“ब्राह्मण से प्रश्न करना जिज्ञासा है, किन्तु उसकी परीक्षा लेना दोष है।”
क्या आपको भी लगता है कि कर्मकांड में अत्यधिक विपर्यता हो रही है, यदि हां तो फिर आपक मन में एक प्रश्न तो उत्पन्न होना ही चाहिये कि इसका समाधान क्या है, कैसे सुधार होगा ? इस आलेख में हम इसी विषय का एक समाधान ढूंढेगे। जो स्वेच्छाचारी/म्लेच्छाचारी हैं उनको छोड़ दें और जो आस्थावान हैं भले ही अल्प क्यों न हों उनके लिये तो अल्प ही सही योग्य कर्मकांडी होने चाहिये न। वो स्वयं को ठगा सा अनुभव करते हैं, उनकी आस्था चोटिल होती है। आइये इसके समाधान का मार्ग ढूंढते हैं।
कर्मकांड के महत्वपूर्ण प्रश्न जो कर्मकांडी से पूछें
“कलयुग पर दोष मढ़ने से व्यक्ति अपने कर्म-फल से मुक्त नहीं हो सकता।”
आज हम कर्मकांड में जो विधि-विपरीतता के साथ-साथ कर्मणा आधार से जिस-किसी ब्राह्मणेत्तर को भी कर्मकांडी बनते देख रहे हैं उसका कारण ब्राह्मणों की शास्त्र में अरुचि से उत्पन्न स्वेच्छाचार ही है।
कलयुग तो सभी दोषों का मूल और प्रामाणिक कारण है ही किन्तु इस प्रकार से हम कलयुग पर ही दोषारोपण करके स्वयं का बचाव करते रहें तो हम बच जायेंगे ऐसा नहीं है, किये गए दोष और उसके फल का भागी कलयुग नहीं होगा, हम स्वयं ही होंगे। इस कारण कलयुग पर दोषारोपण करके निर्दोष सिद्ध होने के भाव का परित्याग करके चिंतन और सुधार के हर संभव प्रयास करने ही चाहिये भले ही सुधार हो अथवा न हो। जैसे डूबते व्यक्ति का प्राण बचे अथवा न बचे किन्तु प्राणरक्षा के सभी प्रयास उसे करने ही चाहिये।
यदि हम यह कहें की ९० – ९५ प्रतिशत कलयुग के चपेट में आकर स्वेच्छाचारी हो गये हैं तो संभवतः अतिशयोक्ति न होगी। आप स्वयं ही अनुभव करते हैं कि हर कोई स्वयं को तो सही सिद्ध करता है किन्तु अपने उचित कर्मों के आधार पर नहीं अपितु दूसरे के अनुचित कर्मों की निंदा करके। जैसे किसी के अशौच न मानने की यथा अशौच में विवाहादि करने की बात करके, अन्यायपूर्ण धनार्जन, पारिवारिक विखंडन, पत्नी की अधीनता, सामाजिक-पारिवारिक मर्यादा का उल्लंघन आदि अनेकानेक ऐसे विषय हैं जो सामान्य हो चुके हैं किन्तु सभी को दूसरे का ही दिखता है अथवा यूँ कहें कि दूसरे की निंदा करके स्वयं का बचाव करने का प्रयास करते हैं।
जैसे यदि मैं होटल का भोजन करूँ तो स्वयं की त्रुटि/दोष को आवरण देने के लिये दूसरे लोगों में यही दर्शाने का प्रयास करूँगा कि सभी ऐसा ही तो कर रहे हैं और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिये मांसाहारियों की घनघोर निंदा करूंगा ताकि मैं मांसाहारी न हूँ ऐसा सिद्ध हो और होटल में भोजन की चर्चा ही गौण हो जाये। मांसाहार की चर्चा को इतना अधिक तूल दूंगा की चर्चा लहसुन-प्याज की हो ही नहीं वो इस लिये कि लहसुन-प्याज खाता हूँ और इस विषय की चर्चा नहीं करना चाहता, आवरण देना चाहता हूँ।

