वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥
मनुस्मृति/१/१२, भविष्यपुराण/१(ब्राह्मपर्व)/७/५७, विष्णुधर्मोत्तरपुराण/३/२३३/६३,
“देश, काल और परिस्थिति” – ये शब्द शास्त्रों द्वारा ‘विकल्प’ के लिए दिए गए थे, न कि ‘विपर्यय’ के लिए। जैसा कि मनुस्मृति और भविष्य पुराण स्पष्ट करते हैं, धर्म का आधार वेद, स्मृति और सदाचार है। जब सदाचार का अर्थ ‘बहुमत का आचरण’ मान लिया जाता है, तब वह ‘आसुरता’ की ओर ले जाता है।
आपने सुना होगा “मूर्ख मित्र से ज्ञानी शत्रु उत्तम होता है”, आज के विमर्श में इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण मिलने वाला है। देश, काल और परिस्थिति इन शब्दों का प्रयोग करते हुये आपने बहुत कर्मकांडियों को देखा होगा, इसके साथ ही लोकाचार, देशाचार, कुलाचार, मिथिला व्यवहार आदि का भी बहुधा प्रयोग किया जाता है। किन्तु इसका उचित प्रयोग करते हैं अथवा दुरुपयोग करते हैं यह कभी कोई विचार नहीं करता और आज यहां हम इसी का विचार करने जा रहे हैं। यह विषय अत्यंत गंभीर है और यदि आप भी इन शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इसके प्रयोग का विवेक प्रदान करने वाला है।
देश, काल, परिस्थिति, मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार, कुलाचार आदि के दुरुपयोग
इस विषय से संबंधित एक अन्य आलेख पूर्व प्रकाशित है जो इस विषय को समझने में और भी सहयोगी होगा, अतः जिज्ञासुगण उस आलेख का भी अवलोकन अवश्य करें। आलेख का लिंक यहां समाविष्ट किया गया है : यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धम्। सही-सही कैसे समझें ?
विशेष ध्यातव्य : विद्वद्जनों से यह विनम्र निवेदन है कि आलेख में प्रयुक्त “अपण्डित/मूर्ख” शब्द का स्वयं के लिये ग्रहण न करें, आलेख में अनेकानेक बार अपण्डित/मूर्ख शब्दों का प्रयोग किया गया है। अपण्डित शब्द का प्रयोग उनके लिये किया गया है जो अपनी हर त्रुटियों, अज्ञान के लिये आवरण रूप में देश-काल-परिस्थिति, कुलाचार-लोकाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि शब्दों का ही प्रयोग करते रहते हैं।
अमंत्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ।
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभ:॥
कोई भी वस्तु हो या और भी कुछ हो उसका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही किया जा सकता है, गुण और दोष सभी में होते हैं। सदुपयोग के लिये ज्ञान आवश्यक होता है किन्तु दुरुपयोग के लिये नहीं। दूध का भी सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों किया जा सकता है एवं विष का भी सदुपयोग किया जा सकता है अर्थात सही उपयोग का ज्ञान होने के बिना दूध का भी दुरुपयोग हो सकता है और हानिकारक हो सकता है, जैसे पाचनक्षमता से अधिक पी लेना और यदि उपयोग का ज्ञान हो तो विष का भी सदुपयोग किया जा सकता है होम्योपैथी में प्रयोग किया जाता है।

वर्त्तमान युग में धर्म कर कर्मकाण्ड में किसी मन्त्र, तंत्रादि अथवा अन्य भी किसी विषय के प्रायोगिक ज्ञान का पूर्णतः अभाव हो गया है और इसी में से एक विषय है देश-काल-परिस्थिति, देशाचार-लोकाचार-कुलाचार-मिथिला व्यवहार आदि। यद्यपि इसकी आज्ञा शास्त्र ही प्रदान करते हैं किन्तु प्रयोग के ज्ञान का अभाव होने के कारण आजकल मूर्ख लोग अपनी अज्ञानता के आवरण में प्रयोग करते हैं अर्थात कर्मकाण्ड में दुरुपयोग करते हैं।
दुरुपयोग का तो परम्परा से प्रशिक्षण भी प्राप्त हो जाता है और दुरुपयोग करने में सभी पारंगत हो जाते हैं किन्तु उचित प्रयोग अर्थात सदुपयोग कोई नहीं कर पाते। वर्त्तमान युग में जहां कहीं भी ये शब्द सुनाई दे समझ लीजिये कि कुछ न कुछ त्रुटिपूर्ण किया जा रहा है और उसको उचित सिद्ध करने के लिये इन शब्दों का प्रयोग किया गया है, अर्थात देश, काल, परिस्थिति, लोकाचार, कुलाचार, देशाचार, मिथिला व्यवहार आदि जिस किसी भी शब्द को चुना गया है किसी न किसी त्रुटि को आवरण प्रदान करने के लिये ही किया गया है।
कदाचित ही कहीं उचित प्रयोग किया जाता है, सामान्यतः सर्वत्र दुरुपयोग ही किया जाता है और इसे हम अनेकों उदाहरण सहित समझेंगे एवं कर्मकाण्डियों और यजमानों के लिये इतनी सरल शैली का प्रयोग करेंगे कि समझने में कोई कठिनाई भी न हो।
दुरुपयोग के कुछ उदाहरण
- उपनयन में पहले चूडाकरण किया जाता है और चूडाकरण में शिखा रखने के स्थान पर शिखा मुंडन कर दिया जाता है। प्रश्न करके देखें यही सब शब्द सुनने को मिलेंगे।
- उपनयन में चतुर्थी विधान नहीं है प्रश्न करें यही सब उत्तर मिलेगा।
- उपनयन में अपराह्न का निषेध है और लगभग सभी उपनयन अपराह्न में ही किये जाते हैं, प्रश्न करें यही सब शब्द सुनने को मिलेंगे।
- विवाह में कन्यादान से पूर्व अग्निस्थापन होना चाहिये किन्तु नहीं किया जाता है प्रश्न करें यही सब शब्द सुनाई देंगे।
- विवाह में लाजा होम का विधान है किन्तु अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुये गिरा दिया जाता है, प्रश्न करें यही सब शब्द सुनने को मिलेंगे।
- पूजा के प्रारम्भ में आचमन से पूर्व शिखा ग्रंथि अनिवार्य है किन्तु आचमन के पश्चात् ही करते हैं, प्रश्न करें यही सब शब्द सुनने को मिलेंगे।
- हवन करने के लिये सरल से सरल पुस्तक उपलब्ध करा दें, सभी सामग्री उपलब्ध कर दें किन्तु सविधि हवन नहीं होगा, प्रश्न करें तो उत्तर में यही सब शब्द सुनने को मिलेंगे।
- कन्यादान कर्त्ता पिता, पितामह, भ्राता, पितृव्य आदि ही हो सकते हैं किन्तु किसी को भी बना दिया जाता है और वो भी इन सबके रहते हुये, प्रश्न करें तो उत्तर में यही सब शब्द सुनने को मिलेंगे।
- नील के प्रयोग का शास्त्रों में पूर्णतः निशेष प्राप्त होता है और प्रायश्चित्त का विधान है, प्रश्न करें पहले तो अस्वीकार करेंगे और यदि प्रमाण सहित प्रश्न करेंगे तो यही सब शब्द सुनाई देंगे।
