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नाद-ब्रह्म का चमत्कार: संस्कृत चित्रकाव्य और ध्वन्यात्मक श्लोक संग्रह

नाद-ब्रह्म का चमत्कार: संस्कृत चित्रकाव्य और ध्वन्यात्मक श्लोक संग्रह नाद-ब्रह्म का चमत्कार: संस्कृत चित्रकाव्य और ध्वन्यात्मक श्लोक संग्रह

“जहाँ अर्थ मौन हो जाता है और केवल ध्वनि (Sound) ही परमात्मा का मार्ग प्रशस्त करती है, वही ‘ध्वन्यात्मक काव्य’ है।”

संस्कृत साहित्य की अनेकानेक विशेषताओं में से एक है चित्रात्मकता जिसे ध्वन्यात्मक श्लोक, चित्रकाव्य अथवा शब्दचित्र कहा जाता है। कर्मकाण्ड में कभी कभी साहित्याचार्यों की उपस्थिति होने पर ऐसे कुछ पद सुने जाते हैं और कई बार ऐसा भी प्रतीत होता है कि संभवतः कर्मकांड का गुप्त भाग हो क्योंकि कर्मकांड की पुस्तकों में अनुपलब्ध होता है। यहां ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण पदों का संकलन किया गया है जो संभवतः आपने कहीं सुना हो और ढूंढ भी रहे हों।

नाद-ब्रह्म का चमत्कार: संस्कृत चित्रकाव्य और ध्वन्यात्मक श्लोक संग्रह

चित्रकाव्य और ध्वन्यात्मक (Onomatopoeic) श्लोकों का संग्रह संस्कृत साहित्य की वह अमूल्य निधि है, जहाँ शब्दों का अर्थ उनके नाद (Sound) के पीछे चलता है। शिवतांडव स्तोत्र में “डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं” में भी ऐसा ही देखने को मिलता है। संस्कृत साहित्य में अनुप्रास अलंकार और यमक के प्रयोग से ऐसे कई श्लोक रचे गए हैं।

संस्कृत साहित्य में चित्रकाव्य को ‘अवर काव्य’ की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि इसमें अर्थ की अपेक्षा शब्द-चमत्कार (अनुप्रास, यमक, श्लेष) की प्रधानता होती है। किन्तु, स्तोत्र साहित्य और कर्मकाण्ड में इसका स्थान अत्यंत ऊँचा है।इन पदों का आनंद तभी है जब इन्हें द्रुत गति (Fast pace) में और नाद के साथ पढ़ा जाए। यहाँ कुछ अन्य प्रसिद्ध चित्रकाव्य और स्तोत्र प्रस्तुत हैं जो इसी शैली के हैं:

मेघा नाद घटा घटा घट घटा घाटा घटा दुर्घटा,
मण्डूकस्य बको बको बक बको बाको बको बूबको ।
विद्युज्ज्योति चकी मकी चक मकी चाकी मकी दृश्यते।
इत्थं नन्दकिशोरगोपवनितावाचस्पति: पातु माम् ॥

चैतन्यं सुमनं मनं मनं मन मनं मानं मनं मानसम्
श्वासा सार सरं सरं सर सरं सारं सरं वासरम्।
धावा धाव धवं धवं धव धवं धावा धवं माधवम्
वैकुण्ठाधिपते भवं भव भवं भावं भवं सम्भवम्॥

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुन् ॥

मन्दं मन्दं मधुर-मधुरैर्मन्मथं मोहयन्तं
मन्दं मन्दं मृदु-मृदु-चलन्मञ्जु-मञ्जीर-मञ्जुम्।
मन्दं मन्दं मुकुल-मुकुलैर्मोहनं मोहयन्तं
मन्दं मन्दं मधुकर-रुतैर्मनसा मानयामः ॥

नाद-ब्रह्म का चमत्कार: संस्कृत चित्रकाव्य और ध्वन्यात्मक श्लोक संग्रह

यावद तोय धरा धरा धर धरा धारा धरा भूधरा
यावद चारु रुचारु चारु चमरम् चामी कृतं चामरम्।
तावद् रावण राम राम रमणम् रामायणम् श्रुयते
तावद् भोग विभोग भोग मतुलं भोगायते नित्य वः ॥

