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मुहूर्त विचार और पंचाङ्ग: मुहूर्त निर्धारण में योग और करण की उपेक्षा का कड़वा सच

मुहूर्त विचार और पंचाङ्ग: मुहूर्त निर्धारण में योग और करण की उपेक्षा का कड़वा सच मुहूर्त विचार और पंचाङ्ग: मुहूर्त निर्धारण में योग और करण की उपेक्षा का कड़वा सच

“शास्त्रों में योग और करण के विषय में केवल निषेध प्राप्त होता है, प्रशस्त पक्ष नहीं।”

आज हम पञ्चाङ्गों में मुहूर्त का अवलोकन करते हैं अथवा मुहूर्त निर्धारण प्रकरण में ही अवलोकन करते हैं जो पञ्चाङ्ग में उपलब्ध होता है वहां हमें योग-करण का विचार प्राप्त नहीं होता। तिथि-नक्षत्र और वार यही तीनों विचार देखने को मिलता है और इस कारण एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि पञ्चाङ्ग का तात्पर्य पांच अंगों से है – तिथि, वार, नक्षत्र, योग, और करण तो मुहूर्त्त निर्धारण में योग करण का विचार क्यों नहीं किया है। आज हम इसी विषय को समझने का प्रयास करेंगे।

मुहूर्त विचार और पंचाङ्ग: मुहूर्त निर्धारण में योग और करण की उपेक्षा का कड़वा सच

इस विमर्श में आगे बढ़ने से पूर्व यह आवश्यक है कि आप जिन पंचांगों का उपयोग करते हैं उसमें अवलोकन कर लें और पुष्ट कर लें कि आपके पंचांग में योग और करण का विचार करके मुहूर्त्त निर्धारण किया गया है अथवा इसका विचार नहीं किया गया है। यदि आपके पञ्चाङ्ग में ऐसा विचार नहीं किया गया होगा तो कहीं-न-कहीं उद्धृत अवश्य होगा कि योग-करण का विचार नहीं किया गया है। कुछ अहंकारी भी होते हैं जो ऐसा उद्धृत नहीं करते तो उनको प्रश्न किया जा सकता है।

मुहूर्त विचार और पंचाङ्ग: मुहूर्त निर्धारण में योग और करण की उपेक्षा का कड़वा सच

अर्थात पञ्चाङ्ग में यदि योग और करण का विचार मुहूर्त निर्धारण हेतु नहीं किया जा रहा है तो वह मुख्यपृष्ठ पर बड़े अक्षरों में अंकित होना चाहिये ताकि सभी भली-भांति समझ सकें और यदि अंकित नहीं है तो पंचांगकारों से संपर्क करके अवगत करें कि या तो इस प्रकार लिखें अथवा विरोध हेतु तैयार रहें।

मुहूर्त्त निर्धारण में पांचों अंगों का विचार

मुहूर्त्त निर्धारण में पांचों अंगों का विचार होता है और करना ही चाहिये यदि पंचांगकर्त्ता स्पष्ट करके बता रहा हो तो वहां उसने यह अवश्य लिखा होगा कि स्वयं विचार कर लें। इससे स्पष्ट होता है कि योग और करण का विचार भी आवश्यक होता है किन्तु इससे सिद्धि नहीं होगी क्योंकि जितने पंचांगों में उद्धृत होगा उससे दोगुने पंचांग होंगे जिसमें उद्धृत ही नहीं होगा। इस नियम से तो फिर असिद्धि भी हो जायेगी। तात्पर्य यह है कि ये केवल विमर्श केवल तात्कालिक भ्रमोच्छेदन हेतु किया गया है।

यात्रा-प्रवेशादि में राशि-लग्न विचार से सम्मुख-दक्षिण जहां प्रशस्त है वहीं पृष्ठ-वाम निषिद्ध है। मुहूर्त विषय में जब लग्न विचार समाहित होता है तो और भी कई नियम स्वतः स्थापित हो जाते हैं।

प्रामाणिक पुष्टि

उपरोक्त तथ्य को समझने के लिये यदि एक उदाहरण का अवलोकन करें तो उत्तम रहेगा। यहां हम प्रतिष्ठादि मुहूर्त के विषय को उदाहरण में ग्रहण कर रहे हैं और सर्वप्रथम इसके मुहूर्त के जो प्रमाण प्राप्त होते हैं उनका अवलोकन करते हैं :

प्राजेशशक्रहरिहस्तसमीरणेषु मूलेन्दुमैत्रगुरुपौष्णशिवोत्तरेषु ।
शस्तेदिने शुभतिथौ शशिनीप्रवृद्धे धन्यां वदन्ति निखिलां शुभदांप्रतिष्ठाम् ॥

बृहज्योतिषसार

ध्रुवमृदुलघुवर्गे वारुणे विष्णुदेवे मरुददिति धनिष्ठे शोभने वासरे च ।
त्रिदशमदनजन्मैकादशे शीतरश्मौ विबुध-सुकृतिरिष्टा नाडिनक्षत्रहीने ॥

