“यदि इतनी मात्र भी अपेक्षा शेष है कि दुनिया में उसकी आत्मज्ञ या महर्षि के रूप में सिद्धि हो, तो अकाट्य सत्य है कि वह साक्षात् अविद्याग्रस्त दम्भी है।”
वर्त्तमान काल में जो देखने को मिल रहा है वो यह कि एक ओर तो जिसे मन करता है धर्मगुरु-जगद्गुरु बन जाता है वहीं दूसरी ओर एक इससे भी विकट स्थिति है वो यह कि कुछ दम्भी जो ब्राह्मण मात्र (नामधारक) भी हैं अथवा नहीं यह अन्वेषण का विषय रहता है किन्तु स्वयं को महर्षि-ब्रह्मर्षि घोषित कर देते हैं अथवा अपने अनुयायियों द्वारा करा लेते हैं। वर्त्तमान काल में ऐसे ढेरों मूढ़ भरे परे हैं किन्तु परवर्ती ऐसा मूढ़ न हो इसके लिये इस विषय का चिंतन-मनन अपेक्षित है। यहां हम ऐसे “रंगे सियारों” की वास्तविकता को शास्त्रीय दृष्टि से समझने का प्रयास करेंगे।
महर्षि-ब्रह्मर्षि (स्वघोषित) या रंगा सियार
“जो देखकर भी चारों वेदों का शुद्ध सस्वर पाठ नहीं कर सकते, वे स्वयं को महर्षि-ब्रह्मर्षि घोषित करके साक्षात् नरकगामी बन रहे हैं।”
सामान्य प्रश्न निरंतर उठते रहते हैं ब्राह्मण के श्राप की शक्ति कहां है, क्योंकि जिस प्रकार की घटनायें घटित होती रहती हैं जो शाप देने में समर्थ हैं वो शाप से ही भस्म क्यों नहीं कर देते ? इसी प्रकार जगद्गुरु, महर्षि आदि लगाने का तो फैशन हो गया है। यहां ब्राह्मण के ८ प्रकार और एक विशेष का वर्णन है। ऋषि तक का प्रयास किया जा सकता है और ऋषि शापानुग्रह सामर्थ्य प्राप्ति ऋषि हेतु ही संभव है, सबके लिये नहीं। हां जो अपने नाम में महर्षि लगाते हैं वो किस आधार से लगाते हैं यह विचारणीय है, यदि मैं ऋषि मात्र बन जाऊं तो योग्य राजा को प्रतिष्ठित कर दूँ; तो :
- ये महर्षि बनके घूमने वाले कर क्या रहे हैं ?
- उन्हें ये क्यों स्मरण नहीं आता कि योग्य राजा को प्रतिष्ठित करने की शक्ति भी उनके पास है ? जैसे पौराणिक कथाओं में वर्णन प्राप्त होता है – उदाहरण वेन से पृथु
मात्रश्च ब्राह्मणश्चैव श्रोत्रियश्च ततः परम्। अनूचानस्तथा भ्रूण ऋषिकल्प ऋषिर्मुनिः॥
एते ह्यष्टौ समुद्दिष्टा ब्राह्मणाः प्रथमं श्रुतौ। तेषां परः परः श्रेष्ठो विद्यावृत्तविशेषतः॥
ब्राह्मणानां कुले जातो जातिमात्रो यदा भवेत्। अनुपेतः क्रियाहीनो मात्र इत्यभिधीयते॥
एकदेशमतिक्रम्य वेदस्याचारवानृजुः। स ब्राह्मण इति प्रोक्तो निभृतः सत्यवाग्घृणी॥
एकां शाखां सकल्पां च षड्भिरंगैरधीत्य च। षट्कर्मनिरतो विप्रः श्रोत्रियोनाम धर्मवित्॥
वेदवेदांगतत्त्वज्ञः शुद्धात्मा पापवर्जितः। श्रेष्ठः श्रोत्रियवान्प्राज्ञः सोऽनूचान इति स्मृतः॥
अनूचानगुणोपेतो यज्ञस्वाध्याययंत्रितः। भ्रूण इत्युच्यते शिष्टैः शेषभोजी जितेंद्रियः॥
वैदिकं लौकिकं चैव सर्वज्ञानमवाप्य यः। आश्रमस्थो वशी नित्यमृषिकल्प इति स्मृतः॥
ऊर्ध्वरेतास्तपस्युग्रे नियताशी नसंशयी। शापानुग्रहयोः शक्तः सत्यसंधो भवेदृषिः॥
