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त्रिक/त्रीतर (तेतर दोष) शांति विधि – trik shanti puja

त्रिक/त्रितर (तेतर) शांति विधि - Trik shanti त्रिक/त्रितर (तेतर) शांति विधि - Trik shanti

त्रीतर शांति हवन विधि

तदनन्तर यदि पूर्व में अग्नि स्थापन न किया हो तो अग्नि स्थापन पूर्वक ब्रह्मा वरण आदि विधि से हवन कार्य करे। यदि पूर्व में अग्निस्थापन किया गया हो तो ब्रह्मा वरण से आरम्भ करके आगे की क्रिया करे :

ब्रह्मावरण – उत्तर दिशा में स्थित प्रत्यक्ष ब्रह्मा (विद्वान ब्राह्मण) ब्रह्मा का वरण वस्त्र, पान, सुपारी, द्रव्य, तिल, जलादि लेकर करे : ॐ अद्य कर्तव्य त्रिकप्रसव शांति होम कर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप ब्रह्मकर्मकर्तुं एभिः वरणीय वस्तुभिः ……….. गोत्रं ……….. शर्माणं ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे॥ ब्रह्मा स्वीकार करके “वृत्तोस्मि” कहे पुनः यजमान “यथाविहितं कर्म कुरु” कहे और ब्रह्मा “करवाणि” कहे। अथवा ५० कुशात्मक ब्रह्मा पक्ष में : ॐ अद्य अस्मिन् होम कर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप कर्मकर्तुं त्वं मे ब्रह्मा भव कुशात्मक ब्रह्मा में प्रतिवचन नहीं होता।

बह्मा का आसन – दक्षिण दिशा (अग्निकोण) में, परिस्तरण भूमि को छोड़कर ब्रह्मा के लिये ३ कुश का आसान पूर्वाग्र बिछाये। प्रत्यक्ष ब्रह्मा का दक्षिणहस्त ग्रहण कर (कुशात्मक बह्मा को उठाकर) प्रदक्षिण क्रम से दक्षिण ब्रह्मासन तक ले जाकर स्वयं पूर्वाभिमुख होकर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख बैठाये या कुशात्मक ब्रह्मा को रखे – ॐ अस्मिन होम कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भव॥ ब्रह्मा की पूजा अमंत्रक ही करे। पुनः अप्रदक्षिणक्रम से अग्नि के पश्चिम आकर आसन पर बैठे।

प्रणीय – तदनन्तर प्रणीतापात्र को आगे में रखकर जल भरे, कुशाओं से आच्छादन करे । फिर ब्रह्मा का मुखावलोकन करते हुए अग्नि के उत्तर भाग में विहित कुशाओं के आसन पर रखे । (वाजसनेयी विशेष, छन्दोग में अभाव)

परिस्तरण – तदनन्तर १६ कुशा लेकर परिस्तरण करे । ४ कुशा अग्निकोण से ईशानकोण तक उत्तराग्र, ४ कुशा दक्षिण में ब्रह्मा से अग्नि पर्यंत पूर्वाग्र, ४ कुशा नैर्ऋत्यकोण से वायव्यकोण तक उत्तराग्र और ४ कुशा उत्तर दिशा में अग्नि से प्रणीता तक पूर्वाग्र बिछाए । (परिस्तरण हेतु एक और प्राकान्तर प्राप्त होता है : पूर्व में पूर्वाग्र, दक्षिण में उत्तराग्र, पश्चिम में पूर्वाग्र और उत्तर में पुनः उत्तराग्र।)

आसादन : अग्नि के उत्तरभाग में पश्चिमपूर्व क्रम से क्रमशः आसादित करे : पवित्रीच्छेदन 3 कुशा, पवित्रिनिर्माण 2 कुशा, आज्यस्थाली, सम्मार्जन कुशा, उपयमन कुशा, 3 समिधा, स्रुवा, घी, पूर्णपात्र।

नवग्रह शांति हवन विधि
नवग्रह शांति हवन विधि

पवित्री निर्माण – पवित्री निर्माण हेतु आसादित पवित्रिकरण २ कुशाओं को ग्रहण करे फिर मूल से प्रादेशप्रमाण भाग पर पवित्रच्छेदन ३ कुशाओं को रखकर दक्षिणावर्त २ बार परिभ्रमित करके नखों का प्रयोग किये बिना २ कुशों का मूल वाला प्रादेशप्रमाण भाग तोड़ ले शेष का उत्तर दिशा में त्याग करे। ग्रहण किये हुए प्रादेशप्रमाण २ कुशाओं में दक्षिणावर्त ग्रंथि दे । प्रोक्षणीपपात्र को प्रणिता के निकट रखे।