स्पष्ट है इस प्रकार की चर्चा में शास्त्र कहीं दूर-दूर तक उपस्थित ही नहीं हो पाता, तर्क-कुतर्क के माध्यम से ही धर्म की चर्चा करते रहते हैं और मनमुखी निर्णय भी लेते हैं। यदि हम लहसुन-प्याज, मत्स्य-मांस की शास्त्रीय चर्चा करें तब तो ज्ञात होगा कि लहसुन-प्याज में तो अधिक दोष है।
इसी प्रकार कर्मकांड में ऐसी चर्चा करते हैं जिसका आधार शास्त्र होता ही नहीं अर्थात शास्त्रसम्मत चर्चा करना ही नहीं चाहते क्योंकि शास्त्र में रूचि ही नहीं है। इसके कारण की बात करें तो हम पुनः वहीं पहुंचते हैं कि व्याकरणाचार्य/साहित्याचार्य आदि जो शिक्षक बने और शिक्षक होने के कारण कर्मकांडी भी बन गये वो शास्त्रज्ञान से रहित होते थे और सभी प्रश्नों का हल वाक्चातुर्य से करते रहे जिससे ढेरों विसंगतियां उत्पन्न होती रही।
गोस्वामी जी के वचन “पंडित सोई जो गाल बजावा” को व्यावहारिक रूप में स्थापित करते हुये उन्होंने कर्मकांडियों को गाल बजाने के लिये तो प्रेरित किया किन्तु प्रच्छन्न भाव शास्त्रविमुख करना ही था। क्योंकि आज यदि शास्त्र के आधार पर चिंतन करते हैं तो ये शिक्षक वर्ग कर्मकांड के लिये अयोग्य सिद्ध हो रहे हैं। यदि ब्राह्मण वर्ग शास्त्रविमुख न रहें अर्थात शास्त्रज्ञ हो जायें तो इनका साम्राज्य ही नष्ट हो जाये, प्रतिष्ठा समाप्त हो जाये, अयोग्य सिद्ध हो जायें।
पिछले ४ – ५ दशकों से इन्हीं का साम्राज्य स्थापित है और विश्वास न हो तो चतुर्दिक देखें जितने भी प्रसिद्ध कर्मकांडी थे वो सरकारी शिक्षक/प्रोफेसर हों अथवा निजी किन्तु इसी वर्ग के मिलेंगे कुछ अपवादों के अतिरिक्त। वर्त्तमान में इनके साम्राज्य का पतन आरम्भ हो चुका है क्योंकि अब ऐसी चर्चा होने लगी है भले ही मैं अकेला ही क्यों न करूँ।
अब नये-नये कर्मकांडी कुछ न कुछ अध्ययन करके आ रहे हैं किन्तु जो ज्ञान चाहिये था वो प्राप्त नहीं कर पाते हैं, कारण यही है कि उक्त शिक्षक वर्ग के कर्मकांडियों ने व्यवहार में तो विलुप्त कर दिया और शास्त्र में अनास्था भी उत्पन्न कर दिया अतः अब जो अध्ययन करके आ भी रहे हैं वो वृत्तिवशात्।
अब यदि कोई प्रश्न कर दे कि रात्रि में विवाह करना चाहिये अथवा नहीं; तो इसके विषय में कोई भी कहीं से शास्त्रोक्त प्रमाण द्वारा कुछ नहीं कहेंगे कुछ कहेंगे रात में हवन नहीं कर सकते, कुछ कहेंगे सब दिन से होता आया है और जो अधिक भ्रमित होगा वो पक्ष में उस आक्रांताओं वाली कहानी भी सुनाकर सिद्ध कर देगा कि रात में नहीं होना चाहिये। जो मेरे संपर्क में हैं उनके लिये तो मैंने प्रमाण उपलब्ध कर रखा है और वो प्रस्तुत करेंगे किन्तु अन्य ये जो कुछ भी कहने वाले हैं सर्वप्रथम इनको प्रमाण ढूंढना आवश्यक होता है अन्यथा उचित कहें या अनुचित दोनों ही अवस्था में ब्रह्मघात होगा : “विना शास्त्रेण यो ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातकं”
इसी कारण सम्पूर्ण कर्मकांड विधि पर प्रमाणों के अनुसार ही किसी भी विषय की चर्चा को दिशा दिया जाता है। अधिकांशतः शास्त्रविमुख हो चुके हैं इस कारण शास्त्रावलोकन करना भी जटिल कार्य है और इस अवस्था में तर्क-कुतर्क का ही आधार रहता है। अस्तु अधिकांशतः पंडित को यही कहते सुना जाता है कि जो किया जा रहा है सब ठीक है। शास्त्रों में भी विरोध है, ऋषियों में भी मतैक्य नहीं है, जिसे जो समझ आता है वह अपनी समझ से सही ही करता है।
तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्था ॥
महाभारत/३/३१४/११९
यह विषय कर्मकांड में उचित-अनुचित निर्णय का बाधक नहीं है, ये धर्म के विषय में कहता है। किन्तु कर्मकांडी अपनी अज्ञानता को इससे आवरण प्रदान करते हैं, झेंपकर कुछ भी कहकर निकल जाते हैं। शास्त्रोचित है अथवा शास्त्रविरुद्ध यह विचार भी नहीं करते और यदि कोई शास्त्र के अनुसार उचित बोले तो अन्यान्य कहानी/किस्से करके “महाजनो येन गतः स पन्था” पर पहुंचा देते हैं। अर्थात अपने शास्त्रविरुद्ध निर्णय को भी फिर सही ही कहने का प्रयास करते हैं।
ब्राह्मणों के लिये शास्त्रावलोकन पूर्वक किसी भी विषय का निर्णय शास्त्रीय आधार से प्रस्तुत करना अपेक्षित होता है। कर्मकांड के विषय में जो भी प्रश्न उठे उसका प्रामाणिक उत्तर ही होगा, तार्किक नहीं हो सकता। व्यवहार, लोकाचार, देशाचार, कुलाचार आदि के विषय में तार्किक उत्तर हो सकता है। सर्वप्रथम तो प्रश्न शास्त्र से सम्बंधित है अथवा व्यवहार से यह विचार करना चाहिये तदुपरांत उसका उत्तर विषय के अनुसार दिया जाना चाहिये।
चत्वारोऽपि त्रयो वापि यद्ब्रूयुर्वेदपारगाः । स धर्म इति विज्ञेयो नेतरेषां सहस्रशः ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥
यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममतन्द्रियम्। तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वैक्तृनधिगच्छति ॥
वशिष्ठ स्मृति ३/६ – ८
यहीं पर जाकर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या इसी प्रकार होते रहना चाहिये अथवा सुधार की दिशा में प्रयत्न करना चाहिये। निःसंदेह सुधार का प्रयत्न करना चाहिये ही; तो फिर क्या करें ? कैसे करें ? कहां से करें ? आदि प्रश्न उठते हैं और इसका उत्तर है कि मूल समस्या शास्त्रविमुख होना है और इसी कारण कर्मकांड का क्षरण बढ़ता ही जा रहा है। जो कोई भी धर्म में आस्था रखता है उसे शास्त्रों में भी आस्था रखनी ही होगी अन्यथा धर्म क्या है, कैसे करें, क्यों करें यह भी ज्ञात नहीं होगा।
- क्या करें – कर्मकाण्डियों को शास्त्र के सम्मुख करने का प्रयास करें।
- कैसे करें – दोषी न बने इस विधि से करें।
- कहां से करें – प्रश्नों से करें।
कर्मकाण्डियों को शास्त्र के सम्मुख करने का प्रयास करें : इसी कारण इतना विश्लेषण किया गया जिससे समस्या है क्या यह समझ आये। कलयुग का प्रभाव तो कहा ही जायेगा किन्तु, व्यावहारिक रूप से कैसे हुआ यह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है अर्थात वर्त्तमान कर्मकांडी वास्तव में दोषी नहीं हैं, वातावरण ही ऐसा है कि शास्त्रविमुख हो चुके हैं। ये कर्मकांडियों के ही विषय में नहीं है यदि यजमान वर्ग की चर्चा करें तो वो तो रसातल में …..