निवृत्तः सर्वतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः। ध्यानस्थानिष्क्रियो दांतस्तुल्यमृत्कांचनो मुनिः॥
एवमन्वयविद्याभ्यां वृत्तेन च समुच्छ्रिताः। त्रिशुक्लानाम विप्रेंद्राः पूज्यन्ते सवनादिषु॥
स्कन्दपुराण/१ (माहेश्वरखण्डः)/कौमारिकाखण्ड/५/११० – १२०
ऋषि कौन
यहां ऋषि की एक पहचान बताई गयी है जो विशेष महत्वपूर्ण है : “ऊर्ध्वरेतास्तपस्युग्रे नियताशी नसंशयी। शापानुग्रहयोः शक्तः सत्यसंधो भवेदृषिः॥” जो ऊर्द्ध्वरेता संशयरहित नियताशी हों उग्र तपस्वी, सत्यनिष्ठ आदि हों और शापानुग्रह में समर्थ हों वो ऋषि कहलाते हैं। शापानुग्रह की शक्ति को यहां हम विशेष लक्षण के रूप में ग्रहण कर रहे हैं इस शक्ति के संपन्न एक मात्र ऋषि हों तो योग्य राजा को स्थापित कर दें।
वर्त्तमान में ऋषि की क्या बात करें ढेरों महर्षि-ब्रह्मर्षि तक भटक रहे हैं क्योंकि उपाधि मात्र समझ रहे हैं। यदि कोई अपने नाम में महर्षि-ब्रह्मर्षि आदि उपाधि लगा रहा है तो उसका ज्ञान यहीं पर विदित हो जाता है कि उसने शस्त्रावलोकन तक नहीं किया है। तुम उक्त लक्षणों को धारण करो नाम में ऋषि लगाना तो मूर्खता की पराकाष्ठा है, ऋषियों का अपमान है तिरष्कार है। ये जो अपने नाम में महर्षि-ब्रह्मर्षि लगाते फिर रहे हैं नारकीय प्राणी हैं और मोहजाल में फंसे हुये हैं।
अच्छा जब मतिभ्रम ऐसा हो कि रिसर्चर स्वयं को ऋषि कहता हो भले ही वो अहर्निश असत्य सम्भाषण ही करता हो, आचार-आहार-व्यवहार सर्वप्रकारेण म्लेच्छ हो। तो जिसने भगवा धारण कर लिया वो क्यों न हो ! ऋषि की तो परिभाषा ही वर्त्तमान में यही गढ़ लिया गया है कि जो रिसर्च करता है वही ऋषि होता है। क्या रिसर्च करता है, आचरण कैसा होता है, आहार-व्यवहार आदि कैसे होता है, शक्तियां क्या होती है इन सबका तो कोई महत्व ही नहीं रहा। वशिष्ठ ब्रह्मर्षि थे और उनकी शक्तियां क्या थी ये विश्वामित्र के नंदिनी मोह प्रसंग में स्पष्ट होता है।

स्वघोषित महर्षि-ब्रह्मर्षियों के लक्षण
“वर्तमान युग के महर्षि चाटुकारिता में निपुण होकर राजनेताओं के शरणागत हैं; उनकी शक्ति शापानुग्रह नहीं, अपितु केवल अनुयायियों की संख्या है।”
आज कोई स्वयं को महर्षि-ब्रह्मर्षि से कम तो घोषित ही नहीं करता, ये कहता ही नहीं कि मैं ऋषि हूँ। रिसर्चर वर्ग जो है वो ऐसा सिद्ध करने का प्रयास करता है कि उसे वर्त्तमान में ऋषि समझा जाय। इसका यह दुष्परिणाम है कि जब पूर्णतः म्लेच्छाचारी भी ऋषि कहला सकता है तो जो भगवा धारण करता हो, जिसके लाखों अनुयायी हों वो ऋषि क्यों बनेंगे, वो महर्षि से नीचे कैसे होंगे तो फटाक से महर्षि बन जाते हैं। ऐसे लोगों की विशेषता यही है कि :
- इन्हें हवन विधान तक का ज्ञान नहीं होता, नित्यकर्म तक विदित नहीं होता।
- चाटुकारिता में निपुण होते हैं और नेता के शरणागत होते हैं, केवल प्रदर्शन के लिये नेता प्रणाम कर लेता हो वो भिन्न विषय है।
