आसन्न संकट और मार्ग; भाग – १
मानव सभ्यता पर आसन्न संकट का शास्त्रीय समाधान और ‘दीक्षा तत्व’ का वास्तविक मर्म। जानें क्यों सावित्री दीक्षा (उपनयन) ही सर्वश्रेष्ठ है और ‘कान फुंकवाने’ का सम्प्रदायवादी भ्रम क्यों पतनोन्मुखी है।
मानव सभ्यता पर आसन्न संकट का शास्त्रीय समाधान और ‘दीक्षा तत्व’ का वास्तविक मर्म। जानें क्यों सावित्री दीक्षा (उपनयन) ही सर्वश्रेष्ठ है और ‘कान फुंकवाने’ का सम्प्रदायवादी भ्रम क्यों पतनोन्मुखी है।
लोकविरुद्ध विसंगतियों के मध्य एकादशाह (प्रेतश्राद्ध) में वृषोत्सर्ग की अपरिहार्यता और उसके शास्त्रसम्मत विकल्प (मृत्तिका, दर्भ या पिष्ट वृष)। पण्डित दिगम्बर झा का प्रामाणिक ऐतिहासिक-शास्त्रीय विमर्श।
सदाचार और त्रिकाल सन्ध्यावन्दन के सूक्ष्म शास्त्रीय मर्म को उद्घाटित करता हुआ एक शोधपरक विमर्श वर्तमान युग की वैचारिक शिथिलता पर एक परम आवश्यक प्रहार है।
पण्डित दिगम्बर झा कृत “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” (प्रथम संस्करण – गंगादशहरा २०८३)। वाजसनेयी परम्परा के अनुसार आद्यश्राद्ध, तन्त्र मासिक, सपिण्डीकरण, सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट, अस्थिसंचय एवं वृषोत्सर्ग विधि का प्रामाणिक ऐतिहासिक-शास्त्रीय विमर्श।
क्या अधिकमास (मलमास) में एकादशाह को वृषोत्सर्ग करना चाहिए? जानें काम्य और नैमित्तिक वृषोत्सर्ग का शास्त्रीय भेद तथा पंडित दिगम्बर झा का प्रामाणिक व अकाट्य निर्णय।
क्या अनुपनीत बालक भात (सिद्धान्न) से पिण्डदान कर सकता है? जानें द्विजाति असंस्कृत पुत्र के कर्माधिकार और पिण्ड द्रव्य का प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय निर्णय।
अपात्रक श्राद्ध और मासिक श्राद्ध के अपकर्षण का ऐतिहासिक प्रारंभ कब हुआ? महामहोपाध्याय रुद्रधर झा और वाचस्पति मिश्र के प्रमाणों के साथ पंडित दिगम्बर झा का शास्त्रीय विमर्श और अधिकार सिद्धि।
संशोधित श्राद्ध पद्धति “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” ग्रंथ की प्रामाणिक प्रस्तावना एवं भूमिका। जानें क्यों कर्मकांड में शास्त्रीय संशोधन अनिवार्य है और ‘मूर्खाचार्यों’ के दुराग्रहों का शास्त्रसम्मत समाधान क्या है।
वाजसनेयी संशोधित ‘सांवत्सरिक (वार्षिक) श्राद्ध विधि’। जानें क्यों वार्षिक श्राद्ध में महापात्र का प्रवेश वर्जित है और स्वभूमि में भूस्वामि भाग का निषेध क्यों है। प्रामाणिक मंत्रों सहित क्षयाह श्राद्ध विमर्श।
वाजसनेयी संशोधित ‘अपात्रक सपिण्डीकरण श्राद्ध विधि’: जानें प्रेतवेदी और पितृवेदी के पृथक्करण का शास्त्रीय महत्त्व। सपिण्डीकरण का उचित काल, आसनादि क्रम और ‘तंत्र’ निषेधों का प्रामाणिक विश्लेषण।