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कर्मकांड सीखना अनिवार्य क्यों ?

कर्मकांड सीखना अनिवार्य क्यों ? कर्मकांड सीखना अनिवार्य क्यों ?

“कुशल और शास्त्रनिष्ठ कर्मकांडी का वरण करना कर्ता का अपना दायित्व है।”

वर्त्तमान युग में सामान्य जनों की तो चर्चा ही क्या करें अधिकतर कर्मकांडी भी एकांगी ही होते हैं और स्वयं भी करना होगा इस उद्देश्य से कर्मकांड सीखते ही नहीं और ये एक बड़ी समस्या है । यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाय तो कर्मकांडी को छोड़ ही दें सामान्य जनों को भी कर्मकांड का ज्ञान होना चाहिये। “कर्मकांड का ज्ञान” कराने के लिये जितना आवश्यक है उससे अधिक आवश्यक स्वयं करने के लिये ही है। इस आलेख में कर्मकांड यथा; कर्मकांड का अर्थ क्या है, कर्मकांड क्या है, कर्मकांड के प्रकार इत्यादि; की विस्तृत चर्चा करते हुये कर्मकांड सीखें तो क्यों अर्थात कर्मकांड सीखना क्यों आवश्यक है यह समझने का प्रयास किया गया है।

यह समझना की कर्मकांड का ज्ञान मात्र कर्मकांडी के लिये आवश्यक है एक भ्रम है। ब्राह्मण की मुख्य आवश्यकता कर्मकांड (पूजा-पाठ-हवन-श्राद्ध आदि) कराने के लिये नहीं उचित आज्ञा देने के लिये, भोजन-दान-दक्षिणा आदि ग्रहण करने के लिये होती है। जहां तक करने और कराने का विषय है तो जिस कर्म की विधि यजमान को ज्ञात न हो अर्थात कर्मकांड का ज्ञान न हो उस कर्म को करने के लिये भी ब्राह्मण की आवश्यकता होती है।

आचार्य का वरण करने के उपरांत आगे का पूजन-हवन आदि कर्म आचार्य का ही होता है, (विवाह व कुछ अन्य संस्कार एवं श्राद्ध को छोड़कर), अर्थात आचार्य वरण ग्रहण करने पर आचार्य का कार्य कराना मात्र नहीं होता है स्वयं करना होता है।

ये तथ्य पचने में कुछ समस्या हो सकती है किन्तु वास्तविकता यही है कि कर्म करना स्वयं का दायित्व ही होता है। ब्राह्मण की मुख्य आवश्यकता सान्निध्य, निर्देशन, भोजन, प्रतिग्रह, दक्षिणा आदि के लिये होती है। गौण आवश्यकता प्रतिनिधि रूप में जापक, पाठक, अर्चक आदि के रूप में। अर्थात यदि कर्त्ता को कर्म का ज्ञान हो तो ब्राह्मण के सान्निध्य में निर्देशन लेते हुये स्वयं ही करे। यहां लोगों को लगेगा कि फिर ब्राह्मण को दक्षिणा आदि क्यों दिया जाय जब केवल बैठेंगे ? दान-दक्षिणा-भोजन आदि भी कर्मांग ही होता है और इस कारण ही ब्राह्मण की मुख्य आवश्यकता होती है। यजमान को जहां न आता है अथवा अक्षम-अयोग्य हो वहां ब्राह्मण प्रतिनिधित्व करते हैं।

कर्मकांड सीखना अनिवार्य क्यों ?
कर्मकांड सीखना अनिवार्य क्यों ?

