“सवर्णों का संवैधानिक उत्पीड़न ही भविष्य के हिंसक गृहयुद्ध की उर्वर भूमि है।”
यदि हम पड़ोसी देशों को देखें तो ऐसा कह सकते हैं कि चतुर्दिक कई गृहयुद्ध हो चुके हैं। किन्तु भारत के विषय में यह आकलन नहीं किया जा सका कि भारत कब गृहयुद्ध के द्वार पर पहुंचा और कब आरम्भ हो गया। वस्तुतः वर्त्तमान भारत में गृहयुद्ध आरम्भ हो चुका है जो दिखाई नहीं दे रहा है, आकलनकर्त्ता देश की वर्त्तमान परिस्थितियों में से उन तथ्यों की वरीयता का अध्ययन कर रहे हैं और संकलन कर रहे हैं जो भविष्यभावी प्रत्यक्ष गृहयुद्ध के कारण कहे जा सकें। हम यहां इसी विषय को समझेंगे कि भारत में गृहयुद्ध आरम्भ हो चुका है और स्वाधीनता के शताब्दी पूर्व ही कैसे हो गया ?
स्वाधीनता शताब्दी पूर्व ही भारत में गृहयुद्ध कैसे आरम्भ हो गया ?
“सवर्णों को राजनीतिक रूप से अछूत बना देना ही सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अपराध है।”
सर्वप्रथम इस तथ्य को ही समझना आवश्यक है कि क्या गृहयुद्ध का आरम्भ हो गया है ?
विश्वभर में लोगों मन में लोकतंत्र कूट-कूट कर भर दिया गया है, कथित लोकतंत्र ने विश्वभर में त्राहिमाम मचा रखा है किन्तु लोग लोकतंत्र-लोकतंत्र ही चिल्ला रहे हैं और लोकतंत्र से ही लड़ भी रहे हैं। भारत के चतुर्दिक सत्तापरिवर्तन का क्रम चलता ही रहा है किन्तु सोचिये हर बार लोकतंत्र-लोकतंत्र ही सुनाई पड़ता है चाहे पहली बार सत्ताधिग्रहण हो अथवा पुनः चुनाव के माध्यम से नई सरकार बने। सत्ताधिग्रहण करने वाले भी लोकतंत्र-लोकतंत्र चिल्लाकर ही लड़ते हैं और पुनः उसके विरुद्ध भी लोकतंत्र-लोकतंत्र ही सुनाई देती है।

ऐसा प्रयास भारत में भी किया जा रहा है जो राजनीति में कही-सुनी जाती है, यहां तक कि जेन-जी दिल्ली को घेरकर सत्ताधिग्रहण कर ले और फिर कोई गद्दी पर बैठ जाये ऐसा प्रयास हो ही रहा है और यह राजनीति भी लोकतंत्र-लोकतंत्र चिल्लाकर ही हो रही है। देश में आग लग जायेगा, खून की नदियां बहेंगी आदि शब्दावलियां सुनते ही रहते हैं।
लोकतांत्रिक गृहयुद्ध
“आटा कहकर मिट्टी थमाना ही वर्त्तमान राजनीति का मूल चरित्र है।”
समझने की बात यह है कि लोकतंत्र का एक हौवा बना दिया गया है, लोगों के मन में कूटकूटकर लोकतंत्र भरा गया है और वर्त्तमान भारत में गृहयुद्ध का आरम्भ हो गया है किन्तु वो लोकतांत्रिक तरीकों से हो रहा है। गृहयुद्ध तो तभी कहा जायेगा जब हिंसक संघर्ष का रूप धारण करे इस कारण जो राजनीतिक विश्लेषक हैं वो इसे गृहयुद्ध नहीं कह पा रहे हैं अथवा वो सब चाहते हैं कि हिंसक संघर्ष ही हो इसलिये भी मौन हैं।
यदि सभी यह सत्य स्वीकार कर लें कि लोकतांत्रिक रूप से भारत में गृहयुद्ध का आरम्भ हो गया है तो फिर समाधान का विचार भी करना होगा और लोकतांत्रिक तरीकों से हिंसक संघर्ष को रोकने का प्रयास किया जायेगा, किन्तु यदि रोकना चाहें तब न। यदि आग में घी देना चाहते हैं तो कैसे चिंतन करेंगे अपितु चिंतन को भी उसी दिशा में मोड़ देंगे।