  • पवित्रीहस्त प्रणीता से प्रोक्षणी में ३ बार जल देकर पवित्री को उत्तराग्र करके अंगूठा व अनामिका से ३ बार प्रणीता का जल ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप करे।
  • प्रोक्षणीपात्र को बांये उठाकर दाहिने हाथ से अनामिका और अंगूठे द्वारा पवित्री ग्रहण किये हुए जल को ३ बार ऊपर उछाले। प्रणीतापात्र के जल से प्रोक्षणी को ३ बार सिक्त करके प्रोक्षणी के जल से होमार्थ आसादित-अनासादित सभी वस्तुओं को सिक्त करके अग्नि व प्रणिता के मध्य भाग में कुशा के आसन पर प्रोक्षणीपात्र को रख दे।
  • घृतपात्र में घृत डालकर घृतपात्र को प्रदक्षिणक्रम से घुमाते हुए अग्नि पर चढ़ाये। २ प्रज्वलित तृण को प्रदक्षिणक्रम से घृत के ऊपर घुमाकर (घृत में सटाये बिना ऊपर घुमाकर) अग्नि में प्रक्षेप करे दे । चरु हो तो सामान विधान करे। दाहिने हाथ से स्रुव को ३ बार अग्नि पर तपाकर बांये हाथ में रखे, दाहिने हाथ से सम्मार्जन कुशा लेकर कुशाग्र से स्रुव के ऊपरी भाग का मूल से अग्रपर्यन्त सम्मार्जन करे और कुशमूल से स्रुव के पृष्ठभाग का अग्र से मूलपर्यन्त मार्जन करके प्रणीतोदक से ३ बार सिक्त करके स्रुव को दाहिने हाथ में लेकर पुनः ३ बार तपाकर दक्षिणभाग में कुशा के ऊपर रखे। स्रुचि के लिये भी स्रुववत् विधि।
  • घृतपात्र को प्रदक्षिणक्रम में अग्नि से उतारकर आगे में रखे (चरु हो तो उसे भी)। पूर्व की भांति पवित्री से घृत को भी ३ बार ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप करे। तत्पश्चात घृत को भलीभांति देखे, कुछ अपद्रव्यादि हो तो निकाल दे। पुनः प्रोक्षणी के जल को ३ बार ऊपर की पूर्ववत उछाले।
  • फिर बांये हाथ में उपयमन कुशा ग्रहण करके, उठकर ३ घृताक्त समिधा प्रजापति का ध्यानमात्र करते हुए अग्नि में प्रक्षेप करे।

पर्युक्षण – फिर बैठकर पवित्रिहस्त प्रोक्षणी से जल लेकर सभी सामग्रियों सहित अग्नि का प्रदक्षिणक्रम से पर्युक्षण करे। ३ बार पर्युक्षण करके पवित्री को प्रणीतापात्र में रख दे।

फिर कुश द्वारा ब्रह्मा से अन्वारब्ध करके पातितदक्षिणजानु होकर प्रज्वलित अग्नि में स्रुवा से आज्याहुति दे। आहुति के पश्चात् शेष प्रोक्षणी में प्रक्षेप करे :-

  1. ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये। (मानसिक मात्र) प्रजापति का स्वाहाकार मंत्र बिना बोले आहुति दे, इदं प्रजापतये भी बिना बोले शेष प्रोक्षणीपात्र में प्रक्षेप करे।
  2. ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय।
  3. ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये।
  4. ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय।
  5. पुनः ३ आहुति और दे – १. ॐ भूः स्वाहा, इदं भूः॥ २. ॐ भुवः स्वाहा, इदं भुवः॥ ३. ॐ स्वः स्वहा, इदं स्वः ॥

फिर प्रायश्चित्तसंज्ञक ये पञ्चमहावारुणी होम करे :

  1. ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अवयासि सीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाᳪसि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा, इदमग्मीवरुणाभ्याम् ॥
  2. ॐ स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अवयक्ष्व नो वरुणᳪरराणो वीहि मृडीकᳪसुहवो न एधि स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्याम् ॥
  3. ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य नभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया असि । अया नो यज्ञ ᳪ वहास्ययानो धेहि भेषज ᳪ स्वाहा, इदमग्नये॥
  4. ॐ ये ते शतँवरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्न्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा, इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यः॥
  5. ॐ उदुत्तमँव्वरुण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमᳪश्रथाय । अथा व्वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा, इदं वरुणाय ॥