- इनके अनुयायियों की संख्या लाखों में होती है और यही इनकी शक्ति होती है, शापानुग्रह शक्ति नहीं।
- नेता इनका समर्थन इस अनुयायी संख्या को देखकर ही करता है।
- अनुयायियों में बड़े-बड़े व्यापारी आदि भी होते हैं और वो भी लाभान्वित होते हैं।
- नेता और व्यापारी दोनों का संबंध होने से यह भी सिद्ध होता है कि पीछे और भी होते हैं जैसे गुण्डे, दलाल आदि भले ही सामने न आयें।
- मनोनुकल वक्तव्य देना जानते हैं और यही इनका ज्ञान होता है, दक्षता होती है।
ऋषि संबंधी और विशेष वर्णन वायुपुराण में प्राप्त होता है जो इस प्रकार है :
ऋषीत्येष गतौ धातुःश्रुतौ सत्ये तपस्यथ। एतत्सन्नियते तस्मिन्ब्रह्मणा स ऋषिः स्मृतः ॥
निवृत्तिसमकालं तु बुद्ध्याव्यक्तमृषिः स्वयम्। परं हि ऋषते यस्मात्परमर्षिस्ततः स्मृतः ॥
गत्यर्थादृषतेर्द्धातोर्नामनिर्वृत्तिरादितः । यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्चात्मर्षिता स्मृता॥
ईश्वराः स्वयमुद्भूता मानसा ब्रह्मणः सुताः। यस्मान्न हन्यते मानैर्महान् परिगतः पुरः॥
यस्मादृषन्ति ये धीरा महान्तं सर्वतो गुणैः। तस्मान्महर्षयः प्रोक्ता बुद्धेः परमदर्शिनः ॥
ईश्वराणां शुभास्तेषां मानसान्तरसाश्च ते। अहङ्कारं तमश्चैव त्यक्त्वा च ऋषिताङ्गाताः ॥
तस्मात्तु ऋषयस्ते वै भूतादौ तत्त्वदर्शनाः। ऋषिपुत्रा ऋषीकास्तु मैथुनाद्गर्भसम्भवाः ॥
वायुपुराण/पूर्वार्ध/५९/७९ – ८४
इन महर्षियों/ब्रह्मर्षियों को ये तथ्य पहुंचाये जांय और पूछा जाय कि आप किस आधार पर महर्षि-ब्रह्मर्षि कहलाते हैं ? इन शास्त्रीय संदर्भों का क्या अर्थ है ? वर्त्तमान में जो परिदृश्य घटित हो रहा है यह तो पुराणादि ग्रंथों में पूर्ववर्णित है ही एक उदाहरण वायुपुराण का ही देखें :
क्षुद्राणामन्त्ययोनेस्तु सम्बन्धा ब्राह्मणैः सह। भवन्तीह कलौ तस्मिन् शयनासनभोजनैः ॥
राजानः शूद्रभूयिष्ठा पाषण्डानां प्रवर्तकाः। भ्रूणहत्याः प्रजास्तत्र प्रजा एवं प्रवर्त्तते ॥
आयुर्मेधा बलं रूपं कुलञ्चैव प्रहीयते। शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचाराश्च ब्राह्मणाः ॥
राजवृत्ते स्थिताश्चौराश्चौरवृत्ताश्च पार्थिवाः। भृत्याश्च नष्टसुहृदो युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
अशीलिन्योऽव्रताश्चापि स्त्रियो मद्यामिषप्रियाः। मायामात्रा भविष्यन्ति युगान्ते प्रत्युपस्थिते ॥
वायुपुराण/पूर्वार्ध/५८/३९ – ४३
यहां जो कुछ भी वर्णित है सभी घटित हो रहे हैं और इस अवस्था में कोई स्वघोषित महर्षि तो कोई ब्रह्मर्षि और कोई-कोई तो भगवान ही बन जाता है। जब भगवान बनकर ढेरों धूर्त्त अभी भटक रहे हैं तो महर्षि-ब्रह्मर्षि बनाना कौन सी बड़ी बात है ? इनके अनुयायियों को ये नहीं ज्ञात कि यदि ये महर्षि-ब्रह्मर्षि-भगवान हैं तो इनकी शक्तियां क्या होंगी वो बकवास मात्र से ही तुष्ट रहते हैं अथवा दलाल का कार्य करते हैं।
