“सत्य बोलना आज अपराध हो गया है और असत्य बोलना महानता।”
स्वतंत्र भारत में भौगोलिक स्वतंत्रता से इतर कुछ भी नहीं दिखता है। यह तथ्य राजनीतिक दल भी स्वीकार करते हैं साथ ही भिन्न-भिन्न राजनीतिक दल अपनी विचारधारा के देश/संस्कृति पर थोपने का कुत्सित प्रयास भी करते हैं अर्थात् अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। इसी कारण जो जाति व्यवस्था भारतीय संस्कृति की पहचान है, सांस्कृतिक गुण है, सामाजिक व्यवस्था है उसे विवादित बना दिया गया और मिटाने की बात भी करते हैं।
इस विषय में एक तथ्य गंभीर है और वो यह कि ये चिल्लाने वाले जोर-शोर से चिल्लाते हैं कि भारतीय संस्कृति में जाति व्यवस्था नहीं थी, अंग्रेजों ने बनाया। इन लोगों को तमाचा जड़ना अत्यावश्यक है क्योंकि इन्ही लोगों ने देश में ऐसे वातावरण का निर्माण किया जहां सत्य बोलना अपराध हो गया और असत्य बोलना महानता का कारण बन गया।
आज इस आलेख में जाति व्यवस्था से संबंधित ढेरों प्रमाणों का अवलोकन करेंगे जो यह सिद्ध करता है कि अंग्रेजों ने इस व्यवस्था का अपने अनुकूल फूट डालने के लिये प्रयोग किया और स्वतंत्र भारत के सत्ता लोलुपों ने अपने अनुकूल।
जाति व्यवस्था कहां से आई – स्मृति प्रमाण संकलन
“जाति व्यवस्था भारतीय संस्कृति के उच्चतम मूल्यों के संरक्षण का कार्य करती है।”
जाति व्यवस्था के विषय में जो महत्वपूर्ण तथ्य हैं पहले उनको समझना उचित होगा :
- जाति व्यवस्था वर्ण व्यवस्था से उत्पन्न प्रामाणिक सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था है अर्थात् यह अंग्रेजों की देन नहीं है अपितु शास्त्रों द्वारा अनुमोदित है ।
- यह भारतीय संस्कृति और समाज के उच्चतम मूल्यों के संरक्षण का कार्य करता है अर्थात् गुण है न कि अवगुण ।
- इसके प्रमाण रामायण और महाभारत काल में भी उपलब्ध हैं।
- यदि रामायण और महाभारत काल में प्रमाण उपलब्ध हैं तो अंग्रेजों का बनाया नहीं है यह भी स्वाभाविक रूप से सिद्ध हो जाता है।
यदि हम जाति व्यवस्था की प्रामाणिक पृष्ठभूमि ढूंढें तो यह स्पष्ट होता है कि वर्णशंकरों के समूह ही विभिन्न जातियों (वर्ण से पृथक) में स्थापित हुये । यह तथ्य आगे प्रस्तुत ढेरों प्रमाणों से सिद्ध हो जायेगा किन्तु समस्या यह है कि राजनीतिक धूर्त शास्त्रों को प्रमाण नहीं मानते अपितु इतिहासकारों व मनगढ़ंत विदेशी विचारधाराओं को प्रमाण मानते हैं। निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि इन राजनीतिक धूर्तों की धर्म और शास्त्र में कोई आस्था ही नहीं है।
इन राजनीतिक धूर्तों ने देश में ऐसे घृणित वातावरण का निर्माण कर दिया है कि वही तथ्य बोलना अपराध हो गया जिसके प्रमाण भरे पड़े हैं जो आगे संकलित किये गये हैं। इन राजनीतिक धूर्तों से एक ही प्रश्न पूछना चाहिए कि तुम भारतीय संस्कृति, शास्त्र में आस्था रखते हो अथवा नहीं। यदि आस्था नहीं है तो तुम अपराधी हो न कि वो जिसकी आस्था है ।
जाति व्यवस्था पूर्णतः भारतीय सांस्कृतिक व सामाजिक व्यवस्था प्रमाणों से सिद्ध होता है, यदि तुम कहते हो कि अंग्रेजों रचित है तो तुम असत्य बोल रहे हो और अपराधी हो । इन धूर्तों का दुस्साहस तो देखिये यदि ये मनगढ़ंत भ्रामक तथ्य परोसकर जनमानस को भ्रमित कर रहे हैं और शास्त्र से वह असत्य सिद्ध हो रहा है तो शास्त्रों में भी परिवर्तन की बात करते हैं अर्थात् शास्त्रों से उन तथ्यों को हटा दिया जाय जो इनके मनगढ़ंत तथ्यों को असत्य सिद्ध करने वाले हैं और उसके स्थान पर भ्रामक मनगढ़ंत तथ्यों की पुष्टि वाले तथ्य अंकित कर दिये जांय ।

इन राजनीतिक धूर्तों के दुस्साहस और सांस्कृतिक अनास्था का आकलन मात्र इसी आधार पर कर लेना चाहिए कि ये असत्य बोलते भी हैं और शास्त्रों में भी अनुकूल परिवर्तन करना चाहते हैं। जाति व्यवस्था का लाभ भले ही अंग्रेजों ने उठाया हो, विकृत भले ही कर दिया हो किन्तु ये व्यवस्था भी पुरातन ही है क्योंकि शास्त्रों में वर्णित है। यदि एक बार हम यह मान भी लें कि शास्त्रों में परिवर्तन कर दिया गया तो वो दो-चार शास्त्रों में किया जा सभी शास्त्रों में नहीं। इसी कारण यहां अनेकानेक स्मृतियों के जाति व्यवस्था से सम्बंधित प्रमाण संकलित किये गए हैं।