ये सभी सामान्य सी बातें हैं, मैंने जो अनुभव किया है इससे बड़े और शास्त्रीय प्रश्न पर भी उचित विचार तक नहीं करते स्पष्ट है ज्ञान का अभाव होने के कारण नहीं करते और झेंपने के लिये इन्हीं शब्दों की दुहाई देने लगते हैं और यही कारण है कि इस विषय को मैं विमर्श का बड़ा विषय मानता हूँ और जो लोग “संपूर्ण कर्मकाण्ड विधि” अथवा मेरे द्वारा किसी भी प्रकार से सीखने-समझने का प्रयास कर रहे हैं वो लोग इन शब्दों के उपयोग का ज्ञान प्राप्त कर लें ताकि दुरुपयोग न हो अर्थात त्रुटियों को झेंपने के लिये आवरण की भांति इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये।

वास्तविकता
यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः । वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते॥
भविष्यपुराण/१(ब्राह्मपर्व)/७/६१
ऊपर कुछ तथ्यात्मक उदाहरण दिये गए हैं किन्तु उनका विश्लेषण नहीं किया गया है, तथापि इस विषय को और गंभीरता से समझने के लिये वर्त्तमान के कुछ अन्य उदाहरणों को सविस्तार समझना होगा जिसके लिये भविष्य में इन्हीं शब्दों का आवरणात्मक प्रयोग किया जायेगा। किन्तु यहां अभी ही विमर्श किया जा रहा है जिस कारण भविष्य में उसका लोकाचार, देशाचार, कुलाचार, मिथिला व्यवहार आदि होना असिद्ध होगा अर्थात परवर्ती आचार्यों के लिये यह आलेख अत्युपयोगी सिद्ध होगा। इस आलेख को आप प्रिंट करके सहेज लें, भविष्य में अगली पीढ़ियों को भी बहुत काम आयेगा।
वर्षी (बरखी) : सांवत्सरिक/वार्षिक श्राद्ध
वर्त्तमान में एक नया शास्त्रविरुद्ध व्यवहार आरम्भ हो चुका है और वो है तेरहवें दिन वार्षिक श्राद्ध (वर्षी) करना। वार्षिक श्राद्ध का अपकर्षण नहीं किया जा सकता है किन्तु बहुत लोग करने लगे हैं। जिस गांव में, जिस कुल में लोग करने लगे हैं उनकी अगली पीढ़ियां इसे लोकाचार, देशाचार, कुलाचार, मिथिला व्यवहार आदि ही कहेंगे और इसका मैं (दिगम्बर झा) आज (फा.शु.एकादशी २०८२, शुक्रवार) ही खंडन कर रहा है। मेरे खंडन या समर्थन का भी अपना विशेष महत्व है और ये परवर्ती आचार्यों के समझ में आयेगा।
ये न तो पहले ऐसा कुछ था, न ही आज है इसलिये भविष्य में भी ऐसा नहीं हो सकता, तथापि यदि कोई करेंगे तो वह लोकाचार-देशाचार-कुलाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं होगा, शास्त्रविरुद्ध ही सिद्ध होगा क्योंकि इसका खंडन आज ही कर रहा हूँ।
पैंट-कोर्ट, कुरता-पैजामा आदि पहनकर विवाह, पूजा, हवन आदि करना
श्रुतिस्मृतिविरोधे तु श्रुतिरेव गरौयसी । अविरोधे सदा कार्य्यं स्मार्त्तं वैदिकवत्सदा ॥
विवाह : वर्त्तमान में बहुत सारे विवाह कोर्ट-पैंट, कुरता-पैजामा आदि पहनकर किया जा रहा है जबकि २ – ३ दशक पूर्व कोई नहीं करता था। मैं इसका भी आज ही खंडन करता हूँ और शास्त्रविरुद्ध घोषित करता हूँ। ये भविष्य में लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
पूजा-हवन : इसी प्रकार पूजा, हवन आदि में भी इन परिधानों का प्रयोग किया जाने लगा है और अब तो कर्मकांडी भी इन्हीं परिधानों को पहनना आरम्भ कर चुके हैं। श्राद्ध में महापात्र भी सर्ट-पैंट पहनने लगा है। मैं इन सबको भी शास्त्रविरुद्ध घोषित करता हूँ और ये भविष्य में लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
इसी प्रकार ऊपर जो और भी कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण दिये गए हैं, मैं इन सबको भी शास्त्रविरुद्ध घोषित करता हूँ और ये भविष्य में लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
कुछ संस्थाओं ने और मूर्खों ने भी अनुपनीतों, स्त्रियों, बालकों से भी हवन करना आरम्भ कर दिया है। ये भी दो-तीन दशक पूर्व नहीं किये जाते थे अर्थात ये भी शास्त्रविरुद्ध हैं और मैं इसका खंडन करता हूँ एवं भविष्य में ये सब भी लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
व्रात्यता : वर्त्तमान में २ – ३ दशकों से उपनयन का ज्ञान लुप्त होता देखा गया है और अधिकांशतः व्रात्य ही होने लगे हैं। विस्तृत भोज, विस्तृत डेकोरेशन आदि की व्यवस्था आदि ने संस्कार के संस्कारतत्व को ही नष्ट कर दिया है और भविष्य में मूर्खों द्वारा इसे भी लोकाचार-देशाचार आदि सिद्ध करने का प्रयास किया जायेगा। इस कारण आज ही इसे भी मैं शास्त्रविरुद्ध घोषित कर रहा हूँ और ये भी कभी लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
वृषली विवाह : जैसे बालक का उपनयन उचित आयु में नहीं हो पा रहा है उसी प्रकार वर्त्तमान में कानून के कारण से कन्या का विवाह भी विलम्ब से होने लगा है। किन्तु जनता इसको सम्पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं कर रही है, वो लोग जो गणमान्य श्रेणी के होते हैं वही भयवश इस कानून का पालन करते हैं।
मैं किसी को कानून के पालन से उपरत होने के लिये उत्प्रेरित नहीं कर रहा हूँ किन्तु जो वास्तविकता है उसको व्यक्त कर रहा हूँ। भविष्य में लोकतंत्र ही समाप्त हो जायेगा और इन कानूनों का तो कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा। अस्तु भविष्य में जब इस प्रकार के बाधक कानून नहीं होंगे तो उस समय इस प्रकार का विवाह भी लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
दूषित सामग्री : वर्त्तमान में पूजा-पाठ आदि के लिये लगभग सभी सामग्रियां दुकानों से क्रय किया जाने लगा है जबकि मैंने देखा है कि कुछ ही ऐसे वस्तु होते थे जो क्रय के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार उपलब्ध न हो सकें वही दुकानों से क्रय किये जाते थे। इसके साथ ही दूषित सामग्रियों का भी व्यापक प्रयोग देखा जा रहा है किन्तु मैंने देखा है कि सामग्रियों को बहुत ही तन्मयता और गम्भीरता से संस्कारित किया जाता था।
आज भी छठ पूजा आदि में वही शुद्धिकरण देखने को मिलता है किन्तु अन्यत्र नहीं। इस प्रकार दूषित सामग्री का प्रयोग भी कभी लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
गृहप्रवेश : गृहप्रवेश करते समय कुछ स्थानों पर गाय को आगे-आगे घर में भी प्रवेश कराया जाने लगा है। शास्त्र गाय की पूजा करके दक्षिण भाग में रखते हुये गृहप्रवेश करने का निर्देश देते हैं अर्थात यह शस्त्रसिद्ध नहीं होता है एवं जहां प्रवेश करने में कठिनाई हो वहां प्रवेश नहीं कराया जाता, जहां सुगमता से प्रवेश हो सके वहीं ऐसा किया जाता है।
