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दौहित्र (नाती) मातामह श्राद्ध (नाना) का – श्राद्ध कैसे करें

दौहित्र (नाती) मातामह श्राद्ध (नाना) का - श्राद्ध कैसे करें

प्रायः ऐसा देखा जाता है कि यदि दौहित्र अपने मातामह (पुत्रहीन) का श्राद्ध करना चाहे तो वहां त्रिरात्राशौच संबंधी विवाद उत्पन्न हो जाता है और यहां चर्चा का मुख्य विषय यह है कि यदि नाती अपने नाना की और्ध्वदेहिक क्रिया व श्राद्ध करे तो उसे त्रिरात्राशौच नहीं दशाहाशौच होता है और यह विवाद भ्रम के कारण होता है जिस भ्रम का यहां प्रमाणों द्वारा निवारण किया गया है।

इस आलेख में यह चर्चा की गई है कि क्या अपुत्र होने पर नाना का श्राद्ध (मातामह श्राद्ध) नाती कर सकता है या नहीं। यदि अपुत्र नाना का श्राद्ध नाती कर सकता है तो अड़चन क्या है अथवा क्यों नहीं कर सकता? यही चचेरा मामा हो या मातामह का सापिण्ड्य हो तो दौहित्र अर्थात नाती को क्यों अधिकार नहीं होगा अथवा किस स्थिति में अधिकार होगा और श्राद्ध यदि करना हो तो कैसे करें ?

दौहित्र (नाती) मातामह श्राद्ध (नाना) का – श्राद्ध कैसे करें

यह विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है और शास्त्रों के प्रमाण सहित चर्चा करने से और अधिक उपयोगी हो जाता है। वर्तमान युग में जिसे पुत्र न हो परन्तु पुत्री और दौहित्र (नाती) हो उसकी मृत्यु से पहले ही श्राद्ध और उत्तराधिकार का विवाद आरम्भ हो जाता है। चर्चा तो सभी जगहों पर होती है परन्तु पर्याप्त प्रमाण सहज में उपलब्ध न होने से जो भी करे दूसरा पक्ष उसे अनुचित ही सिद्ध करता है । चूंकि यहां पर्याप्त प्रमाण देते हुए निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयास किया गया है इसलिये उपरोक्त परिस्थिति में विवाद शेष रहने की संभावना नगण्य हो जाती है।

भ्रातृज्यादि का प्रथम अधिकार

इसमें कोई दो मत नहीं कि पुत्र के अभाव में भ्रातृज्य (भतीजे) से लेकर सपिण्डों तक ही नहीं सोदकों तक का भी उत्तरोत्तर अधिकार होता है।

साथ ही पुराने समय में मातामह का धन-संपत्ति लेना निकृष्टता का द्योतक भी माना जाता था और इसलिये उपरोक्त स्थिति में दौहित्र श्राद्ध नहीं करता था क्योंकि श्राद्ध करने में एक शर्त भी है कि जिसका श्राद्ध करे उसका धन भी ले। और कुछ दशक पहले तक यही चलता आया कि भ्रातृज्यादि ही श्राद्ध करके धन ग्रहण करते रहे।

हेमाद्रि संकल्प मंत्र

परन्तु वर्तमान युग में लोगों की वह सोच बदल गई, राजविधान से पुत्री को भी पिता का उत्तराधिकारी बनाया गया एवं धनलोलुपता की प्रवृत्ति अत्यधिक हो गई है। लोगों का आध्यात्मिक ज्ञान घटता जा रहा है, भौतिकता बढती जा रही है और येन-केन-प्रकारेण धनार्जन करना मात्र जीवन का लक्ष्य रह गया है, पिता की संपत्ति में जब संविधान ही पुत्री को अधिकार प्रदान कर रहा है तो दोष क्या है?