इस विषय में सरकार के तीनों अंगों को चिंतन करना चाहिये कि वो कौन है जो शास्त्रविरुद्ध असत्य व भ्रामक तथ्य परोसता है। यदि विदेशी चश्मा उतार कर सम्यक चिंतन करे तो ज्ञात होगा कि स्वयं सरकार (तीनों अंग) ही दोषी है, वही ऐसे घृणित कार्य कर रही है अथवा परोक्षतः उपस्थित है। इस आधार से सरकार (तीनों अंग) धिक्कार के पात्र हो जाते हैं क्योंकि वो भारतीय होकर भी भारतीय शास्त्र, धर्म, संस्कृति का तिरस्कार कर रही है। असत्य को संरक्षित कर रही है, किन्तु सत्य की विजय सुनिश्चित है।
धर्म की उतनी हानि आक्रांताओं के काल में भी नहीं हुयी; अंग्रेजों के काल में भी नहीं हुयी जीतनी हानि स्वतंत्र भारत में बनी सरकारों ने किया। उस काल में को मानसिक रूप से अधीन नहीं था किन्तु भौगोलिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् मानसिक रूप से विदेशी विचारधाराओं के अधीन हो गये।
“भौगोलिक स्वतंत्रता तो मिली, पर मानसिक रूप से हम आज भी विदेशी विचारधारा के अधीन हैं।”
जातिव्यवस्था पूर्णतः भारतीय व्यवस्था है और इसे स्वीकार करने में ही लाभ है, अस्वीकार करना ही शास्त्रों में अनास्था को सिद्ध करता है। शास्त्र में अनास्था का तात्पर्य धर्म में भी अनास्था है ऐसा ही सिद्ध होता है। तभी तो “जय श्रीराम” का नारा लगाकर सरकार बनाने वाले भी आज “नमो बुद्धाय” और “जय भीम” का नारा लगाने लगे हैं। अतः कोई भी दल हो, कोई भी संस्था/संगठन हो धर्म के विषय में रत्तीभर भी विश्वसनीय नहीं है यदि सरकार से किसी भी प्रकार सम्बद्ध है तो। आइये हम स्मृतियों में जाति व्यवस्था के प्रमाणों का अवलोकन करते हैं :
मनु स्मृति
“जाति व्यवस्था गुण है, अवगुण नहीं, यदि इसे इसके मूल रूप में समझा जाय।”
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः । चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु । आनुलोम्येन संभूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ॥
स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान्सुतान् । सदृशानेव तानाहुर्मातृदोषविगर्हितान् ॥
अनन्तरासु जातानां विधिरेष सनातनः । द्वयेकान्तरासु जातानां धर्म्यं विद्यादिमं विधिम् ॥
ब्राह्मणाद्वैश्यकन्यायामम्बष्ठो नाम जायते । निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां क्रूराचारविहारवान् । क्षत्रशूद्रवपुर्जन्तुरुग्रो नाम प्रजायते ॥
विप्रस्य त्रिषु वर्णेषु नृपतेर्वर्णयोर्द्वयोः । वैश्यस्य वर्णे चैकस्मिन्षडेतेऽपसदाः स्मृताः ॥
क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः । वैश्यान्मागधवैदेहौ राजविप्राङ्गनासुतौ ॥
शूद्रादायोगवः क्षत्ता चण्डालश्चाधमो नृणाम् । वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसंकराः ॥
एकान्तरे त्वानुलोम्यादम्बष्ठोग्रौ यथा स्मृतौ । क्षत्तृवैदेहकौ तद्वत्प्रातिलोम्येऽपि जन्मनि ॥
पुत्रा येऽनन्तरस्त्रीजाः क्रमेणोक्ता द्विजन्मनाम् । ताननन्तरनाम्नस्तु मातृदोषात्प्रचक्षते ॥
ब्राह्मणादुग्रकन्यायां आवृतो नाम जायते । आभीरोऽम्बष्ठकन्यायामायोगव्यां तु धिग्वणः ॥
आयोगवश्च क्षत्ता च चण्डालश्चाधमो नृणाम् । प्रातिलोम्येन जायन्ते शूद्रादपसदास्त्रयः ॥
वैश्यान्मागधवैदेहौ क्षत्रियात्सूत एव तु । प्रतीपं एते जायन्ते परेऽप्यपसदास्त्रयः ॥
जातो निषादाच्छूद्रायां जात्या भवति पुक्कसः । शूद्राज्जातो निषाद्यां तु स वै कुक्कुटकः स्मृतः ॥
क्षत्तुर्जातस्तथोग्रायां श्वपाक इति कीर्त्यते । वैदेहकेन त्वम्बष्ठ्यामुत्पन्नो वेण उच्यते ॥
द्विजातयः सवर्णासु जनयन्त्यव्रतांस्तु यान् । तान्सावित्रीपरिभ्रष्टान्व्रात्यानिति विनिर्दिशेत् ॥
