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जीवन और फल

जीवन का अंतिम फल जीवन का अंतिम फल

एक ऐसा दृश्य प्राप्त हुआ जो जीवन के मूल फल को प्रकट करता है और यह स्पष्ट करता है कि चाहिये क्या, प्रयास किसके लिये करें, इच्छा क्या करें ? यद्यपि ऐसा दृश्य सबके जीवन में भी कहीं न कहीं घटित होते हुये भी दिखता है तथापि उसका सन्देश ग्रहण नहीं करते हैं। सन्देश ग्रहण नहीं करते हैं इसका कारण लोभ-मोह आदि कहना भी अनुचित होगा यह तो वास्तव में दुराग्रह है जो सन्देशग्राह्यता को ही अवरुद्ध कर देता है, बुद्धि और मन दोनों विपरीत प्रवाह में प्रवाहित होते हैं।

जो दृश्य आया है उसमें कर्मकांडियों के लिये एक सीखने का विषय तो यह भी है कि स्तोत्र पाठ कैसे करें ?

सफल जीवन

किन्तु ये सामान्य विषय है मूल विषय/संदेश जीवन के फल का है। जिसने फल प्राप्त कर लिया उसका जीवन ही सफल सिद्ध होगा अन्यथा तो निष्फल ही कहा जायेगा। जीवन का सफल करना चाहें तो उस फल को प्राप्त करना होगा जो जीवन का फल है। जीवन का फल क्या है यह उस वीडियो में देखा और समझा जा सकता है जो आधार है और यहां कहीं न कहीं (आगे-पीछे) मिलेगी।

इस विषय का जो भी यह विश्लेषण है इसमें वाक्य संरचना/व्याकरण से सम्बंधित त्रुटि-विसंगति को ग्रहण करने वाले करें हमें आपत्ति नहीं होगी और स्वीकारता हूँ ढेरों त्रुटि-विसंगति होगी। किन्तु जो आत्मकल्याण के इच्छुक हैं वो भाव को ग्रहण करें।

दिवंगत नारायणदासजी व्यास का अंतिम वीडियो वाराणसी से आया है जो सम्पूर्ण लेख का आधार है और जीवन के फल का ज्ञान कराता है। वीडियो में जो दिखता है वो यह कि ब्राह्मणों के समूह में स्थित कृष्णाष्टकं का पाठ (उत्कृष्ट) करते हुये माइक अपने उत्तराधिकार शिष्य (अथवा जो भी हो) को प्रदान करते हैं और थोड़ा झुकते हैं। जब नेत्रों पर हाथ फेरते हैं तो प्रतीत होता है कि परमात्मा से जीवन का अंतिम निवेदन भक्ति से ओत-प्रोत प्रेमाश्रु समर्पित कर रहे हैं और इसकी कल्पना करके मैं रोमांचित हो जाता हूँ में यदि वक्तव्य देने को कहा जाये तो कंठ अवरुद्ध हो जायेगा क्योंकि लेखनकार्य में भी अवरुद्ध हो रहा है किन्तु कंठ के अवरोध से लेखन कार्य अवरुद्ध नहीं होता एवं लिखकर ही व्यक्त कर सकता हूँ।

प्रेमाश्रु अर्पित करने के पश्चात् एक बार लगता है जैसे पुनः संसार में स्थित हो रह हैं किन्तु ऐसा होता नहीं है विमान पर आरूढ़ हो जाते हैं एवं ऐसा लिखते हुये मेरे नेत्रों में आंसू आ रहा है वह व्यक्ति कैसे थे जिनकी ऐसी सद्गति हुयी कल्पना नहीं कर सकता। व्यावहारिक जीवन के अनेकों पक्ष होते हैं और कुछ विरोधी भी होते हैं एवं विरोधियों की प्रतिक्रिया ऐसी भी हो सकती है : “अमुक गलती किये थे, मैंने मना किया था या कहा था लेकिन नहीं माने और देख लो, चल गये, दण्ड मिल गया” अथवा इसी प्रकार पूर्व की घटनाओं को भी स्मरण करके कह-सुन सकते हैं यही संसार है और ऐसा ही है।

मेरा कोई पूर्व परिचय नहीं है अस्तु न राग और न द्वेष पूर्णतः निष्पक्ष एवं केवल उसी अंतिम घड़ी पर आधारित भाव, अन्य कुछ नहीं।

जीवन का यही फल है जो इन्होंने प्राप्त किया और इनका जीवन सफल सिद्ध हो रहा है। आगे क्या हुआ विदित नहीं संभव है अस्पताल ले जाकर नाक-मुंह में पाइप लगाया गया हो क्योंकि ऐसा ही तो सभी कर रहे हैं।