एक और महत्वपूर्ण विषय वर्तमानयुग के सन्दर्भ में है, १-२ दशक से एक नई परम्परा का भी प्रचलन बढ़ने लगा है और वह है कृत्रिम गर्भाधान पूर्वक अनैतिक क्षेत्रज पुत्रोत्पत्ति करना। इस संबंध में यह स्पष्ट करना अपेक्षित है कि क्षेत्रज पुत्र का तात्पर्य भी अनैतिक संबंध वश, अथवा बलात्कारजन्य उत्पन्न पुत्र होते हैं इसमें पिता की सहमति का अभाव होना आवश्यक होता है।

लेकिन वर्तमान में यदि पिता सहमति से कृत्रिम गर्भाधान कराता है फिर तो वह स्वयं भी अनीति करता है अर्थात उसी समय पतन का भागी बन जाता है। कृत्रिम गर्भाधान में पता नहीं किसका वीर्य स्थापन किया जाय, वो तो म्लेच्छादि का भी हो सकता है और संभवतः कहीं न कहीं इसी प्रकार का कोई षड्यंत्र करके सनातन को भ्रष्ट करने का एक प्रयास किया जा रहा है।

यदि जानबूझ कर अन्य व्यक्ति से उत्पन्न पुत्र का ही इच्छुक हो तो उसके लिये भी कुल के अन्य पवित्र व्यक्तियों का चयन किया जा सकता है और इस सम्बन्ध में तो प्रमाण भी है “देवराच्च सुतोत्पत्तिः”, क्षेत्रज पुत्रों के संबंध में तो यह तथ्यात्मक बात है कि देवर से संतान उत्पन्न करना कभी प्रशस्त भी था, कलयुग में निषिद्ध है। अब गंभीर विचार इस प्रकार करना होगा कि जब “देवराच्च सुतोत्पत्तिः” कहकर इसका भी निषेध किया गया है फिर अज्ञात व्यक्ति के वीर्य से पुत्र उत्पन्न करने के लिये तो सोचा भी नहीं जा सकता।

यह नारकीय गति और प्रवृत्ति का बोधक है। हां जब पति का ही वीर्य पत्नी के गर्भ में स्थापन किया जा रहा हो तो उसमें कोई बाधा नहीं है, लेकिन अन्य पुरुष का वीर्य स्थापन यदि किया जा रहा हो तो निश्चित रूप से वह पुत्र नरक का भागी बनायेगा, नरक से मुक्ति नहीं दिला सकता क्योंकि यह शास्त्र सम्मति के विरुद्ध अनैतिक कर्म ही सिद्ध होता है।

भ्रातृणामेकजातानां एकश्चेत्पुत्रवान्भवेत्। सर्वे ते तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥ – मनु का वचन है कि कई भ्राताओं में से एक भी पुत्रवान् हो तो सभी पुत्रवान् माने जाते हैं । जब भतीजे के होने पर व्यक्ति पुत्रवान् माना जाता है तो वो लोग निःसंदेह शास्त्राज्ञा का उल्लंघन करते हैं जो चचेरे मातुल (मामा) के रहते हुये भी संपत्ति लोभ से मातामह (नाना) का श्राद्ध करते हैं। मनु के वचन से यह सिद्ध होता है कि यदि भ्रातृज्य हो तो वह व्यक्ति पुत्रवान् है और उसके श्राद्ध का अधिकारी दौहित्र (नाती) नहीं हो सकता।

मनु के वचन को आधार मानकर एक बार तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि दौहित्र की अपेक्षा भ्रातृज्यादि का ही प्रथम अधिकार है, इसलिये यदि भ्रातृज्यादि है तो वही श्राद्ध करेगा और धन-संपत्ति भी लेगा। परन्तु यह निष्कर्ष अंतिम तभी हो सकता है जब आगे इस विषय में और स्पष्ट प्रमाण न मिले। यदि आगे और स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हो तो निष्कर्ष से पूर्व और विचार अपेक्षित है।

यह तो पूर्व ही स्पष्ट हो गया है कि दौहित्र का अधिकार किस स्थिति में नहीं है लेकिन पुनः स्मरण कराना आवश्यक है यदि नाती नाना का धन नहीं ले तो नाना का श्राद्ध करने का अधिकार नहीं होगा। आगे सर्वप्रथम कात्यायन का वचन लिया गया है जिसमें यह कहा गया कि सपिण्डी, षोडश और वार्षिक श्राद्ध में नाती का अधिकार नहीं होता :

