त्रीतर शांति विधि
सर्वप्रथम नित्यकर्म करके फिर पूजा की व्यवस्था करे। यदि यजमान नित्यकर्म विहीन हो अर्थात नहीं करता हो और न जानता हो तो सूर्य को अर्घ्य देकर 10 बार गायत्री जप कर ले तदनन्तर गोमुख प्रसव और शांतिपाठ करके पूजा स्थान पर आकर सपत्नीक बैठे। पवित्रीकरण विधि के अनुसार ग्रन्थिबन्धन, पवित्रीकरण, आचमन, आसन शुद्धि, प्राणायाम आदि कर ले।
पूजा स्थान व्यवस्था : मध्य में हवन कुण्ड/वेदी बनाये, पूर्व में नवग्रह मण्डल बनाये और नवग्रह मण्डल के ईशानकोण में ५ धान्यराशि पर पांच कलश स्थापित करे। यदि प्रतिमा की व्यवस्था हो तो प्रतिमा भी रखे। यदि आहुति संख्या सहस्राधिक हो तो हवनवेदी के अग्निकोण में वास्तु वेदी का भी निर्माण करे। अन्य पूजा-हवन सामग्री व्यवस्थित कर ले।
फिर जिसने नित्यकर्म न किया हो वह पंचदेवता और विष्णु पूजन कर ले। पंचदेवता व विष्णु पूजा नित्यकर्म में ही आता है अतः जिसने पहले कर लिया हो उसे पुनः करने की आवश्यकता नहीं होती, जिसने नित्यकर्म न किया हो वही करे। पञ्चगव्य प्रयोग, रक्षादीप प्रज्ज्वलन, दिग्रक्षण, रक्षाबंधन आदि कर ले।
संकल्प विधि : संकल्प हेतु मुख्य रूप से त्रिकुशा, तिल, जल की आवश्यकता होती है; इसके अतिरिक्त पुष्प, चन्दन, दूर्वा, पान, सुपारी, अक्षत, द्रव्य आदि लेकर संकल्प करे :
संकल्प – ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरूषस्य, विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेत वाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते ………… १ संवतसरे महांमागल्यप्रद मासोतमे मासे ………. २ मासे ………… ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५ वासरे ………… ६ गोत्रोत्पन्नः ………… ७ शर्माऽहं (वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ससुतत्रय जन्मान्तरं कन्याजन्म/कन्यात्रय जन्मान्तरं पुत्र जन्म सूचित सर्वारिष्ट निवृत्ति द्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं त्रिक प्रसव शान्तिमहं करिष्ये ॥
(संकल्प निर्देश : १ संवत्सर का नाम, २ महीने का नाम, ३ पक्ष का नाम, ४ तिथि का नाम, ५ दिन का नाम, ६ अपने गोत्र का नाम, ७ ब्राह्मण शर्माऽहं, क्षत्रिय वर्माऽहं, वैश्य गुप्तोऽहं कहें ।)
आचार्य वरण : बांये हाथ में वरण सामग्री (धोती जोड़ा, गमछा, यज्ञोपवीत, कटिसूत्र, पुष्प, द्रव्यादि) लेकर दाहिने हाथ में त्रिकुशा, तिल, जल लेकर पढ़े : ॐ अद्यैतस्य मत्पूर्व संकल्पित त्रिकप्रसव शान्ति कर्मणि आचार्य कर्म कर्तुं एभिः वरणीय वस्तुभिः ………… गोत्रं ………. शर्माणं ब्राह्मणं आचार्यत्वेन त्वामहं वृणे॥ आचार्यादि के लिये वरणीय ब्राह्मणों का जन्मजात ब्राह्मण होना भी अनिवार्य है।
- आचार्य ग्रहण करके कहें – वृत्तोस्मि
- यजमान पुनः कहे – यथा विहितं कर्म कुरु