भगवान “गो ब्राह्मण हिताय” को लेकर चलते हैं, यदि ये सभी महर्षि-ब्रह्मर्षि-भगवान हैं तो देशभर में गाय और ब्राह्मण की रक्षा के लिये इन्होंने क्या-क्या किया है तनिक बताने कहें। अन्यान्य शक्तियां और विशेष कार्यों की तो क्षमता ही नहीं है न। जैसे ही ये चाटुकार नेताओं की चाटुकारी करते हैं, पिछलग्गू बनते हैं वैसे ही इनकी वास्तविकता भी सामने आ जाती है। अरे धूर्त्तों यदि तुम महर्षि-ब्रह्मर्षि हो तो तुम योग्य राजा को प्रतिष्ठित करने में भी समर्थ हो सकते हो, चाटुकारी क्यों करते हो ?
अरे धूर्त्तों तुम्हारी उपस्थिति में धर्मविरुद्ध सभी कार्य हो रहे हैं और तुम बीन बजाकर स्वयं को महर्षि-ब्रह्मर्षि-भगवान घोषित करते फिर रहे हो, चुल्लू भर पानी नहीं है क्या ?
अच्छा ये धूर्त्त प्रश्न होने पर उत्तर क्या देंगे कि मैंने स्वयं थोड़े न घोषित किया है, शिष्यों ने अथवा अमुकामुक संस्था/संगठन ने कहा। अरे पापसंघों तो तुम ये उद्घोषित क्यों नहीं करते हो कि मैं महर्षि नहीं हूँ, ब्रह्मर्षि नहीं हूँ, भगवान नहीं हूँ और कोई भी ऐसा न कहे। जो कहता है उसका त्याग क्यों नहीं करते हो ? अरे वास्तविकता प्रकट करना और त्याग करना तो दूर जब लिखित रूप में पुस्तकों में महर्षि प्राप्त हो रहा है तो तुमने कितनी बार खंडन किया है अर्थात ये सब तुम्हारा ही किया धरा है, केवल अनुयायियों की ओट लोगे कि मैंने नहीं किया तो खंडन करो न।

यदि कोई मुझे ऋषि कह दे तो मैं स्वयं ही खंडित करूँगा कि मैं ऋषि नहीं हूँ और यह ऋषियों का अपमान है। और कदाचित ऋषि बन जाऊं तो किसी अन्य के कथन की, अनुशंसा की आवश्यता नहीं होगी अपितु वैसे कर्मों को संपन्न किया जायेगा।
इन स्वघोषित महर्षि-ब्रह्मर्षि-भगवानों का भेद एक पंक्ति में खोला जा सकता है : यदि ये महर्षि-ब्रह्मर्षि-भगवान हैं तो इनको चारों वेद कंठाग्र होना चाहिये और इनके जैसा (शुद्धतम) पाठ करने में कोई सामान्य वैदिक सक्षम भी न हो। किन्तु इनको लिखा हुआ देकर देखो वो भी नहीं पढ़ सकेंगे। जो देखकर भी वेद न पढ़ सके वो महर्षि-ब्रह्मर्षि-भगवान हो जायेगा ? नहीं कदापि नहीं, पाखण्डी ही कहलायेगा। ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः – मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहलाते हैं, अन्यान्य सभी तथ्यों, विशेष शक्तियों को छोड़ दो पहल देखकर भी चारों वेद पढ़ना तो सीख लो, द्रष्टा की बात आगे करना।
ऋषि कौन – विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज का प्रामाणिक विश्लेषण
१. ऋषि की शास्त्रीय परिभाषा:
‘मंत्रद्रष्टा’ का सिद्धांत शास्त्रीय दृष्टिकोण से ऋषि की सबसे प्रामाणिक और वैज्ञानिक परिभाषा यास्क मुनि के निरुक्त (वेदांग) में मिलती है: “ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः” (निरुक्त २.११)