कर्षूसमन्वितं मुक्त्वा तदाद्यं श्राद्धषोडशम् । प्रत्याब्दिकं च शेषेषु पिण्डास्स्युष्षडिति स्थितिः ॥ – कात्यायन पूर्णरूप से स्पष्ट करते हुये कहते हैं कि सपिंडीकरण सहित षोडशश्राद्ध और आब्दिक अर्थात वार्षिक श्राद्धों को छोड़कर शेष सभी श्राद्धों में षट्पुरुषों (पितरों) की उपस्थिति होती है। अर्थात अन्य सभी सभी श्राद्धों में नाती का अधिकार सिद्ध है। आगे भाव यह है कि यदि नाना का धन नाती लेता है तो उसे इन षोडश व वार्षिक श्राद्धों का भी अधिकार प्राप्त होता है, क्योंकि इसका अभाव धन नहीं लेने की स्थिति में ही होता है।

पितृन् मातामहांश्चैव द्विजश्श्राद्धेन तर्पयेत् । अनृणश्च पितॄणां तु ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ – व्यास जी के इस वचन में कहा गया है कि द्विज पित्रादिकों और मातामहादिकों दोनों का तर्पण-श्राद्धादि करे, ऐसा करने वाला पितृऋण से मुक्त होकर ब्रह्मलोक गमन करता है।

कृत्वा तु पैतृकं श्राद्धं पितृमभृतिषु त्रिषु । कुर्यान्मातामहानां च तथैवानृण्यकारणात् ॥ – पुराणों में भी इस प्रकार का वचन मिलता है कि पित्रादिकों के साथ मातामहादिकों का श्राद्ध करना पितृऋण से मुक्तिदायक होता है।

इतना ही नहीं पुराणों में तो मातामहादिकों का पार्वण श्राद्ध करना दौहित्र के लिये अनिवार्य बताया गया है, और नहीं करने पर अर्थात् मातामहादिकों का पार्वण न करके मात्र पित्रादि का करना दोषपूर्ण और नरक देने वाला भी कहा गया है – पार्वणं कुरुते यस्तु केवलं पितृहेतुकम् । मातामह्यं न कुरुते पितृहा स प्रजायते ॥ पितरो यत्र पूज्यन्ते तत्र मातामहा ध्रुवम् । अविशेषेण कर्तव्यं विशेषान्नरकं व्रजेत् ॥

श्राद्धं मातामहानां तु अवश्यं धनहारिणा । दौहित्रेणार्थनिष्कृत्यै कर्तव्यं विधिवत्सदा ॥ – स्कंदपुराण के इस वचन से और अधिक स्पष्ट हो जाता है कि दौहित्र को मातामह के सभी श्राद्ध का अधिकार है एवं यदि मातामह का धन-सम्पति ले तो षोडश श्राद्ध, सपिंडीकरण और वार्षिक श्राद्ध का भी अधिकार प्राप्त हो जाता है।

अपितु आशय तो और अधिक बताया गया है कि यदि दौहित्र धन ग्रहण करे तो श्राद्ध भी अनिवार्य रूप से करे। यहां श्राद्ध कहने का तात्पर्य पार्वण या नान्दी श्राद्ध नहीं हो सकता क्योंकि उसमें तो अधिकार सिद्ध और अनिवार्य ही है। यहां श्राद्ध कहने का तात्पर्य सपिंडीकरण सहित षोडश श्राद्ध और वार्षिक श्राद्धादि ही है जो धन नहीं लेने की स्थिति में प्राप्त नहीं होता है।

पुनः आगे और अधिक स्पष्ट हो जाता है :
मलमेतन्मनुष्याणां द्रविणं यत्प्रकीर्तितम् । तद्गृह्णन् मलमादत्ते दुर्भेदं ज्ञानिनामपि ॥
ऋषिभिस्तस्य निर्दिष्टा निष्कृतिः पावनी परा । आदेहपतनात्कुर्यात्तस्य पिण्डोदकक्रियाम् ॥

धन-संपत्ति मनुष्य का मल होता है और जो धन ग्रहण करता है उसे मल भी प्राप्त होता है जो उसके लिये तत्क्षण दुर्भेद्य हो जाता है अर्थात उस मल से निवृत्ति पाना कठिन होता है। लेकिन ऋषियों ने इसकी निष्कृति हेतु भी पावन कर्म का विधान किया है कि जिसका मल सहित धन प्राप्त हुआ हो आजन्म (आदेहपतनात् – जब तक शारीरिक सामर्थ्य रहे) उसके लिये पिण्ड-जल प्रदान करे।