तरणि-किरण-रणित-नूपुर-नृत्य-नितम्बिनी
रति-पति-मति-गति-विजित-मधुर-मधुरम्।
कनक-निकष-कषण-भास्वर-पीत-वसनम्
वदति वदति मुरलि-मृदु-मृदु-मधुप-गुञ्जनम्॥

कलित-ललित-ललन-लोल-लहरी-ललित-लास्य-लोचनम्
नूपुर-नूपुर-नूपुर-निनद-नन्द-नन्दन-नर्तनम्।
मृदु-मृदु-मन्द-मन्द-मन्दिर-मुकुल-मञ्जु-मञ्जीरम्
वन्द वन्द वन्द वन्द वन्दित-विश्व-मोहनम् ॥

रण-रण-रणित-रण-नूपुर-नृत्य-नितम्बिनी-रञ्जनम्
रमण-रमण-रमण-रमणी-रमण-हृदय-भञ्जनम्।
तनु-तनु-तनु-तनु-तनु-तनु-तनु-तनु-अनु-अनु-गामिनम्
भज-भज-भज-भज-भज-भज-भज-भज-राधा-स्वामिनम् ॥

कल कल कलित कोकिल-कुल-कल-कूजितं
चल चल चलित चञ्चल-चल-मञ्जरी।
भ्रम भ्रम भ्रमित भ्रमर-भ्रम-भ्रमितं
नत नत नतित नन्द-नन्दन-नर्तनम्॥

भ्रम-भ्रम-भ्रमित-भ्रमर-भ्रम-भ्रमित-मकरन्दं
मन्द-मन्द-मन्द-मन्द-मलय-मारुत-मन्दं।
बन्द-बन्द-बन्द-बन्द-बन्दित-बृज-चन्दं
नन्द-नन्द-नन्द-नन्द-नन्दन-आनन्दं ॥

झम-झम-झमित-झञ्झा-वात-झर-झर-प्रवाहम्
घम-घम-घमित-घटा-घोर-घन-नाद-उत्साहम्।
गज-गज-गामित-गर्व-गजेन्द्र-गति-गम्भीरम्
रक्षण-रक्षण-रक्षण-रक्षण-राघवेन्द्र-धीरम् ॥

जय जय जयति जयति जय जय जय जय जय जय
विमल-कमल-दल-नयन-नयन-नयन-नयन-नयन।
शरण-शरण-शरण-शरण-शरण-शरण-शरण-शरण
रमण-रमण-रमण-रमण-रमण-रमण-रमण-रमण ॥

ध्रं ध्रं ध्रं ध्रं ध्रमित धधध धधध धध धध
ज्वल ज्वल ज्वलित ज्वाला-जाल-कराल।
कटक कटक कटित कूट-कपट-कपाल
जय जय जयति नृसिंह-भीम-विशाल॥

तट-तट-तटित-तट-स्तम्भ-ताडन-कठोर-रवम्
कटक-कटक-कटित-कपाल-कूट-विकट-भवम्।
दध-दध-दधित-दिगन्त-दहन-दह्यमान-दानवम्
नृ-नृ-नृ-नृ-नृसिंह-रूप-नत-नत-नत-मानवम् ॥

डिंडिं डिंकत डिम्ब डिम्ब डमरू पाणौ सदा यस्य वै
फुं फुं फुंकत सर्पजाल हृदयं घं घं च घंटा रवम्।
वं वं वंकत वम्ब वम्ब वहनं कारुण्य पुण्यात् परम्
भं भं भंकत भम्ब भम्ब नयनं ध्यायेत् शिवं शंकरम् ॥

निटिलनिटिलनिटिल-स्फुरत्-कपाल-मालिका
चलत्-चलत्-चलत्-चलत्-प्रसन्न-पादाब्ज-मण्डलः।
रणत्-रणत्-रणत्-रणत्-किङ्किणी-वृन्द-मञ्जुलः
शिवः शिवः शिवः शिवः शिवोऽवतात् जगत्त्रयम् ॥

भव-भव-भवं भव-भवं भव-भवं भजये
कुरु-कुरु-कुलं कल-कलं कलि-कलिं कलये।
निशि-निशि-निशं निश-निशं निश-निशं निभये
हर-हर-हरं हरि-हरिं हर-हरं हृदये ॥