- मनु के देश में बड़े वर्ग को मनुवादी कहकर चिढ़ाना। मनुवाद को ऐसा सिद्ध करना जैसे कोई अपराध हो और आत्मग्लानि से भर जायें, कुंठित रहें।
- सवर्णों का सार्वजानिक रूप से विरोध होना।
- सवर्णों (आर्यों) को विदेशी कहना।
- सवर्णों के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से अभद्र शब्दावलियों का प्रयोग करना, देश से भगाने की बात करना, बेटियां परोसने की बात करना इत्यादि सामान्य सी बात हो गयी है और इसपर सरकार हो न्यापालिका हो सबने चुप्पी तान रखी है, मौन समर्थन भी दे रहे हैं।
- UGC रेगुलेशन की घटना से सामान्य वर्गों का विरोध आरम्भ होना।
- पुनः असामान्य वर्गों का UGC रेगुलेशन के पक्ष में खड़ा होना।
- यहां तक की सवर्णों के जनसंहार की बात भी करना।
एक पक्ष तो बंदरबांट करने के लिये पहले से ही बैठा है, जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश बना नए भारत के और टुकड़े करना चाहता है, वो तो अभी मौके पर चौका लगाने की बाट जोह रहा है। और संभव है कि इन सब घटनाओं के पीछे भी सुनियोजित षड्यंत्र ही रहा हो और बंदरबांट करने का ही प्रयास हो।
हिंसक गृहयुद्ध होगा या नहीं ?
उपरोक्त तथ्यों पर गंभीरता से विचार करते हुये; यदि हम गृहयुद्ध के उस स्वरूप की बात करें जो हिंसक होता है तो कुछ दूर लगता है किन्तु लोकतंत्र में लोकतांत्रिक गृहयुद्ध की बात करें तो वो आरम्भ हो चुका है। भले ही इसमें कुछ वर्ष लगें किन्तु दुनियां इसे तभी गृहयुद्ध कहेगी जब हिंसक होगा। इसका दूसरा भाव यह भी तो है कि सभी ऐसा ही चाहते हैं अर्थात भारत में गृहयुद्ध हो सबकी यही इच्छा है। जब सबके-सब यही इच्छा रखते हैं कि भारत में हिंसक गृहयुद्ध हो तो फिर न होने का कोई मार्ग ही शेष नहीं बचता।

हिंसक गृहयुद्ध जब होगा तब सत्ता और लोकतंत्र का क्या होगा, अथवा जो होगा सो होगा अभी किसी को यह विचार करने की आवश्यकता नहीं है किन्तु लोकतांत्रिक गृहयुद्ध आरम्भ हो चुका है इसकी सिद्धि तो हो रही है और कुछ वर्षों में यह हिंसक रूप भी धारण करेगा ही करेगा।
जो मौन हैं वो भविष्यवर्ती हिंसक गृहयुद्ध का कारण UGC रेगुलेशन और इसकी राजनीति को सिद्ध करने का प्रयास करेंगे, सरकार को कोसेंगे कि सरकार ने सही समय पर सही निर्णय नहीं लिया, मोदी सरकार की विफलता के कारण गृहयुद्ध हुआ, संघ के ऊपर भी दोष मढ़ेंगे, आदि-इत्यादि। किन्तु वास्तविकता यह है कि वो पक्ष भी वर्त्तमान में गृहयुद्ध ही चाहता है और भविष्य में एक-दूसरे पर आरोपित करेंगे।
आरम्भ के मूल कारण
