आयु-आरोग्यादि की कामना से महामृत्युंजय की आराधना की जाती है। महामृत्युंजय जप एक ऐसा अनुष्ठान है जो सर्वाधिक किया जाता है। इस आलेख में महामृत्युंजय, महामृत्युंजय मंत्र और महामृत्युंजय जप के अनुष्ठान करने की सम्पूर्ण विधि बताते हुए अन्य महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है । महामृत्युंजय जप का अनुष्ठान दो प्रकार से किया जाता है घर में और शिवालय आदि पर इस आलेख में दोनों विधि बताई गई है। महामृत्युंजय जप विधि pdf सहित.
महामृत्युंजय जप करने की सम्पूर्ण विधि और जानकारी – mahamrityunjay jaap
महामृत्युंजय जप काम्य प्रयोग की श्रेणी में आता है। अपमृत्यु भय निवारण, अशुभग्रहों के अरिष्ट निवारण, रोग मुक्ति, भय मुक्ति आदि कामनाओं से महामृत्युञ्जन पुरश्चरण किया जाता है। महामृत्युंजय जप का महत्व मृकण्डु ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय जी से जुड़ा हुआ है। अल्पायु मार्कण्डेय महामृत्युंजय कृपा प्राप्ति से चिरंजीवी हो गये।
यहां महामृत्युंजय जप के सम्बन्ध में सामान्य विधियों के साथ-साथ कुछ विशेष महत्वपूर्ण बातें भी बताई गयी है जो अन्यत्र नहीं बताई जाती। इस कारण महामृत्युंजय जाप के बारे में जनोपयोगी और जापकोपयोगी सिद्ध हो ऐसा प्रयास किया गया है।
महामृत्युंजय का अर्थ
महामृत्युंजय मंत्र और महमृत्युंजय जप को समझने से पूर्व महामृत्युंजय का अर्थ समझना आवश्यक है। मृत्युंजय का अर्थ यह नहीं अमर नहीं होता। अमर तो देवता भी कहे जाते हैं किन्तु उन्हें मृत्युंजय नहीं कहा जाता, कई मनुष्य भी देवता के समान ही अमर हैं और 8 नाम तो प्रातः स्मरणीय हैं – अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय। किन्तु इन्हें चिरजीवी या चिरंजीवी कहा जाता है अमर नहीं।
अर्थात पृथ्वीवासी अमर नहीं हो सकते, प्रलयपर्यंत तक का जीवन प्राप्त कर सकते हैं और चिरंजीवी हो सकते हैं। देवता भी अमर तो होते हैं किन्तु मृत्यु पर विजय प्राप्ति नहीं कर सकते और उनकी अमरता का तात्पर्य महाप्रलय काल आने तक का जीवन होता है, अथवा पुण्यक्षय होने तक का काल। महाप्रलय होने पर अथवा पुण्यक्षीण होने पर देवता भी च्युत होते हैं।
देवताओं को अमरत्व अमृतपान के कारण प्राप्त होता है। पुण्यात्मा जीव भी पुण्यवश देवयोनी प्राप्त करके अमृतपान का अधिकारी हो सकता है तथापि वह मृत्युंजय नहीं कहला सकता क्योंकि मृत्यु पर विजय प्राप्ति का भाव अलग है। प्राचीन काल में देव-दानव युद्ध होता था और देवता भी मृत्यु को प्राप्त होते थे। ये बात अलग है कि उन्हें पुनर्जीवन प्रदान किया जाता था।
समुद्रमंथन से जब हलाहल विष निकला था तो सभी देवता दाह से पीड़ित हो रहे थे, भगवान विष्णु का शरीर भी उस हलाहल विष के प्रभाव से श्याम हो गया। भगवान शिव ने उस हलाहल विष का पान करके कंठ में धारण कर लिया। हलाहल विष का प्रभाव भगवान शिव ने भी अंगीकार किया किन्तु मृत्युंजय होने के कारण मृत्यु की प्राप्ति नहीं हो सकी, अथवा हलाहल विषपान करने के बाद भी मृत्यु नहीं हुयी अर्थात मृत्यु पर विजयी सिद्ध हुये अर्थात मृत्युंजय सिद्ध हुये।
