धर्म निर्णय

धर्म निर्णय

“अल्पज्ञ का कुतर्क विद्वान के शास्त्रसम्मत निर्णय को खंडित नहीं कर सकता।”

हम यहां धर्म निर्णय के विषय में चर्चा करने जा रहे हैं कि धर्म का निर्णय कैसे होगा, कौन कर सकते हैं आदि। यदि हम धर्म निर्णय की बात करें तो सभी निर्णय शास्त्रों में और अन्यान्य विविध पुस्तकों में भरे परे होते हैं अर्थात इस दृष्टिकोण से तो करने की आवश्यकता ही नहीं है पुस्तकों का अध्ययन करके कोई भी स्वयं ही कर सकता है। और यदि ऐसा ही हो तो इस प्रश्न का ही कोई औचित्य नहीं रह जाता। तथापि प्रश्न का भी औचित्य है और धर्म निर्णय भी निरंतर होता ही रहता है।

एक पक्ष सामूहिक है और दूसरा पक्ष व्यक्तिगत है और दोनों ही पक्षों में सदैव निर्णय की आवश्यकता होती है। यहीं पर प्रश्न आता है कि यह निर्णय किस प्रकार होने चाहिये और कौन करे एवं इसी विषय को समझने का यहां प्रयास किया जा रहा है।

धर्म निर्णय

“ब्राह्मण की श्रेष्ठता आयु या धन से नहीं, बल्कि उसके शास्त्र-ज्ञान से निर्धारित होती है।”

जाति में परिवर्तन नहीं हो सकता ऐसा एक न्यायिक निर्णय पटना उच्च न्यायालय से किया गया है जो विदित हुआ। इस निर्णय के न्यायिक पक्ष आदि को तो हम नहीं लेंगे किन्तु इससे उन लोगों की राजनीति को ठेस पहुंचेगी जो कर्मणा वर्णव्यवस्था का राग अलापते थे। जाति से तात्पर्य जन्मना पक्ष को न्यायपालिका ने स्वीकार कर लिया है। अर्थात यहां यदि हम ब्राह्मण की बात करेंगे तो उसका प्रथम तात्पर्य जन्मना ब्राह्मण ही होगा, द्वितीय तात्पर्य वो जन्मना ब्राह्मण जो विद्वान भी हों और विद्वान होने का तात्पर्य शास्त्र के ज्ञाता।

अलपज्ञ, मूर्ख आदि ही जाति से ब्राह्मण की श्रेणी में गण्य होते हैं, और ब्राह्मण का तात्पर्य जन्मना विद्वान ब्राह्मण ही होता है। ब्राह्मण जाति (मात्र) का तात्पर्य होता है कि जन्मना ब्राह्मण तो है अर्थात जाति से ब्राह्मण तो है किन्तु ज्ञान-कर्म आदि से युक्त नहीं है।

धर्म का निर्णय ब्राह्मण ही कर सकते हैं

ब्राह्मण और ब्राह्मण जाति को स्पष्ट करना इसलिये आवश्यक था कि संपूर्ण रूप से धर्म निर्णय इन्हीं पर केंद्रित है। अर्थात धर्म विषयक निर्णय कौन करे इसका सीधा उत्तर है कि ब्राह्मण करें या ब्राह्मण ही कर सकते हैं। ब्राह्मण का तात्पर्य विद्वान ब्राह्मण ही है न कि जाति मात्र।

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संरकारैर्द्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं श्रोत्रियस्त्रिभिरेव च ॥
वेदशास्त्राण्यधीते यः शास्त्रार्थं च निषेवते । तदाऽसौ वेदवित्योक्तो वचनं तस्य पावनम् ॥
एकोऽपि वेद‌विद्धर्मं यं व्यवस्येद्विजोत्तमः । स ज्ञेयः परमो धर्मो नाज्ञानामयुतायुतैः ॥

अत्रि संहिता १४१-१४४

धर्मशास्त्र रथारूढा वेदखङ्गधरा द्विजाः । क्रीडार्थमपि यद्ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥
लघु शातातप स्मृति १७१, बौधायन स्मृति १/१/१४, स्कन्द पुराण ४/४०/३८