यद्यपि सामान्य जनता का मोदी से मोहभंग हो चुका है किन्तु कुछ राष्ट्रवादियों द्वारा जिस किसी कारण से हो मोदी अथवा भाजपा को विकल्पविहीन सिद्ध किया जा रहा है। किन्तु भविष्य के इतिहास में मोदी विकासपुरुष नहीं आसुरी प्रतीक माना जायेगा और जैसे आज रावण का पुतला दहन करते हैं भविष्य में मोदी का भी पुतलादहन किया जायेगा जिसका तात्पर्य तात्कालिक शासकों को सन्देश होगा कि ऐसा मत बनना।
अर्थात गृहयुद्ध का सारा दायित्व मोदी, भाजपा और संघ के ऊपर थोपा जायेगा। ये तो भविष्य की बातें हैं और वर्त्तमान की घटनाओं को तो देख ही रहे हैं। किन्तु कैसे हुआ इसका कारण तो भूतकाल में ही छिपा होता है।
जब हम वृक्ष का कारण ढूंढते हैं तो बीज निकलता है और बीज का कारण ढूंढते हैं तो पूर्ववर्ती वृक्ष निकलता है और पुनः उस वृक्ष का कारण भी उसका बीज ही होता है। इसी प्रकार संसार की व्यवस्था को भी एक वृक्ष के रूप में देखने पर इसका कारण पिछले कारणों और परिवर्तनों से जुड़ता रहता है।
इसी व्यवस्था में एक बीजारोपण लोकतंत्र का हुआ था जो वर्त्तमान में विशाल वृक्ष के रूप में दिखाई दे रहा है किन्तु इसकी और और वास्तविकता है वो यह कि ये उस वृक्ष की भांति है जो दूसरे वृक्ष पर ही उत्पन्न होते हैं भूमि पर नहीं। लोकतंत्र भी राजतंत्र रूपी वृक्ष पर उत्पन्न हुआ है भूमि पर नहीं। और राजतंत्र का बीज सुरक्षित ही है एवं वो पुनः भूमि में उग रहा है।
जैसे किसी दूसरे वृक्ष पर उत्पन्न होने वाला वृक्ष का अस्तित्व मूलवृक्ष के अस्तित्व पर ही निर्भर करता है वैसे ही लोकतंत्र का अस्तित्व भी राजतंत्र के अस्तित्व में ही निहित है किन्तु लोकतंत्र चिल्लाने वालों को ये बातें समझ में नहीं आ रही हैं। ये घटनायें कई पीढ़ियों में घटित होती हैं न कि कुछ वर्षों में इस कारण वर्त्तमान के विचारक कुछ समझ ही नहीं पा रहे हैं कि हो क्या रहा है और आगे क्या होगा। लोकतंत्र का अस्तित्व समाप्ति की दिशा में आगे बढ़ रहा है और राजतंत्र का बीज पनप रहा है।
किन्तु यहां पर गृहयुद्ध का मूल कारण होते हुये भी प्रत्यक्षतः नहीं दिखाई देगा। ठीक है जहां प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ता है और वो भी वर्त्तमान विचारकों को नहीं दिखाई दे रहा है वो भविष्य में देखेंगे; उसको भी समझ लेना आवश्यक है एवं यह चर्चा इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ये विचारक लोग और इतिहासकार वास्तविक तथ्यों को छुपाकर कुछ और ही सिद्ध कर देते हैं, सत्ता में आसीन पक्ष को तत्काल उचित सिद्ध कर देते हैं किन्तु भविष्य में दोषी भी सिद्ध करते हैं।
मूल कारण मानसिक स्वतंत्रता का अभाव होना है। भारत भौगोलिक रूप से तो स्वतंत्र हुआ किन्तु मानसिक और वैचारिक रूप से नहीं हुआ। पूरी व्यवस्था ही वैसी बनाई गयी जो औपनिशिक विचारधारा वाले चाहते थे। पूरी राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ती गयी जो उपनिवेशवादी चाहते थे। वर्त्तमान में जो सवर्णोत्पीड़न दिखाई दे रहा है ये मोदीकाल में ही आरम्भ हुआ ऐसा नहीं है ये तो दशकों पूर्व आरक्षण, SC/ST एक्ट आदि रूपों में आरम्भ हो चुका था जिसको मोदी ने गतिशक्ति योजना से तीव्रगामी बनाया और जैसे ही UGC रेगुलेशन आया तो सवर्णों को चेतना आयी कि ये तो अति है और अति की सर्वत्र वर्जना की गयी है।
