“कृपणता का सर्वत्र निषेध प्राप्त होता है, और सक्षम होने पर विकल्प का चयन करना साक्षात् मोह है।”
हम “विस्तरो हि विघ्नकरः” का अवलोकन करके “अधिकस्य अधिकं फलं” कहां और कैसे प्रयोज्य नहीं है इसको समझ चुके हैं। कब-कहां-कैसे विस्तार करने से विघ्न उत्पन्न होता है और कर्म का नाशक बन जाता है इसको समझने के पश्चात् अब यह समझना भी आवश्यक है कि फिर क्या “अधिकस्य अधिकं फलं” निरर्थक है अर्थात इसका कोई प्रयोजन नहीं है क्या अथवा यदि प्रयोजन है तो कैसे और कब प्रयोग किया जायेगा ? यहां हम इसी विषय को समझेंगे कि विस्तार कहां प्रशस्त है अर्थात “अधिकस्य अधिकं फलं” का वास्तविक प्रयोग कैसे, कब और कहां किया जायेगा समझेंगे।
अधिकस्य अधिकं फलं : मूल प्रयोजन और प्रामाणिक शास्त्रीय विस्तार
“अधिकस्य अधिकं फलं का वास्तविक तात्पर्य है—सामर्थ्यानुसार कल्प-विकल्प में से अधिकतम (सर्वश्रेष्ठ) का चयन करना।”
“विस्तरो हि विघ्नकरः” सूत्र के अनुसार जो शास्त्रीय विधान जहां प्राप्त होता है वहां उतना ही करे। प्राप्त विधान जो निर्द्दिष्ट है उसका किसी भी प्रकार विस्तार न करे अन्यथा विघ्नकर ही होगा और कर्म का भी नाश कर सकता है। इस प्रकार पूर्व ही सम्बंधित आलेख “अधिकस्य अधिकं फलं और विस्तरो हि विघ्नकरः का द्वन्द” में भलीभांति स्पष्ट किया गया कि सामान्य रूप से “अधिकस्य अधिकं फलं” का जो प्रयोग किया जाता है वह मात्र भ्रम है और दुष्परिणाम देने वाला है अतः प्रयोग में सावधानी आवश्यक है।
फल की विशेषता जहां वर्णित हो वहां अधिकतम (यथासंभव/सामर्थ्यानुसार) न करना और विकल्प का ग्रहण करना भी निषिद्ध एवं निष्फल कहा गया है। इसमें यह शर्त्त कहा गया है कि वैभव/सामर्थ्य/सक्षम होने पर भी मोहवश कृपणता करने से फल का भागी नहीं होगा अपितु देवद्रोही होता है।
इस कृपणतानिषेध का यत्र-तत्र-सर्वत्र वर्णन दृष्ट है किन्तु कृपणता करने पर परिणाम सर्वत्र उल्लिखित नहीं । यहां कृपणता से परिणाम का भी स्पष्टीकरण है। उत्तरोत्तर सामर्थ्यानुसार ग्राह्य होता है अथवा सामर्थ्यवान भी विकल्प चयन कर सकता है यदि अनुपलब्ध हो तो किन्तु विकल्प में न्यूनतम नहीं उत्तरोत्तर क्रम में जो प्रथम विकल्प प्राप्त हो वही ग्राह्य होता है; यथा स्वर्ण में अक्षम होने पर रजत प्रथम विकल्प प्राप्त होता है किन्तु अथवा अनुपलब्ध हो तो भी, किन्तु कृपणतावश मृदा ही ग्रहण करे तो वह मोह है और देवद्रोही सिद्ध करता है।

इस कृपणतानिषेध का यत्र-तत्र-सर्वत्र वर्णन दृष्ट है किन्तु कृपणता करने पर परिणाम सर्वत्र उल्लिखित नहीं है। इसी प्रकार विकल्प सर्वत्र मिलता है किन्तु विकल्प ग्रहण कब करे और कब न करे इसको समझना आवश्यक है।