व्रात्यात्तु जायते विप्रात्पापात्मा भूर्जकण्टकः । आवन्त्यवाटधानौ च पुष्पधः शैख एव च ॥
झल्लो मल्लश्च राजन्याद्व्रात्यान्निच्छिविरेव च । नटश्च करणश्चैव खसो द्रविड एव च ॥
वैश्यात्तु जायते व्रात्यात्सुधन्वाचार्य एव च । कारुषश्च विजन्मा च मैत्रः सात्वत एव च ॥
व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च । स्वकर्मणां च त्यागेन जायन्ते वर्णसंकराः ॥
संकीर्णयोनयो ये तु प्रतिलोमानुलोमजाः । अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥
सूतो वैदेहकश्चैव चण्डालश्च नराधमः । मागधः तथायोगव एव च क्षत्रजातिश्च ॥
एते षट्सदृशान्वर्णाञ्जनयन्ति स्वयोनिषु । मातृजात्यां प्रसूयन्ते प्रवारासु च योनिषु ॥
यथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते । आनन्तर्यात्स्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ॥
ते चापि बाह्यान्सुबहूंस्ततोऽप्यधिकदूषितान् । परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥
यथैव शूद्रो ब्राह्मण्यां बाह्यं जन्तुं प्रसूयते । तथा बाह्यतरं बाह्यश्चातुर्वर्ण्ये प्रसूयते ॥
प्रतिकूलं वर्तमाना बाह्या बाह्यतरान्पुनः । हीना हीनान्प्रसूयन्ते वर्णान्पञ्चदशैव तु ॥
प्रसाधनोपचारज्ञं अदासं दासजीवनम् । सैरिन्ध्रं वागुरावृत्तिं सूते दस्युरयोगवे ॥
मैत्रेयकं तु वैदेहो माधूकं संप्रसूयते । नॄन्प्रशंसत्यजस्रं यो घण्टाताडोऽरुणोदये ॥
निषादो मार्गवं सूते दासं नौकर्मजीविनम् । कैवर्तं इति यं प्राहुरार्यावर्तनिवासिनः ॥
मृतवस्त्रभृत्स्व्नारीषु गर्हितान्नाशनासु च । भवन्त्यायोगवीष्वेते जातिहीनाः पृथक्त्रयः ॥
कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसूयते । वैदेहिकादन्ध्रमेदौ बहिर्ग्रामप्रतिश्रयौ ॥
चण्डालात्पाण्डुसोपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् । आहिण्डिको निषादेन वैदेह्यामेव जायते ॥
चण्डालेन तु सोपाको मूलव्यसनवृत्तिमान् । पुक्कस्यां जायते पापः सदा सज्जनगर्हितः ॥
निषादस्त्री तु चण्डालात्पुत्रमन्त्यावसायिनम् । श्मशानगोचरं सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥
संकरे जातयस्त्वेताः पितृमातृप्रदर्शिताः । प्रछन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः ॥
स्वजातिजानन्तरजाः षट्सुता द्विजधर्मिणः । शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाः स्मृताः ॥
तपोबीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे । उत्कर्षं चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ॥
शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदापह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥
मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः । म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥
ये द्विजानामपसदा ये चापध्वंसजाः स्मृताः । ते निन्दितैर्वर्तयेयुर्द्विजानां एव कर्मभिः ॥
सूतानामश्वसारथ्यमम्बष्ठानां चिकित्सनम् । वैदेहकानां स्त्रीकार्यं मागधानां वणिक्पथः ॥
मत्स्यघातो निषादानां त्वष्टिस्त्वायोगवस्य च । मेदान्ध्रचुञ्चुमद्गूनां आरण्यपशुहिंसनम् ॥
क्षत्त्रुग्रपुक्कसानां तु बिलौकोवधबन्धनम् । धिग्वणानां चर्मकार्यं वेणानां भाण्डवादनम् ॥
चैत्यद्रुमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च । वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥
चण्डालश्वपचानां तु बहिर्ग्रामात्प्रतिश्रयः । अपपात्राश्च कर्तव्या धनं एषां श्वगर्दभम् ॥
वासांसि मृतचैलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम् । कार्ष्णायसमलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ॥
न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषो धर्ममाचरन् । व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह ॥
अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद्भिन्नभाजने । रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ॥