कुछ लोग गृहप्रवेश में वास्तु शांति न करके कोई अन्य पूजा आदि जैसे सत्यनारायण पूजा करने लगे हैं। गृहप्रवेश में पूरा घर ऐसा बनाया जाने लगा है कि वास्तु शांति के पश्चात् गड्ढा नहीं हो पाता और वास्तु निक्षेप छूट जाता है अथवा घर के बाहर, अथवा आकाशपद से भिन्न कहीं भी निक्षेप किया जाने लगा है।
इसी प्रकार कुछ स्थानों पर गृहप्रवेश के पश्चात् अर्पित अधिकांश सामग्रियां भी कुटुम्बों में वितरित कर दी जाती हैं, ब्राह्मणों को नहीं लेने देते। ये सब भी भविष्य में लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
श्राद्ध : श्राद्ध में भी ढेरों विकृतियां आ गयी है, अब एकादशाह के दिन पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण भी वरण तो लेने लगे हैं किन्तु भोजन में कुछ हां करते हैं कुछ न करते हैं। कुछ कहीं भी भोजन नहीं करते तो कुछ कहीं करते हैं और कहीं नहीं करते हैं। मुझे स्मरण है पुरोहित वर्ग के कर्मकांडी ब्राह्मण एकादशाह के दिन वरण भी नहीं लेते थे, विदाई के समय ही वरण सामग्री भी विदाई रूप में ग्रहण करते थे और उस अवस्था में भोजन नहीं करना उचित सिद्ध होता है किन्तु वर्त्तमान में वरण ले भी लेते हैं और भोजन में नौटंकी भी करते हैं।
द्वादशाह के दिन पूर्वाह्ण में ही अधिकांशतः श्राद्ध का आरम्भ किया जाने लगा है। कुछ अपण्डित श्रेणी के व्यक्ति स्वयं को पण्डित सिद्ध करने के लिये संध्या कराकर कालक्षेप भी करते हैं जबकि प्रातः-मध्याह्न का भी विवेक नहीं रखते, स्वयं भी संध्या का प्रदर्शन मात्र करते हैं वो भी कर्मकाण्डी बनने पर लज्जावश, उपनयन से आरम्भ नहीं करते हैं।
इसी प्रकार श्राद्ध सामग्री अथवा उत्सर्ग सामग्री का विभाजन किया जाने लगा है और विभाजन का स्तर यह है कि नापित और मालाकार में भी विभाजन किया जाता है, उसका भाग कहा जाता है। पूर्वाचार्यों ने भी ऐसे किसी विभाजन को मान्यता नहीं दिया है, मैं भी शास्त्रविरुद्ध घोषित करता हूँ।
बहुत स्थानों पर पुरोहित वर्ग की अज्ञता, लोभ आदि के कारण एकादशाह के दिन ही सामाजिक दवाब से भोजन कराया जाता है। ये सब भी भविष्य में लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, शास्त्रविरुद्ध ही कहा जायेगा।
इसी प्रकार और भी बहुत सारे विषय हैं किन्तु सबका वर्णन नहीं किया जा सकता और सबका उल्लेख करना आवश्यक भी नहीं है अपितु लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि का निर्णय करने के विवेक की आवश्यकता है। यदि यह विवेक हो जाये तो एक-एक विषय के निर्धारण किया जा सकता है कि वह लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार है अथवा नहीं।
निर्णय का विवेक
अपण्डितों द्वारा देश-काल-परिस्थिति, लोकाचार-कुलाचार-देशाचार-मिथिला व्यवहार आदि का प्रयोग स्वेच्छाचार की सिद्धि हेतु किया जाता है और यह दुरुपयोग है। किन्तु यदि इसके आधार को समझ लें, वास्तविक तात्पर्य को समझ लें तो उचित निर्णय भी ले सकते हैं एवं दुरुपयोग करने वाले अपण्डितों का खंडन भी कर सकते हैं।
ये कुछ दशकों से कर्मकांड में घुसपैठ करने वाले घुसपैठिये शिक्षकों आदि के द्वारा ही प्रसारित किया गया है, इनके पास न ही शास्त्रज्ञान होता है और न ही विवेक होता है। कोई व्याकरणाचार्य होते हैं तो कोई ज्योतिषाचार्य तो कोई साहित्याचार्य। सुधार की दिशा में आगे बढ़ने के लिये विवेक को जाग्रत करना आवश्यक है और उस दिशा में “संपूर्ण कर्मकाण्ड विधि” आपको भरपूर सहयोग प्रदान करता है।
देश
देश और देशाचार का तात्पर्य है शास्त्रों में देश भेद से तो बहुत कुछ वर्णन मिलता है जैसे वारारम्भ विचार; ये तीन प्रकार से हैं और देश भेद से तीनों ही प्रभावी हैं दिन की गणना के लिये वारारम्भ हेतु कहीं सूर्योदय को ग्रहण किया गया है तो कहीं रात्रि के तृतीय त्रिभाग से तो कहीं अर्द्धरात्रि से। शास्त्रों में कई प्रकार के वचन भी मिलते हैं और कई वचन परस्पर विरोधी भी प्रतीत होते हैं अथवा वास्तव में भी होते हैं तो उसमें भी देश भेद ही मुख्य कारण होता है और देश भेद के आधार पर विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न पक्ष की मान्यता होती है।
जैसे जीमूतवाहन व्रत निर्णय में देखने को मिलता है। मिथिला में राहुकाल का विचार नहीं किया जाता किन्तु अर्द्धप्रहरा का विशेष विचार किया जाता है किन्तु मैथिलेत्तरों में विपरीत होता है। इसी प्रकार देशभेद से द्रव्य की उपलब्धि में भी भेद होता है और जहां मुख्य द्रव्य उपलब्ध न हो वहां पर उसके स्थानापन्न वैकल्पिक द्रव्य ही मुख्यता से प्रयोग किये जाते हैं। इसी प्रकार देशभेद से शीत-ग्रीष्म-वर्षा आदि के आधार पर भी अनुकूल विधान/व्यवहार प्रचलित होता है। जैसी मरुस्थल में जल का अभाव होता है तो हिमालय पर शीत की अधिकता।
अब यदि हिमालय में गाय उपलब्ध ही न हों तो उसके स्थान पर भैंस-बकड़ी आदि का दुग्ध भी स्वीकार्य हो जाता है और शास्त्र में वर्णन है, किन्तु जहां गाय का अभाव न हो वहां गाय के अतिरिक्त अन्य किसी का भी दूध ग्राह्य नहीं होता। इसी प्रकार मिथिला में बलिविधान है तो मैथिलेत्तरों द्वारा इसका व्यापक विरोध भी किया जाता है। ध्यान देने का मुख्य विषय यह है कि सभी विषय शास्त्र से सिद्ध होते हैं।
इसी प्रकार शास्त्रों में जितने विषय वर्णित हैं वो सभी देशों में समान रूप से प्रचलित नहीं है अथवा ग्रहण नहीं किये गए हैं जैसे श्राद्ध को ही लें तो षोडशत्रयी विधान मिलता है किन्तु मिथिला में मात्र एक ही षोडशी ग्रहण किया गया है, मलिनषोडषी में भी मात्र दशगात्र पिंडदान को ग्रहण किया गया है।
कर्मकाण्ड में संकल्पादि वाक्यप्रयोग संबंधी अंतर भी प्राप्त होता है। इसी प्रकार सभी व्रत-उत्सव भी सभी देशों समान रूप से ग्रहण नहीं किये गये हैं अपितु देशभेद से भिन्न-भिन्न ग्रहण किये गये हैं किन्तु सभी शास्त्रसिद्ध हैं। तीज, मधुश्रावणी, जितिया, करक चतुर्थी, छठ, चतुर्थी चन्द्र, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा आदि अनेकों उदाहरण हैं। सबकी सिद्धि शास्त्र से ही होती है कुछ भी स्वेच्छाचार नहीं है।
काल