कुर्यान्मातामहश्राद्धं नियमात्पुत्रिकासुतः । उभयोरपि सम्बद्धः कुर्यात्स उभयोरपि ॥ दौहित्र के लिये पुनः कहा गया है कि वह मातामह का श्राद्ध भी करे। दौहित्र दोनों कुलों से सम्बद्ध होता है इसलिये दोनों पक्षों पितृपक्ष और मातामह पक्ष की भी क्रिया करे।

याज्ञवल्क्य का वचन है – “औरसोधर्मपत्नीजस्तत्समः पुत्रिकासुतः” अर्थात नाती औरस पुत्र के ही समान होता है।

किन्तु एक तथ्य यहां विशेषविचारणीय है जो दौहित्र का ही प्रथम अधिकार सिद्ध करता है क्योंकि द्वादश पुत्रों में तो कानीन की भी गणना की गयी है एवं यदि पुत्रिकापुत्र को तो औरसपुत्र के ही समान कहा गया है। और यहां यह भी एक गंभीर प्रश्न है कि पुत्रिकापुत्र व भ्रातृज्य में कौन प्रथम अधिकार रखता है। भ्रातृज्य का अधिकार धनग्रहण, सपिण्ड, सगोत्र आदि के कारण ऊपर हो जाता है किन्तु दौहित्र का औरस समानता से ऊपर हो जाता है। यहां अधिकार का निर्णय स्वाभाविक रूप से दौहित्र के पक्ष में जाता है और भ्रातृज्यादि का अधिकार भी दौहित्राभाव में सिद्ध होता है न कि दौहित्र की उपस्थिति में।

इस प्रकार यहां पर्याप्त प्रमाण दिया गया है और भी बहुत सारे प्रमाण शास्त्रों में हैं जो अवलोकन किये जा सकते हैं। यहां निष्कर्ष तक पहुंचने के लिये इतने प्रमाण पर्याप्त हैं।

जिस समय तक राजकीय रूप से संपत्ति का उत्तराधिकार पुत्री (दौहित्र) को नहीं था अथवा मलत्व दोष के कारण धन ग्रहण नहीं करते थे तब तक उनको सपिंडीकरण सहित षोडश और वार्षिक श्राद्ध का अधिकार ही प्राप्त नहीं होता था। अस्तु इस कारण भ्रातृज्यादि जो धन का उत्तराधिकारी होता था उसे ही सपिण्डीकरण सहित षोडश और वार्षिक श्राद्ध का अधिकार प्राप्त रहता था।

लेकिन वर्त्तमान में जब राजकीय विधि से सम्पत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त भी होता है और धन में मलत्व दोष भी नहीं दिखता अर्थात धन ग्रहण करने को आतुर रहते हैं और ग्रहण करते हैं तो सपिण्डीकरण सहित षोडश श्राद्ध और वार्षिक श्राद्ध का अधिकार भी प्राप्त हो जाता है, इसके अतिरिक्त अन्य श्राद्धों का तो अधिकार होता ही है।

एक अन्य पक्ष जो राजकीय विधि से सम्बद्ध है वह ये कि सम्पत्ति के उत्तराधिकार निर्धारण संबंधी प्रावधान में संभवतः इस प्रमाण की अनदेखी की गयी है, विधायिका को चाहिये कि संपत्ति के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों के लिये इन प्रमाणों का विचार करते हुये पुनः आवश्यक संशोधन करे। जैसे :

  • जो श्राद्ध करने का उत्तरोत्तर अधिकारी है उन सबका संपत्ति में उत्तराधिकार होगा।
  • संपत्ति का उत्तराधिकारी वही होगा जो आस्तिक हो और श्राद्ध करे।
  • जो नास्तिक बन जाता है उसका संपत्ति में भी अधिकार नहीं होगा, भले ही वह पुत्र क्यों न हो।
  • जो किसी कारण से पंथपरिवर्तन करके पूजापद्धति बदल लेता है अर्थात श्राद्ध नहीं करता है उसको संपत्ति का उत्तराधिकार नहीं होगा।