कर्मकांडी की स्थिति

“जो पुरोहित केवल वृत्ति या धनार्जन के उद्देश्य से कर्मकाण्ड सीखता है, वह कभी योग्य और शास्त्रनिष्ठ आचार्य नहीं बन सकता।”

इस प्रकार एक कर्मकांडी ब्राह्मण के लिये यह आवश्यक होता है कि वह यजमान की तुलना में अधिक ज्ञान रखे किन्तु इस विधि से तो सभी कर्मकांडी अधिक ज्ञान रखते हैं। यदि दूसरे प्रकार से विचार करें तो अधिक उत्तम पक्ष है वो यह कि कर्मकांडी यजमान को कराने मात्र अर्थात वृत्तिमात्र के उद्देश्य से कर्मकांड सीखेगा तो वह योग्य कर्मकांडी नहीं बन सकता। योग्य कर्मकांडी बनने के लिये यहां द्वितीय भाव की आवश्यकता होगी और वो यह कि स्वयं के लिये सीखे क्योंकि स्वयं भी कर्मकांड करना ही होगा।

वर्त्तमान में कर्मकांडी को उन ब्राह्मण परिवारों में भी निम्नतर माना जाता है जो अन्य वृत्ति ग्रहण करके स्वयं को नारकीय जीव बना चुके होते हैं। वृत्ति मात्र के लिये भी जो कर्मकांडी बनता है, वह ब्राह्मणोचित कर्म का ही पालन कर रहा होता है और वही श्रेष्ठ है, न कि सेवावृत्ति-व्यापार आदि करने वाले। युगव्यवस्था ऐसी हो गयी है कि भले ही चपरासी की नौकरी क्यों न करे वह मूंछों पर ताव मारता है और स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगता है और अहंकारी जीवन जीता है औरों की तो चर्चा ही क्या करें।

वास्तव में जो कर्मकांडी बनकर वृत्ति मात्र से भी ब्राह्मणत्व को धारण किये है वही श्रेष्ठ है, जिसने वृत्तिमात्र तक का भी परित्याग कर दिया वो तो निकृष्ट और यहां तक की पतित की श्रेणी में भी आता है। ब्राह्मण हेतु आपत्काल में ही अन्य वृत्ति ग्रहण करने का विधान है सामान्य स्थिति में नहीं। षट्कर्म के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म/वृत्ति आपद्वृत्ति कहा गया है। भले ही शिक्षक क्यों न हो यदि वैतनिक कर्मचारी है तो वो सेवक ही है।

इस स्थिति का मूल कारण धर्म का ज्ञान न होना ही है, विभिन्न प्रकार के नारे लगाकर कितना भी बड़ा हिन्दू होने का स्वांग रचता हो यदि कर्मकांड का ज्ञान नहीं है तो सब निरर्थक।

कर्मकांडियों की भी वही स्थिति है अन्य किसी प्रकार की वृत्ति न मिली तो कर्मकांडी बन गये और यही कारण है कि अन्य वृत्ति से जुड़े ब्राह्मण (जातिमात्र) भी उन्हें हीनभाव से देखते हैं और वैसा कर्मकांडी भी हीनभावना से ग्रसित रहता है। यदि कर्मकांड सीखकर कर्मकांडी बना जाय तो ये हीनभावना कदापि नहीं उत्पन्न होगी अपितु संतुष्टि ही होगी कि जैसे भी हो स्वधर्म का पालन कर रहा है। आगे कर्मकांड पर थोड़ा प्रकाश डालना आवश्यक है तत्पश्चात सबको कर्मकांड सीखना आवश्यक है इस विषय की विस्तृत चर्चा करेंगे।

कर्मकांड का अर्थ

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

वेद के तीन काण्ड हैं : ज्ञान काण्ड, उपासना/भक्ति काण्ड, और कर्मकाण्ड ।

अध्यात्म/वेद (किन्तु केवल अध्यात्म नहीं होकर जीवन निर्वहन से भी सम्बंधित हैके भी कई भाग किये गए हैं : ज्ञान, भक्ति, कर्म, योग इत्यादि। कर्म भी अध्यात्म/जीवन का एक भाग है इस कारण एक कांड है।