काल का तात्पर्य युग, ऋतु, आपात्काल, दिवारात्रि आदि से है। काल के विषय में कुछ शास्त्रसिद्ध विषय भी आते हैं तो कुछ विवेकाधिकार के अधीन भी आते हैं किन्तु विवेकाधिकार के अधीनस्थ विषयों के लिये शास्त्रज्ञान और विवेक होना तो आवश्यक है। जिसे शास्त्रज्ञान और विवेक ही नहीं वह स्वेच्छाचारी अपण्डित काल के अनुसार कैसे निर्णय ले सकता है अर्थात मात्र अपने स्वेच्छाचार को देश-काल-परिस्थिति के आवरण से ढँक सकता है।
जब शीतऋतु हो तो शास्त्रों में स्नान के विकल्प भी प्राप्त होते हैं और विवेकपूर्वक निर्णय लिया जा सकता है। जब ग्रीष्मऋतु में पुष्प-बिल्वपत्र का अभाव हो तो उस काल में भी शास्त्रोचित निर्णय लिया जा सकता है। दही-चूड़ा का भोजन अधिकतम शुद्ध होता है किन्तु रात्रि में दधिभक्षण का निषेध है तो रात्रि में काल के अनुसार अन्य (दुग्ध) का ही निर्णय लिया जा सकता है। इसी प्रकार आपात्काल में भी शास्त्रोचित निर्णय लिया जा सकता है। तात्पर्य यह कि काल के अनुसार लिया गया निर्णय भी शास्त्रोचित हो यह अनिवार्य है।
काल के अनुसार निर्णय लिया तो जा सकता है किन्तु स्वेच्छाचार नहीं किया जा सकता। वर्त्तमान काल में काल के अनुसार निर्णय के नाम पर स्वेच्छाचार किया जा रहा है। जैसे विवाह में वर को धोती धारण करने की आज्ञा तो नहीं देंगे किन्तु काल की ओट लेंगे। अरे अपण्डितों; ब्राह्मण के पास आज्ञा देने का अधिकार होता है और यजमान आज्ञापालन हेतु बाध्य होता है। ब्राह्मण का दायित्व यजमान के स्वेच्छाचार को काल के आधार पर प्रश्रय देना नहीं है।
यदि यजमान तुम्हारी आज्ञा का पालन न करता हो तो उस यजमान के यहां तुम जाते ही क्यों हो; लोभवश और यदि लोभवश जाते हो तो “लोभः पापस्य कारणं”, एक ओर तुम लोभग्रस्त होकर पाप भी कर रहे हो तो दूसरीओर उसे उचित सिद्ध करने के लिये काल की ओट भी लेते हो।
इसी प्रकार ढेरों विषय हैं जो अन्यान्य युगों में प्रशस्त थे किन्तु कलयुग में निषिद्ध हैं और इनका ज्ञान भी शास्त्र से ही होता है। कलयुग कहकर भी स्वेच्छाचार को काल के नाम पर उचित सिद्ध नहीं किया जा सकता।
परिस्थिति
परिस्थिति का तात्पर्य मुख्यरूपेण सामर्थ्य से है और ये सामर्थ्य स्वास्थ्य, शक्ति, अवस्था, धन-संपत्ति, घर, यात्रा, मंदिर, तीर्थ, समाज आदि के अनुसार निर्धारित किया जाता है और इसके लिये भी शास्त्रों में ही विधान प्राप्त होता है। अब तीर्थ यात्रा को ही लें तो वाहन, उपानद आदि का भी निषेध मिलता है किन्तु शारीरिक रूप से अक्षम हेतु प्रयोग की आज्ञा शास्त्र से ही है। घर में जो विधान है यात्रा में उसका आधा ही कहा गया है।
एक धनाढ्य व्यक्ति नवरात्रा में भी लाखों व्यय कर सकता है और उसके लिये दान की वस्तुयें बढ़ाई जा सकती हैं किन्तु एक दरिद्र व्यक्ति श्राद्ध में पञ्चदान भी नहीं कर पाता और उसके लिये ५०० – १००० में भी गोनिष्क्रय हो जाता है। दक्षिणा में स्वर्ण हो किन्तु परिस्थिति वश “द्रव्यमूल्यक हिरण्यं” ही प्रयुक्त होता है और ये सभी भी आचार्यों द्वारा विवेकपूर्वक लिया गया निर्णय है न कि स्वेच्छाचार।
एक अस्वस्थ व्यक्ति व्रत करने में असमर्थ हो तो उसके लिये भी शास्त्र में विधान दिया गया है और शास्त्रज्ञान होने पर उचित आज्ञा प्रदान करेंगे किन्तु शास्त्रज्ञान न हो तो कुछ भी कह देंगे। परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने के लिये सर्वाधिक शास्त्रज्ञान और विवेक की आवश्यकता होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति को तीन दिन का उपवास भी कहा जा सकता है और एक अस्वस्थ व्यक्ति को मात्र पंचगव्य प्राशन भी कहा जा सकता है। किन्तु किया वही जायेगा जो शास्त्रज्ञ ब्राह्मण की आज्ञा होगी।
एक धनाढ्य को रत्नधारण, ग्रहशांति कहा जा सकता है तो एक दरिद्र को यंत्र-जड़ी धारण, व्रत करने के लिये भी कहा जा सकता है। विवाह में बैठे वर-कन्या में से किसी को भी यदि स्वास्थ्य संबंधी विघ्न आ जाये तो परिस्थितिवश हेतु विवेकानुसार ही निर्णय लेना होगा यद्यपि यह काल प्रभाव में भी आएगा और आपत्काल समझना होगा। वहां पर शास्त्रज्ञ ब्राह्मण जो भी निर्णय लेगा वही उचित मान्य होगा।
यदि व्रत में स्थित व्यक्ति अचेत हो जाये तो उसकी चिकित्सा की आज्ञा दी जायेगी न कि उसके व्रतभंग होने के दोष का विचार किया जायेगा। व्रतभंग दोष का पुनः मार्जन हो सकता है यदि उस व्यक्ति का प्राण सुरक्षित रहे तो और यदि ब्राह्मण की आज्ञा से व्रत में चिकित्सा कराई गयी तो वहां व्रतभंग ही मान्य नहीं होगा। जब ब्राह्मण की आज्ञा का इतना महत्व है तब भी ब्राह्मण बस देश-काल-परिस्थिति जपता रहे तो वो ब्राह्मण किस काम का ?
यजमान तो छोटी-सी-छोटी बात भी ब्राह्मण को ही पूछता है अर्थात आज्ञा मांगता है और पालन भी करता है किन्तु ये जो लोभग्रस्त अपण्डित कर्मकांड में घुसपैठ कर चुके हैं इनको उस यजमान से ही भय होता है जिसको ये आज्ञा दे रहे होते हैं। अरे अपण्डितों इतना ही भय लगता है तो तुम्हीं यजमान को प्रणाम करके अभयदान मांगो फिर परिस्थिति की बात करना। एक बार को जो दुष्ट यजमान होते हैं उनके यहां परिस्थिति की बात की जा सकती है किन्तु सर्वत्र नहीं, सभी दुष्ट नहीं होते ।
देश-काल-परिस्थिति का उचित प्रयोग कैसे करें
देश-काल-परिस्थिति के लिये अनेकों उदाहरण हो सकते हैं किन्तु अनेकों उदाहरण प्रस्तुत करना संभव नहीं है हम एक ही उदाहरण से समझेंगे :
देश : मान लीजिये आप किसी ऐसे देश (क्षेत्र) में हैं जहां गाय का दूध अनुपलब्ध है किन्तु उस देश में वैकल्पिक रूप से भैंस का दूध प्रशस्त स्वीकार किया गया है तो आप भी वहां प्रयोग कर सकते हैं किन्तु मिथिला में ऐसा नहीं है तो नहीं कर सकते। ये नहीं की मिथिया या अन्य देश में जहां गाय का दूध उपलब्ध हो वहां भी आप भैंस के दूध का ही प्रयोग करें।
काल : अपने घर में ही पूजा आदि के लिये किन्तु वर्षाऋतु है और झड़ी लग गयी है। आपके पास सभी सामग्रियां उपलब्ध नहीं हैं तो वहां पर आप विकल्पों का प्रयोग कर सकते हैं और ये काल के अनुसार लिया गया निर्णय होगा। कुछ दशकों पूर्व तक पकड़ौवा विवाह होता था और उसमें कालाभाव के कारण बिना मंडप के ही विवाह किया जाता था, मान लीजिये आज भी ऐसा हो तो बिना मंडप के ही विवाह हो जायेगा। ये भी काल के अनुसार लिया गया निर्णय है; देशाचार, कुलाचार आदि नहीं।
