क्या आप ये प्रातः स्मरण मंत्र जानते हैं ? प्रातः वंदना करने की पूरी विधि

प्रातः स्मरण मंत्र - प्रातः वंदना

दिन का आरंभ सूर्योदय से होता है एवं ज्योतिष में दिन का परिवर्तन भी सूर्योदय से ही होता है किन्तु बात जब नित्यकर्म की आती है तो एक नया सिद्धांत भी है और वह सिद्धांत है सूर्योदय पूर्व का। सर्वप्रथम जगने की बात आती है तो उसके लिये ब्रह्ममुहूर्त का निर्देश मिलता है। रात के अंतिम प्रहर का तृतीय मुहूर्त ब्रह्ममुहूर्त कहलाता है। जगने के बाद ही नित्यकर्म प्रारम्भ हो जाता है। नित्यकर्म में प्रथम कर्म प्रातः स्मरण का आता है। इस आलेख में ब्रह्ममुहूर्त का विश्लेषण करते हुये प्रातः स्मरण के मंत्र समाहित किये गये हैं।

क्या आप ये प्रातः स्मरण मंत्र जानते हैं ? प्रातः वंदना करने की पूरी विधि

आइये अब हम प्रातः काल जगने से लेकर अन्य विधि और मंत्रों को क्रमशः समझते हैं जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण हैं :

प्रातः काल उठना या जगना

प्रातः काल ब्रह्ममुहुर्त में उठना चाहिये। याज्ञवल्क्य वचन – ब्राह्म मुहूर्त उत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम् । धर्मार्थकामान् स्वे काले यथाशक्ति न हापयेत् ॥

  • ब्रह्ममुहुर्त में उठकर आत्महितकारी चिंतन करे ।
  • विद्यार्थियों के लिये ब्रह्ममुहूर्त में अध्ययन करना अत्यधिक लाभकारी होता है।
  • धर्म को चाहने वाला काल का अतिक्रमण न करे ।
  • सूर्योदय काल में सोना दोषकारक होता है।
  • कदाचित् मोहवश सोनेवाले को दोष निवारण या पायश्चित्त हेतु पादकृच्छ्र करना चाहिए :

रत्नावली – ब्राह्मे मुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी । तां करोति द्विजो मोहात्पादकृच्छ्रेण शुद्ध्यति ॥ ब्रह्म मुहूर्त में सोना पुण्य को नाश करता है। कदाचित् मोहवश सोनेवाले को दोष निवारण या पायश्चित्त हेतु पादकृच्छ्र करना चाहिए।

प्रातः कालीन प्रार्थना
प्रातः कालीन प्रार्थना

ब्रह्ममुहूर्त का समय

ब्रह्म मुहूर्त के विषय में भ्रामक एवं अप्रामाणिक तथ्य प्रचुरता से देखे जाते हैं। प्रथमतया हम ब्रह्ममुहूर्त्त के प्रामाणिक काल को समझेंगे।

  • रात्रेस्तु पश्चिमो यामो मुहूर्तो ब्राह्म उच्यते । – रात्रि का पश्चिम याम (अंतिम या चौथा पहर) ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है।
  • विष्णुपुराण – रात्रेः पश्चिमयामस्य मुहूर्तो यस्तृतीयकः । स ब्राह्म इति विज्ञेयो विहितः स प्रबोधने ॥ पञ्चपञ्च उषः कालः सप्तपञ्चारुणोदयः । अष्टपञ्च भवेप्रातस्ततः सूर्योदयः स्मृतः ॥ रात के अंतिम पहर के तीसरे मुहूर्त को ब्रह्ममुहूर्त्त जनना चाहिए, जगने के लिए यही विहित मुहूर्त होता है। ५५ और ५६वां दण्ड उषाकाल, ५७वां दण्ड अरुणोदय, ५८वां दण्ड प्रातः और तत्पश्चात सूर्योदय काल कहलाता है।
  • पुनः अन्य प्रमाण : रात्रेः पश्चिममामे तु घटिका षट्कमेव हि । वेदाभ्यासं द्विजः कुर्यात्सा बेला पाठदायिनी ॥ – इसमें भी ६ घटी ब्रह्ममुहूर्त्त का ही बोध कराता है। तीन मुहुर्त में भी ६ घटी या दण्ड ही होता है।

निष्कर्ष – रात के चौथे पहर को ही ब्रह्ममुहूर्त कहा जाता है, विशेषता यह है कि संपूर्ण प्रहर न होकर तीसरा मुहूर्त तक ब्रह्ममुहूर्त्त कहलाता है। स्थूलमान से 1 दण्ड में 24 मिनट, 1 मुहूर्त में – 48 मिनट अर्थात् 2 दण्ड या घटी होता है। यह दण्ड/मुहूर्त का मान दिनमान-रात्रिमान के आधार पर परिवर्तित भी होता है। एक प्रहर में कुल 7½ दण्ड (3.75 मुहूर्त) होता है जिसमें से सूर्योदयपूर्व 1½ दण्ड को छोड़कर शेष 6 दण्ड में से 4 दण्ड छोड़कर पांचवां और छठा दण्ड ब्रह्ममुहूर्त्त कहलाता है।

स्थूलमान से ब्रह्ममुहूर्त सूर्योदय के 84 मिनट पहले प्रारम्भ होता है और सूर्योदय के 36 मिनट पहले समाप्त होता है। स्थूलमान का तात्पर्य है दिन-रात 12-12 घंटे के माने जायें तो 24 मिनट का एक दंड आता है और 48 मिनट का एक मुहूर्त, 3 घंटे अर्थात 180 मिनट का एक प्रहर।

Leave a Reply