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कर्मकांड के महत्वपूर्ण प्रश्न जो कर्मकांडी से पूछें

कर्मकांड के महत्वपूर्ण प्रश्न जो कर्मकांडी से पूछें

“क्या कर्मकांड में बढ़ती अशुद्धता से आप चिंतित हैं? जानें कैसे ‘जिज्ञासा’ और ‘शास्त्रीय प्रश्नों’ के माध्यम से आप अपने पुरोहित को शास्त्रोन्मुख कर सकते हैं। कर्मकांड में सुधार, सामग्री की शुद्धि और योग्य कर्मकांडी की पहचान पर एक विस्तृत मार्गदर्शिका।

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भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत पूजा कथा - Satyanarayan Vrat Puja Katha

भविष्यपुराणोक्त सत्यनारायण व्रत पूजा कथा – Satyanarayan Vrat Puja Katha

“भविष्यपुराण के अनुसार श्रीसत्यनारायण व्रत की प्रामाणिक विधि। जानें पंच-कलश स्थापन, स्वर्णयुक्त शालिग्राम पूजन, और कर्माधिकार के वे सूक्ष्म नियम जो सामान्यतः लुप्त हो चुके हैं। प्रातः संकल्प से लेकर प्रसाद वितरण तक का शास्त्रीय विश्लेषण।”

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कर्मकाण्ड में ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण अर्थात पात्रापात्र विचार - प्रमाण संकलन

कर्मकाण्ड में ग्राह्यग्राह्य ब्राह्मण अर्थात पात्रापात्र विचार – प्रमाण संकलन

धर्म/कर्मकांड में किस ब्राह्मण को ‘पात्र’ माना गया है और किसे ‘अपात्र’? मनुस्मृति, स्कंदपुराण और अत्रि स्मृति के प्रमाणों के साथ ‘योग्यायोग्य ब्राह्मण’ विचार। जानिए वर्तमान युग में शास्त्रोक्त ब्राह्मण के अभाव में क्या है परिहार की विधि।

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शुद्धिकरण अर्थात पवित्रीकरण के प्रमाण

शुद्धिकरण अर्थात पवित्रीकरण के प्रमाण

कर्मकाण्ड के आरम्भ में शुद्धिकरण का महत्व और शास्त्रोक्त क्रम क्या है? आचमन, पवित्री धारण, और शिखा बंधन के प्रामाणिक श्लोकों का संकलन। जानिए क्यों शुद्धिकरण के बिना कोई भी धार्मिक कृत्य निष्फल है।

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पवित्रीकरण-विधि

पवित्रीकरण अर्थात शुद्धिकरण की संपूर्ण विधि

सम्पूर्ण कर्मकांड में पवित्रीकरण अर्थात शुद्धिकरण की सर्वप्रथम आवश्यकता होती है। चाहे पूजा स्थल की बात हो, पूजा सामग्री की बात हो अथवा शारीरिक या मानसिक शुद्धि का विषय हो, प्रत्येक कर्म का आरम्भ पवित्रीकरण से ही होता है। इस आलेख में पवित्रीकरण की संपूर्ण विधि बताई गयी है जो अत्यंत उपयोगी विषय है।

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क्षमा प्रार्थना मंत्र

क्षमा प्रार्थना मंत्र

क्षमा प्रार्थना का तात्पर्य है अपने अपराधों (गलतियों) के लिये क्षमा याचना की विनती करना। यहां दिये गये क्षमा प्रार्थना में एक मंत्र “आवाहनं न जानामि” का प्राकारांतर भी दिया गया है एवं एक अतिरिक्त मंत्र “प्रसीद भगवत्यम्ब” भी दिया गया है।

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प्राधानिक रहस्य

प्राधानिक रहस्य

भगवन्नवतारा मे चण्डिकायास्त्वयोदिताः।
एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि॥१॥
आराध्यं यन्मया देव्याः स्वरूपं येन च द्विज।
विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे॥२॥

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पुरुष सूक्तं – कृष्ण यजुर्वेदीय

पुरुष सूक्तं – कृष्ण यजुर्वेदीय

जहां शुक्लयजुर्वेद के पुरुषसूक्त में १६ ऋचायें मिलती है वहीं कृष्ण यजुर्वेद में १८ ऋचायें प्राप्त होती हैं।

कृष्ण यजुर्वेदियों को कृष्णयजुर्वेद के मंत्रों का ही उपयोग करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल यजुर्वेद की ऋचायें इसलिये उपलब्ध होती है क्योंकि अधिकांश लोग शुक्ल यजुर्वेद के ही माध्यन्दिन शाखा का पालन करने वाले हैं।

किन्तु अन्य वेदों व शाखा वाले लोग भी हैं।

सबको अपने वेद व शाखा का ही पालन करना श्रेयस्कर कहा गया है।

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पितृ सूक्त

पितृ सूक्त

जिस तरह से विभिन्न देवताओं के सूक्त होते हैं उसी तरह पितरों के लिये भी विभिन्न वेदों में सूक्त हैं जिसे पितृसूक्त कहा जाता है। जिसमें से अन्य सभी सूक्तों की तरह ही शुक्ल यजुर्वेदोक्त पितृसूक्त ही मुख्य रूप से प्रयुक्त होता है।

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अप्रतिरथ सूक्त – Apratirath Suktam

अप्रतिरथ सूक्त – Apratirath Suktam

यजुर्वेद के सत्रहवें अध्याय में ऋचा ३३ से लेकर ४९ तक जो १७ ऋचायें हैं वो इंद्र की विशेष स्तुति है।
इंद्र की स्तुति वाली इस ऋचा का नाम अप्रतिरथ सूक्त है।

अर्थात वेद में मिलने वाला इंद्र स्तोत्र अप्रतिरथ सूक्त ही है।
रुद्राष्टाध्यायी में तीसरा अध्याय अप्रतिरथ सूक्त ही है।

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