इसी प्रकार किसी के उपनयन में विलम्ब हो जाये तो अपराह्न में भी किया जायेगा, किन्तु अपराह्न में उपनयन करना देशाचार आदि नहीं हो सकता। कोरोना काल में कर्मकांड के भी बहुत सारे नियम परिवर्तित हो गए थे, वो काल के अनुसार था, देशाचार आदि नहीं और अब वही नियम नहीं चलेगा। परिस्थिति : मान लीजिये पूजा के समय उपलब्ध दूध फट गया और अब दूध उपलब्ध नहीं है तो वैकल्पिक रूप से जल का प्रयोग करेंगे। किन्तु यह देशाचार आदि नहीं होगा।
वैकल्पिक रूप से भी डेयरी के दूध का प्रयोग नहीं करेंगे किन्तु कुछ स्थानों पर डेयरी के दूध का ही पयोग किया जाने लगा है तो ये देशाचार आदि नहीं हो सकता। पंचामृत के लिये रखा गया दही गिर गया तो विकल्प में दूध का ही प्रयोग कर लेंगे, इसी प्रकार मधु के लिये शर्करा का प्रयोग कर लेंगे; किन्तु ये देशाचार, कुलाचार आदि नहीं बनेगा। बिल्ली को ढंकने वाला विषय बहुत ही चर्चित रहता है और अपण्डितों द्वारा देशाचार, कुलाचार कहा भी जाता है, अरे नहीं वो देशाचार, कुलाचार आदि कुछ भी नहीं है। ये अपण्डित देशाचार, कुलाचार के लिये उदाहरण भी ऐसे ही प्रस्तुत करते हैं जो सिद्ध ही न हो।
मान लीजिये कोई व्यक्ति जल चढाने के लिये शिवालय जा रहा था किन्तु श्वान का स्पर्श हो गया और उसने अपवित्रता के कारण उस जल को वहीं रास्ते में फेंक दिया और संयोगवश उसी दिन उसको नौकरी मिल गयी और और कुछ भी बड़ा लाभ हो गया। अब लोगों ने वहां से रास्ते में जानबूझ कर कुत्ते का स्पर्श करना, रास्ते में जल फेंकना आरंभ कर दिया तो ये देशाचार, कुलाचार कहा जायेगा क्या ? अरे नहीं कहा जायेगा इसमें पाप हो रहा है।
मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार, कुलाचार आदि
मिथिला व्यवहार का तात्पर्य है शास्त्रानुमोदित विभिन्न पक्षों में ग्रहण किया गया कोई विशेष पक्ष। इसी प्रकार मिथिला में सभी कर्मकांड का संक्षेपीकरण किया गया है। व्रात्य के लिये मिथिला के आचार्यों ने विशेष मार्ग निकाला था किन्तु अब उसे उपनयन विधि समझा जा रहा है। अर्द्धप्रहरा का विचार मिथिला में विशेषरूप से किया जाता है किन्तु राहुकाल का नहीं किया जाता ये मिथिला व्यवहार है।
किन्तु नान्दीश्राद्ध का त्याग मिथिलाव्यवहार या देशाचार सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि आचार्यों ने नान्दी श्राद्ध विधि सभी पद्धतियों में दिया है, अनेकानेक स्थानों पर होते भी हैं। अर्थात यह आचार्यों से मान्यताप्राप्त नहीं है। पकड़ौवा विवाह के कारण रात में नान्दीश्राद्ध निषिद्ध होने से नहीं किया गया तो ये देशाचार नहीं है किन्तु पकड़ौवा विवाह में अभी भी मान्य होगा। अब पैंट-पैजामा पहकर विवाह कर-हवन-पूजा आदि करने लगे हैं किन्तु यह देशाचार नहीं हो सकता।
श्राद्ध में पञ्चदान प्रयोग को विशेष प्रकार से आचार्यों ने अपात्रक श्राद्ध में भी ग्रहण किया है तो ये देशाचार, मिथिला व्यवहार कहलायेगा, किन्तु दक्षिणा के लिये पूर्व गोदान को मान्यता नहीं दिया है तो ये नहीं कहलायेगा, पद्धतियों में अवलोकन कर लें इसको मान्यता नहीं दिया गया है, लोक व्यवहार में ऐसा देखने को मिलता है मात्र यह उल्लेख किया गया है। आम-महुआ विवाह को मंगली दोष का वैकल्पिक निवारण स्वीकार किया गया है तो ये मिथिला-व्यवहार, देशाचार आदि सिद्ध होता है किन्तु सभी संस्कार विलुप्तप्राय होते जा रहे हैं इसको मिथिला व्यवहार या देशाचार नहीं कहा जायेगा।
जन्माशौच में सभी स्वेच्छाचार करते दिखते हैं, जब पूजा हो तो जन्माशौच कहकर नहीं करते किन्तु जब विवाह हो तो मरणाशौच में भी कर लेते हैं, ऐसे स्वेच्छारियों का स्वेच्छाचार मिथिला व्यवहार नहीं कहा जा सकता और मान्यता नहीं दी जा सकती और जो मान्यता देते हैं वो अपण्डित ही कहलायेंगे।
मिथिला में “न मम” का प्रयोग नहीं होता और सभी मिथिला देशीय पुस्तकों में हवन प्रकरण का अवलोकन करें नहीं मिलेगा ये मिथिला व्यवहार देशाचार कहा जायेगा। मिथिला में आवाहन के लिये “इहागच्छ इह तिष्ठ” प्रयोग किया जाता है और पुस्तकों में अवलोकन करें तो वहां भी मिलेगा अर्थात आचार्यानुमोदित है तो मिथिला व्यवहार-देशाचार है और शास्त्रों में भी यह विधि है।
लोकाचार, देशाचार को मान्यता
बहुत सारे व्यवहार के लोकाचार, देशाचारत्व का खण्डन करने के पश्चात् कुछ मान्यता की भी आवश्यकता है। मान्यता भी देश-काल-परिस्थितिजन्य आधार से ही दूंगा निराधार नहीं और सप्रयोजन भी दूंगा। वर्तमान काल में एक एक व्यावहारिक समस्या जो देखी जा रही है वो है नवरात्रा में कलश स्थापना मुहूर्त, दीपावली में लक्ष्मी पूजन मुहूर्त हनुमज्जयन्ती-रामनवमी आदि में ध्वजदान । इनमें शुभ मुहूर्त की चर्चा सीमा से अधिक होने लगी है किन्तु इन धूर्तों को व्यावहारिक समस्या का ज्ञान ही नहीं है। जितने यजमान ये कार्य करते हैं उन सबके लिये उतने ब्राह्मण किसी भी प्रकार से उपलब्ध हो ही नहीं सकते ये परिस्थितिजन्य संकट है।
इस कारण व्यवहार में कलश स्थापना दिन भर होता ही रहता है, लक्ष्मी पूजा सायंकाल से अर्द्धरात्रि या उसके बाद तक भी होती रहती है, ध्वजदान भी दिनभर होता है । ये एक ही अवस्था में संभव है कि यजमान स्वयं ही उन कर्मकांडों को सीखे और ब्राह्मण की अनुमति लेकर दर्भबटु को ब्राह्मण मानकर स्वयं ही करे किन्तु ये तो कल्पना से भी परे है। दूसरा मार्ग है उपरोक्त लोक व्यवहार को ही मान्यता प्रदान करना और इसकी आवश्यकता इस कारण से है क्योंकि बहुत सारे धूर्त टेलीविजन पर बैठकर जनमानस की आस्था को भंग करते हैं जो भविष्य में और अधिक हो सकता है।
यहां पर प्रशस्त का खंडन नहीं किया जा रहा है अपितु “यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं” को भी आधार बनाया जा रहा है। यद्यपि कलश स्थापन प्रातःकाल ही हो, यही प्रशस्त है किन्तु सायंकाल तक न हो ऐसा निषेध भी नहीं है, अपितु निषेध रात्रि में कलशस्थापन का है। अर्थात यदि दिनभर कलशस्थापन को व्यावहारिक समस्या के आलोक में प्रशस्त स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं है।