कर्मकांड क्या है

वर्त्तमान में कर्मकांड का भी ज्ञान नहीं होता किन्तु लोग दिव्यज्ञानी होने का भी भ्रम पाल लेते हैं। कर्मकांड को आडम्बर आदि तक कहते रहते हैं, उन्हें यह विदित हो कि कर्मकांड के माध्यम से ही वह शुद्धि प्राप्त होती है जो दिव्यज्ञान के लिये पात्रत्व प्रदान करता है।

परापवादविमुखो परस्त्रीधननिस्पृहः । अक्रोधी लोभनिर्मुक्तः शान्तः शास्त्रविचक्षणः ॥
वेदशास्त्रार्थतत्वज्ञः श्रद्धालुर्गतसाध्वसः । गुणरागी सदात्यागी विरागी बाह्यवस्तुषु ॥
पापभीतो भवेद्द्वेषो विषयादिष्वलोलुपः । अन्यैश्चापि शुभैर्देवि लक्षणैश्चापि लक्षितः ॥
अधिकारीति विज्ञेयस्तस्मै देयमिदं रहः । वेदगुह्यमिदं देवि ! नान्यथा तु प्रकाशयेत् ॥

माहेश्वरतन्त्र/४/७४ – ७७

वो समूह जनसामान्य तक कर्मकांड के वास्तविक तथ्य पहुंचने में अवरोध तो कर ही रहे हैं साथ ही भ्रामक व शास्त्र विरुद्ध तथ्य परोस रहे हैं। इससे बचने हेतु लोगों को स्वयं ही जागरूक होने की आवश्यकता है। जो कोई भी कुछ बता रहा है उसकी समीक्षा करके, प्रमाण देखकर शास्त्रोचित होने पर उसे अधिकाधिक प्रसारित करने का प्रयास करना होगा।

  • “लौकिक एवं पारलौकिक सुख/उन्नति की प्राप्ति के लिए श्रुति-स्मृति द्वारा अनुमोदित कर्ममार्ग का विधान कर्मकाण्ड है।”
  • “उन्नति के शास्त्रों में कई मार्ग बताये गए हैं जिसमें से एक भाग कर्म भी है और कर्ममार्ग का विधान कर्मकाण्ड है।

कर्मकांड से पहले ‘कर्म’ और ‘कांड’ को समझना जरूरी है। कर्म जीवन में हमारे द्वारा किए गए सभी कार्य हैं, जो अनेक दृष्टीकोणों से विश्लेषित किए जा सकते हैं। ‘कांड’ हमारे द्वारा किए गए कार्यों के खंड, भाग या घटना होते हैं। ‘कर्मकांड’ में, ‘कर्म’ अध्यात्मिकता का एक खंड होता है और इस खंड के विधान को ‘कर्मकांड’ कहते हैं। इसका उद्देश्य लौकिक और पारलौकिक सुख की प्राप्ति का मार्ग प्रदान करना है।

मुख्य आवश्यकता

कर्मकांड, धर्म, अध्यात्म संबंधी ज्ञान का अभाव होने का मुख्य कारण है अपनी मुख्य आवश्यकता को नहीं समझना। आहार, निद्रा, भय और मैथुन सभी जीवों में पाये जाते हैं और जीवन इन्हीं सबमें व्यतीत हो जाता है। मनुष्य भी यदि अन्य जीवों की भांति ही जीवन व्यतीत करे तो अन्तर क्या है, जबकि परिभाषा देते हुये बताया जाता है कि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है। यदि मनुष्य में विवेक है तो उसका उपयोग होना भी आवश्यक है, उसकी उपलब्धि क्या है उसे प्राप्त क्या करना है ? विवेक का प्रयोजन क्या है ?