दिवा चरेयुः कार्यार्थं चिह्निता राजशासनैः । अबान्धवं शवं चैव निर्हरेयुरिति स्थितिः ॥
वध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया । वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ॥
वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषयोनिजम् । आर्यरूपमिवानार्यं कर्मभिः स्वैर्विभावयेत् ॥
अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता । पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥
पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा । न कथं चन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥
कुले मुख्येऽपि जातस्य यस्य स्याद्योनिसंकरः । संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा बहु ॥
यत्र त्वेते परिध्वंसाज्जायन्ते वर्णदूषकाः । राष्ट्रिकैः सह तद्राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥
मनु स्मृति/१०/४ – ६१
औशनस स्मृति
सान्तरालकसंयुक्तं सर्वं संक्षिप्य चोच्यते । नृपाद्ब्राह्मणकन्यायां विवाहेषु समन्वयात् ॥
जातः सूतोऽत्र निर्दिष्टः प्रतिलोमविधिर्दिजः । वेदानर्हस्तथा चैषां धर्माणामनुबोधकः ॥
सूताद्विप्रप्रसूतायां सुतो वेणुक उच्यते । नृपायामेव तस्यैव जातो यश्चर्मकारकः ॥
ब्राह्मण्यां क्षत्रियाच्चौर्याद्रथकारः प्रकीर्तितः । वृत्तं च शुद्रवत्तस्य द्विजत्वं प्रतिषिध्यते ॥
यानानां ये च वोढारस्तेषां च परिचारकाः। शूद्रवृत्त्या तु जीवन्ते न क्षात्रं धर्ममाचरेत् ॥
ब्राह्मण्यां वैश्यसंसर्गाज्जातो मागध उच्यते । वन्दित्वं ब्राह्मणानां च क्षत्रियाणां विशेषतः ॥
प्रशंसावृत्तिको जीवेद्वैश्यप्रैषकस्तथा । ब्राह्मण्यां शूद्रसंसर्गाज्जातश्चाण्डाल उच्यते ॥
सीसमाभरणं तेषां कार्ष्णायसमथापि वा । बघ्रीं कण्ठे समावध्य झल्लरी कक्षतोऽपि वा ॥
मलापकर्षणं ग्रामे पूर्वार्धे परिशुद्धिकम् । नापराह्णे प्रविष्टोऽपि बहिर्ग्रामाच्च नैर्ऋते ॥
पिण्डीभूता भवन्त्यत्र नो चेद्वध्या विशेषतः । चाण्डालाद्वैश्यकन्यकायां जातः श्वपच उच्यते ॥
श्वमांसभक्षणं तेषां श्वान एव तु तद्धनम् । नृपायां वैश्यसंसर्गादायोगव इति स्मृतः ॥
तन्तुवाया भवन्त्येते वसुकांस्योपजीविनः । शालिकाः केचिदत्रैव जीवनं वस्त्रनिर्मितम् ॥
आयोगवम्य विप्रायां जातास्ताम्रोपजीविनः । तस्यैव नृपकन्यायां जातः सूनिक उच्यते ॥
सूनिकस्य नृपायां तु जात उद्बन्धकः स्मृतः । निर्णेजयेयुर्वस्त्राणि अस्पृश्याश्च भवन्त्युत ॥
नृपायां वैश्यतश्चौर्यात्पुलिन्दश्चेति कीर्तितः । पशुवृत्तिर्भवेत्तस्य हन्याद्वा दृष्टसत्त्वकान् ॥
नृपायां शूद्रसंसर्गाज्जातः पुल्कस उच्यते । सुरावृत्तिं समारुह्य मधुविक्रयकर्मणा ॥
कृतकानां सुराणां च विक्रेता पाचको भवेत् । पुल्कसाद्वैश्यकन्यायां जातो रजक उच्यते ॥
नृपायां शूद्रतश्चौर्याज्जातो रञ्जक उच्यते । वैश्यायां रञ्जकाज्जातो नर्तको गायको भवेत् ॥
वैश्यायां शूद्रसंसर्गाज्जातो वैदेहकः स्मृतः । अजानां पालनं कुर्यान्महिषीणां गवामपि ॥
दधिक्षीराज्यत्क्राणां विक्रयाज्जीवनं भवेत् । वैदेहकात्तु विप्रायां जाताश्चर्मोपजीविनः ॥
नृपायामेव तस्यैव सूचिकः पाचकः स्मृतः । वैश्यायां शूद्रतश्चौर्याज्जातश्चक्री च उच्यते ॥
तैलपिष्टकजीवी तु लवणं भावयन्पुनः । विधिना ब्राह्मणः प्राप्य नृपायां तु समन्त्रकम् ॥
जातः सुवर्ण इत्युक्तः सानुलोमद्विजः स्मृतः । अथ वर्णक्रियां कुर्वन्नित्यनैमित्तिकीं क्रियाम् ॥
अश्वं रथं हस्तिनं वा वाहयेद्वै नृपाज्ञया । सैनापत्यं च भैषज्यं कुर्याज्जीवेत वृत्तिषु ॥
नृपायां विमतश्चौर्यात्संजातो यो भिषक्स्मृतः । अभिषिक्तनृपस्याऽऽज्ञां प्रतिपाल्य तु वैद्यकः ॥
आयुर्वेदमथाष्टाङ्गं तन्त्रोक्तं धर्ममाचरेत् । ज्यौतिषं गणितं वाऽपि कायिकीं वृत्तिमाचरेत् ॥
नृपायां विधिना विप्राज्जातो नृप इति स्मृतः । नृपायां नृपसंसर्गात्प्रमादाद्गुढजातकः ॥