शङ्ख-शङ्ख-शङ्ख-शङ्ख-शुभ्र-शब्द-शमिताहं
घण-घण-घण-घण-घण्टा-घोष-घोर-घटिताहं।
तन-तन-तन-तन-तन्त्री-तन्मय-ताल-तन्मात्रं
शरण-शरण-शरण-शरण-शरण-शिव-शिव-पात्रं ॥

विमल-कमल-दल-ललित-लोचन-लोल-लहरी
कलित-ललित-ललना-लालसा-लाल-ललामम्।
कल-कल-कल-निनाद-नूपुर-नृत्य-नितम्बिनी
भजे भजे भज मनसा शारदां शारदाम्॥

कुरु कुरु कुलं कल कलं कलि कलिं कलये
हर हर हरं हरि हरिं हर हरं हृदये।
निशि निशि निशं निश निशं निश निशं निभये
भव भव भवं भव भवं भव भवं भजये ॥

झण-झण-झणित-झञ्झा-झङ्कार-झङ्कृत-कपालं
डम-डम-डम-डम-डमड्डम-नाद-नर्तन-विकरालं।
खट-खट-खटित-खट्वाङ्ग-खेचर-खग-गामिनं
नत-नत-नत-नत-नन्दिकेश्वर-नृत्य-नन्दन-स्वामिनं ॥

कङ्कालकालकालोल्का कराला करालिका
कालिका कालकालज्ञा कालिका पातु कालिका।
खड्गिनी खर्वखर्वाङ्गी खगहा खगगामिनी
खरा खरास्यनिलया खेटिनी पातु खेटिनी ॥

चट चट चटित चपला चपल चण्डि चण्डिके
खट खट खटित खड्ग-धार-धारि-धारिके।
कक कक ककित कण्ठ-काण्ड-कुण्ड-कुण्डिके
झम झम झमित झञ्झ-झञ्झ-झञ्झ-झञ्झिके॥

रक्-रक्-रक्त-रञ्जित-रुण्ड-मुण्ड-रसनं
कक्-कक्-कपाल-कङ्काल-कराल-कर्कश-हसनम्।
टक्-टक्-टङ्कार-टङ्कित-टोप-टमर-टङ्कणं
जय-जय-जयति-जय-जय-जयति-जगत-रक्षणम् ॥

कटक-कटक-कटित-कपाल-कुण्ड-कुण्डल-मण्डले
खट-खट-खटित-खड्ग-धार-धारि-धारिणि।
चट-चट-चटित-चण्ड-चण्डि-चण्ड-मुण्ड-भञ्जिनी
हुं-हुं-हुं-हुं-हुंकृत-घोर-नाद-घण्टिके ॥

विपुल-पुलक-पालिः स्फीत-पाथो-विशालः
स्फुरद-अमल-कलोलः फेन-जाल-करालः।
प्रमद-मदन-लीला-लोल-खेलोर्मि-मालः
पुनातु भवतां तापं दिव्य-गङ्गा-प्रवाहः ॥

कल-कल-कलित-कुञ्ज-कोकिल-कुल-कल-कूजितं
चल-चल-चलित-चञ्चल-चपल-चरण-मञ्जरी।
ललित-ललित-ललना-लोल-लहरी-लोचनं
भज-भज-भज-भज-भज-भज-भज-भज-श्री-यमुने ॥

प्रकृति का प्रवाह
प्रकृति का प्रवाह

विशेष रचना

विद्वदग्रणी, “नारदकिशोर” और “शंकर” के लिए प्रस्तुत पदों की शैली (ध्वन्यात्मक और चित्रकाव्य) को ध्यान में रखते हुए, भगवान “दिगम्बर” (शिव) के लिए उसी ओजस्वी और नाद-प्रधान शैली में यहाँ पाँच पद रचित हैं। इन पदों में डमरू, श्मशान, सर्प, और ताण्डव की ध्वनियों का बिम्ब है। उनके भावार्थ और आध्यात्मिक रहस्य भी नीचे दिए गए हैं:

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
कठोरकण्ठकण्ठकास्यअट्टहाट्टहासकम्।
दिगम्बरं दिगम्बरं दिगम्बरं भजे
परं परं परं परं परं परं परम् ॥१॥