मातामह श्राद्ध में दशाहाशौच का प्रमाण

प्रश्न : आवश्यकता अब यह है कि दौहित्र अर्थात नाती यदि मातामह अर्थात नाना का षोडश श्राद्ध करे तो उसे दशाहाशौच होगा इसका कोई प्रमाण भी है ? क्योंकि यदि प्रमाण द्वारा पुष्टि हो जाये तो यह मान्य सिद्ध होगा और विवाद का समापन हो जायेगा।

उत्तर : हां इस तथ्य का प्रमाण भी है कि यदि मातामह का और्ध्वदेहिक कर्म दौहित्र करे तो उसे दशाहाशौच ही होता है और वह भी षोडश श्राद्ध दशरात्राशौच के उपरांत ही करे। इस विषय में पारस्कर का वचन इस प्रकार प्राप्त होता है :

पुत्रो भ्राताऽथ दौहित्रो ज्ञातिर्जामातृकोऽपि वा। प्रथमेऽहनि यो दद्यात्स दशाहं समापयेत्॥

और भी

स्वगोत्रो वान्यगोत्रो वा यदि स्त्री यदि वा पुमान् । प्रथमेऽहनि यो दद्यात् स दशाहं समापयेत् ॥
दाल्भ्य स्मृति : १४१

अन्यगोत्रोऽपसंबन्धः प्रेतस्याग्निं ददाति यः । पिण्डं चोदकदानं च स दशाहं समाचरेत् ॥
लघुहारीत स्मृति ६०

असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत् । अशित्वा च सहोषित्वा दशरात्रेण शुध्यति ॥
कूर्मपुराण/उत्तरभाग/२३/३७

प्रथमेऽहनि यो दद्यात्स दशाहं समापयेत्” यह पंक्ति अनेकानेक स्मृतियों में उपलब्ध हैं जिसका तात्पर्य पिण्डोदक क्रिया के संबंध से यह है कि जो प्रथम दिवस करे वही दशाह पर्यन्त करे। अर्थात उसके लिये दशाहशौच की ही सिद्धि हो जाती है।

  • यदि मृतक के अन्न व गृहवास दोनों में संलित्प हो जाये तो मृतक की जाति का अशौच होता है।
  • यदि शव का अलंकरण करे तो दशाहाशौच होता है।
  • यदि धन में लोभ हो अर्थात मृतक का अंत्येष्टि व और्ध्वदेहिक कर्म धन के कारण किया जाये तो दशाहाशौच होता है।
  • यदि प्रेत का पिण्डदान (दशगात्र) किया जाये तो भी दशाहाशौच (मृतक का पूर्णाशौच) हो जाता है भले वह असपिण्ड अथवा अज्ञाति भी क्यों न हो।

उत्तरक्रियाशौच

यहां विचारणीय यह है कि यदि मरणाशौच की व्याप्ति नहीं होती तो पुनः पूर्णाशौच होता कैसे है ? यह प्रश्न बहुत ही गंभीर है और इसका उत्तर गंभीरता से समझना आवश्यक है। वास्तविकता यह है कि वर्त्तमान काल में पञ्चाङ्ग प्रकाशित होते हैं एवं सभी पंचांगों में संक्षिप्त अशौच विधान (हिन्दी आदि स्थानीय भाषा में) दिया होता है एवं निर्णयकर्त्ता उसके आधार पर ही निर्णय करते हैं जो कि स्वयं ही दोषपूर्ण है क्योंकि निर्णय करने के लिये शास्त्र का ज्ञान आवश्यक होता है न कि दो-चार पंक्तियों का छोटा सा लेख।

इसके साथ ही पंचांगों में मरणाशौच का संक्षिप्त वर्णन होता है एवं कुछ जन्माशौच का जिसके आधार पर सामान्य परिस्थिति में निर्णय लिया जा सकता है तदपि वैसा निर्णय ब्रह्मघात तुल्य होता है किन्तु उसमें उनके कोई प्रमाण नहीं होते और प्रमाणहीन होने से ब्रह्मघात दोष होता है “बिना शास्त्रेण यो ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातकं” और यही कारण है कि “संपूर्ण कर्मकांड विधि” पर जो भी लेख प्रकाशित किये जाते हैं उसमें प्रमाणों द्वारा पुष्टि की जाती है, अप्रामाणिक विश्लेषण नहीं किया जाता है। यद्यपि इस कारण से आलेख विस्तृत हो जाता है जो कुछ लोगों को अच्छा नहीं भी लगता है, तथापि शास्त्रनिष्ठों और आस्थावानों के लिये ज्ञानवर्धक और रुचिकर भी होता है किन्तु इनकी तो संख्या ही न्यून है।