देवाः परोक्षदेवाः, प्रत्यक्षदेवा ब्राह्माणाः ॥
ब्राह्मणैर्लोका धार्यन्ते ॥
ब्राह्मणानां प्रसादेन दिवि तिष्ठन्ति देवताः ।
ब्राह्मणाभिहितं वाक्यं न मिथ्या जायते क्वचित् ॥
यद्ब्राह्मणास्तुष्टतमा वदन्ति तद्देवताः प्रत्यभिनन्दयन्ति ।
तुष्टेषु तुष्टाः सततं भवन्ति प्रत्यक्षदेवेषु परोक्षदेवाः ॥

विष्णु स्मृति १९/२०-२३

धर्म का निर्णय ब्राह्मण ही कर सकते हैं

इस विषय में एक तथ्य यह भी आता है कि ऐसे निर्णय (विशेष रूप से व्रत-पर्वों में) राष्ट्रीय स्तर पर करके एकरूपता क्यों नहीं लायी जाती। वास्तव में व्रत-पर्वादि के विषय में कोई प्रसिद्ध कथावाचक आदि तिथि बताता है तो वह स्वयं ही अपराधी है क्योंकि उसे स्वयं ही ज्ञात नहीं होता कि कौन सा व्रत-पर्व किसे क्षेत्र में कब होगा ? वह अपने क्षेत्रीय विद्वानों के निर्णय को जो कि क्षेत्रीय होता है बड़े मंच से देश को बता देता है और विवाद का आरम्भ कर देता है।

प्रसिद्ध कथावाचक होने का तात्पर्य शास्त्रज्ञ होना नहीं है, वो किसी एक – दो पुराण/रामायण/महाभारत आदि का अध्ययन भी नहीं प्रशिक्षण प्राप्त करके प्रपंच से प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है। बड़े-बड़े विद्वान आचार्य भी प्रवचन करते हैं किन्तु वो उतने प्रसिद्ध नहीं हैं अर्थात उनके सोशल मीडिया आदि के दर्शक बड़ी संख्या में नहीं हैं किन्तु उनके समक्ष ये बड़े दर्शकों वाले कथावाचक क्षणभर भी शास्त्रचर्चा करने में सक्षम नहीं होते। रामकथा तो एक नेता और कवि भी कहने लगा है और उसके भी बहुत दर्शक हैं तो क्या वह विद्वान मान्य होगा अर्थात नहीं हो सकता।

यदि दूरदर्शन पर बैठने वाले ज्योतिषियों की भी बात करें तो वो ब्राह्मण की श्रेणी में गण्य नहीं होते भले ही ज्योतिष का अध्ययन क्यों न कर रखे हों अर्थात अनधिकारी हैं और यदि पत्रकार आदि की बात करें तो वो लोग तो ऐसा करके पाप कर रहे हैं। व्रत-पर्वादि का निर्णय देने वाले विद्वान जब निर्णय देंगे तो वो यह भी स्पष्ट करेंगे कि अमुक क्षेत्र में इस तिथि को मान्य है अमुक क्षेत्र में नहीं। अमुक (दृश्य/अदृश्य) पंचाग के आधार पर ऐसा और ऐसा है।

क्योंकि व्रत-पर्व सदैव देशभर में एक दिन हो यह संभव ही नहीं है यथा; यदि पूर्वी भारत में एकादशी तिथि सूर्योदय के आधे घंटे बाद तक है तो वहां उस दिन एकादशी होगा किन्तु पश्चिमी भारत में सूर्योदय पूर्व ही एकादशी समाप्त हो जाएगी तो वहां एक दिन पूर्व ही एकादशी व्रत होगा। इसी प्रकार अन्यान्य व्रत-पर्व भी राष्ट्रीय स्तर पर एक दिन ही नहीं हो सकता ये मनमाना निर्णय नहीं होता है और जो लोग इस एकरूपता को लाने की चर्चा करते हैं, प्रयास करके सीना चौड़ा करते हैं वो लोग मूर्ख हैं, शास्त्र के विषय में और ज्योतिष के विषय में भी रत्ती भर ज्ञान नहीं रखते।