व्यावहारिक ज्यौतिष तत्वों

हस्तत्रये मित्रहरित्रये च पौष्णद्वयादित्यसुरेज्यभेषु ।
तिस्त्रोत्तरा धातृ शशांकभेषु सर्वामरस्थापनमुत्तमं स्यात् ॥

नक्षत्रशुद्धि में वशिष्ठ वचन

जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा सौम्यायने जीवशशाङ्कःशुक्रे ।
दृश्ये मृदुक्षिप्रचरध्रुवे स्यात्पक्षे सिते स्वर्क्षतिथिक्षणे वा ॥
रिक्तारवर्ज्ये दिवसेऽतिशस्ता शशाङ्कपापैस्त्रिभवाङ्गसंस्थैः ।
व्यन्त्याष्टमैः सत्खचरैर्मृगेन्द्रे सूर्यो घटे को युवतौ च विष्णुः ॥
शिवो नृयुग्मे द्वितनौ च देव्यः क्षुद्राश्चरे सर्व इमे स्थिरर्क्षे ।
पुष्ये ग्रहा विघ्नपयक्षसर्पभूतादयोऽन्त्ये श्रवणे जिनश्च ॥

मुहूर्त चिंतामणि

वर्जित योग और करण

अब आगे प्रश्न वर्जित योग और करण के विषय का है :

जन्मर्क्षमासतिथयो व्यतिपातभद्रा वैधृत्यमापितृदिनानि तिथिक्षयर्द्धी ।
न्यूनाधिमासकुलिकप्रहरार्द्धपाताः विष्कम्भवज्रघटिकात्रयमेव वर्ज्यम् ॥

परिघार्द्धं पञ्च शूले षट् च गण्डातिगण्डयोः । व्याघाते नव नाड्यश्च वर्ज्याः सर्वेषु कर्मसु ॥
मुहूर्त चिंतामणि

विरुद्धयोगेषु सदाद्यपादः शुभेषु कार्येषु विवर्जनीयः ।
सवैधृतिस्तु व्यतिपातयोगः सर्वोऽप्यनिष्टः परिघस्य चार्धम् ॥
तिस्रस्तु विष्कम्भकवज्रयोश्च व्याघातसंज्ञे नव पञ्च शूले ।
गण्डातिगण्डे च षडेव नाड्यः शुभेषु कार्येषु विवर्जनीयाः ॥

विष्टिस्तु सर्वथा त्याज्या क्रमेणैवागता तु या । अक्रमेणागता भद्रा सर्वकार्येषु शोभना ॥
बृहज्योतिषसार

यहां वर्जित योग-करण विषयक कुछ प्रमाण हैं, किन्तु हमें वर्जित योग-करण का निर्धारण नहीं करना है अन्यथा और भी प्रमाणों की आवश्यकता होगी। हमें केवल यह समझना है कि योग और करण के विषय में निषिद्ध का उल्लेख है किन्तु किसी भी मुहूर्त्त निर्धारण हेतु प्रशस्त का नहीं। इस प्रकार मुहूर्त्त निर्धारण में योग और करण का भी विचार होता है किन्तु वर्जित का त्याग करने के लिये। दुर्भाग्य से पंचांगकार मुहूर्त्तविचार में वर्जित योग-करण का त्याग नहीं करते यह चिंताजनक है। जिस पंचांग में विचार किया जाता है वो प्रशंसनीय।

वर्जित योग और करण

निष्कर्ष

मूल निष्कर्ष यह है कि मुहूर्त निर्धारण में तिथि, वार और नक्षत्र की भाँति योग और करण का विचार भी उतना ही अनिवार्य है। अंतर केवल इतना है कि तिथि-नक्षत्र में ‘प्रशस्त’ (श्रेष्ठ) पक्ष को ढूँढा जाता है, जबकि योग और करण में केवल ‘निषिद्ध’ (वर्जित) पक्ष का त्याग किया जाता है। व्यतिपात, वैधृति, विष्कम्भ या परिघ जैसे दुष्ट योगों की विशिष्ट घड़ियों और विष्टि (भद्रा) करण का त्याग किए बिना निकाला गया कोई भी मुहूर्त शुभ फल नहीं दे सकता। पंचाङ्गकारों द्वारा इस विषय को छिपाना या मुख्य पृष्ठ पर अंकित न करना जनसामान्य के साथ एक बड़ा प्रपंच है। अस्तु, यदि पंचाङ्ग में योग-करण का शोधन नहीं है, तो वह मुहूर्त अधूरा और अग्राह्य है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत निष्कर्ष प्रामाणिक ग्रंथों के सूक्ष्म अंतर्संबंधों के समन्वय पर आधारित हैं। पारंपरिक रूप से प्रचलित देश-भेद या कुलाचार जनित भ्रम की स्थिति में सुधी पाठक शास्त्रीय साक्ष्यों को ही सर्वोपरि मानें। उपरोक्त विश्लेषण समझने के लिये है किसी भी प्रकार का निर्णय स्वविवेक, शास्त्रमंथन और विद्वानों के निर्देशन में लें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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