सोऽपि क्षत्रिय एव स्यादभिषेके तु वर्जितः । अभिषेकं विना प्राप्य गोज इत्यभिधायकः ॥
सर्वं तु राजवत्तस्य शस्यते पट्टबन्धनम् । पुनर्भूकरणे राज्ञां नृपकानीन एव च ॥
वैश्यायां विधिना विप्राज्जातो ह्यम्वष्ठ उच्यते। कृष्याजीवो भवेत्तस्य तथैवाऽऽग्नेयनर्तकः ॥
ध्वजविश्रावका वाऽपि अम्बष्ठाः शत्रजीविनः । वैश्यायां विप्रतश्चौर्यात्कुम्भकारः प्रजायते ॥
कुलालवृत्त्या जीवेत नापिता वा भवन्त्युत । सूतके प्रेतके वाऽपि दीक्षाकालेऽथ वापनम् ॥
नाभेरूर्ध्वं तु वपनं तस्मान्नापित उच्यते । कायस्थ इति जीवेत्तु विचरेच्च इतस्ततः ॥
कालालौल्यं यमात्क्रौर्यं स्थपतेरथ कृन्तनम् । आद्यक्षराणि संगृह्य कायस्थ इति निर्दिशेत् ॥
शुद्रायां विधिना विप्राज्ञ्जातः पारशवो मतः । भद्रकालीं समाश्रित्य जीवेयुः पूजकाः स्मृताः ॥
शिवाचागमविद्याद्यैस्तथा मर्दलवृत्तिभिः । तस्यां वै चौरसद्वृत्तो निषादो जात उच्यते ॥
वने दृष्टमृगान्हत्वा जीवनं मांसविक्रयम् । नृपाज्जातोऽथ गृह्यायां वैश्याया विधिना सुतः ॥
वैश्यवृत्त्या तु जीवेत न क्षात्रं धर्ममाचरेत् । तस्यां तस्यैव चौर्येण मणिकारः प्रजायते ॥
मणीनां राजतां कुर्यान्मुक्तानां वेधनक्रियाम् । प्रवालानां च सूत्रत्वं शङ्खानां वलनक्रियाम् ॥
शूद्रायां विप्रसंसर्गाज्जात उग्र इति रमृतः । नृपस्य दण्डधारः स्यादैण्डं दण्डेषु संचरेत् ॥
तस्यां वै चौरसंवृत्त्या जातः शूलिक उच्यते । जातदुष्टान्समारोप्य शूलकर्मणि योजयेत् ॥
शूद्रायां वैश्यसंसर्गाद्विधिना सूचकः स्मृतः । सूचकाद्विप्रकन्यायांजातस्तक्षक उच्यते ॥
शिल्पकर्माणि चान्यानि प्रासादलक्षणं तथा । नृपायामेव तस्यैव जातो यो मत्स्यबन्धकः ॥
शूद्रायां वैश्यतश्चौर्यात्कटकार इति स्मृतः । वसिष्ठशापात्रेतायां केचित्पारशवास्तथा ॥
वैखानसेन केचित्तु केचिद्भागवतेन च । वेदशास्त्राबलम्बास्ते भविष्यन्ति कलौ युगे ॥
कटकारास्ततः पश्चान्नारायणगणाः स्मृताः । शाखा वैखानसेनोक्ता तन्त्रमार्गविधिक्रियाः ॥
निषेकाद्याः श्मशानान्ताः क्रियाः पूजाङ्गसूत्रधृक् । पञ्चरात्रेण वा कश्चित्तन्त्रोक्तं धर्ममाचरेत् ॥
शूद्रादेव तु शूद्रायां जातः शूद्र इति स्मृतः । द्विजशुश्रूषणपरः पाकयज्ञपरान्वितः ॥
सच्छूद्रं तं विजानीयादसच्छूद्रस्ततोऽन्यथा । चौर्यात्काकवचो ज्ञेया अश्वानां तृणवाहकः ॥
औशनस स्मृति २ – ५०
वशिष्ठ स्मृति
नास्तिकः पिशुनश्चैव कृतघ्न्नो दीर्घरोषकः । चत्वारः कर्मचाण्डालाः जन्मतश्चापि पञ्चमः ॥
दीर्घवैरमसूया च असत्यं ब्रह्मदूषणम् । पैशुन्यं निर्दयत्वं च जानीयाच्छूद्रलक्षणम् ॥
वशिष्ठ स्मृति ६/२२ – २३
शूद्रेण ब्राह्मण्यामुत्पन्नश्रण्डालो भवतीत्याहू राजन्यायां वैणो वैश्यायामन्त्यावसायी ॥
वैश्येन ब्राह्मण्यामुत्पन्नो रामको भवतीत्याहुः, राजन्यायां पुल्कसः ॥
राजन्येन ब्राह्मण्यामुत्पन्नः सूतो भवतीत्याहुः ॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥
छत्रोत्पन्नास्तु ये केचित्प्रातिलोम्यगुणाश्रिताः । गुणाचारपरिभ्रंशात्कर्मभिस्तान्विजानीयुः, इति ॥
एकान्तरव्यन्तरत्र्यन्तरानुजाता ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैरम्ब ष्ठोग्रनिषादा भवन्ति ॥
शुद्रायां पारशवः पारयन्नेव जीवन्नैव शवो भवतीत्याहुः॥
शव इति मृताख्या ॥
एके वै तच्छ्मशानं ये शूद्रास्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्ये तव्यम् ॥
अथापि यमगीताञ्श्लोकानुदाहरन्ति ॥
श्मशानमेतत्प्रत्यक्षं ये शूद्राः पापचारिणः । तस्माच्छूद्रसमीपे तु नाध्येतव्यं कदाचन ॥
न शूद्राय मतिं दद्यानोच्छिष्टं न हविष्कृतम् । न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत् ॥
यश्चास्योपदिशेद्धर्म यश्चास्य व्रतमादिशेत् । सोऽसंवृतं तमो घोरं सह तेन प्रपद्यते, इति ॥
व्रणद्वारे कृमिर्यस्य संभवेत कदाचन । प्राजापत्येन शुध्येत हिरण्यं गौर्वासो दक्षिणा, इति ॥
नाग्निं चित्वा रामामुपेयात् ॥१५॥
कृष्णवर्णा या रामा रमणायैव न धर्माय न धर्मायेति ॥
वशिष्ठ स्मृति १८/१ – १६