इसलिये पहले तो यजमान को स्वयं की ही आस्था का विचार करना होगा और स्वयं ही शास्त्र के सम्मुख होना होगा, म्लेच्छाचार का परित्याग करना होगा। यदि कर्मकांडी को ४०० – ५०० संस्कृत शब्द मात्र का भी ज्ञान है तो आपको कितने शब्दों का ज्ञान है ? यदि कर्मकांडी किसी भी प्रकार से संस्कृत पाठ कर लेते हैं तो आप कितना कर सकते हैं ? मतलब साफ है कि कितने भी अलपज्ञ हों आपसे अधिक जानते हैं। समस्या शास्त्रविमुख होना है और उसी का समाधान करना है। येन-केन-प्रकारेण शास्त्रावलोकन आरम्भ करें स्वतः शास्त्रज्ञ हो जायेंगे।

दोषी न बने इस विधि से करें : लेकिन इस प्रयास में एक सावधानी की आवश्यकता है और वो है कि दोषी न बनें। ब्राह्मण से प्रश्न करना अनुचित नहीं है किन्तु परीक्षा लेना, ज्ञान की परख करना केवल श्राद्ध में ही प्रशस्त है अन्यत्र नहीं। इसलिये कितने शास्त्रज्ञ हैं इसकी परीक्षा लेने के भाव से प्रश्न नहीं कर सकते किन्तु जिज्ञासा के भाव से प्रश्न कर सकते हैं और उसमें यह आग्रह भी कर सकते हैं कि प्रामाणिक उत्तर चाहिये। अर्थात मात्र तर्क से सिद्ध उत्तर का महत्व नहीं होता, आप ब्राह्मण हैं आपको शास्त्रोक्त सन्दर्भ के साथ उत्तर देना चाहिये। यह आलेख भी उनके प्रति साझा कर सकते हैं।
तीर्थेषु ब्राह्मणं नैव परीक्षेत कदाचन। अत्रार्थिनमनुप्राप्तं भोज्यं तं मनुरब्रवीत् ॥
नारदपुराण/उत्तरार्धः/६२/३८
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥
मनुस्मृति/३/१४९
न ब्राह्मणान्परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित्। महान्भवेत्परीवादो ब्राह्मणानां परीक्षणे।।
ब्राह्मणानां परीवादं यः कुर्यात्स नराधमः। रासभानां शुनां योनिं गच्छेत्पुरुषदूषकः॥
श्वत्वं प्राप्नोति निन्दित्वा परीवादात्खरो भवेत्। कृमिर्भवत्यभिभवात्कीटो भवति मत्सरात्॥
दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा प्राकृता वा सुसंस्कृताः। ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः॥
क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम्। नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन॥
एतत्त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम्। तस्मादेतत्प्रयत्नेन नावमन्येत बुद्धिमान् ॥
यथा सर्वास्ववस्थासु पावको दैवतं महत्। तथा सर्वास्ववस्थासु ब्राह्मणो दैवतं महत् ॥
महाभारत/१४/९८/७३ – ७९
युगे युगे च ये धर्मास्तत्र तत्र च ये द्विजाः । तेषां निन्दा न कर्तव्या युगरूपा हि ते द्विजाः ॥
पाराशरस्मृति/१/३३
न पृच्छेद्गोत्रचरणे न स्वाध्यायं श्रुतं तथा । हृदये कल्पयेद्देवं सर्वदेवमयो हि सः ॥
पाराशरस्मृति/१/४८
अमानुषा गया विप्रा ब्रह्मणा ये प्रकल्पिताः। तेषु तुष्टेषु संतुष्टाः पितृभिः सहदेवताः ॥
न विचार्यं कुलं शीलं विद्यां च तप एव च। पूजितैस्तैस्तु संतुष्टादेवाः सपितृगुह्यकाः ॥
यद्यपि परीक्षा का अर्थ यहां ज्ञान मात्र का परीक्षण नहीं अपितु और भी लक्षणों/गुणों/चिह्नों आदि के आधार पर विचार करना भी है और इस परीक्षण में प्रश्न करना है ही नहीं, तथापि यदि ज्ञान की परीक्षा करने के उद्देश्य से प्रश्न करेंगे तो दोष उत्पन्न होगा अर्थात नहीं कर सकते। किन्तु जिज्ञासा हेतु कर सकते हैं, क्योंकि प्रश्न ही नहीं कर सकते ऐसा नहीं है। प्रश्न तो किया ही जायेगा बस उसमें परीक्षा लेने का भाव न हो अपितु भाव शास्त्रावलोकन के लिये प्रेरित करने का हो।
प्रश्नों से करें : अब तक बात समझ में आ गयी होगी कि सुधार की दिशा में आगे बढ़ने हेतु जो मार्ग है वह प्रश्न से आरम्भ होता है और उसका प्रामाणिक उत्तर हो इस शर्त के साथ। उद्देश्य परीक्षा लेना होना ही नहीं चाहिये अपितु यह तो ज्ञात ही है कि सब-कुछ विपरीत हो रहा है और दोष का भागी बने बिना सुधार भी करना है। प्रश्न किया जा सकता है, परीक्षा नहीं। तो आगे क्या प्रश्न करें, कैसे करें यह भी विषय है और अब हम प्रश्नों को भी समझने का प्रयास करेंगे कि क्या-क्या प्रश्न हो सकते हैं और कब किये जायेंगे?