अर्थ: ऋषि वह दिव्य पुरुष है जो मंत्रों का द्रष्टा (देखने वाला) है, न कि उनका कर्ता या लेखक। वैदिक वांग्मय में वेदों को अपौरुषेय वेदः (जिसे किसी मनुष्य ने नहीं रचा) और अनादि कहा गया है। ब्रह्मांड में जो ईश्वरीय ज्ञान ध्वनियों के रूप में शाश्वत रूप से गूंज रहा है, ऋषियों ने अपनी गहरी ध्यान अवस्था (समाधि) में उन परम सत्यों का साक्षात् साक्षात्कार किया। इसलिए उन्हें मंत्रद्रष्टा कहा जाता है।
व्युत्पत्ति एवं व्यावहारिक लक्षण
- ज्ञान की पराकाष्ठा: संस्कृत व्याकरण के अनुसार एक अन्य व्युत्पत्ति है— “ऋषति गच्छति ज्ञानस्य पारं इति ऋषिः” अर्थात्, जो ज्ञान की अंतिम सीमा के पार पहुँच चुका हो, वही ऋषि है।
- सत्यनिष्ठा: प्रसिद्ध शब्दकोश ‘अमरकोश’ में ऋषि का सबसे बड़ा व्यावहारिक लक्षण बताते हुए कहा गया है — “ऋषयः सत्यवचसः” अर्थात् ऋषि वे हैं जिनकी वाणी में केवल और केवल परम सत्य होता है और उनके मुख से निकला हर शब्द सिद्ध (वाक-सिद्धि) हो जाता है।
वायु पुराण के अनुसार ऋषित्व के ५ अनिवार्य मापदंड
वायु पुराण के ५७वें अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी साधक को शास्त्रीय रूप से ऋषि की उपाधि तभी मिल सकती है जब वह इस मूल श्लोक की कसौटी पर खरा उतरता हो: दीर्घायुषो मन्त्रकृतैश्वर्या दिव्यचक्षुषः। प्रत्यक्षधर्माणश्चैव प्रकीर्त्याश्च महर्षयः॥ (वायु पुराण) इस श्लोक के अनुसार ऋषित्व के ५ अनिवार्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
- दीर्घायुषित्व: अपनी योग-साधना और प्राणायाम के बल पर लंबी आयु और दिव्य-स्वस्थ शरीर का होना।
- मन्त्रकृत: यहाँ ‘कृत’ शब्द का अर्थ रचना नहीं, बल्कि योगबल से मंत्रों को सिद्ध करने या उन्हें ब्रह्मांड से ग्रहण करने की क्षमता से है।
- ऐश्वर्या (ईश्वरा): अणिमा, महिमा जैसी अष्ट सिद्धियों और दिव्य ऐश्वर्य से युक्त होना।
- प्रत्यक्षधर्माणः (दिव्य चक्षु): भूत, भविष्य और वर्तमान को साक्षात देखने की त्रिकालदर्शी दृष्टि।
- प्रकीर्त्याश्च: अपने तपोबल और सदाचार के कारण संपूर्ण ब्रह्मांड या समाज में स्वतः पूजनीय व विख्यात होना।
२. महर्षि: ऋषित्व का शिखर और ऋषियों का पदानुक्रम
जब कोई ऋषि अपने तपोबल, ज्ञान और इंद्रिय-निग्रह में सर्वोच्च सीमा पर पहुँच जाता है, तो उसे ‘महर्षि’ (महान + ऋषि) की उपाधि दी जाती है। अमरकोश के अनुसार:
“शब्दादिभ्यः परे यस्मात् परं रूपं महत्तरम्। तस्माद् गीतार्थतत्त्वज्ञा महर्षय इति स्मृताः॥”
व्याख्या: अर्थात्, जो ऋषि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध जैसी पंचतन्मात्राओं तथा सांसारिक इंद्रियों के भोगों से सर्वथा ऊपर उठ चुके हैं, और जिन्होंने ब्रह्मांड के महत्तर (सर्वोच्च या परम) रूप का साक्षात्कार कर लिया है, उन्हें महर्षि कहा जाता है।