इसी प्रकार प्रदोषकाल में लक्ष्मी पूजा हो, स्थिर लग्न में पूजा हो प्रशस्त है किन्तु रात्रिभर पूजा, द्युत आदि का विधान है और रात्र्यंत में दरिद्रानिष्काशन का। अस्तु यदि अर्द्धरात्रि तक होने वाले लक्ष्मीपूजन को प्रशस्त ही मानने में कोई शस्त्रविरोध नहीं दिखता। इसी प्रकार दिनभर ध्वजदान में भी को समस्या नहीं दिखती है।
इसलिए इस व्यवहार को मैं लोकाचार स्वीकारता हूं, मान्यता देता हूं अर्थात् परवर्ती काल के कर्मकाण्डी मेरे इस वचन को आधार बनाकर प्रस्तुत कर सकेंगे, तात्कालिक कर्मकाण्डी तो मेरे अधिकार पर प्रश्नचिह्न उपस्थित करेंगे, विरोध करेंगे। किन्तु मैं ही इसको मान्यता देने का अधिकार रखता हूं और देता हूं। मेरे पास यह अधिकार है अथवा नहीं इसकी पुष्टि “संपूर्ण कर्मकाण्ड विधि” के सैकड़ों आलेखों से होगी न कि किसी अन्य के प्रमाणपत्र पर निर्भर है।
यदि शास्त्र अपना रहस्य मेरे समक्ष प्रकट कर रहे हैं तो मैं ही मान्यता दे सकता हूं अथवा खण्डन कर सकता हूं। उदरपूर्ति में संलग्न व्यक्तियों के समक्ष शास्त्र अपना रहस्य प्रकट नहीं करते और ऐसे लोग प्रश्नचिह्न लगाने का भी अधिकार नहीं रखते। जिसे विरोध करना हो वो पहले उदरपूर्ति में संलग्नता का परित्याग करके १२ वर्षों तक शास्त्रसेवा करे; उसके समक्ष भी शास्त्र अपना रहस्य स्वयं ही प्रकट करने लगेंगे वो आकर विरोध करने का अधिकारी हो सकते हैं।
इसी प्रकार विवाहादि में भी मुहूर्त विषयक ऐसा ही व्यवहार देखने को मिलता है यथा विवाह नक्षत्र या तिथि रात्रि ९ बजे तक अथवा दिन में ही कुछ काल मिलता है किन्तु विवाह अर्धरात्रि के पश्चात् ही आरम्भ होता है। यह व्यवहार सर्वत्र देखा जा रहा है। यहां भी यदि विकल्प की बात करें तो नहीं है और भविष्य में बढती जनसंख्या के अनुसार मुहूर्त भी बढना चाहिए और यह भी संभव नहीं है यदि ऐसा भी करते हैं तो शास्त्रविरुद्ध ही होगा।
शास्त्रसम्मत तथ्य यह है कि उपनयन मुहूर्त की आवश्यकता अंतिम वर्ष से पूर्व ही कहा गया है, १६वें वर्ष में शुभमुहूर्त न हो तो भी उपनयन करे ही करे आगे के लिये मुहूर्त विचार की आवश्यकता ही नहीं है। इसी प्रकार विवाह में शुभ मुहूर्त की आवश्यकता योग्य वर-कन्या के लिये होती है, जो पुरुषार्थ सिद्धि-आत्मकल्याण चाहते हैं उनके लिए होती है।
पूर्णरूपेण म्लेच्छाचार करने वाला कितने पुरुषार्थ की सिद्धि चाहता है, कितना आत्मकल्याण चाहता है यह समझा जा सकता है। अस्तु जो आत्मकल्याण चाहता है, पुरुषार्थ सिद्धि चाहता है उसके लिए तो शुभमुहूर्त विचार की आवश्यकता रहेगी और शुभमुहूर्त में ही विवाह हो किन्तु कोई यह कहेगा ही नहीं कि वो आत्मकल्याण नहीं चाहता, पुरुषार्थ सिद्धि नहीं चाहता तो फिर इसका निर्णय कैसे हो।
तो इसका निर्णय उसके वचनमात्र पर आधारित नहीं होगा, इसका निर्णय उसके आचरण-व्यवहार से निर्धारित होगा । अर्थात् इस व्यवहार (मुहूर्त विषयक) को भी देश-काल-परिस्थिति वश उचित स्वीकारने में आपत्ति नहीं है और शास्त्रविरुद्ध प्रतीत नहीं होता। इसकी सिद्धि के लिये स्मृतियों के उन वचनों का आशय समझें जहां रजस्वला को ३ वर्ष प्रतीक्षा करने के लिये कहा गया है तदन्तर स्वेच्छा से योग्य वर चयन का अधिकार प्रदान किया गया है और यदि योग्य न मिले तो अयोग्य के वरण का भी अधिकार प्रदान किया गया है।
इसी प्रकार गृहप्रवेश की बात करें तो घर में गाय को प्रवेश कराने का विधान नहीं है किन्तु यदि किया जाता है तो कोई निषेध भी नहीं है एवं किसी प्रकार से शास्त्रविरुद्ध भी नहीं है। तो इसको भी लोकाचार स्वीकारने में आपत्ति नहीं है किन्तु इसकी अनिवार्यता नहीं है अर्थात जिसके घर में गाय प्रवेश न कर सके वो इसको लेकर भ्रमित न हों यह भी आवश्यक है।
कुलाचार देशाचार कब बनता है
“ब्राह्मण का बल उसकी आज्ञा में है, यजमान के अनुनय-विनय में नहीं।”
कुल मिलाकर मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार आदि का तात्पर्य वो विधियां हैं जो आचार्यानुमोदित हैं, आचार्यानुमोदित होने का तात्पर्य है शास्त्रविरुद्ध न होना। आचार्य उसी का अनुमोदन कर सकते हैं जो भले ही शास्त्रसम्मत न हो किन्तु शास्त्रविरुद्ध भी न हो। किन्तु देश-काल-परिस्थिति के आधार पर व्यक्ति विशेष के लिये लिया गया निर्णय भी मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार नहीं हो सकता है।
देश-काल-परिस्थिति के अनुसार जो विधान सार्वजनिक रूप से अनुमोदित किया गया हो वह मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार कहला सकता है जिसका आरम्भ कुलाचार से हो सकता है। देशाचार, लोकाचार आदि का आरम्भ कुलाचार से ही होता है शनैः शनैः अन्यान्य आचार्य अनुमोदित करते जाते हैं और विस्तार होने पर देशाचार हो जाता है। किन्तु यदि विस्तार न हो तो कुलाचार ही कहलाता है।
मान लीजिये किसी पर्व-त्योहार में किसी की मृत्यु हो गयी तो अगले वर्ष उसी पर्व-त्योहार में उसकी वर्षी होगी इस कारण वह श्राद्ध करेगा किन्तु पर्व-त्योहार संबंधी पूजनादि नहीं करेगा क्योंकि श्राद्ध ही करना होगा। ये व्यवहार उसके कुल तक ही सीमित रहेगा और उसके कुलाचार की संज्ञा धारण करेगा। किन्तु यदि पूरा गांव ही उस पर्व-उत्सव का त्याग कर दे तो यह मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार नहीं हो सकता यदि इसे कोई मान्यता दे दें तो वो अपण्डित ही सिद्ध होंगे।
एक व्यक्ति/परिवार के लिये तो वर्षी में पर्व-उत्सव का बाध होता है किन्तु पूरे गांव के लिये नहीं होता। यदि पूरा गांव ऐसा करता है तो वह भोज खाने के लिये करेगा, न कि विद्वान आचार्य के अनुमोदन से। यह स्वेच्छाचार ही कहलायेगा, मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार नहीं कहला सकता। क्योंकि शास्त्रानुसार पूरे गांव के लिये पर्व-उत्सव बाधित नहीं हो रहा है और इसलिये विद्वान आचार्य कभी भी अनुमोदन नहीं करेंगे, अपण्डित भले ही कर दें।
विचार करें; अधिकांश क्षेत्रों में लोग खड़े-खड़े मूत्रोत्सर्ग करने लगे हैं क्या ये देशाचार, लोकाचार, मिथिला व्यवहार कहा जा सकता है ? नहीं भाई इसका विद्वान आचार्य अनुमोदन नहीं करते हैं, हां अपण्डित स्वयं भी भले ही खड़े-खड़े कर लेते हों। यह शास्त्रविरुद्ध है और अनुमोदन प्राप्त कर ही नहीं सकता उस व्यक्ति विशेष के अतिरिक्त जिसे बैठने में समस्या हो।