तदुत्तर अन्वारब्ध (ब्रह्मा से कुशात्मक संबंध) के बिना स्थापित-पूजित देवताओं की, जप किये गए मंत्र की आदि शाकल्यादि अन्य होम द्रव्य हो तो उससे अन्यथा आज्य से ही आहूति दे। सर्वप्रथम गणपति की आहुति दे :

ॐ गं गणपतये स्वाहा, इदं गणपतये ॥ (अथवा गणानांत्वा से)
यदि आज्याहुति करे तो प्रोक्षणी में शेष प्रक्षेप करे, अन्यथा नहीं। केवल पाठ मात्र करे। वेदी देवताओं के होम का आरम्भ नवग्रहवेदी से करे।

फिर यथोक्त द्रव्य से निर्धारित संख्यानुसार हवन करे।

सूर्य हवन : ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च । हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भूवनानि पश्यन् स्वाहा

  • अधिदेवता शिव – ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता अग्नि – ॐ अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुपब्रुवे देवाँ२ ऽआसादयादिह स्वाहा॥

चन्द्र हवन : ॐ इमं देवा असपत्न ᳪ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय । इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना ᳪ राजा स्वाहा॥

  • अधिदेवता उमा – ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रो पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुम्म ऽइषाण सर्वलोकम्म ऽइषाण स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता अप् – ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवस्तानऽऊर्जे दधातन महेरणाय चक्षसे यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः उशतीरिव मातरः स्वाहा॥

मङ्गल हवन : ॐ अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपा ᳪ रेता ᳪ सि जिन्वति स्वाहा॥

  • अधिदेवता स्कन्द – ॐ यदक्रन्दः प्रथमं जायमानः उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात्। श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहूऽउपस्तुत्यं महिजातन्ते अर्वन् स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता पृथ्वी – ॐ स्योना पृथिवी नो भवानृक्षरा निवेशनी यच्छा नः शर्म स प्रथाः स्वाहा॥

बुध हवन : ॐ उद्‍बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वभिष्टापूर्ते स ᳪ सृजेथामयं च । अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत स्वाहा॥

  • अधिदेवता विष्णु – ॐ विष्णोरराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्त्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोर्ध्र्रुवोसि वैष्णवमसि विष्णवे त्वा स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता विष्णु – ॐ विष्णोरराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्त्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोर्ध्र्रुवोसि वैष्णवमसि विष्णवे त्वा स्वाहा॥

गुरु हवन : ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अहार्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यदीदयच्छवसऋत- प्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् स्वाहा॥

  • अधिदेवता ब्रह्मा – ॐ ब्रह्म यज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेनऽआवः। सबुध्न्या उपमाऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसश्च विवः स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता इन्द्र – ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र ᳪ हवे हवे सुहव ᳪ शूरमिन्द्रम्, ह्वायामि शक्रम्पुरुहूतमिन्द्र ᳪ स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः स्वाहा॥

शुक्र हवन : ॐ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत्क्षत्रं पयः सोमं प्रजापतिः । ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान ᳪ शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु स्वाहा॥

  • अधिदेवता इन्द्र – ॐ सजोषा इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमम्पिब वृत्रहा शूर विद्वान् जहि शत्रूँरपमृधोनुदस्वाथाभयङ्कृणुहि विश्वतो नमः स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता इन्द्राणी – ॐ अदित्यैरास्नासीन्द्राण्याऽउष्णीषः पूषासि धर्मायदीष्व स्वाहा॥

शनि हवन : ॐ शं नो देवीरभिष्ट्य आपो भवन्तु पीतये । शं योरभि स्रवन्तु नः स्वाहा॥

  • अधिदेवता यम – ॐ यमाय त्वांगिरस्वते पितृमते स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मः पित्रे स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता प्रजापति – ॐ प्रजापते न त्वदेतान्यन्न्यो विश्वारूपाणि परिता बभूव। यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोऽस्तु वय ᳪ स्याम पतयो रयीणाम् स्वाहा॥

राहु हवन : ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः । सखा कया सचिष्ठया वृता स्वाहा॥

  • अधिदेवता काल – ॐ कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि समापो ऽअद्भिरग्मत समोषधीभिरोषधीः स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता सर्प – ॐ नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु येऽअन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः स्वाहा॥

केतु हवन : ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे । समुषद्भिरजायथाः स्वाहा॥

  • अधिदेवता चित्रगुप्त – ॐ चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय स्वाहा॥
  • प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा – ॐ ब्रह्म यज्ञानम्प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेनऽआवः सबुध्न्याऽउपमाऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः स्वाहा॥

