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राहु शांति विधि

राहु शांति के उपाय | राहु शांति पूजा : Rahu shanti ke upay 10th

राहु शांति के उपाय | राहु शांति पूजा : Rahu shanti ke upay : राहु को क्रूर, पाप ग्रह कहा जाता है और जिससे संपर्क या दृष्टि आदि युति करे उसे भी अशुभ कर देता है। राहु को छायाग्रह भी कहा जाता है क्योंकि इसका कोई पिंड नहीं है यह वास्तव में एक बिंदु है जो सूर्य और चंद्र मार्ग का संक्रमण स्थल है।

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शनि शांति के उपाय | शनि शांति मंत्र : Shani shanti ke upay

शनि शांति के उपाय | शनि शांति मंत्र : Shani shanti ke upay – 9th

शनि शांति के उपाय | शनि शांति मंत्र : Shani shanti ke upay : शनि को क्रूर, पाप ग्रह कहा जाता है और जिससे संपर्क या दृष्टि आदि युति करे उसे भी अशुभ कर देता है। तथापि शनि की जिस भाव में स्थिति होती है उस भाव संबंधी फल के लिये शुभद माना जाता है। शनि की दृष्टि में ही वास्तविक अशुभ फल का प्रभाव बताया गया है।

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शुक्र शांति विधि

शुक्र शांति के उपाय | शुक्र शांति मंत्र : Shukra shanti ke upay 8th

शुक्र शांति के उपाय | शुक्र शांति मंत्र : Shukra shanti ke upay – शुक्र को सौम्य, शुभ ग्रह कहा जाता है और जिससे संपर्क या दृष्टि आदि युति करे उसे भी शुभद कर देता है। तथापि असुर गुरु होने के कारण शुक्र विलासिता के कारक होते है, सर्वाधिक पाप विलासिता हेतु ही किये जाते हैं। इस आलेख में शुक्र शांति विधि दी गयी है। शुक्र शांति विधि का तात्पर्य शास्त्रोक्त विधान से शुक्र के अशुभ फलों की शांति करना है।

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गुरु शांति विधि

गुरु शांति के उपाय | गुरु शांति मंत्र : Guru Shanti Mantra – 7th

गुरु शांति के उपाय (Guru Shanti) : गुरु को सौम्य, शुभ ग्रह कहा जाता और जिससे संपर्क या दृष्टि आदि युति करे उसे भी शुभद कर देता है। गुरु की दृष्टि शुभद है किन्तु उपस्थिति अशुभ है, जिस भाव में गुरु स्थित होता है उस भाव संबंधी फलों का ह्रास करता है। इस आलेख में गुरु शांति विधि दी गयी है।

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बुध शांति विधि, बुध शांति के उपाय

बुध शांति के उपाय | बुध शांति मंत्र – Budh shanti 6th

बुध शांति के उपाय | बुध शांति मंत्र – Budh shanti : नवग्रहों में बुध का चौथा क्रम आता है। जैसे सूर्य, चंद्र और बुध की शांति विधि मिलती है उसी प्रकार बुध के लिये भी शांति विधि प्राप्त होती है। बुध को सौम्य, सम ग्रह कहा जाता और जिससे संपर्क या दृष्टि आदि युति करे उसके अनुसार फलदायी होता है। इस आलेख में मंगल शांति विधि दी गयी है। बुध शांति विधि का तात्पर्य शास्त्रोक्त विधान से बुध के अशुभ फलों की शांति करना है।

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विजयादशमी : दुर्गा विसर्जन, अपराजिता पूजा

विजयादशमी : दुर्गा विसर्जन, अपराजिता पूजा

विजयादशमी : दुर्गा विसर्जन, अपराजिता पूजा : आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाली शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल दशमी को संपन्न होती है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी भी कहा जाता है, दशहरा भी कहा जाता है और यात्रा भी। विजयादशमी के दिन भगवती दुर्गा, कलश आदि का विसर्जन किया जाता है, अपराजिता पूजा की जाती है, जयंती धारण किया जाता है।

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व्रत-पर्व निर्णय से पूर्व पंचांग की शुद्धता को जांचना आवश्यक है

व्रत पर्व विवेक : पंचांग की जानकारी व शुद्धता को जांचना – Part 1

व्रत पर्व विवेक : इस प्रकार दूध का दूध व पानी का पानी होने के पश्चात् भी यदि कोई यह गांठ बांध ले कि हम उसी पंचांग के आधार पर निर्णय करेंगे जिसके साक्षी चन्द्रमा नहीं हैं तो इस दुराग्रह का कोई हल नहीं हो सकता। ये ठीक उसी प्रकार है जैसे को क्रेता बाजार से जान-बूझकर उचित मूल्य पर सड़ी-गली सब्जी, फल इत्यादि क्रय करने का हठी/बुद्धू हो।

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रामार्चा कथा

रामार्चा कथा : 6 Chapter

रामार्चा कथा : श्री शिव संहिता के भव्योत्तर खण्ड में रामार्चा पूजाविधि, माहात्म्य मिलता है। यह कथा भगवान शंकर और पार्वती के संवाद रूप में दिया गया है। प्रथम दो अध्याय में रामार्चा पूजा की विधि एवं मंत्रों को बताया गया है तथा अध्याय ३ से अध्याय ६ तक ४ अध्यायों में रामार्चा माहात्म्य अर्थात रामार्चा कथा है। यहां संपूर्ण कथा संस्कृत में प्रस्तुत प्रस्तुत किया गया है।

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श्री सत्यनारायण कथा – सुंदर कविता हिंदी में

श्री सत्यनारायण कथा – सुंदर कविता हिंदी में

श्री सत्यनारायण कथा – सुंदर कविता हिंदी में : सत्यनारायण पूजा के बाद कथा श्रवण और नृत्य-गीत पूर्वक रात्रि जागरण करने का भी विधान बताया गया है, इस कारण सत्यनारायण पूजा में लोग भजन-कीर्तन का भी अनिवार्य रूप से आयोजन करते हैं। यहां काव्यात्मक सत्यनारायण कथा, भजन, आरती आदि दी गयी है जो सोने में सुहागे के समान है।

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कुमारी कन्या का पूजन

कुमारी कन्या पूजन विधि – Kumari kanya pujan vidhi

कुमारी कन्या पूजन विधि : शारदीय नवरात्रि जो कि आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से दशमी पर्यन्त होती है कुमारी कन्या का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। इसके अतिरिक्त शतचंडी आदि यज्ञों में भी कुमारी कन्या को भगवती का ही स्वरूप मानकर पूजा की जाती है।

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