यदि सक्षम होते हुये मुख्य विधान (कल्प) को ग्रहण न करके उसका विकल्प ग्रहण करे तो वह निरर्थक होता है। विकल्प विशेष परिस्थितियों में ही ग्रहण किया जा सकता है न कि प्रधानता देकर। कृपणता का सर्वत्र निषेध प्राप्त होता है, विकल्प भी सर्वत्र प्राप्त होता है किन्तु यदि कृपणता करें अथवा मुख्य विधान (कल्प) में सक्षम होने पर भी विकल्प का ही चयन करें तो क्या दोष होता है यह सामान्य रूप से देखने को नहीं मिलता है। “अधिकस्य अधिकं फलं” और विस्तार का प्रशस्त होना इसी विषय से सम्बंधित है।
अधिकस्य अधिकं फलं – प्रामाणिक विमर्श
यहां जो भाव प्राप्त हो रहा है वही भाव “अधिकस्य अधिकं फलं” है और एक विशेष पौराणिक प्रसङ्ग की पूर्व चर्चा अपेक्षित है। यह चर्चा बलभद्र जी के सूतवध और उसके प्रायश्चित्त प्रकरण की है। बलभद्र ने सूतवध में प्रायश्चित्त की मांग करते हुये यह कहा कि मैं सर्वाधिक कठिन प्रायश्चित्त करूँगा। कारण कि वो सक्षम थे और उनके लिये विकल्प अथवा गौण का महत्व नहीं था।
करिष्ये वधनिर्वेशं लोकानुग्रहकाम्यया। नियमः प्रथमे कल्पे यावान्स तु विधीयताम् ॥
दीर्घमायुर्बतैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च। आशासितं यत्तद्ब्रूत साधये योगमायया ॥
श्रीमद्भागवतपुराण/१०/उत्तरार्ध/७८/३३ – ३४
स्पष्ट रूप से बलभद्र कहते हैं “नियमः प्रथमे कल्पे” प्रथम कल्प में जो नियम हो वही बतायें, लोक को शिक्षा देने के लिये मैं वही करूँगा।
आगे नारदपुराण में एक प्रसंग आता है जहां देवता के मृदा, ताम्र, रजत, स्वर्ण आदि कुम्भों को उत्तरोत्तर अधिक फलदायक कहा गया है। इसी प्रकरण में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जो जिसमें समर्थ/सक्षम हो वो यदि मोह/प्रमाद आदि के वशीभूत होकर उसका वह (मुख्य पक्ष) न करके उससे न्यून करता है तो वह फल का भागी नहीं होता। इसमें यही पर दर्शन-स्पर्श-अर्चन-घृत स्नान आदि भी उत्तरोत्तर अधिक फलदायक बताया गया है।
मृत्कुंभात्ताम्रकुंभैस्तु स्नानंदशगुणंस्मृतम् । रौप्यैःशतगुणंपुण्यं हेमैःकोटिगुणंस्मृतम् ॥
एवमर्घे च नैवेद्ये बलिपूजादिषु क्रमात् । पात्रांतरविशेषेण फलंचैवोत्तरोत्तरम् ॥
विभवेसतियो मोहान्नकुर्याद्विधिविस्तरम् । न स तत्कर्मफलभाग्देवद्रोहीप्रकीर्त्यते ॥
देवानांदर्शनंपुण्यं दर्शनात्स्पर्शनंवरम् । स्पर्शनादर्चनंश्रेष्ठं घृतस्नानमतः परम् ॥
प्राहुर्गंगाजलैःस्नानं घृतस्नानसमंबुधाः । अर्घ्यंद्रव्यविशेषेण गंगातोयेन यः सकृत् ॥
मागधप्रस्थमात्रेण ताम्रपात्रस्थितेन च ॥
नारदपुराण/उत्तरार्ध/४१/१६ – २१