शास्त्र और विज्ञान

शास्त्र और विज्ञान का यही तो विरोध है :

  • शास्त्र कहते हैं जीवन को क्षणभंगुर समझो, मृत्यु का वरण करने के लिये तत्पर रहो, प्रत्येक क्षण को अंतिम समझो, मरने की तैयारी करो और तत्पर रहो।
  • विज्ञान कहता है जीने की इच्छा को समाप्त मत होने दो अर्थात मृत्यु को मत स्वीकारो जीवन और जीवन से जुड़े सुख (सांसारिक) के लिये तत्पर रहो। यदि नास्तिक दर्शन का भाव कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी : “यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्”

यही कारण है कि मैं विज्ञान से किसी भी शास्त्रीय विषय की सिद्धि का प्रबल विरोध भी करता हूँ, दोनों का मार्ग ही भिन्न है एवं विज्ञान (वर्त्तमान साइंस) पूर्णतः धर्म और शास्त्र के विरुद्ध ही गमन करता है। अर्थात यदि विज्ञान से धर्म और शास्त्रीय सिद्धांतों की सिद्धि करने लगें तो कुछ ही काल में नास्तिक हो जायेंगे। इससे बचने का एक ही मार्ग है धर्म और शास्त्रीय विषय में विज्ञान (वर्त्तमान साइंस) के सिद्धांतों का पूर्ण त्याग। हमें वैज्ञानिक कारण ज्ञात हो अथवा नहीं यदि हमारा शास्त्र रात में दधिभक्षण निषेध करता है तो स्वीकारेंगे। वैज्ञानिक तथ्यों से इसकी प्रमाणिकता सिद्ध करने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि वो प्रमाणक है ही नहीं।

मृत्यु की तैयारी

हमारे शास्त्र हमें मृत्यु की तैयारी करने के लिये कहते हैं, जीवन को इस प्रकार जीने के लिये कहते हैं मानो जो घड़ी चल रही है वही अंतिम है। इसी घड़ी आत्मकल्याण का उपाय कर लो अर्थात यदि मृत्यु आये तो चल दो, जीने की इच्छा शेष मत रखना।

कारण जो मृत्यु की घड़ी है उसमें तुम लाख प्रयास करो, विज्ञान कुछ भी कर ले मृत्यु को टाल नहीं सकेगा, तो उस जीवन की इच्छा का क्या लाभ जो जीवन दे ही नहीं सके और कष्टकर मृत्यु का भाजन बना दे।

उत्तम पक्ष तो यही है कि उस मरण के लिये तत्पर रहें जो कष्टप्रद न हो और कल्याणकारी भी हो। हमारे शास्त्र यही कहते हैं और विज्ञान से प्रामाणिकता की आवश्यकता ही नहीं है। यदि इसके लिये विज्ञान से प्रामाणिकता चाहिये तो वहां शास्त्र में आस्था नहीं है और नरक सुनिश्चित है। कारण कि कई बार तो क्षणभर में ही दुर्घटना होने पर मृत्यु हो जाती है यदि मृत्यु में लगने वाले काल को आधार बनायें और क्षणभर में स्वस्थ व्यक्ति का मरण हो जाये तो उसे सुखद समझें तो यह भी भ्रम ही होगा, यह तो दुर्मरण संज्ञक है।

सफल जीवन

अर्थात केवल यह आधार नहीं बनाया जा सकता कि कुछ काल पूर्व स्वस्थ थे और अचानक से हृदयाघात अथवा अन्य कुछ हुआ और चुट-पुट में चल बसे। ऐसा नास्तिकों के साथ जो कि घोर नारकीय प्राणी होते हैं; भी हो सकता है, दुर्घटना में भी यही होता है। इसमें केवल एक ही तथ्य विचारणीय होता है कि अधिक काल तक सांसारिक कष्ट नहीं प्राप्त हुआ किन्तु आत्मकल्याण हुआ इसकी सिद्धि नहीं होती।

इसकी सिद्धि केवल यहां हो रही है जो वीडियो में देखने को मिल रहा है। यद्यपि आगे का ज्ञात नहीं किन्तु अनुमान है कि वही अंतिम घड़ी थी, नाक-मुंह में पाइप आदि नहीं लग पाया होगा।

क्या है पाइप लगाना थोड़ा समझते हैं :