पुष्पं पुष्पं विचिनुयान्मूलच्छेदं न कारयेत् । मालाकार इवारामे न यथाङ्गारकारकः ॥
पाराशरस्मृति/१/६२
प्रश्न करना
“सामग्री की अशुद्धि ब्राह्मण का नहीं, यजमान का दोष है क्योंकि व्यवस्था उसकी है।”
प्रश्न सामान्य दिनों में संवाद रूप में भी किये जा सकते हैं और ढूंढकर बताने का आग्रह करते हुये। इसका तात्पर्य यह होगा कि जब उत्तर दिया जायेगा तो आप किस शास्त्र में है यह भी पूछ सकते हैं, श्लोक लिखवाने का भी आग्रह कर सकते हैं। इस प्रकार आपके जो ब्राह्मण हैं वो शास्त्रावलोकन आरम्भ करेंगे। क्योंकि सामान्य दिनों में जब कोई कर्मकांड न कर रहे हैं तो परीक्षण का दूर तक लेना देना ही नहीं होगा। जब कर्मकांड कर रहे हैं तब परीक्षण (संभावना) हो सकता है और उससे ही बचने का प्रयास करना चाहिये।

तथापि जब कर्मकाण्ड सामग्री की सूची बन जाये तो उस सूची के आधार पर भी कई महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकते हैं जो कि उदाहरण हेतु बताये जा रहे हैं। जैसे कि
- अधिकांशतः कर्मकांडी चन्दन के स्थान पर कुंकुम आदि का प्रयोग करते हैं जबकि चन्दन में घिसा हुआ चन्दन होना चाहिये जो श्रीखंड, मलयागिरि, रक्तचंदन आदि हो सकता है।
- इसी प्रकार नवग्रह समिधा जो दुकान से लिया जाता है वह अनुपयोगी होता है।
- कलश स्थापन में लगने वाली सामग्री सप्तमृत्तिका, सर्वौषधि, पञ्चरत्न पूर्णतः निषिद्ध श्रेणी के होते हैं।
- अगरबत्ती कहीं-कहीं से भी धूप का विकल्प है ही नहीं।
- डेयरी के दूध-दही-घी का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
- नैवेद्य में छेना से बनी मिठाई उचित नहीं है और घर में बनाई गयी सामग्री (भोज्य) का भोग महत्वपूर्ण होता है।
- एक बार पहनकर खोला गया वस्त्र पुनः प्रक्षालन के पश्चात ही धारणीय होता है।
इस प्रकार किसी भी कर्मकांड में सामग्री की शुद्धता अनिवार्य है किन्तु इसके लिये तो सर्वप्रथम यजमान को ही आस्थावान होना होगा। यदि आस्था ही नहीं है और यह सोचते हैं कि दोष ब्राह्मण का हो जायेगा तो ये मतिभ्रम है, अपना दोष ब्राह्मण पर थोप नहीं सकते। अब हम इन्हीं तथ्यों के आधार पर कुछ प्रश्नों को भी समझेंगे जो उदाहरण स्वरूप हैं :
- पंडित जी क्या चंदन में कुछ नहीं लिखा है, क्या कुंकुम ही चन्दन है या चन्दन में कुछ और भी व्यवस्था करनी होगी ?
- पंडित जी पंचरत्न, सप्तमृत्तिका आदि तो सब जानते हैं नहीं रहता है, क्या वह चढ़ाना उचित होगा ?
- पंडित जी क्या डेयरी का दूध, दही, घी शुद्ध होता है ?
- पंडित जी सुना है कि छेना से बनी मिठाई अशुद्ध होती है, क्या भोग लगेगा ?
