Headlines

अस्थिविसर्जन प्रयोग

अस्थिविसर्जन प्रयोग अस्थिविसर्जन प्रयोग

“यदि विवशतावश तात्कालिक गंगाप्रवाह सम्भव न हो, तो अस्थि को देववृक्ष (पीपल) की जड़ में पंक-शैवाल सहित निक्षेप करना ही सर्वश्रेष्ठ कल्प है।”

शास्त्रों के अनुसार अस्थि विसर्जन की अत्यंत पवित्र है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि दाह संस्कार के दस दिनों के भीतर गंगा में अस्थि विसर्जन करना सर्वोत्तम है, अन्यथा इसे एक वर्ष के बाद वार्षिक श्राद्ध के उपरांत ही करना चाहिए। विभिन्न पुराणों के उद्धरणों के माध्यम से यह समझाया गया है कि गंगा में अस्थियों के वास तक आत्मा स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित रहती है। इसके अतिरिक्त, पाठ में परोपकार की भावना से दूसरों की अस्थियों का विसर्जन करने को भी पुण्यकारी बताया गया है।

अस्थिविसर्जन प्रयोग

वर्त्तमान के म्लेच्छाचारी अस्थिविसर्जन का महत्व क्या जानें और कहां से विधिपूर्वक करें ? वो तो जूते-चप्पल पहनकर अस्थि लेंगे, बस-ट्रेन से जायेंगे और कहेंगे “मन चंगा कठौती में गंगा”, जिस मूढ़ की शास्त्र में निष्ठा नहीं उसका मन चंगा है वाह यही तो कलयुग का प्रभाव है। अरे धूर्तों मन चंगा होगा तो शास्त्रविरुद्ध आचरण करते हुये म्लेच्छाचारी क्यों बन जाते हो ?

यदि अस्थिप्रक्षेप (विसर्जन) की बात करें तो दश दिन के भीतर गंगा में विसर्जन को विशेष प्रशस्त बताया गया है, जो गंगातट पर ही दाह करते हैं वो तो तत्काल ही अस्थिविसर्जन भी कर ही देते हैं, जो दूरस्थ होते हैं उनके लिये अस्थिसंचय के उपरांत दशदिन के मध्य विसर्जन का विधान है और जो अतिदूरस्थ होते हैं उनके लिये अस्थि को पीपल-वट वृक्षमूल वा जलाशय के निकट रखने का विधान है ताकि आब्दिक के पश्चात् विसर्जन करें।

अस्थिविसर्जन प्रयोग

क्योंकि यदि दश दिन के मध्य विसर्जन न हो तो वर्षमध्य में अस्थिविसर्जन का भी निषेध प्राप्त होता है। इस प्रकार अस्थिविसर्जन के विषय को समझना चाहिये। इसकी पुष्टि के लिये शास्त्रीय वचन की बात आती है तो अवलोकन किया जा सकता है :

अस्थिक्षेपं गयाश्राद्धं श्राद्धञ्चापरपक्षिकम् । अब्दमध्ये न कुर्व्वीत सपिण्डीकरणं विना ॥
गरुडपुराण/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/३४/११३

यावदस्थि च गङ्गायां तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ॥अग्निपुराण/११०/४

यावदस्थि मनुष्याणां गंगातोयेषु तिष्ठति । तावदब्दसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥
स्कन्दपुराण/४ (काशीखण्डः)/२८/३५, लक्ष्मीनारायणसंहिता/१/५४०/१४, पद्मपुराण१/६२/६६

गंगातोये तु यस्यास्थि नीत्वा प्रक्षिप्यते नरैः ॥ तत्कालमादितः कृत्वा स्वर्गलोके भवेत्स्थितिः ॥
नारदपुराण/उत्तरार्ध/४३/११०

दशाहाभ्यन्तरे यस्य गङ्गातोयेऽस्थि मज्जति । गङ्गायां मरणे यादृक् स तादृग् फलमाप्नुयात् ॥

