन्तु स्मरण रहे १०वीं पीढ़ी के नामादि अज्ञात हों तो अन्यथा नहीं।
इस विधान में भी स्वघोषित रूप से कुछ नहीं कर सकते यह निर्णय भी विचार-पूर्वक विद्वान ब्राह्मणों से ही लिया जा सकता है क्योंकि यहां निर्णय की आवश्यकता है और ऐसा निर्णय विद्वान ब्राह्मण ही दे सकते हैं कोई और नहीं। किसी अन्य का दिया निर्णय मान्य भी नहीं होता अर्थात वहां दोष होगा। इस प्रकार से वंशवृक्ष, सपिण्ड/सोदक आदि का निर्धारण, गणना विद्वान ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य कोई कर भी नहीं सकता है और निर्णय देने के अधिकारी तो विद्वान ब्राह्मण ही होते हैं।
यहां विद्वान ब्राह्मण का तात्पर्य केवल वैयाकरण/ज्योतिषी आदि न होकर शास्त्रज्ञ ब्राह्मण है, अधिकांश वैयाकरण/ज्योतिषी आदि ही पंडित बनकर घूम रहे हैं जो शास्त्र के विषय में अल्पज्ञ ही होते हैं और वो भी शास्त्रीय विषयों का निर्णय नहीं कर सकते। जो हमारे आलेख पढ़ने वाले हैं वो भी ऐसे वैयाकरणों/ज्योतिषियों से अधिक शास्त्रज्ञ होते हैं।
अधिकांशतः ऐसे अपण्डित ही पण्डित बनकर घूम रहे हैं इसी कारण सभी विषय विवादित ही होते जा रहे हैं। इन धूर्तों की धृष्टता कितनी होती है वो भी स्पष्ट कर देना अपेक्षित है ये लोग हमारे सामने भी वही सब राग अलापते रहते हैं : यद्यपि शुद्धं, बाप-दादा, लोकाचार, देशाचार, महाजनो येन गतः स पन्थाः। इन शास्त्रदस्युओं को इसका भी कुछ तात्पर्य ज्ञात नहीं होता किन्तु राग अलापते रहते हैं।
इसी कारण इनको शास्त्रदस्यु, अपण्डित आदि कहकर दुत्कारना आरम्भ कर चुका हूँ। ये लोग सम्मान के पात्र ही नहीं हैं क्योंकि ये लोग न तो स्वयं कोई शास्त्रीय चर्चा कर पाते हैं, न सुनना-समझना चाहते हैं और धृष्टता तो देखिये कि यदि कोई तीसरा भी जानना-समझना चाहता है तो उसको भी समझने-समझाने में अड़चन उत्पन्न करते हैं। विघ्न के विषय में एक और तथ्य स्पष्ट करना अपेक्षित है कि मांगलिक कार्यों में नान्दीमुख श्राद्ध करने के उपरांत अशौच नहीं होता है, विवाह में १० दिन पूर्व किया जा सकता है और उपनयन में ६ दिन पूर्व।
कन्या के पिता को भी नान्दीमुख श्राद्ध करना चाहिये और वर के पिता को भी। मांगलिक कार्यों में अशौच के कारण जो समस्या होती है यदि नान्दीमुख श्राद्ध करो तो वो समस्या होगी ही नहीं किन्तु मनमाना ही करना है, अशौच ज्ञात हो गया तो कहेंगे संकल्प कर लिया अरे धूर्त कौन सा संकल्प कर लिया, अशौच निवारण का क्या संकल्प है और कहां है ? कोई बच्चे को ननिहाल आदि भेज देते हैं अरे धूर्त वो कहीं भी जाये अशौच की व्याप्ति हो गयी, ननिहाल जाये या ससुराल अशौच समाप्त नहीं होगा।
इसी प्रकार कन्यादान में नाना/मामा/फूफा/मौसा आदि की बात ले आते हैं अरे कोई अन्य कन्यादान करेगा तो इससे कन्या का अशौच समाप्त कैसे हो जायेगा ? उस कन्या को भी तो अशौच होता है। अब आप विचार करें ऐसा कराने वाले अपण्डित धिक्कार के योग्य हैं अथवा नहीं !