महामृत्यु
देवी अथर्वशीर्ष में भी दो बार महामृत्यु शब्द आया है और माहात्म्य वर्णन करते हुए मनुष्य के लिये भी महामृत्यु के निवारण की सिद्धि कही गयी है। मृत्यु का एक बार टलना पुनर्जीवन संज्ञक होता है अमरत्व नहीं, यदि पुण्य प्रभाव से अमरत्व (देवयोनि) प्राप्त भी हो जाये तो भी महामृत्यु का निवारण नहीं होता अर्थात अमरत्व महाप्रलय कालपर्यन्त सीमित ही सिद्ध होता है।
महामृत्यु के दो आशय हो सकते हैं महाप्रलय काल में सम्पूर्ण सृष्टि का नाश होना अथवा मृत्युचक्र की निरंतर पुनरावृत्ति। जीव के लिये महामृत्यु से तरने का तात्पर्य मृत्युचक्र से मुक्त होना ही है अर्थात मोक्ष प्राप्त करना है।
महामृत्युंजय
महामृत्यु अर्थात महाप्रलय जिसका स्पर्श न कर सके अथवा जो महामृत्यु (महाप्रलय) पर भी विजय प्राप्त करता हो वो महामृत्युंजय हैं। अथवा जिसका आश्रय ग्रहण करने से महामृत्यु भी प्रभावित न कर सके वही महामृत्युंजय हैं।
महामृत्युंजय मंत्र
भगवान महामृत्युंजय की कृपा प्राप्त कराने वाला मंत्र महामृत्युंजय मन्त्र कहलाता है। महामृत्युंजय मंत्र के अनेक प्रकार हैं और सभी प्रयोग किये जाते हैं किन्तु सबसे अधिक जप किया जाने वाला महामृत्युंजय मंत्र अर्द्धशताक्षरी महामृत्युंजय मंत्र है।
अर्द्धशताक्षरी महामृत्युंजय मंत्र : ॐ हौं ॐ जूंसः भूर्भुवः स्वः त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् भूर्भुवः स्वरों जूं सः हौं ॐ ॥ अर्द्धशताक्षरी महामृत्युंजय मंत्र में चार बार प्रणव प्रयुक्त होता है।
मूल मंत्र : “त्र्यंबकं यजामहे सुगंन्धिम्पुष्टिवर्द्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्” – यह मंत्र चारों वेदों में प्राप्त होता है और जप हेतु इसी मंत्र को विभिन्न प्रकार से प्रणव, महाव्याहृति व बीजों द्वारा सम्पुटित किया जाता है।
52 अक्षर का महामृत्युंजय मंत्र
जब प्रणव की षडावृत्ति की जाती है तो 52 अक्षर हो जाता है अर्थात 52 वर्ण या अक्षर के महामृत्युंजय मंत्र में 6 बार प्रणव का प्रयोग होता है। आलेख के अंत में 52 वर्णों को अलग-अलग करके दिया गया है जिससे समझने में आसानी होती है। ॐ हौं जूंसः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॐ भूर्भुवः स्वरों जूं सः हौं ॐ ॥
52 अक्षर का महामृत्युंजय मंत्र (दूसरा प्रकार) : 52 अक्षर के महामृत्युंजय मंत्र का एक और प्रकार भी है जो मंत्र आगे दिया गया है : ॐ हौं जूंसः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ ॥
62 अक्षर का महामृत्युंजय मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र का एक और 62 अक्षरों वाला प्रकार है जिसमें 14 प्रणव का प्रयोग किया जाता है और अंत में स्वाहा का भी उच्चारण किया जाता है : ॐ हौं ॐ जूं ॐ सः ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॐ स्वः ॐ भुवः ॐ भूः ॐ सः ॐ जूं ॐ हौं ॐ स्वाहा ॥
लघु महामृत्युंजय मंत्र : ॐ जूं सः ॥
पुराणोक्तमृत्युञ्जय मन्त्र – ॐ मृत्युञ्जयाय रुद्राय नीलकण्ठाय शम्भवे । अमृतेशाय शर्वाय महादेवाय ते नमः ॐ ॥