अब बात धर्म निर्णय की करें तो जब ये साधारण व्रत-पर्व के निर्णय में देश और जनमानस को दिग्भ्रमित करते रहते हैं तो इन लोगों से धर्म निर्णय की अपेक्षा ही क्या करें। अब आगे बात वैष्णव, शैव आदि सम्प्रदायों की करें तो ये लोग स्वयं ही अपनी मान्यता के अनुकूल शास्त्रों को स्वीकारते हैं शेष को अस्वीकार कर देते हैं, यथा बलि विधान। वैष्णव सम्प्रदाय बलि विधान को अशास्त्रीय कहने में भी पीछे नहीं हटता जबकि वेदविहित भी है।

शास्त्रों में वेदविहित हिंसा को भी अहिंसा ही कहा गया है। अर्थात ये जो बलि को अशास्त्रीय सिद्ध करने वाले हैं किस प्रकार से विद्वान कहे जा सकते हैं। ये लोग आज यत्र-तत्र अन्यान्य क्षेत्रों में भी अपने संप्रदाय का ही प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और सभी क्षेत्रों की मूल परम्परा का ही उच्छेदन कर रहे हैं। उदाहरण :

एक शताब्दी पूर्व गृहस्थ ब्राह्मण ही गुरु होते थे, ब्राह्मणों के लिये अभी भी होते हैं। किन्तु अब ये लोग जो बाल्यकाल में घर छोड़कर भाग गए थे बड़े-बड़े महंथ बन बैठे हैं । उनसे पूछो कि क्या आप गृहस्थ हैं तो उत्तर मिलेगा नहीं, आश्रम की बात करें तो ज्ञात होना ही कठिन होगा कि किस आश्रम में हैं; ब्रह्मचारी हैं अथवा सन्यासी ज्ञात ही नहीं और कान फूंकते फिर रहे हैं।

लेकिन यह तो स्पष्ट हो ही चुका है कि धर्म का निर्णय विद्वान ब्राह्मण ही कर सकते हैं और इसमें भी अतिक्रमण दोष को सम्मिलित करके ही विचार किया जायेगा। अतिक्रमण दोष का तात्पर्य होता है कि निकटतम विद्वान और योग्य ब्राह्मण का द्वेष/विरोध आदि किसी भी कारण से त्याग करके अन्यान्य अल्पज्ञों का भी चयन कर लेना। किन्तु निकटतम मूर्ख का त्याग करके दूरस्थ विद्वान का वरण करने में अतिक्रमण दोष नहीं होता है।

विषय प्रवेश से भी रहित स्वघोषित पंडित अनर्थकारी

“निकटस्थ विद्वान की उपेक्षा कर दूरस्थ अल्पज्ञ का वरण करना ‘अतिक्रमण दोष’ है।”

किसी भी विषय में विचार-विमर्श हेतु उस विषय का ज्ञाता होना अनिवार्य होता है और विशेषज्ञ का विचार मान्य होता है। जिसका विषय में प्रवेश हो वही विशेषज्ञ के तथ्यों/विवेचनों को समझ भी सकता है यदि विषयप्रवेश भी न हो तो विशेषज्ञ का कथन मान्य होता है, भले ही समझें अथवा नहीं।

किन्तु कर्मकाण्ड और धर्म के विषय में विचित्र व चिंताजनक स्थिति है वो यह कि विशेषज्ञ का प्रामाणिक वक्तव्य और विश्लेषण भी जिनका विषयप्रवेश नहीं है उनकी समझ में नहीं आता किन्तु स्वीकार भी नहीं करना चाहते, कारण यह है कि अधिकांशतः कर्मकाण्डी शास्त्रज्ञान रहित हैं किन्तु प्रतिष्ठित तो हैं ।

विशेषज्ञ द्वारा प्रस्तुत प्रामाणिक तथ्य स्वीकारने में अहंकार अड़चन उत्पन्न करता है और प्रतिष्ठा धूमिल होने की शंका उत्पन्न होती है अथवा यह भाव आता है कि विशेषज्ञ की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और यदि अस्वीकार करें तो हमारी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। यहीं से शास्त्र प्रवेश नहीं होना सिद्ध हो जाता है क्योंकि यदि शास्त्रप्रवेश मात्र हो तो कर्मकाण्डी किसी भी प्रमाण को अस्वीकार कर ही नहीं सकता किन्तु बहुत ऐसा करते हैं, स्पष्ट कहते हैं नहीं मानूंगा ।