आत्मोन्नति का मार्ग कर्मकांड से ही आरम्भ होता है यह ज्ञान होना भी आवश्यक है। यद्यपि आत्मज्ञान प्राप्ति होने पर सब कुछ प्रयोजनरहित हो जाता है किन्तु जब तक प्राप्त न हो तब तक तो यही आधार है और ज्ञानप्राप्ति के पश्चात् प्रयोजनरहित तो होता किन्तु निरर्थक नहीं। आत्मज्ञानी को भी शिक्षा देने के उद्देश्य से अथवा प्रारब्ध भोगते हुये कर्मकांड का ही आश्रय ग्रहण करना उत्तम पक्ष है।

विवेक का प्रयोजन

मनुष्य विवेकशील प्राणी है तो क्या इसके विवेक का प्रयोजन क्या अच्छा भोजन, कपड़ा, मकान, वाहन आदि के लिये ही प्रयोग करना है अथवा अन्य है ? वर्त्तमान युग में जो स्वयं को पढ़ा-लिखा, विवेकशील सिद्ध करते हैं वो मशीन बन चुके हैं, और सांसारिक कार्यों में इस प्रकार से व्यस्त हो गये हैं कि आध्यात्मिक विषयों और गतिविधियों के लिये उनके पास पूर्णतः समयाभाव हो गया है अथवा उन्होंने ऐसा मान लिया है और इसका कारण यह है कि सांसारिक कार्यों में समय देने से तत्क्षण सांसारिक लाभ दिखता है किन्तु आध्यात्मिक कर्मों में समय देने पर तत्क्षण तो कुछ भी नहीं प्राप्त होता।

विवेक का प्रयोजन सांसारिक उपलब्धि मात्र प्राप्त करना नहीं है, ये गौण विषय है और इतना विवेक तो अन्य जीवों को भी है, पक्षी भी अपना घोंसला बना लेते हैं, धरती पर रहने वाले कई जी बिल, मांद आदि का निर्माण कर लेते हैं। सभी प्राणी मनुष्य को यह शिक्षा भी दे रहे होते हैं कि तुमसे अधिक विवेक तो मेरे पास है जिस कारण मैं चिंतामुक्त हूँ। विवेकशील मनुष्य का जीवन चिंतायुक्त ही रहे ये कैसा विवेक है ?

वास्तव में विवेक का प्रयोजन अन्य प्राणियों के लिये जो अनुपलब्ध है उसकी प्राप्ति करना है और वो है आत्मज्ञान की प्राप्ति अर्थात मोक्षप्राप्ति। विवेक का प्रयोजन सांसारिक उपलब्धि (भोजन, वस्त्र, आवास आदि) प्राप्त करना है ही नहीं। जब इस सत्य को स्वीकार कर लेंगे तब यह प्रश्न उत्पन्न होगा की विवेक का प्रयोग करें कैसे ? लेकिन प्रथम यही प्रश्न आना अनुचित है, प्रथम प्रश्न यह होना चाहिये कि विवेकचक्षु उन्मीलन कैसे करें ? क्योंकि विवेकचक्षु तो बंद है, खुलने के उपरांत ही उसका प्रयोग हो सकता है।

विवेकचक्षु कैसे खुलेगा

विवेकचक्षु खोलने का सबसे सरल मार्ग है कर्मकांड। सत्संग, कथा-वार्ता आदि सभी कर्मकांड में ही समाहित हो जाते हैं। श्रद्धा, विश्वास, भक्ति आदि कर्मकांड की आवश्यकता है। गीता में भगवान का कथन है “अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति” अज्ञानी, अश्रद्धालु, संशयात्मा विनष्ट हो जाता है। कर्म से निरत नहीं हुआ जा सकता इस लिये कर्म के प्रति विशेष सजग रहना आवश्यक होता है कि हमारे कर्म पतन करने वाले न हों, मोक्ष न मिले तो भी स्वर्ग तो मिले ही मिले, नरक से बचें।