निष्कर्ष
“निर्णय देने के अधिकारी केवल विद्वान ब्राह्मण ही होते हैं।”
अशौच और सापिण्ड्य का संबंध रक्त और पिण्ड होता है जो जिसका निर्णय शास्त्रों द्वारा निर्धारित मर्यादाओं से होता है। इस विमर्श का मुख्य निष्कर्ष यह है कि ७वीं पीढ़ी तक सपिण्डता को किसी भी स्थिति में समाप्त नहीं किया जा सकता; वहाँ पूर्णाशौच अनिवार्य है। कुलटूट या पीढ़ी पृथक्करण का शास्त्रीय आधार केवल ८वीं पीढ़ी से आरम्भ होता है, जहाँ ‘सपिण्ड’ संज्ञा समाप्त होकर ‘सोदक’ या ‘सकुल्य’ संज्ञा आरम्भ होती है।
१०वीं पीढ़ी तक त्रिरात्राशौच का विधान अटल है, और ११वीं पीढ़ी के पश्चात ही अज्ञात नामादि की स्थिति में अशौच से पूर्ण मुक्ति (सद्यःशौच) संभव है। किन्तु यह निर्णय केवल विद्वान शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों के विवेक और वंश-वृक्ष की सूक्ष्म गणना पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी मनमाने मनगढंत तथ्यों से ।
F&Q :
FAQ
प्रश्न : कुलटूट (पीढ़ी कटाना) वास्तव में क्या है?
उत्तर : यह वह शास्त्रीय बिंदु है जहाँ से एक विस्तारित परिवार अशौच के बंधन से मुक्त होकर दो पृथक ‘कुलों’ में विभाजित हो जाता है।
प्रश्न : क्या ४ या ५ पीढ़ी में कुल अलग किया जा सकता है?
उत्तर : नहीं, ७वीं पीढ़ी तक सापिण्ड्य अनिवार्य है; इससे पूर्व अलग होना शास्त्रविरुद्ध है।
प्रश्न : सपिण्ड और सोदक में क्या अंतर है?
उत्तर : १ से ७ पीढ़ी तक सपिण्ड (पिण्ड के सहभागी) और ८ से १४ तक सोदक (केवल जल के सहभागी) होते हैं।
प्रश्न : ८वीं पीढ़ी के बाद कितना अशौच लगता है?
उत्तर : ८वीं से १०वीं पीढ़ी तक सामान्यतः त्रिरात्राशौच (३ दिन) का विधान है।
प्रश्न : क्या सोदक होने पर भी १० दिन का अशौच करना चाहिए?
उत्तर : नहीं, सोदक होने पर १० दिन का अशौच करना नित्यकर्म का लोप करने का दोष उत्पन्न करता है।
प्रश्न : कुलटूट का निर्णय कौन कर सकता है?
उत्तर : केवल वह विद्वान ब्राह्मण जो धर्मशास्त्र और वंशावली की गणना में निपुण हो।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख शास्त्रीय विमर्श और धर्मशास्त्रीय शोध के उद्देश्य से लिखा गया है। अशौच और कुलटूट जैसे विषय अत्यंत संवेदनशील होते हैं, जिनमें कुल-परम्परा और स्थान-भेद का भी महत्व होता है। अतः इस आलेख में वर्णित तथ्यों को व्यक्तिगत जीवन में लागू करने से पूर्व अपने कुलगुरु या किसी शास्त्रज्ञ विद्वान ब्राह्मण से परामर्श अवश्य लें। केवल इस आलेख के आधार पर किए गए निर्णयों के लिए लेखक उत्तरदायी नहीं होगा। यह आलेख विषय को समझने के लिये है न कि किसी को कोई निर्णय प्रदान किया गया है। आलेख में अपण्डित/शास्त्रदस्यु को दुत्कारा भी गया है किन्तु उसका तात्पर्य विद्वानों से नहीं है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