नारदपुराण के इन श्लोकों में कृपणता से परिणाम का भी स्पष्ट है। उत्तरोत्तर सामर्थ्यानुसार ग्राह्य होता है अथवा सामर्थ्यवान भी विकल्प चयन कर सकता है यदि अनुपलब्ध हो तो किन्तु विकल्प में न्यूनतम नहीं उत्तरोत्तर क्रम में जो प्रथम विकल्प प्राप्त हो वही ग्राह्य होता है; यथा स्वर्ण में अक्षम होने पर रजत प्रथम विकल्प प्राप्त होता है किन्तु अथवा अनुपलब्ध हो तो भी, किन्तु कृपणतावश मृदा ही ग्रहण करे तो वह मोह है और देवद्रोही सिद्ध करता है।
मृदा, ताम्र, रजत, स्वर्ण आदि कुम्भों को उत्तरोत्तर अधिक फलदायक प्रथम ही कहा गया है एवं वही स्पष्ट कर दिया गया है कि जो जिसमें समर्थ हो वह वैसा ही करे। वर्त्तमान में ब्रह्मा के पूर्णपात्र, आज्यस्थाली आदि प्रकरण में सक्षमों द्वारा भी मृत्पात्र का प्रयोग होना इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। सक्षम यजमान भी विशेष आयोजन तक में ब्राह्मण को लोभी तक कहने से पीछे नहीं हटते अर्थात मुख्य प्रकश ग्रहण भी न करना और ब्राह्मण (कर्मकांडी) को लांछित भी कर देना ये तो उससे भी अधिक दोषप्रद हो जाता है।

दर्शन-स्पर्श-अर्चन-घृत स्नान ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ कहा गया है, गंगाजल के लिये घृतसमान कहा गया है। अब किसी को अर्चन करने का सामर्थ्य है और वह दर्शनमात्र ही करे कि अर्चन में तो धन का व्यय भी होगा तो वह देवद्रोही संज्ञक होगा। स्पर्श को दर्शन से श्रेष्ठ कहा गया है किन्तु सभी स्पर्श का अधिकारी नहीं होता तो जो स्पर्श में अनाधिकार रखता हो वह दर्शन मात्र ही करेगा और उसके लिये वहां दोष नहीं होगा।
“अधिकानि फलाधिकात्”
“देवताओं का दर्शन पुण्य है, दर्शन से स्पर्श, स्पर्श से अर्चन और अर्चन से घृत-स्नान उत्तरोत्तर अधिक फलदायी है।”
अब आगे पद्मपुराण में दान प्रकरण जो व्यास के लिये कहा गया है वहां अवलोकन करें :
षड्रसानन्नपानानि स्नेहद्रव्याणि यानि च । गृहं सोपस्करं राम पुराणज्ञाय दापयेत् ॥
पर्याप्तान्येव सर्वाणि अधिकानि फलाधिकात् । दद्याद्द्रव्यमतो भूयः सचैलं शोभितं मृदु ॥
भूषणानि यथार्हाणि स्वशक्त्या प्रतिपादयेत् । गंधपुष्पं प्रतिदिनं केवलं गंधमेव च ॥
केवलं च तथा पुष्पं फलकाले फलान्यपि। तांबूलं च तथा दद्यान्नमस्कुर्याच्च भक्तितः ॥
पुराणस्य समाप्तौ तु दद्याद्दानादिकं तथा । अधिकं तु तथा देयं भूहिरण्यादिकं नृप ॥
पद्मपुराण/५ (पातालखण्डः)/११५/५१ – ५५
यहां हमें जो सूत्र प्राप्त हो रहा है वह इस प्रकार है “अधिकानि फलाधिकात्” और इसी को दूसरे प्रकार से “अधिकस्य अधिकं फलं” कहा जाता है अर्थात इसका प्रयोग कहां-किस प्रकार से होगा ये स्पष्ट हो रहा है। आगे के प्रमाणों और उद्धरणों से इस तथ्य को और स्पष्ट किया जा रहा है :