- पहले राज्य लिया।
- भूपतियों की भूमि छीना, सेवावृत्ति के लिये बाध्य किया।
- धन छीनकर लुटा रहे हैं और लाभुक वर्ग ही गाली भी दे रहे हैं।
- सवर्णों की बेटियों को बाजार में बेच रहे हैं (अंतर्जातीय विवाह में प्रोत्साहन राशि प्रदान करना मूल्य लगाना ही तो है, केवल भुगतान विवाहित जोड़े को किया जाता है)
- और अब बेटियों को छीनने की भी बात कर रहे हैं, सवर्णों को देश से भगाने की बात कर रहे हैं।
जिस सीढ़ी से उठा उस सीढ़ी को ही कहता है अब सड़ गया, जला दो, अरे उतरना भी तो होगा छत पर चढ़ने के पश्चात् उतरते भी हैं न कि आजीवन छत पर ही रहते हैं। जिस थाली में खाया उसी में छेद कर रहे हैं अरे आगे भी खाना होगा और वही थाली काम आएगा इसलिये थाली में छेद मत करो। जिस रास्ते पर चलते हो, जिस स्कूल/कॉलेजों में पढ़ते हो, जिस अस्तपताल में चिकित्सा कराते हो सब उसी का दिया हुआ है।
कृतघ्नता की भी सीमा का अतिक्रमण किया जा रहा है और ये है गृहयुद्ध का दिखने वाला मूल कारण किन्तु जो राजनीतिक विचारक बन बैठे हैं उन्हें यह नहीं दिखाई देगा क्योंकि उनके आँखों पर पट्टी बंधी हुयी है और आटा कहकर मिट्टी हाथ में दिया जा रहा है और वो मिट्टी को आटा कह रहे हैं।
शताब्दियों तक के जिस उत्पीड़न की बात करी जाती है वो तो किसी ने नहीं देखा किन्तु लोकतांत्रिक भारत में सवर्णों का संवैधानिक उत्पीड़न दशकों से हो रहा है और देखते हुये भी सब उलटी गंगा बहा रहे हैं। सवर्णों का संवैधानिक उत्पीड़न चरम पर है और ये गृहयुद्ध (वर्त्तमान में लोकतांत्रिक भविष्य में हिंसक संघर्ष) का कारण है।
अरे जो भूमिपति था उसे सेवक बना दिया और कितना विकास करोगे, जो ब्राह्मण समाज का सिरमौर था उससे जूते मारने की बात कर रहे हो, देश से भगाने की बात कर रहे हो, बेटियां सौंपने की धमकी दे रहे हो और सब कुछ सार्वजनिक रूप से एवं कहीं कोई कानून-व्यवस्था नामक चीज है ही नहीं अपितु संरक्षण ही कर रही है।
स्मरण कीजिये ३ – ४ दशक पूर्व सरकारें लोगों को नौकरी के लिये पकर कर ले जाती थी और बहुत सारे छोड़कर चले आते थे, विकास ऐसा हुआ कि संपत्तिवान, समृद्ध परिवार के बच्चे भी नौकरी के लिये व्याकुल रहते हैं। सामान्य लोगों को तो बाध्य ही कर दिया गया है।
