अप्रतिरथ सूक्त – Apratirath Suktam

अप्रतिरथ सूक्त – Apratirath Suktam

यजुर्वेद के सत्रहवें अध्याय में ऋचा ३३ से लेकर ४९ तक जो १७ ऋचायें हैं वो इंद्र की विशेष स्तुति है।
इंद्र की स्तुति वाली इस ऋचा का नाम अप्रतिरथ सूक्त है।

अर्थात वेद में मिलने वाला इंद्र स्तोत्र अप्रतिरथ सूक्त ही है।
रुद्राष्टाध्यायी में तीसरा अध्याय अप्रतिरथ सूक्त ही है।

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पवमान सूक्त – यजुर्वेदोक्त, विभिन्न यज्ञ, पूजा, पाठ आदि कर्मकांड के लिये विशेष महत्वपूर्ण सूक्त

पवमान सूक्त – यजुर्वेदोक्त, विभिन्न यज्ञ, पूजा, पाठ आदि कर्मकांड के लिये विशेष महत्वपूर्ण सूक्त

पवमान सूक्त यज्ञ में महत्वपूर्ण है। यह सामग्री को पवित्र करता है और जल प्रोक्षण में उपयोग होता है। ऋग्वेद में इसका वर्णन है। इसमें देवों की पूजा और अनुष्ठान का विवरण है।

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रक्षोघ्न सूक्त – ऋग्वेदोक्त, यजुर्वेदोक्त – रक्षोघ्न मंत्र

रक्षोघ्न सूक्त – ऋग्वेदोक्त, यजुर्वेदोक्त – रक्षोघ्न मंत्र

रक्षोघ्न सूक्त यजुर्वेद, ऋग्वेद, और अथर्ववेद में पाया जाता है और यज्ञ-पूजा में इसका प्रमुख उपयोग होता है। श्राद्ध में भी इसका पाठ किया जाता है, लेकिन यह पूजा-यज्ञ-अनुष्ठानों में भी होता है। इसे पितरों का मंत्र मानना एक भ्रम है।

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नामकरण कैसे करें ? नामकरण संस्कार

नामकरण कैसे करें ? नामकरण संस्कार

सूतिका को पंचगव्य प्राशन करा दे।
फिर पूर्व बताई विधि के अनुसार बालक को लेकर सूतिका पूजा स्थान पर आये।
बालक को गोद में ली हुई माता अग्नि की प्रदक्षिणा करके संस्कारकर्ता के बांयी ओर बैठे ।
आचमन करके पूजित देवताओं का स्मरण करके पुष्पांजलि दे।
फिर आचार्य अथवा बालक का पिता स्वर्ण शलाका से अष्टगंधादि द्रव्य का द्वारा पीपल के पांच पत्ते या श्वेत वस्त्र पर बच्चे के लिये निर्धारित पंचनाम लिखे।
फिर पंचनामों को तण्डुलपूर्ण पात्र में रखकर अक्षत-पुष्पादि लेकर उसकी प्रतिष्ठा करे :

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संध्या तर्पण विधि

संध्या तर्पण विधि

संध्या तर्पण विधि : शारीरिक शुद्धि अर्थात शुचिता के बाद नित्यकर्म में संध्या, तर्पण, पंचदेवता व विष्णु पूजन का क्रम आता है। संध्या तो त्रैकालिक होती है अर्थात प्रातः, मध्यान और सायाह्न तीनों कालों में करणीय है, किन्तु तर्पण व पंचदेवता विष्णु पूजन प्रातः का ही नित्यकर्म है ये दोनों त्रैकालिक नहीं हैं।

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नित्यकर्म विधि – भाग ३, शुचिता

नित्यकर्म विधि – भाग ३, शुचिता

यहाँ शुचिता के महत्त्व एवं विधान के विषय में जानकारी दी गई है। शरीर और आत्मा की शुद्धता बनाए रखने के लिए शौच, दन्तधावन, स्नान जैसे विधियों का पालन करना आवश्यक है। इसमें दिशा, वस्त्र-यज्ञोपवीत एवं स्नान के नियम तथा महत्वपूर्ण विधियाँ सम्मिलित हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शुचिता का पालन करना शारीरिक और आत्मिक शुद्धता के लिए कितना महत्वपूर्ण है।

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दुर्गा पूजा विधि मंत्र सहित

दुर्गा पूजा विधि मंत्र सहित

दुर्गा पूजा विधि – ॐ अद्यैतस्य ब्रह्मणोह्नि द्वितीय परार्द्धे ……… सपरिवारस्योपस्थित शरीराविरोधेन महाभयाभावपूर्वक विपुलधन धान्य सुतान्विताऽतुल विभूति चतुर्वर्ग फलप्राप्तिपूर्वक सर्वाऽरिष्ट निवारणार्थं सकल मनोरथ सिद्ध्यर्थं श्रीदुर्गायाः प्रीत्यर्थं साङ्गसायुधसवाहन सपरिवारायाः भगवत्याः श्रीदुर्गादेव्याः पूजनमहं करिष्ये ।

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सत्यनारायण पूजा विधि मंत्र सहित

सत्यनारायण पूजा विधि मंत्र सहित – Satyanarayan Puja Vidhi

सत्यनारायण पूजा विधि मंत्र सहित – Satyanarayan Puja Vidhi : १. पवित्रीकरण मंत्र : ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्गतोऽपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याऽभंतर: शुचि:॥ ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥ हाथ में गंगाजल/जल लेकर इस मंत्र से शरीर और सभी वस्तुओं पर छिड़के ।२. आसन पवित्रीकरण मंत्र : ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुनाधृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ इस मंत्र से आसन पर जल छिड़क कर आसनशुद्धि करें।

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मकर संक्रांति का महत्व और दान विधि - Makar Sankranti Significance

मकर संक्रांति का महत्व और दान विधि – Makar Sankranti Significance

मकर संक्रांति का महत्व और दान विधि – Makar Sankranti Significance : मकर संक्रांति का महत्व, दान विधि और शुभ मुहूर्त की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें। जानें सूर्य के उत्तरायण होने का धार्मिक व वैज्ञानिक कारण और संक्रांति पर तिल, खिचड़ी व वस्त्र दान के विशेष मंत्र और नियम।

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अक्षय नवमी कब है

अक्षय नवमी कब है – akshaya navami

अक्षय नवमी कब है : शास्त्र पुराणों में अक्षय नवमी का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। अक्षय नवमी करने वाला अक्षय पुण्य का भागी बनकर सुख का भाजन बनता है, उसे यम यातना नहीं मिलती अर्थात नरक नहीं जाना पड़ता है।

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