एकभक्तेन नक्तेन तथैवाऽयाचितेन च । भिक्षाहारेण तोयेन फलाहारेण वा यदि ॥
उपवासेन कृच्छ्रेण शाकाहारेण वा जनाः । तीर्थयात्रां प्रकुर्वन्ति तेषां लोकास्तु शाश्वताः ॥
लक्ष्मीनारायणसंहिता/१ (कृतयुगसन्तान)/१५०/६२ – ६३
उपवासं तथा नक्तमेकभुक्तमयाचितम्। अशक्तस्तु यथा कुर्वन्सायं प्रातरखण्डितम् ॥
भविष्योत्तर (देवशयनी एकादशी माहात्म्य)
व्रतादि में दोनों समय भोजन करना (अशक्त हो तो), अयाचित, एकभुक्त, नक्त, उपवास इस क्रम से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ कहा गया है। आगे अन्यत्र से उपवास का अन्य विशेष प्रकार निर्जला भी होता है जो उपवास से भी अधिक श्रेष्ठ कहा गया है। जो उपवास में सक्षम न हो वह नक्त करे, जो एकभुक्त का विकल्प लेना चाहता हो वह एकभुक्त का ही ग्रहण करे ये सामान्य व्रतों (एक दिन) के लिये है। अधिक दिनों का होने पर जैसे नवरात्रा या मास व्रत आदि में आगे अयाचित का भी विकल्प है और अशक्तों के लिये सायं-प्रातः दोनों ही समय आहार कहा गया है और यह अंतिम विकल्प है।
एकभुक्तेन जन्मोत्थम् नक्तेन द्विजनुर्भवम्। सप्तजन्मभवं पापमुपवासेन नश्यति ॥
स्कन्द (एकादशी माहात्म्य – देवोत्थान)
एकादशी में मुख्य रूप से एकभुक्त, नक्त और उपवास के फल भी कहे भी कहे गये हैं – एकभुक्त विधि में वर्त्तमान जन्म (एक जन्म) से जो पाप हो उसका नाश, नक्त विधि करे तो दो जन्मों का पाप अर्थात वर्त्तमान और पूर्व जन्म के पाप, एवं उपवास करने पर सात जन्मों के पाप का नाश होता है। इसी प्रकार अन्यत्र निर्जला आदि का भी वर्णन प्राप्त होता है। यहीं स्पष्ट हो जाता है कि जो उपवास में समर्थ होकर भी नक्त वा एकभुक्त का विकल्प चयन नहीं किया जा सकता और जो अशक्त (अस्वस्थ, बालक, वृद्ध आदि) होते हैं उनके लिये विशेष छूट होता है, करने की अनिवार्यता होती ही नहीं।

देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च संतर्प्य विधिपूर्वकम्। कृत्वा श्राद्धं पितॄणां तु दद्याद्दानं स्वशक्तितः॥
स्कन्दपुराण/७ (प्रभासखण्डः)/वस्त्रापथक्षेत्रमाहात्म्यम्/१५/५९
अब दान में और देख सकते हैं “स्वशक्तितः” का प्रयोग प्राप्त होता है एवं अन्यत्र भी ऐसे मिलते हैं इसी को बोलचाल में यथाशक्ति भी कहा जाता है। लेकिन समस्या यह है कि यथाशक्ति जहां प्रयोग होता है वहां शक्ति के अनुसार भाव ग्रहण नहीं किया जाता अपितु इच्छानुसार ग्रहण किया जाता है जो कहीं न कहीं स्वेच्छाचार से ही संबद्ध प्रतीत होता है। यथाशक्ति का तात्पर्य यह है कि यदि शक्ति/सामर्थ्य स्वर्णमुद्रा दक्षिणा की हो तो वही दे, और उसमें सक्षम नहीं होने पर अगला विकल्प ग्रहण करे। यदि ताम्रादि विहित पात्र का भी सामर्थ्य है तो मृण्मय पात्र का विकल्प ग्रहण नहीं किया जा सकता।