कर्मकांड में एक सोया हुआ व्यक्ति भी कर्म कर रहा होता है और वो है “अजपा-जप” अर्थात एक सोता हुआ मनुष्य भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। और जब स्थिति यह है कि सोता हुआ मनुष्य भी कर्मरहित/कर्मनिवृत्त नहीं हो सकता तो कर्ममार्ग अर्थात कर्मकांड ही सबका आधार है। वानप्रस्थी/सन्यासी बनने का तात्पर्य भी कर्मकांड का त्याग नहीं होता, आश्रम परिवर्तन होता है। चूंकि कर्म का त्याग किया ही नहीं जा सकता इसलिये यदि कर्मकांड संबंधी ज्ञान का अभाव होगा तो कर्म नरकगामी बना सकता है और इसलिये कर्मकांड का ज्ञान सबके लिये आवश्यक है।

क्या कर्मकांड सीखना सबके लिये अनिवार्य है

यद्यपि ऊपर यह स्पष्ट हो चुका है कि कर्मकांड सीखना सबके लिये अनिवार्य है तथापि पुनः अज्ञानियों का प्रश्न यही रहेगा कि क्या कर्मकांड सीखना सबके लिये अनिवार्य है ? और अब इसे दूसरे प्रकार से समझना आवश्यक हो जाता है।

यहां सबके लिये कहने का तात्पर्य यह है कि कर्मकांडियों मात्र के लिये नहीं जिसे कर्म करना है उसके लिये भी अर्थात कर्ता के लिये। कर्म सिद्धांत के अनुसार सभी कर्ता है, किन्तु व्यावहारिक रूप में श्राद्ध करने वाले को कर्ता बोला जाता है एवं एक मनोवैज्ञानिक दोष के कारण अन्यत्र कर्ता शब्द का प्रयोग (व्यावहारिक रूप से) नहीं किया जाता है। किन्तु सैद्धांतिक रूप से सभी कर्ता है, और चूंकि सभी कर्ता है तो कर्मकांड के ज्ञान से रहित होने पर कैसा कर्म करेगा यह समझना कठिन नहीं है। साईकल चलाने का ज्ञान न हो तो साईकिल भी नहीं चलाया जा सकता अर्थात ज्ञान के अभाव में कर्म करना ही संभव नहीं है।

जब हम यह चर्चा कर रहे हैं कि सबके लिये कर्मकांड का ज्ञान होना आवश्यक है तो उन कर्मकांडियों का स्मरण हो जाता है जिन्हें कर्मकांड का ज्ञान नहीं होता और येन-केन-प्रकारेण कुछ भी स्वेच्छाचार करते रहते हैं। सामान्य जन उन्हीं स्वेच्छाचारी कर्मकांडियों के भरोसे स्वयं को दोषमुक्त भी समझता है जबकि यह भ्रममात्र है। कुशल कर्मकांडी का आश्रय ग्रहण करना कर्ता का ही दायित्व होता है। यदि स्वयं के दायित्व का ही सही से निर्वहन न किया गया हो तो दोषमुक्त कैसे हो सकते हैं, दोष तो मूल में ही स्थित हो जाता है।

इस दोष का भी कारण होता है कर्मकांड के ज्ञान का अभाव होना, जिसने कर्मकांड नहीं सीखा उसे ज्ञात नहीं हो सकता कि कौन कर्मकांडी कुशल हैं और कौन स्वेच्छाचारी ? अर्थात भलीभांति कर्मकांड को निष्पन्न करने हेतु कुशल कर्मकांडी का वरण करने हेतु भी कर्मकांड का ज्ञान होना आवश्यक होता है। जब कर्ता कुशल कर्मकांडी का वरण करेगा तभी वह दोषमुक्त हो सकता है।

कुशल कर्मकांडी ही विहित/निषिद्ध का ज्ञान और प्रयोग करता है, स्वेच्छाचारी को विहित/निषिद्ध का कोई ज्ञान ही नहीं होता और यदि हो भी तो भी वह धनलोलुप होता है और धनलोलुपता के कारण निषिद्ध का त्याग नहीं कर पाता अपितु कर्ता निषिद्ध कर्म में प्रवृत्त होने की अनुमति चाहता है और स्वेच्छाचारी धनलोलुप उसकी अनुमति देता रहता है।