- पंडित जी अगरबत्ती जलाना ठीक रहेगा या धूप जलाना ?
- पंडित जी भोग लगाने के लिये घर में क्या-क्या बनाना है ?
- पंडित जी एक ही कपड़े से काम चल जायेगा या दूसरा भी रखना होगा, क्योंकि ऐसा सुना है कि एक बार खोलने पर वस्त्र अशुद्ध हो जाता है और प्रक्षालन करने पर ही शुद्ध होता है।
- पंडित जी दुकान की नवग्रह समिधा सही होता है क्या ?
ये कर्मकांड के कुछ सामान्य प्रश्नों के कुछ उदाहरण हैं आस्थावान को स्वतः ऐसे प्रश्न ज्ञात होने लगेंगे फिर भी यदि प्रश्न चाहिये तो “संपूर्ण कर्मकांड विधि” के आलेखों का अवलोकन करें स्वतः ही उत्पन्न होते जायेंगे, प्रश्न के साथ उत्तर भी प्राप्त होते जायेंगे। सभी यजमान स्वयं से सम्बद्ध कर्मकांडी को इसी प्रकार प्रश्न करके शास्त्रावलोकन के लिये प्रेरित कर सकते हैं।
कुछ और भी महत्वपूर्ण प्रश्न दिये जा रहे हैं जो यजमान और पुरोहित के लिये विशेष महत्वपूर्ण है। यदि आपसे संबंधित कर्मकांडी इन विषयों का प्रामाणिक उत्तर नहीं दे पाते हैं तो ढूंढने के लिये भी प्रेरित करें और यदि ढूंढकर भी न दे सकें तो जो दे सकें उन्हीं से कर्मकांड करायें। ये प्रश्न सामान्य संवाद में होने चाहिये न कि पूजा पाठ में आमंत्रित करके। यदि पूजा-पाठ में आमंत्रित ब्राह्मण से ये प्रश्न किये जायेंगे तो वो परीक्षण की श्रेणी में आ जायेगा और दोष होगा।
- पंडित जी पञ्चोपचार पूजन में क्या-क्या आता है, इसका श्लोक क्या है ?
- पंडित जी पंचदेवता में कौन-कौन आते हैं, इसका श्लोक क्या है ?
- पंडित जी षड्देवता में कौन-कौन आते हैं, इसका श्लोक क्या है ?
- पंडित जी पञ्चभू संस्कार क्या-क्या है, इसका श्लोक क्या है ?
- पंडित जी अनुपनीत हवन नहीं कर सकता इसका श्लोक क्या है हमको जानना है कि ऐसा कहीं लिखा है अथवा नहीं !
- पंडित जी सुना है धोती पहनकर ही पूजा आदि किया जा सकता है, धोती कितने हाथ का होना चाहिये ?
- पंडित जी नित्यकर्म तो कोई नहीं करता है इसमें कौन सा दोष लगता है ?
- पंडित जी नित्यकर्म में क्या-क्या आता है ?
- पंडित जी आचमन कब-कब करने का विधान है ?
- पंडित जी शिखा न हो तो उसका क्या विकल्प है ? शिखा काट लेने पर क्या करें ?
- पंडित जी जिसने यज्ञोपवीत खोलकर रख दिया उसको क्या करना चाहिये ?
- पंडित जी जो लहसुन प्याज खाता है उसको क्या करना चाहिये ?
- पंडित जी नान्दीमुख श्राद्ध कब-कब करें ?
- पंडित जी यदि मातृका पूजन और वसोर्द्धारा किस कर्म का अंग है ?
- पंडित जी नवग्रह मंडल कब बनाया जाना चाहिये ?
- पंडित जी क्या घर में रुद्राभिषेक आदि किसी पूजा में सभी मंडल बनाना आवश्यक है ?
- पंडित जी व्रात्य दोष क्या होता है और जो व्रात्य हो गया उसके लिये क्या विकल्प है ?
- पंडित जी उपनयन कब (कितनी आयु में) होना चाहिये ? आचार्य किसे बनना चाहिये ?
- पंडित जी एक बार में दो-तीन बटुक का उपनयन हो सकता है क्या ?
- पंडित जी उपनयन किस समय होना चाहिये अर्थात पूर्वाह्न आदि। कब निषिद्ध है ?