वायु पुराण में महर्षि बनने के लिए अहंकार का पूर्ण त्याग और महत् तत्व (Cosmic Intelligence) का जाग्रत होना अनिवार्य बताया गया है:
माहात्म्याच्च लोकेऽस्मिन् महर्षय इति स्मृताः। बुद्धेर्महत्त्वात् परत्वाच्च अहंकारस्य चैव हि॥ (वायु पुराण)
अर्थ: इस लोक में महर्षि उन्हें कहा गया है जिनमें महान आत्मभाव (माहात्म्य) हो, जो अपनी बुद्धि के महत् तत्व में स्थित हो चुके हैं और जो अहंकार (मैं और मेरा की भावना) से सर्वथा परे उठ चुके हैं।
ऋषियों का शास्त्रीय पदानुक्रम (चेतना के आधार पर ७ भेद) – महाभारत के शांतिपर्व और वायु पुराण में ऋषियों की साधना के आधार पर ७ भेदों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है:
ब्रह्मर्षयो महर्षय राजर्षयस्तथैव च। परमर्षयः श्रुतर्षयः काण्डर्षयश्च ते स्मृताः॥ (वायु पुराण)
ज्ञान और चेतना के आरोहण (चढ़ते क्रम) के अनुसार यह पदानुक्रम इस प्रकार है:
- श्रुतर्षि: जो अपनी कुशाग्र बुद्धि से वेदों को सुनकर याद रखने और उन्हें सुरक्षित रखने की क्षमता रखते हैं।
- काण्डर्षि: जो वेदों के किसी विशेष भाग या काण्ड (जैसे कर्मकाण्ड या ज्ञानकाण्ड) के प्रकांड पंडित और प्रयोक्ता हैं।
- राजर्षि: वे राजा जो क्षत्रिय कुल के होकर भी राजपाठ के बीच ऋषियों जैसा पूर्ण तपोमय और आसक्तिरहित जीवन जीते हैं (जैसे- राजा जनक)।
- देवर्षि / ऋषिका: दिव्य लोकों के ऋषि जो देवताओं के समान पूज्य हैं (जैसे- नारद मुनि) या उच्च आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त महिला ऋषि।
- परमर्षि: जो परम सत्य और आत्म-ज्ञान के परम पद में सदा स्थित रहते हैं (जैसे- ऋषि भृगु)।
- महर्षि: वे ऋषि जो ज्ञान, तप, और इंद्रिय-विजय में महानता की पराकाष्ठा को प्राप्त कर चुके हैं (जैसे- व्यास, वाल्मीकि)।
- ब्रह्मर्षि: ऋषित्व की सर्वोच्च अवस्था। जो साक्षात परब्रह्म को जान चुके हैं और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की स्थिति में लीन हैं (जैसे- वसिष्ठ, विश्वामित्र)।
३. वर्तमान युग में ऋषित्व: योग्यता और चुनौतियाँ
आधुनिक युग (कलियुग) के संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वर्तमान में कोई व्यक्ति ऋषि बन सकता है? शास्त्रों ने इसे दो दृष्टिकोणों से देखा है:
- मंत्रद्रष्टा के रूप में (शास्त्रीय रूप से असंभव): यदि प्राचीन काल के मूल ‘मंत्रद्रष्टा’ ऋषियों की बात की जाए, तो वर्तमान समय में वैसा ऋषि बनना संभव नहीं है। क्योंकि वेद अनादि और पूर्ण हैं, अब कोई नए वेदमंत्र प्रकट नहीं होने हैं। साथ ही, कलियुग के प्रभाव से मनुष्यों की आयु, मानसिक एकाग्रता और शारीरिक क्षमता वैसी नहीं रह गई है कि वे ब्रह्मांडीय ध्वनियों को साक्षात सुन सकें।