यदि हम दौहित्र के लिये मातामह श्राद्ध में अशौच का विचार कर रहे हैं तो यहां हमें यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इसका निर्धारण मरणाशौच के आधार पर नहीं होगा। अधिकांशतः मतिच्छिन्न इसमें मरणाशौच विधान से ही निर्णय लेते हैं और कहते हैं कि दौहित्र (नाती) तो त्रिरात्र का ही अधिकारी होता है अर्थात उसे तो त्रिरात्राशौच ही होता है। अरे अपण्डितों (पंचांग की चार पंक्तियां पढ़कर निर्णय करने वाले ब्रह्मघाती) ये बिना कुछ किये सामान्य विधान से मरणाशौच होता है। क्या बात समझ में आ रही है ?

उत्तरक्रियाशौच

यदि वह कुछ न करे तो उसे त्रिरात्राशौच होगा। तुम्हारे लिये तुम्हारे स्तर का एक प्रश्न है और यदि तुमने इसका उत्तर ढूंढ लिया तो इस प्रकार से कभी भी निर्णय नहीं करोगे। मित्र और पुरोहित को भी श्राद्ध का अधिकार है; सोचो यदि मित्र या पुरोहित प्रेत क्रिया और श्राद्ध करे तो उसे कितने दिन का अशौच होगा ? एक रात का या त्रिरात्र अथवा दशरात्र ? समस्या यह है कि शास्त्रविमुख हो और यत्र-तत्र दो-चार पंक्तियां पढ़कर, वीडियो देखकर पंडित बन बैठे हो।

आओ ऑंखें खोलो और सर्वप्रथम यह जान लो कि यहां मरणाशौच होता ही नहीं है और मरणाशौच का विचार ही नहीं होगा। यहां उत्तरक्रियाशौच होता है और उसके अनुसार विचार व निर्णय होगा। क्या उत्तरक्रियाशौच समझ में आ रहा है ? नहीं न ! निमित्त भेद से अशौच के चार प्रकार होते हैं : जननाशौच, मरणाशौच, उत्तरक्रियाशौच और दोषशौच।

उत्तरक्रियाशौच का तात्पर्य है प्रेत की क्रिया के कारण होने वाला अशौच। उत्तरक्रियाशौच ८ होते हैं : रोदन, स्पर्श, अलंकरण, अनुगमन, वहन, दहन, उदकदान और पिण्डदान (दशगात्र) एवं भिन्न-भिन्न उत्तरक्रिया के आधार पर भिन्न-भिन्न दिनों का अशौच होता है एवं इसी प्रकार दोषाशौच में तो ढेरों विषय आते हैं जिसमें अशौची का अन्न भोजन करना और अशुचि के गृह में वास करना व अन्यान्य संसर्ग भी आता है।

अशौची (मृतक के घर) का अन्न ग्रहण करने से त्रिरात्राशौच होता है और उसके घर में वास करने से भी। किन्तु यदि दोनों ही क्रिया कर लें तो दशरात्राशौच हो जाता है। यदि नाती ननिहाल में मातामह के घर में रहकर कर्म कर रहा है तो यह भी प्रभावी हो जाता है किन्तु यदि स्वगृह में कर रहा हो अथवा अन्यत्र कर रहा हो तो नहीं होगा। किन्तु उत्तरक्रियाशौच होगा ही होगा।

  • रोदन में भिन्न-भिन्न वर्णभेद से सद्यः-त्रिरात्राशौच व्याप्त होता है।
  • स्पर्श में दिवस्पर्श में नक्षत्रदर्शन तक का और रात्रिस्पर्श में सूर्यदर्शन तक का अशौच होता है।
  • असजातीय शव के अलंकरण में पूर्णाशौच होता है।
  • अनुगमन में स्नान, घृतप्राशन, प्राणायाम से शुद्धि होती है।
  • वहन, दहन,उदकदान में सामान्यतः त्रिरात्राशौच कहा गया है। मतभेद से पूर्णाशौच भी।
  • पिण्डदान (प्रेत पिण्ड) में पूर्णाशौच (मृतक) की जाति का होता है।
उत्तरक्रियाशौच निर्धारण