वृद्धहारीत स्मृति
ब्राह्मणाः क्षत्रियो वैश्याः शूद्रा वर्णा यथाक्रमम् । आद्यास्त्रयो द्विजाः प्रोक्तास्तेषां वै मन्त्रसत्क्रियाः ॥
सवर्णेभ्यः सवर्णासु जायन्ते हि सजातयः । तेषां संकरयोगाच्च प्रतिलोमानुलोमजाः ॥
विप्रान्मूर्धाभिषिक्तस्तु क्षत्रियायामजायत । वैश्यायां तु तथाऽऽम्बष्ठो निषादः शूद्रया तथा ॥
राजन्याद्वैश्यशूद्र्यां तु माहिष्योग्रौ तु तौ स्मृतौ । शूद्र्यां वैश्यात्तु करणस्थिरैर्वा तेऽनुलोमजाः ॥
विप्रायां क्षत्रियात्सूतो वैश्याद्वैदेहिकस्तथा । चण्डालस्तु ततः शूद्रात्सर्वकर्मसु गर्हितः ॥
मागधः क्षत्रियायां वै वैश्याक्षत्रात्तु शूद्रतः । शूद्रादायोगवं वैश्या जनयामास वै सुतम् ॥
रथकारः करण्यां तु माहिष्येण प्रजायते । असत्संततयो ज्ञेयाः प्रतिलोमानुलोमजाः ॥
प्रतिलोमासु वै जाता गर्हिताः सर्वकर्मणां । एतेषां ब्राह्मणाद्याश्च षट्कर्मसु नियोजिताः ॥
त्रिकर्मसु क्षत्रविशावेकस्मिञ्शूद्र्योनिजः । प्रतिग्रहं च वृत्त्यर्थं ब्राह्मणस्तु समाचरेत् ॥
वृद्धहारीत स्मृति ७/१४९ – १५७
जीवेद्यायावरेणैव विप्रः सर्वत्र सर्वदा । वर्जयित्वैव पाषण्डान्पतितांश्चान्यदैविकान् ॥
कृषिणा वाऽपि जीवेत सतां चानुमतेन वा ॥
न वाहयेदनहुहं क्षुधितं श्रान्तमेव च । तस्य पुंस्त्वमहित्वैव वाहयेद्विजपुंगवः ॥
कर्मलोपमकुर्वन्वै कृषिं कुर्वीत वै द्विजः । हरेः पूजां यथाकालं कृषिलोपे समाचरेत् ॥
न ब्राह्म्यं संत्यजेद्विप्रस्तथा यज्ञादिकर्म च । आपद्यपि न कुर्वीत सेवां वाणिज्यमेव च ॥
असत्प्रतिग्रहं स्तेयं तथा धर्मस्य विक्रयम् । अन्यायोपार्जितं द्रव्यमापद्यपि विवर्जयेत् ॥
भृतकाध्यापनं चैव न कुर्याद्वेदविक्रयस् । विदित्वैवं च सद्वृत्तिमेवं जीवति धार्मिकः ॥
महाभागवते दत्तं यत्किंचिन्मिश्रितं भवेत् । असत्यतिगृहीतं त्वविमलं तन्न संशयः ॥
प्रीतये वासुदेवस्य यद्दत्तमसतामपि । महाभागवतस्पर्शात्तत्सदित्युच्यते बुधैः ॥
तापादिपञ्चसंस्कारैस्तथाकारैस्त्रिभिर्युतः । हरेरनन्यशरणो महागवतः स्मृतः ॥
यक्षराक्षसभूतानां तामसानां दिवौकसाम् । तेषां यत्भीतये दत्तं तथा यद्यपि वर्जयेत् ॥
बुद्धरुद्रौ तथा वायुर्दुर्गागर्णपभैरवाः । यमः स्कन्दो नैर्ऋतश्च तामसा देवताः स्मृताः ॥
एवं विशुद्धिं द्रव्यस्य ज्ञात्वा गृह्णीत सत्तमः । कृषिस्तु सर्ववर्णानां सामान्यो धर्म उच्यते ॥
प्रतिग्रहस्तु विप्राणां राज्ञां क्ष्मापालनं तथा । कुसीदं चैव वाणिज्यं विशामेव प्रकीर्तितम् ॥
सेवावृत्तिस्तु शूद्राणां कृषिर्वा संप्रकीर्तिता । अशक्तस्तु भवेद्राजा पृथिव्याः परिपालने ॥
जीवेद्वाऽपि विशां वृत्त्या शूद्राणा वा यथासुखम् । कृषिर्भृतिः पाशुपाल्यं सर्वेषां न निषिध्यते ॥
स्तेयं परस्त्रीहरणं हिंसा कुहककौतुके । स्त्रीमद्यमांसलवणविक्रयं पतितं स्मृतम् ॥
अपकृष्टनिकृष्टानां जीवितं शिल्पकर्मभिः । हीनं तु प्रतिलोमानामहीनमनुलोमिनाम् ॥
चर्मवैणववस्त्राणां हिंसाकर्म च नेजनम् । गाणिक्यं यवनाद्यं च मद्यमांसक्रिया तथा ॥
सारथ्यं वाहकानां च रथानां भूभृतामपि । एवमादि निषिद्धं यत्प्रातिलोमक्षम्यं तदुच्यते ॥
यत्सौम्य शिल्पं लोकेऽस्मिन्सौम्यं तदनुलोमकम् । मृद्दारुशैललोहानां शिल्पं सौम्यमिहोच्यते ॥
न्यायेन पालयेद्राजा पृथिवीं शास्त्रमार्गतः । स्वराष्ट्रकृतधर्मस्य सदा षड्भागसिद्धये ॥
राज्ञां राष्ट्रकृतं पापमिति धर्मविदो विदुः । तस्मादपापसंयुक्तां यथा संरक्षयेद्भुवम् ॥
वृद्धहारीत स्मृति ७/१६८ – १८९
बौधायन स्मृति
चत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः ॥
तेषां वर्णानुपूर्व्येण चतस्रो भार्या ब्राह्मणस्य ॥
तिस्रो राजन्यस्य ॥ द्वे वैश्यस्य ॥ एका शूद्रस्य ॥
तासु पुत्राः सवर्णानन्तरासु सवर्णाः ॥
एकान्तरद्वयन्तरास्वम्बष्ठोग्रनिषादाः ॥
प्रतिलोमास्वायोगवमागधवैणक्षत्रपुल्कसकुक्कुटवैदेहकचण्डालाः ॥
अम्बष्ठात्प्रथमायां श्वपाकः ॥ उग्राद्वितीयायां वैणः ॥
निषादात्तृतीयायां पुल्कसः ॥ विपर्यये कुक्कुटः ॥