निर्दोष होने के भ्रम का कारण

सामान्य जनों के मन में एक भ्रम रहता है कि यदि ब्राह्मण से अनुमति ले लिया तो दोष ब्राह्मण का होगा, हमारा नहीं। किन्तु इसमें जो अनिवार्य है कि वह अनुमति विद्वान ब्राह्मण से लेना चाहिये इसका पालन ही नहीं किया जाता। “रेहुआ लगन” बनाने वाले धनलोलुप/स्वेच्छारियों की अनुमति/स्वीकृति लेने पर दोषमुक्त नहीं हो सकते क्योंकि मुख्य सिद्धांत “विद्वान ब्राह्मण से अनुमति/स्वीकृति” की अवहेलना की गयी।

बड़े-से-बड़े पाप का भी लघु प्रायश्चित्त द्वारा शमन हो सकता है किन्तु विद्वान ब्राह्मण द्वारा विवेकपूर्वक प्रायश्चित्त बताया गया हो तो; और वह दोष विद्वान ब्राह्मण को भी नहीं लगता, फिर यह विचार रखना कि दोष ब्राह्मण का होगा स्वयं में ही भ्रम सिद्ध हो जाता है।

लेकिन यदि किसी कारण से धनलोलुप/स्वेच्छाचारी द्वारा छोटे-से-छोटे पाप का भी बड़े-से-बड़ा प्रायश्चित लिया जाय तो भी एक दोष तो स्वतः सिद्ध है कि अयोग्य से आज्ञा ली गयी जो स्वयं नरकगामी है, और उसकी आज्ञा का पालन करके अन्य सद्गति कैसे प्राप्त कर सकता है। एवं ऐसे ब्राह्मणों के लिये ही लोग बोला करते हैं दोष पंडित जी का होगा, जबकि उस पंडित जी का दोष तो पूर्व से ही रहता है जो यजमान भी ग्रहण करता है।

ये कर्मकांड के ज्ञान का ही अभाव है कि कलश-स्थापन में भी अपद्रव्यों का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण उपस्थित देवता भी प्रयाण कर जायें, फिर उसमें आवाहन किया जाता है।

कलश स्थापन विधि और मंत्र - kalash sthapana
कलश स्थापना
  • सप्तधान्य की पहचान की जा सकती है फिर भी कर्मकांडी और कर्ता दोनों में से कोई पहचान नहीं करता है कि सप्तधान्य है या कुछ और, प्रयोग करने के योग्य है भी अथवा नहीं किसी को कोई लेना-देना नहीं होता।
  • सप्तमृत्तिका का प्रश्न तो करना ही अनुचित है किन्तु सबके-सब बाजार से लाये एक पुड़िया वाली मिट्टी को सप्तमृत्तिका कहकर कलश में देते हैं।
  • सर्वौषधि की भी पहचान की जा सकती है किन्तु स्वयं से प्रश्न करें, कभी पहचान किया है क्या ?
  • पञ्चरत्न 25 – 50 रुपये में मिल सकता है क्या ? एक स्वर्णखंड भी न्यूनतम इतने में अप्राप्य होता है, उसमें दिये गये अपद्रव्यों का प्रयोग क्यों सब कर रहे हैं ? अज्ञान के कारण और यह ज्ञान मात्र कर्मकांडी को ही नहीं कर्ता को भी होना चाहिये।

सबके-सब किसी पात्र (तगाड़ आदि) में आग जलाकर स्वाहा-स्वाहा करके कुछ द्रव्य देते हैं और उसी को हवन कहते हैं। इसका नाम हवन नहीं है, जब हवन की विधि से अग्निस्थापन करके विधिपूर्वक पवित्र द्रव्य का अग्नि में उत्सर्ग करते हैं तब उसे हवन कहा जाता है। और हवन की विधि सर्वत्र समान ही कही गयी है चाहे अयुतहोम हो, सहस्राहुति हो अथवा शताहुति हो। फिर 99.9% हवन विधिरहित ही क्यों होता है ? इसका कारण कर्मकांड के ज्ञान का अभाव ही है। इस विषय को यहां दिये गये “हवन करने की विधि एवं मंत्र” आलेख पढ़कर गंभीरता से समझा जा सकता है।