ऐसे व्यक्ति विद्वान के अभाव में ग्राह्य हो सकते हैं किन्तु आयु, धन, जनबल आदि के अहंकार से मनमुखी निर्णय भी देते रहते हैं जबकि यह ब्रह्मघात है किन्तु शास्त्र प्रवेश न होने के कारण इतना भी नहीं जानते। शास्त्रज्ञ के पास ही निर्णय का अधिकार होता है, अज्ञ को नहीं। सत्य को स्वीकार करना कल्याणकारी है किन्तु असत्य का आधार लेना अकल्याण का भागी बनाता है।

मैं अनुभव कर रहा हूं कि मेरी बात जिसे समझ भी नहीं पाता वो भी चिल्ला-चिल्लाकर बकने का अनर्थ करता है। कारण कि असत्य और अनुचित का ही पक्ष लेना है, भले ही प्रमाण को अस्वीकार करना पड़े, शास्त्र को ही अस्वीकार करना पड़े।

ऐसे कुकर्मी निःसंदेह धिक्कार के योग्य होते हैं जो प्रामाणिक चर्चा में अक्षम होकर समझना भी नहीं चाहते। निश्चित रूप से ऐसी मूर्खता भी पाप ही है। मैं उसे भी सुनने का प्रयास अवश्य करता हूं जो कुतर्क रचता है, प्रामाणिक चर्चा करने वालों को न सुनूं, समझने का प्रयास न करूं इसमें तो अपनी हानि दिखती है। अधिकांशतः स्वयं शास्त्र प्रवेश नहीं रखते इस कारण शास्त्रसम्मत विषय में रुचि भी उत्पन्न नहीं हो पाती।

ये प्रामाणिक तथ्य तो है किन्तु मनमुखी धारणा और उचित में से झुकाव उचित के प्रति न होकर मनमुखी धारणा की ओर होती है। भोजन के विषय को ही लें कभी उचित चर्चा हो भी तो मनमुखी धारणा के अनुरूप ही स्वीकार करेंगे, शास्त्रीय पक्ष को सुन लें यह भी बड़ी बात है अर्थात् सुन भी नहीं सकते। चर्चा के मध्य में ही व्यवहार कहकर, देश-काल-परिस्थिति कहकर, मन चंगा कठौती में गंगा कहकर या इसी प्रकार से कुछ और कहकर चर्चा को ही रोकेंगे, अंत में यह भी कह सकते हैं कि मैं ये सब नहीं मानता। लेकिन मछली-मांस की चर्चा में वो भी विशेषज्ञ बनकर निर्णय देते मिलते हैं।

यहां हम समस्या को स्पष्ट कर रहे हैं कि कुछ न जानते हुए भी हर कोई धर्म और कर्मकाण्ड का विशेषज्ञ बनकर निर्णय देते रहता है। यहां भी कर्मकाण्डी ब्राह्मण की बात पर विश्वास करके उसका पालन करना शास्त्र का ही निर्देश है अर्थात् ब्राह्मण का निर्णय मान्य होगा यह भी शास्त्र ही बताता है और इसी कारण ब्राह्मण वचन का महत्व है। जो शास्त्र ब्राह्मण के वचन को परम धर्म कहते हैं यदि ब्राह्मण उस शास्त्र को ही नहीं मानता ऐसा कहने वाले हैं उनकी जिह्वा नहीं गल जाती ये भी बड़ी कृपा है।

परम धर्म : विद्वान ब्राह्मण का वचन

“विद्वान ब्राह्मण का वचन ही परम धर्म है, अज्ञानियों की भीड़ का निर्णय नहीं।”

यदि प्रथम पक्ष यह है कि विद्वान ब्राह्मण का वचन ही परम धर्म है और अंतिम तथ्य यह कि ब्राह्मण के वचन का ही देवतादि समर्थन करते हैं।

अंतिम निष्कर्ष यह है कि धर्म-कर्मकाण्ड के विषय में विद्वान ब्राह्मण का वचन बाध्यकारी भी होता है। यदि उसमें कुछ विसंगतिपूर्ण हो तो भी उसका पालन करना ही धर्म होता है और मनोनुकूल प्रवृत्ति हेतु वचन में त्रुटि/विसंगति ढूंढना पाप है। जिस ब्राह्मण से निर्णय, वचन लेना हो उनकी विद्वत्ता, शास्त्रज्ञान प्रथम ही परख ले और उपर्युक्त अवसर पर जो निर्णय/वचन प्राप्त हो उसका पूर्ण निष्ठा से पालन करे ।