निषादेन निषाद्यामा पञ्चमाज्जातोऽपहन्ति शूद्रताम् ॥
तमुपनयेत्षष्ठं याजयेत् ॥
सप्तमो विकृतबीजः समबीजः सम इत्येकेषां संज्ञाः क्रमेण निपतन्ति ॥
त्रिषु वर्णेषु सादृश्यादव्रतो जनयेत्तु यान्।
तान्सावित्रीपरिभ्रष्टान्व्रात्यानाहुर्मनीषिणो व्रात्यानाहुर्मनीषिण इति ॥
बौधायन स्मृति/१/८/१ – १६
रथकाराम्बष्ठसूतोग्रमागधायोगववैणक्षत्तृपुल्कसकुक्कुटवैदेहकचण्डालश्वपाकप्रभृतयः ॥
तत्र सवर्णासु सवर्णाः ॥
ब्राह्मणात्क्षत्रियायां ब्राह्मणो वैश्यायामम्बष्ठः शूद्रायां निषादः ॥ पारशव इत्येके ॥
क्षत्रियाद्वैश्यायां क्षत्रियः शूद्रायामुग्रः ॥ वैश्याच्छूद्रायां रथकारः ॥
शूद्राद्वैश्यायां मागधः क्षत्रियायां क्षत्ता ब्राह्मण्यां चण्डालः ॥
वैश्यात्क्षत्रियायामायोगवो ब्राह्मण्यां वैदेहकः ॥
क्षत्रियाद्ब्राह्मण्यां सूतः ॥ तत्राम्बष्ठोग्रसंयोगे भवत्यनुलोमः ॥
क्षत्तृवैदेहकयोः प्रतिलोमः ॥ उग्राज्जातः क्षत्रयां श्वपाकः ॥
वैदेहकादम्बष्ठायां वैणः ॥ निषादाच्छूद्रायां पुल्कसः ॥ शुद्रान्निषाद्यां कुक्कुटः ॥
वर्णसंकरादुत्पन्नान्व्रात्यानाहुर्मनीषिणो व्रात्यानाहुर्मनीषिण इति ॥
बौधायन स्मृति/१/९/१ – १६
याज्ञवल्क्य स्मृति
सवर्णेभ्यः सवर्णासु जायन्ते हि सजातयः । अनिन्द्येषु विवाहेषु पुत्राः संतानवर्धनाः ॥
विप्रान्मूर्धावसिक्तो हि क्षत्रियायां विशः स्त्रियां । अम्बष्ठः शूद्र्यां निषादो जातः पारशवोऽपि वा ॥
वैश्याशूद्र्योस्तु राजन्यान्माहिष्योग्रौ सुतौस्मृतौ । वैश्यात्तु करणः शूद्र्यां विन्नास्वेष विधिः स्मृतः ॥
ब्राह्मण्यां क्षत्रियात्सूतो वैश्याद्वैदेहकस्तथा । शूद्राज्जातस्तु चण्डालः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥
क्षत्रिया मागधं वैश्याच्छूद्रात्क्षत्तारमेव च । शूद्रादायोगवं वैश्या जनयामास वै सुतम् ॥
माहिष्येण करण्यां तु रथकारः प्रजायते । असत्सन्तस्तु विज्ञेयाः प्रतिलोमानुलोमजाः ॥
जात्युत्कर्षो युगे ज्ञेयः सप्तमे पञ्चमेऽपि वा । व्यत्यये कर्मणां साम्यं पूर्ववच्चाधरोत्तरम् ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति/१/९० – ९६
दासनापितगोपाल कुलमित्रार्धसीलिणः । एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत् ॥
शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । संस्कारात्तु भवेद्दासः असंस्कारात्तु नापितः ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां समुत्पन्नस्तु यः सुतः । स गोपाल इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥
वैश्यकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । स ह्यार्धिक इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥
पराशर स्मृति ११/२१ – २४
ब्राह्मण्यां शूद्रजनितश्चण्डालो धर्मवर्जितः । कुमारीसंभवस्त्वेकः सगोत्रायां द्वितीयकः ॥
ब्राह्मण्यां शूद्रजनितश्चण्डालस्त्रिविधः स्मृतः । वर्धकी नापितो गोप आशापः कुम्भकारकः ॥
वणिक्किरातकायस्थमालाकारकुटुम्बिनः । एते चान्ये च बहवः शूद्रा भिन्नाः स्वकर्मभिः ॥
चर्मकारो भटो भिल्लो रजकः पुष्करो नटः । वराटो मेदचाण्डालौ दाशः श्वपचकोलिकाः ॥
एतेऽन्त्यजाः समाख्याता ये चान्ये च गवाशनाः । एषां संभाषणात्स्नानं दर्शनादर्कवीक्षणम् ॥
वेदव्यास स्मृति १/९ – १३
ज्ञाताःसवर्णाम्बष्ठोग्रनिषाददौष्यन्तपारशवाः ॥
प्रतिलोमास्तु सूतमागधायोगवकृतवैदेहकचण्डालाः ॥
गौतम धर्मसूत्र
“धर्म की जितनी हानि स्वतंत्र भारत में हुई, उतनी आक्रांताओं के काल में भी नहीं हुई।”
प्रस्तुत आलेख मुख्य रूप से इस विचार को प्रतिपादित करते हैं कि जाति व्यवस्था भारतीय संस्कृति की एक प्राचीन और शास्त्रसम्मत संरचना है, जिसे अंग्रेजों या आधुनिक राजनीति ने उत्पन्न नहीं किया है। शास्त्रों के प्रमाणों का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि विभिन्न जातियों की उत्पत्ति वर्णों के मध्य हुए अनुलोम और प्रतिलोम संबंधों से हुई है, जिसका विस्तृत विवरण मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथों में मिलता है।

