जब कभी भी किसी यज्ञ, प्राण प्रतिष्ठा के लिये बड़ा मण्डप बनाया जाता है तो मण्डप निर्माण के लिये भी शास्त्रों में एक विशेष विधि बताई गई है जिसके अनुसार मण्डप निर्माण किया जाना चाहिये। पुनः मण्डप पूजन के लिये भी कर्मकाण्ड के शास्त्रों में एक विशेष विधि बताई गई है। मंडप निर्माण विधि की चर्चा पहले ही अन्य आलेख में की जा चुकी है : मंडप स्थापना विधि, इस आलेख में यज्ञ मंडप पूजा विधि बताई गयी है। यज्ञों में मंडप की विशेष पूजा की जाती है।
मंडप के बारे में संक्षिप्त जानकारी
- उपनयन, विवाह, व्रत उद्यापन आदि के लिये छोटा मण्डप भी बनाया जा सकता है, जिसकी निर्माण विधि व पूजा विधि भी संक्षिप्त ही होती है।
- यज्ञ, प्राण प्रतिष्ठा आदि में बड़ा मण्डप बनाया जाता है।
- मण्डप में न्यूनतम 16 स्तम्भ (खम्भा) होने चाहिये। 4 मध्यवर्ती, 4 बाहरी कोने में और 8 स्तम्भ 4 द्वार में होते हैं।
- कथा आदि कार्यक्रमों के लिये पंडाल बनाया जाता है, यज्ञादि के लिये मण्डप अनिवार्य अंग है । पंडाल में यज्ञादि संबंधी पूजन-हवन अनुचित है।
- यज्ञ मण्डप में तोरण द्वार भी बनाना चाहिये।
- यज्ञ मण्डप के शिखर में पताका और अन्य १० दिशाओं में दशदिक्पाल व स्तम्भ सम्बंधी ध्वज-पताका लगाना चाहिये।
- यज्ञ मण्डप को सजाने के लिये अपद्रव्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिये जैसे – थर्मोकॉल, बैलून आदि। मण्डप को वस्त्रादि से सजाना चाहिये।
- सर्वतोभद्र मंडल या अन्य प्रधान वेदी मुख्यतः पूर्व दिशा में ही बनाया जाता है। पूर्व द्वार व वेदी के मध्य न्यूनतम १ हाथ खाली रखना चाहिये।
जहां कहीं भी बड़ा मण्डप बनाया गया हो वह यज्ञ हो या प्राण प्रतिष्ठा मण्डप पूजन विधि एक समान ही रहेगी।
- दर्भमालिकया धूप–घटैरन्यैश्च मंगलैः। मंडपं भूषयेत् सर्वं बुधः चित्तप्रसत्तये॥
- एवं विधीयते यच्च मंडपस्य प्रसाधनम् । तदेव हि बुधाः प्राहुर्यज्ञशालाप्रवेशनम् ॥
यज्ञ मण्डप पूजन विधि
वास्तु पूजन करने के बाद पवमान सूक्त पाठ करते हुये चारों ओर जल और दूध की धारा दे । गृहप्रवेश प्रकरण में दुग्धमिश्रित जलधारा की विधि बताई गई है किन्तु यज्ञ पद्धतिकारों ने यज्ञमण्डप में दोनों अलग-अलग देने का निर्देश दिया है। ताम्र पात्र से जल धारा और पीतल पात्र से दुग्धधारा । आरम्भ अग्निकोण से ही करे ।
जल व दुग्धधारा देने के बाद रक्षोघ्न सूक्त पाठ करते हुये वस्त्र या त्रिसूत्री से मण्डप का वेष्टन करे। अग्निकोण से आरम्भ करे ।

कई यज्ञ पद्धतियों में पहले धारा फिर वेष्टन क्रम बताया गया है। लेकिन गृहप्रवेश में विपरीत क्रम प्राप्त होता है अर्थात पहले वेष्टन फिर धारा ।
फिर त्रिकुशा, तिल, जलादि संकल्प द्रव्य लेकर संकल्प करे :
संकल्प मंत्र – ॐ अद्यादि ………….. कर्माङ्गभूतं मण्डप देवानां स्थापनं पूजनं च करिष्ये॥
स्तम्भ पूजन :
स्तम्भ पूजन का आरम्भ मध्यवर्ती चार स्तंभों में ईशानकोण से करके बाह्य स्तम्भों की पूजा भी ईशानकोण से ही आरम्भ करे ।