जिसे बैठने में समस्या हो वह व्यक्ति विशेष होगा और उसके लिये परिस्थितिवश विद्वान आचार्य भी आज्ञा प्रदान करेंगे किन्तु पैंट पहने के कारण यदि बैठने में समस्या होती है तो इसको अनुमोदित नहीं किया जा सकता वो भी शारीरिक समस्या के कारण होने पर ही किया जा सकेगा और वो व्यक्ति विशेष तक ही सीमित होगा, कुलाचार भी नहीं बन सकता।
मिथिला व्यवहार का सर्वोत्तम उदाहरण है श्राद्ध में पत्नी के स्थान पर बेनी (पैंता) का प्रयोग करना। यह शास्त्र से भी सिद्ध होता है, आचार्यों ने ग्रहण भी किया है। किन्तु इससे श्राद्ध में पत्नी के सम्मिलित होने का निषेध नहीं होता है यह भी ध्यातव्य है। अपण्डित ऐसा अनर्थ भी कर लेते हैं कि यदि कोई तीर्थ में सपत्नीक श्राद्ध करने गया है तो वहां पत्नी का सम्मिलित होना निषिद्ध होगा ही नहीं।
इसी प्रकार वर्षी, पार्वण में भी जब घर (प्रांगण) में ही कर रहा हो तो वहां भी पत्नी के सम्मिलित होने में कोई सामाजिक व्यवधान नहीं है। ये सामाजिक व्यवधान मात्र षोडशश्राद्ध में ही होता है जहां समाज के बहुत सारे लोग उपस्थित होते हैं, बंधु-बांधव भी उपस्थित होते हैं और ऐसी परिस्थिति में मर्यादा, लोकलज्जा वश पत्नी के लिये विकल्प को ही प्रधानता से ग्रहण किया गया है।
कल्पना कीजिये भयंकर वर्षा हो रही हो और सभी ईंधन भी भींग गए हों, पाक बनाना संभव न हो तो वहां विद्वान आचार्य चावल पीसकर (चौरठ) के प्रयोग की अथवा खोया आदि अनेकों विकल्प दे सकते हैं ताकि श्राद्ध का लोप न हो। किन्तु यह आगे जाकर कुलाचार भी नहीं बन सकता लोकाचार, देशाचार और मिथिला व्यवहार होना तो दूर की कौड़ी है।
इसी प्रकार यदि विवाह में भी मंडप जल गया हो तो मंडप रहित स्थान पर भी चादर टांगकर विवाह करा सकते हैं। यह भी कुलाचार नहीं बन सकता क्योंकि परिस्थितिजन्य तात्कालिक विकल्प था क्योंकि तत्काल नया मंडप बनना संभव ही नहीं था।
इसी प्रकार किसी व्यक्ति ने यदि एकादशी व्रत कर रखा और उसको रक्तचाप निम्न या उच्च हो रहा है, अथवा मधुमेह, वात आदि कोई भी समस्या है तो उसके लिये ब्राह्मण उचित भक्ष्य के भक्षण की आज्ञा प्रदान कर सकते हैं जो लाभकारी हो, किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं होगा कि आगे से और भी कोई व्यक्ति एकादशी में उसका भक्षण करना आरम्भ कर दे और कुलाचार, देशाचार आदि बन जाये।
श्राद्ध के अर्घ्य पात्र में शन्नो देवी मंत्र से जल, तिलोऽसि मंत्र से तिल प्रक्षेप करने का विधान है किन्तु लोक व्यवहार में यह पूर्व से ही दिया रहता है और कुशा से स्पर्श करके मंत्र पाठ किया जाता है। इसमें कुछ भी शास्त्रविरुद्ध नहीं है अतः यह लोकाचार, देशाचारादि है।
इस प्रकार हम यहां पहुंचे हैं कि कोई भी विषय जो व्यक्ति मात्र के लिये विहित किया गया हो वह कुलाचार-लोकाचार आदि नहीं सिद्ध हो सकता। किन्तु कोई विषय जो सामूहिक रूप से स्वीकार किया गया हो और शास्त्रविरुद्ध न हो भले ही शास्त्रसम्मत भी न हो तो वह लोकाचार, देशाचार आदि सिद्ध होगा।
निगमो धर्ममूलं स्यात्स्मृतिशीले तथैव च । तथाचारश्च साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥
सर्वं तु समवेक्षेत निश्चयं ज्ञानचक्षुषा । श्रुतिप्राधान्यतो विद्वान्स्वधर्मे निवसेत वै ॥
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन्सदा नरः । प्राप्य चेह परां कीर्तिं याति शक्रसलोकताम् ॥
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेषु मीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥
योऽवमन्येत ते चोभे हेतुशास्त्राश्रयाद्द्विजः । स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥
भविष्यपुराण/१(ब्राह्मपर्व)/७/५२ – ५६
यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं
“यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं” का तात्पर्य भी यह है कि शास्त्रसम्मत तो हो किन्तु लोक में किसी प्रकार की हानि, विघ्न संभावित हो तो उसका परित्याग किया जा सकता है जैसे बाल विवाह विरोधी कानून से बाल विवाह में लोकहानि होगी, कारागार जाना पर सकता है। किन्तु इसमें शास्त्रविरुद्ध करने की आज्ञा प्रदान नहीं की गयी है यदि कानून से बाध्यकारी न हो तो। कानून से बाध्यकारी होने पर शास्त्रविरुद्ध भी करना ही होगा जब तक वह कानून हो किन्तु वह लोकाचार, देशाचार आदि नहीं बन सकता।
जैसे विधवा विवाह के लिये बाध्यकारी प्रावधान नहीं है तो करना ही करना है ऐसा सिद्ध नहीं होता। तो शास्त्रविरुद्ध होने के कारण भले ही कानून प्रशस्त कर रहा हो यह लोकाचार आदि नहीं बन सकता। ये लोकाचार, देशाचार चिल्लाने वाले उस बाल विवाह विरोधी कानून पर कभी क्यों नहीं चिल्लाते, कभी विधवा विवाह पर क्यों नहीं चिल्लाते। इससे यह सिद्ध होता है कि ये लोग अपण्डित है और लोकाचार, देशाचार के नाम पर अपनी मूर्खता को ही ढंकते हैं।
बहुत ही स्थानों पर सामान्य लोगों को ही नहीं अपण्डितों को भी शिखाग्रन्थियुक्त, उपानद धारण किये हुये भोजनादि करते दिखते हैं, सामूहिक रूप से भोज में भी और व्यक्तिगत रूप से भी । इसका तात्पर्य यह नहीं कि इसको देशाचार, लोकाचार, मिथिला व्यवहार कहें । मूर्खों का व्यवहार लोकाचार, देशाचारादि नहीं हो सकता।
जब नामधारक ब्राह्मणों का सामूहिक व्यवहार भी यदि वह अपण्डित है तो लोकाचारादि नहीं सिद्ध हो सकता तो ब्राह्मणेतरों के व्यवहार का महत्व ही क्या शेष रहता है अर्थात् वह विद्वानों के समीक्षाधीन ही होता है। अपण्डित किसी व्यवहार को लोकाचार, देशाचारादि घोषित करने का अधिकारी ही नहीं होता।
वर्तमान काल व्रात्यता सामान्य व्यवहार जैसा होता चला जा रहा है और यदि इन अपण्डितों को अधिकारी माना जाये तो ये व्रात्यता को भी मिथिला व्यवहार घोषित कर दें, लोकाचार, देशाचारादि घोषित कर दें। क्या ये अपण्डित वर्ग जो बात-बात में लोकाचारादि चिल्लाते रहते हैं इनको अधिकारी माना जाय तो इन्हें भले ही व्रात्यता दोष, परिहार, वैकल्पिक मार्ग का रत्तीभर ज्ञान न हो किन्तु व्रात्यता को मिथिला व्यवहार, लोकाचार, देशाचारादि घोषित नहीं कर देंगे?