आज के लोगों के मन में जैसे लोकतंत्र कूट-कूटकर भर दिया गया है उसी प्रकार और भी कई बातें भरी जा चुकी है जैसे व्यावहारिकता, प्रगतिशीलता, वैज्ञानिकता आदि के नाम पर धर्म, सत्य, मर्यादा, कुलीनता आदि का त्याग करना, धार्मिक सिद्धांतों को रूढ़िवादिता कहना, अस्पृश्यता नहीं मानना, सुविधाभोगी बनना आदि और इसमें से एक विषय नौकरी भी है। लोगों के मन में नौकरी (विशेषकर सरकारी नौकरी) को लेकर विशेष दुराग्रह भर दिया गया है और जिस परिवार में १० – २० – ५० नौकर कार्यरत होते हैं उस परिवार की बहु भी नर्स की नौकरी करती मिलती है।
इस प्रकार राज्य ने लोगों को नौकर बनना ही श्रेष्ठता का आधार है, सम्मानित होने का मूल है आदि स्थापित कर दिया है और बंधुआ मजदूर शब्द निंदापरक भले ही हो किन्तु प्रत्येक नागरिक को बंधुआ मजदूर ही बना दिया है, ये भिन्न विषय है कि पारिश्रमिक रूप में वेतनादि की मात्रा कुछ अधिक होती है किन्तु किसी भी कर्मचारी (नौकरी करने वाले) की स्थिति लगभग बंधुआ मजदूर के समान ही होती है। किन्तु मन में ऐसे विचार भर दिये गए हैं कि हर कोई नौकरी के लिये व्याकुल दिखता है।
यहीं पर यह प्रश्न उठता है कि जब सरकार ने स्वयं ही सबको बंधुआ मजदूर की श्रेणी का बना दिया है तो फिर शोषित, वंचित, दलित आदि कौन नहीं रहा ? वो नहीं रहा जिसे वैधानिक और कानूनी रूप से विशेषाधिकार दिया गया हो। विशेषाधिकार किसे दिया गया है ? विशेषाधिकार देने के लिये ही दलित, शोषित, वंचित आदि शब्द गढ़े गए हैं और आरक्षण, SC/ST एक आदि के माध्यम से विशेषाधिकार प्रदान किया गया है और इसका उपयोग कम दुरुपयोग अधिक हो रहा है अर्थात जिसे विशेषाधिकार नहीं दिया गया है उसका उत्पीड़न करने के लिये इसका प्रयोग होता है।

कुल मिलाकर राजनीति में अछूत शब्द को सामान्य वर्ग की निंदा करने के लिये प्रयोग भी किया जाता है और सामान्य वर्ग या सवर्ण को राजनीतिक रूप से अछूत बना दिया गया है। जहां देखें सवर्णों कीरोटी-बेटी छीनी भी जा रही है, उत्पीड़न भी किया जा रहा है और न्याय का रास्ता भी बंद कर दिया गया है अपितु उलटा अपराधी बना दिया जाता है। एक प्रकार से सवर्ण होने का तात्पर्य जन्मजात अपराधी होना स्थापित कर दिया गया है।
प्रतिशोध का भाव
“मृत्युदण्ड से बड़ा दंड है—एक समृद्ध वर्ग को बंधुआ मजदूर बना देना।”
जब तक यह कुछ लोगों तक सीमित था और अल्पमात्रा में देखने को मिलता था तब तक तो सह्य था किन्तु अब इसका दुरूपयोग सीमा से अधिक किया जाने लगा है, व्यापक रूप से प्रयोग होने लगा है एवं सवर्णों के मन में प्रतिशोध का भाव उत्पन्न होता जा रहा है। असवर्णों के मन में तो प्रतिशोध का भाव भरा ही गया है तभी तो धार्मिक ग्रंथ, देवता, ब्राह्मण आदि के विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग हो रहा है एवं सवर्णों के मन में भी प्रतिशोध उत्पन्न होता जा रहा है एवं इसकी परिणति गृहयुद्ध के रूप में होगा ही होगा।
राजनीतिक दलों की भूमिका