ये तथ्य मुख्य रूप से ब्राह्मणों को ही अधिक समझने की आवश्यकता है क्योंकि मैंने ब्राह्मण वर्ग में ही अनुभव किया है कि आंमत्रित भी विद्वान समझकर करते हैं किन्तु मनोनुकूल निर्णय की भी अपेक्षा रखते हैं और भरपूर प्रयास करते हैं कि जो प्रामाणिक निर्णय दिया गया है उससे पीछे हट जायें और हमारे मनोनुकूल ही कहें । ब्राह्मण वर्ग के प्रति इस विषय में भी कुछ तथ्य इस प्रकार हैं :

  • धर्म – कर्म में हुई किसी प्रकार की त्रुटि/छिद्र का निवारण भी ब्राह्मण के वचन से होता है।
  • यदि आप ब्राह्मण के वचन/निर्णय में दोष निकालने लगे तो फिर आपके दोष या त्रुटि का निवारण कैसे होगा अर्थात् नहीं होगा।
  • अथवा यदि अपने मनोनुकूल वचन/निर्णय के लिये ब्राह्मण को ही बाध्य कर दिया तो फिर अब वहां धर्म बचा क्या?

जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि । सर्वं भवति निश्छिद्रं यस्य चेच्छन्ति ब्राह्मणाः ॥
ब्राह्मणा यानि भाषन्ते मन्यन्ते तानि देवताः । सर्वदेवमया विप्रा न तद्वचनमन्यथा ॥

शातातप स्मृति १/३० – ३१

वचन/निर्णय किसका मान्य ?

यह स्पष्ट होने के पश्चात कि विद्वान ब्राह्मण का वचन ही परम धर्म है अर्थात निर्णय देना उनका दायित्व है और उसका पालन करना ही धर्म है; तो आगे यह प्रश्न आता है कि निर्णय किसका माने ?इस प्रश्न का कारण यह है कि जितनें मुंह उतनी बातें और यदि किसी की भी उपेक्षा/अवज्ञा करें तो वो ब्राह्मण की ही उपेक्षा/अवज्ञा कही जायेगी। यदि उपेक्षा/अवज्ञा का विचार करें तो ये कोई सोचता ही नहीं है अन्यथा एक ही प्रश्न १० ब्राह्मण से नहीं करता।

मान लीजिये किसी ने मुझसे कोई प्रश्न किया और यदि वो इस तथ्य से अवगत है कि जो निर्णय दिया गया वही परम धर्म है तो उसके लिये किसी अन्य से पूछने अब अवकाश ही कहां बचा, यदि किसी अन्य से भी वह प्रश्न कर रहा है तो मेरे प्रति अविश्वास के कारण, आस्था रहित होने के कारण।

अवज्ञा तो कर ही रहा है और जितने मुंह उतनी बातें वाला संकट तभी उपस्थित भी होगा।जिसकी मानसिक स्थिति ऐसी होती है वही अनेकों से प्रश्न भी करता है और पुनः “जितने मुंह उतनी बातें” चिल्लाकर अपने मनोनुकूल वचन जिसका हो उसको ग्रहण करता है। उसे यह भी ज्ञान नहीं होता कि एक अपराध कर चुका है और दूसरा अपराध भी ब्राह्मणों की निंदा करके कर रहा है। मनोनुकूल निर्णय किसी के मुंह से निकले इसलिये तो अनेकों से पूछ रहा था। स्पष्ट है जो सदैव मनोनुकूल निर्णय ही देते हैं और शास्त्रीय संदर्भ/प्रमाण कभी नहीं देते वो निर्णय देने के अधिकारी ही नहीं होते।