- पंडित जी अनध्याय क्या है ?
- पंडित जी प्राणायाम की विधि क्या है ?
- पंडित जी यदि पति न करे तो क्या अकेली पत्नी रुद्राभिषेक आदि कर सकती है ?
- पंडित जी क्या अनुपनीत बालक रुद्राभिषेक कर सकता है ?
- पंडित जी क्या स्त्री, अनुपनीत बालक, शूद्र पार्थिव पूजन कर सकते हैं ?
- पंडित जी सपिण्ड, सकूल्य, सोदक, सगोत्र क्या होता है ?
- पंडित जी बांधव में कौन-कौन आते हैं ?
- पंडित जी यदि व्रत के दिन दवा खानी हो तो कैसे करें ?
- पंडित जी यदि स्वस्थ व्यक्ति का व्रत भंग हो जाये तो क्या करे ?
- पंडित जी कर्माधिकार क्या है ?
इतने प्रश्नों का प्रामाणिक उत्तर प्राप्त करने के पश्चात् उत्तर देने वाले ब्राह्मण में भी आपका विश्वास हो जायेगा और आपका भी ज्ञानवर्द्धन होगा एवं जो ढूंढकर भी उत्तर प्रदान करेंगे वो शास्त्र अध्ययन के अभ्यस्त हो जायेंगे।
दूसरी बात यह भी है कि यदि अयोग्य होंगे तो स्वतः ही आना छोड़ देंगे और यदि योग्य होंगे तो प्रश्नों का उत्तर देने में संतुष्टि होगी और आपको भी संतुष्टि होगी। प्रायः होता यह है कि जो प्रश्न करने चाहिये वो प्रश्न किया ही नहीं जाता है व्यर्थ के विषयों में भटकते रहते हैं। यदि यजमान व्यर्थ के ही प्रश्न करता रहे तो पंडित जी भी व्यर्थ विषयों का ही चिंतन-मनन करेंगे। यजमान ही शास्त्र से सम्बंधित प्रश्न करे तब तो पंडित जी शास्त्र का अवलोकन करेंगे।
निष्कर्ष
“दोषी न बनकर सुधार करना ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है।”
कर्मकांड में सुधार का मार्ग केवल दोषारोपण से नहीं, बल्कि ‘शास्त्र-सम्मुखता’ से खुलेगा। यजमान जब सजग होकर सामग्री की शुद्धि और विधि के आधार पर प्रश्न करना आरम्भ करेगा, तब कर्मकांडी स्वतः ही स्वाध्याय और शास्त्रावलोकन के लिए प्रेरित होंगे। कलयुग के प्रभाव को कम करने का एकमात्र उपाय यही है कि हम तर्क-कुतर्क का त्याग कर पुनः ऋषियों द्वारा स्थापित मर्यादाओं और प्रमाणों की शरण में जाएं। सुधार की प्रक्रिया ‘प्रश्न’ से शुरू होती है और ‘प्रमाण’ पर समाप्त।
F&Q :
FAQ
प्रश्न : क्या यजमान ब्राह्मण से प्रश्न कर सकता है?
उत्तर : हाँ, जिज्ञासा के भाव से, परीक्षा के भाव से नहीं।
प्रश्न : अनुपनीत बालक हवन क्यों नहीं कर सकता?
उत्तर : क्योंकि बिना उपनयन के वेदमन्त्रों का अधिकार प्राप्त नहीं होता।
प्रश्न : व्रात्य दोष क्या है?
उत्तर : निश्चित समय पर उपनयन संस्कार न होना व्रात्य दोष है।
प्रश्न : डेयरी का घी-दूध क्यों वर्जित है?
उत्तर : क्योंकि उनमें शुद्धि का कोई विचार ही नहीं होता।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
सूचना: इस आलेख का उद्देश्य किसी भी ब्राह्मण या कर्मकांडी की योग्यता का परीक्षण करना (Test) या अपमान करना नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, देव और पितृ कार्यों में ब्राह्मण की परीक्षा लेना दोषपूर्ण माना गया है। अतः, इसमें दिए गए प्रश्नों का उपयोग केवल ‘जिज्ञासा’ के भाव से और सामान्य संवाद के दौरान ही करें, ताकि शास्त्र की मर्यादा पुनः स्थापित हो सके।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