हवन करने की विधि एवं मंत्र – संपूर्ण हवन विधि मंत्र – havan vidhi

ऊपर दो मुख्य विषय उदाहरण स्वरूप दिये गये हैं और संबंधित आलेख के अनुसरण पथ भी दिये गये हैं, जिसका अध्ययन-मनन करके यह सरलता से समझा जा सकता है कि कर्मकांड में कितनी त्रुटियां हो रही है। इसका मूल कारण सामान्य जनों को कर्मकांड के ज्ञान का अभाव होना ही है। यदि सामान्य जन कर्मकांड सीख लें तो इस प्रकार की सामान्य त्रुटियां नहीं होंगी। एवं इसीलिये यह आवश्यक है कि सबको कर्मकांड सीखना चाहिये, कर्मकांडी को तो पारंगत ही होना चाहिये किन्तु सामान्य जनों को भी मुख्य जानकारी होना चाहिये।

जब सामान्यजनों (यजमान/कर्ता) को कर्मकांड का आवश्यक ज्ञान होगा तभी वह कुशल कर्मकांडी का भी चयन कर सकता है अन्यथा नहीं। कालनेमि की पहचान करने के लिये हनुमान तो बनना ही होगा अन्यथा कालनेमि छलने में सफल हो जायेगा।

कर्मकांड केवल पुरोहितों के जीविकोपार्जन का साधन नहीं है, बल्कि प्रत्येक यजमान के लिए इसका बुनियादी ज्ञान होना आवश्यक है ताकि वह योग्य और शास्त्रनिष्ठ आचार्य का चयन कर सके। वर्तमान में व्याप्त भ्रांतियों का खंडन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि विवेक का मुख्य प्रयोजन भौतिक सुख नहीं, अपितु आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति है, जिसका मार्ग शुद्ध कर्मों से प्रशस्त होता है। उचित विधि-विधान के अभाव में किए गए धार्मिक अनुष्ठान निष्फल होते हैं, इसलिए शास्त्रोक्त मर्यादाओं का पालन करना अनिवार्य है। 

निष्कर्ष

“ब्राह्मण की मुख्य आवश्यकता कर्मकाण्ड कराने के लिए नहीं, अपितु यजमान को उचित शास्त्रीय आज्ञा और निर्देश देने के लिए होती है।”

मूल निष्कर्ष यह है कि कर्मकाण्ड का ज्ञान केवल कर्मकांडी पुरोहित वर्ग के लिए ही आवश्यक नहीं, अपितु प्रत्येक सनातनी यजमान (कर्ता) के लिए भी सर्वथा अनिवार्य है। कलियुग के प्रभाववश यह गम्भीर भ्रम फैल चुका है कि कर्मकाण्ड केवल आजीविका या ‘वृत्ति’ का साधन मात्र है, जिसके कारण अधिकतर पुरोहित स्वयं भी हीनभावना से ग्रसित होकर स्वेच्छाचार में प्रवृत्त हो जाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, आचार्य का मुख्य कर्तव्य केवल मन्त्र पढ़ना नहीं, अपितु कर्ता को उचित शास्त्रीय निर्देश देना और कर्मांग रूप में भोजन, प्रतिग्रह व दक्षिणा स्वीकार करना है। जब यजमान स्वयं कर्मकाण्ड के आवश्यक नियमों (जैसे कलश स्थापन के शुद्ध अपद्रव्य-रहित नियम, सविधि अग्निस्थापन और विहित काल) से सर्वथा अनभिज्ञ रहता है, तब वह कालनेमि सदृश ‘धनलोलुप धूर्ताचार्यों’ के चंगुल में फँसकर अनुचित कर्मों को भी ‘सब ठीक है’ मान बैठता है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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