जो व्यक्ति स्वस्थ है वह “यथाशक्ति तथाभक्ति” कहकर उपवास के स्थान पर दिनभर फलाहार का विकल्प ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि “अधिकानि फलाधिकात्” का नियम है और इसी का जो दूसरा प्रयोग “अधिकस्य अधिकं फलं” मिलता है वह यही सिद्ध करता है एवं इसी प्रकार से विचारणीय है।
सर्वाभरणसंयुक्तां कन्यकां यो ददाति च। तेन दत्ता धरा सर्वा सशैलवनकानना॥
अर्द्धाभरणदानेन फलं दातुर्भवेद्ध्रुवम्। अनाभरणकन्यायाः पादैकस्य फलं भवेत्॥
पद्मपुराण/१ (सृष्टिखण्डम्)/५२/८५ – ८६
अब देखिये कन्यादान प्रकरण में कहा गया है ” यदि कन्या को सभी आभूषणों (गहनों) से सुसज्जित करके कन्यादान किया जाए, तो संपूर्ण फल (पृथ्वी दान के समान) प्राप्त होता है। यदि समर्थ न होने पर आभूषणों का केवल आधा भाग (कुछ ही गहने) दान किया जाए, तो भी दाता को निश्चित रूप से उसका पूर्ण फल मिलता है।” वहीं आगे कहा गया है कि “यदि कन्या का दान बिना किसी आभूषण के किया जाता है, तो उस कन्यादान का केवल एक-चौथाई (पादैक) या बहुत आंशिक फल ही प्राप्त होता है।”
यहां भी सामर्थ्यानुसार ही विचार किया जायेगा, जो सभी आभरण देने में सक्षम होकर भी न दे उसके लिये ही “अनाभरणकन्यायाः पादैकस्य फलं” ग्रहण किया जा सकेगा, अक्षमों के लिये नहीं। अक्षम होने पर अनाभरण अथवा यथाशक्ति जो सम्भव हो उतना मात्र करके ही पूर्ण फल प्राप्त करेगा किन्तु सक्षम यदि मोहादि के वशीभूत होकर अल्प करेगा तो उसके फल भी अल्प ही प्राप्त होगा।
विस्तार का वास्तविक प्रयोग
अब हमें विस्तार का वास्तविक प्रयोग समझ लेना आवश्यक है। पूर्व विमर्श में “विस्तरो हि विघ्नकरः” स्पष्ट किया गया था जिसका तात्पर्य जिस कल्प वा विकल्प की शक्ति/आवश्यकता होने से ग्रहण किया गया उसके क्रिया-काल-देश-शौच और ब्राह्मण सम्पदा इन वर्णित विषयों का विस्तार तो कदापि न करे।
इसका उदाहरण इस प्रकार है कि यदि “शतचण्डी” करें तो वहां क्रिया “शतावृत्ति सप्तशती पाठ”, काल “पंचदिवस”, देश “मण्डप”, शौच विधान अन्यत्र से, ब्राह्मण सम्पदा “१० पाठक ब्राह्मण” निर्धारित है तो इनमें से किसी का भी विस्तार नहीं कर सकते यदि करेंगे तो विघ्नकर ही होगा। जैसे “१०८ आवृत्ति पाठ करना या दिन की संख्या ७-९ आदि करना अथवा अधिक बड़ा मंडप बना लेना या ११ पाठक ब्राह्मण रखना।
