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संपूर्ण कर्मकांड विधि

संपूर्ण कर्मकांड विधि

अधिकस्य अधिकं फलं : मूल प्रयोजन और प्रामाणिक शास्त्रीय विस्तार

अधिकस्य अधिकं फलं : मूल प्रयोजन और प्रामाणिक शास्त्रीय विस्तार

कर्मकाण्ड में ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का वास्तविक क्षेत्र और ‘अधिकानि फलाधिकात्’ सूत्र की प्रामाणिक स्थापना। सक्षमों द्वारा विकल्प-चयन के कारण उत्पन्न होने वाले देवद्रोह दोष पर प्रामाणिक विमर्श।

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क्या गीता का ज्ञान भी भ्रमित करने वाला है ?

क्या गीता का ज्ञान भी भ्रमित करने वाला है ?

क्या गीता का ज्ञान भ्रमित करने वाला है? भृतकाध्यापकों की अनर्हता, मन्त्राक्षमता, ‘कर्मणा वर्णव्यवस्था’ के कुतर्क का खण्डन आदि तथ्यों का गंभीर और तीक्ष्ण शास्त्रीय सम्मार्जन।

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अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द

अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द

कर्मकाण्ड में ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ के भ्रम का निवारण और ‘विस्तरो हि विघ्नकरः’ सूत्र की प्रामाणिक स्थापना। मनुस्मृति और कालोत्तरम् के साक्ष्यों पर महत्वपूर्ण विमर्श।

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ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन

ग्रहशान्ति हवन: मुख्य आहुति द्रव्य, शाकल्य विमर्श और स्वेच्छाचार का खण्डन

ग्रहशान्ति हवन में घृत-मधु-दधि युक्त समिधा की प्रधानता, शाकल्य में व्याप्त अशास्त्रीय स्वेच्छाचार का खण्डन और नवग्रहों के विहित मन्त्रों का प्रामाणिक विमर्श।

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अस्थिसंचय : अशौच में वेदमंत्र का प्रयोग कैसे ?

अस्थिसंचय : अशौच में वेदमंत्र का प्रयोग कैसे ?

अशौच (सूतक) काल में अस्थिसञ्चय के समय वेदमन्त्र प्रयोग की प्रामाणिक शास्त्रीय सिद्धि। “तदपि ग्राह्यं” और “त्यागेन लब्धं” सूत्रों के आलोक अन्वेषण और श्रीरामकृत श्राद्ध विमर्श।

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"सब ठीक है" में छुपी सबसे बड़ी त्रुटि और मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम

“सब ठीक है” में छुपी सबसे बड़ी त्रुटि और मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम

धार्मिक विसंगतियों में “सब ठीक है” कहने की आत्मघाती भूल, वर्तमान में व्रात्य दोष के शास्त्रीय परिहार और मनमुखी पुरोहिती के भयंकर दुष्परिणामों पर पण्डित दिगम्बर झा का तीक्ष्ण विमर्श।

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आसन्न संकट और मार्ग; भाग - १

आसन्न संकट और मार्ग; भाग – १

मानव सभ्यता पर आसन्न संकट का शास्त्रीय समाधान और ‘दीक्षा तत्व’ का वास्तविक मर्म। जानें क्यों सावित्री दीक्षा (उपनयन) ही सर्वश्रेष्ठ है और ‘कान फुंकवाने’ का सम्प्रदायवादी भ्रम क्यों पतनोन्मुखी है।

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प्रेतश्राद्ध (एकादशाह) में वृषोत्सर्ग की अपरिहार्यता व विकल्प

प्रेतश्राद्ध (एकादशाह) में वृषोत्सर्ग की अपरिहार्यता व विकल्प

लोकविरुद्ध विसंगतियों के मध्य एकादशाह (प्रेतश्राद्ध) में वृषोत्सर्ग की अपरिहार्यता और उसके शास्त्रसम्मत विकल्प (मृत्तिका, दर्भ या पिष्ट वृष)। पण्डित दिगम्बर झा का प्रामाणिक ऐतिहासिक-शास्त्रीय विमर्श।

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संध्यावंदन प्रयोग

संध्यावंदन प्रयोग

सदाचार और त्रिकाल सन्ध्यावन्दन के सूक्ष्म शास्त्रीय मर्म को उद्घाटित करता हुआ एक शोधपरक विमर्श वर्तमान युग की वैचारिक शिथिलता पर एक परम आवश्यक प्रहार है।

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संशोधित मिथिलादेशीय अपात्रक श्राद्ध पद्धति - "सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं"

संशोधित मिथिलादेशीय अपात्रक श्राद्ध पद्धति – “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं”

पण्डित दिगम्बर झा कृत “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” (प्रथम संस्करण – गंगादशहरा २०८३)। वाजसनेयी परम्परा के अनुसार आद्यश्राद्ध, तन्त्र मासिक, सपिण्डीकरण, सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट, अस्थिसंचय एवं वृषोत्सर्ग विधि का प्रामाणिक ऐतिहासिक-शास्त्रीय विमर्श।

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