एक व्यक्ति जो थककड़ खड़ा हो गया हो और उसे बारम्बार पीछे से धक्का देकर कोई चलने के लिये बाध्य करे तो थोड़ी कल्पना की जा सकती है। ठीक यही स्थिति मृत्युकाल में जब शांत हो रहे हृदय को पाइप आदि लगाकर चलाया जाता है तो होती है। उसके कष्ट की कल्पना मात्र ही की जा सकती है। विज्ञान को इस विषय में आपत्ति भी होगी कि ऐसा कहना उचित नहीं है किन्तु मैं अपने मन से कल्पित अभिव्यक्ति नहीं कर रहा हूँ, शास्त्र यही कहता है।

शास्त्र क्या कहता है

शास्त्र मृत्यु की तैयारी करने के लिये कहता है, वर्त्तमान में काशीवास कर अनशन आदि समाप्त हो चुका है अथवा हो तो विदित नहीं, किन्तु गरुड़पुराण में स्पष्टतः ऐसा कहा गया है। यदि घर में भी किसी का अंतिम समय आया है तो उसके लिये परिवार को भी क्या-क्या करना चाहिये ऐसा विधान बताया गया है। परिवार को यह दायित्व दिया गया है कि हर वो व्यवस्था करो जिससे यमदूत का आगमन न हो सके और मरणोपरांत शान्ति मिले।

इसको मुमूर्षुविधान नाम से जाना जाता है। स्पष्ट है मरण को तत्पर चाहिये न की जीवन के लिए। अब यहां शास्त्र के ही एक व्यवधान उपस्थित होता है और मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना चिल्लाने वालों के लिये यह उत्कृष्ट उदाहरण भी है : जीवेच्छरदः शतं

करें, मैं इस गूढ़ रहस्य का उद्भेदन नहीं कर सकता, सामर्थ्य नहीं और यदि कर भी सकता हूँ तो नहीं करने वाला। ये विषय इस तरह से समझाने योग्य नहीं है विशेषरूप से उन मतिछिन्नों को जो नरकगामी हैं, मुझे नहीं ज्ञात यहीं पर मुझे अल्पज्ञ कहो, मूर्ख कहो, मूढ़ कहो जो भी कहना हो कह दो, सब स्वीकार है किन्तु इस विरोधाभास की संगती नहीं करूँगा। आगे का विषय प्रकट नहीं किया जा सकता क्योंकि भटकने वाले को भटकते ही रहना चाहिये।

मूल उद्देश्य

जीवन का मूल उद्देश्य ही बंधनमुक्ति है और यह तभी संभव है जब जीवन की इच्छा का परित्याग कर दें। यदि जीवन की इच्छा शेष है तो आगे पुनः जीवन प्राप्त होगा, वर्त्तमान जीवन बढे अथवा न बढे अर्थात बंधन में रहेंगे। जीवन का उद्देश्य जो है वह इस वीडियो में मुझे दिख रहा है जिसे न दिखे वो अपने नेत्रों (विवेकचक्षु) की चिकित्सा करे। सभी साधनों का एक मात्र यही फल है :

एतावान् सांख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया ।
जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः ॥

मूल उद्देश्य

अन्यान्य ग्रन्थ मरण को तत्पर रहना सिखाते हों अथवा नहीं किन्तु सम्पूर्ण भागवत मरण को तत्पर रहने के लिये कहता है। परीक्षित के लिये तो अमृत उपलब्ध था यदि जीवन की इच्छा रखना ही उत्कृष्ट है तो जीवन ही प्राप्त करते क्यों मरण को तत्पर थे!

अस्वीकरण :

जो कहा गया वो भी विशेषतः मुमुक्षुओं का ही विषय है और जो नहीं कहा वह तो है ही। मरण तत्पर का तात्पर्य मरने के लिये प्रेरित करना नहीं मृत्युभय को समाप्त करना है जो शास्त्र सम्मत तथ्य है अतः वर्त्तमान युग में जैसा अनर्थ ग्रहण किया जाता है वैसा न करें, किसी को किसी प्रकार से मृत्यु हेतु प्रेरित नहीं किया गया है और आलेख में न ही ऐसा कोई भाव है।

सामान्य रूप से वैज्ञानिक सिद्धांतों का खण्डन करते हुये शास्त्रीय सिद्धांतों को प्रकट किया गया है और इसका आधार शास्त्र ही हैं न कि मेरी कल्पना। मैं न भक्त हूँ न ही तत्वबोध है अस्तु ऐसा भी कोई न समझे क्योंकि वर्त्तमान में तो ऐसा ही चल रहा है जहां भी थोड़ी सी कल्पित षड्यंत्र वाला तथ्य भी प्रस्तुत किया जाता है सब दौड़ पड़ते हैं किन्तु मुझे लेख का श्रेय भी नहीं चाहिये। चाहिए तो वही जो वीडियो में दिख रहा है :

मेरा सांवरा निकट हो
जब प्राण तन से निकले

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