लेकिन यहां विस्तार प्रशस्त का विमर्श किया गया है और “अधिकानि फलाधिकात्” अथवा “अधिकस्य अधिकं फलं” की भी सिद्धि की गयी है। यह भी प्रामाणिक तथ्य ही है किन्तु अंतर यह है कि इसका प्रयोग ही ज्ञात नहीं और जहां निषिद्ध है सामान्यतः वहीं करते हैं। इसका कारण इसके प्रयोग संबंधी ज्ञान का अभाव है। आज जहां विस्तार ही प्रशस्त सिद्ध हो रहा है इन्हीं विषयों को लेकर अज्ञ के द्वारा खंडन किया जा रहा था। ये प्रशस्त ही अन्यत्र हो रहा है और दोनों का ज्ञान और दोनों में अंतर क्या है इसको जो नहीं जानते यदि उन्होंने पूर्व आलेख का अवलोकन किया होगा और इस आलेख का अवलोकन न करें तो भ्रमित ही रहेंगे।
“अधिकस्य अधिकं फलं” का वास्तविक तात्पर्य है सामर्थ्यानुसार वर्णित कल्प-विकल्प में अधिकतम का चयन करना। रुद्र, लघुरुद्र, महारुद्र, अतिरुद्र अथवा इसी प्रकार विष्णु-चण्डी आदि में भी अपनी क्षमता के अनुसार ग्रहण करे। इसी प्रकार पात्रादि प्रयोग में विकल्प प्राप्त होता है किन्तु जो ताम्रादि में भी अक्षम हो उसके लिये मृण्मय पात्र का विकल्प होता है सक्षमों के लिये नहीं।
यदि कोई व्यक्ति सक्षम है तो वह आज्यस्थाली, पूर्णपात्र आदि में विकल्प ले ही नहीं सकता, यहां निषेधात्मक भाव भी है। किन्तु यज्ञादि में जो पक्ष है उसमें निषेधात्मक नहीं होगा पुनः व्रत के उपवास परक विषय में अथवा कन्यादान में आभरण पक्ष के लिये निषेधात्मक भाव भी ग्रहण करेगा । निषेधात्मक भाव का तात्पर्य सामर्थ्य होने पर विकल्प ग्रहण ही न करे ऐसा है।
निष्कर्ष
कर्मकाण्ड में “विस्तरो हि विघ्नकरः” और “अधिकस्य अधिकं फलं (अधिकानि फलाधिकात्)” परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक ही सिक्के के दो शास्त्रीय पहलू हैं। जहाँ किसी निर्दिष्ट अनुष्ठान के भीतर उसकी नियत क्रिया, काल, देश, शौच और विप्रसंख्या का अपनी मर्जी से विस्तार करना ‘विघ्नकर और नाशक’ है; वहीं इसके विपरीत, अपनी सामर्थ्य और वैभव के अनुसार सर्वश्रेष्ठ कल्प (मुख्य पक्ष) का चयन करना और कृपणता का परित्याग करना ही ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का वास्तविक क्षेत्र है।
पद्मपुराण, नारदपुराण और स्कन्दपुराण के साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि जो यजमान स्वर्ण या ताम्र पात्रों के प्रयोग में सक्षम होकर भी मोहादि के वशीभूत होकर मिट्टी (मृत्पात्र) का विकल्प चुनता है, अथवा जो उपवास में समर्थ होकर भी ‘यथाशक्ति’ के नाम पर केवल फलाहार का शॉर्टकट लेता है, वह अनुष्ठान के फल से वंचित होकर साक्षात् ‘देवद्रोही’ कहलाता है। अतः सामर्थ्य होने पर ‘प्रथम कल्प’ (विशिष्ट कोटि) को अंगीकार करना ही धर्म है; विकल्प केवल अक्षमों, बालकों और वृद्धों के लिए शास्त्रों की दयालुता है, सक्षमों के स्वेच्छाचार का आवरण नहीं।
FAQ
प्रश्न १: “विस्तरो हि विघ्नकरः” और “अधिकस्य अधिकं फलं” के मध्य क्या शास्त्रीय समन्वय है?