प्रयोग

पुत्र-पौत्रादि जो भी करे यथाकाल (देश-कालानुसार) अस्थि लेकर गंगातट पर जाये।

  • सर्वप्रथम स्नान करे। 
  • फिर शुद्धिकरण करके पञ्चगव्य निर्माण करे। 
  • फिर अस्थि को पञ्चगव्य से प्रोक्षित करे।
  • फिर अस्थि को सुवर्ण-मधु-आज्य-तिल-पुष्प-चन्दन से संयुक्त करे। 
  • तदनन्तर गंगा कि मिट्टी (गंगौट) से मृद्भाण्ड (पात्र) बनाये। 
  • अस्थि को संयुक्त द्रव्यों सहित उस मृद्भाण्ड में रखे। 
  • तदनन्तर मृद्भाण्ड को दाहिने हाथ में लेकर अगले मन्त्र को पढ़ते हुये और दक्षिण दिशा की ओर देखते हुये गंगा में प्रवेश करे : “ॐ नमोऽस्तु धर्माय”
  • फिर दक्षिणाभिमुख होकर मृतक के स्वर्गप्राप्ति की कामना करते हुये अगले मन्त्र को पढ़ते हुये मृद्भाण्ड सहित अस्थि को गंगाजल में विसर्जित करे : “ॐ स मे प्रीत”

(नमोऽस्तु धर्मराजाय प्रेतप्रेतत्वमुक्तये। स मे प्रीतः शुभं दद्यादस्मिल्लोके परत्र च ॥)

  • तदुपरांत स्नान करे। 
  • फिर खड़ा होकर सूर्य का दर्शन करे। 
  • तदुपरांत आचमन करके दक्षिणा करे :

दक्षिणा : ॐ अद्य कृतैतदस्थिप्रक्षेप प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यक हिरण्यमग्निदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय दक्षिणांदातुमहमुत्सृजे ॥

पितृ-मातृ कुल से भिन्न का अस्थिप्रक्षेप निषिद्ध

अब अस्थिविसर्जन के विषय में एक महत्वपूर्ण विषय यह भी है कि मातृकुल और पितृकुल से भिन्न का अस्थिविसर्जन निषेध भी किया गया है। 

मातुः कुलं पितृकुलं वर्जयित्वा नराधमः। अस्थीन्यन्यकुलोत्थानि नीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
ब्रह्मपुराण (श्राद्धविवेक)

 किन्तु इसका समाधान भी विद्वानों द्वारा पूर्वकृत है जिसमें यह कहा गया कि धर्मबुद्धि से करे तो दोषाभाव।

निष्कर्ष

अस्थिविसर्जन (अस्थिप्रक्षेप) का मुख्य पक्ष शवदाह के तत्काल बाद अथवा दशरात्राशौच के भीतर ही है। यदि किञ्चित् अपरिहार्य कारणवश दश दिन के भीतर गंगाप्रवाह न हो सके, तो गरुडपुराण के अनुसार सपिण्डीकरण श्राद्ध के बिना संवत्सर (वर्ष) के मध्य विसर्जन सर्वथा निषिद्ध है; ऐसी स्थिति में आब्दिक (वार्षिक) श्राद्ध के उपरान्त ही विसर्जन विहित है। मातृकुल और पितृकुल से भिन्न अन्यों की अस्थि ले जाने पर ब्रह्मपुराणोक्त चान्द्रायण दोष केवल स्वार्थपरक वृत्ति के लिए है; नितान्त असहाय प्रेत के प्रति ‘धर्मबुद्धि और परोपकार’ की भावना से विसर्जन करने पर विप्र को दोष नहीं, अपितु कोटि यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत निष्कर्ष प्राचीन गृह्यसूत्रों, पुराणों और प्रामाणिक ग्रंथों के सूक्ष्म अंतर्संबंधों के समन्वय पर आधारित हैं। पारंपरिक रूप से प्रचलित देश-भेद या कुलाचार जनित भ्रम की स्थिति में सुधी पाठक शास्त्रीय साक्ष्यों को ही सर्वोपरि मानें। उपरोक्त विश्लेषण समझने के लिये है किसी भी प्रकार का निर्णय स्वविवेक, शास्त्रमंथन और विद्वानों के निर्देशन में लें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

Leave a Reply