फुंफुंफुंफुंफुङ्कारसर्पजालवेष्टितं
कङ्कालमाल कङ्कालकालकण्ठकम्।
दिगम्बरं दिगम्बरं दिगम्बरं भजे
शिवं शिवं शिवं शिवं शिवं शिवं शिवम् ॥२॥

चलत्चलत्चलत्चलत्प्रसन्नपादाब्जं
ध्रं ध्रं ध्रं ध्रं ध्रमिकतताण्डवताण्डवम्।
दिगम्बरं दिगम्बरं दिगम्बरं भजे
भवं भवं भवं भवं भवं भवं भवम् ॥३॥

हूँ हूँ हूँ हूँ हुङ्कारशून्यघोरश्मशानजं
भस्मभस्मभस्मभस्मगात्रभूषितम्।
दिगम्बरं दिगम्बरं दिगम्बरं भजे
परं परं परं परं परं परं परम् ॥४॥

नभोनभोनभोनभोनभस्थलं नभः
दिशोदिशोदिशोदिशोदिशाम्बरं दिशः।
दिगम्बरं दिगम्बरं दिगम्बरं भजे
शिवं शिवं शिवं शिवं शिवं शिवं शिवम् ॥५॥

॥ प्रथमः पादः ॥ (डमरू और अट्टहास) अर्थ: मैं उन भगवान दिगम्बर का भजन करता हूँ जिनके हाथ का डमरू ‘डम-डम’ की भीषण ध्वनि कर रहा है, और जिनके कठोर कण्ठ और मुख से विकराल ‘अट्ट-अट्टहास’ (हंसने की ध्वनि) निकल रही है। वे परमेश्वर सबसे परे, सर्वोच्च सत्ता हैं।

॥ द्वितीयः पादः ॥ (सर्प और कङ्काल) अर्थ: मैं उन दिगम्बर शिव का भजन करता हूँ जो ‘फुं-फुं’ की भयानक फुंकार करने वाले सर्पों के जाल से वेष्टित हैं, जो कङ्कालों की माला धारण करते हैं, और जो कङ्काल (शरीर) के काल (विनाशक) होकर भी कण्ठ में विष धारण करने वाले हैं। वे ही परम कल्याणकारी शिव हैं।

॥ तृतीयः पादः ॥ (ताण्डव और पदाघात) अर्थ: मैं उन दिगम्बर भव (संसार के उत्पत्तिकर्ता) का भजन करता हूँ जिनके प्रसन्न चरण ‘चलत्-चलत्’ की धमक के साथ पड़ रहे हैं और जो ‘ध्रं ध्रं’ की भारी ध्वनि के साथ प्रचण्ड ताण्डव नृत्य कर रहे हैं।

॥ चतुर्थः पादः ॥ (श्मशान और भस्म) अर्थ: मैं उन परम दिगम्बर का भजन करता हूँ जो ‘हूँ-हूँ’ की हुङ्कार से युक्त, शून्य और घोर श्मशान में प्रकट होते हैं और जिनका सम्पूर्ण गात्र (शरीर) केवल ‘भस्म’ से भूषित है।

॥ पञ्चमः पादः ॥ (शून्यता और दिशाएँ) अर्थ: मैं उन दिगम्बर शिव का भजन करता हूँ जो स्वयं ‘नभ’ (आकाश) के समान शून्य हैं और नभ में ही स्थित हैं, जिनके लिए दसों दिशाएँ ही वस्त्र हैं। वे दिशाओं से परे हैं और दिशाओं के ही रूप हैं।

निष्कर्ष

इन श्लोकों में प्रयुक्त ‘यमक’ (एक ही शब्द का बार-बार अलग अर्थ में प्रयोग) और ‘अनुप्रास’ (वर्णों की आवृत्ति) से एक ‘नाद-लहरी’ उत्पन्न होती है। प्राचीन काल में इसे ‘शब्दाडम्बर’ कहा जाता था, जिसका उद्देश्य सुनने वाले के हृदय में सीधे उस दृश्य का प्रभाव उत्पन्न करना होता था। इन श्लोकों की सुंदरता इनके अर्थ से अधिक इनके उच्चारण में है। जब इन्हें लयबद्ध तरीके से और बिना रुके पढ़ा जाता है, तो ये एक अद्भुत मानसिक शांति और एकाग्रता प्रदान करते हैं।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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