जितने मुंह उतनी बातें
जितने मुंह उतनी बातें

आपत्काल में जब विद्वान ब्राह्मण उपस्थित न हों अथवा उनसे निर्णय लेना संभव न हो तो जो उपस्थित हों उनसे भी निर्णय लिया जा सकता है।यदि जितने मुंह उतनी बातें हों तो यही वो अवसर होता है जब योग्य विद्वान की पहचान की जा सकती है। सबसे पुनर्प्रश्न किया जा सकता है उसका प्रमाण (शास्त्रीय संदर्भ) मांगा जा सकता है और जो प्रमाण न दें वो अवांछित सिद्ध हो जायेगें, जो प्रमाण प्रस्तुत करें उनका वचन/निर्णय मान्य सिद्ध हो जायेगा।

वचन ही प्रमाण है तो किनका वचन/निर्णय माने इसके लिये सीधी से बात है श्रेष्ठ की, वृद्ध की बात मानें। यदि श्रेष्ठ/वृद्ध की बात करें तो ब्राह्मण हेतु आयु/धन/बल में से किसी का भी अधिक होना श्रेष्ठतादायक नहीं होता ब्राह्मण में श्रेष्ठ/ज्येष्ठ/वृद्ध का निर्धारण ज्ञान करता है। इस विषय का ध्यान उन सभी स्वघोषित कर्मकांडी पंडितों को भी रखना चाहिये कि वो स्वयं के समाज में से ज्ञानवृद्ध की पहचान कर लें और उसी के अनुकूल बोलें।

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥
विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः । वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणां एव जन्मतः ॥
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥

मनुस्मृति/२/१५४ – १५६

ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम् । वैश्यस्य तु तपो वार्ता तपः शूद्रस्य सेवनम् ॥
मनुस्मृति/११/२३५

वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी । एतानि मानस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥
ब्राह्मणं दशवर्षं च शतवर्षं च भूमिपम् । पितापुत्रौ विजानीयाद्ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ॥
विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः । वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणां एव जन्मतः ॥

विष्णु स्मृति/३२/१६ – १८

अदृष्ट निर्णय में ब्रह्मघात

यदि शास्त्र का ज्ञान नहीं है तो आपके पास दूसरा कोई आधार हो ही नहीं सकता, यदि ज्ञानवृद्ध की पहचान करके उनके अनुकूल निर्णय करेंगे तो दोष के भागी नहीं बनेंगे अन्यथा ब्रह्मघात होता है। इसमें मुख्य तथ्य यही है कि निर्णय देने में शास्त्रीय पक्ष ज्ञात हो अथवा गुरु से ज्ञात हो । यदि उचित-अनुचित पक्ष ज्ञात नहीं है तो निर्णय देना अज्ञात निर्णय या अदृष्ट निर्णय कहलायेगा और इस अवस्था में ब्रह्मघात दोष लगेगा। इसको उदाहरण पूर्वक समझना आवश्यक है क्योंकि अधिकांशतः अदृष्ट निर्णय देते रहते हैं, निर्णय देने में प्रतिष्ठा वृद्धि का भाव रखते हैं।

अदृष्ट निर्णय में ब्रह्मघात
अदृष्ट निर्णय में ब्रह्मघात

प्रायश्चित्तं चिकित्सा च ज्योतिषे धर्मनिर्णयं। विनाशास्त्रेण यो ब्रूयात् तमाहुर्ब्रह्मघातकं॥
नारद पुराण पूर्व० १२/६४

किसी ने प्रश्न किया पुष्प स्नान करके तोड़ना चाहिये अथवा स्नानपूर्व । उत्तरदाता को तीन प्रकार से इसका उत्तर ज्ञात हो सकता है एक शास्त्र से, दूसरा गुरु मुख से और तीसरा सुनी-सुनाई।यहां तीसरे पक्ष का कोई अस्तित्व नहीं है और इसके आधार पर दिया गया उत्तर भले ही उचित भी हो ब्रह्मघात दोष उत्पन्न करेगा, अर्थात् जिस-किसी से भी सुनी-सुनाई बातों के आधार पर निर्णय नहीं दे सकते। क्योंकि इसमें फिर तुलसी तोड़ने का प्रश्न आयेगा और इसका उत्तर ज्ञात नहीं है तो पुष्पत्रोटन के समान ही तुलसी में भी स्नानपूर्व ही कह सकते हैं।