अब सोचो उत्तरक्रिया में दो क्रिया ऐसे हैं जिससे पूर्णाशौच की व्याप्ति होती है – अलंकरण व पिण्डदान। एवं ये विचार दौहित्र मात्र के लिये ही नहीं मित्र-पुरोहित आदि अथवा अन्यान्य असंबन्धी, असजातीय व्यक्ति के लिए किया जायेगा अर्थात दौहित्र की तो बात छोड़ो कोई भी करे पूर्णाशौच (मृतक की जाति का) ही होगा।

अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव वा। सवासा जलमाप्लुत्य घृतं प्राश्य विशुध्यति॥
विष्णुधर्मोत्तरपुराण/ खण्डः २/७५/२४

असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत् । विशुध्यति त्रिरात्रेण मातुराप्तांश्च बान्धवान् ॥
यद्यन्नमति तेषां तु दशाहेनैव शुध्यति । अनदन्नन्नमह्नैव न चेत्तस्मिन्गृहे वसेत् ॥
अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव च । स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥

मनुस्मृति/५/९९ – १०२

यस्तु भुङ्‌क्ते पराशौचे वर्णी सोऽप्यशुचिर्भवेत् । आशौचशुद्धौ शुद्धिश्च तस्याप्युक्ता मनीषिभिः ॥
शंख स्मृति १५/२२

इस प्रकार यहां मरणाशौच से विचार नहीं होता है उत्तरक्रियाशौच से विचार होता है। पंचांग की चार पंक्तियां पढ़कर निर्णय देने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। निर्णेता बनने के लिये शास्त्रज्ञान की आवश्यकता होती है और इसके लिये यदि गुरुकुल में अध्ययन न किया तो स्वाध्याय तो करना ही होगा। यदि स्वाध्याय भी नहीं करते हो तो निर्णय देने का अधिकार ही नहीं रखते हो और यदि अनधिकृत रूप से निर्णय करते हो तो ब्रह्मघाती बनते हो।

निष्कर्ष

बिंदुवार क्रम से निष्कर्ष इस प्रकार कहे जा सकते हैं :

  • दौहित्र का मातामहादि के लिये पार्वण, नान्दी, तीर्थ, महालय आदि सभी श्राद्धों में अधिकार होता है, संपत्ति का उत्तराधिकारी हो या न हो अनिवार्य कर्तव्य है।
  • यदि मलत्व दोष के कारण संपत्ति ग्रहण न करे तो सपिंडीकरण सहित षोडश श्राद्ध और वार्षिक श्राद्ध में दौहित्र का अधिकार भी सिद्ध नहीं होता।
  • सम्पत्ति का उत्तराधिकारी जो बने चाहे वह भ्रातृज्यादि सापिण्ड हो अथवा दौहित्र हो उसे ही सपिंडीकरण सहित षोडश श्राद्ध और वार्षिक श्राद्ध का भी अधिकार प्राप्त होता है।
  • संपत्ति ग्रहण करने वाला जब तक शारीरिक रूप से समर्थ रहे अर्थात जीवन पर्यन्त वार्षिक, महालयादि श्राद्ध करने के लिये भी शास्त्रीय विधि से वाध्य होता है अन्यथा नरक का भागी होता है क्योंकि ऋण से मुक्त नहीं हो सकता।
  • प्रेतक्रिया करने वाला कोई भी हो असंबन्धी, असजातीय उसे मृतक की जाति का पूर्णाशौच होता है और यह उत्तरक्रियाशौच है न कि मरणाशौच।

आशा है कि इस आलेख से अपुत्रों के सपिण्डीकरण सहित षोडश श्राद्ध और वार्षिक श्राद्ध आदि में दौहित्र व भ्रातृज्यादि सापिण्ड में अधिकार सम्बन्धी विवाद उत्पन्न होता है उसका निस्तारण संभव हो जाता है। हां जो नास्तिक होते हैं अर्थात धर्म और धर्मशास्त्रों में विश्वास नहीं करते उनको तो संपत्ति का उत्तराधिकार ही नहीं होना चाहिये।

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