जाति व्यवस्था मूलतः सामाजिक कार्यों के विभाजन और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण की एक पद्धति है जो जन्म पर ही आधारित है। निष्कर्षतः, यह पाठ पाठकों को विदेशी विचारधारा का चश्मा त्यागकर भारतीय शास्त्रों के आधार पर अपनी विरासत को समझने का आग्रह करता है। यह स्पष्ट किया गया है कि रामायण और महाभारत काल में जातियों की उपस्थिति इसके शाश्वत होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
निष्कर्ष
“भारतीय संस्कृति को समझना है तो विदेशी चश्मा उतारना होगा।”
उपर्युक्त विस्तृत प्रमाणों के अवलोकन से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि जाति व्यवस्था भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न और प्राचीन अंग है। शास्त्रों में अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न संतानों को विशिष्ट संज्ञाएं (जैसे सूत, वैदेहक, चण्डाल, अम्बष्ठ आदि) दी गई हैं, जिन्होंने कालांतर में अपनी कार्यशैली और कुल के आधार पर जातियों का रूप लिया।
अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को समाप्त नहीं किया, बल्कि अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत इसे ‘जातिवाद’ की विकृति में बदल दिया। स्वतंत्र भारत के राजनीतिक दलों ने भी सत्ता के लालच में शास्त्रों को दोष देकर जनमानस को भ्रमित किया है। वास्तविकता यह है कि जाति व्यवस्था समाज के कार्यों के सूक्ष्म विभाजन और वंशानुगत गुणों के संरक्षण की एक वैज्ञानिक पद्धति थी, जिसे आज राजनीतिक स्वार्थ हेतु विवादित बना दिया गया है।
F&Q :
FAQ
प्रश्न: क्या जाति व्यवस्था अंग्रेजों ने बनाई थी?
उत्तर: नहीं; यह असत्य है। वर्ण चार हैं (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)। इन वर्णों के आपसी मिश्रण (संकर) से उत्पन्न समूहों को ‘जाति’ कहा गया।
प्रश्न: अनुलोम और प्रतिलोम विवाह क्या हैं?
उत्तर: उच्च वर्ण के पुरुष का निम्न वर्ण की स्त्री से विवाह ‘अनुलोम’ और निम्न वर्ण के पुरुष का उच्च वर्ण की स्त्री से विवाह ‘प्रतिलोम’ कहलाता है।
प्रश्न: क्या जातियों के कर्म भी शास्त्रों में निर्धारित हैं?
उत्तर: हाँ, मनुस्मृति के 10वें अध्याय में सूत, अम्बष्ठ, मागध आदि जातियों के विशिष्ट कर्म विस्तार से बताए गए हैं।
प्रश्न: रामायण और महाभारत में जाति के क्या प्रमाण हैं?
उत्तर: निषाद राज गुह, भील, रजक, विदुर, सूत पुत्र कर्ण आदि पात्रों के माध्यम से जातियों की उपस्थिति स्पष्ट दिखती है।
प्रश्न: स्मृतियों को प्रमाण क्यों मानना चाहिए?
उत्तर: क्योंकि स्मृतियाँ वेदों के व्यावहारिक कार्यान्वयन के लिए ऋषियों द्वारा रचित आचार संहिताएं हैं।
प्रश्न: आधुनिक शिक्षा पद्धति इस विषय में क्या गलती करती है?
उत्तर: आधुनिक शिक्षा केवल पश्चिमी इतिहासकारों के नजरिए से इतिहास पढ़ाती है और मूल संस्कृत ग्रंथों की उपेक्षा करती है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख का उद्देश्य केवल प्राचीन स्मृतियों और धर्मशास्त्रों में वर्णित तथ्यों को सूचनात्मक एवं शैक्षणिक दृष्टि से प्रस्तुत करना है। इसमें संकलित श्लोक और विचार शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित हैं। हम किसी भी जाति, समुदाय या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का उद्देश्य नहीं रखते। पाठक इन प्रमाणों को ऐतिहासिक और भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में ही ग्रहण करें। इस आलेख का विचार और विश्लेषण विदेशी विचारधाराओं से नहीं किया जा सकता अपितु भारतीय शास्त्रों के आधार पर ही किया जा सकता है और मूलतः यहां शास्त्रों के ही प्रमाणों को संकलित किया गया है एवं उसे समझने हेतु कुछ भूमिका बांधी गयी है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