किन्तु जो कुछ भी हो रहा है वह एकमात्र भाजपा या मोदी के सिर पर नहीं मढ़ा जा सकता। ये सब कुछ दशकों से हो रहा है और सभी दलों की समान भूमिका ही रही है। सत्ता प्राप्ति के लिये सभी दलों ने मिलकर समाज का विभाजन किया है, हां थोपने के लिये अंग्रेजों के सिर पर थोपते रहें, एकजुट करने की बात करते रहें किन्तु किया वही है जिसका विरोध करते हैं।
सभी दलों ने मिलकर समाज के विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर दिया है और जो कमजोर पक्ष लगता है उसे उकसावा भी दे रहे हैं कि लड़ो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। अर्थात वो वर्ग जो अपनी दुर्बलता के कारण संघर्ष नहीं करना चाहता उसे योजनाबद्ध तरीकों से संघर्ष के लिये प्रेरित किया गया है एवं देश को गृहयुद्ध में ढकेला गया है।
परिणाम
परिणामस्वरूप गृहयुद्ध का वर्त्तमान लोकतांत्रिक स्वरूप का हल यदि लोकतांत्रिक रूप से ही समय रहते नहीं किया गया तो यह हिंसक रूप भी धारण करेगा एवं कहीं से भी यह संभावना बनती नहीं दिख रही है कि कोई भी इसको रोकना चाहता है। राजनीतिक दल सत्तालोलुपता के कारण समाधान चाहते ही नहीं हैं।
हां न्यायपालिका में कुछ हलचल देखने को मिल रही है किन्तु यही न्यायपालिका तो कुछ महीने पूर्व तक उसी राग को अलाप रही थी। अचानक से नींद टूट गयी तो क्या हुआ राजनीतिक दल यदि गृहयुद्ध ही चाहते हैं तो गृहयुद्ध (हिंसक) कराकर ही रहेंगे।
गृहयुद्ध के पश्चात् लोकतंत्र को बचाने के लिये विश्व खड़ा होगा और जैसे अन्य पड़ोसी देशों में देखने को मिला है वैसा ही कुछ भारत में भी किया जायेगा अर्थात पुनः चुनाव और लोकतंत्र की स्थापना किन्तु भारतीय जनमानस इस लोकतंत्र को स्वीकार नहीं करेगी क्योंकि ऊबती जा रही है दुष्परिणामों को समझ रही है, इसके विरुद्ध पुनः संघर्ष होगा और यदि दूसरी बार में लोकतंत्र का समापन नहीं हुआ तो तीसरे संघर्ष में निश्चित होगा। इन तीन संघर्षों में २५ वर्ष से लेकर १०० वर्षों तक का काल लग सकता है।
पड़ोसी देशों के सत्तापरिवर्तनों से यही सिद्ध होता है कि लोकतंत्र के नाम पर दुनियां में डीपस्टेट अपना षड्यंत्र चला रही है, यह एक छलावा है। जो सरकार इसके अनुकूल न करे उसे गिरा देती है, अपना एजेंट बैठा देती है और फिर चुनाव व लोकतंत्र के नाम पर अपने लोगों के माध्यम से उपनिवेश स्थापित करती है। वर्त्तमान शताब्दी में उपनिवेशवाद का ही परिष्कृत रूप है लोकतंत्र। लोकतंत्र शब्द का प्रभाव और मताधिकार से जनता को लगता है कि उसके प्रतिनिधि देश चलाते हैं किन्तु उसके प्रतिनिधि उसके अनुसार नहीं अपितु डीप स्टेट के अनुसार देश चलाने के लिये बाध्य होते हैं और इसका उद्भेदन एप्सटीन फाइल ने किया।

वर्त्तमान भारत में जिसे हम ‘प्रगति’ या ‘विकास’ कह रहे हैं, उसके भीतर प्रतिशोध की ज्वाला सुलग रही है। गृहयुद्ध केवल शस्त्रों से नहीं लड़ा जाता; जब कानून स्वयं भेदभाव का अस्त्र बन जाए, जब सवर्णों के विरुद्ध सार्वजनिक जनसंहार की भाषा सामान्य हो जाए और जब न्यायपालिका ‘मौन समर्थन’ देने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि ‘लोकतांत्रिक गृहयुद्ध’ (Democratic Civil War) आरम्भ हो चुका है।
