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अचलासप्तमी

अचला सप्तमी – अचला सप्तमी कब है – अचला का अर्थ – अचला सप्तमी 2025

अचला सप्तमी – अचला सप्तमी कब है – अचला का अर्थ – अचला सप्तमी 2025 : माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को अचला सप्तमी कहा जाता है।
इसका एक अन्य नाम रथ सप्तमी भी है।
शास्त्रों के नियमानुसार इस दिन किया गया प्रत्येक कर्म चाहे पुण्य कर्म हो या पाप कर्म अनन्त काल तक फलित होता है।

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हवन विधि – छन्दोग

हवन विधि – छन्दोग

छन्दोग हवन विधि में पञ्चभूसंस्कार के समय बांयां हाथ भूमि पर रखने का विधान है अतः पञ्चभूसंस्कार के समय अग्निस्थापन तक बांयां हाथ भूमि पर रखे और सभी क्रियायें एक ही हाथ से करें; अङ्गिरा – सव्यं भूमौ प्रतिष्ठाप्य प्रोल्लिखेद्दक्षिणेन तु । तावन्नोस्थापयेत्पाणिं यावदग्निं निधापयेत् ॥

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हवन विधि मंत्र सहित – वाजसनेयी

हवन विधि मंत्र सहित – वाजसनेयी

वैदिक हवन विधि में संपूर्ण हवन विधि को तीन भागों में बांटा गया है :
पूर्वाङ्ग – पवित्रीकरणादि के उपरान्त पञ्चभूसंस्कार से पञ्चमहावारुणी होम तक की सभी क्रियायें पूर्वाङ्ग कहलाती है। सभी प्रकार के हवनों में पूर्वाङ्ग समान ही रहता है।
मध्याङ्ग – पूजित देवी-देवता सहित मुख्य देवता का हवन मुख्य अंग होता है; जिसे समझने में सुविधा के लिये यहां मध्याङ्ग भी कहा गया है, जिसकी विधि, हविर्द्रव्य, मंत्र परिवर्तित होते रहते हैं।
उत्तराङ्ग – मध्याङ्ग अर्थात मुख्य देवता का होम करने के बाद की शेष क्रियायें उत्तराङ्ग कहलाती है। सभी प्रकार के वैदिक हवन विधि में उत्तराङ्ग भी समान रहता है।

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हवन विधि पूर्वाङ्ग व उत्तराङ्ग – पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार

हवन विधि पूर्वाङ्ग व उत्तराङ्ग – पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार

मुख्य रूप से आपस्तम्बकृत पारस्करगृह्यसूत्र के हवन सूत्रानुसार हवन विधान पर विमर्श करते हैं। इस विमर्श का तात्पर्य यह है कि हवन विधि को सरलतापूर्वक समझा जा सके। सरल हवन पद्धति का तात्पर्य यही होता है कि शास्त्रोक्त हवन विधि को सरलता पूर्वक जिस पद्धति में समझाया गया हो।

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हवन करने की विधि एवं मंत्र – संपूर्ण हवन विधि मंत्र – havan vidhi

हवन करने की विधि एवं मंत्र – संपूर्ण हवन विधि मंत्र – havan vidhi

सरल हवन विधि कहकर भ्रमित करने वालों की संख्या बहुत अधिक है, यहां हम हवन विधि को समझेंगे। पहले हवन के विषय-क्रियाविधि को समझने का प्रयास करेंगे और तत्पश्चात संपूर्ण हवन विधि एवं मंत्र का भी अवलोकन करेंगे।

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पवित्रीकरण-विधि

पवित्रीकरण अर्थात शुद्धिकरण की संपूर्ण विधि

सम्पूर्ण कर्मकांड में पवित्रीकरण अर्थात शुद्धिकरण की सर्वप्रथम आवश्यकता होती है। चाहे पूजा स्थल की बात हो, पूजा सामग्री की बात हो अथवा शारीरिक या मानसिक शुद्धि का विषय हो, प्रत्येक कर्म का आरम्भ पवित्रीकरण से ही होता है। इस आलेख में पवित्रीकरण की संपूर्ण विधि बताई गयी है जो अत्यंत उपयोगी विषय है।

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वृद्धि श्राद्ध विधि अर्थात आभ्युदयिक श्राद्ध विधि

वृद्धि श्राद्ध विधि अर्थात आभ्युदयिक श्राद्ध विधि

नान्दी श्राद्ध : आचमन, पवित्रीकरणादि करके गया, विष्णु भगवान एवं पितरों का ध्यान करे : ॐ श्राद्धकाले गयां ध्यात्वा ध्यात्वा देवं गदाधरं। मनसा च पितृन ध्यात्वा वृद्धिश्राद्धं समारभे॥ फिर संकल्प करे ।

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नान्दीमुख श्राद्ध विधि pdf सहित

नान्दी श्राद्ध – षोडश मातृका पूजन, सप्तघृत मातृका पूजन सहित

दाह संस्कार के अतिरिक्त सभी संस्कारों में नान्दीमुख श्राद्ध किया जाता है। इसके साथ ही यज्ञ, प्राण-प्रतिष्ठा आदि कर्मों में नान्दीश्राद्ध आवश्यक होता है। लेकिन जिस प्रकार पवित्रीकरण, संकल्प, सम्पूर्ण कर्मकाण्ड का अनिवार्य प्रारंभिक अंग होता है उस प्रकार से सभी कर्मों में अनिवार्य नहीं होता। जिस प्रकार कलश स्थापन सभी पूजा पाठ में आवश्यक होता है उस प्रकार से नान्दी श्राद्ध सभी शुभ कर्मों में अनिवार्य नहीं है। जैसे सत्यनारायण पूजा करनी हो तो नान्दी श्राद्ध आवश्यक नहीं है।

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एकादशी उद्यापन की सामग्री – ekadashi udyapan samagri

एकादशी उद्यापन की सामग्री – ekadashi udyapan samagri

एकादशी उद्यापन की सामग्री – ekadashi udyapan samagri : दान सामग्री के संबंध में मुख्य नियम यही है कि यजमान का सामर्थ्य क्या है। यजमान से सामर्थ्य के अनुसार दान सामग्री में कमी भी हो सकती है और अधिक भी किया जा सकता है। यहां एक पुनरावृत्ति पुनः करना अपेक्षित है “एक दरिद्र यजमान यदि कुछ दान करने में समर्थ न हो तो मात्र ब्राह्मण भोजन कराकर भी उद्यापन कर सकता है।”

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देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् – देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् – देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र

इसका प्रार्थना का भाव इतना गंभीर है कि कुटिल जीव का भी हृदय द्रवित हो जाये। फिर जो माता स्वभावतः भक्तों के ऊपर दया करने को आतुर रहती है उनके लिये तो कहना ही क्या ?

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