उत्तर: ‘विस्तरो हि विघ्नकरः’ का नियम वहाँ प्रभावी होता है जहाँ किसी अनुष्ठान के भीतर उसकी नियत क्रिया, काल या विप्रसंख्या को अपनी मर्जी से बढ़ाया जाए (वह सर्वथा वर्जित है)। इसके विपरीत, ‘अधिकस्य अधिकं फलं’ का नियम अनुष्ठान की श्रेणी (गुणवत्ता) पर प्रभावी होता है, जो कहता है कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वश्रेष्ठ (जैसे मिट्टी के स्थान पर स्वर्ण कलश) का चयन करें।
प्रश्न २: नारदपुराण के अनुसार सामर्थ्य होने पर भी विकल्प (न्यून कोटि) चुनने वाले को क्या संज्ञा दी गई है?
उत्तर: नारदपुराण के अनुसार, यदि यजमान के पास वैभव और सामर्थ्य उपलब्ध हो, फिर भी वह मोह या कृपणता के कारण उत्तम विधि का विस्तार न करके न्यूनतम विकल्प चुनता है, तो वह कर्म के फल का भागी नहीं होता। शास्त्रों में उसे ‘देवद्रोही’ कहा गया है।
प्रश्न ३: बलभद्र जी के सूतवध और प्रायश्चित्त के प्रसंग से ‘प्रथम कल्प’ का क्या सिद्धांत सिद्ध होता है?
उत्तर: श्रीमद्भागवतपुराण के अनुसार, बलभद्र जी ने सूतवध के प्रायश्चित्त हेतु ऋषियों से स्पष्ट कहा था—”नियमः प्रथमे कल्पे” अर्थात मुझे प्रथम कल्प (सर्वोच्च और सबसे कठिन विधान) का नियम बताएं। चूंकि वे समर्थ थे, इसलिए उन्होंने किसी शिथिल विकल्प का आश्रय नहीं लिया, जो प्रत्येक सक्षम व्यक्ति के लिए एक आदर्श शास्त्रीय शिक्षा है।
प्रश्न ४: नारदपुराण में विभिन्न धातु के कुम्भों (कलशों) के स्नान का क्या फल-क्रम बताया गया है?
उत्तर: मिट्टी के कुम्भ की अपेक्षा ताम्बे का कुम्भ दस गुना, चांदी का कुम्भ सौ गुना और स्वर्ण (सोने) का कुम्भ कोटि (करोड़) गुना अधिक पुण्य और फल प्रदान करने वाला माना गया है।
प्रश्न ५: ‘यथाशक्ति’ शब्द का वास्तविक शास्त्रीय तात्पर्य क्या है?
उत्तर: स्कन्दपुराण के अनुसार, यथाशक्ति का अर्थ ‘अपनी चरम क्षमता और वैभव के अनुसार’ देना है, न कि ‘अपनी इच्छानुसार कृपणता करना’। यदि आपकी शक्ति स्वर्णमुद्रा दान की है, तो ताम्र या रजत देना यथाशक्ति नहीं, अपितु स्वेच्छाचार और शास्त्राज्ञा का उल्लंघन है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस आलेख में वर्णित सिद्धान्त स्मृतियों, पुराणों तथा बलभद्र जी के प्रायश्चित्त प्रसंग के अकाट्य साक्ष्यों पर आधारित हैं। अनुष्ठानगत विसंगतियों (जैसे सक्षम यजमानों द्वारा यज्ञों में मिट्टी के पात्रों का प्रयोग, कृपणता, अथवा पुरोहितों को लांछित करना) पर किए गए कड़े प्रहार किसी व्यक्ति विशेष के प्रति द्वेष से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि ‘वैभव होने पर भी मोहवश की जाने वाली कृपणता’ के प्रति एक ‘तिक्त ओषधि’ हैं। इस विश्लेषणात्मक सूत्र-प्रतिष्ठा पर लेखक का वैधानिक बौद्धिक सम्पदा (कॉपीराइट) अधिकार सुरक्षित है। यह चर्चा शास्त्रानुसार समझने के लिये है निर्णय नहीं, निर्णय स्वविवेक से लें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