पञ्चलोकपाल होम

  1. गणेश  – ॐ गणानान्त्वा गणपति  हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति  हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति  हवामहे व्वसो मम आहमजानि गर्भधमात्त्वमजासि गर्भधम् स्वाहा॥
  2. दुर्गा – ॐ अम्बेऽम्बिकेऽम्बालिके न मानयति कश्चन ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् स्वाहा॥
  3. वायु  – ॐ आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वर  सहश्रिणीभिरुपयाहि यज्ञम्, वायो ऽअस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयम्पात स्वस्तिभिः सदा नः स्वाहा॥
  4. आकाश – ॐ घृतं घृतपावानः पिबत वसाम्व्वसापावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा दिशः प्रदिशऽआदिशो विदिशऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा ॥
  5. अश्विनी – ॐ यावांकशामधुमत्यश्विना सूनृतावती तया यज्ञम्मिमिक्षताम् स्वाहा ॥

दश दिक्पाल होम

  1. इन्द्र – ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र हवे हवे सुहव  शूरमिन्द्रम्, ह्वायामि शक्रम्पुरुहूतमिन्द्र  स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः स्वाहा ॥
  2. अग्नि – ॐ त्वन्नोऽअग्ने तव पायुभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य। त्राता तोकस्य तनये गवामस्य निमेष  रक्षमाणस्तवव्व्रते स्वाहा ॥
  3. यम – ॐ यमाय त्वांगिरस्वते पितृमते स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मः पित्रे स्वाहा ॥
  4. निर्ऋति – ॐ असुन्नवन्तमयजमानमिच्छस्तेनस्येत्यामन्विहितस्करस्य अन्यमस्मदिच्छसात ऽइत्यानमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु स्वाहा ॥
  5. वरुण – ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश  समानऽआयुः प्रमोषीः स्वाहा ॥
  6. वायु – ॐ आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वर  सहश्रिणीभिरुपयाहि यज्ञम्, वायो ऽअस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयम्पात स्वस्तिभिः सदा नः स्वाहा ॥
  7. कुबेर – ॐ वय  सोमव्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः प्रजावन्तः सचेमहि स्वाहा ॥
  8. ईशान – ॐ तमीशानञ्जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयं। पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये स्वाहा ॥
  9. ब्रह्मा – ॐ अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतो सजोषाः यः श  स तेस्तुवते धायि वज्रऽइन्द्र ज्येष्ठाऽअस्माँ२ऽअवन्तु देवाः स्वाहा ॥
  10. अनन्त – ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरानिवेशनी यच्छा नः सर्मसप्रथाः स्वाहा ॥

पूर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र और रुद्र के लिये निर्धारित आहुति प्रदान करे :

ब्रह्मा : ॐ ब्रह्म यज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेनऽआवः। सबुध्न्या उपमाऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसश्च विवः स्वाहा ॥

विष्णु : ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदं। समूढमस्य पा ᳪ सुरे स्वाहा स्वाहा ॥

महेश : ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् स्वाहा ॥

इन्द्र : ॐ यत इन्द्र भयामहे ततो नोऽअभयं कृधि । मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतये उतिभिर्विद्विषो विमृधो जहि स्वाहा ॥

रुद्र : ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः॥ बाहुब्भ्यामुत ते नमः स्वाहा ॥

तत्पश्चात् स्विष्टकृद्धोम करे।

स्विष्टकृद्धोम : ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदं अग्नयेस्विष्टकृते।
व्याहृति होम : (आज्याहुति)

  • ॐ भूः स्वाहा, इदं भूः॥
  • ॐ भुवः स्वाहा, इदं भुवः॥
  • ॐ स्वः स्वहा, इदं स्वः ॥

पञ्चमहावारुणी होम :

  1. ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अवयासि सीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाᳪसि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा, इदमग्मीवरुणाभ्याम् ॥
  2. ॐ स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अवयक्ष्व नो वरुणᳪरराणो वीहि मृडीकᳪसुहवो न एधि स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्याम् ॥
  3. ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य नभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया असि । अया नो यज्ञᳪवहास्ययानो धेहि भेषज ᳪ स्वाहा, इदमग्नये॥
  4. ॐ ये ते शतँवरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्न्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा, इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यः॥
  5. ॐ उदुत्तमँव्वरुण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमᳪश्रथाय । अथा व्वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा, इदं वरुणाय ॥
  6. तथा : ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये॥ (मानसिक मात्र)

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