अस्तु जिस किसी भी व्यवहार को चाहें लोकाचार, कुलाचार, देशाचार कह दें तो यह स्वयं ही अपण्डित होने की घोषणा करने जैसा है। अब एक और उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है : अधिकांश नहीं अपितु ९९% भी अधिक हवन विधिरहित ही किये जाते हैं ८० – ९० प्रतिशत हवन तो सीधे अग्नि प्रज्वलित करके, पूजा करना हो तो पूजा करके भी स्वाहा-स्वाहा कर देते हैं, शेष थोड़े से पंचभूसंस्कार करते हैं किन्तु आगे की विधियों का लोप कर देते हैं।
हां प्रोक्षणी-प्रणीता के नाम पर दो कटोरी या ढकनी रख देते हैं किन्तु उसके स्थान का भी ज्ञान नहीं होता यत्र-तत्र रखते हैं किन्तु वो भी प्रतीकात्मक मात्र होता है हवन को विधिवत सिद्ध करना उद्देश्य होता है। यजमान को क्या ज्ञात कि ये भी विधिवत नहीं है उसे तो यह लगता है कि और कर्मकांडी ऐसे ही हवन कराते थे एवं ये विस्तार से कराते हैं। तो क्या इसका तात्पर्य यह होगा कि इसे लोकाचार, देशाचार, मिथिला व्यवहार स्वीकार कर लिया जाय नहीं, कदापि नहीं।
मान लीजिये मैं विधिवत हवन करता हूँ और कोई मुझे कहे कि नहीं ये लोकाचार है, मिथिला व्यवहार है ऐसे ही कर दीजिये विधिवत की आवश्यकता नहीं तो मैं नहीं करूँगा क्या, अरे उसे नानी का स्मरण करा दूंगा और विधिवत ही हवन करूँगा यदि विधिवत नहीं हो सकता तो हवन करूँगा ही नहीं। भविष्य में इस विधिहीन आसुरी हवन को भी अपण्डित लोकाचार, देशाचार, मिथिला व्यवहार घोषित करने का दुस्साहस करेंगे ये मुझे ज्ञात है और इसलिये इसका भी आज ही खंडन कर रहा हूँ, यह मिथिला व्यवहार, देशाचार, लोकाचार आदि कुछ भी नहीं है। शास्त्रों के अनुसार यह आसुरी है, निष्फल ही नहीं दुष्परिणामकर भी है।
लोकाचार, देशाचार, कुलाचार आदि के नियम और शर्त्त
विद्वद्भिः सेवितो धर्मो यस्मिन्देशे प्रवर्तते । शास्त्रोक्तश्चापि विप्रेन्द्राः स देशः परमो मतः ॥
भविष्यपुराण/१(ब्राह्मपर्व)/७/४६
इस प्रकार से यह विमर्श और विश्लेषण बहुत विशाल हो सकता है किन्तु शेष विमर्श मैं परवर्ती आचार्यों के लिये छोड़ रहा हूं। वर्तमान में तो सभी ऐसे कुकर्म कर ही रहे हैं अर्थात् जहां कहीं त्रुटि पकड़ी जाती है तो तपाक से देश-काल-परिस्थति का रोना रोने लगते हैं, देशाचार-लोकाचार चिल्लाने लगते हैं। उपरोक्त विश्लेषण से देशाचार, लोकाचार, मिथिला व्यवहार आदि के लिये कुछ नियम और शर्तें स्पष्ट होते हैं जो इस प्रकार कहे जा सकते हैं :

- लोकाचार, देशाचारादि की मान्यता तभी तक होती है जब तक वह शास्त्रविरुद्ध न हो। भले शास्त्र सम्मत होना अनिवार्य न हो किन्तु शास्त्रविरुद्ध न होना अनिवार्य है।
- शास्त्र सम्मत अथवा शास्त्र विरुद्ध का निर्णय शास्त्रज्ञ विद्वान ब्राह्मण ही कर सकते हैं, सामान्य जन स्वयं नहीं कर सकते ।
- संख्याबल के आधार पर लोकतांत्रिक कहकर लिया गया निर्णय शास्त्रसम्मत हो ही यह अनिवार्य नहीं है अर्थात वह लोकाचार देशाचारादि नहीं कहला सकता।
- लोकाचारादि शास्त्र सम्मत वैकल्पिक मार्ग भी हो सकता है अथवा वो प्रतीकात्मक व्यवहार भी हो सकता है जो शास्त्र विरुद्ध न हो।
- लोकाचारादि न तो अनादि हैं और न ही अनंत अर्थात् विशेष कालखंडों में परिस्थितिवश आरम्भ भी होते हैं और समाप्त भी होते हैं।
- जो भी लोकाचार, देशाचार आदि शास्त्रविरुद्ध सिद्ध हो तो उसे समाप्त करना ही चाहिये, किन्तु शास्त्रविरुद्ध होने की पुष्टि शास्त्रज्ञ विद्वानों द्वारा हो तो।
संख्याबल के आधार पर लिया गया अधिकांश निर्णय शास्त्रविरुद्ध ही होता है और यदि संख्याबल से ही निर्णय होना आवश्यक होता फिर शास्त्र का औचित्य ही क्या। संख्याबल से तो शास्त्र को भी अस्वीकार किया जा सकता है जैसा कि मोहन भागवत ने कहा “शास्त्र ऑउटडेटेड हो गए हैं परिवर्तन होना चाहिये” (शब्दशः नहीं है), ये तो वो भी करने के लिये तत्पर हैं।
किन्तु ऐसा करना भी शास्त्र का खंडन करना ही है, शास्त्र संविधान की भांति नहीं है अपितु संविधान से तुलना करना भी शास्त्र का अपमान है। संविधान स्वयं ही शास्त्रों का अपमान कर रहा है और बहुधा देखा भी जाता है कि संविधान-संविधान चिल्लाने वाले धर्म, धार्मिक प्रतीकों, शास्त्र की निंदा आदि भी करते हैं।
चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत्रैविद्यमेव वा । सा ब्रूते यं स धर्मः स्यादेकोवाऽध्यात्मवित्तमः ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति/आचाराध्याय/९
निष्कर्ष
“विवेकहीन कर्मकाण्डी उस अंधे के समान है जो दूसरों को भी गर्त में ले जाता है।”
निष्कर्षतः, “देश, काल, परिस्थिति, लोकाचार और देशाचार” जैसे शब्द शास्त्र द्वारा प्रदत्त ‘विवेकाधिकार’ के उपकरण हैं, न कि स्वेच्छाचार के आवरण। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि कोई भी व्यवहार तभी ‘सदाचार’ या ‘लोकाचार’ की संज्ञा प्राप्त कर सकता है, जब वह ‘विद्वद्भिः सेवितः’ (विद्वानों द्वारा आचरित) हो और मूल श्रुति-स्मृति के सिद्धांतों के विपरीत न हो। वर्तमान में ९९% से अधिक कर्मकाण्ड में इन शब्दों का दुरुपयोग केवल अपनी अयोग्यता और विधि-लोप को छिपाने के लिए किया जा रहा है। विवेकहीन बहुमत द्वारा अपनाया गया कोई भी गलत अभ्यास कभी ‘देशाचार’ नहीं बन सकता। अतः, एक सच्चे कर्मकाण्डी का दायित्व है कि वह कुतर्कों का परित्याग कर ‘शास्त्र-दृष्टि’ से धर्म का निर्णय करे।
“यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं” का तात्पर्य यह है कि यदि कोई विधि समाज में महान हानि कर रही हो तो उसका त्याग करें, किन्तु उसका आधार ‘तर्क’ नहीं, अपितु ‘शास्त्र’ होना चाहिए। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, धर्म का निर्णय ‘पर्षद’ (३ विद्वानों की सभा) करती है, न कि ‘लोकतांत्रिक संख्याबल’। यदि एक ही विद्वान हों तो एक मात्र विद्वान का निर्णय ही धर्म होता है न कि सहस्रों अपण्डितों का।
जो कर्मकाण्डी ‘देश-काल’ की दुहाई देकर विधि को छोटा करते हैं, वे वास्तव में अपनी अयोग्यता को छिपा रहे हैं। भविष्य के आचार्यों के लिए यह आलेख एक ‘दर्पण’ की भांति कार्य करेगा। यदि आज इस स्वेच्छाचार का खंडन नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां ‘अधर्म’ को ही ‘देशाचार’ मानकर आचरण करेंगी।
F&Q :
FAQ
प्रश्न: क्या लोकाचार शास्त्र से बड़ा है?
उत्तर: नहीं। श्रुति और स्मृति के अविरोध में ही सदाचार/लोकाचार ग्राह्य है। श्रुति ही सर्वोपरि है।
प्रश्न: क्या विवाह में पैंट पहनना ‘परिस्थिति’ मानी जा सकती है?
उत्तर: नहीं। यह ‘म्लेच्छाचार’ है। परिस्थिति शारीरिक अक्षमता को कहते हैं, फैशन के दबाव को नहीं।
प्रश्न: क्या संख्याबल से लोकाचार तय होता है?
उत्तर: नहीं। यदि पूरा गाँव शास्त्र विरुद्ध आचरण करे, तो वह ‘पाप/दुराचार’ होगा, ‘लोकाचार’ नहीं।
प्रश्न: ‘देशाचार’ और ‘कुलाचार’ में क्या अंतर है?
उत्तर: जो व्यवहार एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में मान्य हो वह देशाचार है, और जो केवल एक विशिष्ट वंश तक सीमित हो वह कुलाचार है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: यह आलेख पूर्णतः शास्त्रीय शोध, स्मृति-पुराणों के प्रमाणों और प्रामाणिक कर्मकाण्ड परंपराओं के विश्लेषण पर आधारित है। यहाँ व्यक्त विचार ‘स्वेच्छाचार’ के विरुद्ध ‘शास्त्र-मर्यादा’ को स्थापित करने के उद्देश्य से दिए गए हैं। किसी भी स्थानीय परंपरा या कुल-धर्म में परिवर्तन करने से पूर्व अपने क्षेत्र के ‘धर्मशास्त्र-विशारद’ और ‘विद्वत परिषद्’ से परामर्श अवश्य लें। यह लेख किसी की व्यक्तिगत भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं, बल्कि लुप्त होती शास्त्रीय चेतना को जाग्रत करने हेतु लिखा गया है।
कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।