- आत्म-साक्षात्कार की अवस्था के रूप में (साधना से संभव): यदि ऋषि शब्द को आत्म-ज्ञान, इंद्रिय-निग्रह या चेतना की उच्च अवस्था के रूप में देखा जाए, तो ऋषि बनने के द्वार आज भी हर उस साधक के लिए खुले हैं जो कठोर तपस्या करने को तैयार है।
शास्त्रों के गहन अनुशीलन से सिद्ध होता है कि ऋषित्व कोई वंशानुगत अधिकार या कृत्रिम उपाधि नहीं है, बल्कि यह एक आंतरिक आध्यात्मिक रूपांतरण है। केवल किसी विशिष्ट कुल में जन्म लेने मात्र से, किसी वैभवशाली मठ के मठाधीश हो जाने से, अथवा सांसारिक-राजनीतिक पदों के प्रभाव से कोई ऋषि नहीं बन सकता; फिर महर्षि या ब्रह्मर्षि बनने के बारे में सोचना तो दुःसाहस मात्र है। अपितु, तीव्र इंद्रिय-निग्रह, अखंड सत्यवादिता, निष्काम तपस्या और आत्म-साक्षात्कार के कठिन पथ पर चलने से ही इस परम चेतना को प्राप्त किया जा सकता है।

इस प्रकार विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज कृत उपरोक्त विश्लेषण से इस विषय को और गंभीरता से समझ सकते हैं। आगे विषय को अधिक विस्तार न देकर मूल निष्कर्ष ही दिया गया है।
निष्कर्ष
मूल निष्कर्ष यह है कि ‘महर्षि’ या ‘ब्रह्मर्षि’ कोई कृत्रिम उपाधि, प्रदर्शन का साधन या सोशल मीडिया की प्रसिद्धि का नाम नहीं है, अपितु यह चेतना, उग्र तप और आत्म-साक्षात्कार की वह सर्वोच्च पराकाष्ठा है जहाँ मनुष्य का अहंकार समूल नष्ट हो जाता है। कलियुग के प्रभाववश आज अविद्या और मतिभ्रम का यह विद्रूप परिदृश्य है कि साधारण ‘रिसर्चर’ (अनुसन्धानकर्त्ता) स्वयं को ऋषि समझने का दम्भ पालते हैं और लाखों अनुयायियों के बल पर धूर्त लोग ‘महर्षि’ का पट्ट पहनकर राजनेताओं की चाटुकारिता में लीन रहते हैं।
यास्क मुनि के “ऋषियो मन्त्रद्रष्टारः” तथा स्कन्दपुराण के लक्षणों के अनुसार, साक्षात् ऊर्ध्वरेता, संशयरहित, नियताशी और ‘शापानुग्रह’ की अमोघ वाक-सिद्धि से युक्त पुरुष ही ऋषि होने के अधिकारी हैं। जो तथाकथित स्वघोषित महर्षि-ब्रह्मर्षि आदि लिखित रूप में भी चारों वेदों का सस्वर शुद्ध पाठ करने में सर्वथा अक्षम हैं, वे केवल ‘रंगे सियार’ हैं जो शिष्यों की ओट लेकर अपनी अज्ञानता छुपाते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में प्रयुक्त तीक्ष्ण और दुत्कारात्मक शब्द (जैसे रंगे सियार, धूर्ताचार्य, मूढ़, मदांध, पापसंघों) किसी निष्कपट, वेदमार्गी या नित्य-सन्ध्यापूत विद्वान के प्रति नहीं हैं, बल्कि ‘कथा-व्यापार’ और राजनैतिक चाटुकारिता के कारण सनातन मर्यादा को कलङ्कित करने वाले छद्मवेषियों के प्रति है। इस विश्लेषण का उद्देश्य केवल पाठकों का ज्ञानवर्द्धन है जिससे वो ठगों के शिकार न बनें, अपितु बच सकें। स्वघोषित महर्षि-ब्रह्मर्षि-भगवान आदि भी अनेकों हैं कोई व्यक्ति विशेष मात्र नहीं है और न ही किसी व्यक्ति विशेष को लक्षित किया गया है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