- आचार्य पुनः कहें – कर्वाणि
- आचार्यादि वरण करके स्वस्तिवाचन, गणेशाम्बिका पूजन कर ले। गणेशाम्बिका पूजन संकल्प पूर्व भी किया जा सकता है।
- फिर वरुण कलश स्थापन पूजन करे। (यदि पुण्याहवाचन, मातृका पूजा, वसोर्धारा, नान्दीमुख श्राद्ध करना हो तो सभी कर्म करे और संकल्प व ब्राह्मण वरण नान्दीमुख श्राद्ध करने के बाद करे।)
- अग्निस्थापन पहले करे। जब नवग्रह शांति कर रहे हों तो नवग्रह मण्डल देवता की भी न्यूनतम 8 – 8 आहूति नहीं अष्टोत्तरशताहुति करना चाहिये ।
- आगे का पूजन, अग्निस्थापनादि आचार्य स्वयं करे।
अग्नि स्थापन विधि
- परिसमूह्य : ३ कुशाओं से स्थण्डिल या हस्तमात्र भूमि की सफाई करें। कुशाओं को ईशानकोण में (अरत्निप्रमाण) त्याग करे ।
- उल्लेपन : गोबर से ३ बार लीपे।
- उल्लिख्य – स्फय या स्रुवमूल से प्रादेशमात्र पूर्वाग्र दक्षिण से उत्तर क्रम में ३ रेखा उल्लिखित करे।
- उद्धृत्य – दक्षिणहस्त अनामिका व अंगुष्ठ से सभी रेखाओं से थोड़ा-थोड़ा मिट्टी लेकर ईशान में (अरत्निप्रमाण) त्याग करे।
- अग्नानयन व क्रव्यदांश त्याग – कांस्यपात्र या हस्तनिर्मित मृण्मयपात्र में अन्य पात्र से ढंकी हुई अग्नि मंगाकर अग्निकोण में रखवाए । ऊपर का पात्र हटाकर थोड़ी सी क्रव्यदांश अग्नि (ज्वलतृण) लेकर नैर्ऋत्यकोण में त्याग कर जल से बुझा दे ।
- अग्निस्थापन – दोनों हाथों से आत्माभिमुख अग्नि को स्थापित करे :- ॐ अग्निं दूतं पुरोदधे हव्यवाहमुपब्रुवे । देवां२ आसादयादिह ॥ अग्नानयन पात्र में अक्षत-जल छिरके।
- अग्निपूजन-उपस्थान – अग्नि को प्रज्वलित कर पूजा करे, नैवेद्य वायव्यकोण में देकर स्तुति करे : ॐ अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनं। हिरण्यवर्णममलं समृद्धं विश्वतोमुखं ॥
अग्नि स्थापन करने के बाद अग्नि रक्षणार्थ पर्याप्त ईंधन देकर आगे का पूजन कर्म करे।
- अष्टोत्तरसहस्राहुति देना हो तो अग्निकोण में वास्तु वेदी निर्माण करके वास्तु पूजन भी करे।
- तत्पश्चात नवग्रह मंडल पूजा विधि के अनुसार नवग्रहादि की पूजा करे।
नवग्रह मंडल देवता पूजनान्तर नक्षत्र, योग, करण, द्वीप, वेद, सागर, सरिता, आदित्य, रुद्र, मरुत्, मातृका, ऋतु, अयन, मास, तिथि, संवत्सर आदि की पूजा भी प्राचीन पद्धतियों में प्राप्त होता है किन्तु सिद्धि नहीं होती ऐसा उल्लेख करते हुये महाजनो येन गतः स पन्थाः का अनुसरण करते हुये कर्मकाण्ड रत्नाकरकार ने भी नाम मंत्र से आवाहन की विधि को ग्रहण किया है।
पूजा करके पुष्पाञ्जलि प्रदान करे :
सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्च पदवीं, सन्मंगलं मंगल:
सद्बुद्धिञ्चबुधो गुरूश्चगुरुतां, शुक्रःसुखं शं शनिः।
राहुर्बाहुबलं करोतु विपुलं, केतुः कुलस्योन्नतिं
नित्यं प्रीतिकरा भवन्तु भवतां, सर्वे प्रसन्ना ग्रहा: ॥