ज्ञात न होने के कारण यहां अनुचित निर्णय हो जाएगा। इसी प्रकार यदि तुलसी तोड़ने में स्नान पूर्वक ज्ञात है किन्तु पुष्प में स्नान पूर्व ज्ञात नहीं तो पुष्प हेतु भी स्नान करके तोड़ने के लिये कह देंगे। अज्ञात होने मात्र से ब्रह्मघात लगेगा वह उचित हो अथवा अनुचित। यही अदृष्ट निर्णय अथवा अज्ञात निर्णय कहलायेगा।

अस्तु ब्राह्मणों को निर्णय देने से पूर्व स्वयं ही ब्रह्मघात का विचार करते हुये निर्णय शास्त्र/गुरु से ज्ञात है अथवा नहीं यह विचार करना चाहिए। यदि ज्ञात नहीं है तो समय लेकर शास्त्र/गुरु से प्राप्त करके फिर निर्णय देना चाहिए, न कि प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर जो तर्क से जहां बुद्धि स्थिर हो वह ।

त्रुटि की संभावना सदैव और सबके लिये रहती ही है भले ही वो शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हों। यहां पर शास्त्रज्ञ ब्राह्मण जो सदैव उचित अर्थात् शास्त्रसम्मत निर्णय देने का ही प्रयास करते हैं उनकी त्रुटि में ब्रह्मघात उत्पन्न नहीं होगा ।

यदि मतिपूर्वक अल्पज्ञ से ही निर्णय लिया जाय (विद्वान का तिरष्कार करके अर्थात् उपस्थित रहते हुये) तो निर्णय दोनों ही दोषी होते हैं। धृष्ट निर्णय देने वाला तो ब्रह्मघात दोष और विद्वान ब्राह्मण की अवज्ञा जनित पाप का भागी बनता ही है साथ ही यजमान स्वयं भी अतिक्रमण व ब्राह्मण अवज्ञा दोष का भागी बनता है। पूज्य की अनुपस्थिति में अपूज्य की पूजा हो सकती है किन्तु पूज्य की उपस्थिति में उनका त्याग करके तो अपूज्य की पूजा में महान दोष है ही साथ ही पूज्य के समक्ष अपूज्य की पूजा करना और कराना दोनों ही दोषी। पूज्य की अनुमति से उपस्थित अपूज्य की भी पूजा हो सकती है, स्वयं के निर्णय से नहीं।

हम धर्म निर्णय पर वापस आते हैं और इसके प्रमुख बिन्दुओं को इस प्रकार समझा जा सकता है :

  • निर्णेता का विद्वान होना अनिवार्य है।
  • विद्वान ब्राह्मण में भी निकटम का अतिक्रमण नहीं करना चाहिये, वर्त्तमान में यह सामान्य व्यवहार बन गया है क्योंकि विद्वानों से मनोनुकल प्रिय वचन वाली अपेक्षा पूर्ण नहीं होती।
  • सामान्य परिस्थिति में अल्पज्ञ को न ही निर्णय देना चाहिए और न ही यजमान को लेना चाहिए।
  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्णय देने वाले वास्तव में अल्पज्ञ हैं और प्रपञ्चपूर्वक विद्वान के रूप में प्रसिद्ध किये गए हैं। उनके कथा/प्रवचन आदि यदि मनोरंजन हेतु अच्छे हैं तो इसका यह तात्पर्य नहीं है कि वो विद्वान भी और उनका धर्म निर्णय मान्य है। ये लोग स्वयं ही भ्रष्ट हैं तो धर्म की शिक्षा और निर्णय किस मुंह से दे सकते हैं !
  • विशेष परिस्थिति में जैसे पूजा-पाठादि में जो उपस्थित हैं वो तात्कालिक निर्णय दे सकते हैं एवं वही मान्य होगा। तात्कालिक निर्णय का तात्पर्य वह निर्णय तुरंत ही अपेक्षित है एवं उनके अतिरिक्त कोई निर्णय हेतु उपलब्ध ही नहीं है, यथा पंचामृत हेतु रखा दूध फट गया या बिल्ली पी गई या गिर गया। शक्कर में मरी हुई चींटियां सनी हुई है। उपस्थित ब्राह्मण सामान्य विवेक से विकल्प रूप में जल प्रयोग का निर्णय दे सकते हैं भले ही अल्पज्ञ हों ।
  • शास्त्रज्ञ की पहचान करने के उपरांत सभी विशेष निर्णय उन्हीं से लेना अनिवार्य होता है और अल्पज्ञ के कुतर्कों से शास्त्रज्ञ का कोई निर्णय त्रुटिपूर्ण हो तो भी खंडित नहीं होता, क्योंकि अल्पज्ञ तो अनधिकारी है और शास्त्रज्ञ के त्रुटिपूर्ण निर्णय को भी दैव की मान्यता प्राप्त होगी ।
  • अतः सामान्य कर्मकाण्डी जिनका शास्त्र में प्रवेश ही नहीं है वो निर्णय देने का दुस्साहस करने से ही बचें और न ही शास्त्रज्ञ के निर्णय को कुतर्कों से खंडित करने का प्रयास करें, यदि संशय हो या समझ न आये तो समझाने का आग्रह करें और जो संशय/शंका हो वह स्पष्ट रूप से व्यक्त करें । क्योंकि अल्पज्ञ के कुतर्कों से शास्त्रज्ञ का त्रुटियुक्त निर्णय भी खंडित नहीं हो सकता कारण की दैव मान्यता प्रदान करेंगे।

अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः । धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः ॥
तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम् । तपसा किल्बिषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते ॥

मनुस्मृति/१२/१०३ – १०४

धर्म निर्णय विषयक चर्चा में एक और महत्वपूर्ण पक्ष है पर्षद विधान किन्तु उसकी प्रामाणिक चर्चा हम भिन्न आलेख में करेंगे और पर्षद परक चर्चा करेंगे किन्तु उसको इसी आलेख का विस्तार माना जायेगा।

निष्कर्ष

निष्कर्ष यह है कि धर्म-निर्णय केवल उसी विद्वान ब्राह्मण का अधिकार है जो शास्त्रों का ज्ञाता हो। वर्तमान में कथावाचकों या सोशल मीडिया के ‘स्वघोषित विद्वानों’ द्वारा दिए गए निर्णय अक्सर क्षेत्रीय विसंगतियों और शास्त्रीय सूक्ष्मताओं की उपेक्षा करते हैं, जिससे समाज में भ्रम फैलता है। धर्म-निर्णय में ‘अतिक्रमण दोष’ (निकटस्थ विद्वान का त्याग) से बचना अनिवार्य है। अंततः, एक वेदविद् ब्राह्मण का वचन ही ‘परम धर्म’ है, क्योंकि उसके वचनों को देवताओं की भी मान्यता प्राप्त होती है। अल्पज्ञों को ‘अदृष्ट निर्णय’ देने से बचना चाहिए, क्योंकि बिना शास्त्र के निर्णय देने वाले अर्थात अप्रमाणिक निर्णय देने वाले को ‘ब्रह्मघाती’ कहा गया है।

F&Q :

FAQ

प्रश्न : क्या ब्राह्मण के वचन में त्रुटि हो सकती है?

उत्तर : शास्त्रज्ञ से भी त्रुटि संभव है, पर वह ‘अदृष्ट निर्णय’ की तरह पापपूर्ण नहीं होती अपितु दैव उसका भी अनुमोदन ही करते हैं।

प्रश्न : ‘परम धर्म’ किसे कहा गया है?

उत्तर : विद्वान ब्राह्मण द्वारा विवेकपूर्वक स्थापित निर्णय को।

प्रश्न : ब्राह्मण में ज्येष्ठता का आधार क्या है?

उत्तर : केवल ज्ञान। (क्षत्रिय में बल, वैश्य में धन)।

प्रश्न : धर्म का निर्णय करने का वास्तविक अधिकारी कौन है?

उत्तर : वो ब्राह्मण जो जन्मना कुलीन हों और शास्त्र के ज्ञाता भी (वेदविद्) हों।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

सूचना: यह आलेख विशुद्ध रूप से सनातन धर्म की स्मृतियों (मनु, अत्रि, शातातप, विष्णु आदि) और पुराणों के प्रमाणों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संप्रदाय या संस्था की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि धर्म-जिज्ञासुओं को शास्त्र-सम्मत निर्णय प्रक्रिया से अवगत कराना है। किसी भी विशेष धार्मिक संकट या निर्णय हेतु अपने स्थानीय कुलगुरु या मूर्धन्य विद्वानों से परामर्श अवश्य लें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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