निष्कर्ष
“लोकतंत्र वर्त्तमान शताब्दी में उपनिवेशवाद का ही परिष्कृत रूप है।”
निष्कर्षतः, भारत वर्त्तमान में एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से पीछे मुड़ने का मार्ग लगभग बंद हो चुका है। जिस मोदी शासन को ‘राष्ट्रवाद’ का पर्याय बताया गया, वह भविष्य के इतिहास में अपनी विफलताओं और ‘अति’ के कारण एक काला अध्याय सिद्ध हो सकता है। सवर्णों का संवैधानिक उत्पीड़न अब उस ‘अति’ की सीमा पर है जहाँ से प्रतिशोध का भाव उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
आगामी स्वाधीनता शताब्दी तक भारत न केवल हिंसक गृहयुद्धों का साक्षी बनेगा, बल्कि लोकतंत्र के इस परिष्कृत ‘उपनिवेशवाद’ को उखाड़ फेंकने के लिए भी संघर्ष करेगा। यह संघर्ष २५ से १०० वर्षों तक चल सकता है, जिसके अंत में पुनः राजतंत्र या किसी सुदृढ़ शास्त्रीय व्यवस्था का बीजारोपण होगा। वर्त्तमान का ‘अदृश्य गृहयुद्ध’ भविष्य के ‘प्रत्यक्ष महासंग्राम’ की केवल एक प्रस्तावना मात्र है।
F&Q :
FAQ
प्रश्न: क्या भारत में वास्तव में गृहयुद्ध आरम्भ हो गया है?
उत्तर: हाँ, वैचारिक और विधिक स्तर पर ‘लोकतांत्रिक गृहयुद्ध’ आरम्भ हो चुका है।
प्रश्न: क्या हिंसक संघर्ष निश्चित है?
उत्तर: जब समाज के सभी पक्ष प्रतिशोध से भरे हों और समाधान के बजाय संघर्ष चाहते हों, तो हिंसा अवश्यम्भावी है।
प्रश्न: सवर्णों की रोटी-बेटी पर संकट कैसे है?
उत्तर: आरक्षण के कारण आजीविका का संकट और अंतर्जातीय प्रोत्साहन राशि के माध्यम से कुल-मर्यादा पर प्रहार।
प्रश्न: सवर्णों के प्रति अभद्र भाषा पर कानून चुप क्यों है?
उत्तर: क्योंकि वर्त्तमान शासन तंत्र ऐसे अराजक तत्वों को वोटबैंक के कारण संरक्षण प्रदान करता है।
प्रश्न: क्या भविष्य में लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा?
उत्तर: संकेत है कि २-३ बड़े संघर्षों के बाद भारतीय जनमानस लोकतंत्र के इस छलावे को त्याग देगा।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: यह आलेख पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत राजनैतिक विश्लेषण, सामाजिक अवलोकन और भविष्यभावी आकलनों पर आधारित है। इसमें प्रयुक्त शब्द ‘गृहयुद्ध’, ‘दस्यु’ और ‘आसुरी प्रतीक’ वैचारिक विमर्श के उद्देश्य से प्रयोग किए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना या हिंसा भड़काना नहीं, बल्कि वर्त्तमान परिस्थितियों के प्रति समाज को सचेत करना है। पाठक इसे एक स्वतंत्र राजनीतिक-शास्त्रीय विमर्श के रूप में ग्रहण करें।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








